Thursday, 31 March 2016

धर्मांतरण का विरोध करने गए हिंदूवादी नेताओं को ग्रामीणों ने पीटा

Wednesday, 30 March 2016

कुंभपर्व एवं उनका माहात्म्य




कुंभपर्व एवं उनका माहात्म्य

कुंभपर्वका लाभ उठानेके लिए देश-विदेशसे श्रद्धालु एकत्र आ रहे हैं ।

 इस निमित्तसे कुंभमेलेकी महिमाका वर्णन करनेवाले सूत्र पाठकोंके 

लिए यहां प्रस्तुत कर रहे हैं ।





१. कुंभपर्वका अर्थ

प्रत्येक १२ वर्षके उपरांत प्रयाग, हरद्वार (हरिद्वार), उज्जैन एवं त्र्यंबकेश्वर-नासिकमें आनेवाला पुण्ययोग ।

 

२. उत्पत्तिकी कथा

अमृतकुंभ प्राप्ति हेतु देवों एवं दानवोंने (राक्षसोंने) एकत्र होकर क्षीरसागरका मंथन करनेका निश्चय किया । समुद्रमंथन हेतु मेरु (मंदार) पर्वतको बिलोनेके लिए सर्पराज वासुकीको रस्सी बननेकी विनती की गई । वासुकी नागने रस्सी बनकर मेरु पर्वतको लपेटा । उसके मुखकी ओर दानव एवं पूंछकी ओर देवता थे । इस प्रकार समुद्रमंथन किया गया । इस समय समुद्रमंथनसे क्रमशः हलाहल विष, कामधेनु (गाय), उच्चैःश्रवा (श्वेत घोडा), ऐरावत (चार दांतवाला हाथी), कौस्तुभमणि, पारिजात कल्पवृक्ष, रंभा आदि देवांगना (अप्सरा), श्री लक्ष्मीदेवी (श्रीविष्णुपत्नी), सुरा (मद्य), सोम (चंद्र), हरिधनु (धनुष), शंख, धन्वंतरि (देवताओंके वैद्य) एवं अमृतकलश (कुंभ) आदि चौदह रत्न बाहर आए । धन्वंतरि देवता हाथमें अमृतकुंभ लेकर जिस क्षण समुद्रसे बाहर आए, उसी क्षण देवताओंके मनमें आया कि दानव अमृत पीकर अमर हो गए तो वे उत्पात मचाएंगे । इसलिए उन्होंने इंद्रपुत्र जयंतको संकेत दिया तथा वे उसी समय धन्वंतरिके हाथोंसे वह अमृतकुंभ लेकर स्वर्गकी दिशामें चले गए । इस अमृतकुंभको प्राप्त करनेके लिए देव-दानवोंमें १२ दिन एवं १२ रातोंतक युद्ध हुआ । इस युद्धमें १२ बार अमृतकुंभ नीचे गिरा । इस समय सूर्यदेवने अमृतकलशकी रक्षा की एवं चंद्रने कलशका अमृत न उडे इस हेतु सावधानी रखी एवं गुरुने राक्षसोंका प्रतिकार कर कलशकी रक्षा की । उस समय जिन १२ स्थानोंपर अमृतकुंभसे बूंदें गिरीं, उन स्थानोंपर उपरोक्त ग्रहोंके विशिष्ट योगसे कुंभपर्व मनाया जाता है । इन १२ स्थानोंमेंसे भूलोकमें प्रयाग (इलाहाबाद), हरद्वार (हरिद्वार), उज्जैन एवं त्र्यंबकेश्वर-नासिक समाविष्ट हैं ।

 

३. कुंभपर्वका विविध धर्मग्रंथोंमें वर्णित माहात्म्य

३ अ. ऋग्वेद

        ऋग्वेदके खिलसूक्तमें कहा गया है –

सितासिते सरिते यत्र सङ्गते तत्राप्लुतासो दिवमुत्पतन्ति ।

ये वै तन्वं विसृजन्ति धीरास्ते जनासो अमृतत्वं भजन्ते ।।

– ऋग्वेद, खिलसूक्त

अर्थ : जहां गंगा-यमुना दोनों नदियां एक होती हैं, वहां स्नान करनेवालोंको स्वर्ग मिलता है एवं जो धीर पुरुष इस संगममें तनुत्याग करते हैं, उन्हें मोक्ष-प्राप्ति होती है ।

३ आ. पद्मपुराण

प्रयागराज तीर्थक्षेत्रके विषयमें पद्मपुराणमें कहा गया है –

ग्रहाणां च यथा सूर्यो नक्षत्राणां यथा शशी ।

तीर्थानामुत्तमं तीर्थं प्रयागाख्यमनुत्तमम् ।।

अर्थ : जिस प्रकार ग्रहोंमें सूर्य एवं नक्षत्रोंमें चंद्रमा श्रेष्ठ है, उसी प्रकार सर्व तीर्थोंमें प्रयागराज सर्वोत्तम हैं ।

३ इ. कूर्मपुराण

कूर्मपुराणमें कहा गया है कि प्रयाग तीनों लोकोंमें सर्वश्रेष्ठ तीर्थ है ।

३ ई. महाभारत

प्रयागः सर्वतीर्थेभ्यः प्रभवत्यधिकं विभो ।।

श्रवणात् तस्य तीर्थस्य नामसंकीर्तनादपि ।।

मृत्तिकालम्भनाद्वापि नरः पापात् प्रमुच्यते।।

– महाभारत, पर्व ३, अध्याय ८३, श्लोक ७४, ७५

अर्थ : हे राजन्, प्रयाग सर्व तीर्थोंमें श्रेष्ठ है । उसका माहात्म्य श्रवण करनेसे, नामसंकीर्तन करनेसे अथवा वहांकी मिट्टीका शरीरपर लेप करनेसे मनुष्य पापमुक्त होता है ।


-- 
हिन्दू परिवार संघटन संस्था
 Cont No-08088080870
Www.hinduparivar.org

 
ये लड़ाई यूरोप के सभी स्कूलो मेँ पढाई जाती है पर हमारे देश में इसे कोई जानता तक नहीं
एक तरफ 12 हजार अफगानी लुटेरे .....तो दूसरी तरफ 21
सिख .......



अगर आप को इसके बारे नहीं पता तो आप अपने इतिहास से बेखबर है।
आपने "ग्रीक सपार्टा" और "परसियन" की लड़ाई के बारे मेँ सुना होगा ...... इनके ऊपर "300" जैसी फिल्म भी बनी है ....पर अगर आप "सारागढ़ी" के बारे मेँ पढोगे तो पता चलेगा इससे महान लड़ाई सिखलैँड मेँ हुई थी ...... बात 1897 की है .....
नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर स्टेट मेँ 12 हजार अफगानोँ ने हमला कर दिया ...... वे गुलिस्तान और लोखार्ट के किलोँ पर कब्जा करना चाहते थे ....
इन किलोँ को महाराजा रणजीत सिँघ ने बनवाया था ..... इन किलोँ के पास सारागढी मेँ एक सुरक्षा चौकी थी ....... जंहा पर 36 वीँ सिख रेजिमेँट के 21 जवान तैनात थे ..... ये सभी जवान माझा क्षेत्र के थे और सभी सिख थे ..... 36 वीँ सिख रेजिमेँट मेँ केवल साबत सूरत (जो केशधारी हों) सिख भर्ती किये जाते थे ....... ईशर सिँह के नेतृत्व मेँ तैनात इन 20 जवानोँ को पहले ही पता चल गया कि 12 हजार अफगानोँ से जिँदा बचना नामुमकिन है .......
फिर भी इन जवानोँ ने लड़ने का फैसला लिया और 12 सितम्बर 1897 को सिखलैँड की धरती पर एक ऐसी लड़ाई हुयी जो दुनिया की पांच महानतम लड़ाइयोँ मेँ शामिल हो गयी ..... एक तरफ 12 हजार अफगान थे .....
तो दूसरी तरफ 21 सिख .......
यंहा बड़ी भीषण लड़ाई हुयी और 600-1400 अफगान मारे गये और अफगानोँ की भारी तबाही हुयी ..... सिख जवान आखिरी सांस तक लड़े और इन किलोँ को बचा लिया ........ अफगानोँ की हार हुयी ..... जब ये खबर यूरोप पंहुची तो पूरी दुनिया स्तब्ध रह गयी ......ब्रिटेन की संसद मेँ सभी ने खड़ा होकर इन 21 वीरोँ की बहादुरी को सलाम किया ..... इन सभी को मरणोपरांत इंडियन ऑर्डर ऑफ मेरिट दिया गया ....... जो आज के परमवीर चक्र के बराबर था ......
भारत के सैन्य इतिहास का ये युद्ध के दौरान सैनिकोँ द्वारा लिया गया सबसे विचित्र अंतिम फैसला था ...... UNESCO ने इस लड़ाई को अपनी 8 महानतम लड़ाइयोँ मेँ शामिल किया ...... इस लड़ाई के आगे स्पार्टन्स की बहादुरी फीकी पड़ गयी ...... पर मुझे दुख होता है कि जो बात हर भारतीय को पता होनी चाहिए ...... उसके बारे मेँ कम लोग ही जानते है .......ये लड़ाई यूरोप के स्कूलो मेँ पढाई जाती है पर हमारे यहा जानते तक नहीँ

Tuesday, 29 March 2016

सोमेश्वर महादेव मंदिर’ – जहां झुकाया था औरंगजेब ने भी अपना सिर





इलाहाबाद : औरंगजेब को दुनिया एक क्रूर और हिंदू विरोधी शासक के रूप में ही जानती है। उसने न सिर्फ हिंदुओंका कत्लेआम किया, बल्कि मंदिरोंको तहस-नहस कर लूटा। ऐसे औरंगजेब ने प्रयाग के सोमतीर्थ में अपने विजय अभियान को कुछ दिनोंके लिए विराम दे दिया था। यहां आकर उसके कदम रुक गए थे। उसने भगवान शिव के इस मंदिर में न सिर्फ शीश झुकाया, बल्कि एक बडी जागीर मंदिर के रख-रखाव के लिए दान में दे दी। मंदिर के बाहर लगे एक धर्मदंड और फरमान में इसका उल्लेख है। इतिहासकार डॉ. प्रदीप केसरवानी ने अपने शोध में इसे उजागर किया। सोमतीर्थ जिसे अब सोमेश्वर महादेव मंदिर के नाम से जाना जाता है, संगम के सामने देवरख क्षेत्र में स्थित है। इसका शुमार देश के महत्वपूर्ण शिवालयों में किया जाता है। सावन के महीने में यहां हजारोंकी संख्या में भक्त देश के अलग-अलग भागों से पहुंचते हैं।

चंद्रदेव ने की थी स्थापना

पद्मपुराण में प्रयाग के अक्षयवट क्षेत्र के अग्निकोण पर गंगा-यमुना की धारा के संगम स्थल के समीप दक्षिणी तट पर लोक विख्यात सोमतीर्थ का वर्णन है। पौराणिक आख्यानों में गौतम ऋषि की ओर से दिए गए शाप से कुष्ठ पीडित चंद्रदेवद्वारा प्रयाग की धरती पर सोमेश्वर महादेव लिंग की स्थापना करने की चर्चा आती है। १४वीं शताब्दी में विद्यापति ने अपने ग्रंथ भू-परिक्रमा में भी सोमतीर्थ का उल्लेख किया है। वहीं १८वीं शताब्दी के प्रयाग महात्मशताब्दध्यायी में कुष्ठ पीडित चंद्रमा की तरफ से रोगमुक्ति के लिए तपस्या का स्थान अलर्कपुरी के निकट सामेश्वर महादेव बताया गया है। अलर्कपुरी आज अरैल के नाम से जाना जाता है।

धर्मदंड में जागीर का जिक्र

सोमेश्वर महादेव मंदिर में हनुमान प्रतिमा के सामने एक धर्मदंड है। पत्थर की एक शिला के रूप में स्थापित इस धर्मदंड में १५ पक्तियों में एक लेख उत्कीर्ण है। इस लेख में संवत् १६७४ के श्रावण मास में औरंगजेब की ओर से मंदिर को जागीर दिए जाने का उल्लेख है। हालांकि हनुमान जी की प्रतिमा के सामने स्थित इस दंड पर प्रतिदिन सिंदूर का लेप होने से अब लेख स्पष्ट नहीं दिखता।

राज्यसभा में पेश किए गए थे साक्ष्य

केसरवानी के मुताबिक २७ जुलाई १९७७ को राज्यसभा की कार्रवाई के दौरान तत्कालीन सांसद और बाद में उडीसा के राज्यपाल रहे विश्वंभर नाथ पांडेय ने सदन को जानकारी दी थी कि, उनके इलाहाबाद के महानगर पालिका चैयरमैन रहने के दौरान सोमेश्वर मंदिर की जागीर से जुडा एक विवाद आया था। इस में एक पक्ष की ओर से औरंगजेबद्वारा मंदिर को दी गयी जागीर से संबंधित फरमान दिखाया गया था। इसकी वैधता परखने के लिए न्यायमूर्ति तेज बहादुर सप्रू की अध्यक्षता में कमिटी बनी थी। जिसने देश के सभी महत्वपूर्ण मंदिरोंसे औरंगजेब के वजीफे या जागीर से जुडे दस्तावेज मंगाए थे।

Monday, 28 March 2016

एक आदमी ने साफ कर दी 160 किमी लम्बी नाले से भी गंदी नदी

एक आदमी ने साफ कर दी 160 किमी लम्बी नाले से भी गंदी नदी



जालंधर। पंजाब के होशियारपुर में बहती काली बीन नदी कभी बेहद प्रदूषित थी। लोग उसे नदी नहीं नाला मानते थे। नहाना छोड़िए, 40 गांवों के लोग उसमें कूड़ा डालने लगे थे लेकिन एक व्यक्ति की पहल ने उस नदी को स्वच्छ करवा दिया। वह शख्स कोई और नहीं पर्यावरण कार्यकर्ता और सिख धर्मगुरू बलबीर सिंह सीचेवाल हैं। उन्हें इस काम के लिए 'हीरोज आफ एन्वायरनमेंट' की लिस्ट में शुमार किया गया। 

ऐसे साफ की नदी
40 गांव की नालियों का गंदा पानी लोग नदी में मिलाते थे। इससे यह एक गंदे नाले में बदल गई थी। नतीजतन आस-पास के खेतों को पानी नहीं मिल पाता था। साल 2000 में पर्यावरण कार्यकर्ता बलबीर सिंह सीचेवाल ने इस नदी को साफ करने का काम शुरू किया था। उन्होंने अपने साथी और सहयोगी स्वयं सेवकों के साथ मिलकर सबसे पहले इसके तटों का निर्माण किया और नदी के किनारे-किनारे सड़कें बनाई। सीचेवाल ने लोगों के बीच जनजागृति अभियान चलाया। इसके तहत लोगों से अपना कूड़ाकरकट कहीं और डालने को कहा गया। नदी में मिलने वाले गंदे नालों का रुख मोड़ा गया और सबसे बड़ी बात, नदी के किनारे बसे लोगों को इसकी पवित्रता को लेकर जागरुक किया गया। जिस नदी के किनारे खड़े होने पर लोगों को नाक पर रुमाल रखना पड़ता था, अब उसी नदी के किनारे लोग पिकनिक मनाते हैं।

क्यों खास है ये नदी
काली बीन नदी होशियारपुर जिले में 160 किलोमीटर क्षेत्र में बहती है। यह वही काली बीन नदी है, जिसके किनारे 500 साल पहले गुरु नानक देव को अंतर्ज्ञान प्राप्त हुआ था और वे नानक से गुरु नानक के रूप में पहचाने जाने लगे थे।

देश को मां का दर्जा देना इस्लाम में लिखा है:इस्लामिक विद्वान

54899-tahir-ul-qadri
नई दिल्ली बीते दिनों MIM नेता असदुद्दीन ओवैसी ने कहा था कि वह भारत माता की जय नहीं बोलेंगे। उन्होंने यहां तक कहा था कि अगर उनकी गर्दन पर छुरी भी रख दे कोई तो भी वह ये नहीं बोलेंगे। जिसके बाद से पूरे देश में बवाल शुरू हो गया था। कई नेताओं ने उनके इस बयान का विरोध किया था। एक बीजेपी नेता ने तो यहां तक बोल दिया था कि ओवैसी की जुबान काटने वाले को वह एक करोड़ का इनाम देंगे। इसी बीच पाकिस्तान के मशहूर इस्लामिक स्कॉलर और राजनेता ताहिर उल कादरी ने कहा कि वतन को मां का दर्जा देना इस्लाम की तालीम और उसके इतिहास का हिस्सा हैं।

 pkOLJjPM

ताहिर उल कादरी ने आतंकवाद के खिलाफ खोला था मोर्चा

ताहिर उल कादरी ने कहा कि वतन की सरजमीन को मां का दर्जा देना, वतन की सरजमीन से मोहब्बत करना, वतन की सरजमीन से प्यार करना, वतन की सरजमीन के लिए जान भी दे देना, ये हरगिज़ इस्लाम के खिलाफ नहीं है। ये इस्लामी तालीम में शामिल है। ताहिर उल कादरी ने कहा कि जो वतन से प्यार के खिलाफ बात करता है उसे चाहिए कि कुरान को पढ़े। इस्लामी इतिहास को पढ़े। ताहिर उल कादरी आतंकवाद के खिलाफ 20 मार्च को होने वाली इंटरनेशनल सूफी कॉन्फ्रेंस में शरीक होन के लिए भारत आए हैं। दिलचस्प पहलू ये है कि इस्लाम के जिस संप्रदाय को असदुद्दीन ओवैसी का संबंध है, ताहिर उल कादरी उसी संप्रदाय के दुनिया के बड़े विद्वानों में शामिल हैं। साल 2012 में ओवैसी और ताहिर उल कादरी को मंच साझा करते हुए भी देखा गया था।
क्या कहा था ओवैसी ने
5104729-article-2259163-16d08e8d000005dc-55_634x463
एमआईएम नेता असदुद्दीन ओवैसी ने कहा था कि वह ‘भारत माता की जय’ नहीं बोलेंगे। आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के बयान के विरोध में ओवैसी ने यह बात कही थी। भागवत ने पिछले दिनों सुझाव दिया कि नई पीढ़ी को भारत माता की जय बोलना सीखाना होगा। असदुद्दीन ओवैसी ने सभा में मौजूद लोगों से कहा कि मैं भारत में रहूंगा पर भारत माता की जय नहीं बोलूंगा। क्योंकि यह हमारे संविधान में कहीं नहीं लिखा है कि भारत माता की जय बोलना जरूरी है।

VASCO-DE-GAMA (वास्कोडिगामा) एक लुटेरा था .कोई खोजी नही 


आज से लगभग ५०० साल पहलेवास्को डी गामा आया था हिंदुस्तान. इतिहास की चोपड़ी मेंइतिहास की किताब में हमसब ने पढ़ा होगा कि सन. १४९८ में मई की २० तारीख को वास्को डी गामा हिंदुस्तान आया था. इतिहास की चोपड़ी में हमको ये बताया गया कि वास्को डी गामा ने हिंदुस्तान की खोज कीपर ऐसा लगता है कि जैसे वास्को डी गामा ने जब हिंदुस्तान की खोज कीतो शायद उसके पहले हिंदुस्तान था ही नहीं.
1वास्को डी गामा यहाँ आया था भारतवर्ष को लुटने के लिएएक बात और जो इतिहास मेंबहुत गलत बताई जाती है कि वास्को डी गामा एक बहूत बहादुर नाविक थाबहादुर सेनापति थाबहादुर सैनिक थाऔर हिंदुस्तान की खोज के अभियान पर निकला थाऐसा कुछ नहीं थासच्चाई ये है………………………………………
कि पुर्तगाल का वो उस ज़माने का डॉन थामाफ़िया था. जैसे आज के ज़माने में हिंदुस्तान में बहूत सारे माफ़िया किंग रहे हैउनका नाम लेने की जरुरत नहीं है,ऐसे ही बहूत सारे डॉन और माफ़िया किंग १५ वी सताब्दी में होते थे यूरोप में. और १५ वी. सताब्दी का जो यूरोप थावहां दो देश बहूत ताकतवर थें उस ज़माने मेंएक था स्पेन और दूसरा था पुर्तगाल. तो वास्को डी गामा जो था वो पुर्तगाल का माफ़िया किंग था. १४९० के आस पास से वास्को डी गामा पुर्तगाल में चोरी का कामलुटेरे का कामडकैती डालने का काम ये सब किया करता था. और अगर सच्चा इतिहास उसका आप खोजिए तो एक चोर और लुटेरे को हमारे इतिहास में गलत तरीके से हीरो बना कर पेश किया गया. और ऐसा जो डॉन और माफ़िया था उस ज़माने का पुर्तगाल का ऐसा ही एक दुसरा लुटेरा और डॉन थामाफ़िया था उसका नाम था कोलंबसवो स्पेन का था. तो हुआ क्या थाकोलंबस गया था अमेरिका को लुटने के लिए और वास्को डी गामा आया था भारतवर्ष को लुटने के लिए. लेकिन इन दोनों के दिमाग में ऐसी बात आई कहाँ सेकोलंबस के दिमाग में ये किसने डाला की चलो अमेरिका को लुटा जाएऔर वास्को डी गामा के दिमाग में किसने डाला कि चलो भारतवर्ष को लुटा जाए. तो इन दोनों को ये कहने वाले लोग कौन थे?
हुआ ये था कि १४ वी. और १५ वी. सताब्दी के बीच का जो समय थायूरोप में दो ही देश थें जो ताकतवर माने जाते थे,एक देश था स्पेनदूसरा था पुर्तगालतो इन दोनों देशो के बीच में अक्सर लड़ाई झगडे होते थेलड़ाई झगड़े किस बात के होते थे कि स्पेन के जो लुटेरे थे, वो कुछ जहांजो को लुटते थें तो उसकी संपत्ति उनके पास आती थीऐसे ही पुर्तगाल के कुछ लुटेरे हुआ करते थे वो जहांज को लुटते थें तो उनके पास संपत्ति आती थीतो संपत्ति का झगड़ा होता था कि कौन-कौन संपत्ति ज्यादा रखेगा. स्पेन के पास ज्यादा संपत्ति जाएगी या पुर्तगाल के पास ज्यादा संपत्ति जाएगी. तो उस संपत्ति का बटवारा करने के लिए कई बार जो झगड़े होते थे वो वहां की धर्मसत्ता के पास ले जाए जाते थे. और उस ज़माने की वहां की जो धर्मसत्ता थीवो क्रिस्चियनिटी की सत्ता थीऔर क्रिस्चियनिटी की सत्ता में १४९२ के आसपास पोप होता था जो सिक्स्थ कहलाता थाछठवा पोप. तो एक बार ऐसे ही झगड़ा हुआपुर्तगाल और स्पेन की सत्ताओ के बीच मेंऔर झगड़ा किस बात को ले कर थाझगड़ा इस बात को ले कर था कि लूट का माल जो मिले वो किसके हिस्से में ज्यादा जाए. तो उस ज़माने के पोप ने एक अध्यादेश जारी किया. सन १४९२ मेंऔर वो नोटिफिकेशन क्या थावो नोटिफिकेशन ये था कि १४९२ के बादसारी दुनिया की संपत्ति को उन्होंने दो हिस्सों में बाँटाऔर दो हिस्सों में ऐसा बाँटा कि दुनिया का एक हिस्सा पूर्वी हिस्सा, और दुनिया का दूसरा हिस्सा पश्चिमी हिस्सा. तो पूर्वी हिस्से की संपत्ति को लुटने का काम पुर्तगाल करेगा और पश्चिमी हिस्से की संपत्ति को लुटने का काम स्पेन करेगा. ये आदेश १४९२ में पोप ने जारी किया. ये आदेश जारी करते समयजो मूल सवाल है वो ये है कि क्या किसी पोप को ये अधिकार है कि वो दुनिया को दो हिस्सों में बांटेऔर उन दोनों हिस्सों को लुटने के लिए दो अलग अलग देशो की नियुक्ति कर देस्पैन को कहा की दुनिया के पश्चिमी हिस्से को तुम लूटोपुर्तगाल को कहा की दुनिया के पूर्वी हिस्से को तुम लूटो और १४९२ में जारी किया हुआ वो आदेश और बुल आज भी एग्जिस्ट करता है. 
ये क्रिस्चियनिटी की धर्मसत्ता कितनी खतरनाक हो सकती है उसका एक अंदाजा इस बात से लगता है कि उन्होंने मान लिया कि सारी दुनिया तो हमारी है और इस दुनिया को दो हिस्सों में बांट दो पुर्तगाली पूर्वी हिस्से को लूटेंगेस्पेनीश लोग पश्चिमी हिस्से को लूटेंगे. पुर्तगालियो को चूँकि दुनिया के पूर्वी हिस्से को लुटने का आदेश मिला पोप की तरफ से तो उसी लुट को करने के लिए वास्को डी गामा हमारे देश आया था. क्योकि भारतवर्ष दुनिया के पूर्वी हिस्से में पड़ता है. और उसी लुट के सिलसिले को बरकरार रखने के लिए कोलंबस अमरीका गया. इतिहास बताता है कि १४९२ में कोलंबस अमरीका पहुंचा, और १४९८ में वास्को डी गामा हिंदुस्तान पहुंचाभारतवर्ष पहुंचा. कोलंबस जब अमरीका पहुंचा तो उसने अमरीका मेंजो मूल प्रजाति थी रेड इंडियन्स जिनको माया सभ्यता के लोग कहते थेउन माया सभ्यता के लोगों से मार कर पिट कर सोना चांदी छिनने का काम शुरु किया. इतिहास में ये बराबर गलत जानकारी हमको दी गई कि कोलंबस कोई महान व्यक्ति थामहान व्यक्ति नहीं थानराधम था. और वो किस दर्जे का नराधम थासोना चांदी लुटने के लिए अगर किसी की हत्या करनी पड़े तो कोलंबस उसमे पीछे नहीं रहता थाउस आदमी ने १४ – १५ वर्षो तक बराबर अमरीका के रेड इन्डियन लोगों को लुटाऔर उस लुट से भर – भर कर जहांज जब स्पेन गए तो स्पेन के लोगों को लगा कि अमेरिका में तो बहुत सम्पत्ति हैतो स्पेन की फ़ौज और स्पेन की आर्मी फिर अमरीका पहुंची. और स्पेन की फ़ौज और स्पेन की आर्मी ने अमरीका में पहुँच कर १० करोड़ रेड इंडियन्स को मौत के घाट उतार दिया. १० करोड़. और ये दस करोड़ रेड इंडियन्स मूल रूप से अमरीका के बाशिंदे थे. ये जो अमरीका का चेहरा आज आपको दिखाई देता हैये अमरीका १० करोड़ रेड इन्डियन की लाश पर खड़ा हुआ एक देश है. कितने हैवानियत वाले लोग होंगेकितने नराधम किस्म के लोग होंगेजो सबसे पहले गए अमरीका को बसाने के लिए,उसका एक अंदाजा आपको लग सकता हैआज स्थिति क्या है कि जो अमरीका की मूल प्रजा हैजिनको रेड इंडियन कहते हैउनकी संख्या मात्र ६५००० रह गई है. 
१० करोड़ लोगों को मौत के घाट उतारने वाले लोग आज हमको सिखाते है कि हिंदुस्तान में ह्यूमन राईट की स्थिति बहुत ख़राब है. जिनका इतिहास ही ह्यूमन राईट के वोइलेसन पे टिका हुआ है, जिनकी पूरी की पूरी सभ्यता १० करोड़ लोगों की लाश पर टिकी हुई हैजिनकी पूरी की पूरी तरक्की और विकास १० करोड़ रेड इंडियनों लोगों के खून से लिखा गया हैऐसे अमरीका के लोग आज हमको कहते है कि हिंदुस्तान में साहबह्यूमन राईट की बड़ी ख़राब स्थिति हैकश्मीर में,पंजाब मेंवगेरह वगेरह. और जो काम मारने कापीटने का, लोगों की हत्याए कर के सोना लुटने काचांदी लुटने का काम कोलंबस और स्पेन के लोगों ने अमरीका में कियाठीक वही काम वास्को डी गामा ने १४९८ में हिंदुस्तान में किया. ये वास्को डी गामा जब कालीकट में आया२० मई१४९८ कोतो कालीकट का राजा था उस समय झामोरिनतो झामोरिन के राज्य में जब ये पहुंचा वास्को डी गामातो उसने कहा कि मै तो आपका मेहमान हुऔर हिंदुस्तान के बारे में उसको कहीं से पता चल गया था कि इस देश में अतिथि देवो भव की परंपरा. तो झामोरिन ने बेचारे नेये अथिति है ऐसा मान कर उसका स्वागत कियावास्को डी गामा ने कहा कि मुझे आपके राज्य में रहने के लिए कुछ जगह चाहिए,आप मुझे रहने की इजाजत दे दोपरमीशन दे दो. झामोरिन बिचारा सीधा सदा आदमी थाउसने कालीकट में वास्को डी गामा को रहने की इजाजत दे दी. जिस वास्को डी गामा को झामोरिन के राजा ने अथिति बनायाउसका आथित्य ग्रहण कियाउसके यहाँ रहना शुरु कियाउसी झामोरिन की वास्को डी गामा ने हत्या कराइ. और हत्या करा के खुद वास्को डी गामा कालीकट का मालिक बना. और कालीकट का मालिक बनने के बाद उसने क्या किया कि समुद्र के किनारे है कालीकट केरल मेंवहां से जो जहांज आते जाते थे, जिसमे हिन्दुस्तानी व्यापारी अपना माल भर-भर के साउथ ईस्ट एशिया और अरब के देशो में व्यापार के लिए भेजते थेउन जहांजो पर टैक्स वसूलने का काम वास्को डी गामा करता था. और अगर कोई जहांज वास्को डी गामा को टैक्स ना देतो उस जहांज को समुद्र में डुबोने का काम वास्को डी गामा करता था.
पोर्तुगीज सरकार के जो डॉक्यूमेंट है वो  बताते है कि वास्को डी गामा पहली बार जब हिंदुस्तान से गयालुट कर सम्पत्ति को ले कर के गयातो ७ जहांज भर के सोने की अशर्फिया, उसके बाद दुबारा फिर आया वास्को डी गामा. वास्को डी गामा हिंदुस्तान में ३ बार आया लगातार लुटने के बादचौथी बार भी आता लेकिन मर गया. दूसरी बार आया तो हिंदुस्तान से लुट कर जो ले गया वो करीब ११ से १२ जहांज भर के सोने की अशर्फिया थी. और तीसरी बार आया और हिंदुस्तान से जो लुट कर ले गया वो २१ से २२ जहांज भर के सोने की अशर्फिया थी.इतना सोना चांदी लुट कर जब वास्को डी गामा यहाँ से ले गया तो पुर्तगाल के लोगों को पता चला कि हिंदुस्तान में तो बहुत सम्पत्ति है. और भारतवर्ष की सम्पत्ति के बारे में उन्होंने पुर्तगालियो ने पहले भी कहीं पढ़ा थाउनको कहीं से ये टेक्स्ट मिल गया था कि भारत एक ऐसा देश हैजहाँ पर महमूद गजनवी नाम का एक व्यक्ति आया१७ साल बराबर आता रहालुटता रहा इस देश कोएक ही मंदिर कोसोमनाथ का मंदिर जो वेरावल में है. उस सोमनाथ के मंदिर को महमूद गजनवी नाम का एक व्यक्ति, एक वर्ष आया अरबों खरबों की सम्पत्ति ले कर चला गयादुसरे साल आयाफिर अरबों खरबों की सम्पत्ति ले गया. तीसरे साल आयाफिर लुट कर ले गया. और १७ साल वो बराबर आता रहाऔर लुट कर ले जाता रहा. तो वो टेक्स्ट भी उनको मिल गए थे कि एक एक मंदिर में इतनी सम्पत्तिइतनी पूंजी है,इतना पैसा है भारत मेंतो चलो इस देश को लुटा जाएऔर उस ज़माने में एक जानकारी और दे दूये जो यूरोप वाले अमरीका वाले जितना अपने आप को विकसित कहेसच्चाई ये है कि १४ वी. और १५ वी. शताब्दी में दुनिया में सबसे ज्यादा गरीबी यूरोप के देशो में थी. खाने पीने को भी कुछ होता नहीं था. प्रकृति ने उनको हमारी तरह कुछ भी नहीं दियान उनके पास नेचुरल रिसोर्सेस है, जितने हमारे पास है. न मौसम बहूत अच्छा हैन खेती बहुत अच्छी होती थी और उद्योगों का तो प्रश्न ही नहीं उठता. १३ फी. और १४ वी. शताब्दी में तो यूरोप में कोई उद्योग नहीं होता था. तो उनलोगों का मूलतः जीविका का जो साधन था जो वो लुटेरे बन के काम से जीविका चलाते थे. चोरी करते थेडकैती करते थेलुट डालते थे,ये मूल काम वाले यूरोप के लोग थेतो उनको पता लगा कि हिंदुस्तान और भारतवर्ष में इतनी सम्पत्ति है तो उस देश को लुटा जाएऔर वास्को डी गामा ने आ कर हिंदुस्तान में लुट का एक नया इतिहास शुरु किया. उससे पहले भी लुट चली हमारीमहमूद गजनवी जैसे लोग हमको लुटते रहे.
लेकिन वास्को डी गामा ने आकर लुट को जिस तरह से केन्द्रित किया और ओर्गनाइजड किया वो समझने की जरूरत है. उसके पीछे पीछे क्या हुआ,पुर्तगाली लोग आएउन्होंने ७० – ८० वर्षो तक इस देश को खूब जम कर लुटा. पुर्तगाली चले गए इस देश को लुटने के बादफिर उसके पीछे फ़्रांसिसी आए,उन्होंने इस देश को खूब जमकर लुटा ७० – ८० वर्ष उन्होंने भी पुरे किए. उसके बाद डच आ गये हालैंड वालेउन्होंने इस देश को लुटा. उसके बाद फिर अंग्रेज आ गए हिंदुस्तान में लुटने के लिए ही नहीं बल्कि इस देश पर राज्य भी करने के लिए. पुर्तगाली आए लुटने के लिएफ़्रांसिसी आए लुटने के लिए,डच आए लुटने के लिएऔर फिर पीछे से अंग्रेज चले आए लुटने के लिएअंग्रेजो ने लुट का तरीका बदल दिया. 

रणछोड़दास रबारी- 1200 पाकिस्तानी सैनिकों पर भारी पड़ गया था यह हिंदुस्तानी हीरो

रणछोड़दास रबारी- 1200 पाकिस्तानी सैनिकों पर भारी पड़ गया था यह हिंदुस्तानी हीरो




हाल ही में भारतीय सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) ने ‘मार्गदर्शक’ आम आदमी के सम्मान में अपनी बॉर्डर पोस्ट का नामकरण किया है।  उत्तर गुजरात के सुईगांव अंतरराष्ट्रीय सीमा क्षेत्र की एक बॉर्डर पोस्ट को रणछोड़दास पोस्ट नाम दिया है। इस पोस्ट पर रणछोड़दास की एक प्रतिमा भी लगाई जाएगी। ‘मार्गदर्शक’ जिसे की आम बोलचाल की भाषा में ‘पगी’ कहा जाता है वो आम इंसान होते है जो दुर्गम क्षेत्र में पुलिस और सेना के लिए पथ पर्दशक का काम करते है। ये उस क्षेत्र की भौगोलिक संरचना से भली भाति वाक़िफ़ होते है।

साल 1971:रणछोड़भाई रबारी भी एक ऐसे ही इंसान थे जिन्होंने भारत-पाकिस्तान के बीच 1965 व 71 में हुए युद्ध के समय सेना का जो मार्गदर्शन किया, वह सामरिक दृष्टि से निर्णायक रहा। जनवरी-2013 में 112 वर्ष की उम्र में रणछोड़भाई रबारी का निधन हो गया था।
एक आम आदमी के ऊपर पहली बार पोस्ट का नामकरण
सुरक्षा बल की कई पोस्ट के नाम मंदिर, दरगाह और जवानों के नाम पर हैं, किन्तु रणछोड़भाई पहले ऐसे आम इंसान हैं, जिनके नाम पर पोस्ट का नामकरण किया गया है। रणछोड़भाई अविभाजित भारत के पेथापुर गथडो गांव के मूल निवासी थे। पेथापुर गथडो विभाजन के चलते पाकिस्तान में चला गया है। पशुधन के सहारे गुजारा करने वाले रणछोड़भाई पाकिस्तानी सैनिकों की प्रताड़ना से तंग आकर बनासकांठा (गुजरात) में बस गए थे।
1965 के भारत-पाक युद्ध में क्या थी भूमिका:
साल 1965 के आरंभ में पाकिस्तानी सेना ने भारत के कच्छ सीमा स्थित विद्याकोट थाने पर कब्जा कर लिया था। इसको लेकर हुई जंग में हमारे 100 सैनिक शहीद हो गए थे। इसलिए सेना की दूसरी टुकड़ी (10 हजार सैनिक) को तीन दिन में छारकोट तक पहुंचना जरूरी हो गया था, तब रणछोड़ पगी के सेना का मार्गदर्शन किया था। फलत: सेना की दूसरी टुकड़ी निर्धारित समय पर मोर्चे पर पहुंच सकी। रणक्षेत्र से पूरी तरह परिचित पगी ने इलाके में छुपे 1200 पाकिस्तानी सैनिकों के लोकेशन का भी पता लगा लिया था। इतना ही नहीं, पगी पाक सैनिकों की नजर से बचकर यह जानकारी भारतीय सेना तक पहुंचाई थी, जो भारतीय सेना के लिए अहम साबित हुई। सेना ने इन पर हमला कर विजय प्राप्त की थी।
3_1433940152
इस युद्ध के समय रणछोड़भाई बोरियाबेट से ऊंट पर सवार होकर पाकिस्तान की ओर गए। घोरा क्षेत्र में छुपी पाकिस्तानी सेना के ठिकानों की जानकारी लेकर लौटे। पगी के इनपुट पर भारतीय सेना ने कूच किया। जंग के दौरान गोली-बमबारी के गोला-बारूद खत्म होने पर उन्होंने सेना को बारूद पहुंचाने का काम भी किया। इन सेवाओं के लिए उन्हें राष्ट्रपति मेडल सहित कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया।
जनरल सैम माणिक शॉ के हीरो थे रणछोड़ पगी:
रणछोड पगी जनरल सैम माणेक शॉ के ‘हीरो’ थे। इतने अजीज कि ढाका में माणिक शॉ ने रणछोड़भाई पगी को अपने साथ डिनर के लिए आमंत्रित किया था। बहुत कम ऐसे सिविल लोग थे, जिनके साथ माणिक शॉ ने डिनर लिया था। रणछोडभाई पगी उनमें से एक थे।
अंतिम समय तक माणिक शॉ नहीं भूले थे पगी को:
वर्ष 2008 में 27 जून को जनरल सैम माणिक शॉ का निधन हो गया। वे अंतिम समय तक रणछोड़ पगी को भूल नहीं पाए थे। निधन से पहले हॉस्पिटल में वे बार-बार रणछोड़ पगी का नाम लेते थे। बार-बार पगी का नाम आने से सेना के चेन्नई स्थित वेलिंग्टन अस्पताल के दो चिकित्सक एक साथ बोल उठे थे कि ‘हू इज पगी’। जब पगी के बारे में चिकित्सकों को ब्रीफ किया गया तो वे भी दंग रह गए।
4_1433939586
रणछोड़भाई के कलेउ के लिए उतारा था हेलिकॉप्टर:
साल 1971 के युद्ध के बाद रणछोड़ पगी एक साल नगरपारकर में रहे थे। ढाका में जनरल माणिक शॉ ने रणछोड़ पगी को डिनर पर आमंत्रित किया था। उनके लिए हेलिकॉप्टर भेजा गया। हेलिकॉप्टर पर सवार होते समय उनकी एक थैली नीचे रह गई, जिसे उठाने के लिए हेलिकॉप्टर वापस उतारा गया था। अधिकारियों ने थैली देखी तो दंग रह गए, क्योंकि उसमें दो रोटी, प्याज और बेसन का एक पकवान (गांठिया) भर था।
रणछोड़भाई रबारी
इनका पूरा नाम रणछोड़भाई सवाभाई रबारी। वे पाकिस्तान के घरपारकर, जिला गढडो पीठापर में जन्मे थे। बनासकांठा पुलिस में राह दिखाने वाले (पगी) के रूप में सेवारत रहे। जुलाई-2009 में उन्होंने स्वैच्छिक सेवानिवृति ले ली थी। विभाजन के समय वे एक शरणार्थी के रूप में आए थे। जनवरी-2013 में 112 वर्ष की उम्र में रणछोड़भाई रबारी का निधन हो गया था

सप्त ऋषि : भारत के महान सात संत




सप्त ऋषि : भारत के महान सात संत
वेदों का अध्ययन करने पर जिन सात ऋषियों या ऋषि कुल के नामों का पता चलता है वे नाम क्रमश: इस प्रकार है:-
1.वशिष्ठ,
2.विश्वामित्र,
3.कण्व,
4.भारद्वाज,
5.अत्रि,
6.वामदेव
7.शौनक







आकाश में सात तारों का एक मंडल नजर आता है उन्हें सप्तर्षियों का मंडल कहा जाता है। उक्त मंडल के तारों के नाम भारत के महान सात संतों के आधार पर ही रखे गए हैं। वेदों में उक्त मंडल की स्थिति, गति, दूरी और विस्तार की विस्तृत चर्चा मिलती है। प्रत्येक मनवंतर में सात सात ऋषि हुए हैं। यहां प्रस्तुत है वैवस्तवत मनु के काल में जन्में सात महान ‍ऋषियों का संक्षिप्त परिचय।
वेदों के रचयिता ऋषि : ऋग्वेद में लगभग एक हजार सूक्त हैं, लगभग दस हजार मन्त्र हैं। चारों वेदों में करीब बीस हजार हैं और इन मन्त्रों के रचयिता कवियों को हम ऋषि कहते हैं। बाकी तीन वेदों के मन्त्रों की तरह ऋग्वेद के मन्त्रों की रचना में भी अनेकानेक ऋषियों का योगदान रहा है। पर इनमें भी सात ऋषि ऐसे हैं जिनके कुलों में मन्त्र रचयिता ऋषियों की एक लम्बी परम्परा रही। ये कुल परंपरा ऋग्वेद के सूक्त दस मंडलों में संग्रहित हैं और इनमें दो से सात यानी छह मंडल ऐसे हैं जिन्हें हम परम्परा से वंशमंडल कहते हैं क्योंकि इनमें छह ऋषिकुलों के ऋषियों के मन्त्र इकट्ठा कर दिए गए हैं।
पुराणों में सप्त ऋषि के नाम पर भिन्न-भिन्न नामावली मिलती है। विष्णु पुराण अनुसार इस मन्वन्तर के सप्तऋषि इस प्रकार है :- वशिष्ठकाश्यपो यात्रिर्जमदग्निस्सगौत। विश्वामित्रभारद्वजौ सप्त सप्तर्षयोभवन्।। अर्थात् सातवें मन्वन्तर में सप्तऋषि इस प्रकार हैं:- वशिष्ठ, कश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र और भारद्वाज।
इसके अलावा पुराणों की अन्य नामावली इस प्रकार है:- ये क्रमशः केतु, पुलह, पुलस्त्य, अत्रि, अंगिरा, वशिष्ट तथा मारीचि है।
महाभारत में सप्तर्षियों की दो नामावलियां मिलती हैं। एक नामावली में कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वशिष्ठ के नाम आते हैं तो दूसरी नामावली में पांच नाम बदल जाते हैं। कश्यप और वशिष्ठ वहीं रहते हैं पर बाकी के बदले मरीचि, अंगिरस, पुलस्त्य, पुलह और क्रतु नाम आ जाते हैं। कुछ पुराणों में कश्यप और मरीचि को एक माना गया है तो कहीं कश्यप और कण्व को पर्यायवाची माना गया है। यहां प्रस्तुत है वैदिक नामावली अनुसार सप्तऋषियों का परिचय।
1. वशिष्ठ : राजा दशरथ के कुलगुरु ऋषि वशिष्ठ को कौन नहीं जानता। ये दशरथ के चारों पुत्रों के गुरु थे। वशिष्ठ के कहने पर दशरथ ने अपने चारों पुत्रों को ऋषि विश्वामित्र के साथ आश्रम में राक्षसों का वध करने के लिए भेज दिया था। कामधेनु गाय के लिए वशिष्ठ और विश्वामित्र में युद्ध भी हुआ था। वशिष्ठ ने राजसत्ता पर अंकुश का विचार दिया तो उन्हीं के कुल के मैत्रावरूण वशिष्ठ ने सरस्वती नदी के किनारे सौ सूक्त एक साथ रचकर नया इतिहास बनाया।
2.विश्वामित्र : ऋषि होने के पूर्व विश्वामित्र राजा थे और ऋषि वशिष्ठ से कामधेनु गाय को हड़पने के लिए उन्होंने युद्ध किया था, लेकिन वे हार गए। इस हार ने ही उन्हें घोर तपस्या के लिए प्रेरित किया। विश्वामित्र की तपस्या और मेनका द्वारा उनकी तपस्या भंग करने की कथा जगत प्रसिद्ध है। विश्वामित्र ने अपनी तपस्या के बल पर त्रिशंकु को सशरीर स्वर्ग भेज दिया था। इस तरह ऋषि विश्वामित्र के असंख्य किस्से हैं।
माना जाता है कि हरिद्वार में आज जहां शांतिकुंज हैं उसी स्थान पर विश्वामित्र ने घोर तपस्या करके इंद्र से रुष्ठ होकर एक अलग ही स्वर्ग लोक की रचना कर दी थी। विश्वामित्र ने इस देश को ऋचा बनाने की विद्या दी और गायत्री मन्त्र की रचना की जो भारत के हृदय में और जिह्ना पर हजारों सालों से आज तक अनवरत निवास कर रहा है।
3. कण्व : माना जाता है इस देश के सबसे महत्वपूर्ण यज्ञ सोमयज्ञ को कण्वों ने व्यवस्थित किया। कण्व वैदिक काल के ऋषि थे। इन्हीं के आश्रम में हस्तिनापुर के राजा दुष्यंत की पत्नी शकुंतला एवं उनके पुत्र भरत का पालन-पोषण हुआ था।
4. भारद्वाज : वैदिक ऋषियों में भारद्वाज-ऋषि का उच्च स्थान है। भारद्वाज के पिता बृहस्पति और माता ममता थीं। भारद्वाज ऋषि राम के पूर्व हुए थे, लेकिन एक उल्लेख अनुसार उनकी लंबी आयु का पता चलता है कि वनवास के समय श्रीराम इनके आश्रम में गए थे, जो ऐतिहासिक दृष्टि से त्रेता-द्वापर का सन्धिकाल था। माना जाता है कि भरद्वाजों में से एक भारद्वाज विदथ ने दुष्यन्त पुत्र भरत का उत्तराधिकारी बन राजकाज करते हुए मन्त्र रचना जारी रखी।
ऋषि भारद्वाज के पुत्रों में 10 ऋषि ऋग्वेद के मन्त्रदृष्टा हैं और एक पुत्री जिसका नाम 'रात्रि' था, वह भी रात्रि सूक्त की मन्त्रदृष्टा मानी गई हैं। ॠग्वेद के छठे मण्डल के द्रष्टा भारद्वाज ऋषि हैं। इस मण्डल में भारद्वाज के 765 मन्त्र हैं। अथर्ववेद में भी भारद्वाज के 23 मन्त्र मिलते हैं। 'भारद्वाज-स्मृति' एवं 'भारद्वाज-संहिता' के रचनाकार भी ऋषि भारद्वाज ही थे। ऋषि भारद्वाज ने 'यन्त्र-सर्वस्व' नामक बृहद् ग्रन्थ की रचना की थी। इस ग्रन्थ का कुछ भाग स्वामी ब्रह्ममुनि ने 'विमान-शास्त्र' के नाम से प्रकाशित कराया है। इस ग्रन्थ में उच्च और निम्न स्तर पर विचरने वाले विमानों के लिए विविध धातुओं के निर्माण का वर्णन मिलता है।
5. अत्रि : ऋग्वेद के पंचम मण्डल के द्रष्टा महर्षि अत्रि ब्रह्मा के पुत्र, सोम के पिता और कर्दम प्रजापति व देवहूति की पुत्री अनुसूया के पति थे। अत्रि जब बाहर गए थे तब त्रिदेव अनसूया के घर ब्राह्मण के भेष में भिक्षा मांगने लगे और अनुसूया से कहा कि जब आप अपने संपूर्ण वस्त्र उतार देंगी तभी हम भिक्षा स्वीकार करेंगे, तब अनुसूया ने अपने सतित्व के बल पर उक्त तीनों देवों को अबोध बालक बनाकर उन्हें भिक्षा दी। माता अनुसूया ने देवी सीता को पतिव्रत का उपदेश दिया था।
अत्रि ऋषि ने इस देश में कृषि के विकास में पृथु और ऋषभ की तरह योगदान दिया था। अत्रि लोग ही सिन्धु पार करके पारस (आज का ईरान) चले गए थे, जहां उन्होंने यज्ञ का प्रचार किया। अत्रियों के कारण ही अग्निपूजकों के धर्म पारसी धर्म का सूत्रपात हुआ। अत्रि ऋषि का आश्रम चित्रकूट में था। मान्यता है कि अत्रि-दम्पति की तपस्या और त्रिदेवों की प्रसन्नता के फलस्वरूप विष्णु के अंश से महायोगी दत्तात्रेय, ब्रह्मा के अंश से चन्द्रमा तथा शंकर के अंश से महामुनि दुर्वासा महर्षि अत्रि एवं देवी अनुसूया के पुत्र रूप में जन्मे। ऋषि अत्रि पर अश्विनीकुमारों की भी कृपा थी।
6. वामदेव : वामदेव ने इस देश को सामगान (अर्थात् संगीत) दिया। वामदेव ऋग्वेद के चतुर्थ मंडल के सूत्तद्रष्टा, गौतम ऋषि के पुत्र तथा जन्मत्रयी के तत्ववेत्ता माने जाते हैं।
7. शौनक : शौनक ने दस हजार विद्यार्थियों के गुरुकुल को चलाकर कुलपति का विलक्षण सम्मान हासिल किया और किसी भी ऋषि ने ऐसा सम्मान पहली बार हासिल किया। वैदिक आचार्य और ऋषि जो शुनक ऋषि के पुत्र थे।
फिर से बताएं तो वशिष्ठ, विश्वामित्र, कण्व, भरद्वाज, अत्रि, वामदेव और शौनक- ये हैं वे सात ऋषि जिन्होंने इस देश को इतना कुछ दे डाला कि कृतज्ञ देश ने इन्हें आकाश के तारामंडल में बिठाकर एक ऐसा अमरत्व दे दिया कि सप्तर्षि शब्द सुनते ही हमारी कल्पना आकाश के तारामंडलों पर टिक जाती है।
इसके अलावा मान्यता हैं कि अगस्त्य, कष्यप, अष्टावक्र, याज्ञवल्क्य, कात्यायन, ऐतरेय, कपिल, जेमिनी, गौतम आदि सभी ऋषि उक्त सात ऋषियों के कुल के होने के कारण इन्हें भी वही दर्जा प्राप्त है।

Friday, 25 March 2016

पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के चेयरमैन बिलावल भुट्टो ज़रदारी ने कहा कि अगर इंडिया में एक मुसलमान राष्ट्रपति हो सकता है

नई दिल्ली।
 पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के चेयरमैन बिलावल भुट्टो ज़रदारी ने कहा कि अगर इंडिया में एक मुसलमान राष्ट्रपति हो सकता है तो कोई हिंदू पाकिस्तान में क्यों नहीं बन सकता। उमर कोट में एक रैली को संबोधित करते हुए बिलावल भुट्टो ने अल्पसंख्यकों को होली की मुबारकबाद भी दी। 
उन्होंने कहा कि पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी रंग, नस्ल या धर्म के आधार पर लोगों के साथ भेदभाव की पक्षधर नहीं है। हम ग़रीबों और अल्पसंख्यकों के अधिकारों के समर्थक हैं। कुछ महीने पहले सिंध प्रांत की असेंबली में हिंदू मैरिज एक्ट पास हुआ है।
बिलावल ने कहा कि पाकिस्तान के 68 साल के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है कि अल्पसंख्यकों को कानूनी अधिकार देने के लिए कोई बिल पास किया गया। उन्होंने यह एलान भी किया कि जल्द ही अल्पसंख्यकों के जबरन धर्मांतरण के खिलाफ कानून बनाकर उन्हें मज़बूत बनाएंगे। 

भुट्टो ने कहा कि हम लोगों को अमीर-ग़रीब, अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक और हिंदू-मुस्लिम में नहीं बंटने देंगे। हम सभी के लिए एक एकीकृत पाकिस्तान बनाएंगे। अल्पसंख्यकों के लिए सभी क्षेत्र में समान अधिकार और अवसर की बात भी उन्होंने की। 
इससे पहले सिंध प्रांत की सरकार ने 16 मार्च को अल्पसंख्यकों के त्यौहार होली, दीवाली और ईस्टर के लिए सार्वजनिक अवकाश का बिल पारित करने के साथ-साथ नोटिफिकेशन भी जारी कर दिया था। 


Thursday, 24 March 2016

अस्वस्थामा आज भी ज़िंदा है डोक्टर ने किया दावा

अस्वस्थामा आज भी ज़िंदा है डोक्टर ने                     किया दावा   

               

हमने अश्वत्थामा के बारे में बहुत सारी कहानियां सुनी हैं जिसमें यह बताया गया है कि वह अभी भी ज़िंदा हैं। हालांकि अश्वत्थामा को कोई वरदान नहीं मिला था अमर होने का बल्कि वह श्राप था जो उन्हें श्री कृष्ण ने दिया था।

कौन है अश्वत्थामा?

अश्वत्थामा द्रोणाचार्य के पुत्र थे। इनकी माता का नाम कृपा था जो शरद्वान की लड़की थी। जन्म के समय इनके कण्ठ से हिनहिनाने की सी ध्वनि हुई जिससे इनका नाम अश्वत्थामा पड़ा। अश्वत्थामा को रुद्र के ग्यारवें अवतार में से एक माना जाता है।


महाभारत युद्ध में अश्वत्थामा कौरव-पक्ष के सेनापति थे। एक बार रात में ये पाण्डवों के शिविर में गये और सोते में अपने पिता के हनन करने वाले धृष्टद्युम्न और शिखंडी तथा पाण्डवों के पाँचों लड़कों को मार डाला।

क्या अश्वत्थामा अभी भी ज़िंदा हैं?

हर किसी को दिखाई नहीं देते हालांकि, इन सब कहानियों के बाद भी अश्वत्थामा कुछ ही लोगों को दिखाई देता था क्योंकि उसके पास इस तरह की शक्ति थी कि वह कुछ को दिखाई देगा और कुछ को नहीं। 

कृष्ण का श्राप

कृष्ण ने अश्वत्थामा को 3000 साल के लिए कुष्ठ रोग का श्राप दिया था, और वह इतना भयंकर था कि कोई चाह कर भी अश्वत्थामा की मदद नहीं कर सकता था। यही नहीं अश्वत्थामा का पूरा शरीर घाव से भर जाएगा, जिनसे खून और पस बहेगा और यह कभी ठीक नहीं होगा।


ऐसा क्यों हुआ?

यह सब क्यों हुआ यह जाने के लिए हमे महाभारत के युद्ध में जाना पड़ेगा। युद्ध के दौरान अश्वत्थामा के पिता द्रोणाचर्या को धृष्टद्युम्न ने धोखे से मारा था। जिसका बदला लेने के लिए अश्वत्थामा ने मरते हुए दुर्योधन से आज्ञा ली कि वह युद्ध होने के बाद धृष्टद्युम्न के साथ पांचों पांडवों को को मार डालेगा।

युद्ध खत्म होने के बाद अश्वत्थामा, दुर्योधन से वादा करके आधी रात में पांडवों को मारने के लिए चला गया। लेकिन गलती से रात के अँधेरे में वह द्रौपदी के पांच पुत्रों को मार देता है।


उसके बाद अश्वत्थामा की इस हरकत से पांडव बहुत क्रोधित हुए और उसे पकड़ने के लिए भागे, जिसमें अर्जुन ने उन्हें युद्ध के लिए ललकारा। युद्ध के दौरान अश्वत्थामा ने ब्रह्मास्त्र का आवाहन किया और अर्जुन ने पशुपतस्त्र का। इन दोनो ही शस्त्रों से दुनिया का अंत होजाता इसलिए ऋषिओं ने दोनों से कहा कि वे अपने शस्त्र को वापस लें लें। यह सुन कर अर्जुन ने अपना शस्त्र वापस ले लिया लेकिन अश्वत्थामा ऐसा नहीं कर सकते थे। और गुस्से में अश्वत्थामा ने ब्रह्मास्त्र अर्जुन की बहु के गर्भ पर चला दिया।

शस्त्र जिसने सब कुछ नष्ट कर दिया उस वक़्त उत्तरा के गर्भ में अभिमन्यु का पुत्र परीक्षित था जो आगे चल कर पांडव का उत्तराधिकारी बनता। लेकिन ब्रह्मास्त्र की वजह से बच्चा गर्भ में ही मर जाता है। तब कृष्णा अपनी शक्तियों से बच्चे को पुनर्जीवित करते हैं, और अश्वत्थामा को 3000 साल के लिए कुष्ठ रोग का श्राप देते हैं।


अमरता का अभिशाप

इसका दूसरा विवरण है कि अश्वत्थामा को कलियुग के अंत तक जीवित रहने का अभिशाप मिला था। और यह माना जाता है कि अश्वत्थामा अरब प्रायद्वीप में है।

निरंतर कष्ट

ऐसा माना है कि अश्वत्थामा को अपना कीमती मणि देना पड़ा था जिसकी वजह से उन्हें किसी भी हथियार, बीमारी, और भूख का भय नहीं था। साथ ही देवता, दानव और नागाओं से भी कोई भय नही होता था।

क्या वह जीवित है?

अगर ऊपर की कहानी को सच माना जाए तो अश्वत्थामा अभी भी जिंदा हो सकता है और इसके सबूत भी हैं।

उसके जिंदा होने का सबूत मध्य प्रदेश में एक डॉक्टर ने यह दावा किया कि उसके पास एक मरीज़ आया था जिसके माथे पर कुष्ठ रोग था। जिसका इलाज कई सारे औषधि लगा कर किया गया लेकिन वह उतना ही ताज़ा था। डॉक्टर ने यह भी कहा कि वह घाव पुराना था जिसका इलाज नहीं हो सकता है। यही नहीं जब डॉक्टर ने यह कहा कि क्या वह अश्वत्थामा है तो वह ज़ोर से हंसने लगा। फिर वह डॉक्टर जब दूसरी बार दवा लगाने के लिए मुड़ा तो वहां कुर्सी पर कोई नहीं था। वह मरीज वहां से जा चूका था। कहा जाता है कि यह कहानी सच्ची है।


दूसरी कहानी कुछ योगियों के अनुसार यह दावा किया गया है कि अश्वत्थामा हिमालय की तलहटी में कुछ आदिवसयों के साथ रहता है। और वह शिवलिंग पर रोज़ सुबह फूल चढ़ता है।

एक वर्ष में एक बार दिखता है वहां के लोगों का कहना है कि वह साल में एक बार आता है अपनी प्यास और क्रोध शांत कर वापस जंगलों में चला जाता है।

बिंदु से बिंदु जोड़ना

ऐसा कहा जाता है कि द्वापर युग में एक आदमी की औसत ऊंचाई 12-14 फुट की थी और ऐसे आदमी एक बार में खूब खाना खाते थे जिससे एक साल तक उन्हें भूख नहीं लगती थी। यह सब इस युग में संभव नहीं है।

हर किसी को दिखाई नहीं देते हालांकि, इन सब कहानियों के बाद भी अश्वत्थामा कुछ ही लोगों को दिखाई देता था क्योंकि उसके पास इस तरह की शक्ति थी कि वह कुछ को दिखाई देगा और कुछ को नहीं।