Thursday, 9 March 2017

सावित्रीबाई फुले को महिलाओं में शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए जाना जाता है.

सावित्रीबाई फुले: आधुनिक भारत की पहली महिला शिक्षिका

देश में किसी को शिक्षा ग्रहण करने से रोका नहीं जा सकता क्योंकि ये हर व्यक्ति का मौलिक अधिकार है. लेकिन एक भारत ऐसा भी था. जो महिलाओं को शिक्षा देने के विरुद्ध था. समाज के ऐसे नजरिए के खिलाफ खड़ा होना आसान बात नहीं थी. सावित्रीबाई फुले ने लोगों के नजरिए को बदलने का काम किया. उन्होंने 100 साल पहले ही महिलाओं के लिए 18 महिला स्कूल खोल दिए थे.
सावित्रीबाई का जन्म 3 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र के सतारा जिले के नायगांव नामक छोटे से गांव में हुआ था. 9 साल की उम्र में उनकी शादी पूना के ज्योतिबा फुले के साथ हो गई. विवाह के समय सावित्री बाई फुले की कोई स्कूली शिक्षा नहीं हुई थी.
सावित्री जब छोटी थी तब एक बार अंग्रेजी की एक किताब के पन्ने पलट रही थी, तभी उनके पिताजी ने यह देख लिया और तुरंत किताब को छीनकर खिड़की से बाहर फेंक दिया, क्योंकि उस समय शिक्षा का हक केवल उच्च जाति के पुरुषों को ही था, दलित और महिलाओं को शिक्षा ग्रहण करना पाप था.
    1 जनवरी 1848 से लेकर 15 मार्च 1852 के दौरान सावित्रीबाई फुले और ज्योतिबा फुले ने बिना किसी आर्थिक मदद और सहारे के लड़कियों के लिए 18 विद्यालय खोले. उस दौर में ऐसा सामाजिक क्रांतिकारी की पहल पहले किसी ने नहीं की थी.

सावित्रीबाई फुले ने क्यों किया अंग्रेजी शासन और शिक्षा का समर्थन

सावित्रीबाई फुले इसी वजह से अंग्रेजी शासन का समर्थन करती थीं. सावित्रीबाई फुले का जन्म 3 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र के सतारा जिले में हुई थी. उनका और ज्योतिबा का बाल विवाह हुआ था. ज्योतिबा के सहयोग से सावित्रीबाई ने पाश्चात्य शिक्षा हासिल की और मात्र 17 साल की उम्र में ही ज्योतिबा द्वारा खोले गए लड़कियों के स्कूल की शिक्षिका और प्रिंसिपल बनीं.
सावित्रीबाई के लेखन से साफ है कि वे अंग्रेजी शिक्षा को महिलाओं और शूद्रों की मुक्ति के लिए जरूरी मानती थीं. अपनी कविता ‘अंग्रेजी मैय्या’ में वे लिखती हैं:
अंग्रेजी मैय्या, अंग्रेजी वाणई
शूद्रों को उत्कर्ष करने वाली
पूरे स्नेह से.
अंग्रेजी मैया, अब नहीं है मुगलाई
और नहीं बची है अब
पेशवाई, मूर्खशाही.
अंग्रेजी मैया, देती सच्चा ज्ञान
शूद्रों को देती है जीवन
वह तो प्रेम से।
अंग्रेजी मैया, शूद्रों को पिलाती है दूध
पालती पोसती है
माँ की ममता से.
अंग्रेजी मैया, तूने तोड़ डाली
जंजीर पशुता की
और दी है मानवता की भेंट
सारे शूद्र लोक को.
छत्रपति शिवाजी की प्रशंसक सावित्रीबाई पेशवाओं के शासन की भी घोर विरोधी थीं. इसकी मुख्य वजह थी कि पेशवाओं के शासन में शूद्रों और महिलाओं को बुनियादी अधिकार भी नहीं थे. पेशवाओं के राज में शूद्रों की दयनीय स्थिति का वर्णन अपनी एक कविता में करते हुए लिखती हैं:
पेशवा ने पाँव पसारे
उन्होंने सत्ता, राजपाट संभाला
और अनाचार, शोषण अत्याचार होता देखकर
शूद्र हो गए भयभीत
थूक करे जमा
गले में बँधे मटके में
और रास्तों पर चलने की पाबंदी
चले धूल भरी पगडंडी पर,
कमर पर बँधे झाडू से मिटाते
पैरों के निशान
असल में सावित्रीबाई ने सदियों से ब्राह्मणवाद और जातिवाद के कारण ‘गुलामगिरी’ में पड़े शूद्रों और महिलाओं की मुक्ति के लिए अंग्रेजी शासन और शिक्षा को एक अवसर के रूप में देखा.
आज जिस 1857 के ‘सिपाही विद्रोह’ को खासकर उत्तर भारत में प्रथम स्वाधीनता संग्राम के रूप में देखा जाता हैं. वहीँ सावित्रीबाई फुले ने उस समय अंग्रेजों की तरफ से लड़ने वाले महारों की वीरता की तारीफ में कविताएं लिखी हैं. वे यह मानती थीं कि अंग्रेजों ने हमें नहीं बल्कि उन ब्राह्मणों को गुलाम बनाया है जिन्होंने सदियों से शूद्रों को गुलाम बनाया हुआ है.
शिक्षित हो, संगठित हो और संघर्ष करो’ का जो नारा भीमराव अंबेडकर ने दलितों के लिए दिया था, उस नारे की पृष्ठभूमि सावित्रीबाई फुले ने अपनी कविताओं से बहुत पहले तैयार कर दी थी. इसी वजह से अंबेडकर भी फुले दंपत्ति को अपना आदर्श मानते थे.
सावित्रीबाई फुले ने शूद्रों से शिक्षित होने और मेहनत करने का आह्वान करते हुए लिखा:
स्वाबलंबन का हो उद्यम, प्रवृत्ति
ज्ञान-धन का संचय करो
मेहनत करके
बिना विद्या जीवन व्यर्थ पशु जैसा
निठल्ले ना बैठे रहो
करो विद्या ग्रहण
शूद्र-अतिशूद्रों के दुख दूर करने के लिए
मिला है कीमती अवसर
अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त करने का
जिस अंग्रेजी शासन को अधिकतर जनसमुदाय हिकारत की नजर से देखता है. उसकी तारीफ करने की सावित्रीबाई फुले के पास अपनी जमीनी वजह थी. इस जमीनी हकीकत को भी नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए कि शूद्रों और महिलाओं के भीतर शिक्षा का जो प्रसार हुआ उसमें ज्योतिबा और सावित्रीबाई फुले का नाम सबसे ऊपर होगा.

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