Wednesday, 30 December 2015


ऑस्ट्रिया की खुदाई में 800 साल पुराना मोबाइल

 फोन पाया गया!


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यूं तो मोबाइल फोन का आविष्कार आधिकारिक रूप से आज से तकरीबन 40 साल पहले हुआ था। लेकिन ऑस्ट्रिया में पुरातत्व विभाग की खुदाई में एक मोबाइल फोन मिला है जिसके 800 साल पुराने होने का दावा किया जा रहा है।
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खुदाई में ज
ो मोबाइल फोन पाया गया है वह देखने में 1990 के दशक का लगता है जिसकी सोशल मीडिया पर जमकर चर्चा हो रही है। फोन के बटन स्फानलिपि के लगते हैं, जोकि प्राचीन समय में प्रयोग होती थी।
वैज्ञानिकों का दावा है कि यह फोन मेसोपोटामिया सभ्यता के लोग इस्तेमाल करते थे। इस फोन के बारे कई तरह के दावे किये जा रहे हैं, जिसमें कहा जा रहा है कि यह फोन इसी वर्ष ऑस्ट्रिया में खुदाई के दौरान पाया गया है। लेकिन अभी तक इस बात की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हो सकी है कि यह फोन किस वक्त खुदाई में पाया गया है।


https://www.youtube.com/watch?v=0_sUDkBABqk

Sunday, 27 December 2015

डेल्ही में तालिबान का फरमान हिन्दू परिवार को दी इलाका छोड़ने की धमकीhttp://hindi.revoltpress.com/nation/taliban-in-delhi-hindu-family-asked-to-leave-paternal-home/

राम मंदिर निर्माण की बात करने पर उत्तरप्रदेश के राज्यमंत्री ओमपाल नेहरा को मंत्रीपद से हटाया गया !

नागरिको, एक ओर राज्य के मंत्री आजम खान दिन प्रतिदिन इस्लामिक स्टेट के समर्थन में वक्तव्य कर रहे हैं; परंतु अखिलेश यादव उन पर कार्यवाही नहीं करते! दूसरी ओर राममंदिर के विषय में  बोलनेवाले नेहरा पर कार्यवाही की जाती है ! क्या यही धर्मनिरपेक्षता और राष्ट्रनिष्ठा है ? क्या यह असहिष्णुता नहीं है ? 
लखनऊ : राम मंदिर निर्माण का समर्थन करने को लेकर उत्तर प्रदेश के दर्जा प्राप्त राज्यमंत्री ओमपाल नेहरा को हटाया गया है।
जानकारी के अनुसार, उत्तर प्रदेश के राज्य मंत्री ओमपाल नेहरा ने वक्तव्य किया था कि अयोध्या में राम मंदिर और मथुरा में कृष्ण मंदिर बनाने की आवश्यकता है । नेहरा ने मुसलमान समाज से मंदिर बनाने में सहयोग करने का आवाहन भी किया था । उन्होंने कहा था की, राम मंदिर अयोध्या में नहीं होगा तो कहां होगा । राम मंदिर निर्माण के लिए मुसलमानों को कारसेवा करनी चाहिए । इससे विश्‍व हिंदू परिषद का मुद्दा ही खत्म हो जाए।

Thursday, 24 December 2015



 सर्दियों में गरीबों के लिए बादाम से बेहतर है मूंगफली, जो बड़ी-बड़ी बीमारियों से बचाती है












Monday, 21 December 2015

 
यह है काशी का

ज्ञानवापी मस्जिद जो औरंगजेब ने बनाया था काशी का सबसे 

प्राचीन ज्ञानवापी मंदिर तोड़ कर




ईसा पूर्व 11वीं सदी में राजा हरीशचन्द्र ने जिस विश्वनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था उसका सम्राट विक्रमादित्य ने जीर्णोद्धार करवाया था। उसे ही 1194 में मुहम्मद गौरी ने लूटने के बाद तुड़वा दिया था। इतिहासकारों के अनुसार इस भव्य मंदिर को सन् 1194 में मुहम्मद गौरी द्वारा तोड़ा गया था। इसे फिर से बनाया गया, लेकिन एक बार फिर इसे सन् 1447 में जौनपुर के सुल्तान महमूद शाह द्वारा तोड़ दिया गया। पुन: सन् 1585 ई. में राजा टोडरमल की सहायता से पं. नारायण भट्ट द्वारा इस स्थान पर फिर से एक भव्य मंदिर का निर्माण किया गया। इस भव्य मंदिर को सन् 1632 में शाहजहां ने आदेश पारित कर इसे तोड़ने के लिए सेना भेज दी। सेना हिन्दुओं के प्रबल प्रतिरोध के कारण विश्वनाथ मंदिर के केंद्रीय मंदिर को तो तोड़ नहीं सकी, लेकिन काशी के 63 अन्य मंदिर तोड़ दिए गए।

डॉ. एएस भट्ट ने अपनी किताब 'दान हारावली' में इसका जिक्र किया है कि टोडरमल ने मंदिर का पुनर्निर्माण 1585 में करवाया था। 18 अप्रैल 1669 को औरंगजेब ने एक फरमान जारी कर काशी विश्वनाथ मंदिर ध्वस्त करने का आदेश दिया। यह फरमान एशियाटिक लाइब्रेरी, कोलकाता में आज भी सुरक्षित है । ( नफरत का सबूत )
उस समय के लेखक साकी मुस्तइद खां द्वारा लिखित 'मासीदे आलमगिरी' में इस ध्वंस का वर्णन है। औरंगजेब के आदेश पर यहां का मंदिर तोड़कर एक ज्ञानवापी मस्जिद बनाई गई। 2 सितंबर 1669 को औरंगजेब को मंदिर तोड़ने का कार्य पूरा होने की सूचना दी गई थी। औरंगजेब ने प्रतिदिन हजारों ब्राह्मणों को मुसलमान बनाने का आदेश भी पारित किया था। आज उत्तर प्रदेश के 90 प्रतिशत मुसलमानों के पूर्वज ब्राह्मण है। (लेकिन ये मानेंगे नहीं)
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7 अगस्त 1770 ई. में महादजी सिंधिया ने दिल्ली के बादशाह शाह आलम से मंदिर तोड़ने की क्षतिपूर्ति वसूल करने का आदेश जारी करा लिया, परंतु तब तक काशी पर ईस्ट इंडिया कंपनी का राज हो गया था इसलिए मंदिर का नवीनीकरण रुक गया। 1777-80 में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई द्वारा इस मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया गया था। अहिल्याबाई होलकर ने इसी परिसर में विश्वनाथ मंदिर बनवाया जिस पर पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह ने सोने का छत्र बनवाया। ग्वालियर की महारानी बैजाबाई ने ज्ञानवापी का मंडप बनवाया और महाराजा नेपाल ने वहां विशाल नंदी प्रतिमा स्थापित करवाई। सन् 1809 में काशी के हिन्दुओं ने जबरन बनाई गई मस्जिद पर कब्जा कर लिया था, क्योंकि यह संपूर्ण क्षेत्र ज्ञानवापी मं‍डप का क्षेत्र है जिसे आजकल ज्ञानवापी मस्जिद कहा जाता है। 30 दिसंबर 1810 को बनारस के तत्कालीन जिला दंडाधिकारी मि. वाटसन ने 'वाइस प्रेसीडेंट इन काउंसिल' को एक पत्र लिखकर ज्ञानवापी परिसर हिन्दुओं को हमेशा के लिए सौंपने को कहा था, लेकिन यह कभी संभव नहीं हो पाया।
अगर आप कबी वहा जाये तो देखेंगे की
इसके पीछे का हिस्सा अभी भी मंदिर ही है .

Monday, 14 December 2015

ईसाइयों के धर्मप्रमुख पोप का आदेश : ज्यू को छोड कर अन्य धर्मियों को ईसाई बनाएं 

हिन्दुओ, पोप द्वारा धर्मपरिवर्तन के खुले आवाहन के विषय में संसार भर के सहिष्णुवादी, ढोंगी धर्मनिरपेक्षतावादी क्या कहते हैं यह देखना होगा । जो स्वयं आतंकवाद से भयभीत हो रहे हैं, वे अन्य लोगों को क्या सांत्वना देंगे, यह सोचनेवाली बात है । – सम्पादक, हिन्दूजागृति
पोप ने सभी कैथलिक मिशनरियों को आदेश देते हुए कहा कि ज्यू धर्मियों को छोड कर अन्य धर्मियों को ईसाई बनाएं । पोप ने आगे कहा कि कैथोलिक चर्च, ज्यू लोगों के प्रति कोई द्वेष की भावना नहीं रखता । हम ज्यू धर्म को एक अलग धर्म मानते हैं । वे हमारे बडे भाई के समान हैं । दर्शकों को बता दें कि एक कथा के अनुसार ज्यू लोगों ने ईसामसीह को सूली (सूली पर अर्थात ‘क्रास’ पर) पर चढाया था इसी कारण ईसाई और ज्यू में सैकडों वर्षों से शत्रुता है  ।
इस समाचार के विषय में हिंदुत्ववादी संगठन हिंदवा केरलम के धर्माभिमानी श्री. जी.एस.के. मेनन ने प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि इस वक्तव्य से पोप ने यह मान्य किया है कि चर्च, अन्य धर्मियों का सर्वाधिक धर्मपरिवर्तन करता है । इस प्रकार के वक्तव्य से उन्होंने ज्यू धर्म को छोड अन्य धर्मियों के प्रति ‘असहिष्णुता’ दिखाई है । मेनन ने यह भी शंका व्यक्त की, कि पोप को इसका भान है कि इस्लामिक आतंक से लडने के लिए ईसाई सक्षम नहीं हैं । आतंकवादियों से मात्र ज्यू धर्मीय ही लड सकते हैं यह इस्राईल के उदाहरण से सिद्ध हुआ है । इसलिए पोप इस्लाम के विरुद्ध ज्यू धर्मियों का उपयोग कर स्वयं को बचाने का प्रयास कर रहे हैं ।

Tuesday, 8 December 2015


  1.         
  2. मरते वक्त मुंह में तुलसी, गंगाजल 

  3.            रखते हैं क्यो?



मरते वक्त मुंह में तुलसी, गंगाजल रखते हैं क्यो?


कहते हैं क‌ि ज‌िस द‌िन जीव का जन्म होता है यमराज उसी द‌िन से उसके पीछे लगे रहते हैं और जैसे ही मौत का समय आता है उसे अपने साथ लेकर इस द‌ुन‌िया से चले जाते हैं। इसल‌िए ज‌िसका जन्म हुआ है उसकी मृत्यु न‌िश्च‌ित है। लेक‌िन मृत्यु के बाद का सफर कैसा होगा इस बात को लेकर दुन‌िया भर में कई मान्यताएं हैं।

इन्हीं मान्यताओं में मृत्यु के समय होने वाली कुछ क्र‌ियाएं भी शाम‌िल हैं। उदाहरण के तौर पर ह‌िन्दूओं में मृत्यु के समय मरने वाले व्यक्त‌ि के मुंह में तुलसी और गंगाजल डाला जाता है।

कुछ स्‍थानों पर मुंह में सोना भी रखते हैं। आइये जानें क‌ि इसके पीछे क्या कारण है।


गंगाजल
ह‌िन्दू धर्म में जल को शुद्ध‌ि करने वाला माना गया है। इसल‌िए पूजा-पाठ हो या कोई भी अनुष्ठान सबसे पहले जल से पूजन सामग्री और पूजा करने वाले को शुद्ध क‌िया जाता है। स्नान भी इसी का ह‌िस्सा है। लेक‌िन जल में गंगा नदी के जल को सबसे पव‌ित्र माना जाता है। कारण यह है क‌ि गंगा को स्वर्ग की नदी कहा गया है।


गंगा नदी के व‌िषय में पुराणों में बताया गया है क‌ि यह भगवान व‌िष्‍णु के चरण से न‌िकली है और श‌िव की जट में इनका वास है। इसल‌िए मृत्यु के समय मुंह में गंगा जल रखने से शरीर से आत्मा न‌िकलते समय अध‌िक कष्ट नहीं होता है। यह भी मान्यता है क‌ि मुंह में गंगा जल होने से यमदूत नहीं सताते हैं और जीव के आगे का सफर असान हो जाता है।


व्यवहार‌िक तौर पर देखा जाए तो मृत्यु के समय मुंह में जल डालने का उद्देश्‍य यह भी है क‌ि शरीर छोड़कर जा रहा व्यक्त‌ि प्यासा नही जाए। इसकी एक झलक आप आम ज‌िंदगी में देख सकते हैं क‌ि जब कोई व्यक्त‌ि लंबी यात्रा पर जा रहा होता है तो बड़े बुजुर्ग उन्हें पानी जरूर प‌िलाते हैं। ससुराल से कन्या की व‌िदाई के समय भी उन्हें पानी प‌िलाया जाता है। यानी मरने वाले को जल प‌िलाने का धार्म‌िक ही नहीं व्यवहार‌िक कारण भी है।

तुलसी पत्ता
मृत्यु के समय गंगा जल के साथ एक और चीज मुह में रखी जाती है वह है तुलसी पत्ता। धार्म‌िक दृष्ट‌ि से तुलसी का बड़ा ही महत्व है। कहते हैं तुलसी हमेशा श्री व‌िष्‍णु के स‌िर पर सजती है। तुलसी धारण करने वाले को यमराज कष्ट‌ नहीं देते। मृत्यु के बाद परलोक में व्यक्त‌ि को यमदंड का सामना नहीं करना पड़े इसल‌िए मरते समय मुंह में तुलसी का पत्ता रखा जाता है। धार्म‌िक दृष्ट‌ि के अलावा इसका वैज्ञान‌िक और व्यवहार‌िक कारण भी है।


दरअसल तुलसी एक औषध‌ि है जो कई रोगों में कारगर होता है। मृत्यु के समय तुलसी पत्ता मुंह में होने से प्राण त्यागने के समय होने वाले कष्ट से राहत म‌िलती है क्योंक‌ि यह सात्व‌िक भाव जगाता है। व्यवहार‌िक दृष्ट‌ि से बात करें तो तुलसी मुंह में रखने का उद्देश्य यह हो सकता है क‌ि जाने वाला कुछ खाकर गया है। लोक मान्यता के अनुसार घर से कभी भी ब‌िना खाए हुए यात्रा नहीं करनी चाह‌िए।
मरते वक्त मुंह में तुलसी, गंगाजल रखते हैं क्यो? कहते हैं क‌ि ज‌िस द‌िन जीव का जन्म होता है यमराज उसी द‌िन से उसके पीछे लगे रहते हैं और जैसे ही मौत का समय आता है उसे अपने साथ लेकर इस द‌ुन‌िया से चले जाते हैं। इसल‌िए ज‌िसका जन्म हुआ है उसकी मृत्यु न‌िश्च‌ित है। लेक‌िन मृत्यु के बाद का सफर कैसा होगा इस बात को लेकर दुन‌िया भर में कई मान्यताएं हैं। इन्हीं मान्यताओं में मृत्यु के समय होने वाली कुछ क्र‌ियाएं भी शाम‌िल हैं। उदाहरण के तौर पर ह‌िन्दूओं में मृत्यु के समय मरने वाले व्यक्त‌ि के मुंह में तुलसी और गंगाजल डाला जाता है। कुछ स्‍थानों पर मुंह में सोना भी रखते हैं। आइये जानें क‌ि इसके पीछे क्या कारण है। गंगाजल ह‌िन्दू धर्म में जल को शुद्ध‌ि करने वाला माना गया है। इसल‌िए पूजा-पाठ हो या कोई भी अनुष्ठान सबसे पहले जल से पूजन सामग्री और पूजा करने वाले को शुद्ध क‌िया जाता है। स्नान भी इसी का ह‌िस्सा है। लेक‌िन जल में गंगा नदी के जल को सबसे पव‌ित्र माना जाता है। कारण यह है क‌ि गंगा को स्वर्ग की नदी कहा गया है। गंगा नदी के व‌िषय में पुराणों में बताया गया है क‌ि यह भगवान व‌िष्‍णु के चरण से न‌िकली है और श‌िव की जट में इनका वास है। इसल‌िए मृत्यु के समय मुंह में गंगा जल रखने से शरीर से आत्मा न‌िकलते समय अध‌िक कष्ट नहीं होता है। यह भी मान्यता है क‌ि मुंह में गंगा जल होने से यमदूत नहीं सताते हैं और जीव के आगे का सफर असान हो जाता है। व्यवहार‌िक तौर पर देखा जाए तो मृत्यु के समय मुंह में जल डालने का उद्देश्‍य यह भी है क‌ि शरीर छोड़कर जा रहा व्यक्त‌ि प्यासा नही जाए। इसकी एक झलक आप आम ज‌िंदगी में देख सकते हैं क‌ि जब कोई व्यक्त‌ि लंबी यात्रा पर जा रहा होता है तो बड़े बुजुर्ग उन्हें पानी जरूर प‌िलाते हैं। ससुराल से कन्या की व‌िदाई के समय भी उन्हें पानी प‌िलाया जाता है। यानी मरने वाले को जल प‌िलाने का धार्म‌िक ही नहीं व्यवहार‌िक कारण भी है। तुलसी पत्ता मृत्यु के समय गंगा जल के साथ एक और चीज मुह में रखी जाती है वह है तुलसी पत्ता। धार्म‌िक दृष्ट‌ि से तुलसी का बड़ा ही महत्व है। कहते हैं तुलसी हमेशा श्री व‌िष्‍णु के स‌िर पर सजती है। तुलसी धारण करने वाले को यमराज कष्ट‌ नहीं देते। मृत्यु के बाद परलोक में व्यक्त‌ि को यमदंड का सामना नहीं करना पड़े इसल‌िए मरते समय मुंह में तुलसी का पत्ता रखा जाता है। धार्म‌िक दृष्ट‌ि के अलावा इसका वैज्ञान‌िक और व्यवहार‌िक कारण भी है। दरअसल तुलसी एक औषध‌ि है जो कई रोगों में कारगर होता है। मृत्यु के समय तुलसी पत्ता मुंह में होने से प्राण त्यागने के समय होने वाले कष्ट से राहत म‌िलती है क्योंक‌ि यह सात्व‌िक भाव जगाता है। व्यवहार‌िक दृष्ट‌ि से बात करें तो तुलसी मुंह में रखने का उद्देश्य यह हो सकता है क‌ि जाने वाला कुछ खाकर गया है। लोक मान्यता के अनुसार घर से कभी भी ब‌िना खाए हुए यात्रा नहीं करनी चाह‌िए।

अयोध्या में मोहम्मद पैगम्बर ने नहीं श्रीराम ने लिया था जन्म : योगगुरु बाबा रामदेव

सूरत – राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवतद्वारा अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि पर मंदिर बनाने की बात कहे जाने के बाद योगगुरु बाबा रामदेवजी से जब अयोध्या में मंदिर बनाने को लेकर प्रश्न पूछा गया तो उन्होंने साफ कहा कि, अयोध्या में मोहम्मद पैगम्बर ने नहीं अपितु भगवान श्रीराम ने जन्म लिया था तो मुस्लिमो को भी उनका सम्मान कर मंदिर बनाने में मदद करनी चाहिए !
सूरत की मशहूर हीरा कारोबारी कंपनी हरे कृष्ण द्वारा रविवार को आयोजित पारिवारिक विवाह समारोह में योगगुरु बाबा रामदेव अतिथि विशेष के रूप में उपस्थित रहे थे । इस दौरान यहां उपस्थित मीडियाकर्मियों ने जब बाबा रामदेवजी से प्रश्न पूछा गया कि, लखनऊ में मुस्लिम संगठन के लोग अयोध्या में बाबरी मस्जिद बनाने को लेकर एक जुट हो रहे है तो आप क्या मानते हो ?
इस प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा कि, हिन्दुओ और मुसलमानों को मंदिर-मस्जिद के नाम पर नहीं लडना चाहिए । प्रत्येक को देश में प्रेम और भाईचारे से रहना चाहिए । अयोध्या में मोहम्मद पैगम्बर साहब ने जन्म नहीं लिया था, अयोध्या में श्रीराम ने जन्म लिया था इसलिए जिस प्रकार से हिन्दू भगवान श्रीराम का सम्मान करते है वैसे ही मुस्लिमो को भी भगवान श्रीराम का सम्मान करना चाहिए ।

Sunday, 6 December 2015

महबूबा मुफ्ती का बडा बयान, आइएस जैसा है हिंदुत्व कट्टरवाद

पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की अध्यक्ष व सांसद महबूबा मुफ्ती ने शनिवार को हिंदुत्व के नाम पर सक्रिय कट्टरपंथी तत्वों पर अंकुश लगाने पर जोर देते हुए उनकी तुलना इस्लाम का दुरुपयोग करने वाले आतंकी संगठन आइएस से की।
नई दिल्ली में एक मीडिया हाउस के कार्यक्रम में महबूबा मुफ्ती ने कहा कि हमारा देश एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है, यहां सांप्रदायिक सौहार्द की परंपरा है। सहिष्णुता हमारे मुल्क की ताकत है और यदि हमने तथाकथित अतिवादी तत्वों को नहीं रोका तो सभी जानते हैं कि सीरिया, अफगानिस्तान व इराक में क्या हो रहा है.क्योंकि वे भी अतिवादी तत्व हैं जो इस्लाम के नाम का दुरुपयोग कर रहे हैं। पीडीपी अध्यक्ष ने कहा कि हमारे देश में कई अतिवादी तत्व हिंदुत्व का दुरुपयोग करते हुए इसकी तुलना राष्ट्रवाद से कर रहे हैं, जो बहुत घातक है।
बिहार चुनाव में अच्छा सबक मिला
महबूबा ने जम्मू-कश्मीर में अपनी सहयोगी भाजपा पर परोक्ष रूप से निशाना साधते हुए कहा कि हिंदुत्व के नाम का दुरुपयोग कर उसकी तुलना राष्ट्रवाद से करने वाले तत्वों को बिहार चुनाव में अच्छा सबक मिला है।
महबूबा से सवाल किया गया कि उनकी पार्टी कैसे उचित ठहराती है जब ‘पाकिस्तान जाने की’ आवाज उठती है और इन आवाजों में कुछ केंद्रीय मंत्री भी शामिल होते हैं। महबूबा ने कहा कि ‘मानसिकता वही है.वह सोचने की प्रक्रिया है जो मायने रखती है। उन्होंने पाकिस्तान के दिवंगत प्रधानमंत्री जेड ए भुट्टो को उद्धृत किया, जिन्होंने कहा था कि भारत लोकतंत्र के उथल पुथल और हंगामे से परिपूर्ण है। महबूबा ने कहा कि जब लोग बढ़ती महंगाई से संघर्ष करने का प्रयास कर रहे हों, उन्हें प्याज नहीं मिलता हो और अचानक कुछ लोग यह कहना शुरू कर दें कि एक व्यक्ति को कौन सा मांस खाना चाहिए। यह नहीं होना चाहिए। यह स्वीकार्य नहीं।
ऊधमपुर हमलावरों पर की जा रही कार्रवाई
पिछले दिनों ऊधमपुर में एक कश्मीर ट्रक चालक पर तेजाब हमले और उसमें उसकी मौत से भाजपा-पीडीपी गठबंधन सरकार पर किसी तरह के प्रभाव संबंधी सवाल पर महबूबा ने कहा कि हत्यारों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है, कार्रवाई की जा रही है।
कश्मीरी किसी का फरमान नहीं सुनते
कश्मीरी युवाओं के कट्टरपंथ और इस्लाम की अतिवादी धारा से प्रभावित होने के खतरे पर महबूबा ने कहा कि कश्मीरियत, कश्मीर की सूफीवादी संस्कृति सभी का जवाब है। कश्मीरी किसी का फरमान नहीं सुनते।
कश्मीरी आइएस कभी समर्थन नहीं करेंगे
महबूबा ने कहा कि जहां तक आइएस एवं अन्य चीजों का सवाल है, यह बहुत ही हास्यास्पद लगता है। कुछ लोगों जिन्होंने आइएस के झंडे लहराए उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। महबूबा ने कहा, ‘इसलिए मेरा मानना है कि सूफीवाद और कश्मीरियत जो हमारे पास है, रहेगा। आइएस इस्लाम मूल के खिलाफ है। वे उन सभी चीजों को नष्ट कर रहे हैं जो इस्लाम को प्रिय हैं। इसलिए मैं नहीं मानती कि कश्मीरी कभी भी उसका पालन करेंगे, जिसका आइएस समर्थन करता है। (अगर एैसा तो महबूबा जी क्या बता सकती है की आखिर क्यों हर शुक्रवार नमाज के बाद कश्मीर में आइएस का समर्थन करनेवाले लोग आइएस के झंडे फहराते है ?

Tuesday, 1 December 2015

बिना वीजा के इन 59 देशों में घूम सकते हैं भारतीय 





नई दिल्‍ली: अगर आपको विदेश घूमने जाना है और वीजा नहीं मिल रहा तो शायद यह खबर आपके लिए बहुत ही फायदेमंद साबित होगी, क्‍योंकि भारतीय नागरिक बिना किसी वीजा के भी इन 59 देशों की यात्रा कर सकते हैं।
ग्लोबल फाइनेंस एडवाइजरी फर्म अर्टन कैप्टिल ने हाल ही में एक रिपोर्ट जारी कर उन देशों की लिस्ट जारी की है, जिनके पासपोर्ट सबसे पावरफुल हैं। ऐसे देश दूसरे देशों में बिना वीजा के अपने नागरिकों को घूमने की इजाजत देते हैं।
इनमें सबसे पावरफुल पासपोर्ट स्वीडन का है, जो अपने नागरिकों को 174 देशों में बिना वीजा के ट्रैवल करने की इजाजत देता है। दुनिया के सिर्फ 59 देश ऐसे हैं, जहां इंडियन पासपोर्ट होल्डर बिना वीजा के ट्रैवल कर सकते हैं। इनमें से कुछ देशों में आपको वीजा ऑन अराइवल की सुविधा भी है।
यह हैं वह देश:
1. बहरीन - ईवीजा
2. भूटान - बिना वीजा
3. बोलीविया - आगमन पर वीजा
4. कंबोडिया - आगमन पर वीजा
5. केप वर्डे - आगमन पर वीजा
6. कोमोरोस -आगमन पर वीजा
5. कोटे डी आइवर - ईवीजा
6. जिबूती - आगमन पर वीजा
7. डोमिनिका - बिना वीजा
8. इकाडोर - बिना वीजा
9. अल सल्वाडोर - बिना वीजा
10 इथियोपिया - आगमन पर वीजा
11. फिजी - बिना वीजा
12. गैबॉन - ईवीजा
13. जॉर्जिया - ईवीजा
14. ग्रेनाडा - बिना वीजा
15. गिनी-बिसाऊ - आगमन पर वीजा
16. गुयाना - आगमन पर वीजा
17. हैती - बिना वीजा
18. इंडोनेशिया - आगमन पर वीजा
19. जमैका - बिना वीजा
20. जॉर्डन - आगमन पर वीजा
21. केन्या - ईवीजा
22. लाओस - आगमन पर वीजा
23. मेडागास्कर - आगमन पर वीजा
24. मालदीव - आगमन पर वीजा
25 मॉरिटानिया - आगमन पर वीजा
26. मॉरीशस - बिना वीजा
27. माइक्रोनेशिया - बिना वीजा
28. माल्डोवा - ईवीजा
29. म्यांमार - ईवाजी
30. नेपाल - बिना वीजा
31. पलाऊ - आगमन पर वीजा
32. रवांडा - ईवीजा
33. सेंट किट्स और नेविस - बिना वीजा
34. सेंट लूसिया - आगमन पर वीजा
35. सेंट विंसेंट और ग्रेनेडाइंस - कोई वीजा
36. समोआ - आगमन पर परमिट
37. साओ टोम और प्रिंसिपे - ईवीजा
38. सेनेगल - आगमन पर वीजा
39. सेशेल्स - आगमन पर वीजा
40. सोमालिया - आगमन पर वीजा
41. श्रीलंका - बिना वीजा लेकिन विशेष अनुमति की आवश्यकता
42. तंजानिया - आगमन पर वीजा
43. थाईलैंड - आगमन पर वीजा
44. टोगो - आगमन पर वीजा
45. तिमोर-लेस्ते - आगमन पर वीजा
46. ​​त्रिनिदाद और टोबैगो - बिना वीजा
47. तुवालु - आगमन पर वीजा
48. युगांडा - आगमन पर वीजा
49. वानुअतु - बिना वीजा
50. जाम्बिया - ईवीजा
51. जिम्बाब्वे - ईवीजा
52. भूटान - बिना वीजा
53. हांगकांग - बिना वीजा
54. अंटार्टिका -आगमन पर वीजा
55. दक्षिण कोरिया - बिना वीजा
56. एवाईआरओ मैसेडोनिया - बिना वीजा
57. स्वालबार्ड - बिना वीजा
58. मोंटसेराट - बिना वीजा
59. तुर्क और कैकोस द्वीप समूह - बिना वीजा

Sunday, 29 November 2015

तीर्थ यात्रा में ना करें यह 32 अपराध... जरूर पढ़ें


हमारे जीवन में यात्रा का विशेष महत्व है। सभी लोग दूर-दूर की तीर्थ यात्रा पर जाते हैं। तीर्थयात्रा का धार्मिक महत्व अनेक वेद और पुराणों में वर्णित हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं  कि किसी भी धार्मिक यात्रा पर जाते समय किन-किन बातों का ध्यान रखना आवश्यक होता है। आइए जानते हैं.... 
Temple

 

1. सवारी पर चढ़कर अथवा पैरों में खड़ाऊ पहनकर श्री भगवान के मंदिर में जाना।
2. रथयात्रा, जन्माष्टमी आदि उत्सवों का न करना या उनके दर्शन न करना।
3. श्रीमूर्ति के दर्शन करके प्रणाम न करना।
4. अशौच-अवस्‍था में दर्शन करना।
5. एक हाथ से प्रणाम करना।
66. परिक्रमा करते समय भगवान के सामने आकर कुछ देर न रुककर फिर परिक्रमा करना अथवा केवल सामने ही परिक्रमा करते रहना।
7. श्री भगवान के श्रीविग्रह के सामने पैर पसारकर बैठना।
8. दोनों घुटनों को ऊंचा करके उनको हाथों से लपेटकर बैठ जाना।
9. मूर्ति के समक्ष सो जाना।
10. भोजन करना।
11. झूठ बोलना
12. श्री भगवान के श्रीविग्रह के सामने जोर से बोलना।

13. आपस में बातचीत करना।
14. मूर्ति के सामने चिल्लाना।
15. कलह करना
16. पीड़ा देना।
20. दूसरों की निंदा करना।
21. दूसरों की स्तुत‍ि करना।
22. अश्लील शब्द बोलना।
23. अधोवायु का त्याग करना।
24. शक्ति रहते हुए भी गौण अर्थात सामान्य उपचारों से भगवान की सेवा-पूजा करना।
25. श्री भगवान को निवेदित किए बिना किसी भी वस्तु का खाना-पीना। 
26. ऋतु फल खाने से पहले श्री भगवान को न चढ़ाना।
27. किसी शाक या फलादि के अगले भाग को तोड़कर भगवान के व्यंजनादि के लिए देना।
28. श्री भगवान के श्रीविग्रह को पीठ देकर बैठना। 
29. श्री भगवान के श्रीविग्रह के सामने दूसरे किसी को भी प्रणाम करना।
30. गुरुदेव की अभ्यर्थना, कुशल-प्रश्न और उनका स्तवन न करना।
31. अपने मुख से अपनी प्रशंसा करना।
32. किसी भी देवता की निंदा करना

जानिए हिन्दू धर्म को


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ऋग्वेद को संसार की सबसे प्राचीन और प्रथम पुस्तक माना है। इसी पुस्तक पर आधारित है हिंदू धर्म। इस पुस्तक में उल्लेखित 'दर्शन' संसार की प्रत्येक पुस्तक में मिल जाएगा। माना जाता है कि इसी पुस्तक को आधार बनाकर बाद में यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद की रचना हुई। दरअसल यह ऋग्वेद के भिन्न-भिन्न विषयों का विभाजन और विस्तार था।

विश्व की प्रथम पुस्तक : वेद मानव सभ्यता के सबसे पुराने लिखित दस्तावेज हैं। वेदों की 28 हजार पांडुलिपियाँ भारत में पुणे के 'भंडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट' में रखी हुई हैं। इनमें से ऋग्वेद की 30 पांडुलिपियाँ बहुत ही महत्वपूर्ण हैं जिन्हें यूनेस्को ने विरासत सूची में शामिल किया है। यूनेस्को ने ऋग्वेद की 1800 से 1500 ई.पू. की 30 पांडुलिपियों को सांस्कृतिक धरोहरों की सूची में शामिल किया है।

हिन्दू शब्द की उत्पत्ति : को सनातन, वैदिक या धर्म भी कहते हैं। हिन्दू एक अप्रभंश शब्द है। हिंदुत्व या हिंदू धर्म को प्राचीनकाल में सनातन धर्म कहा जाता था। एक हजार वर्ष पूर्व हिंदू शब्द का प्रचलन नहीं था। ऋग्वेद में कई बार सप्त सिंधु का उल्लेख मिलता है। सिंधु शब्द का अर्थ नदी या जलराशि होता है इसी आधार पर एक नदी का नाम सिंधु नदी रखा गया, जो लद्दाख और पाक से बहती है।

भाषाविदों का मानना है कि हिंद-आर्य भाषाओं की 'स' ध्वनि ईरानी भाषाओं की 'ह' ध्वनि में बदल जाती है। आज भी भारत के कई इलाकों में 'स' को 'ह' उच्चारित किया जाता है। इसलिए सप्त सिंधु अवेस्तन भाषा (पारसियों की भाषा) में जाकर हप्त हिंदू में परिवर्तित हो गया। इसी कारण ईरानियों ने सिंधु नदी के पूर्व में रहने वालों को हिंदू नाम दिया। किंतु पाकिस्तान के सिंध प्रांत के लोगों को आज भी सिंधू या सिंधी कहा जाता है।

ईरानी अर्थात पारस्य देश के पारसियों की धर्म पुस्तक 'अवेस्ता' में 'हिन्दू' और 'आर्य' शब्द का उल्लेख मिलता है। दूसरी ओर अन्य इतिहासकारों का मानना है कि चीनी यात्री हुएनसांग के समय में हिंदू शब्द की उत्पत्ति ‍इंदु से हुई थी। इंदु शब्द चंद्रमा का पर्यायवाची है। भारतीय ज्योतिषीय गणना का आधार चंद्रमास ही है। अत: चीन के लोग भारतीयों को 'इन्तु' या 'हिंदू' कहने लगे।

आर्य शब्द का अर्थ : आर्य समाज के लोग इसे आर्य धर्म कहते हैं, जबकि आर्य किसी जाति या धर्म का नाम न होकर इसका अर्थ सिर्फ श्रेष्ठ ही माना जाता है। अर्थात जो मन, वचन और कर्म से श्रेष्ठ है वही आर्य है। इस प्रकार आर्य धर्म का अर्थ श्रेष्ठ समाज का धर्म ही होता है। प्राचीन भारत को आर्यावर्त भी कहा जाता था जिसका तात्पर्य श्रेष्ठ जनों के निवास की भूमि था।

हिन्दू इतिहास की भूमिका : जब हम इतिहास की बात करते हैं तो वेदों की रचना किसी एक काल में नहीं हुई। विद्वानों ने वेदों के रचनाकाल की शुरुआत 4500 ई.पू. से मानी है। अर्थात यह धीरे-धीरे रचे गए और अंतत: कृष्ण के समय में वेद व्यास द्वारा पूरी तरह से वेद को चार भाग में विभाजित कर दिया। इस मान से लिखित रूप में आज से 6508 वर्ष पूर्व पुराने हैं वेद। यह भी तथ्‍य नहीं नकारा जा सकता कि कृष्ण के आज से 5500 वर्ष पूर्व होने के तथ्‍य ढूँढ लिए गए।

हिंदू और जैन धर्म की उत्पत्ति पूर्व आर्यों की अवधारणा में है जो 4500 ई.पू. (आज से 6500 वर्ष पूर्व) मध्य एशिया से हिमालय तक फैले थे। कहते हैं कि आर्यों की ही एक शाखा ने पारसी धर्म की स्थापना भी की। इसके बाद क्रमश: यहूदी धर्म 2 हजार ई.पू.। बौद्ध धर्म 500 ई.पू.। ईसाई धर्म सिर्फ 2000 वर्ष पूर्व। इस्लाम धर्म 14 सौ साल पहले हुए।

लेकिन धार्मिक साहित्य अनुसार हिंदू धर्म की कुछ और धारणाएँ भी हैं। मान्यता यह भी है कि 90 हजार वर्ष पूर्व इसकी शुरुआत हुई थी। दरअसल हिंदुओं ने अपने इतिहास को गाकर, रटकर और सूत्रों के आधार पर मुखाग्र जिंदा बनाए रखा। यही कारण रहा कि वह इतिहास धीरे-धीरे काव्यमय और श्रंगारिक होता गया। वह दौर ऐसा था जबकि कागज और कलम नहीं होते थे। इतिहास लिखा जाता था शिलाओं पर, पत्थरों पर और मन पर।

जब हम हिंदू धर्म के इतिहास ग्रंथ पढ़ते हैं तो ऋषि-मुनियों की परम्परा के पूर्व मनुओं की परम्परा का उल्लेख मिलता है जिन्हें जैन धर्म में कुलकर कहा गया है। ऐसे क्रमश: 14 मनु माने गए हैं जिन्होंने समाज को सभ्य और तकनीकी सम्पन्न बनाने के लिए अथक प्रयास किए। धरती के प्रथम मानव का नाम स्वायंभव मनु था और प्रथम ‍स्त्री थी शतरूपा।

पुराणों में हिंदू इतिहास की शुरुआत सृष्टि उत्पत्ति से ही मानी जाती है, ऐसा कहना की यहाँ से शुरुआत हुई यह ‍शायद उचित न होगा फिर भी वेद-पुराणों में मनु (प्रथम मानव) से और भगवान कृष्ण की पीढ़ी तक का इसमें उल्लेख मिलता है।-

Saturday, 28 November 2015

गायत्री महामंत्र की स्तुति, ध्यान तथा वंदना

ओम् भूर्भुव: स्वः तत्स वितुर्वरेर्ण्यं !
भर्गो देवस्य धीमहि धियो: योनः प्रचोदयात !!

हमारे वेदों, पुराणों और शास्त्रों में कई तरह के मन्त्र होते है,  और देवताओं की स्तुति के लिए अलग मंत्र होते है तथा ध्यान के लिए अलग तथा वंदना के अलग स्त्रोत्र होते है |

परन्तु जप करने लायक इस गायत्री मन्त्र  के लिए ऐसा विधान नहीं है, गायत्री मंत्र में जप, ध्यान, स्तुति और वंदना करने के लिए एक ही मंत्र का प्रयोग किया जाता है अर्थात गायत्री मन्त्र अपने आप में ही पूर्ण महामंत्र है और इस महामंत्र कि स्तुति, ध्यान और वंदना इस प्रकार है:-

स्तुति:-  "ओम् भूर्भुव: स्वः"

इस मंत्र छंद से उस परमात्मा कि स्तुति की जाती है जो तीनो लोकों में व्याप्त है अर्थात जो अपने प्रकाशमान रूप से इस चराचर जगत में स्थित है और अपने तेज से इन तीनो लोकों को प्रकाशित करते है |

ध्यान:-  "तत्स वितुर्वरेर्ण्यं भर्गो देवस्य धीमहि"

इस छंद में पाप का विनाश करने वाली माँ भगवती का शांत मन से चिंतन एवं ध्यान का वर्णन किया गया है |

प्रार्थना:- "धियो: योनः प्रचोदयात"

इस छंद से मंत्र कि शक्ति के द्वारा बुद्धि एवं विवेक को सही दिशा में ले जाने और मोक्ष प्राप्ति की कामना कि गयी है | इस प्रकार से मानव जीवन को सार्थक एवं सफल बनाने के लिए यह महामंत्र है और इस सिद्ध मंत्र का जाप निश्चित रूप से फलदायी होता है ऐसा मेरा मत है |

(श्री गायत्री नमः)
श्री गायत्री यन्त्र

श्री गायत्री माँ को भगवती गायत्री भी कहा जाता है और उनके पूजन यन्त्र को गायत्री यन्त्र कहा जाता है |

ओ३म् (ॐ) या ओंकार का अभिप्राय और महत्ता


ओंकार - परमाक्षर
ओ३म् (ॐ) क्या है:- ओ३म् (ॐ) का शाब्दिक और सरल अर्थ प्रणव अर्थात परमेश्वर से है, ओ३म् वास्तविकता में सम्पूर्ण सृष्टि कि उद्भावता कि ओर संकेत करता है, कहने का तात्पर्य यह है कि ओ३म् से ही यह चराचर जगत चलायमान है और इस संसार के कण कण में ओ३म् रमा हुआ है |

ओ३म् किसी भी एक देव का नाम या संकेत नहीं है, अपितु हर धर्म को मानने वालों ने इसे अपने तरीके से प्रचलित किया है | जैसे ब्रह्मा-वाद में विश्वास रखने वाले इसे ब्रह्मा, विष्णु के सम्प्रदाय वाले वैष्णवजन इसे विष्णु तथा शैव या रुद्रानुगामी इसे शिव का प्रतिक मानते है और इसी तरीके से इसको प्रचलित करते है | परन्तु वास्तव में ओ३म् तीनों देवो का मिश्रित तत्त्व है जो कि इस प्रकार है:-

#NoCricketWithPakistan Effect?  ​​Indo-Pak Series not decided yet!


Delhi:  India and Pakistan on the series is still intact suspense. The series between the two countries, the Indian government has not yet cleared. Said Foreign Ministry spokesman tweeted growth pattern so far taken any decision on the series between India and Pakistan have not been.
The series in Sri Lanka between the BCCI and the PCB to which the agreement was Security was intensified after protests in India. It is believed that this was due to opposition from the government, tweeted that has not yet taken any decision on this series. The Pakistani newspaper said Pakistan Prime Minister Nawaz Sharif has approved the PCB. Although the country still continues the series about the support and resistance. India and Pakistan conducted a series of initiatives, India has not gone to many people.
With approval from the Pakistani people in India #NoCricketWithPakistan started with the tweet. #NoCricketWithPakistan On social networking site Twitter are consistent with the trend of people are opposed to the India-Pakistan series. Adding that India and Pakistan should stop with politics biryani. People are tweeted on Twitter that the series with Pakistan are playing a good day, we must better days.

फारूख अब्दुल्ला के विवादित बोल, भारत की सारी फौज भी आ जाए तो आतंकियों से नहीं बचा सकती


Farooq Abdullah
जम्मू/नई दिल्ली : जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम फारूख अब्दुल्ला ने 24 घंटे के अंदर दूसरी बार विवादास्पद बयान दिया है। फारूक अब्दुल्ला ने कहा कि अगर भारत की सारी फौज भी आ जाए तो आतंकवादियों का मुकाबला नहीं कर सकती। उन्होंने कहा कि बातचीत ही जम्मू-कश्मीर की समस्या को सुलझाने का एकमात्र तरीका है। यही एक रास्ता है। लेकिन ये होगा कभी नहीं।
फारूक ने कहा कि जब तक पाकिस्तान के साथ बातचीत नहीं होगी, तब तक राज्य में हालात ठीक नहीं होंगे। उन्होंने कहा, ‘आज मैं आपके सामने बोल रहा हूं। कल मुझे आतंकवादी मार सकते हैं, मगर मैं जो बोलूंगा, सच बोलूंगा।
अब्दुल्ला ने कहा कि भारत -पाकिस्तान को मिलकर ही हल ढूंढना होगा । अमेरिका किसी का दोस्त नहीं है। उसे सिर्फ अपना हथियार बेचना है। उन्होने कहा कि नवाज शरीफ पाकिस्तान के प्रधानमंत्री जरूर हैं लेकिन ताकत सेना के पास हैं।
अब्दुल्ला ने शुक्रवार को कहा था कि पीओके पाकिस्तान का हिस्सा है और भविष्य में भी रहेगा। जबकि जम्मू-कश्मीर हमारा हिस्सा है और रहेगा। फारुक अब्दुल्ला ने शनिवार को फिर अपने को बयान दोहराया।

Tuesday, 24 November 2015


असहिष्णुता का ढिंढोरा पिटनेवाले आमिर खान ने कहा, ‘पत्नी किरण राव ने दिया था भारत छोडने का सुझाव’






बॉलीवुड अभिनेता आमिर खान भी बढती कथित असहिष्णुता के विरूद्ध आवाज उठाने वाले प्रबुद्ध वर्ग में आज शामिल हो गए और कहा कि कई घटनाओं ने उन्हें ‘‘चिंतित’’ किया है और उनकी पत्नी किरण राव ने यहां तक सुझाव दे दिया कि उन्हें संभवत: देश छोड देना चाहिए।
खान ने वस्तुत: उन लोगों का समर्थन किया जो अपने पुरस्कार लौटा रहे हैं और कहा कि रचनात्मक लोगों के लिए उनका पुरस्कार लौटाना अपना असंतोष या निराशा व्यक्त करने के तरीकों में से एक है।
उन्होंने यहां पत्रकारिता के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य के लिए रामनाथ गोयनका पुरस्कार वितरण कार्यक्रम में कहा, ‘‘एक व्यक्ति के तौर पर, एक नागरिक के रूप में इस देश के हिस्से के तौर पर हम समाचार पत्रों में पढते हैं कि क्या हो रहा है, हम इसे समाचारों में देखते हैं और निश्चित तौर पर मैं चिंतित हुआ हूं। मैं इससे इनकार नहीं कर सकता। मैं कई घटनाओं से चिंतित हुआ हूं।’’ (कश्मीर में लाखों हिन्दू जब विस्थापित हुए, तब आमित खान चुप क्यों थे ? तब उनकी असहिष्णुता कहां गर्इ थी ? https://www.google.co.in/url?sa=t&rct=j&q=&esrc=s&source=web&cd=1&cad=rja&uact=8&ved=0ahUKEwjRgf6S0KjJAhWWj44KHdgRBMQQFggdMAA&url=http%3A%2F%2Fwww.hinduparivar.org%2F&usg=AFQjCNEyZMcDwi6FB6UXlTwALzY3zZeDqQ&sig2=_Yrfd0H6SgGV-NXmI8jXpg

पिछले छह से आठ महीने में असुरक्षा और भय की भावना बढ़ी

अामिर खान ने कहा कि वह, महसूस करते हैं कि पिछले छह से आठ महीने में असुरक्षा और भय की भावना बढ़ी है। उन्होंने कहा, ‘‘मैं जब घर पर किरण के साथ बात करता हूं, वह कहती हैं कि ‘क्या हमें भारत से बाहर चले जाना चाहिए?’ किरण का यह वक्तव्य देना एक दुखद एवं बड़ा बयान है। उन्हें अपने बच्चे की चिंता है। उन्हें भय है कि हमारे आसपास कैसा माहौल होगा। उन्हें प्रतिदिन समाचारपत्र खोलने में डर लगता है।’’