Wednesday, 29 March 2017

हिन्दुओ के आस्था के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है .

.दक्षिणेश्वर काली मंदिर,बंगाल में आम जनता के लिए मंगला आरती बंद है ।
वहाँ के सरकार द्वारा हिंदुस्तान की आत्मा पे ये कठोर घात है ।
हिन्दुओ के आस्था के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है ... 
कलकत्ता में दक्षिणेश्वरी काली माता का मंदिर स्तिथ है यहाँ मंदिर बहुत ही भव्य और सुन्दर है . इस मंदिर का निर्माण 1855 में हुवा था  ये  एक बहुत ही प्राचीन मंदिर है इस मंदिर का पूरा काम होने में 8  साल लगे थे जब इस मंदिर का निर्माण किया योग तब कीनी ने नहीं सोच होगा के तृष्टीकरण के कारण इस मनिदर में मंगल आरती एक दिन बंद कर दी जाएगी  किनते दुःख की बात है ये की अब हिन्दू आरती भी नहीं कर सकते 
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार इस बात की जानकारी स्वयं इन केंद्रीय मंत्री ने दी है जिसके बाद शक का तो कोई सवाल ही नहीं उठता  बेगम ममता बनर्जी सेक्युलरिजम ने काम पर किस तरह हिन्दुओ का अपमान कर रही है पक्षिम बंगाल में यहाँ इस बात का दूसरा उदाहरण है 

आपको बता दे की हिन्दुओ के लियुए इस मंदिर में आरती बंद कर दी गए है . अब इस मंदिर में कोई भी हिन्दू आरती नहीं कर पायेगा अब केंद्रीय मंत्री ने इसके पीछे पक्षिम बंगाल की सरकार यानि जिहादी ममता बेनर्जी पर निशाना साधा है आपको याद होगा की अब त्तक बंगाल के  मुस्लिम इलाको से खबर आयी थी की माँ दुर्गा पूरा सरस्वती पूजा , पर रोक लगा दी गयी है लेकिन अब कोलकाता के दक्षिणेश्वरी मंदिर में भी इस तरह का कुछ लोग इस बारी में तो कई सोच भी नहीं सकता था जैसे जैसे ज़ुहदीयो की जनसंख्या  बढ़ रही है  वैसे वैसे हिन्दुओ का बुरी तरह दमन कर रही है  

क्या है इस काली मंदिर का रहस्य
कोलकाता। 1847 की बात है। देश में अंग्रेजों का शासन था। पश्चिम बंगाल में रानी रासमनी नाम की एक बहुत ही अमीर विधवा थी।
उनकी जिंदगी में सबकुछ था लेकिन पति का सुख नहीं था। रानी रासमनी जब उम्र के चौथे पहर में आ गई तो उनके मन में सभी तीर्थों के दर्शन करने का खयाल आया। रानी रासमनी देवी माता की बहुत बड़ी उपासक थी।
उन्होंने सोचा कि वो अपनी तीर्थ यात्रा की शुरुआत वराणसी से करेंगी और वहीं रहकर देवी का कुछ दिनों तक ध्यान करेंगी। उन दिनों वाराणसी और कोलकाता के बीच कोई रेल लाइन नहीं थी।
कोलकाता से वाराणसी जाने के लिए अमीर लोग नाव का सहारा लेते थे। दोनों ही शहर से गंगा गुजरती हैं इसलिए लोग गंगा के रास्ते ही वाराणसी तक जाना चाहते थे।
रानी रासमनी ने भी यही फैसला किया। उनका काफिला वाराणसी जाने के लिए तैयार हुआ। लेकिन जाने के ठीक एक रात पहले रानी के साथ एक अजीब वाकया हुआ।
मन में देवी का ध्यान कर के वो सोई थी। रात में एक सपना आया। सपने में देवी काली प्रकट हुई और उनसे कहा कि वाराणसी जाने की कोई जरूरत नहीं है। आप गंगा के किनारे मेरी प्रतिमा को स्थापित करिए। एक खूबसूरत मंदिर बनाइए। मैं उस मंदिर की प्रतिमा में खुद प्रकट होकर श्रद्धालुओं की पूजा को स्वीकार करुंगी।
रानी की आंख खुली। सुबह होते ही वाराणसी जाने का कार्यक्रम रद्द कर दिया गया और गंगा के किनारे मां काली के मंदिर के लिए जगह की तलाश शुरू कर दी गई।
कहते हैं कि जब रानी इस घाट पर गंगा के किनारे जगह की तलाश करते करते आईं तो उनके अंदर से एक आवाज आई कि हां इसी जगह पर मंदिर का निर्माण होना चाहिए।
फिर ये जगह खरीद ली गई और मंदिर का काम तेजी से शुरु हो गया। ये बात 1847 की है और मंदिर का काम पूरा हुआ 1855 यानी कुल आठ सालों में।

No comments:

Post a Comment