Friday, 17 February 2017

हर पुरूष ले जिम्मेदारी

हर पुरूष ले जिम्मेदारी



हमारा समाज पुरुष प्रधान देश बन चुका है, ऐसे में शायद बहुत समय लगेगा महिलाओं को अपना खोया सम्मान वापिस पाने में। लेकिन क्या ये हर पुरुष का कर्तव्य नहीं है कि वो हर महिला का हर रूप में सम्मान करे? माँ का सम्मान और पत्नी का अपमान, बहिन को प्यार और भाभी को दुत्कार, प्रेमिका से प्यार और पत्नी को तिरस्कार। ये कैसा सम्मान जो सभी स्त्रियों के लिए समान नहीं होता, घर की महिलाएं आदरणीय और बाहर की स्त्रियों पर बुरी नजर। आज भी हम गौर करें तो इसी समाज में ऐसे भी पुरूष हुए हैं जिन्होंने नारी शक्ति का समझा भी और हमेशा उसका आदर, सम्मान किया। ऐसा ही एक वाकया स्वामी विवेकानंद से  जुड़ा हुआ है। 

एक बार एक विदेशी महिला स्वामी विवेकानंद के समीप आकर बोली मैं आपस शादी करना चाहती हूं। विवेकानंद बोले क्यों? मुझसे क्यों ? क्या आप जानती नहीं की मैं एक सन्यासी हूं?औरत बोली  मैं आपके जैसा ही गौरवशाली, सुशील और तेजोमयी पुत्र चाहती हूं और वो वह तब ही संभव होगा। जब आप मुझसे विवाह करेंगे।

विवेकानंद जी बोले हमारी शादी तो संभव नहीं है, परन्तु हां एक उपाय है। औरत- क्या? विवेकानंद बोले आज से मैं ही आपका पुत्र बन जाता हूं। आज से आप मेरी मां बन जाओ। आपको मेरे रूप में मेरे जैसा बेटा मिल जाएगा।औरत विवेकानंद के चरणों में गिर गयी और बोली की आप साक्षात् ईश्वर के रूप है। इसे कहते है पुरुष और ये होता है पुरुषार्थ।

एक सच्चा पुरुष वो ही होता है जो हर नारी के प्रति अपने अन्दर मातृत्व की, सम्मान की भावना उत्पन्न कर सके। क्यों नहीं स्वामी जी जैसे सभी पुरूष बन सकते हैं? अगर ऐसा पुरूष हो और इनसे बना हो समाज तो हर कोई समान अधिकार से जी सकता है। फिर समाज न पुरुष प्रधान होगा न ही नारी प्रधान होगा तो बस एक सभ्य और अनुशाषित समाज, राष्ट्र।

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