Saturday, 16 April 2016

क्या हुआ भगवान श्री राम और भगवान शिव के प्रलयंकारी युद्ध का परिणाम !

ramshiv

जब भगवान राम रावण को पराजित कर अयोध्या लोटे तो उन्होंने अयोध्या में अपना एकछत्र राज्य स्थापित किया. इसी बीच एक दिन उन्होंने अश्मेधयज्ञ करवाया तथा उस यज्ञ में बड़े-बड़े ऋषि मुनियो एवं विद्वानो को सम्ल्लित किया. इस यज्ञ में एक अश्व को छोड़ा गया जो किसी भी राज्य से होकर गुजरता तो वह राज्य राजा राम के अधीन होता चला जाता. यदि कोई राजा अपनेराज्य की रक्षा के लिए उस घोड़े को पकड़ने का साहस भी करता तो वह उस अश्व के पीछे चल रहेअयोध्या की सेना द्वारा पराजित हो जाता. इस सेना का नेतृत्व स्वयं वीर हनुमानसुग्रीवशत्रुघ्नतथा भरत के पुत्र पुष्कल कर रहे थे.
यज्ञ का घोडा अनेक राज्यों को अयोध्या के अधीन करते हुए देवपुर पहुंचा, जहा का राजा वीरमणि था जो भगवान शिव का परम भक्त था. भगवान शिव ने राजा वीरमणि के तपश्या से प्रसन्न होकर स्वयं उसके राज्य की रक्षा करने का वरदान दिया था. अश्व जैसे ही वीरमणि के राज्य में पहुचा तो उनके पुत्र रुक्मानन्द ने उसे बंदी बना लिया तथा शत्रुघ्न के पास युद्ध की चुनौती का संदेश भेज दिया. जब यह बात वीरमणि को पता चली तो उन्होंने अपने पुत्र को समझाया की तुमने श्री राम से शत्रुता मोल लेकर अच्छा नही किया. श्री राम हमारे परम मित्र है, अतः अयोध्या जाकर यज्ञ का घोडा वापस लोटा आओ.
अपने पिता की बात सुनकर रुक्मांनद बोला की पिताश्री मेने तो श्री राम को युद्ध की चुनौती भी दे दी है. इसलिए अब घोडा वापिस करना हमारे और श्री राम दोनों के लिए अपमान की बात होगी क्योकि क्षत्रिय कभी अपनी बात से पलटे नही. अब आप मुझे सिर्फ युद्ध की आज्ञा दे. वीरमणि ने अपने पुत्र की बात उचित समझी परन्तु वह राम और उनकी शक्तिशाली सेना से भी परिचित था अतः उसनेभगवान शिव से मदद मांगते हुए अपने पुत्र को युद्ध में जाने की आज्ञा दे दी.
महादेव ने अपने भक्त की मदद के लिए वीरभद्र के नेतृत्व में नंदी, भृंगी सहित सारे गणो को श्री राम की सेना के विरुद्ध युद्ध में भेज दिया. वीरभद्र ने अपने त्रिशूल द्वारा भरत के पुत्र पुष्कल का सर उसके शरीर से अलग कर दिया तथा भृंगी आदि गणो ने श्री राम के भाई शत्रुघ्न को बंदी बना लिया. बाद में जब हनुमान भी नंदी के शिवास्त्र से पराजित होने लगे तो उन्होंने प्रभु राम का स्मरण किया. अपने भक्तो की रक्षा के लिए श्री राम अपने भाइयो लक्ष्मण और भरत सहित युद्ध में पहुंचे तथा हनुमान और शत्रुघ्न को शिव के गणो से मुक्त करवाया. जब शिव के गणो पर राम की सेना भारी पड़ने लगी तो उन्होंने महादेव शिव को याद किया. भगवान शिव अपने भक्तो की पुकार पर उनकी रक्षा के लिए युद्ध स्थल पर प्रकट हुए तथा जिससे श्री राम की सेना मूर्छित हो गयी.
महादेव को देख के भगवान राम ने उन्हें प्रणाम किया और कहा ” हे प्रभु आप तो जगत के स्वामी है और जो भी हमारे पास बल और शक्ति है वो आपकी कृपा से है इसीलिए इस युद्ध को समाप्त करने का मुझे कोई मार्ग सुझाये”. यह सुन भगवान शिव बोले की ” हे राम , आप तो साक्षात विष्णु के अवतार है और मेरी भी आपसे युद्ध करने की कोई इच्छा नहीं है लेकिन मैं अपने भक्त को दिए हुए वचन से पीछे नहीं हट सकता” और फिर श्री राम और भगवान शिव के मध्य बहुत भयंकर युद्ध शुरू हो गया. श्री राम ने अपने समस्त दिव्यास्त्रों का प्रयोग महाकाल के ऊपर कर दिया पर वो सभी निष्प्रभावी सिद्ध हुए.

अंत में श्री राम ने पाशुपतास्त्र का आह्वान किया तथा भगवान शिव से बोले, ‘हे प्रभु ये दिव्यास्त्र आपने ही मुझे प्रदान करते हुए कहा था की इस अश्त्र से तुम त्रिलोग में किसी को भी पराजित कर सकते हो इसलिए में इसका प्रयोग आप पर ही करता हु. यह कहते हुए श्री राम ने वह महान दिव्यास्त्र शिव पर चला दिया. वह तीर भगवान शिव के हृदयस्थल में लगा जिसके द्वारा भगवान रूद्र संतुष्ट हुए तथा प्रसन्न होकर उन्होंने श्री राम से वरदान मागने को कहा. श्री राम बोले, हे महादेव  कृपया मेरे भाई भरत के पुत्र पुष्कल सहित यहाँ लेटे असंख्य योद्धा जो वीरगति को प्राप्त हो गए है, को दोबारा जीवित कर दीजिये. भगवान शिव के आशीर्वाद से पुष्कल सहित सारे योद्धा जीवित हो उठे. भगवान शिव की आज्ञा से वीरमणि ने यज्ञ का घोडा श्री राम को वापस कर दिया तथा राम ने भी उनका राज्य उन्हें वापस लोटा दिया !

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