इंडियन नेशनल कांग्रेस के संस्थापक थे इंग्लैण्ड में सन् 1829 में जन्मे मि. एलन आक्टेवियन ह्रूम। यह शायद बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि कांग्रेस के संस्थापक ने 1857 में अंग्रेजों की सत्ता के विरुद्ध भड़के विद्रोह के दौरान इटावा व आगरा में अपने हाथों से अनेक स्वतंत्रता सेनानी राष्ट्रभक्तों की हत्या की थी। महीनों तक ए. ओ. ह्रूम भारतीय स्वाधीनता सेनानियों के विरुद्ध सक्रिय रहे थे। आधुनिकतम शस्त्रों व तोपों के बल पर राष्ट्रभक्त ग्रामीणों व भारतीय सिपाहियों को कुचलने में उन्होंने अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी।
ये सनसनीखेज रहस्योद्घाटन लगभग सौ वर्ष पूर्व संवत् 1973 में प्रकाशित सर विलियम बेडरवर्न द्वारा लिखित “काँग्रेस के पिता- एलन आक्टेवियन ह्रूम” पुस्तक में किया गया है। मूलत: अंग्रेजी की इस पुस्तक का हिन्दी अनुवाद दयाचन्द गोयलीय तथा चिरंजी लाल माथुर ने किया था। पुस्तक का प्रकाशन हिन्दी गौरव ग्रंथ माला, बम्बई द्वारा किया गया था। यह ऐतिहासिक पुस्तक मुझे हाल ही में अपने पिताश्री भक्त रामशरणदास जी के संग्रहालय में सुरक्षित पुस्तकों में मिली।
पुस्तक में पृष्ठ 8 पर कहा गया है- “एलन ह्रूम सन् 1849 ई. में बंगाल सिविल सर्विस में भरती हुए। उस समय उनकी अवस्था 20 वर्ष थी। उन्हें हिन्दुस्थान में आये अभी आठ वर्ष भी न बीते थे कि 1857 में गदर मच गया और उनको अपनी सैनिक वीरता और शासन की योग्यता के प्रकट करने का मौका मिला। उनकी जल्दी-जल्दी पदोन्नति होती गई। उनकी केवल 26 वर्ष की अवस्था थी जब वे इटावा जिले के प्रधान सिविल अफसर (कलेक्टर) थे।
जब सन् 1857 का मई का महीना प्रारंभ हुआ तब किसी प्रकार की भी शंका नहीं थी। सब काम ठीक-ठाक चल रहा था। अपराध कम होते जा रहे थे। लगान और मालगुजारी आसानी से वसूल हो जाती थी। ऐसी अवस्था में ही 10 मई को एकाएक तूफान आ गया। मेरठ में घुड़सवार सेना ने हमला कर दिया। दो दिन के अन्दर इटावा में भी इस उपद्रव के समाचार पहुंच गये। एक-दो दिन बाद थोड़ी सी फौज भी आ गई। जबरदस्त मुकाबले के बाद बहुत से बागी तो कैद कर लिए गये और बहुत से मार डाले गये।” इसके बाद जो कुछ हुआ उसे एक अन्य अंग्रेजी अधिकारी काये ने अपनी पुस्तक “सिपाही विद्रोह” में लिखा है। ह्रूम साहब की उन्होंने बड़ी प्रशंसा की है।
काये लिखते हैं- “उस समय ह्रूम साहब इटावा में मजिस्ट्रेट व कलेक्टर थे। लोकोपकार और वीरता आदि गुण उन्होंने अपने पिता से पैतृक सम्पत्ति के तौर पर प्राप्त किये थे। 18 तथा 19 मई को उसी सेना के “भगोड़ों” अर्थात हिन्दुस्थानी सिपाहियों का दूसरा दल इटावा से 10 मील की दूरी पर जसवंत नगर में आ पहुँचा। जब पुलिस के सिपाहियों ने अधीनता स्वीकार करने को कहा तो उन्होंने कुछ सिपाहियों को गोली से मार डाला। बागी एक हिन्दू मंदिर पर कब्जा करके वहां से अपना बचाव करने लगे। जब ह्रूम साहब ने यह खबर सुनी तो उन्होंने तुरन्त अपनी बग्घी मंगवाई और गोली, बारूद, तमंचा, बन्दूक वगैरह तमाम हथियार लेकर अपने सहायक कर्मचारी मिस्टर डेनियल सहित रवाना हो गये।”
आगे लिखा है, “ह्रूम साहब कुछ सिपाहियों को साथ लेकर मंदिर के सामने जा डटे। कठिनाई यह थी कि स्थानीय लोग बागियों की तरफ थे। जब दिन ढल गया और सूर्य अस्त होने लगा तब केवल इन दोनों अंग्रेज अफसरों ने ही एक पुलिस सिपाही को साथ लेकर उस मंदिर पर छापा मारा। इस दौरान पुलिस का सिपाही गोली से मर गया और डेनियल के चेहरे में से होकर गोली पार हो गई। ह्रूम ने बड़ी वीरता से डेनियल को बचाकर गाड़ी तक पहुँचाया। इस दौरान उन्होंने एक बागी को जान से मार डाला तथा दूसरे को अधमरा कर दिया। इसी से घबराकर बागी लोग रात को भाग निकले।”
काये लिखते हैं- इससे अंग्रेज जाति की वीरता और धीरता का अच्छी तरह पता चलता है। ह्रूम साहब और उनके सहायक डेनियल ने बागी लोगों के सामने ही उन लोगों से बदला लिया जिन्होंने कुछ दिन पहले अंग्रेजों को मार डाला था।
लेखक इटावा के हिन्दुस्थानी सैनिकों द्वारा मई के इस स्वाधीनता संग्राम में पूरी तरह सक्रियता से जुटने की चर्चा करते हुए लिखता है- “इटावा की सेना ने भी उपद्रव मचा दिया, खजाना लूट लिया, बंगले जला दिये। जेलों में से तमाम कैदी मुक्त करा दिये। अंग्रेज मेमों को राजभक्त कर्मचारियों के साथ चुपचाप आगरा के किले में पहुंचा दिया गया।” लेकिन भारतीय सैनिकों की वीरता से ह्रूम इतना डर गया था कि पहले तो उसने मेज के नीचे छिपकर जान बचाई और बाद में 17 जून को ह्रूम महिला का वेश बनाकर रात के समय इटावा से चुपचाप आगरा भागने को मजबूर हो गया था- यह इस पुस्तक के लेखक ने नहीं बताया। क्योंकि वह ह्रूम को वीर साहसी सिद्ध करना चाहता था।
5 जुलाई को आगरा में स्वाधीनता सेनानी हिन्दुस्थानी सैनिकों तथा अंग्रेजों की सेना के बीच हुए युद्ध का वर्णन निम्न शब्दों में किया गया है-
“बागियों में दो हजार अच्छे-सधे सिपाही थे और एक फौज बंगाल के तोपखाने की थी। यहां बड़ा युद्ध हुआ और इसमें बहुत से अफसर काम आए। ह्रूम साहब बराबर तोपखाने के साथ काम करते रहे। कर्नल पैट्रिक बैनरमैन ने कहा था, “ह्रूम साहब जैसे साहसी वीर मैंने बहुत कम देखे हैं। वे कई रातों तक खुली हवा में तोपों के साथ रहे। यहां तक कि हैजे ने उन्हें परेशान किया और उन्हें बीमार होकर किले में जाना पड़ा।”
ह्रूम कई माह तक आगरा में ही चुपचाप दुबके रहे। जनवरी में उन्होंने पुन: वापस पहुंचकर इटावा को कब्जे में लेने का प्रयास किया। 7 फरवरी 1858 को इटावा के पास अनंतराम में विद्रोहियों व अंग्रेजों की सेना के बीच हुए युद्ध में ह्रूम ने तोपों के गोलों से किस प्रकार स्वधीनता समर्थकों पर कहर ढाया इसका विषद वर्णन किया गया है।
प्रधान सेनापति ने लार्ड केनिंग को भेजी रपट में लिखा- “मि. ह्रूम और कप्तान एल्किजेन्डर ने बड़ी वीरता से काम किया। इस लड़ाई का नतीजा यह हुआ कि 131 बागी मारे गये और उनके घोड़े, तोपें, गोला बारूद- हथियार अंग्रेजी सेना के हाथ आये।
हमने अजीत महल में रूपसिंह के एक दल पर बड़े जोर से धावा किया, जिसमें पूर्ण सफलता पाई। शत्रुओं को भागना पड़ा उनके सात आदमी गड्ढों में गिरकर मर गये। दूसरे दिन हमने दोपहर को शत्रु पर फिर छापा मारा। 15 को काट डाला और तीन को पकड़ कर फाँसी पर चढ़ा दिया।”
स्वयं ह्रूम ने आगे लिखा है- “हमने बागियों की अपने से कहीं बड़ी फौज को हरा दिया। उनकी तोपें व सामान छीन लिया और उनके 81 सधे हुए सिपाहियों को मार डाला।”
उपरोक्त तथ्यात्मक विवरण से यह स्पष्ट हो जाता है कि इंडियन कांग्रेस के जन्मदाता ए.ओ. ह्रूम ने 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान राष्ट्रभक्त हिन्दुस्थानी सिपाहियों व ग्रामीणों पर कहर बरपाने में कोई संकोच नहीं किया था। उन्होंने लगभग एक वर्ष तक उन्हें शत्रु मानकर उनसे संघर्ष किया, उनकी हत्या करने में संकोच नहीं किया। इन्हीं ए.ओ. ह्रूम ने 1885 में कांग्रेस की स्थापना की।
आगे चलकर 18 मार्च, 1894 को बम्बई में आयोजित अपने विदाई अभिनंदन समारोह में कांग्रेस संस्थापक ए.ओ. ह्रूम ने अपने भाषण में भारतवासियों को सम्बोधित करते हुए कहा- “यदि दुर्भाग्य से यूरोप में विश्व युद्ध हो जाए तो भारतवासियों के लिए यही उपयुक्त है कि वे एक होकर बिना किसी सोच-विचार के ब्रिाटिश जाति की सहायता करें। यद्यपि इस (अंग्रेज) जाति में अनेक कमियाँ हैं तथापि यह सभ्य और शिष्ट जाति है। जो कुछ तुमने प्राप्त किया है वह सब इसी के प्रताप से किया है। अत: यही उचित है कि ऐसे युद्ध के समय में एक होकर ब्रिाटिश टापू की रक्षा करो जो स्वतंत्रता का केन्द्र है।”
ह्रूम ने भारत से विदा लेते समय दिए गये अपने सन्देश में भी उस ब्रिटिश जाति को सभ्य और शिष्ट बताया जिसने भारत में शासन के दौरान अपनी क्रूरता व अत्याचारों से मानवता को तार-तार कर डाला था। संसार के अनेक देशों को गुलामी की बेड़ियों में जकड़ने वाले ब्रिटेन को वे अंत तक स्वतंत्रता का केन्द्र बताने में गर्व करते थे।
काँग्रेस उसी ह्रूम की रोपी गई पौध है, क्या इस देश के काँग्रेसी इसी पर गर्व करते हैं कि एक भारतविद्वेषी और राष्ट्रभक्तों के हत्यारे ने उनकी पार्टी की नींव रखी थी?
क्या वे उसी काँग्रेस की वर्षगांठ मना रहे हैं?