Saturday, 23 April 2016

72 करोड़ थी रावण की सेना फिर भी 8 दिन ही                 चला था रामायण का युद्ध!




अश्विन शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को शुरू हुआ था रामायण का युद्ध, दशहरे के दिन यानि दशमी को रावण वध के साथ ही समाप्त हो गया था. पढ़ने वालो को लगता है की ये तो रातो रात ही हो गया लेकिन वो रात कितनी लम्बी थी इसका अंदाजा आप और मैं नही सिर्फ देवता ही लगा सकते है.

इस बात का अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है की रावण की सेना की संख्या 720000000 ( बहत्तर करोड़) थी, इसके बावजूद भी सिर्फ वानरों की सेना के सहारे ही भगवान राम ने सिर्फ आठ दिन में ही युद्ध समाप्त कर रावण का वध किया. 

युद्ध में एक बार श्री राम और दो बार लक्ष्मण हार गए थे, लेकिन फिर भी रावण ने मर्यादा रखी और मूर्छित और युद्ध से अपहृत ही राम सेना पर आक्रमण नही किया था. 


रावण की सेना में उसके सात पुत्र और कई भाई सेना नायक थे इतना ही नहीं रावण के कहने पर उसके भाई अहिरावण और महिरावण ने भी श्री राम और लक्ष्मण का छल से अपहरण कर खात्मे की कोशिश की थी. रावण स्वयं दशग्रीव था और उसके नाभि में अमृत होने के कारन लगभग अमर था.

रावण का पुत्र मेघनाद ( जन्म के समय रोने की नहीं बल्कि मुख से बदलो की गरज की आवाज आई थी) को स्वयं ब्रह्मा ने इंद्र को प्राण दान देने पर इंद्रजीत का नाम दिया था. ब्रह्मा ने उसे वरदान भी मांगने बोला तब उसने अमृत्व माँगा पर वो न देके ब्रह्मा ने उसे युद्ध के समय अपनी कुलदेवी का अनुष्ठान करने की सलाह दी, जिसके जारी रहते उसकी मृत्यु असंभव थी.

रावण का पुत्र अतिक्या जो की अदृश्य होने युद्ध करता था, अगर उसकी मौत का रहस्य देवराज इंद्र लक्ष्मण को न बताते तो उसकी भी मृत्यु होनी असंभव थी. रावण का भाई कुम्भकरण जिसे स्वयं नारद मुनि ने दर्शन शाश्त्र की शिक्षा दी थी, उससे इंद्र भी ईर्ष्या करता था ये जान कर की वो अधर्म के पक्ष में है भाई के मान के लिए अपनी आहुति दी थी.


अदृश्य इंद्रजीत के बाण से लक्ष्मण का जीवित रहना असंभव था, ये सोच कर ही श्रीराम का दिल बैठ रहा था की वो अयोध्या में अपनी माँ से कैसे नज़ारे मिलाएंगे, उनका कलेजा बैठ गया था. लक्ष्मण अगले दिन का सूर्य न देखते अगर हहमान संजीवनी बूटी वाला पर्वत न उठा लाते ( एक भाई के लिए वो रात कितनी लम्बी रही होगी).
इंद्रजीत के नागपाश के कारन श्री राम और लक्ष्मण का अगले दिन की सुबह देखना नामुमकिन था तब हनुमान वैकुण्ठ से विष्णु के वाहन गरुड़ को लेके आये और उनके प्राण बचे. समस्त वानर सेना जो राम के भरोसे लंका पर चढ़ाई कर चली थी उनके लिए ये रात कितनी लम्बी थी. 

अहिरावण और महिरावण शिविर में सोये रामलखन को मूर्छित कर अपहृत कर ले गए और दोनों भाइयो की बलि देने लगे, तब हनुमान ने अहिरावण और महिरावण की ही बलि देदी. वो रात भी वानर शिविर के लिए किसी युग से कम न थी, ऐसे बहुत से विस्मयकारण है जो रामायण के युद्ध को महान बनाते है, बशर्ते युद्ध आठ दिन ही चला लेकिन वो आठ दिन रामसेना के लिए कितने भारी थे उसके कुछ उदहारण भर दिए है हमने. जय श्रीराम 

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