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Wednesday, 15 April 2020

what world will we live in after this storm passes

हमें खुद से सवाल पूछना होगा, इस तूफान के गुजर जाने के बाद हम कैसी दुनिया में रहेंगे?

हमें खुद से सवाल पूछना होगा, केवल यही सवाल नहीं कि हम इस संकट से कैसे उबरेंगे, बल्कि यह सवाल भी कि इस तूफान के गुजर जाने के बाद हम कैसी दुनिया में रहेंगे. तूफान गुजर जायेगा, जरूर गुजर जायेगा, हम में से ज्यादातर जिंदा बचेंगे लेकिन हम एक बदली हुई दुनिया में रह रहे होंगे... ये महत्वपूर्ण बात कहने वाले शख्स हैं प्रो. युवाल नोहा हरारी.
मगर अब हम उस दौर में आ गये हैं जब कम खाने की बजाये दुनिया में ज्यादा खाकर मरने वालों की संख्या ज्यादा है. कुपोषण से ज्यादा लोग मोटापे और उससे होने वाली बीमारी से मरते हैं. यहीं वो लिखते हैं जिस युग में मानव जाति प्राकृतिक महामारियों के सामने असहाय हुआ करती थी वह युग शायद अब बीत गया है मगर संभव है उसकी याद आये.
कुछ सालों के अंतराल में ये महामारियां आती रहीं हैं और हमारी सभ्यता पर हमारे इतराने के अहंकार को चूर चूर कर चली जातीं हैं. जब हम राष्ट्रवाद के नशे में डूब रहे हैं तब ये छोटा सा वायरस आकर बताता है कि कहां अपने को सीमाओं के दायर में बांट कर इतरा रहे हो. हम तो वैश्विक हैं ना हम लाख कहें कि ये बीमारी इसने फैलायी या उसने फैलायी मगर ये वायरस का यही खास गुण ही है कि पता ही नहीं चलता कि वायरस लेकर घूमने वाला शख्स बीमार है.


वो अंजाने में बीमारी बांटता है और संक्रमित लोगों की संख्या कई गुना बढ़ता जाता है. कोई धर्म और संप्रदाय किसी को बीमारी नहीं बांटते. दूसरा इस बीमारी से निपटने का तरीका भी बहुत अलग है जो लोगों को इस बीमारी को छिपाने को मजबूर करते हैं. बीमार शख्स को तो एकांतवास में भेजा ही जाता है फिर उसके परिवार और फिर उसका पड़ोस सभी के साथ ये क्रम दोहराया जाता है.जो 21वीं सदी में धरती से मानव जाति का अस्तित्व ही मिटा सकते हैं. इसलिये जरूरी है कि कोरोना से तो कड़ाई से निपटे मगर रोगियों से उदारता से पेश आयें फिर वो चाहे किसी भी धर्म जाति या संप्रदाय के हों. इस महामारी से तो हम जीत जाएंगे ही इस बात का गवाह इतिहास है. मगर समाज में वैमनस्यता घर कर गयी तो देश का बंटवारा ही होता है इस बात की गवाही भी इतिहास ही देता है.