Wednesday, 20 April 2016

हिन्दू धर्म के वो कौनसे 20 रहस्य जो अनसुलझे है


<div style="text-align: justify;"><br></div><div style="text-align: justify;">हिन्दू धर्म या भारतीय संस्कृति में प्रचलित और कई&nbsp;ग्रंथों में उल्लेखित भारत के 29 ऐसे रहस्य हैं, जो अभी तक अनसुलझे हुए हैं और उनमें से कुछ का तो रहस्य मानव कभी नहीं जान पाएगा। प्राचीन सभ्यताओं, धर्म, समाज और संस्कृतियों का महान देश भारत वैसे भी रहस्य और रोमांच के लिए जाना जाता है। एक ओर जहां भारत में दुनिया की प्रथम भाषा संस्कृत का जन्म हुआ तो दूसरी ओर दुनिया का प्रथम ग्रंथ ऋग्वेद लिखा गया।</div><div style="text-align: justify;"><br></div><div style="text-align: justify;">वही जन्मी दुनिया की प्रथम लिपि ब्राह्मी लिपि का जन्म हुआ तो दूसरी ओर दुनिया के प्रथम विश्वविद्यालय नालंदा और तक्षशिला की स्थापना हुई। ज्यामिति, पाई का मान, रिलेटिविटी का सिद्धांत जैसे कई सिद्धांत और आविष्कार हैं, जो भारत ने गढ़े हैं। लेकिन हम इन सबको हटकर कुछ ऐसे 29 रहस्य बताने वाले हैं, जो अब तक बिलकुल अनसुलझे हैं।</div><div style="text-align: justify;"><br></div><div style="text-align: justify;">Next Slide: <b>हिन्दू धर्म का पहला रहस्य...</b></div>

हिन्दू धर्म या भारतीय संस्कृति में प्रचलित और कई ग्रंथों में उल्लेखित भारत के 29 ऐसे रहस्य हैं, जो अभी तक अनसुलझे हुए हैं और उनमें से कुछ का तो रहस्य मानव कभी नहीं जान पाएगा। प्राचीन सभ्यताओं, धर्म, समाज और संस्कृतियों का महान देश भारत वैसे भी रहस्य और रोमांच के लिए जाना जाता है। एक ओर जहां भारत में दुनिया की प्रथम भाषा संस्कृत का जन्म हुआ तो दूसरी ओर दुनिया का प्रथम ग्रंथ ऋग्वेद लिखा गया।
वही जन्मी दुनिया की प्रथम लिपि ब्राह्मी लिपि का जन्म हुआ तो दूसरी ओर दुनिया के प्रथम विश्वविद्यालय नालंदा और तक्षशिला की स्थापना हुई। ज्यामिति, पाई का मान, रिलेटिविटी का सिद्धांत जैसे कई सिद्धांत और आविष्कार हैं, जो भारत ने गढ़े हैं। लेकिन हम इन सबको हटकर कुछ ऐसे 29 रहस्य बताने वाले हैं, जो अब तक बिलकुल अनसुलझे हैं।

<div><b><br></b></div><div><b>ऋषि कश्यप और उनकी पत्नियों के पुत्रों का रहस्य :</b> कहते हैं कि धरती के प्रारंभिक काल में धरती एक द्वीप वाली थी, फिर वह दो द्वीप वाली बनी और अंत में सात द्वीपों वाली बन गई। प्रारंभिक काल में ब्रह्मा ने समुद्र में और धरती पर कई तरह के जीवों की भी उत्पत्ति की। उत्पत्ति के इस काल में उन्होंने अपने काफी मानस पुत्रों को भी जन्म दिया। उन्हीं में से एक थे मरीची। ऋषि कश्यप ब्रह्माजी के मानस पुत्र मरीची के विद्वान पुत्र थे।&nbsp;</div><div><br></div><div>मान्यता के मुताबित न्हें अनिष्टनेमी के नाम से भी जाना जाता है। इनकी माता 'कला' कर्दम ऋषि की पुत्री और कपिल देव की बहन थी। आपको बता दे की&nbsp;यहां रहस्य वाली बात यह कि क्या कोई इंसान सर्प, पक्षी, पशु आदि तरह की जातियों को जन्म दे सकता है? जबकि जीव विकासवादियों को ऐसे में शोध करना जरूर चाहिए। भगवान विष्णु सदा एक गरूड़ पर सवार रहते थे। ये गरूड़जी कश्यप की पत्नी विनीता से जन्मे थे।</div><div>&nbsp;</div><div>ऐसे तो कश्यप ऋषि की कई पत्नियां थीं जबकि प्रमुख रूप से 17 का हम उल्लेख करना चाहेंगे- 1. अदिति, 2. दिति, 3. दनु, 4. काष्ठा, 5. अरिष्टा, 6. सुरसा, 7. इला, 8. मुनि, 9. क्रोधवशा, 10. ताम्रा, 11. सुरभि, 12. सुरसा, 13. तिमि, 14. विनीता, 15. कद्रू, 16. पतांगी और 17. यामिनी आदि पत्नियां बनीं।</div><div><br></div><div>1. अदिति से 12 आदित्यों का जन्म हुआ- विवस्वान्, अर्यमा, पूषा, त्वष्टा, सविता, भग, धाता, विधाता, वरुण, मित्र, इंद्र और त्रिविक्रम (भगवान वामन)। ये सभी देवता कहलाए और इनका हिमालय के उत्तर में स्थान था।</div><div>&nbsp;</div><div>2. दिति से कई पुत्रों का जन्म हुआ- कश्यप ऋषि ने दिति के गर्भ से हिरण्यकश्यप और हिरण्याक्ष नामक 2 पुत्र एवं सिंहिका नामक एक पुत्री को जन्म दिया। ये दैत्य कहलाए और इनका स्थान हिमालय के ‍दक्षिण में था। श्रीमद्भागवत के मुताबित इन 3 संतानों के अलावा दिति के गर्भ से कश्यप के 49 अन्य पुत्रों का जन्म भी हुआ, जो कि मरुन्दण कहलाए। कश्यप के ये पुत्र बिल्कुल नि:संतान रहे जबकि हिरण्यकश्यप के 4 पुत्र थे- अनुहल्लाद, हल्लाद, भक्त प्रह्लाद और संहल्लाद।</div><div>&nbsp;</div><div>3. दनु : ऋषि कश्यप को उनकी पत्नी दनु के गर्भ से द्विमुर्धा, शम्बर, अरिष्ट, हयग्रीव, विभावसु, अरुण, अनुतापन, धूम्रकेश, विरुपाक्ष, दुर्जय, अयोमुख, शंकुशिरा, कपिल, शंकर, एकचक्र, महाबाहु, तारक, महाबल, स्वर्भानु, वृषपर्वा, महाबली पुलोम और विप्रचिति आदि 61 महान पुत्रों की प्राप्ति हुई। ये सभी पुत्र दानव कहलाए।</div><div>&nbsp;</div><div><img src="http://i.imgur.com/osI4Eh8.jpg" width="100%"></div><div><font size="2">Image Source:</font>&nbsp;<a href="https://en.wikipedia.org/wiki/Arundhati_(Hinduism)" title="" target="_blank"><font size="2">wikipidia</font></a></div><div><br></div><div>4. इनकी&nbsp;अन्य पत्नियां : रानी काष्ठा से घोड़े आदि एक खुर वाले पशु उत्पन्न हुए। पत्नी अरिष्टा से गंधर्व पैदा हुए। सुरसा नामक रानी से यातुधान (राक्षस) उत्पन्न हुए। इला से वृक्ष, लता आदि पृथ्वी पर उत्पन्न होने वाली वनस्पतियों का जन्म हुआ। मुनि के गर्भ से अप्सराएं जन्मीं। कश्यप की क्रोधवशा नामक रानी ने सांप, बिच्छू आदि विषैले जंतु पैदा किए।</div><div>&nbsp;</div><div>ताम्रा ने बाज, गिद्ध आदि शिकारी पक्षियों को अपने बच्चे के रूप में जन्म दिया। सुरभि ने भैंस, गाय तथा दो खुर वाले पशुओं की उत्पत्ति की। रानी सरसा ने बाघ इत्यादि हिंसक जीवों को पैदा किया। तिमि ने जलचर जंतुओं को अपनी संतान के रूप में उत्पन्न किया।</div><div><br></div><div>और यही नहीं&nbsp;रानी विनीता के गर्भ से गरूड़ (विष्णु का वाहन) और वरुण (सूर्य का सारथि) पैदा हुए। कद्रू की कोख से बहुत से नागों की उत्पत्ति हुई जिनमें प्रमुख 8 नाग थे- अनंत (शेष), वासुकि, तक्षक, कर्कोटक, पद्म, महापद्म, शंख और कुलिक।</div><div><br></div><div>रानी पतंगी से पक्षियों का जन्म हुआ। यामिनी के गर्भ से शलभों (पतंगों) का जन्म हुआ। ब्रह्माजी की आज्ञा से प्रजापति कश्यप ने वैश्वानर की 2 पुत्रियों पुलोमा और कालका के साथ भी विवाह किया। उनसे पौलोम और कालकेय नाम के 60 हजार रणवीर दानवों का जन्म हुआ, जो कि कालांतर में निवात कवच के नाम से भी विख्यात हुए।</div>

ऋषि कश्यप और उनकी पत्नियों के पुत्रों का रहस्य : कहते हैं कि धरती के प्रारंभिक काल में धरती एक द्वीप वाली थी, फिर वह दो द्वीप वाली बनी और अंत में सात द्वीपों वाली बन गई। प्रारंभिक काल में ब्रह्मा ने समुद्र में और धरती पर कई तरह के जीवों की भी उत्पत्ति की। उत्पत्ति के इस काल में उन्होंने अपने काफी मानस पुत्रों को भी जन्म दिया। उन्हीं में से एक थे मरीची। ऋषि कश्यप ब्रह्माजी के मानस पुत्र मरीची के विद्वान पुत्र थे। 

मान्यता के मुताबित न्हें अनिष्टनेमी के नाम से भी जाना जाता है। इनकी माता 'कला' कर्दम ऋषि की पुत्री और कपिल देव की बहन थी। आपको बता दे की यहां रहस्य वाली बात यह कि क्या कोई इंसान सर्प, पक्षी, पशु आदि तरह की जातियों को जन्म दे सकता है? जबकि जीव विकासवादियों को ऐसे में शोध करना जरूर चाहिए। भगवान विष्णु सदा एक गरूड़ पर सवार रहते थे। ये गरूड़जी कश्यप की पत्नी विनीता से जन्मे थे।
 
ऐसे तो कश्यप ऋषि की कई पत्नियां थीं जबकि प्रमुख रूप से 17 का हम उल्लेख करना चाहेंगे- 1. अदिति, 2. दिति, 3. दनु, 4. काष्ठा, 5. अरिष्टा, 6. सुरसा, 7. इला, 8. मुनि, 9. क्रोधवशा, 10. ताम्रा, 11. सुरभि, 12. सुरसा, 13. तिमि, 14. विनीता, 15. कद्रू, 16. पतांगी और 17. यामिनी आदि पत्नियां बनीं।

1. अदिति से 12 आदित्यों का जन्म हुआ- विवस्वान्, अर्यमा, पूषा, त्वष्टा, सविता, भग, धाता, विधाता, वरुण, मित्र, इंद्र और त्रिविक्रम (भगवान वामन)। ये सभी देवता कहलाए और इनका हिमालय के उत्तर में स्थान था।
 
2. दिति से कई पुत्रों का जन्म हुआ- कश्यप ऋषि ने दिति के गर्भ से हिरण्यकश्यप और हिरण्याक्ष नामक 2 पुत्र एवं सिंहिका नामक एक पुत्री को जन्म दिया। ये दैत्य कहलाए और इनका स्थान हिमालय के ‍दक्षिण में था। श्रीमद्भागवत के मुताबित इन 3 संतानों के अलावा दिति के गर्भ से कश्यप के 49 अन्य पुत्रों का जन्म भी हुआ, जो कि मरुन्दण कहलाए। कश्यप के ये पुत्र बिल्कुल नि:संतान रहे जबकि हिरण्यकश्यप के 4 पुत्र थे- अनुहल्लाद, हल्लाद, भक्त प्रह्लाद और संहल्लाद।
 
3. दनु : ऋषि कश्यप को उनकी पत्नी दनु के गर्भ से द्विमुर्धा, शम्बर, अरिष्ट, हयग्रीव, विभावसु, अरुण, अनुतापन, धूम्रकेश, विरुपाक्ष, दुर्जय, अयोमुख, शंकुशिरा, कपिल, शंकर, एकचक्र, महाबाहु, तारक, महाबल, स्वर्भानु, वृषपर्वा, महाबली पुलोम और विप्रचिति आदि 61 महान पुत्रों की प्राप्ति हुई। ये सभी पुत्र दानव कहलाए।


4. इनकी अन्य पत्नियां : रानी काष्ठा से घोड़े आदि एक खुर वाले पशु उत्पन्न हुए। पत्नी अरिष्टा से गंधर्व पैदा हुए। सुरसा नामक रानी से यातुधान (राक्षस) उत्पन्न हुए। इला से वृक्ष, लता आदि पृथ्वी पर उत्पन्न होने वाली वनस्पतियों का जन्म हुआ। मुनि के गर्भ से अप्सराएं जन्मीं। कश्यप की क्रोधवशा नामक रानी ने सांप, बिच्छू आदि विषैले जंतु पैदा किए।
 
ताम्रा ने बाज, गिद्ध आदि शिकारी पक्षियों को अपने बच्चे के रूप में जन्म दिया। सुरभि ने भैंस, गाय तथा दो खुर वाले पशुओं की उत्पत्ति की। रानी सरसा ने बाघ इत्यादि हिंसक जीवों को पैदा किया। तिमि ने जलचर जंतुओं को अपनी संतान के रूप में उत्पन्न किया।

और यही नहीं रानी विनीता के गर्भ से गरूड़ (विष्णु का वाहन) और वरुण (सूर्य का सारथि) पैदा हुए। कद्रू की कोख से बहुत से नागों की उत्पत्ति हुई जिनमें प्रमुख 8 नाग थे- अनंत (शेष), वासुकि, तक्षक, कर्कोटक, पद्म, महापद्म, शंख और कुलिक।

रानी पतंगी से पक्षियों का जन्म हुआ। यामिनी के गर्भ से शलभों (पतंगों) का जन्म हुआ। ब्रह्माजी की आज्ञा से प्रजापति कश्यप ने वैश्वानर की 2 पुत्रियों पुलोमा और कालका के साथ भी विवाह किया। उनसे पौलोम और कालकेय नाम के 60 हजार रणवीर दानवों का जन्म हुआ, जो कि कालांतर में निवात कवच के नाम से भी विख्यात हुए।


10 फन, उड़ने वाले, मणिधर और इच्छाधारी सांप होते हैं? आप सभी जानते है की जीव-जंतुओं में सबसे उच्च स्थान गाय का है और उसके बाद सांप ही है! सांप एक रहस्यमय प्राणी है। आपने देखा होगा की आज भी देशभर के गांवों में लोगों के शरीर में नाग देवता की सवारी आती है।

शिव के प्रमुख गणों में सांप भी है। भारत में नाग जातियों का एक लंबा इतिहास रहा है। कहते हैं कि कश्यप की क्रोधवशा नामक रानी ने सांप, बिच्छू आदि विषैले जंतु पैदा किए। अनंत (शेष), वासुकि, तक्षक, कर्कोटक और पिंगला- उक्त 5 नागों के कुल के लोगों का ही भारत में वर्चस्व था। ये सभी कश्यप वंशी थे, जबकि इन्हीं से नागवंश चला। और शेषनाग को 10 फन वाला माना गया है। भगवान विष्णु भी उन पर ही लेटे हुए दर्शाए गए हैं।

माना जाता है कि 100 सालो से ज्यादा उम्र होने के बाद सर्प में उड़ने की शक्ति आ जाती है। सर्प कई तरह के होते हैं जिनमे मणिधारी, इच्‍छाधारी, उड़ने वाले, एकफनी से लेकर दसफनी तक के सांप, जिसे शेषनाग कहते हैं। नीलमणिधारी सांप को सबसे उत्तम माना जाता है। इच्छाधारी नाग के बारे में कहा जाता है कि वह अपनी इच्छा से मानव, पशु या अन्य किसी भी जीव के अनुसार अपना रूप धारण कर सकता है। जबकि वैज्ञानिको ने इसकी पुष्टि की है लेकिन 10 फन वाले सांप अभी तक उन्हें नहीं देखे गए हैं।

<div style="text-align: justify;"><br></div><div style="text-align: justify;"><b>10 फन, उड़ने वाले, मणिधर और इच्छाधारी सांप होते हैं?</b>&nbsp;आप सभी जानते है की जीव-जंतुओं में सबसे उच्च स्थान गाय का है और उसके बाद सांप ही है! सांप एक रहस्यमय प्राणी है। आपने देखा होगा की आज भी&nbsp;देशभर के गांवों में लोगों के शरीर में नाग देवता की सवारी आती है।</div><div style="text-align: justify;"><br></div><div style="text-align: justify;">शिव के प्रमुख गणों में सांप भी है। भारत में नाग जातियों का एक लंबा इतिहास रहा है। कहते हैं कि कश्यप की क्रोधवशा नामक रानी ने सांप, बिच्छू आदि विषैले जंतु पैदा किए। अनंत (शेष), वासुकि, तक्षक, कर्कोटक और पिंगला- उक्त 5 नागों के कुल के लोगों का ही भारत में वर्चस्व था। ये सभी कश्यप वंशी थे, जबकि इन्हीं से नागवंश चला। और शेषनाग को 10 फन वाला माना गया है। भगवान विष्णु भी उन पर ही लेटे हुए दर्शाए गए हैं।</div><div style="text-align: justify;"><br></div><div><div style="text-align: justify;">माना जाता है कि 100 सालो से ज्यादा उम्र होने के बाद सर्प में उड़ने की शक्ति आ जाती है। सर्प कई तरह के होते हैं जिनमे&nbsp;मणिधारी, इच्‍छाधारी, उड़ने वाले, एकफनी से लेकर दसफनी तक के सांप, जिसे शेषनाग कहते हैं। नीलमणिधारी सांप को सबसे उत्तम माना जाता है। इच्छाधारी नाग के बारे में कहा जाता है कि वह अपनी इच्छा से मानव, पशु या अन्य किसी भी जीव के अनुसार अपना रूप धारण कर सकता है। जबकि वैज्ञानिको ने इसकी पुष्टि की है लेकिन 10 फन वाले सांप अभी तक उन्हें नहीं देखे गए हैं।</div></div>

क्या पारसमणि होती है? मणि एक प्रकार का चमकता हुआ खूबसूरत पत्थर होता है। मणि को हीरे की श्रेणी में रखा जा सकता है। यह भी अपने आप में एक रहस्य है। जिसके भी पास मणि होती थी वह कुछ भी कर सकता था। ज्ञात हो कि अश्वत्थामा के पास एक मणि थी जिसके बल पर वह काफी शक्तिशाली और अमर हो गया था। रावण ने कुबेर से चंद्रकांत नाम की मणि छीन ली थी।

मान्यता है कि मणियां कई प्रकार की होती थीं। नीलमणि, चंद्रकांत मणि, शेष मणि, कौस्तुभ मणि, पारसमणि, लाल मणि आदि। पारसमणि से लोहे की किसी भी चीज को छुआ देने से वह सोने की बन जाती थी। लोग कहते हैं कि कौवों को इसकी पहचान होती है और यह हिमालय के पास में पाई जाती है। और जबकि पौराणिक ग्रंथों में भी ‍मणि के किस्से काफी भरे पड़े हैं।

<div><br></div><b>क्या पारसमणि होती है?</b> मणि एक प्रकार का चमकता हुआ खूबसूरत पत्थर होता है। मणि को हीरे की श्रेणी में रखा जा सकता है। यह भी अपने आप में एक रहस्य है। जिसके भी पास मणि होती थी वह कुछ भी कर सकता था। ज्ञात हो कि अश्वत्थामा के पास एक&nbsp;मणि थी जिसके बल पर वह काफी शक्तिशाली और अमर हो गया था। रावण ने कुबेर से चंद्रकांत नाम की मणि छीन ली थी।<div><br></div><div><div>मान्यता है कि मणियां कई प्रकार की होती थीं। नीलमणि, चंद्रकांत मणि, शेष मणि, कौस्तुभ मणि, पारसमणि, लाल मणि आदि। पारसमणि से लोहे की किसी भी चीज को छुआ देने से वह सोने की बन जाती थी। लोग कहते हैं कि कौवों को इसकी पहचान होती है और यह हिमालय के पास में पाई जाती है। और जबकि पौराणिक ग्रंथों में भी ‍मणि के किस्से काफी भरे पड़े हैं।</div></div>


संजीवनी बूटी का रहस्य अभी भी बरकरार : शुक्राचार्य को मृत संजीवनी विद्या याद थी जिसके दम पर वे युद्ध में मारे गए दैत्यों को फिर से जीवित कर देते थे। और इस विद्या को सीखने के लिए गुरु बृहस्पति ने अपने एक शिष्य को शुक्राचार्य का शिष्य बनने के लिए भेजा। उसने यह विद्या सीख ली थी जबकि शुक्राचार्य और उनके दैत्यों को इसका जब पता चला तो उन्होंने उसका वध कर दिया।

रामायण में उल्लेख मिलता है कि जब राम-रावण युद्ध में मेघनाथ आदि के भयंकर अस्त्र प्रयोग से समूची राम सेना मरणासन्न हो गई थी, तो हनुमानजी ने जामवंत के कहने पर वैद्यराज सुषेण को बुलाया और फिर सुषेण ने कहा कि आप द्रोणगिरि पर्वत पर जाकर 4 वनस्पतियां लाएं : मृत संजीवनी (मरे हुए को जिलाने वाली), विशाल्यकरणी (तीर निकालने वाली), संधानकरणी (त्वचा को स्वस्थ करने वाली) तथा सवर्ण्यकरणी (त्वचा का रंग बहाल करने वाली)। हनुमान बेशुमार वनस्पतियों में से इन्हें पहचान नहीं पाए, तो वह पूरा पर्वत ही उठा लाए। और इस प्रकार लक्ष्मण को मृत्यु के मुख से खींचकर जीवनदान दिया गया।

इन 4 वनस्पतियों में से मृत संजीवनी (या सिर्फ संजीवनी कहें) सबसे महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह व्यक्ति को मृत्युशैया से पुनः स्वस्थ कर सकती है। लेकिन सवाल यह है कि यह चमत्कारिक पौधा कौन-सा है! और इस बारे में कृषि विज्ञान विश्वविद्यालय, बेंगलुरु और वानिकी महाविद्यालय, सिरसी के डॉ. केएन गणेशैया, डॉ. आर. वासुदेव तथा डॉ. आर. उमाशंकर ने बेहद व्यवस्थित ढंग से इस पर शोध कर 2 पौधों को चिह्नित भी किया है।

इन 6 में से भी 3 प्रजातियां ऐसी थीं, जो 'संजीवनी' या उससे मिलते-जुलते शब्द से सर्वाधिक बार और सबसे ज्यादा एकरूपता से मेल खाती थी : क्रेसा क्रेटिका, सिलेजिनेला ब्रायोप्टेरिस और डेस्मोट्रायकम फिम्ब्रिएटम। इनके सामान्य नाम क्रमशः रुदन्ती, संजीवनी बूटी और जीवका हैं। इन्हीं में से एक का चुनाव करना था। अगला सवाल यह था कि इनमें से कौन-सी पर्वतीय इलाके में पाई जाती है, जहां हनुमान ने इसे तलाशा होगा। क्रेसा क्रेटिका नहीं हो सकती, क्योंकि यह दखन के पठार या नीची भूमि में पाई जाती है।
 
सिलेजिनेला ब्रायोप्टेरिस कई महीनों तक एकदम सूखी या 'मृत' पड़ी रहती है और एक बारिश आते ही 'पुनर्जीवित' हो उठती है। डॉ. एनके शाह, डॉ. शर्मिष्ठा बनर्जी और सैयद हुसैन ने इस पर कुछ प्रयोग किए हैं और पाया है कि इसमें कुछ ऐसे अणु पाए जाते हैं, जो ऑक्सीकारक क्षति व पराबैंगनी क्षति से चूहों और कीटों की कोशिकाओं की रक्षा करते हैं तथा उनकी मरम्मत में मदद करते हैं। तो क्या सिलेजिनेला ब्रायोप्टेरिस ही रामायण काल की संजीवनी बूटी है? 
 
सच्चे वैज्ञानिकों की भांति गणेशैया व उनके साथी जल्दबाजी में किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचना चाहते।इसके लिए उनका कहा की दूसरे पौधे डेस्मोट्रायकम फिम्ब्रिएटम का दावा भी कमतर नहीं है। अब इन दो प्रजातियों के बीच फैसला करने के लिए और शोध की जरूरत है। इसके संपन्न होते ही रामायणकालीन संजीवनी बूटी शायद हमारे सामने होगी।
 
भारतीय वैज्ञानिकों ने हिमालय के ऊपरी इलाके में पौधे की खोज की वो अलग ही अनोखा नज़र आता है। वैज्ञानिकों का दावा है कि यह पौधा एक ऐसी औषधि के रूप में काम करता है, जो हमारे इम्यून सिस्टम को रेग्युलेट करता है। और हमारे शरीर को पर्वतीय परिस्थितियों के अनुरूप ढलने में भी काफी मदद करता है और हमें रेडियो एक्टिविटी से भी बचाता है। लेकिन आज तक कोई भी इन जड़ी बूटियों के बारे में सही उत्तर नहीं दे सका है!



<div><br></div><b>संजीवनी बूटी का रहस्य अभी भी बरकरार :</b> शुक्राचार्य को मृत संजीवनी विद्या याद थी जिसके दम पर वे युद्ध में मारे गए दैत्यों को फिर से जीवित कर देते थे। और&nbsp;इस विद्या को सीखने के लिए गुरु बृहस्पति ने अपने एक शिष्य को शुक्राचार्य का शिष्य बनने के लिए भेजा। उसने यह विद्या सीख ली थी जबकि शुक्राचार्य और उनके दैत्यों को इसका जब पता चला तो उन्होंने उसका वध कर दिया।<div><br></div><div>रामायण में उल्लेख मिलता है कि जब राम-रावण युद्ध में मेघनाथ आदि के भयंकर अस्त्र प्रयोग से समूची राम सेना मरणासन्न हो गई थी, तो हनुमानजी ने जामवंत के कहने पर वैद्यराज सुषेण को बुलाया और फिर सुषेण ने कहा कि आप द्रोणगिरि पर्वत पर जाकर 4 वनस्पतियां लाएं : मृत संजीवनी (मरे हुए को जिलाने वाली), विशाल्यकरणी (तीर निकालने वाली), संधानकरणी (त्वचा को स्वस्थ करने वाली) तथा सवर्ण्यकरणी (त्वचा का रंग बहाल करने वाली)। हनुमान बेशुमार वनस्पतियों में से इन्हें पहचान नहीं पाए, तो वह पूरा पर्वत ही उठा लाए। और इस प्रकार लक्ष्मण को मृत्यु के मुख से खींचकर जीवनदान दिया गया।</div><div><br></div><div><div>इन 4 वनस्पतियों में से मृत संजीवनी (या सिर्फ संजीवनी कहें) सबसे महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह व्यक्ति को मृत्युशैया से पुनः स्वस्थ कर सकती है। लेकिन सवाल यह है कि यह चमत्कारिक पौधा कौन-सा है! और इस बारे में कृषि विज्ञान विश्वविद्यालय, बेंगलुरु और वानिकी महाविद्यालय, सिरसी के डॉ. केएन गणेशैया, डॉ. आर. वासुदेव तथा डॉ. आर. उमाशंकर ने बेहद व्यवस्थित ढंग से इस पर शोध कर 2 पौधों को चिह्नित भी&nbsp;किया है।</div><div><br></div><div>इन 6 में से भी 3 प्रजातियां ऐसी थीं, जो 'संजीवनी' या उससे मिलते-जुलते शब्द से सर्वाधिक बार और सबसे ज्यादा एकरूपता से मेल खाती थी : क्रेसा क्रेटिका, सिलेजिनेला ब्रायोप्टेरिस और डेस्मोट्रायकम फिम्ब्रिएटम। इनके सामान्य नाम क्रमशः रुदन्ती, संजीवनी बूटी और जीवका हैं। इन्हीं में से एक का चुनाव करना था। अगला सवाल यह था कि इनमें से कौन-सी पर्वतीय इलाके में पाई जाती है, जहां हनुमान ने इसे तलाशा होगा। क्रेसा क्रेटिका नहीं हो सकती, क्योंकि यह दखन के पठार या नीची भूमि में पाई जाती है।</div><div>&nbsp;</div><div>सिलेजिनेला ब्रायोप्टेरिस कई महीनों तक एकदम सूखी या 'मृत' पड़ी रहती है और एक बारिश आते ही 'पुनर्जीवित' हो उठती है। डॉ. एनके शाह, डॉ. शर्मिष्ठा बनर्जी और सैयद हुसैन ने इस पर कुछ प्रयोग किए हैं और पाया है कि इसमें कुछ ऐसे अणु पाए जाते हैं, जो ऑक्सीकारक क्षति व पराबैंगनी क्षति से चूहों और कीटों की कोशिकाओं की रक्षा करते हैं तथा उनकी मरम्मत में मदद करते हैं। तो क्या सिलेजिनेला ब्रायोप्टेरिस ही रामायण काल की संजीवनी बूटी है?&nbsp;</div><div>&nbsp;</div><div>सच्चे वैज्ञानिकों की भांति गणेशैया व उनके साथी जल्दबाजी में किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचना चाहते।इसके लिए उनका कहा की दूसरे पौधे डेस्मोट्रायकम फिम्ब्रिएटम का दावा भी कमतर नहीं है। अब इन दो प्रजातियों के बीच फैसला करने के लिए और शोध की जरूरत है। इसके संपन्न होते ही रामायणकालीन संजीवनी बूटी शायद हमारे सामने होगी।</div><div>&nbsp;</div><div>भारतीय वैज्ञानिकों ने हिमालय के ऊपरी इलाके में पौधे की खोज की वो अलग ही अनोखा नज़र आता है। वैज्ञानिकों का दावा है कि यह पौधा एक ऐसी औषधि के रूप में काम करता है, जो हमारे इम्यून सिस्टम को रेग्युलेट करता है। और हमारे शरीर को पर्वतीय परिस्थितियों के अनुरूप ढलने में भी काफी&nbsp;मदद करता है और हमें रेडियो एक्टिविटी से भी बचाता है। लेकिन आज तक कोई भी इन जड़ी बूटियों के बारे में सही उत्तर नहीं दे सका है!</div></div>
क्या कल्पवृक्ष अभी भी है? : वेद और पुराणों में कल्पवृक्ष का काफी  उल्लेख मिलता है। कल्पवृक्ष स्वर्ग का एक विशेष प्रकार का वृक्ष है। और पौराणिक धर्मग्रंथों और हिन्दू मान्यताओं के मुताबित यह माना जाता है कि इस वृक्ष के नीचे बैठकर व्यक्ति जो भी इच्छा मांगता है वह पूर्ण हो जाती है, क्योंकि इस वृक्ष में अपार सकारात्मक ऊर्जा का काफी भंडार होता है। यह वृक्ष समुद्र मंथन से निकला था। और समुद्र मंथन से प्राप्त यह वृक्ष देवराज इन्द्र को दे दिया गया था और इन्द्र ने इसकी 'सुरकानन वन' (हिमालय के उत्तर में) में स्थापना कर दी थी।

कल्प की आयु : कल्पवृक्ष का अर्थ होता है, जो एक कल्प तक जीवित रहे। जबकि अब सवाल यह उठता है कि क्या सच में ऐसा कोई वृक्ष था या अभी भी है? यदि था तो उसे आज भी होना चाहिए, क्योंकि उसे तो एक कल्प तक जीवित रहना है। यदि ऐसा कोई-सा वृक्ष है तो वह कैसा दिखता है? और उसके क्या फायदे हैं? जबकि कुछ लोग कहते हैं कि अपरिजात के वृक्ष को ही कल्पवृक्ष माना जाता है, लेकिन अधिकतर इससे कोई भी सहमत नहीं हैं।

<div style="text-align: justify;"><b><br></b></div><div style="text-align: justify;"><b>क्या कल्पवृक्ष अभी भी है?</b> : वेद और पुराणों में कल्पवृक्ष का काफी&nbsp; उल्लेख मिलता है। कल्पवृक्ष स्वर्ग का एक विशेष प्रकार का वृक्ष है। और&nbsp;पौराणिक धर्मग्रंथों और हिन्दू मान्यताओं के मुताबित यह माना जाता है कि इस वृक्ष के नीचे बैठकर व्यक्ति जो भी इच्छा मांगता है वह पूर्ण हो जाती है, क्योंकि इस वृक्ष में अपार सकारात्मक ऊर्जा का काफी भंडार होता है। यह वृक्ष समुद्र मंथन से निकला था। और समुद्र मंथन से प्राप्त यह वृक्ष देवराज इन्द्र को दे दिया गया था और इन्द्र ने इसकी&nbsp;'सुरकानन वन' (हिमालय के उत्तर में)&nbsp;में&nbsp;स्थापना कर&nbsp;दी थी।</div><div style="text-align: justify;"><br></div><div>कल्प की आयु : कल्पवृक्ष का अर्थ होता है, जो एक कल्प तक जीवित रहे। जबकि अब सवाल यह उठता है कि क्या सच में ऐसा कोई वृक्ष था या अभी भी&nbsp;है? यदि था तो उसे&nbsp;आज भी होना चाहिए, क्योंकि उसे तो एक कल्प तक जीवित रहना है। यदि ऐसा कोई-सा वृक्ष है तो वह कैसा दिखता है? और उसके क्या फायदे हैं? जबकि कुछ लोग कहते हैं कि अपरिजात के वृक्ष को ही कल्पवृक्ष माना जाता है, लेकिन अधिकतर इससे कोई भी&nbsp;सहमत नहीं हैं।</div>


क्या कामधेनु गाय होती थी? : आपको बता दे की कामधेनु गाय की उत्पत्ति भी समुद्र मंथन से हुई थी। और यह एक चमत्कारी गाय होती थी जिसके दर्शन मात्र से ही सभी प्रकार के दु:ख-दर्द दूर हो जाते थे। और  दैवीय शक्तियों से संपन्न यह गाय जिसके भी पास होती थी उससे चमत्कारिक लाभ मिलता था। इस गाय का दूध अमृत के समान माना जाता था।

आपको पता होगा की हिन्दु्ओं के लिए सबसे पवित्र पशु गाय है। इस धरती पर भी सबसे पहले गायों की कुछ ही प्रजातियां होती थीं। उससे भी प्रारंभिक काल में केवल एक ही प्रजाति थी। जो आज से करीब 9,500 साल पूर्व गुरु वशिष्ठ ने गाय के कुल का विस्तार किया और उन्होंने गाय की नई प्रजातियों को भी बनाया, तब गाय की 8 या 10 नस्लें ही थीं जिनका नाम कामधेनु, कपिला, देवनी, नंदनी, भौमा आदि था। कामधेनु के लिए गुरु वशिष्ठ से विश्वामित्र सहित कई अन्य राजाओं ने कई बार युद्ध किया, जबकि उन्होंने कामधेनु गाय को किसी को भी नहीं दिया। और गाय के इस झगड़े में गुरु वशिष्ठ के सारे100 पुत्र मारे गए थे।

माना जाता है की गाय में 33 कोटि के देवी-देवता निवास करते हैं। कोटि का अर्थ 'करोड़' नहीं, 'प्रकार' होता है। इसका मतलब गाय में 33 प्रकार के देवता निवास करते हैं। ये देवता हैं- 12 आदित्य, 8 वसु, 11 रुद्र और 2 अश्‍विन कुमार। ये मिलकर कुल 33 होते हैं। इनके कारण गाय से कई तरह के रोगो को दूर करने के गुण भी मोजूत है और इसके हर एक अंग से पुण्य अपने का भी है!
<div><br></div><b>क्या कामधेनु गाय होती थी?</b> : आपको बता दे की&nbsp;कामधेनु गाय की उत्पत्ति भी समुद्र मंथन से हुई थी। और&nbsp;यह एक चमत्कारी गाय होती थी जिसके दर्शन मात्र से ही सभी प्रकार के दु:ख-दर्द दूर हो जाते थे। और &nbsp;दैवीय शक्तियों से संपन्न यह गाय जिसके भी पास होती थी उससे चमत्कारिक लाभ मिलता था। इस गाय का दूध अमृत के समान माना जाता था।<div><br></div><div><div>आपको पता होगा की हिन्दु्ओं के लिए सबसे पवित्र पशु गाय है। इस धरती पर भी सबसे पहले गायों की कुछ ही प्रजातियां होती थीं। उससे भी प्रारंभिक काल में केवल&nbsp;एक ही प्रजाति थी। जो&nbsp;आज से करीब 9,500 साल पूर्व गुरु वशिष्ठ ने गाय के कुल का विस्तार किया और उन्होंने गाय की नई प्रजातियों को भी बनाया, तब गाय की 8 या 10 नस्लें ही थीं जिनका नाम कामधेनु, कपिला, देवनी, नंदनी, भौमा आदि था। कामधेनु के लिए गुरु वशिष्ठ से विश्वामित्र सहित कई अन्य राजाओं ने कई बार युद्ध किया, जबकि उन्होंने कामधेनु गाय को किसी को भी नहीं दिया। और गाय के इस झगड़े में गुरु वशिष्ठ के सारे100 पुत्र मारे गए थे।</div><div><br></div><div>माना जाता है की गाय में 33 कोटि के देवी-देवता निवास करते हैं। कोटि का अर्थ 'करोड़' नहीं, 'प्रकार' होता है। इसका मतलब गाय में 33 प्रकार के देवता निवास करते हैं। ये देवता हैं- 12 आदित्य, 8 वसु, 11 रुद्र और 2 अश्‍विन कुमार। ये मिलकर कुल 33 होते हैं। इनके कारण गाय से कई तरह के रोगो को दूर करने के गुण भी मोजूत है और इसके हर एक अंग से पुण्य अपने का भी है!</div></div>

सोमरस के बारे में अक्सर पढ़ने और सुनने को मिलता है। लेकिन ये केसा होता है और क्या होता है इसका पता नहीं है !ऋग्वेद में शराब की काफी घोर निंदा करते हुए कहा गया है-
।।हृत्सु पीतासो युध्यन्ते दुर्मदासो न सुरायाम्।।
अर्थात : सुरापान करने या नशीले पदार्थों को पीने वाले अक्सर युद्ध, मार-पिटाई या उत्पात मचाया करते हैं।

जबकि वेदों में शराब को बुराइयों की एक जड़ भी कहा गया है, देवताओं को कैसे शराब चढ़ा सकते हैं। लेकिन सुरापान और सोमरस में काफी फर्क था।


सोमरस के बारे में अक्सर पढ़ने और सुनने को मिलता है। लेकिन ये केसा होता है और क्या होता है इसका पता नहीं है !ऋग्वेद में शराब की काफी&nbsp;घोर निंदा करते हुए कहा गया है-<div><div>।।हृत्सु पीतासो युध्यन्ते दुर्मदासो न सुरायाम्।।</div><div>अर्थात : सुरापान करने या नशीले पदार्थों को पीने वाले अक्सर युद्ध, मार-पिटाई या उत्पात मचाया करते हैं।</div><div><br></div><div>जबकि&nbsp;वेदों में शराब को बुराइयों की एक जड़ भी कहा गया है, देवताओं को कैसे शराब चढ़ा सकते हैं। लेकिन सुरापान और सोमरस में काफी फर्क था।</div></div>

ये तो सभी को पता है की समुद्र मंथन के समय कोई ऐसा रस निकला था जिसे पीकर देवताओं ने अमरता को प्राप्त कर लिया था? यदि ऐसा समुद्र से ऐसा कोई रस निकल सकता है तो क्या आज क्यों नहीं निकल सकता? उस दौरान अमृत कलश के लिए देव और दैत्यों के बीच काफी भयंकर युद्ध हुआ था। और सचमुच अमृत का निकलना एक रहस्य भी है। जबकि वैज्ञानिक ऐसी दवा बनाने में लगे हैं जिसे पीकर व्यक्ति अधिक समय तक जवान बना रह सके।

अमर होने का रहस्य : आज अमर कौन नहीं होना चाहता? समुद्र मंथन में अमृत निकला। इसे प्राप्त करने के लिए देवताओं ने दानवों के साथ एक छल किया। और देवता अमर हो गए। अभी अधिकतम 100 साल के जीवन में अनेकानेक रोग, कष्ट, संताप और झंझट होते हैं तो आज अमृत जल पिने से अमर हो जाने पर 100 साल बाद वैराग्य प्राप्त कर व्यक्ति हिमालय चला जाएगा। और वहां व्यक्ति क्या करेगा? आपको पता है वो बोर हो जाएगा! इस लिए आज यह संसार में नहीं आकर रहेगा। बस इसीलिए यही सिलसिला हमेशा चलता रहेगा।

<div><br></div>ये तो सभी को पता है की&nbsp;समुद्र मंथन के समय कोई ऐसा रस निकला था जिसे पीकर देवताओं ने अमरता को प्राप्त कर लिया था? यदि ऐसा समुद्र से ऐसा कोई रस निकल सकता है तो क्या आज क्यों&nbsp;नहीं निकल सकता? उस दौरान&nbsp;अमृत कलश के लिए देव और दैत्यों के बीच काफी भयंकर युद्ध हुआ था। और&nbsp;सचमुच अमृत का निकलना एक रहस्य भी है। जबकि वैज्ञानिक ऐसी दवा बनाने में लगे हैं जिसे पीकर व्यक्ति अधिक समय तक जवान बना रह सके।<div><br></div><div>अमर होने का रहस्य : आज&nbsp;अमर कौन नहीं होना चाहता? समुद्र मंथन में अमृत निकला। इसे प्राप्त करने के लिए देवताओं ने दानवों के साथ एक छल किया। और देवता अमर हो गए। अभी अधिकतम 100 साल के जीवन में अनेकानेक रोग, कष्ट, संताप और झंझट होते हैं तो आज अमृत जल पिने से अमर हो जाने पर 100 साल बाद वैराग्य प्राप्त कर व्यक्ति हिमालय चला जाएगा। और वहां व्यक्ति क्या करेगा? आपको पता है वो&nbsp;बोर हो जाएगा! इस लिए आज यह संसार में नहीं आकर रहेगा। बस इसीलिए यही सिलसिला हमेशा चलता रहेगा।</div>

आपको बता दे की बर्बरीक महान पांडव भीम के पुत्र घटोत्कच और नागकन्या अहिलवती के पुत्र थे। कहीं-कहीं पर मुर दैत्य की पुत्री 'कामकंटकटा' के उदर से भी इनके जन्म होने की बात सामने आई है। बर्बरीक और घटोत्कच के बारे में कहा जाता है कि ये दोनों ही एक विशालकाय मानव थे। घटोत्कच ने कौरवों की सेना में काफी कोहराम मचा दिया था। और आखिरकार कर्ण ने उस अस्त्र का उपयोग किया जिसे वह अर्जुन पर चलाना चाहते थे लेकिन यह घटोत्कच किया और मारा गया।

महाभारत का युद्ध जब तय हो गया तो बर्बरीक ने भी युद्ध में सम्मिलित होने की अपनी इच्छा जताई और मां को हारे हुए पक्ष का साथ देने का वचन दिया। बर्बरीक अपने नीले रंग के घोड़े पर सवार होकर 3 बाण और धनुष के साथ कुरुक्षेत्र की रणभूमि में आया।

आपको बता दे की बर्बरीक के लिए तो 3 बाण ही काफी थे जिसके बल पर वे कौरव और पांडवों की पूरी सेना को समाप्त कर सकते थे। यह सब भगवान कृष्ण जानते थे तो इन्होने ब्राह्मण के वेश में उनके सामने उपस्थित होकर उनसे दान में छलपूर्वक बर्बरीक से शीश मांग लिया।
 
कृष्ण से बर्बरीक ने प्रार्थना की कि वे अंत तक ये युद्ध देखना चाहते हैं, तब कृष्ण ने उनकी यह बात स्वीकार कर ली। और ल्गुन मास की द्वादशी को उन्होंने अपने शीश का दान दिया। भगवान ने उस शीश को अमृत से सींचकर वहा की सबसे उच्चे स्थान पर रख दिया ताकि वे महाभारत युद्ध देख सकें। जहां से बर्बरीक संपूर्ण युद्ध का अच्छे से जायजा ले सकते थे।

<div><br></div>आपको बता दे की&nbsp;बर्बरीक महान पांडव भीम के पुत्र घटोत्कच और नागकन्या अहिलवती के पुत्र थे। कहीं-कहीं पर मुर दैत्य की पुत्री 'कामकंटकटा' के उदर से भी इनके जन्म होने की बात सामने आई है। बर्बरीक और घटोत्कच के बारे में कहा जाता है कि ये दोनों ही एक&nbsp;विशालकाय मानव थे। घटोत्कच ने कौरवों की सेना में काफी कोहराम मचा दिया था। और&nbsp;आखिरकार कर्ण ने उस अस्त्र का उपयोग किया जिसे वह अर्जुन पर चलाना चाहते थे लेकिन यह घटोत्कच किया और मारा गया।<div><br></div><div><div>महाभारत का युद्ध जब तय हो गया तो बर्बरीक ने भी युद्ध में सम्मिलित होने की अपनी इच्छा जताई और मां को हारे हुए पक्ष का साथ देने का वचन दिया। बर्बरीक अपने नीले रंग के घोड़े पर सवार होकर 3 बाण और धनुष के साथ कुरुक्षेत्र की रणभूमि में आया।</div><div><br></div><div>आपको बता दे की बर्बरीक के लिए तो 3 बाण ही काफी थे जिसके बल पर वे कौरव और पांडवों की पूरी सेना को समाप्त कर सकते थे। यह सब भगवान कृष्ण जानते थे तो इन्होने ब्राह्मण के वेश में उनके सामने उपस्थित होकर उनसे दान में छलपूर्वक बर्बरीक से शीश मांग लिया।</div><div>&nbsp;</div><div>कृष्ण से बर्बरीक ने प्रार्थना की कि वे अंत तक ये युद्ध देखना चाहते हैं, तब कृष्ण ने उनकी यह बात स्वीकार कर ली। और ल्गुन मास की द्वादशी को उन्होंने अपने शीश का दान दिया। भगवान ने उस शीश को अमृत से सींचकर वहा की सबसे उच्चे स्थान पर रख दिया ताकि वे महाभारत युद्ध देख सकें। जहां से बर्बरीक संपूर्ण युद्ध का अच्छे से जायजा ले सकते थे।</div></div>

आपको यह पता नहीं होगा की मथुरा से निकलकर भगवान कृष्ण ने द्वारिका क्षेत्र में ही पहले से स्थापित खंडहर हो चुके नगर क्षेत्र में एक और नए नगर की स्थापना की थी। और इनका कहना था की अपने पूर्वजों की भूमि को फिर से रहने लायक बनाया जायेगा। प्राचीन इतिहास की खोज करने वाले इतिहासकारों के अनुसार द्वारिका विश्व का सबसे रहस्यमय शहर है। इस शहर पर अभी भी काफी शोध करना बाकि है।

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गुफाएं तो भारत में बहुत हैं, जबकि अजंता-एलोरा की गुफाओं के बारे में तो आज वैज्ञानिक भी हते हैं कि ये किसी एलियंस के समूह ने बनाई हैं। यहां पर एक विशालकाय कैलाश मंदिर है। और आर्कियोलॉजिस्टों के अनुसार इसे कम से कम 4,000 साल पूर्व बनाया गया था। 40 लाख टन की चट्टानों से बनाए गए इस मंदिर को किस तकनीक से बनाया गया होगा? यह आज की आधुनिक इंजीनियरिंग की भी बस की बात नहीं है।

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आपको बता दे की जब तक कर्ण के पास उसका कवच और कुंडल हैं, तब तक उसे कोई नहीं मार सकता। ऐसे में अर्जुन की सुरक्षा भी इसके सामने फ़ैल थी। उधर देवराज इन्द्र भी चिंतित थे, क्योंकि अर्जुन उनका पुत्र था। भगवान कृष्ण और देवराज इन्द्र दोनों जानते थे कि जब तक कर्ण के पास पैदायशी कवच और कुंडल हैं, इन्हे युद्ध में कोई भी नहीं हरा सकता और ये अजेय रहेगा।

तभी कृष्ण ने देवराज इन्द्र को एक उपाय सुजय और फिर देवराज इन्द्र ने एक ब्राह्मण के वेश में कर्ण के समीप पहुंच गए। जब यह दान में कुछ न कुछ दे रहे थे तो देवराज इंद्रा भी लग गए और जब नंबर आया तो दानी कर्ण ने पूछा- विप्रवर, आज्ञा कीजिए! तभी देवराज इंद्रा ने छल से कर्ण के कवच और कुंडल दान में मांग लिए और कर्ण ने इन्हे दे दिए थे।

<div><br></div>आपको बता दे की जब तक कर्ण के पास उसका कवच और कुंडल हैं, तब तक उसे कोई नहीं मार सकता। ऐसे में अर्जुन की सुरक्षा भी इसके सामने फ़ैल थी। उधर देवराज इन्द्र भी चिंतित थे, क्योंकि अर्जुन उनका पुत्र था। भगवान कृष्ण और देवराज इन्द्र दोनों जानते थे कि जब तक कर्ण के पास पैदायशी कवच और कुंडल हैं, इन्हे युद्ध में कोई भी नहीं हरा सकता और ये अजेय रहेगा।<div><br></div><div>तभी कृष्ण ने देवराज इन्द्र को एक उपाय सुजय और फिर देवराज इन्द्र ने&nbsp;एक ब्राह्मण के वेश में कर्ण के समीप&nbsp;पहुंच गए। जब यह दान में कुछ न कुछ दे रहे थे तो देवराज इंद्रा भी लग गए और जब नंबर आया तो दानी कर्ण ने पूछा- विप्रवर, आज्ञा कीजिए! तभी देवराज इंद्रा ने छल से कर्ण के कवच और कुंडल दान में मांग लिए और कर्ण ने इन्हे दे दिए थे।</div>



आपको पता है कि भगवान विष्णु के पास सुदर्शन चक्र एक ऐसा अचूक अस्त्र था कि जिसे छोड़ने के बाद यह लक्ष्य का पीछा करता था और तब तक जाता था जब तक काम तमाम करके वापस छोड़े गए स्थान पर नहीं आ जाता था। इस चक्र को विष्णु की तर्जनी अंगुली में घूमते हुए दिखाया गया है। सबसे पहले यह चक्र उन्हीं के पास था। लेकिन यह आया कहा से उनके पास?

पुराणों की माने तो विभिन्न देवताओं के पास अपने-अपने चक्र हुआ करते थे। सभी चक्रों की अलग-अलग क्षमता होती थी और सभी के चक्रों के नाम भी होते थे। और महाभारत युद्ध में भी भगवान कृष्ण के पास अपना सुदर्शन चक्र था। यह सुदर्शन चक्र उनके पास कहां से आया था और चक्रों का जन्मदाता कौन था? क्या आज भी इस प्रकार का कोई अस्त्र शास्त्र बनाया जा सकता है? या कि यह एक चमत्कारिक शक्ति से ही संचालित होता था किसी मशीन द्वारा नहीं? ऐसे कई सवाल हैं जो रहस्य अभी भी बरकरार है। जबकि आजकल ऐसी मिसाइलें बनने लगी हैं, जो लक्ष्य को भेदकर वापस लौट आती हैं, परन्तु चक्र जैसा अस्त्र तो सचमुच ही एक अद्भुत है।
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आज पश्चिमी देशो में कई तरह की जादू-विद्या लोकप्रिय है और समाज में हर वर्ग के लोग भी इसका अभ्यास करते रहते हैं। एक समय था, जब भारत में जादूगरों की भरमार थी। और इस देश में एक से बढ़ कर एक जादूगर, सम्मोहनविद, इंद्रजाल, नट, सपेरे और करतब दिखाने वाले होते थे। बंगाल का काला जादू तो सबसे ज्यादा विश्वप्रसिद्ध था। 

यूरोप की कल्पना में भारत सदा से बेहिसाब संपत्ति और अलौकिक घटनाओं का एक अविश्वसनीय देश रहा है, और जहां बुद्धिमान, जादूगर, सिद्ध आदि व्यक्तियों की संख्या सामान्य से कुछ अधिक थी। वही विदेशी भ्रमणकर्ताओं और व्यापारियों ने भारत से कई तरह का जादू सीखा और उसे अपने देश में ले जाकर विकसित भी किया। बाद में इसी तरह के जादू का इस्तेमाल धर्म प्रचार के लिए करना चालू किया गया। 

भारत में सड़क या चौराहे पर जादूगर एक जादू दिखाते थे जिसे रस्सी का जादू या करतब कहा जाता था। बीन या पुंगी की धुन पर वह रस्सी सांप के पिटारे से निकलकर आसमान में चली जाती थी और जादूगर उसे हवा में झूले की तरह रस्सी को लड़का के चढ़कर आसमान में और वहां से कहीं गायब हो जाता था।
 
अंग्रजों के काल में किसी ने यह जादू दिखाया था, लेकिन उसके बाद से इस जादू के बारे में कभी किसी ने सुना ही जाता है। अब इसे दिखाने वाला कोई नहीं है। इसी कारण यह जादू भी विलुप्त हो गया है और आज यह कही है या नहीं पता चल नहीं सका हैं!

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वानर प्रजाति : क्या सचमुच रामायण काल में बताए गए जामवंत एक रीछ थे और हनुमानजी एक वानर? जबकि आज भी यह रहस्य बरकरार है। यदि बजरंग बली वानर नहीं होते तो उनको रामायण और रामचरित मानस में कपि, वानर, शाखामृग, प्लवंगम, लोमश और पुच्छधारी कहकर नहीं पुकारा जाता। लंकादहन का वर्णन भी फिर पूंछ से जुड़ा हुआ नहीं होता।

कहा जाता है कि कपि नामक एक वानर जाति थी। और हनुमानजी भी उसी जाति के ब्राह्मण थे। हनुमान चालीसा की एक पंक्ति है: को नहि जानत है जग में, 'कपि' संकटमोचन नाम तिहारो।। 

आपको बता दे की कुछ लोग कपि को चिंपांजी के रूप में देखते हैं। वैज्ञानिकों की माने तो 'कपि प्रजाति' होमिनोइडेया नामक महापरिवार प्राणी जगत की सदस्य जीव जातियों में से एक थी। जीव विज्ञानी कहते हैं कि होमिनोइडेया नामक महापरिवार के प्राणी जगत की 2 प्रमुख जाति शाखाएं जिसमें से प्रथम को 'हीन कपि' दूसरी को महाकपि कहा जाता था। हीन कपि अर्थात छोटे कपि और महाकपि अर्थात बड़े आकार के मानवनुमा कपि। इन महाकपियों की 4 उपशाखाएं भी हैं- गोरिल्ला, चिंपांजी, मनुष्य तथा ओरंगउटान। 

शोधकर्ताओं के मुताबित भारतवर्ष में आज से 9 से 10 लाख वर्ष पूर्व बंदरों की एक ऐसी विलक्षण जाति में विद्यमान थी, जो आज से करीब 15 हजार साल पूर्व विलुप्त होने लगी थी और रामायण काल के बाद करीब विलुप्त ही हो गई। इस वानर जाति का नाम 'कपि' था। मानवनुमा यह प्रजाति मुख और पूंछ से बंदर जैसी नजर आती थी। भारत से दुर्भाग्यवश कपि प्रजाति समाप्त हो गई, जबकि कहा जाता है कि इंडोनेशिया देश के बाली नामक द्वीप में अब भी पुच्छधारी जंगली मनुष्यों का अस्तित्व विद्यमान है। 

आपको बताना इस लिए जरुरी है, क्योंकि उत्तरी अमेरिका और पूर्वी एशिया के बीच फ्यूनल विनिमय के कुछ सबूत पाए गए हैं। कर्क ने बताया कि यह जीवाश्म अनुकूलित प्रजातियों के अंत के संबंध में बहुत कुछ जानकारी दे सकते हैं, क्योंकि यह अमेरिका के उस वक्त कितनी विविधता रही थी इस बात के जीते- जागते यह उदाहरण थे।
<div><br></div><b>वानर प्रजाति :</b> क्या सचमुच रामायण काल में बताए गए जामवंत एक रीछ थे और हनुमानजी एक वानर? जबकि आज भी यह रहस्य बरकरार है। यदि बजरंग बली वानर नहीं होते तो उनको रामायण और रामचरित मानस में कपि, वानर, शाखामृग, प्लवंगम, लोमश और पुच्छधारी कहकर नहीं पुकारा जाता। लंकादहन का वर्णन भी फिर पूंछ से जुड़ा हुआ नहीं होता।<div><br><div><div>कहा जाता है कि कपि नामक एक वानर जाति थी। और&nbsp;हनुमानजी भी&nbsp;उसी जाति के ब्राह्मण थे। हनुमान चालीसा की एक पंक्ति है: को नहि जानत है जग में, 'कपि' संकटमोचन नाम तिहारो।।&nbsp;</div><div><br></div><div>आपको बता दे की&nbsp;कुछ लोग कपि को चिंपांजी के रूप में देखते हैं। वैज्ञानिकों की माने&nbsp;तो 'कपि प्रजाति' होमिनोइडेया नामक महापरिवार प्राणी जगत की सदस्य जीव जातियों में से एक थी। जीव विज्ञानी कहते हैं कि होमिनोइडेया नामक महापरिवार के प्राणी जगत की 2 प्रमुख जाति शाखाएं जिसमें से प्रथम को 'हीन कपि' दूसरी को महाकपि कहा जाता था। हीन कपि अर्थात छोटे कपि और महाकपि अर्थात बड़े आकार के मानवनुमा कपि। इन&nbsp;महाकपियों की 4 उपशाखाएं भी हैं- गोरिल्ला, चिंपांजी, मनुष्य तथा ओरंगउटान।&nbsp;</div><div><br></div><div>शोधकर्ताओं के मुताबित भारतवर्ष में आज से 9 से 10 लाख वर्ष पूर्व बंदरों की एक ऐसी विलक्षण जाति में विद्यमान थी, जो आज से करीब 15 हजार साल पूर्व विलुप्त होने लगी थी और रामायण काल के बाद करीब विलुप्त ही हो गई। इस वानर जाति का नाम 'कपि' था। मानवनुमा यह प्रजाति मुख और पूंछ से बंदर जैसी नजर आती थी। भारत से दुर्भाग्यवश कपि प्रजाति समाप्त हो गई, जबकि कहा जाता है कि इंडोनेशिया देश के बाली नामक द्वीप में अब भी पुच्छधारी जंगली मनुष्यों का अस्तित्व विद्यमान है।&nbsp;</div><div><br></div><div>आपको बताना इस लिए जरुरी है, क्योंकि उत्तरी अमेरिका और पूर्वी एशिया के बीच फ्यूनल विनिमय के कुछ सबूत पाए गए हैं। कर्क ने बताया कि यह जीवाश्म अनुकूलित प्रजातियों के अंत के संबंध में बहुत कुछ जानकारी दे सकते हैं, क्योंकि यह अमेरिका के उस वक्त कितनी विविधता रही थी इस बात के जीते- जागते यह उदाहरण थे।</div></div></div>

आपसे पूछा जाये की क्या कोई हजारों वर्षों तक जीवित रहे सकता है? पौराणिक और संस्कृत ग्रंथों के मुताबित भारत में ऐसे कई लोग हैं, जो हजारों सालो से ‍जीवित हैं। हिमालय में आज भी ऐसे कई ऋषि और मुनि हैं जिनकी आयु करीब 600 साल से अधिक बताई जाती है।

यानी की इन 8 लोगों (अश्वथामा, दैत्यराज बलि, वेदव्यास, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य, परशुराम और मार्कण्डेय ऋषि) का स्मरण सुबह-सुबह करने से सारी बीमारियां समाप्त होती हैं और मनुष्य 100 साल की आयु को प्राप्त करता है। अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य और भगवान परशुराम- ये सभी चिरंजीवी हैं।

आपको बता दे की पुराणों कहा गया है की अश्‍वत्थामा, बलि, व्यास, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य, परशुराम और मार्कण्डेय ऋषि के अलावा अन्य और भी ऐसे लोग हैं जिनके बारे में कहा जाता है कि वे आज इस समय भी जीवित हैं। यह संभव है कि कोई व्यक्ति हजारों साल तक जीवित रह सकता है। आयुर्वेदानुसार मनुष्य की आयु करीब 120 साल बताई गई है जबकि वह अपने योगबल से करीब 150 सालो से ज्यादा जी सकता है। कहते हैं कि प्राचीन मानव की सामान्य आयु 300 से 400 साल हुआ करती थी, क्योंकि तब धरती का वातावरण व्यक्ति को आगे के काल तक जिंदा बनाए रखने के लिए था।<div><br></div>आपसे पूछा जाये की क्या कोई हजारों वर्षों तक जीवित रहे सकता है? पौराणिक और संस्कृत ग्रंथों के मुताबित भारत में ऐसे कई लोग हैं, जो हजारों सालो से ‍जीवित हैं। हिमालय में आज भी ऐसे कई ऋषि और मुनि हैं जिनकी आयु करीब 600 साल&nbsp;से अधिक बताई जाती है।<div><br><div><div>यानी की इन 8 लोगों (अश्वथामा, दैत्यराज बलि, वेदव्यास, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य, परशुराम और मार्कण्डेय ऋषि) का स्मरण सुबह-सुबह करने से सारी बीमारियां समाप्त होती हैं और मनुष्य 100 साल की आयु को प्राप्त करता है। अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य और भगवान परशुराम- ये सभी चिरंजीवी हैं।</div><div><br></div><div>आपको&nbsp;बता दे&nbsp;की&nbsp;पुराणों कहा गया है की अश्‍वत्थामा, बलि, व्यास, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य, परशुराम और मार्कण्डेय ऋषि के अलावा अन्य और भी ऐसे लोग हैं जिनके बारे में कहा जाता है कि वे आज इस समय भी जीवित हैं। यह संभव है कि कोई व्यक्ति हजारों साल तक जीवित रह सकता है। आयुर्वेदानुसार मनुष्य की आयु करीब 120 साल बताई गई है जबकि वह अपने योगबल से करीब 150 सालो से ज्यादा जी सकता है। कहते हैं कि प्राचीन मानव की सामान्य आयु 300 से 400 साल हुआ करती थी, क्योंकि तब धरती का वातावरण व्यक्ति को आगे के काल तक जिंदा बनाए रखने के लिए था।</div></div></div>


क्या आज इच्छामृत्यु प्राप्त की जा सकती है? भीष्म पितामह के बारे में कहा जाता है कि उनको इच्छामृत्यु का वरदान मिला हुआ था।

पुराणों के मुताबित ब्रह्माजी से अत्रि, अत्रि से चन्द्रमा, चन्द्रमा से बुध और बुध से इलानंदन पुरुरवा का जन्म हुआ। पुरुरवा से आयु, आयु से राजा नहुष और नहुष से ययाति उत्पन्न हुए। ययाति से पुरु हुए। पुरु के वंश में भरत और भरत के कुल में राजा कुरु हुए। कुरु के वंश में आगे चलकर राजा प्रतीप हुए जिनके दूसरे पुत्र थे शांतनु। शांतनु का बड़ा भाई बचपन में ही ख़त्म हो गया था। और शांतनु के गंगा से देवव्रत (भीष्म) हुए। एवं भीष्म ने ब्रह्मचर्य की प्रतिज्ञा ली थी इसकारण यह वंश आगे नहीं चल सका। और भीष्म अंतिम कौरव थे।
<div><br></div>क्या आज&nbsp;इच्छामृत्यु प्राप्त की जा सकती है? भीष्म पितामह के बारे में कहा जाता है कि उनको इच्छामृत्यु का वरदान मिला हुआ था।<div><br><div>पुराणों के मुताबित ब्रह्माजी से अत्रि, अत्रि से चन्द्रमा, चन्द्रमा से बुध और बुध से इलानंदन पुरुरवा का जन्म हुआ। पुरुरवा से आयु, आयु से राजा नहुष और नहुष से ययाति उत्पन्न हुए। ययाति से पुरु हुए। पुरु के वंश में भरत और भरत के कुल में राजा कुरु हुए। कुरु के वंश में आगे चलकर राजा प्रतीप हुए जिनके दूसरे पुत्र थे शांतनु। शांतनु का बड़ा भाई बचपन में ही ख़त्म हो गया था। और&nbsp;शांतनु के गंगा से देवव्रत (भीष्म) हुए। एवं&nbsp;भीष्म ने ब्रह्मचर्य की प्रतिज्ञा ली थी इसकारण यह वंश आगे नहीं चल सका। और भीष्म अंतिम कौरव थे।</div></div>











सिंधु, सरस्वती, गंगा, नर्मदा और ब्रह्मपुत्र : उक्त 5 नदियों को भारत और विशेषकर हिन्दू धर्म में बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। उक्त पांचों नदियों का जल एक-दूसरे से अलग है जबकि उनमें से नर्मदा नदी को छोड़कर बाकी नदियां हिमालय के एक ही स्थान से निकलने वाली नदियां हैं। नर्मदा एकमात्र ऐसी नदी है, जो सभी नदियों की अपेक्षा विपरीत दिशा में बहती है और इसे पाताल की नदी कहते हैं।
 
सरस्वती : सरस्वती नदी का तो अब भूगर्भीय हलचलों के कारण अस्तित्व लुप्त हो गया जबकि आज भी वह राजस्थान और हरियाणा के कुछ क्षेत्रों में अपने होने का एक अहसास दिलाती है। और कहते हैं कि करीब 18 ईसापूर्व इस नदी का अस्तित्व मिट गया। इस नदी के किनारे बैठकर ही वेद की ऋ‍चाओं का जन्म हुआ और भगवान ब्रह्मा ने अपने कई महत्वपूर्ण यज्ञ संपन्न भी किए। प्राचीन सभ्यताओं की जननी सरस्वती नदी आज भी एक रहस्य है आज उन लोगों को लिए जो जान-बूझकर इसका अस्तित्व नहीं स्वीकारना चाहते हैं।

शोधानुसार यह सभ्यता करीब 9,000 ईसा पूर्व अस्तित्व में आई थी और 3,000 ईसापूर्व उसने स्वर्ण युग देखा और करीब 1800 ईसा पूर्व आते-आते यह लुप्त हो गया। कहा जाता है कि 1,800 ईसा पूर्व के आसपास किसी भयानक प्राकृतिक आपदा के कारण एक और जहां सरस्वती नदी लुप्त हो गई वहीं दूसरी ओर इस क्षेत्र के लोगों ने पश्चिम की ओर पलायन कर दिया। पुरात्ववेत्ता मेसोपोटामिया (5000-300 ईसापूर्व) को सबसे प्राचीन बताते हैं, जबकि अभी इस सरस्वती सभ्यता पर शोध करना जरुरी आवश्यकता है।

गंगा नदी : यह एक रहस्य ही है कि आखिरकार गंगा नदी का पानी कभी भी क्यों नहीं सड़ता? जबकि वैज्ञानिक बताते हैं कि इस नदी में 3 प्रकार के ऐसे बैक्टीरिया पाए जाते हैं, जो अन्य सभी प्रकार के बैक्टीरियाओं को खा जाते हैं जिसके चलते इसका पानी सड़ता नहीं है। मान्यता hai की यह भारत की सबसे और उच्च पवित्र और रहस्यमय नदी है। इसे राम के वंशज राजा भगीरथ ने स्वर्ग से नीचे उतारा था।


<div><br></div><b>सिंधु, सरस्वती, गंगा, नर्मदा और ब्रह्मपुत्र : </b>उक्त 5 नदियों को भारत और विशेषकर हिन्दू धर्म में बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। उक्त पांचों नदियों का जल एक-दूसरे से अलग है जबकि उनमें से नर्मदा नदी को छोड़कर बाकी नदियां हिमालय के एक ही स्थान से निकलने वाली नदियां हैं। नर्मदा एकमात्र ऐसी नदी है, जो सभी नदियों की अपेक्षा विपरीत दिशा में बहती है और इसे पाताल की नदी कहते हैं।<div>&nbsp;</div><div><div><b>सरस्वती :</b> सरस्वती नदी का तो अब भूगर्भीय हलचलों के कारण अस्तित्व लुप्त हो गया जबकि आज भी वह राजस्थान और हरियाणा के कुछ क्षेत्रों में अपने होने का एक अहसास दिलाती है। और&nbsp;कहते हैं कि करीब 18 ईसापूर्व इस नदी का अस्तित्व मिट गया। इस नदी के किनारे बैठकर ही वेद की ऋ‍चाओं का जन्म हुआ और भगवान ब्रह्मा ने अपने कई महत्वपूर्ण यज्ञ संपन्न भी किए। प्राचीन सभ्यताओं की जननी सरस्वती नदी आज भी एक रहस्य है आज उन लोगों को लिए जो जान-बूझकर इसका अस्तित्व नहीं स्वीकारना चाहते हैं।</div></div><div><br></div><div><div>शोधानुसार यह सभ्यता करीब 9,000 ईसा पूर्व अस्तित्व में आई थी और 3,000 ईसापूर्व उसने स्वर्ण युग देखा और करीब 1800 ईसा पूर्व आते-आते यह लुप्त हो गया। कहा जाता है कि 1,800 ईसा पूर्व के आसपास किसी भयानक प्राकृतिक आपदा के कारण एक और जहां सरस्वती नदी लुप्त हो गई वहीं दूसरी ओर इस क्षेत्र के लोगों ने पश्चिम की ओर पलायन कर दिया। पुरात्ववेत्ता मेसोपोटामिया (5000-300 ईसापूर्व) को सबसे प्राचीन बताते हैं, जबकि अभी इस&nbsp;सरस्वती सभ्यता पर शोध करना जरुरी आवश्यकता है।</div><div><br></div><div><b>गंगा नदी :</b> यह एक रहस्य ही है कि आखिरकार गंगा नदी का पानी कभी भी क्यों नहीं सड़ता? जबकि वैज्ञानिक बताते हैं कि इस नदी में 3 प्रकार के ऐसे बैक्टीरिया पाए जाते हैं, जो अन्य सभी प्रकार के बैक्टीरियाओं को खा जाते हैं जिसके चलते इसका पानी सड़ता नहीं है। मान्यता <span id="5_TRN_n">hai की&nbsp;</span>यह भारत की सबसे और उच्च पवित्र और रहस्यमय नदी है। इसे राम के वंशज राजा भगीरथ ने स्वर्ग से नीचे उतारा था।</div></div>

गरूड़ वाहन : गरूड़ का हिन्दू धर्म में एक महत्वपूर्ण स्थान है। वे पक्षियों के राजा और भगवान विष्णु के वाहन हैं। भगवान गरूड़ को कश्यप ऋषि और विनीता का पुत्र कहा गया है। विनीता दक्ष कन्या थीं। गरूड़ के बड़े भाई का नाम अरुण है, जो भगवान सूर्य के रथ का सारथी है। पक्षीराज गरूड़ को जीव विज्ञान में लेपटोटाइल्स जावानिकस कहते हैं। यह इंटरनेशनल यूनियन कंजरवेशन ऑफ नेचर की रेड लिस्ट यानी विलुप्तप्राय पक्षी की श्रेणी में है। पंचतंत्र में गरूड़ की कई सारी कहानियां हैं।

प्राचीन मंदिरों के द्वार पर एक ओर गरूड़, तो दूसरी ओर हनुमानजी की मूर्ति आवेष्‍ठित की जाती रही है। घर में रखे मंदिर में गरूड़ घंटी और मंदिर के शिखर पर गरूड़ ध्वज होता है। इनके नाम से एक व्रत, पुराण भी है। एवं भगवान गरूड़ को विनायक, गरुत्मत्, तार्क्ष्य, वैनतेय, नागान्तक, विष्णुरथ, खगेश्वर, सुपर्ण और पन्नगाशन नाम से भी जाना जाता है।

अब सवाल यह भी उठता है कि आखिर क्या कभी पक्षी मानव हुआ करते थे? पुराणों में भगवान गरूड़ के पराक्रम के बारे में कई कथाओं का वर्णन मिलता है। की गरुड़ ने देवताओं से युद्ध करके उनसे अमृत कलश को छीन लिया था। उन्होंने भगवान राम को नागपाश से भी मुक्त कराया था। गरुड़ को अपनी शक्ति पर बड़ा घमंड हो गया था जबकि हनुमानजी ने उनका घमंड चूर-चूर कर दिया था।
 
चेन्नई से 60 किलोमीटर दूर एक तीर्थस्थल है जिसे 'पक्षी तीर्थ' कहा जाता है। आपको बता दे की यह तीर्थस्थल वेदगिरि पर्वत के ऊपर है। कई सदियों से दोपहर के वक्त गरूड़ का जोड़ा सुदूर आकाश से उतर आता है और फिर मंदिर के पुजारी द्वारा दिए गए खाद्यान्न को ग्रहण करके आकाश में लौट जाता है। 

aaj सैकड़ों लोग उनका दर्शन करने के लिए वहां पहले से ही उपस्थित हुए रहते हैं। वहां के पुजारी के अनुसार सतयुग में ब्रह्मा के 8 मानसपुत्र शिव के शाप से गरूड़ बन गए थे। उनमें से 2 सतयुग के अंत में, 2 त्रेता के अंत में, 2 द्वापर के अंत में शाप से मुक्त हो चुके हैं। ऐसा कहा जाता है कि अब जो 2 बचे हुए वे कलयुग के अंत में मुक्त

<div><br></div><b>गरूड़ वाहन :</b> गरूड़ का हिन्दू धर्म में एक महत्वपूर्ण स्थान है। वे पक्षियों के राजा और भगवान विष्णु के वाहन हैं। भगवान गरूड़ को कश्यप ऋषि और विनीता का पुत्र कहा गया है। विनीता दक्ष कन्या थीं। गरूड़ के बड़े भाई का नाम अरुण है, जो भगवान सूर्य के रथ का सारथी है। पक्षीराज गरूड़ को जीव विज्ञान में लेपटोटाइल्स जावानिकस कहते हैं। यह इंटरनेशनल यूनियन कंजरवेशन ऑफ नेचर की रेड लिस्ट यानी विलुप्तप्राय पक्षी की श्रेणी में है। पंचतंत्र में गरूड़ की कई सारी कहानियां हैं।<div><br></div><div><div>प्राचीन मंदिरों के द्वार पर एक ओर गरूड़, तो दूसरी ओर हनुमानजी की मूर्ति आवेष्‍ठित की जाती रही है। घर में रखे मंदिर में गरूड़ घंटी और मंदिर के शिखर पर गरूड़ ध्वज होता है। इनके नाम से एक व्रत, पुराण भी है। एवं भगवान गरूड़ को विनायक, गरुत्मत्, तार्क्ष्य, वैनतेय, नागान्तक, विष्णुरथ, खगेश्वर, सुपर्ण और पन्नगाशन नाम से भी जाना जाता है।</div><div><br></div><div>अब सवाल यह भी&nbsp;उठता है कि आखिर क्या कभी पक्षी मानव हुआ करते थे? पुराणों में भगवान गरूड़ के पराक्रम के बारे में कई कथाओं का वर्णन मिलता है। की गरुड़ ने&nbsp;देवताओं से युद्ध करके उनसे अमृत कलश को छीन लिया था। उन्होंने भगवान राम को नागपाश से भी मुक्त कराया था। गरुड़ को अपनी शक्ति पर बड़ा घमंड हो गया था जबकि हनुमानजी ने उनका घमंड चूर-चूर कर दिया था।</div><div>&nbsp;</div><div>चेन्नई से 60 किलोमीटर दूर एक तीर्थस्थल है जिसे 'पक्षी तीर्थ' कहा जाता है। आपको बता दे की यह तीर्थस्थल वेदगिरि पर्वत के ऊपर है। कई सदियों से दोपहर के वक्त गरूड़ का जोड़ा सुदूर आकाश से उतर आता है और फिर मंदिर के पुजारी द्वारा दिए गए खाद्यान्न को ग्रहण करके आकाश में लौट जाता है।&nbsp;</div><div><br></div><div><span id="5_TRN_m">aaj&nbsp;</span>सैकड़ों लोग उनका दर्शन करने के लिए वहां पहले से ही उपस्थित हुए रहते हैं। वहां के पुजारी के अनुसार सतयुग में ब्रह्मा के 8 मानसपुत्र शिव के शाप से गरूड़ बन गए थे। उनमें से 2 सतयुग के अंत में, 2 त्रेता के अंत में, 2 द्वापर के अंत में शाप से मुक्त हो चुके हैं। ऐसा&nbsp;कहा जाता है कि अब जो 2 बचे हुए वे कलयुग के अंत में मुक्त <span id="5_TRN_r">ho <span id="5_TRN_s">jayenge</span></span>।</div></div>

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