Friday, 30 September 2016


पहले दिन माँ दुर्गा के पहले स्वरूप शैलपुत्री की पूजा होती है


पर्वतराज हिमालय के यहा पुत्री रूप मे उत्पन्न होने केकारण इनका नाम शैलपुत्री है॥

हले दिन मां दुर्गा के पहले स्वरूप शैलपुत्री की पूजा होती है। पर्वतराज हिमालय के यहां पुत्री रूप में उत्पन्न होने के कारण इनका नाम शैलपुत्री पड़ा था। भगवती का वाहन वृषभ, दाहिने हाथ में त्रिशूल, और बायें हाथ में कमल सुशोभित है। देवी दुर्गा के नौ रूप होते हैं।
जैसे :-
प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी l
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम् ll
पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च l
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम् ll
नवमं सिद्धि दात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः l
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मनः ll
नवरात्र के प्रथम दिवस शैलपुत्री के रूप में ही दुर्गा की पूजा और उपासना की जाती है। इस प्रथम दिन की उपासना में योगी अपने मन को 'मूलाधार' चक्र में स्थित करते हैं। यहीं से उनकी योग साधना का प्रारंभ होता है ।
कथानक :-
एक बार प्रजापति दक्ष ने एक बहुत बड़ा यज्ञ किया। इसमें उन्होंने सारे देवताओं को अपना-अपना यज्ञ-भाग प्राप्त करने के लिए निमंत्रित किया, किन्तु शंकरजी को उन्होंने इस यज्ञ में निमंत्रित नहीं किया। सती ने जब सुना कि उनके पिता एक अत्यंत विशाल यज्ञ का अनुष्ठान कर रहे हैं, तब वहां जाने के लिए उनका मन विकल हो उठा।
अपनी यह इच्छा उन्होंने शंकरजी को बताई। सारी बातों पर विचार करने के बाद उन्होंने कहा- प्रजापति दक्ष किसी कारणवश हमसे रुष्ट हैं। अपने यज्ञ में उन्होंने सारे देवताओं को निमंत्रित किया है। उनके यज्ञ-भाग भी उन्हें समर्पित किए हैं, किन्तु हमें जान-बूझकर नहीं बुलाया है। कोई सूचना तक नहीं भेजी है। ऐसी स्थिति में तुम्हारा वहां जाना किसी प्रकार भी श्रेयस्कर नहीं होगा।'
शंकर जी के इस उपदेश से सती का प्रबोध नहीं हुआ। पिता का यज्ञ देखने, वहां जाकर माता और बहनों से मिलने की उनकी व्यग्रता किसी प्रकार भी कम न हो सकी। उनका प्रबल आग्रह देखकर भगवान शंकरजी ने उन्हें वहां जाने की अनुमति दे दी।
सती ने पिता के घर पहुंचकर देखा कि कोई भी उनसे आदर और प्रेम के साथ बातचीत नहीं कर रहा है। सारे लोग मुंह फेरे हुए हैं। केवल उनकी माता ने स्नेह से उन्हें गले लगाया। बहनों की बातों में व्यंग्य और उपहास के भाव भरे हुए थे।
परिजनों के इस व्यवहार से उनके मन को बहुत क्लेश पहुंचा। उन्होंने यह भी देखा कि वहां सब ओर भगवान शंकर जी के प्रति तिरस्कार का भाव भरा हुआ है। दक्ष ने उनके प्रति कुछ अपमानजनक वचन भी कहे। यह सब देखकर सती का हृदय क्षोभ, ग्लानि और क्रोध से संतप्त हो उठा। उन्होंने सोचा भगवान शंकरजी की बात न मान, यहां आकर मैंने बहुत बड़ी गलती की है।
वे अपने पति भगवान शंकर के इस अपमान को सह न सकीं। उन्होंने अपने उस रूप को तत्क्षण वहीं योगाग्नि द्वारा जलाकर भस्म कर दिया। वज्रपात के समान इस दारुण-दुःखद घटना को सुनकर शंकरजी ने क्रुद्ध होकर अपने गणों को भेजकर दक्ष के उस यज्ञ का पूर्णतः विध्वंस करा दिया।
सती ने योगाग्नि द्वारा अपने शरीर को भस्म कर अगले जन्म में शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लिया। इस बार वे 'शैलपुत्री' नाम से विख्यात हुर्ईं। पार्वती, हैमवती भी उन्हीं के नाम हैं। उपनिषद् की एक कथा के अनुसार इन्हीं ने हैमवती स्वरूप से देवताओं का गर्व-भंजन किया था।'शैलपुत्री' देवी का विवाह भी शंकरजी से ही हुआ। पूर्वजन्म की भांति इस जन्म में भी वे शिवजी की ही अर्द्धांगिनी बनीं।
नव दुर्गाओं में प्रथम शैलपुत्री दुर्गा रूप का पूजन करने के उपरान्त “ ॐ प्रथमं शैलपुत्र्यै नमः’’ मन्त्र का जप करना चाहिये और भोग आदि लगाकर कर्पूर आरती करनी चाहिए l मां शैलपुत्री की आराधना से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

Friday, 23 September 2016

          राजा हरि सिंह  जिनकी बदौलत जम्मू-कश्मीर
                   बना  था भारत का हिस्सा।




राजा हरि सिंह की बदौलत J&K बना भारत का हिस्सा
हर साल की तरह इस साल भी राजा हरि सिंह का जन्मदिन धूमधाम से मनाया गया। लेकिन पिछले दिनों कश्मीर को लेकर पाकिस्तान का रवैया और भारत की आक्रामक नीति ने इस साल के जन्मदिन आयोजन को काफी अहम बना दिया।
राजा हरि सिंह का नाम देश के उन प्रगतिशील राजाओं की फेहरिस्त में शामिल है जिसने अखंड भारत की रचना में अहम योगदान दिया। जम्मू-कश्मीर भारत का हिस्सा होगा ये सैद्धांतिक फैसला राजा हरि सिंह का जरूर था लेकिन यह निर्णय राजा हरि सिंह ने राज्य की जनता के भविष्य और भावनाओं को ध्यान में रखते हुये ही लिया।
राजा हरि सिंह ने पहले गोलमेज सम्मेलन में राजाओं के संगठन नरेश मंडल के उपाध्यक्ष की हैसियत से शिरकत की। इस सम्मेलन में अंग्रेजों की मंशा थी कि राजाओं को लालच देकर आजादी के आंदोलन को कमजोर कर दिया जाय। लेकिन राजा हरि सिंह ने देश हित को सर्वोपरि रखते हुये अंग्रेजों के मंसूबों को पूरा नहीं होने दिया।
राजा हरि सिंह जम्मू-कश्मीर राज्य के अंतिम राजा थे। उन्होंने 1925 से लेकर 1947 तक राज्य की बागडोर संभाली। लेकिन उनके दूरदर्शी और लोकप्रिय फैसले आज भी शासकों को लिये मिसाल हैं। वे पहले राजा थे जिन्होंने अपने राज्य में सभी के लिये अनिवार्य शिक्षा, बाल विवाह पर रोक का कानून बनाया। उन्होंने मंदिर में दलितों के प्रवेश को लेकर अपने राज्य में सख्त रूख अपनाकर एक मिसाल रखी।
आज जबकि पाकिस्तान कश्मीर को लेकर पूरे विश्व में राज अलाप रहा है। राजा हरि सिंह ने कश्मीर को भारत में शामिल करने की पहल अपनी ओर से करके पाकिस्तान को आइना दिखाया था। जम्मू-कश्मीर सहित पूरे भारत के लोग हरि सिंह जैसे प्रगतिशील और देशभक्त शासक को सदियों तक याद करेंगे।

Wednesday, 21 September 2016

गणेश विसर्जन पर पुणे के ईन हिन्दुओं ने जो किया उसको देखकर सर झुकाएगा सारा ज़माना !


गणेश विसर्जन का एक जुलूस निकल रहा था । सब लोगों में बड़ा उत्साह था ख़ूब जोश में थे और सभी हिंदू लोग गणेश भक्ति में मतवाले हो रहे थे । बेहद दर्शनीय नज़ारा था फिर जुलूस में सारे जोश को छोड़कर एक नेक काम .... 

सारे भक्तिभाव और जोश के साथ साथ होश क़ायम रखने की ऐसी मिसाल आपको हिंदू धर्म के अलावा किसी और में देखने का सोभाग्य कभी प्राप्त नहीं होगा । आपको ये भी पता है कि एक सम्प्रदाय तो ऐसा है जो अपनी आस्था में .... 

ख़ैर उनको छोड़िए आपको बताते हैं दरअसल गणेश विसर्जन के जुलूस में क्या घटित हुआ । हुआ यूँ कि जुलूस के बीच में मरीज़ को कहीं ले के जा रहीएक ऐम्ब्युलन्स का सायरन गूँज उठा । हिन्दुओं ने बड़े ही शांत भाव स .... 

चाहे कोई कुछ भी कहता रहे हज़ारों की भीड़ के बावजूद ये शांति , ये मानवता आपको किसी और में देखने को नहि मिलेगी । देखें ये शानदार विडीओ और देखने के बाद ख़ुद के हिंदू होने पे गर्व महसूस हो तो शेयर ज़रूर क .... 


https://www.youtube.com/watch?v=w_yyCVb_yjk

Tuesday, 13 September 2016

ममता बॅनर्जी की गोरक्षकों को चेतावनी, गोमाताआें को
                     गिनना बन्द करें !


मुसलमानप्रेमी ममता बानो (बॅनर्जी) गोहत्या का समर्थन कर रही है, यदि एेसा जनता को लगें, तो इसमें कोर्इ आश्चर्य नहीं होगा
कोलकाता – गोरक्षकों को कड़ी चेतावनी देते हुए पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सोमवार (१२ सितंबर) को कहा कि, यदि किसी ने कानून तोडा तो कानून फिर अपने ढंग से काम करेगा। मुख्यमंत्री ने यह बात इस प्रश्न के उत्तर में कही कि क्या गोरक्षकों के विरुध्द कार्रवाई हो सकती है ? ममता ने कहा, ‘कोई शाकाहारी व्यक्ति शाकाहारी भोजन करेगा जबकि मांसाहारी व्यक्ति मांसाहार करेगा। ये लोग बतानेवाले कौन होते हैं कि मैं क्या खाऊं।’
बनर्जी ने राज्य सचिवालय में संवाददाताओं से बातचीत में कहा, ‘मैं सभी से अनुरोध करूंगी गंदी चालें न खेलें। सभी को अपने धर्म के पालन का अधिकार है और वे गायें गिन रहे हैं। यूरोप में लोग गाय खाते हैं। आदिवासी लोग भी गाय खाते हैं।’
धर्म के साथ खेलने वालों को नहीं बख्शने के लिए आगाह करते हुए ममता ने कहा कि आजकल तो यह हो गया है कि यदि कोई दुर्घटना भी हो जाए तो लोग पूछते हैं कि चालक और मृतक का क्या धर्म था। उन्होंने कहा कि विधानसभा के अगले सत्र में सरकार एक विधेयक लाएगी जिसमें किसी भी दंगे के दोषियों के लिए यह अनिवार्य होगा कि वे पीड़ितों को मुआवजा दें। मुख्यमंत्री ने कहा, ‘हम इसे पिछले पांच वर्ष के पूर्व प्रभाव से लाएंगे।’ उन्होंने कहा कि कुछ पार्टियां ऐसी हैं जिनका मकसद लोगों को बांटना और हिंसा भड़काना है। उन्होंने कहा कि राजनीति लड़ाई विचाराधारा पर आधारित होती है, न कि धर्म या लोगों के आधार पर।

Monday, 12 September 2016

केरल का खास पर्व है ओणम


ओणम महोत्सव पर आकर्षक रंगोली की रंगत

उत्सवों की श्रृंखला के बीच रविवार को ओणम महोत्सव की शुरुआत हुई। उत्सव का विभिन्न स्थानों पर फूलों की आकर्षक रंगोली बनाकर स्वागत किया गया। लोगों का विश्वास है कि तिरुओणम वह अवसर है जब सम्राट महाबली की आत्मा केरल की यात्रा करती है। इस उपलक्ष्य में स्थान-स्थान पर सहभोज और उत्सव का आयोजन होता है। केरल में बड़े पैमाने पर इस पर्व को मनाते हैं।

केरल के प्रसिद्ध त्योहार 'ओणम' के माध्यम से नई संस्कृति को जानने का मौका मिलता है। इस अवसर पर महिलाओं द्वारा आकर्षक 'ओणमपुक्कलम' (फूलों की रंगोली) बनाई जाती है। और केरल की प्रसिद्ध 'आडाप्रधावन' (खीर) का वितरण किया जाता है। ओणम के उपलक्ष्य में विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम तथा खेल-कूद प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाता है। इन प्रतियोगिताओं में लोकनृत्य, शेरनृत्य, कुचीपु़ड़ी, ओडि़सी, कथक नृत्य प्रतियोगिताएँ प्रमुख हैं।

इतिहास की नजर में : माना जाता है कि ओणम पर्व का प्रारंभ संगम काल के दौरान हुआ था। उत्सव से संबंधित अभिलेख कुलसेकरा पेरुमल (800 ईस्वी) के समय से मिलते हैं। उस समय ओणम पर्व पूरे माह चलता था।



ओणम केरल का महत्वपूर्ण पर्व है। यह त्योहार फसलों की कटाई से संबंधित है। शहर में इस त्योहार को सभी समुदाय के लोग हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं। ओणम मलयालम कैलेंडर के पहले माह 'चिंगम' के प्रारंभ में मनाया जाता है। यह पर्व चार से दस दिनों तक चलता है जिसमें पहला और दसवाँ दिन सर्वाधिक महत्वपूर्ण होता है।

Friday, 9 September 2016

एक ऐसा शिव मंदिर जिसके रहस्य से      वैज्ञानिक भी हुए हैरान


एक ऐसा शिव मंदिर जिसके रहस्य से वैज्ञानिक भी हुए हैरान तमिलनाडु में स्थित बृहदेश्वर मंदिर अपनी भव्यता और वास्तुशिल्प के लिए प्रसिद्ध है। तंजावुर के इस मंदिर के निर्माण कला की एक विशेषता यह है कि इसके गुंबद की छाया जमीन पर नहीं पड़ती है।


1-एक ऐसा शिव मंदिर जिसके रहस्य से वैज्ञानिक भी हुए हैरान
1-एक ऐसा शिव मंदिर जिसके रहस्य से वैज्ञानिक भी हुए हैरान

यह अब भी वैज्ञानिकों के लिए आश्चर्य का विषय है।

इस मंदिर को कुछ वर्ष पहले यूनेस्को ने विश्व धरोहर घोषित किया था।

इतिहास के साक्ष्यों के मुताबिक, इस मंदिर का निर्माण करवाया था राजाराज चोल-I ने। कहा जाता है कि यह मंदिर 1010 में पूरी तरह बन कर तैयार हुआ था।

चोल राजवंश के शासनकाल को भारतीय इतिहास का स्वर्णिम काल भी कहा जाता है।यह आश्चर्य का विषय है कि उन दिनों इतनी बड़ी मात्रा में ग्रेनाइट पत्थर कहां से लाया गया होगा, क्योंकि यहां से सौ-सौ किलोमीटर दूर तक भी ग्रेनाइट के खान नहीं हैं।


मंदिर के शिखर पर स्वर्णकलश स्थित है। जिस पत्थर पर यह कलश स्थित है, उसका भार अनुमानतः 80 टन के करीब है।

इसकी खास बात यह है कि यह एक ही पाषाण से बना हुआ है। मंदिर में स्थापित विशाल, भव्य शिवलिंग को देखने पर उनका बृहदेश्वर मंदिर नाम सर्वथा उपयुक्त प्रतीत होता है।


एक ऐसा शिव मंदिर जिसके रहस्य से वैज्ञानिक भी हुए हैरान

इन सबूतों से पता चलता है कि ‘माया सभ्यता’ के लोग ‘हिन्दू’ थे, करते थे सूर्य की उपासना


इस पृथ्वी पर कई सभ्यताएं थीं. लोग रहते थे, व्यापार करते थे और अपनी ज़िंदगी को आसानी से जीते थे. सबसे अच्छी बात ये थी कि सभी सभ्यताओं की अपनी अलग पहचान होती थी. जैसे हड़प्पा सभ्यता में लोग नगरो में रहना पसंद करते थे. उनकी जीवनशैली दूसरों से पूरी तरह अलग थी. वहीं मिस्र में लोग गांवों में रहना पसंद करते थे. मरने वालों की ममी बनाई जाती थी. कहने का तात्पर्य यह है कि सभी सभ्यताओं की अपनी एक विशेष पहचान थी. लेकिन हम आपको दो ऐसी सभ्यताओं के बारे में बताने जा रहे हैं, जो अलग होने के बावजूद भी कई मामलो में समान थीं.

कहने को तो दोनों सभ्यताएं काफ़ी अलग हैं क्योंकि प्रशांत महासागर इन दोनों को विभाजित करता है. फ़िर भी कई मामलों में ये दोनों सभ्यताएं आपस में काफी मिलती-जुलती हैं. आइए, हम आपको बताते हैं कि कैसे इन सभ्यताओं में समानता है.माया सभ्यता और इंडोनेशियाई सभ्यता एक ही हैं?

दोनों सभ्यताओं के पिरामिड चकौर हैं

 Copan Temple, Honduras. Mayan Empire, 5th century A.D. or before.
Chichen Itza, Mexico. Mayans Empire, between 600 – 900 AD.

दोनों सभ्यताओं में सूर्य की पूजा होती थी

Gate of the Sun, Bolivia. Tiwanaku Culture, 1500 B.C

.
Candi Sukuh, 15th Century Hindu Temple, Indonesia. 

लंबे पिरामिड को देखने से पता चलता है कि दोनों काफी समान थे

Tikal Pyramid, Guatemala. Mayan Empire, 400 B.C. 
Ak Yom, Cambodia. Khmer Regime, 900 A.D.  

इन सभ्यताओं में द्वारपाल होते थे.

Simian Sculpture, Copan, Honduras. Mayan Empire, 5th century A.D. or before. 
Dwarpala, Candi Sewu, Indonesia. Mataram Kingdom, 782 A.D. 

माया सभ्यता के लोग हिन्दू थे?

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इंडोनेशिया एक हिन्दू राष्ट्र था. महाभारत हो या फ़िर रामायण, प्रत्येक ग्रंथों में इंडोनेशिया की चर्चा होती है. आज भी वहां कई पौराणिक मंदिर और गुफाएं हैं. माया सभ्यता और इंडोनेशियाई सभ्यता में काफी समानताएं देखने को मिलती है. मंदिर हो या फ़िर स्मारक, हर जगह इसे महसूस किया जा सकता है. तो मन में यही सवाल उठता है कि क्या माया सभ्यता के लोग हिन्दू थे?

खुलासा: पारसी समुदाय है परशुराम के अनुयायिओं का वंशज


पारसियों का किसी जमाने में था भारत से बहुत गहरा नाता. आपको मेरी ये बात सुनकर थोड़ा अजीब लगे लेकिन भाई, ये मैं नहीं कह रहा. यह तो इस किताब का दावा है और इसने अपनी इस बात को साबित करने के लिए अनेक तर्क भी दिए हैं. जिन्हें जानने के बाद आप भी इस बात पर यकीन करने लगेंगे.



इसके अलावा भी कई ऐतिहासिक परम्पराएं ऐसी हैं, जो इन तथ्यों को सही साबित करती हैं. आपको बता दें, पारसी ‘Zoroastrianism’ पंथ को मानते हैं. यह सम्प्रदाय प्राचीन समय में काफ़ी तेज़ी से फैला था. कई विद्वानों ने इन पर किताबें लिखी है. कुछ का दावा है कि इनका उद्गम प्राचीन भारत से हुआ है.
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विद्वानों का दावा है कि पारसी (Parsees) शब्द संस्कृत के परशु (Parashu) से आया है. यह भगवान परशुराम के हथियार का नाम था. आपकों बता दें परशुराम का जन्म त्रेता युग में हुआ था. इनका जन्म क्षत्रियों का नाश करने के लिए हुआ था. परशुराम के अनुयायी ही पारसी कहलाये.
कालान्तर में वो ईरान चले गये. इसी वजह से ईरान को प्राचीन समय में Parasika या Parasya Desha कहा जाता था. आगे चलकर इसे ही पर्शिया कहा जाने लगा. यह दावा Bhikshu Chaman Lal ने अपनी फेमस बुक ‘Hindu America’ में किया है. यह किताब 1940 में लिखी गयी थी.


इसके अलावा भी पारसियों का मानना है कि उनकी उत्पत्ति Hapta Hendu क्षेत्र में हुई थी. जिसे हम संस्कृत में Sapta Sindhu के नाम से जानते हैं. जिसमें कि आज का पंजाब और पाकिस्तान वाला क्षेत्र आता है. उनके द्वारा जिस देवता की मुख्य रूप से पूजा की जाती है, उसे Ahura Mazda के नाम से सम्बोधित किया जाता है, जो कि संस्कृत के Asura Mahadev से बना है. उनकी भाषा की उत्त्पत्ति भी संस्कृत भाषा से हुई बतायी जाती है. उनका पवित्र ग्रन्थ Zend Avesta भी संस्कृत ग्रन्थ Chanda Avastha से उद्भित बताया जाता है.
यहां कुछ शब्द हम आपको बताते हैं, जिससे आपको अंदाज़ा लगेगा कि उनकी भाषा Zend (Avestan) और हमारी संस्कृत में कितनी समानता है.
इसके साथ ही ख़ास बात यह है कि दोनों भाषाओँ में इन शब्दों का अर्थ भी समान ही निकलता है.
यहां हम आपकों कुछ ऐसी वैदिक परम्पराएं बता रहे हैं, जो आज भी पारसी धर्म के अनुयायिओं द्वारा फ़ॉलो की जाती है.
  1.  अग्नि को पवित्र मान कर उसकी पूजा करना.
  2.  पवित्र धागा सेरेमनी को मनाना जिसे हम आज Kushti के नाम से जानते हैं.
  3.  जिस तरह वैदिक समय में हमने समाज को ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शुद्र नामक चार वर्णों में बांटा था उसी तरह पारसियों ने भी अपनी सामाजिक व्यवस्था को Atharva, Ratheshtan, Vastriyoksiya, Huits में बांट रखा है. इस तरह के अनेक प्रमाण मिले हैं, जिनसे निम्न निष्कर्ष निकलते हैं-
  •  पारसियों की शुरूआती बस्तियां भारत से निकल कर विश्व में फैली हैं.
  •  पारसी समुदाय वैदिक हिन्दुओं से निकल कर ही बना है. (इस किताब के अनुसार पारसी हिन्दुओं के बिछड़े हुए भाई ही हैं).
विश्व की प्राचीन सभ्यताओं में से एक वैदिक सभ्यता में अनेक ऐसे पहलू अभी छिपे हुए हैं. जो समय-समय पर होने वाली रिसर्च में सामने आते रहते हैं. देखते हैं, बुद्धिजीवी अपने अगले अध्ययन से इस सभ्यता का कौन-सा पर्दा उठाते हैं.

Thursday, 8 September 2016

कश्मीर में तैनात एक सिपाही का खुला खत, जो पूरे देश का सिर शर्म से झुका देगा


 मैं पैरामिलिट्री फोर्स में सेवारत हूं, और पिछले चार साल से कश्मीर में तैनात हूं, इसी महीने मेरी नौकरी को दस साल भी पूरे हो गए है, और मुझे करीब 28,000 रुपये तनख्वाह मिलती है, और अगर इस दौरान छुट्टी पर गया तो तनख्वाह भी कट जाती है, तो सिर्फ 22,500 रुपये ही मिलेंगे।
मेरा परिवार किराये के मकान में रहता है, जिसके लिये मैं हर महीने उन्हें 5000 रुपये चुकाता हूं, दो बच्चे हैं, जिनकी स्कूल फीस, ट्यूशन और बाकी चीजों में करीब 6 हजार रुपये खर्च हो जाते है, घर में राशन और गैस वगैरह पर हर महीने करीब 7 हजार रुपये खर्च होते है। यानि कुल मिलाकर मेरे घर का मोटा-मोटी खर्च 18 हजार रुपये है।



कश्मीर में तैनात सिपाही का छलका दर्द

सके बाद मेरा और परिवार का मोबाइल खर्च करीब 1500 रुपये है, इसके अलावा अगर मैं हर तीन महीने के बाद घर छुट्टी पर लौटता हूं तो दोनों तरफ का किराया और बाकी खर्च जोड़कर करीब 10 हजार रुपये खर्च हो जाते है, अगर परिवार का हर सदस्य स्वस्थ्य रहें यानि डॉक्टर का चक्कर नहीं लगता है तो करीब तीन हजार महीने में बच जाते हैं नहीं तो वो भी खत्म। मेरी कुछ बातों पर सभी गौर करें, और छोटे-बड़े सभी इसे शेयर भी करें
मैं कश्मीर में तैनात हूं इस वजह से मेरे घर पर ना होने के कारण मेरे बच्चों को कोई सुरक्षा नहीं मिलती है, मैं उनसे केवल बात कर पाता हूं। मेरी गैर-मौजूदगी में उनके पास ऐसा कोई रोल मॉडल नहीं होता, जो उन्हें अच्छी बातें सिखा सकें, हां, अगर आस-पास कोई नशा करने वाला व्यक्ति है तो वो जल्दी ही उनकी नकल करने लग जाते हैं। हमारे परिवार की भी ठीक ढ़ंग से सुरक्षा नहीं हो पाती है, सरे राह, भरे बाजार कोई भी उनसे कुछ भी कहकर चला जाता है।
इसके बाद पुलिस से शिकायत करने जाओ, तो वो कहती है कि परिवार वालों को कहो कि सुरक्षित तरीके से रहे, अगर एफआईआर दर्ज करा दिया तो उल्टा दबंगों और नेताओं का दबाव सहों। इसके साथ ही हमारी संपत्ति भी सुरक्षित नहीं है, जिसके आगे या अगल-बगल है, वहीं कब्जा करने लगता है, शिकायत करो तो पता चलता है कि वो किसी नेता का रिश्तेदार है, मामले में कुछ नहीं हो पाएगा, केवल आश्वासन मिलता है, इसके सिवा कुछ नहीं।
साथ ही हमारी जान का भी कुछ पता नहीं, कभी भी जा सकती है। हम भी पढ़ें-लिखे हैं, घर पर रहकर अपना और अपने परिवार का पालन-पोषण अच्छे से कर सकते हैं, आजीविका अच्छे से चला सकते हैं, अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा घर में ही दे सकते हैं, उन्हें स्कूल छोड़ सकते है, अपनी संपत्ति का रख-रखाव कर सकते है, अपने परिवार के सदस्यों मां, बहन और बीवी की सुरक्षा खुद कर सकते हैं, हमारा शरीर तो पूरा साल चौबीसी घंटे ड्यूटी पर ही रहता है, लेकिन इस घिनौनी दुनिया से इतना डर लगता है कि दो-दो दिनों तक नींद ही नहीं आती है।
लोग हमारे लिए सिर्फ बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, लेकिन असल में होता क्या है इसका एक ताजा उदाहरण देता हूं, मैं पिछले 10 सालों से नौकरी कर रहा हूं, मेरे घर तक अभी तक ना तो बिजली पहुंची है और न ही पक्की सड़क, उसी ग्राम पंचायत का दूसरा शख्स है जिसका साल 2013-14 में सिविल सेवा में चयन हो गया। सरकार ने 3 महीने के भीतर उसके घर तक बिजली और पक्की सड़क बनवा दी, जबकि मैंने संबंधित विभागों से कई बार कहा लेकिन इस दिशा में कुछ भी काम नहीं हुआ।
बताइये हमारी क्या गलती है और हमने किस गरीब का पैसा खाया है, हमको किसी गरीब का पेट काटकर सरकार सैलरी न दे, लेकिन, देशभक्त का चोला पहनाकर हमारे स्वाभिमान और हमारे परिवार को लज्जित भी मत करो।

Tuesday, 6 September 2016

सुप्रीम कोर्ट हमारे मामले में दखल नहीं दे सकता

सुप्रीम कोर्ट हमारे मामले में दखल नहीं दे सकता

ट्रिपल तलाक पर डरा सुप्रीम कोर्ट, केंद्र से बोला, "आप ही बताओ इसपर अब क्या करें"
अक्सर आपने फिल्मो में सुना और देखा होगा की, कानून कुछ लोगों की मुट्ठी में होता है
पुलिस प्रशासन जेब में होते है और अदालते घर में पालतू जानवर की तरह बंधे हुए होते है, फिल्मे भी बिलकुल निराधार नहीं होती कुछ न कुछ सच्चाई भी उनमे होती ही है
और ये रहा उदाहरण आपके सामने, अक्सर आपने सुना होगा की सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को लगाई फटकार, सुप्रीम कोर्ट ने हिन्दुओ के मामले में सुनाया ये फैसला वो फैसला
ऐसा प
्रतीत होता है की सुप्रीम कोर्ट और देश में कानून कितना मजबूत है, सुप्रीम कोर्ट एकदम स्वतंत्र है और ताकतवर है और फैसले लेने में सबसे आगे है
पर सभी मुद्दों पर ऐसा है नहीं, और जब मुद्दा जुड़ा हो मुस्लिमो से तो सुप्रीम कोर्ट भी पसोपेश में ही रहता है
सभी मुद्दों पर बड़े बड़े फैसले लेने वाला सुप्रीम कोर्ट मुस्लिम महिलाओ के हक़ पर फैसला लेने में असमर्थ नजर आ रहा है
मुस्लिम पुरुषो का संगठन मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का कहना है की सुप्रीम कोर्ट हमारे मामले में दखल नहीं दे सकता, ट्रिपल तलाक एकदम जायज है इत्यादि
वहीँ कुछ मुस्लिम महिलाएं सुप्रीम कोर्ट से न्याय की भीख मांग रही है, पर मामला मुस्लिमो का है इसलिए सुप्रीम कोर्ट भी केंद्र से मदद मांग रहा है, की क्या करें ?
साफ़ है की सुप्रीम कोर्ट इस बात से डरा हुआ है की कहीं उसने कुछ फैसला सुनाया और मुस्लिम नाराज न हो जाएं,
वैसे सुप्रीम कोर्ट कल को दीपावली पर भी प्रतिबन्ध लगा सकता है, ऐसे फैसलों के लिए उसे किसी से पूछने की जरुरत नही
पड़ती