Saturday, 18 February 2017

श्री गुरुजी माधव सदाशिव गोलवलकर

श्रीगुरुजी

श्रीगुरुजी! श्री. माधव सदाशिव गोलवलकर! राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक। सन् 1940 से 1973 इन 33 वर्षों में श्रीगुरुजी नें संघ को अखिल भारतीय स्वरुप प्रदान किया। इस कार्यकाल में उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारप्रणालि को सूत्रबध्द किया। श्रीगुरुजी, अपनी विचार शक्ति व कार्यशक्ति से विभिन्न क्षेत्रों एवम् संघटनाओं के कार्यकर्ताओं के लिए प्रेरणास्रोत बनें। श्रीगुरुजी का जीवन अलौकिक था, राष्ट्रजीवन के विभिन्न पहलुओं पर उन्होंने मूलभुत एवम् क्रियाशील मार्गदर्शन किया। “सचमुच ही श्रीगुरूजी का जीवन ऋषि-समान था।”
माधव सदाशिव गोलवलकर को श्री गुरुजी के नाम से भी जाना जाना जाता है. आप राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघके दूसरे सरसंघचालक (सुप्रीम लीडर) थे। इनका जन्म 19 फ़रवरी 1906 को रामटेक, महाराष्ट्र में हुआ था.
अनुशासन पर विचार:
1.  मानव स्वयं पर अनुशासन के कठोरतम बंधन तब बड़े आनन्द से स्वीकार करता है, जब उसे यह अनुभूति होती है कि उसके द्वारा कोई महान कार्य होने जा रहा है.
आत्मविश्वास पर विचार:
2.  मनुष्य के आत्मविश्वास में और अहंकार में अंतर करना कई बार कठिन होता है.
घृणा पर विचार:
3. मानव के हृदय में यदि यह भाव आ जाय कि विश्व में सब-कुछ भगवत्स्वरूप है तो घृणा का भाव स्वयमेव ही लुप्त हो जाता है.
जीवन पर विचार:
4. हमारी मुख्य समस्या है – जीवन के शुद्ध दृष्टिकोण  का अभाव और इसी के कारण शेष समस्याएँ प्रयास करने पर भी नहीं सुलझ पातीं.
निर्भयता/निडरता पर विचार:
5. मनुष्य के लिए यह कदाचित अशोभनीय है कि वह मनुष्य- निर्मित संकटों से भयभीत रहे.
6. इस बात से कभी वास्तविक प्रगति नहीं हो सकती कि हम वास्तविकता का ज्ञान प्राप्त किये बिना अंधों की भांति इधर-उधर भटकते फिरें.
भारत/देश पर विचार:
7. भारत – भूमि इतनी पावन है कि अखिल विश्व में दिखाई देनेवाला सत तत्व यहीं अनुभूत किया जाता है, अन्यत्र नहीं.
शक्ति पर विचार:
8. सच्ची शक्ति उसे कहते हैं जिसमें अच्छे गुण, शील, विनम्रता, पवित्रता, परोपकार की प्रेरणा तथा जन –जन के प्रति प्रेम भरा हो. मात्र शारीरिक शक्ति ही शक्ति नहीं कहलाती.

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