Tuesday, 23 August 2016

पाकिस्तान की मां हिंगलाज देवी, मुस्लिम भी देते हैं सम्मान





आपको जानकर आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि पाकिस्तान में भी पूजी जाती हैं देवी मां, पाकिस्तान के बलूचिस्तान राज्य में स्थित मां हिंगलाज मंदिर में हिंगलाज शक्तिपीठ की प्रतिरूप देवी की प्राचीन दर्शनीय प्रतिमा विराजमान हैं। माता हिंगलाज की ख्याति सिर्फ कराची और पाकिस्तान ही नहीं अपितु पूरे भारत में है। कराची जिले के बाड़ी कलां में विराजमान माता का मंदिर सुरम्य पहाड़ियों की तलहटी में स्थित है।माता का मन्दिर यहां इतना विख्यात है कि यहां वर्ष भर मेले जैसा माहौल रहता है। नवरात्रि के दौरान तो यहां पर नौ दिनों तक शक्ति की उपासना का विशेष आयोजन होता है। सिंध-कराची के लाखों सिंधी श्रद्धालु यहां माता के दर्शन को आते हैं।

पाकिस्तान के बलूचिस्तान राज्य में हिंगोल नदी के समीप हिंगलाज क्षेत्र में स्थित हिंगलाज माता मंदिर हिन्दू भक्तों की आस्था का प्रमुख केंद्र और प्रधान 51 शक्तिपीठों में से एक है।

माता के 52 शक्ति पीठ, संपूर्ण जानकारी

पौराणिक कथानुसार जब भगवान शंकर माता सती के मृत शरीर को अपने कंधे पर लेकर तांडव नृत्य करने लगे, तो ब्रह्माण्ड को प्रलय से बचाने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता के मृत शरीर को 51 भागों में काट दिया।

मान्यतानुसार हिंगलाज ही वह जगह है जहां माता का सिर गिरा था। यहां माता सती कोटटरी रूप में जबकि भगवान भोलेनाथ भीमलोचन भैरव रूप में प्रतिष्ठित हैं। माता हिंगलाज मंदिर परिसर में श्रीगणेश, कालिका माता की प्रतिमा के अलावा ब्रह्मकुंड और तीरकुंड आदि प्रसिद्ध तीर्थ हैं।

पाकिस्तान के राज्य बलूचिस्तान में हिंदुओं के बहुत से धार्मिक स्थान मौजूद हैं जिनमें माता हिंगलाज देवी सिद्ध पीठ प्रमुख हैं। माता हिंगलाज देवी 51 सिद्ध पीठों में से एक हैं।  इस आदि शक्ति की पूजा हिंदुओं द्वारा तो की ही जाती है इन्हें मुसलमान भी काफी सम्मान देते हैं।  

कैसे जाएं माता हिंगलाज के मंदिर दर्शन को –  इस सिद्ध पीठ की यात्रा के लिए दो मार्ग हैं – एक पहाड़ी तथा दूसरा मरुस्थली। यात्री जत्था कराची से चल कर लसबेल पहुंचता है और फिर लयारी। माता हिंगलाज देवी की यात्रा कठिन है क्योंकि रास्ता काफी ऊबड़-खाबड़ है। इसके दूर-दूर तक आबादी का कोई नामो-निशान तक नजर नहीं आता।
रास्ते में कई बरसाती नाले तथा कुएं भी मिलते हैं। इसके आगे रेत की एक शुष्क बरसाती नदी है। इस इलाके की सबसे बड़ी नदी हिंगोल है जिसके निकट चंद्रकूप पहाड़ हैं। चंद्रकूप तथा हिंगोल नदी के मध्य लगभग 15 मील का फासला है। हिंगोल में यात्री अपने सिर के बाल कटवा कर पूजा करते हैं तथा यज्ञोपवीत पहनते हैं। उसके बाद गीत गाकर अपनी श्रद्धा की अभिव्यक्ति करते हैं।
 
मंदिर की यात्रा के लिए यहां से पैदल चलना पड़ता है क्योंकि इससे आगे कोई सड़क नहीं है इसलिए ट्रक या जीप पर ही यात्रा की जा सकती है। हिंगोल नदी के किनारे से यात्री माता हिंगलाज देवी का गुणगान करते हुए चलते हैं। इससे आगे आसापुरा नामक स्थान आता है। यहां यात्री विश्राम करते हैं। यात्रा के वस्त्र उतार कर स्नान करके साफ कपड़े पहन कर पुराने कपड़े गरीबों तथा जरूरतमंदों के हवाले कर देते हैं। इससे थोड़ा आगे काली माता का मंदिर है। इतिहास में उल्लेख मिलता है कि यह मंदिर 2000 वर्ष पूर्व भी यहीं विद्यमान था।
 
इस मंदिर में आराधना करने के बाद यात्री हिंगलाज देवी के लिए रवाना होते हैं। यात्री चढ़ाई करके पहाड़ पर जाते हैं जहां मीठे पानी के तीन कुएं हैं। इन कुंओं का पवित्र जल मन को शुद्ध करके पापों से मुक्ति दिलाता है। इसके निकट ही पहाड़ की गुफा में माता हिंगलाज देवी का मंदिर है जिसका कोई दरवाजा नहीं। मंदिर की परिक्रमा में गुफा भी है। यात्री गुफा के एक रास्ते से दाखिल होकर दूसरी ओर निकल जाते हैं। मंदिर के साथ ही गुरु गोरखनाथ का चश्मा है। मान्यता है कि माता हिंगलाज देवी यहां सुबह स्नान करने आती हैं।
 
हिंगलाज मंदिर में दाखिल होने के लिए पत्थर की सीढिय़ां चढ़नी पड़ती हैं। मंदिर में सबसे पहले श्री गणेश के दर्शन होते हैं जो सिद्धि देते हैं। सामने की ओर माता हिंगलाज देवी की प्रतिमा है जो साक्षात माता वैष्णो देवी का रूप हैं

Monday, 22 August 2016


सेना की मदद के लिए आगे आ रहे लोग, एक बुजुर्ग दंपत्ति ने 40 लाख

रुपये देने की घोषणा की

मोदी सरकार बनने के बाद देश की सेना के प्रति लोगों का प्रेम उफान पर है. हर रोज चिट्ठी और ईमेल के जरिए आम लोग रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर से पूछ रहे हैं कि वो सेना के जवानों की मदद के लिए आर्थिक सहायता देना चाहते हैं.

सेना की मदद के लिए आगे आ रहे लोग
कुछ लोग तो ऐसे हैं जो अपनी संपत्ति का एक बड़ा हिस्सा जवानों के लिए हथियार खरीदने के लिए देना चाहते हैं. नागपुर की रहने वाली डॉ. वासंती वैद्य ने मनोहर पर्रिकर को पत्र लिखकर कहा है कि वो अपनी संपत्ति का एक बड़ा हिस्सा देश की सेना के लिए जरुरी हथियार खरीदने के लिए देना चाहती हैं. अपने पत्र में इस महिला ने साफ तौर पर जवानों के लिए हथियार खरीदने के लिए पैसा देने की बात लिखी है. हालांकि रक्षा मंत्रालय ने अपने जवाब में लिखा कि उनके पास ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जिसमें आम नागरिक हथियार खरीदने के लिए पैसा दे सके.

जवानों के कल्याण के लिए दिए 40 लाख
पुणे की एक बुजुर्ग दंपत्ति ने रक्षा मंत्री को ईमेल लिखकर अपनी वसीयत के 40 लाख रुपये सेना के वीर जवानों के कल्याण के लिए देने की इच्छा जताई है. जबकि कोल्हापुर महाराष्ट्र के चंद्रसेन जाधव ने ईमेल के जरिए रक्षा मंत्री को लिखा है कि वो हर साल अपनी आय से एक हजार रुपये जवानों के कल्याण के लिए देना चाहते हैं. ऐसे अकेले चंद्रसेन नहीं है, बल्कि हर रोज रक्षा मंत्री के नाम ऐसे दर्जनों ईमेल और पत्र आ रहे हैं, जिनमें लोग सेना के जवानों की मदद के लिए आर्थिक सहायता देना चाहते हैं.


आयकर में मिलेगी छूट
इसी तरह इंदौर के आरटीआई कार्यकर्ता राजेंद्र गुप्ता और कई और लोगों के सुझाव पर रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने जनता के द्वारा सेना के लिए राशि जमा करने के लिए आखिरकार सेना के लिए खोला बैंक खाता खोला. रक्षा मंत्री के ओएसडी उपेंद्र जोशी ने ईमेल के जरिए इन लोगों को जानकारी दी कि आर्मी वेलफेयर फंड बैटल कैजुअल्टी के नाम से ये खाता सिंडिकेट बैंक की साऊथ ब्लॉक नई दिल्ली ब्रांच में खोला गया है. जबकि खाता नं- 90552010165915 है. इस खाते में पैसा जमा करने पर आयकर में भी छूट मिलेगी.






Sunday, 21 August 2016

जानिए महादेव की इस यात्रा के बारे में जो        है अमरनाथ यात्रा से भी कठिन!!!


आपने शिव जी के दर्शन के लिए अमरनाथ की यात्रा कर ली होगी! लेकिन देवताओ के तपस्थली हिमाचल में कुल्लू जिले में श्रीखंड महादेव मंदिर है! ये मंदिर करीब 18,300 फुट उचाई पर स्थित है! यहाँ पर विश्व से धार्मिक यात्रा करने लोग जगह जगह से आए है! ये 15 वर्ष से देश के हर एक कोने से लोग दर्शन करने पहुँचते है! बता दे इस मंदिर के लिए 25 किलोमीटर की सीधी चढाई यानि अग्नि परीक्षा देनी पड़ती है! जब इस यात्रा में काफी लोगो की मौत भी हो गई है

श्रीखंड यात्रा के आगे अमरनाथ यात्रा की चढ़ाई कुछ भी नहीं है। ऐसा उन लोगों का कहना है जो दोनों जगह होकर आए हैं। श्रीखंड महादेव हिमाचल के ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क से सटा है। स्थानीय लोगों के अनुसार, इस चोटी पर भगवान शिव का वास है। इसके शिवलिंग की ऊंचाई 72 फीट है। यहां तक पहुंचने के लिए सुंदर घाटियों के बीच से एक ट्रैक है। अमरनाथ यात्रा के दौरान लोग जहां खच्चरों का सहारा लेते हैं। वहीं, श्रीखण्ड महादेव की 35 किलोमीटर की इतनी कठिन चढ़ाई है, जिसपर कोई खच्चर घोड़ा नहीं चल ही नहीं सकता। श्रीखण्ड का रास्ता रामपुर बुशैहर से जाता है। यहां से निरमण्ड, उसके बाद बागीपुल और आखिर में जांव के बाद पैदल यात्रा शुरू होती है।


क्या है पौराणिक महत्व-
श्रीखंड की पौराणिकता मान्यता है कि भस्मासुर राक्षस ने अपनी तपस्या से शिव से वरदान मांगा था कि वह जिस पर भीअपना हाथ रखेगा तो वह भस्म होगा। राक्षसी भाव होने के कारण उसने माता पार्वती से शादी करने की ठान ली। इसलिए भस्मापुर ने शिव के ऊपर हाथ रखकर उसे भस्म करने की योजना बनाई लेकिन भगवान विष्णु ने उसकी मंशा को नष्ट किया। विष्णु ने माता पार्वती कारूप धारण किया और भस्मासुर को अपने साथ नृत्य करने के लिए राजी किया। नृत्य के दौरान भस्मासुर ने अपने सिर पर ही हाथ रख लिया और भस्म हो गया। आज भी वहां की मिट्टी व पानी दूर से लाल दिखाई देते हैं
रीखंड यात्रा में अठारह हजार तीन सौ फुट की ऊंचाई पर साँस लेने के लिए ऑक्सीजन की कमी है! इस बीच लगभग एक दर्जन से अधिक धार्मिक और देव शिलाएं है! भगवान शिव की श्रीखंड में शिवलिंग है! और यहाँ से लगभग पचास मीटर पहले पार्वती, गणेश, कार्तिक स्वामी की प्रतिमाएं है!
कैसे पहुंचे श्रीखंड-
श्रीखंड जाने के लिए शिमला से रामपुर 130 किलोमीटर व रामपुर से बागीपुल 35 किलोमीटर दूर है। निरमंड के बागीपुल से जावं तक सात किलोमीटर वाहन योग्य सड़क है। उसके बाद फिर 25 किलोमीटर की सीधी चढ़ाई शुरू होती है। इस यात्रा के बीच में सिंहगाड़, थाचरू, कालीकुंड, भीमडवारी, पार्वती बाग, नयनसरोवर व भीमबही आदि स्थान आते हैं। और सिंहगाड़ यात्रा का बेस कैंप है। यहाँ पर पहले श्रद्धालु अपना नाम दर्ज करने के बाद यात्रा की अनुमति दी जाती है।



Thursday, 18 August 2016

 जय हिंद 

कारगिल युद्ध में बरखा दत्त ने भारतीय सेना को पहुंचाया था नुकसान!





नई दिल्ली। कारगिल युद्ध के दौरान पत्रकार बरखा दत्त ने अपनी रिपोर्टिंग से काफी सुर्खियां बटोरी थीं। वहीं उनकी भूमिका पर भी सवाल उठे थे। तब कहा गया था कि बरखा दत्त की रिपोर्टिंग से भारतीय सेना को नुकसान पहुंचा था। वकील जय भट्टाचार्जी ने तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल वीपी मलिक को पत्र लिखकर बरखा की युद्ध में भूमिका पर जानकारी मांगी है।


पत्र के अनुसार बरखा ने अपनी किताब के पेज-4 पर इस बात का उल्लेख किया है कि कारगिल युद्ध में उनकी भूमिका को लेकर जहरीली कानाफूसी होती है। भट्टाचार्जी ने दावा किया है कि बरखा को लड़ाई खत्म होने के बाद वीपी मलिक ने बधाई देते हुए कहा था कि उन्होंने सेना की ताकत बढ़ाने का काम किया।

बरखा के इरिडियम सैटेलाइट फोन के इस्तेमाल पर भी सवाल उठ रहे हैं। खबरों के मुताबिक बरखा दत्त एकमात्र ऐसी पत्रकार थीं जिनके पास यह फोन था, वह भी वॉर जोन में। ऐसे फोन सिर्फ सेना के बड़े अधिकारी रख सकते हैं। वो भी ऐसे अफसर जो युद्ध क्षेत्र में नहीं होते। भट्टाचार्जी ने संभावना जाहिर की है कि बरखा दत्त का सैटेलाइट फोन पाकिस्तानी सेना सुन रही थी।

इस फोन को लेकर भी बरखा दत्त ने अपनी किताब में सफाई दी है। उन्होंने लिखा है कि वीके मलिक ने उन्हें बताया था कि कुछ और लोगों के पास ऐसे इरीडियम सैटेलाइट फोन हैं और पाकिस्तानी सेना के पास इन फोन को इंटरसेप्ट (बीच में सुनने की) करने की क्षमता नहीं है।

जय के मुताबिक ऐसा दावा करके उन्होंने गेंद मलिक के पाले में डाल दी है और अब मलिक को यह पुष्टि करनी चाहिए कि क्या वाकई आपने बरखा दत्त से यह बात कही थी। टाइगर हिल पर हमले से पहले द्रास में डिप्टी ब्रिगेड कमांडर कर्नल डेविड ने बरखा दत्त को ऑपरेशन की जानकारी दी थी। इसके फौरन बाद बरखा दत्त ने अपने चैनल के लिए लाइव रिपोर्ट की थी। भारतीय सेना ने पाकिस्तानी फौज के ऐसे कई मैसेज इंटरसेप्ट किए थे, जिनके मुताबिक इस लाइव रिपोर्ट के फौरन बाद पाकिस्तानी रियर कमांडर ने टाइगर हिल पर अपनी फौज को अलर्ट कर दिया था।

पाकिस्तानी फौजी टाइगर हिल के ऊपर पोजीशन लिए बैठे थे और उन्होंने अपने सारे हथियार बिलुकल उस दिशा में घुमा दिए थे जिधर से भारतीय सैनिकों को ऊपर चढ़ना था। ऊपर चढ़ने के लिए जिस रस्सी का इस्तेमाल भारतीय फौजी कर रहे थे पाकिस्तानियों ने बिलकुल ठीक उसी रस्सी पर गोले दागे थे। पाकिस्तानी हमले में करीब 20 भारतीय जवान शहीद हुए थे।

बरखा दत्त से जुड़ी एक और घटना सामने आ रही है। कई लोग बता चुके हैं कि बरखा जब 56 ब्रिगेड हेड क्वार्टर के गेट पर रात के वक्त रिकॉर्डिंग कर रही थीं, तभी उनके कैमरामैन ने कैमरा लाइट जला दी थी ताकि रिकॉर्डिंग में उनका चेहरा, हेलमेट और माइक दिख सके। रिकॉर्डिंग खत्म होते ही वो वहां से चली गईं। इसके 5 मिनट के अंदर पाकिस्तानी सेना ने ठीक उसी जगह पर भारी गोलाबारी शुरू कर दी थी। इस हमले में 17 गढ़वाल राइफल्स के एक अफसर और तीन जवानों की मौत हो गई थी।

वकील ने अपने पत्र में सवाल उठाया है कि 6 जुलाई 1999 को भारतीय सेना ने टाइगर हिल पर बैठे पाकिस्तानी सैनिकों और उनके हेड क्वार्टर के बीच बातचीत इंटरसेप्ट की थी। इसके बाद आप बरखा दत्त से बेहद नाराज हुए थे और आपने पंद्रहवी कोर के हेड क्वार्टर को आदेश दिया था कि फौरन पूरे इलाके से मीडिया को हटा दिया जाए।

जय भट्टाचार्जी ने अपने पत्र में लिखा है कि ये सारे तथ्य लड़ाई से जुड़े अलग-अलग लोगों से बातचीत के बाद निकले नतीजों में सामने आए हैं। भट्टाचार्जी ने सवाल उठाया है कि जब ये आरोप हैं तो आखिर इनकी जांच क्यों नहीं हुई?

Tuesday, 16 August 2016

अंग्रेजों ने कुएं में जिंदा दफनाए थे 283 क्रान्तिकारी


अंग्रेजी सेनाओं ने 150 को गोली मार दी, जबकि 283 सिपाहियों को रस्सियों से बांध कर अजनाला लाया गया और इस कुएं में फेक दिया गया था।

(कुएं से निकले शहीदों के नरकंकाल को दिखाते गुरूद्वारा शहीदगंज प्रबंधन समिति के सदस्य) कुएं की खुदाई के दौरान की तस्वीर।
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अस्थियों के साथ ईस्ट इंडिया कम्पनी की मुहर वाले सिक्के और ज्वैलरी निकाली गई है।
अमृतसर के समीप अजनाला गांव में मौजूद "कालों का कुआं"। अब ‘शहीदां दा खू’ के नाम से जाना जाता है। यह वहीं कुआं है जिसमें 1857 की क्रान्ति के दौरान अंग्रेजी फौजों ने 282 क्रान्तिकारियों को जिन्दा दफन कर दिया था। 2 मार्च 2014 यानि, 157 साल बाद जब इस कुएं की खुदाई की गई तो इस कुएं से एक बाद एक 283 क्रान्तिकारियोें के नरकंकाल मिले। "कालों का कुआं" अंग्रेजी हुकूमत की दरिंदगी की ऐसी खौफनाक दास्तान का गवाह बना, जिसे देख कर किसी के भी आंखों के आंसू नहीं थम सके। 
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स्थानीय गुरूद्वारा शहीदगंज प्रबंधन समिति की ओर से सिख इतिहासकारों की राय पर इस कुएं की खुदाई शुरू की गई थी। खुदाई करने वाले जैसे-जैसे इस कुएं की गहराई में जाते गए, वैसे-वैसे इस कुएं से शहीदों की अस्थियां मिलनी शुरू हुई। कुएं से खुदाई के दौरान न सिर्फ अस्थियां ही मिली बल्कि ईस्ट इंडिया कंपनी की मुहर वाले सिक्के और ज्वैलरी निकाली गई है। करीब दस दिन तक चली इस खुदाई में सभी शहीद सैनिकों की अस्थियां बरामद होने के बाद उन्हें हरिद्वार और गोइंदवाल साहिब में प्रवाहित किया गया।
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एक समाचार वेबसाइट ने सिख इतिहासकार सुरिन्दर कोचर के हवाले से बताया है कि अगhttps://www.facebook.com/hinduparivarorg-600508766680925/?ref=bookmarksस्त 1857 में अमृतसर के तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर फ्रेडरिक हैनरी कूपर और कर्नल जेम्स जॉर्ज ने इस नरसंहार की योजना बनाई थी। कूपर ने अपनी पुस्तक "द क्राइसिस ऑफ पंजाब" में भी इस घटना का उल्लेख किया है। नरसंहार में मारे गए क्रान्तिकारी अंग्रेजों की बंगाल नेटिव इन्फेंट्री से संबंद्ध थे, जिन्होंने बगावत कर दी थी। इनमें से अंग्रेजी सेनाओं ने 150 को गोली मार दी, जबकि 283 सिपाहियों को रस्सियों से बांध कर अजनाला लाया गया और इस कुएं में फेंक दिया गया था।