Tuesday, 28 February 2017

दलित महिला के साथ किया गैंगरेप, आरोपी BJP का बड़ा नेता

BJP शासित MP में भाजपाइयों ने राशन कार्ड बनवाने के बहाने दलित महिला के साथ किया गैंगरेप, आरोपी BJP का बड़ा नेता

मध्य प्रदेश/मुरैना, गुजरात के बाद भाजपा शासित मध्य प्रदेश में रामराज का ये आलम है कि सत्तारूढ़ भाजपा के नेता ही अपनी प्रजा की महिलाओं के साथ बलात्कार कर रहे हैं। मुरैना में एक दलित महिला के साथ सनसनीखेज गैंगरेप का मामला सामने आया है। जिसमें दलित महिला के साथ बीजेपी नेता और सेवा सहकारी संस्था सुमावली के अध्यक्ष ने राशन कार्ड बनवाने का झांसा देकर उसके साथ गैंगरेप किया।
इस रेप प्रकरण में बीजेपी का नेता भोजपाल सिंह जादौन पर शामिल बताया गया है। भोजपाल सिंह सुमावली का बीजेपी मंडल उपाध्यक्ष है। पुलिस के मुताबिक सुमावली सेवा सहकारी संस्था का अध्यक्ष एवं पूर्व सरपंच भोजपाल जादौन ने अपने दो अन्य साथियों के साथ पीड़ित दलित महिला को बीपीएल कार्ड बनवाने का झांसा देकर पीड़ित महिला को हथरिया गांव से मुरैना स्थित अपने मकान पर ले गए और तीनों ने सोमवार की रात उसके साथ गैंगरेप किया।
पुलिस ने बताया कि पीड़िता की रिपोर्ट पर आरोपी भोजपाल जादौन और उसके दो अन्य साथियों भगचंद तथा जितेन्द्र के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है। घटना के बाद से तीनों आरोपी फरार हैं और उनकी तलाश की जा रही है।

चुनाव जीतने के बाद मुख्तार अंसारी से हट जाएगा माफिया का ठप्पा

चुनाव जीतने के बाद मुख्तार अंसारी से हट जाएगा माफिया का ठप्पा: मायावती


बहुजन समाज पार्टी (BSP) मुखिया मायावती ने आज कहा कि जनता माफिया और बाहुबली को पसंद नहीं करती है और जब माफिया समझे जाने वाले मऊ सीट से बसपा प्रत्याशी मुख्तार अंसारी चुनाव जीत जाएंगे तो उन पर मुहर लग जाएगी कि वह ना तो माफिया हैं और ना ही बाहुबली।

मायावती ने यहां आयोजित चुनावी सभा में विश्वास जताया कि मऊ की जनता मुख्तार को जेल में रहते हुए भी चुनाव जिताएगी। जनता प्रधानमंत्री को बताएगी कि किसकी जीत हुई है। उन्होंने कहा, प्रधानमंत्री ने कल मऊ की अपनी रैली में मुख्तार अंसारी का नाम तो नहीं लिया, लेकिन वह जिस तरह माफिया, बाहुबली कह रहे थे, उससे पता लग रहा था कि उनका इशारा किस तरफ था। क्या जनता माफिया और बाहुबली को पसंद करती है। मैं समझती हूं कि बिल्कुल भी पसंद नहीं करती। जब वह (मुख्तार) चुनाव जीत जाएगा तो उस पर मुहर लग जाएगी कि वह ना तो माफिया है और ना ही बाहुबली है।
प्रधानमंत्री ने कल मऊ में अपनी रैली में मुख्तार का नाम लिये बगैर बसपा द्वारा उन्हें प्रत्याशी बनाये जाने पर सवाल खड़े किये थे। मुख्तार हत्या समेत कई जघन्य अपराधों के आरोप में जेल में बंद हैं। दिल्ली उच्च न्यायालय ने उन्हें चुनाव प्रचार के लिये पैरोल देने से कल मना कर दिया था। मायावती ने कहा कि उन्हें मुख्तार और उनके भाई अफजाल अंसारी पर पूरा भरोसा है कि वे सपा को पूर्वांचल में बेहाल कर देंगे।
उन्होंने सपा और भाजपा पर बाहुबलियों को लेकर दोहरा रवैया अपनाने का आरोप लगाते हुए कहा कि सपा अध्यक्ष मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और भाजपा के लोग मुख्तार को तो माफिया बताते हैं लेकिन भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह से कुंडा का गुंडा का खिताब पाये रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया को लेकर उनका रख हमेशा नरम रहता है।
पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि जिस राजा भैया को उन्होंने जेल भेजा था, वह आज भाजपा और सपा की आंख का तारा बना हुआ है। सपा और भाजपा बदनामी के डर से राजा भैया को अपनी पार्टी से टिकट तो नहीं देतीं, लेकिन पर्दे के पीछे से ये दोनों पार्टियां उसके विरुद्ध कमजोर प्रत्याशी खड़ा करती हैं। यही वजह है कि राजा भैया आसानी से चुनाव जीत जाते हैं और ये दोनों पार्टियां सरकार बनने पर मंत्री बना दे देती हैं। उन्होंने मीडिया से कहा कि वह उनकी इस बात को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तक तक जरूर पहुंचा दे। मोदी को मुख्तार अंसारी परिवार के बारे में कुछ भी बोलना शोभा नहीं देता है।
मायावती ने जनता से अपील की कि उसे इस चुनाव में अपने साथ-साथ प्रदेश के हित में अपना वोट सपा, कांग्रेस, भाजपा तथा अन्य विरोधी पार्टियों को ना देकर बसपा को ही देना है। उन्होंने भाजपा अध्यक्ष अमित शाह पर प्रहार करते हुए कहा कि शाह जगह-जगह भाषण दे रहे हैं कि जब यूपी में भाजपा सत्ता में आ जाएगी तो देश का नम्बर वन उत्तम प्रदेश बनेगा। वह यह कह रहे हैं कि यहां दूध दही और घी की नदियां बहेंगी। मैं पूछती हूं कि जब यूपी में आपकी छह साल तक सरकार रही थी तो तब ऐसा क्यों नहीं हुआ।
मायावती ने अलग पूर्वांचल राज्य का मुद्दा उठाते हुए कहा कि उनकी सरकार बनने पर अलग पूर्वांचल राज्य बनाने का प्रयास किया जाएगा। उनकी कोशिश तब तक खत्म नहीं होगी, जब तक यह अलग राज्य नहीं बन जाता।

पाकिस्तान को भी चाहिए कोहिनूर हीरा

पाकिस्तान को भी चाहिए कोहिनूर हीरा, कोर्ट ने मांगी करार की कॉपी

कोहिनूर पर भारत के अलावा तीन और देशों का दावा 
लंदन में रखे कोहिनूर हीरे पर भारत , अफगानिस्तान, पाकिस्तान और ईरान दावा करते हैं.

भारत के बाद अब पाकिस्तान की पंजाब प्रांत सरकार ने भी कहा है कि कोहिनूर हीरे को राजा रणजीत सिंह और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच साल 1849 में एक समझौते के बाद ब्रिटेन को दिया गया था. इसलिए उसे वापस लेने का दावा नहीं किया जा सकता.
पाकिस्तान ने भी कहा- वापस नहीं ला सकते कोहिनूर
डॉन ऑनलाइन की रिपोर्ट के अनुसार, पंजाब सरकार के एक अधिकारी ने मंगलवार को लाहौर हाई कोर्ट मेंकोहिनूर हीरे को पाकिस्तान वापस लाने के लिए दायर याचिका की सुनवाई के दौरान यह बयान दिया. अधिकारी ने कहा कि हीरा पाकिस्तान नहीं लाया जा सकता क्योंकि उसे 'ट्रीटी ऑफ लाहौर' के तहत ब्रिटेन को दिया गया था. 
जानें, क्‍यों है कोहिनूर दुनिया में मशहूर 
हाई कोर्ट ने मांगी करार की कॉपी
याचिकाकर्ता ने सरकार के इस बात का विरोध करते हुए कहा कि यह करार दो सरकारों के बीच किया जाना चाहिए था. ईस्ट इंडिया कंपनी इस तरह का करार करने के लिए अधिकृत नहीं थी. जज ने पंजाब सरकार के वकील को रणजीत सिंह और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच हुए करार की कॉपी पेश करने के लिए कहा.
कोहिनूर पर भारत के अलावा तीन और देशों का दावा 
याचिका दाखिल करने वाले ने कहा कि ब्रिटिश शासक महाराजा रणजीत सिंह के पोते दिलीप सिंह से कोहिनूर छीन कर ब्रिटेन ले गए. उसने अदालत से सरकार को निर्देश देने का आग्रह किया है कि वह ब्रिटिश राष्ट्रमंडल का सदस्य होने के नाते मशहूर हीरे को पाकिस्तान लाए. कड़ी सुरक्षा के बीच टॉवर ऑफ लंदन में रखे कोहिनूर हीरे पर भारत , अफगानिस्तान, पाकिस्तान और ईरान दावा करते हैं.

कन्हैया उमर खालिद ने लगाए थे देशविरोधी नारे!

कन्हैया उमर खालिद ने लगाए थे देशविरोधी नारे!

देशभक्त बनाम देशद्रोह, इस मुद्दे की शुरुआत 13 फरवरी 2016 को देश के नामचीन जवाहर लाल यूनिवर्सिटी से शुरु हुई. जब वहां छात्रों के एक गुट ने विवादित नारे लगाए. जेएनयू कांड को एक साल पूरा हो चुका है. इस मामले की जांच पहले स्थानीय पुलिस के पास थी. उसके बाद 28 फरवरी को जांच स्पेशल ब्रांच को दे दी गई. जेएनयू कांड की जांच के दौरान 2 कमिश्नर (बी.एस.बस्सी और आलोक वर्मा) आए और चले गए. अब तीसरे कमिश्नर भी आ चुके हैं. लेकिन अब तक मामले में दिल्ली पुलिस ने अदालत में चार्जशीट दाखिल नहीं की. या यूं कहें मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया.
दिल्ली यूनिवर्सिटी में देशभक्त बनाम देशद्रोही का मसला एक बार फिर उठा है. इस बार रामजस कॉलेज से शुरु हुई छात्र राजनीति और बवाल के बहाने तमाम विरोधी दल इस मामले में सरकार को निशाने पर लिए हुए हैं. तमाम पार्टियां अपना-अपना सियासी नफा नुकसान देखकर बयानबाजी भी कर रही हैं. और अब मामला दिल्ली पुलिस के पास है और जांच क्राइम ब्रांच के हवाले है.
ठीक ऐसे ही 13 फरवरी 2016 को जेएनयू में 'विवादित नारों' की वजह से बवाल हुआ था. और पहली बार देशभक्त बनाम देशद्रोह का मुद्दा सुर्खियों में आया था.
एक साल बाद भी खाली हाथ दिल्ली पुलिस 
दिल्ली पुलिस के पूर्व कमिश्नर बी.एस.बस्सी जिनके रहते जेएनयू के छात्रों पर देशद्रोह का मुकदमा हुआ वो अपना कार्यकाल खत्म कर रिटायर्ड हो गए. उसके बाद दिल्ली के कमिश्नर बने आलोक वर्मा वो भी अपना कार्यकाल पूरा कर सीबीआई डायरेक्टर बन गए लेकिन दोनों ही कमिश्नर के रहते जेएनयू कांड की चार्जशीट अदालत में दाखिल नहीं हो सकी.
कई वीडियो असली, लगाए गए थे देश विरोधी नारे
अब जेएनयू कांड के एक साल बाद स्पेशल सेल की जांच में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है. स्पेशल सेल के सूत्रों के मुताबिक तरीबन 40 से ज्यादा वीडियो फूटेज को सीएफएसएल लैब जांच के लिए भेजा गया. रिपोर्ट में जेएनयू के कई फूटेज असली पाए गए जिनसे साबित होता है की जेएनयू में देश विरोधी नारे लगाए गए थे.
40 वीडियो की हुई जांच 
स्पेशल सेल ने तकरीबन 40 वीडियो फुटेज जिनमें न्यूज चैनल, प्राइवेट वीडियो, सोशल साइट्स के वीडियो जांच के लिए सीएफएसएल लैब भेजे. जांच में पाया गया कि जेएनयू में देश विरोधी नारे लगाए गए थे.
उमर खालिद ने बनवाए थे पोस्टर
वीडियो फूटेज की जांच में उमर खालिद और अनिर्बान समेत कुल 9 लोग देश विरोधी नारे लगाते पाए गए. उमर खालिद, अनिर्बान के अलावा बाकी तमाम छात्र कश्मीरी हैं जो जामिया, अलीगढ़ और जेएनयू के छात्र हैं. जांच में पता चला कि 13 फरवरी को जेएनयू कैंपस में उमर खालिद ने कल्चरल इवेंट के लिए इजाजत मांगी थी. साथ ही प्रोटेस्ट में यूज होने वाले पोस्टर बैनर भी उमर खालिद ने बनवाए थे
दिल्ली पुलिस से हुई गलती
दिल्ली के पूर्व कमिश्नर बी.एस बस्सी और लोकल थाने की पुलिस ने जांच में यहीं लापरवाही बरती और जल्दबाजी में तमाम छात्रों के साथ जेएनयू छात्र संगठन अध्यक्ष कन्हैया पर भी देशविरोधी नारे लगाने के आरोप में देशद्रोह का मुकदमा दर्ज कर दिया.
ऐसे में सवाल उठता है...
- देश विरोधी नारे लगाने वाले कश्मीरी छात्रों पर एफआईआर दर्ज क्यों नहीं की गई?
- देश विरोधी लगाने वाले कश्मीरी छात्रों को अब तक गिरफ्तार क्यों नहीं किया गया?
- आखिर दिल्ली पुलिस पर किसका दबाव?
- 1 साल बाद भी दिल्ली पुलिस ने चार्जशीट दाखिल क्यों नहीं की?

नरूला ने भगवान शिव का किरदार निभाने से इनकार कर दिया है था कयौकि उन्होंने चिकन खाया था

टीवी चैनल एमटीवि रोडीज  और से चर्चा में आए और BIGBOSS के ९वे सीजन के विजेता घोषित कीए गए 
नरूला ने भगवान शिव का किरदार निभाने से इनकार कर दिया है था कयौकि  उन्होंने  चिकन खाया था 
एक टीवी कार्यक्रम में इस अभीनेता को भगवान् शिव का किरदार करना था लेकिन इन्होंने मना कर दिया .
लेकिन इस बजह से मना किया वे जान के अब आप भी इस अभिनेता को नमन कर रहे होंगे 
 नरूला को एक द्रश्य में शिव की भूमिका  निभाने   के लिए कहा गया , जहा उनकी पत्नी बढे (रीताशा राठौड़ )
अपनी कल्पना में  लकी को भगवान् शिव के रूप में देखती है .प्रिंस इस शो में अपनी भूमिका की तैयारी के   ज़िमेदार आपने आहार में शुभ प्रोटीन और चिकन का सेवन कर रही है और उन्हों जिस दिन शिव की भूमिका 
निभाने के लिए कहा गया,  उस दिन पहले ही वह नाश्ते में चिकन खा चुके थे 
अभिनेता ने कहा की  मुझसे भगवान् शिव का अभिनय नहीं कर सकता    आगे बोलते हुवे पत्रकार से उन्होंने कहा की य मेरी निजी राय आई जिस दिन मुझे ये अभिनय करना हो उस दिन में चिकन नहीं 
और उन्होंने  ख़ुशी है के निर्माता  और चैनल ने उनकी भावनाओ को समझते हुवे यहाँ भूमिका निभाने के 
लिए मजबूर नहीं किया मान गए इस अभिनेता को जिसने अपने धर्म के लिए अपनी आस्था के लिए इतना 
बड़ा कदम उठाया 

Monday, 27 February 2017

डॉ राजेंद्र प्रसाद का जीवन परिचय

भारत के प्रथम राष्ट्रपति 'भारत-रत्न' डॉ राजेन्द्र प्रसाद जी की पुण्यतिथि पर नमन।
उपलब्धियां: स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति, संविधान सभा के अध्यक्ष
डॉ. राजेंद्र प्रसाद स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति थे। वह उस संविधान सभा के अध्यक्ष थे जिसने संविधान की रूप रेखा तैयार की। उन्होंने कुछ समय के लिए स्वतन्त्र भारत की पहली सरकार में केंद्रीय मंत्री के रूप भी में सेवा की थी। राजेन्द्र प्रसाद गांधीजी के मुख्य शिष्यों में से एक थे और उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
प्रारंभिक जीवन 
डॉ. राजेंद्र प्रसाद का जन्म 3 दिसंबर 1884 को बिहार के सीवान जिले के जीरादेई गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम महादेव सहाय और माता का नाम कमलेश्वरी देवी था। राजेन्द्र प्रसाद अपने भाई-बहनों में सबसे छोटे थे। महादेव सहाय फारसी और संस्कृत भाषा के विद्वान थे। डॉ. राजेंद्र प्रसाद को अपनी माँ और बड़े भाई से काफी लगाव था।
पांच वर्ष की आयु में राजेंद्र प्रसाद को उनके समुदाय की एक प्रथा के अनुसार उन्हें एक मौलवी के सुपुर्द कर दिया गया जिसने उन्हें फ़ारसी सिखाई। बाद में उन्हें हिंदी और अंकगणित सिखाई गयी। मात्र 12 साल की उम्र में राजेंद्र प्रसाद का विवाह राजवंशी देवी से हो गया।
राजेंद्र प्रसाद एक प्रतिभाशाली छात्र थे। उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया और उन्हें 30 रूपए मासिक छात्रवृत्ति दिया गया। वर्ष 1902 में उन्होंने प्रसिद्ध कलकत्ता प्रेसीडेंसी कॉलेज में प्रवेश लिया। यहाँ उनके शिक्षकों में महान वैज्ञानिक जगदीश चन्द्र बोस और माननीय प्रफुल्ल चन्द्र रॉय शामिल थे। बाद में उन्होंने विज्ञान से हटकर कला के क्षेत्र में एम ए और कानून में मास्टर्स की शिक्षा पूरी की। इसी बीच, वर्ष 1905 में अपने बड़े भाई महेंद्र के कहने पर राजेंद्र प्रसाद स्वदेशी आंदोलन से जुड़ गए। वह सतीश चन्द्र मुख़र्जी और बहन निवेदिता द्वारा संचालित ‘डॉन सोसाइटी’ से भी जुड़े।
राजनैतिक जीवन
भारतीय राष्ट्रीय मंच पर महात्मा गांधी के आगमन ने डॉ. राजेंद्र प्रसाद को काफी प्रभावित किया। जब गांधीजी बिहार के चंपारण जिले में तथ्य खोजने के मिशन पर थे तब उन्होंने राजेंद्र प्रसाद को स्वयंसेवकों के साथ चंपारण आने के लिए कहा। गांधीजी ने जो समर्पण, विश्वास और साहस का प्रदर्शन किया उससे डॉ. राजेंद्र प्रसाद काफी प्रभावित हुए। गांधीजी के प्रभाव से डॉ. राजेंद्र प्रसाद का दृष्टिकोण ही बदल गया। उन्होंने अपने जीवन को साधारण बनाने के लिए अपने सेवकों की संख्या कम कर दी। उन्होंने अपने दैनिक कामकाज जैसे झाड़ू लगाना, बर्तन साफ़ करना खुद शुरू कर दिया जिसे वह पहले दूसरों से करवाते थे।
गांधीजी के संपर्क में आने के बाद वह आज़ादी की लड़ाई में पूरी तरह से मशगूल हो गए। उन्होंने असहयोग आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया। डॉ राजेंद्र प्रसाद को 1930 में नमक सत्याग्रह में भाग लेने के दौरान गिरफ्तार कर लिया गया। 15 जनवरी 1934 को जब बिहार में एक विनाशकारी भूकम्प आया तब वह जेल में थे। जेल से रिहा होने के दो दिन बाद ही राजेंद्र प्रसाद धन जुटाने और राहत के कार्यों में लग गए। वायसराय के तरफ से भी इस आपदा के लिए धन एकत्रित किया। राजेंद्र प्रसाद ने तब तक तीस लाख अस्सी हजार राशि एकत्रित कर ली थी और वायसराय इस राशि का केवलएक तिहाई हिस्सा ही जुटा पाये। राहत का कार्य जिस तरह से व्यवस्थित किया गया था उसने डॉ. राजेंद्र प्रसाद के कौशल को साबित किया। इसके तुरंत बाद डॉ. राजेंद्र प्रसाद को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के बम्बई अधिवेशन के लिए अध्यक्ष चुना गया। उन्हें 1939 में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के इस्तीफे के बाद कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में निर्वाचित किया गया।
जुलाई 1946 को जब संविधान सभा को भारत के संविधान के गठन की जिम्मेदारी सौंपी गयी तब डॉ. राजेंद्र प्रसाद को इसका अध्यक्ष नियुक्त किया गया। आज़ादी के ढाई साल बाद 26 जनवरी 1950 को स्वतन्त्र भारत का संविधान लागू किया गया और डॉ. राजेंद्र प्रसाद को भारत के प्रथम राष्ट्रपति के रूप में चुना गया। राष्ट्रपति के रूप में अपने अधिकारों का प्रयोग उन्होंने काफी सूझ-बूझ से किया और दूसरों के लिए एक नई मिशाल कायम की। राष्ट्रपति के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने मित्रता बढ़ाने के इरादे से कई देशों का दौरा किया और नए रिश्ते स्थापित करने की मांग की।
राष्ट्रपति के रूप में 12 साल के कार्यकाल के बाद वर्ष 1962 में डॉ. राजेंद्र प्रसाद सेवानिवृत्त हो गए और उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया। सेवानिवृत्ति के बाद अपने जीवन के कुछ महीने उन्होंने पटना के सदाक़त आश्रम में बिताये। 28 फरवरी 1963 को डॉ. राजेंद्र प्रसाद का देहांत हो गया।

राष्ट्रीय विज्ञान दिवस

क्यों मनाया जाता है 28 फरवरी को राष्ट्रीय विज्ञान दिवस?

आज 28 फरवरी को राष्ट्रीय विज्ञान दिवस मनाया जा रहा है. भारत में आर्यभट्ट, चंद्रशेखर और वेंकट रमन जैसे कई वैज्ञानिक हुए, जिन्होंने विज्ञान के क्षेत्र में देश का नाम रोशन किया. विज्ञान के प्रति समाज में जागरूकता लाने और वैज्ञानिक सोच पैदा करने के उद्देश्य से राष्ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद तथा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रलय द्वारा ‘राष्ट्रीय विज्ञान दिवस’ मनाया जाता है.

अभी हाल ही में मशहूर वैज्ञानिक प्रोफेसर सी. एन. राव. को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान से सम्मानित किया गया. 
28 फरवरी, 1928 को कोलकाता में भारतीय वैज्ञानिक प्रोफेसर चंद्रशेखर वेंकट रामन ने इस दिन विज्ञान के क्षेत्र में उत्कृष्ट वैज्ञानिक खोज की जिसे ‘रामन इफेक्ट’ के रूप में जाना जाता है.  सीवी रामन ने कणों की आणविक और परमाणविक संरचना का पता लगाया. उनके इस खोज के कारण ही 1930 में नोबेल पुरस्कार मिला.

चंद्रशेखर वेंकट रमन, भारत के भौतिक विज्ञानी थे। सात नवंबर 1888 को पैदा हुए रमन को प्रकाश के विवर्तन का पता लगाने के लिए 1930 में भौतिकी के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उस समय के मैसूर स्टेट में पैदा होने वाले सीवी रमन को 1954 में भारत का सबसे बड़ा सम्मान भारत रत्न दिया गया।
विज्ञान में हो रहे नये प्रयोगों के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए देश में ‘साइंस सिटी’ भी बनाई गयी है. फिलहाल चार सांइंस सिटी, कोलकाता, लखनऊ, अहमदाबाद और कपूरथला में है. इसके अलावा देश के गुवाहटी और कोट्टयाम में भी इसका निर्माण हो रहा है. साइंस सिटी विज्ञान के क्षेत्र में हो रहे प्रगति और क्रियाकलापों की प्रदर्शनी का केंद्र है. यहां विज्ञान से जुड़ी 3डी फिल्में भी दिखायी जाती हैं.राष्ट्रीय विज्ञान दिवस का मूल उद्देश्य विद्यार्थियों को विज्ञान के प्रति आकर्षित करना और विज्ञान के क्षेत्र में नये प्रयोगों के लिए प्रेरित करना है.
वैज्ञानिक अनुसंधान और विकास को बढ़ावा देने के लिए नेशनल साइंस कांग्रेस का आयोजन होता है. 2014 में 101वां नेशनल साइंस कांग्रेस जम्मू में दो से सात फरवरी तक आयोजित किया गया.

शहीद मंदीप सिंह की बेटी के पोस्ट के जवाब में कर्नल विक्रम का देश के नाम खुला खत!

शहीद मंदीप सिंह की बेटी के पोस्ट के जवाब में कर्नल विक्रम का देश के नाम खुला खत!
बेटे ने नहीं दिखाया होता तो शायद पुराने दर्द फिर से उभर कर सामने नहीं आते, 1965 हो या 1971 का युद्ध, 1947 से चली आ रही हमारी पालिसी अब नागरिकों के दिलों में भी घर करती जा रही है। ‘जूते खाओ, बर्दाश्त करो’, 7 दशक बीत जाने के बाद भी स्थिति में कुछ ख़ास बदलाव नहीं आया है। कैप्टन हैरी की बेटी की तस्वीर के साथ एक तख्ती देखी जिसपर लिखा था “पाकिस्तान ने मेरे पिताजी को नहीं मारा, युद्ध ने उन्हें मारा”. शब्दों के चयन से ही समझ में आ जाता है कि बिटिया को ‘शहीद’ क्या होता है किसी ने समझाया नहीं।
खैर 20 साल की बच्ची इस पूरे विवाद की जड़ नहीं हो सकती ये आप सभी जानते हैं, कहीं न कहीं इस विचारधारा को बल देने और प्रचारित करने की साजिश हमेशा से होती आयी है। भारत को भावनाओं और दरियादिली का सागर कह दिया जाए तो गलत नहीं होगा। हम बांग्लादेश जीते और उन्हें वापिस कर दिया, ठीक वैसे ही जैसे भगवान राम ने लंका जीत कर भी लंका वापिस कर दी थी। पर सवाल ये उठता है कि इतने सालों बाद भी हमें इस दरियादिली वाले स्वभाव से मिला क्या है?

खुद पर सवाल उठाने की आदत कोई नयी नहीं है, 1965 युद्ध के बाद जब हम कैंप वापिस लौटे थे तो कुछ लोगों ने हमसे भी सवाल किये थे, ‘आपने फायरिंग क्यों की?’, आजतक भारत उस स्वर्णिम इतिहास की व्याख्या करते वक़्त गर्वित महसूस करता है, पर कुछ थे जिन्हें तब भी आपत्ति थी। ठीक वैसे ही जैसे हाल में ही लोगों ने सेना से सर्जिकल स्ट्राइक के सुबूत मांग लिए थे। बेटी गुरमेहर अभी सवाल करने के लिहाज़ से बहुत छोटी है, पर मैं आज की पीढ़ी के युवाओं से कुछ सवाल करना चाहूंगा, जो मेरे मन में हमेशा उठते आये हैं।
  1. अगर राष्ट्रविरोधी नारों का विरोध करने वाले ‘गुंडे’ हैं, तो क्या उन्हें मारने वाले फौजी ‘आतंकी’ हैं?
  2. सेना से रहम की उम्मीद करने वाले लोग ही ‘बन्दूक के दम पर आज़ादी’ लेने की बात करते हैं, किसी ने सवाल उठाया?
  3. अगर देश नहीं युद्ध मौत का कारण है तो मैं पूछता हूँ इसकी शुरुआत कौन करता है?
  4. आतंकियों को पनाह देने वाले लोगों की ‘आज़ादी’ कहाँ तक तर्कसंगत है?
  5. सैड़कों ऐसे शहीद परिवार हैं जो खुलेआम इन देशविरोधी गतिविधियों के खिलाफ है, उनके साथ शायद एक या दो हैं, पर मीडिया उन सैकड़ों को छोड़ कर एक या दो को ही क्यों हीरो बनाने के फिराक में है?
कहीं ये कोई साजिश तो नहीं है? इतिहास पढ़ा हो तो आपको मालूम होगा, लाल बहादुर शास्त्री से लेकर इंदिरा गाँधी तक और इंदिरा गाँधी से लेकर नरेंद्र मोदी तक, भारतीय फौज फ्रंट-फुट पर तभी आती है जब देश की जनता के साथ सरकार भी खुल कर उनके साथ आये। गुरमेहर बिटिया के पिता शहीद कैप्टन मंदीप को मैं व्यक्तिगत तौर पर तो नहीं जानता पर कहानियां बहुत सुन रखी हैं। अपने कैम्प को बचाने के लिए खुद को समर्पित कर दिया, क्या आज के युवा ये चाहेंगे कि वो वहां पर किताबी ज्ञान देते और शांति की बातें कर आतंकियों को गौतम बुद्ध बना देते?
देशविरोधी नारे लगाने वालों और आतंकवादियों में एक बात कॉमन है, दोनों को नहीं पता होता वो क्या कर रहे हैं, समाज का एक वर्ग उनका पूरी तरह से ‘माइंड वाश’ कर चुका होता है। पर अब जब यह विचारधारा शहीद के घर के दरवाजे तक पहुँच गयी है तो आवाज़ उठाना मजबूरी हो जाती है। मैं नहीं जानता सोशल मीडिया के जमाने में मेरे इस पत्र का युवा वर्ग पर क्या असर पड़ता है, पर अगर समझो तो एक बात जरूर कहूंगा “हर घर में कमियां होती हैं, पर जब उन कमियों की वजह से हम घर तोड़ने पर अमादा हो जाएँ, तो कहीं ना कहीं कमी हमारे ही अंदर है।
जय हिन्द, जय भारत!
कर्नल विक्रम

Sunday, 26 February 2017

गुरमेहर कौर ने एक अभियान चलाया जिसके तेहत ये कह रही है की “मुझे ABVP पार्टी से डर नहीं लगता

दिल्ली यूनिवर्सिटी के रामजस कॉलेज में जो दंगे हुए वो तो आप सब जानते ही होंगे . अभी तक सोशल मीडिया पे लोगों की विभिन्न विभिन्न प्रतिक्रियाये आ रही है. लेकिन इस बार दिल्ली के श्री राम कॉलेज की एक छात्रा गुरमेहर कौर ने एक अभियान चलाया जिसके तेहत ये कह रही है की “मुझे ABVP पार्टी से डर नहीं लगता”. जो लोग नहीं जानते, उन्हें बता दे की गुरमेहर के पिता कारगिल युद्ध में शहीद हुए थे. अगर आप इस लड़की की फेसबुक प्रोफाइल देखें तो आपको अंदाज़ा हो जायेगा की ये आम आदमी पार्टी की बहुत बड़ी समर्थक है यानी अभी जो वो कर रही है वो राजनैतिक है लेकिन मीडिया उसकी पहचान केवल कारगिल शहीद की बेटी के रूप में करवा रही है जो अधूरा सच है ।
इस लड़की ने एक विडियो बनाया है जिसमे इसने बड़ा ही बेतुका सा ब्यान दिया है की पाकिस्तान ने मेरे पिता को नहीं मारा बल्कि जंग ने मारा है ये कहकर उसने अपनी पिता की भी इंसल्ट कर दी है, हमें पूर्ण विश्वास है उसके पिता अभी ज़िंदा होते तो सबसे पहले वही इसको सही रास्ता दिखाते । देखिये ये फोटो गुरमेहर कौर की:
जैसे ही JNU के वामपंथियों ने ये विडियो सोशल मीडिया पे फैलाना शुरू कर दिया, वैसे ही इस विडियो के विरोध में कई लोग उतर गए. लेकिन मज़ा तो तब आया जब क्रिकेटर वीरेंदर सहवाग ने इस लड़की की चुटकी लेते हुए इसके इस विडियो को नॉनसेंस बताया. वीरू पाजी ने एक फोटो भी डाली
ऐसा हम कभी नहीं सोच सकते थे की एक शहीद की बेटी ऐसा कुछ भी कर सकती है. बजाये इसके कि देश के टुकड़े करने का ख़्वाब देखने वाले वामपंथियों का विरोध किया जाएँ बल्कि गुरमेहर जैसे छात्र राजनीति की वजह से देश विरोधी तत्वों को बढ़ावा देते है. लेकिन वेरिंदर सहवाग का जवाब सिर्फ उसके लिए ही नहीं बाकी वामपंथियों के लिए भी काफी वक़्त तक एक यादगार मिसाल रहेगा ।

इस पर रणदीप हुड्डा ने उनका पूरा समर्थन किया


गोधरा की सच्ची कहानी

शहीद कारसेवकों को हिन्दू परिवार संघठन संस्थ की और से भावपूर्ण_श्रधांजलि। : गोधरा रेल नरसंहार


27 फरवरी 2002. 'आधुनिक' भारत के इतिहास का एक और काला दिन. इसी दिन इस 'स्वतंत्र' और "धर्मनिरपेक्ष" देश में सुबह 7:43 बजे गुजरात के गोधरा स्टेशन पर इसी देश के 58 नागरिकों (23 पुरुषों, 15 महिलाओं और 20 बच्चों) को साबरमती एक्सप्रेस के कोच S-6 में ज़िंदा जला दिया गया. उनका 'अपराध' शायद ये था कि वे अपनी धार्मिक आस्थाओं के अनुसार अयोध्या को श्रीराम की जन्मभूमि मानते थे और उसी अयोध्या की अपनी तीर्थयात्रा से लौट रहे थे.

मैंने सुना है कि इस देश में नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त है. मैंने ये भी सुना है कि इस देश में मानवाधिकारों और महिला-अधिकारों की रक्षा के लिए भी अनेक प्रावधान हैं. लेकिन मुझे ये नहीं मालूम कि ये अधिकार हिंदुओं के लिए भी हैं या नहीं. सुना तो मैंने ये भी है कि इस देश का मीडिया बहुत 'जागरूक', 'निष्पक्ष' और 'ज़िम्मेदार' मीडिया है. मीडिया में गोधरा के बाद पूरे गुजरात में हुए दंगों की खबरें खूब सुनने को मिलीं, लेकिन अफसोस! गोधरा में मारे गए लोगों के परिवार की व्यथा विश्व को सुनाने का समय शायद किसी चैनल, किसी अखबार को नहीं मिला.

गोधरा-कांड की जांच के लिए गठित नानावती आयोग और साथ ही राज्य की SIT की रिपोर्ट के अनुसार गोधरा की घटना एक सुनियोजित षड्यंत्र का परिणाम थी. पूर्व रेल-मंत्री लालूप्रसाद यादव द्वारा नियुक्त बनर्जी कमीशन ने ट्रेन में सवार यात्रियों को ही इस अग्नि-कांड के लिए दोषी ठहराया था, लेकिन 13 अक्टूबर 2006 को गुजरात उच्च-न्यायालय ने इस रिपोर्ट को असंवैधानिक करार देते हुए निरस्त कर दिया. हत्याकांड के नौ वर्षों बाद 22 फरवरी 2011 को एक विशेष अदालत ने 31 लोगों को गोधरा की घटना के लिए दोषी करार दिया, जिनमें से 11 लोगों को मृत्यु-दंड और 20 को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई.

हालांकि, कानूनी प्रक्रिया अभी लंबी चलेगी, लेकिन मेरे मन में सवाल ये है कि देश में होने वाली इस तरह की घटनाओं और सांप्रदायिक दंगों का सिलसिला आखिर कब रूकेगा? और रूकेगा भी या नहीं? आखिर इसका परिणाम क्या होगा? गोधरा हत्याकांड और उसके बाद पूरे गुजरात में हुए दंगे इस बात का एक खतरनाक संकेत हैं कि हमारे देश में शांति और सद्भाव को खत्म करने के लिए किसी विदेशी शक्ति की आवश्यकता नहीं है. दंगों के बाद मीडिया के माध्यम से शोर मचाकर तथाकथित 'सेक्युलर' समूहों और NGOs के बीच जिस तरह श्री नरेंद्र मोदी को दंगों का गुनहगार साबित करने की होड़ दिखाई दी, उससे फिर मुझे यही महसूस होता है कि हम आपस में ही लड़ने-मिटने को तैयार बैठे हैं. मेरे मन में प्रश्न ये है कि मोदी के खिलाफ शोर मचाने वालों के मन में इस देश के लोकतंत्र और न्याय-तंत्र पर विश्वास है या नहीं? गुजरात दंगों के बाद हुए दोनों विधानसभा चुनावों में मोदी जी के नेतृत्व में भाजपा ने गुजरात में जीत हासिल की है. साथ ही, उनके खिलाफ जो प्रकरण न्यायालय में दाखिल किए गए थे, उन पर निर्णय न्यायालय में होगा ही. फिर बेवजह शोर मचाकर देश में सांप्रदायिक वैमनस्य बढाने का प्रयास क्यों? मुझे आश्चर्य होता है कि गुजरात दंगों के दोषियों को कड़ी सज़ा दिलाने के लिए आंदोलन चलाने वाले कभी गोधरा के दोषियों के खिलाफ आवाज़ क्यों नहीं उठाते? नरेंद्र मोदी को गुनहगार बतानेवाले लोग 1984 के सिख दंगों पर मौन क्यों हैं? अल्पसंख्यकों के अधिकार और उनकी सुरक्षा जितनी महत्वपूर्ण है, क्या बहुसंख्यकों के अधिकारों और उनकी सुरक्षा को भी उतना ही महत्व नहीं दिया जाना चाहिए?

मुझे लगता है कि गुजरात दंगों जैसी घटनाओं के संदर्भ में अपनी सुविधानुसार निष्कर्ष निकालने वालों को पूर्वाग्रहों से बाहर निकलकर सत्य को स्वीकार करना चाहिए. गुजरात दंगों की बात गोधरा के बिना अधूरी है. झूठे आरोप-प्रत्यारोप किसी को तात्कालिक लाभ तो दिला सकते हैं, लेकिन ये देश और समाज को नुकसान ही पहुंचाते हैं. आवश्यकता इस बात की है कि हम संगठित होकर इस तरह के कुचक्रों का सामना करें और उन्हें परास्त करें. यही गोधरा के शहीदों के लिए हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी.


पाकिस्तानी राष्ट्रपति के जहरीले बोल

पाकिस्तानी राष्ट्रपति के जहरीले बोल "भारत हटे कश्मीर से वरना हम भारत को बर्बाद कर देंगे"
पाकिस्तानी राष्ट्रपति ममनून हुसैन ने गुलाम कश्मीर की राजधानी मुज़्ज़फ़राबाद में मुहम्मद अली जिन्ना की जन्म शताब्दी पर भारत को धमकी देते हुए कहा है कि"भारत की भलाई इसी में है कि वो कश्मीर से हट जाये ,वरना हम भारत को बर्बाद कर देंगे , उन्होंने कहा की वहां मौजूद भारतीय सैनिक जानवरों पर इस्तेमाल की जानी वाली पैलेट गन का इस्तेमाल कश्मीर के मासूम लोगों पर कर रहे हैं , उन्होंने अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर कश्मीर में चल रहे आंदोलन कार्यकर्ताओं का समर्थन देने की अपील भी की

चंद्रशेखर आजाद जीवन परिचय

चंद्रशेखर आजाद जीवन परिचय


जब कभी भी आपको किसी शक्तिशाली व्यक्तित्व को देखने की इच्छा हो तो आपके दिमाग में सबसे पहले भारत के उग्र स्वतंत्रता सेनानी चंद्रशेखर आज़ाद का नाम अवश्य आयेगा। वे भारत के महान और शक्तिशाली क्रांतिकारी थे, आज़ाद भारत को अंग्रेजो के चंगुल से छुडाना चाहते थे। सबसे पहले उन्होंने महात्मा गांधी जी के असहयोग आंदोलन में भाग लिया था, बाद में उन्होंने आज़ादी के लिये संघर्ष करने के लिये हथियारों का उपयोग किया। आज़ाद के आश्चर्यचकित कारनामो में हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिक एसोसिएशन संस्था शामिल है। उन्होंने अपने सहकर्मी भगत सिंह और सुखदेव के साथ मिलकर अंग्रेजो से लड़ना शुरू किया था, और इसके लिये उन्होंने झाँसी कैंप की भी स्थापना की। उन्होंने मरते दम तक अंग्रेजो के हाथ न आने की कसम खाई थी और मरते दम तक वे अंग्रेजो के हाथ में भी नही आये थे, उन्होंने अपने अंतिम समय में अंग्रेजो हाथ आने के बजाये गर्व से खुद को गोली मार दी थी, और भारत की आज़ादी के लिये अपने प्राणों का बलिदान दिया था। आज इस महान क्रांतिकारी के महान जीवन के बारे में कुछ जानते हैं।
मेरे भारत माता की इस दुर्दशा को देखकर यदि अभी तक आपका रक्त क्रोध नहीं करता है, तो यह आपकी रगों में बहता खून है ही नहीं या फिर बस पानी है” ~   
CHANDRA SHEKHAR AZAD

चंद्रशेखर आजाद जीवन परिचय

पूरा नाम –  पंडित चंद्रशेखर तिवारी
जन्म     –  23 जुलाई, 1906
जन्मस्थान – भाभरा (मध्यप्रदेश)
पिता     –  पंडित सीताराम तिवारी
माता     –  जाग्रानी देवी
चन्द्र शेखर आजाद के नाम को साधारणतः चंद्रशेखर या चन्द्रसेखर भी कहते है। उनका जीवनकाल 23 जुलाई 1906 से 27 फ़रवरी 1931 के बीच था। ज्यादातर वे आजाद के नाम से लोकप्रिय है। वे एक भारतीय क्रांतिकारी थे जिन्होंने हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के संस्थापक राम प्रसाद बिस्मिल और तीन और मुख्य नेता रोशन सिंह, राजेंद्र नाथ लाहिरी और अश्फकुल्ला खान की मृत्यु के बाद नये नाम हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) पुनर्संगठित किया था।

चन्द्र शेखर आजाद का प्रारंभिक जीवन

आजाद का जन्म चन्द्र शेखर तिवारी के नाम से 23 जुलाई 1906 को भावरा ग्राम में हुआ था, जो वर्मान में मध्यप्रदेश का अलीराजपुर जिला है। उनके पूर्वज कानपूर (वर्तमान उन्नाव जिला) के पास के बदरका ग्राम से थे। उनके पिता सीताराम तिवारी और माता जगरानी देवी थी।

उनकी माता चाहती थी की उनका बेटा एक महान संस्कृत का विद्वान बने और उन्होंने चंद्रशेखर के पिता से उन्हें अभ्यास के लिये बनारस के काशी विद्यापीठ भेजने के लिये भी कहा था। दिसम्बर 1921 में जब मोहनदास करमचंद गांधी ने असहकार आन्दोलन की घोषणा की थी तब चंद्रशेखर आज़ाद 15 साल के एक विद्यार्थी थे। लेकिन फिर भी वे गांधीजी के असहकार आन्दोलन में शामिल हो गए। परिणामस्वरूप उन्हें कैद कर लिया गया। जब चंद्रशेखर को जज के सामने लाया गया तो नाम पूछने पर चंद्रशेखर ने अपना नाम “आजाद” बताया था, उनके पिता का नाम “स्वतंत्र” और उनका निवास स्थान “जेल” बताया। उसी दिन से चंद्रशेखर लोगो के बीच चन्द्र शेखर आज़ाद के नाम से लोकप्रिय हुए।
चन्द्र शेखर आजाद क्रांतिकारी जीवन
1922 में जब गांधीजी ने चंद्रशेखर को असहकार आन्दोलन से निकाल दिया था तब आज़ाद और क्रोधित हो गए थे। तब उनकी मुलाकात युवा क्रांतिकारी प्रन्वेश चटर्जी से हुई जिन्होंने उनकी मुलाकात राम प्रसाद बिस्मिल से करवाई, जिन्होंने हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) की स्थापना की थी, यह एक क्रांतिकारी संस्था थी। जब आजाद ने एक कंदील पर अपना हाथ रखा और तबतक नही हटाया जबतक की उनकी त्वचा जल ना जाये तब आजाद को देखकर बिस्मिल काफी प्रभावित हुए। इसके बाद चंद्रशेखर आजाद हिन्दुस्तान रिपब्लिक एसोसिएशन के सक्रीय सदस्य बन गए थे और लगातार अपने एसोसिएशन के लिये चंदा इकठ्ठा करने में जुट गए। उन्होंने ज्यादातर चंदा सरकारी तिजोरियो को लूटकर ही जमा किया था। वे एक नये भारत का निर्माण करना चाहते थे जो सामाजिक तत्वों पर आधारित हो। आजाद 1925 के काकोरी ट्रेन लुट में भी शामिल थे और अंतिम समय में उन्होंने लाला लाजपत राय के कातिल जे.पी. सौन्ड़ेर्स की हत्या 1928 में की थी।
हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन –

हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) की स्थापना राम प्रसाद बिस्मिल, चटर्जी, सचिन्द्र नाथ सान्याल और सचिन्द्र नाथ बक्षी ने मिलकर 1924 में की थी। 1925 में काकोरी ट्रेन लुट के बाद ब्रिटिश भारतीयों की क्रांतिकारी गतिविधियों से डर चुके थे। प्रसाद, अश्फाकुल्ला खान, ठाकुर रोशन सिंह और राजेंद्र नाथ लहिरी कोकाकोरी कांड में दोषी पाये जाने के कारण मौत की सजा दी गयी थी। लेकिन आजाद, केशब चक्रवर्ति और मुरारी शर्मा को भी दोषी पाया गया था। बाद में कुछ समय बाद चन्द्र शेखर आजाद ने अपने क्रांतिकारियों जैसे शेओ वर्मा और महावीर सिंह की सहायता से हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन को पुनर्संगठित किया। इसके साथ ही आजाद भगवती चरण वोहरा, भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु के साथ भी जुड़े हुए थे, इन्होने आजाद को हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन का नाम बदलकर हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन रखने में सहायता भी की थी।
मृत्यु –
आजाद की मृत्यु अल्लाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में 27 फरवरी 1931 को हुई थी। जानकारों से जानकारी मिलने के बाद ब्रिटिश पुलिस ने आजाद और उनके सहकर्मियों की चारो तरफ से घेर लिया था। खुद का बचाव करते हुए वे काफी घायल हो गए थे और उन्होंने कई पुलिसकर्मीयो को मारा भी था। चंद्रशेखर बड़ी बहादुरी से ब्रिटिश सेना का सामना कर रहे थे और इसी वजह से सुखदेव राज भी वहा से भागने में सफल हुए। लंबे समय तक चलने वाली गोलीबारी के बाद, अंततः आजाद चाहते थे की वे ब्रिटिशो के हाथ ना लगे, और जब पिस्तौल में आखिरी गोली बची हुई थी तब उन्होंने वह आखिरी गोली खुद को ही मार दी थी। चंद्रशेखर आजाद की वह पिस्तौल हमें आज भी अल्लाहबाद म्यूजियम में देखने मिलती है।

लोगो को जानकारी दिये बिना ही उनके शव को रसूलाबाद घाट पर अंतिम संस्कार के लिये भेजा गया था। लेकिन जैसे-जैसे लोगो को इस बात की जानकारी मिलते गयी वैसे ही लोगो ने पार्क को चारो तरफ से घेर लिया था। उस समय ब्रिटिश शासक के खिलाफ लोग नारे लगा रहे थे और आजाद की तारीफ कर रहे थे

इस वीडियो में ओवैसी ‘हिंदू भाइयों’ के लिए शिवरात्रि पर दो छुट्टियां देने की मांग करते नज़र आ रहे हैं.

महाशिवरात्रि पर अकबरुद्दीन ओवेसी ने जो कहा उसके बाद हर हिन्दू उसको जवाब देना चाहेगा

अकबरुद्दीन ओवैसी. नाम आते ही याद आती है वो तेज़ाबी स्पीच जिसमें उन्होंने पंद्रह मिनट सेना हटाने की बात कही थी. पांच साल पहले दी गई वो स्पीच ओवैसी से ऐसी चिपटी कि उसके बाद उनको किसी और चीज़ के लिए जाना ही नहीं गया. पिछले पांच सालों में उन्होंने जो कुछ भी किया या कहा वो उसी स्पीच की रोशनी में परखा जाता रहा. आज हम आपके लिए उन्हीं ओवैसी का कहा कुछ और लेकर आए हैं.
इस वीडियो में ओवैसी ‘हिंदू भाइयों’ के लिए शिवरात्रि पर दो छुट्टियां देने की मांग करते नज़र आ रहे हैं. वो कहते हैं,
ईद पर सरकार ने दो छुट्टियां दी हैं हम उसका स्वागत करते हैं. क्रिसमस के लिए भी छुट्टी दी है हम उसका भी स्वागत करते हैं. लेकिन मजलिस की तरफ से मैं सरकार से मांग करता हूं कि शिवरात्रि के लिए भी दो छुट्टियां दी जाएं. क्योंकि शिवरात्रि के लिए हमारे हिंदू भाई, खाना खाए बगैर रोज़े की तरह रहते हैं. रात भर जागते हैं और दूसरे दिन उनको काम पर जाना पड़ता है. ये सही नहीं है. आपने जिस तरीके से ईद पर दो दिन की छुट्टी दी है, क्रिसमस पर दी है उसी तरह शिवरात्रि पर भी दीजिए. ये अच्छा पैगाम जाएगा हुकूमत की तरफ से.”
वीडियो एक-दो शिवरात्रि पहले का है, नज़र पड़ गई तो चौंके. बहुत पॉजिटिव भी महसूस हुआ. हमेशा नेगेटिव रहना भी तो ठीक नहीं किसी के लिए.


यहां बात धार्मिक, अधार्मिक होने की नहीं है. बात ये है कि पॉलिटिक्स में इस चीज की ज्यादा जरूरत है जहां आप अलग धार्मिक, राजनीतिक पहचान वाले लोगों और वोटर्स के मन में भरोसा और प्रेम पैदा करने वाला काम करें. यही बात अकबरुद्दीन के लिए भी जाती है और यही बात तोगड़िया के लिए भी जाती है. ये डेमोक्रेसी की ही खूबी है कि जनप्रतिनिधियों पर दबाव बनाकर रखती है. जहां कसर रह जाए वहां लोग ख़याल रखे. जो भी बात हो प्रेम-भाईचारे के बीच हो, कोई यहां परमानेंट रहने तो आया नहीं है.

मोदी के जिक्र से वायरल हो गया गटर में उतरे IAS का फोटो

मोदी के जिक्र से वायरल हो गया गटर में उतरे IAS का फोटो

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने 'मन की बात' कार्यक्रम में जब स्वच्छता के मुद्दे पर बात करते हुए ट्विन पिट टॉयलेट का जिक्र किया और बताया कि कैसे एक आईएएस अफसर खुद इसे प्रमोट करने के लिए गटर में उतरा और सफाई में जुटा तो सोशल मीडिया पर आईएएस परम लैयर की तस्वीर वायरल हो गई. इस तस्वीर में लैयर एक ट्विट पिट टॉयलेट की सफाई करते नजर आ रहे हैं. तस्वीर खुद लैयर ने 18 फरवरी को ट्वीट की थी और कहा था कि गंगादेवीपल्ली गांव में उन्होंने बताया कि कैसे ट्विट पिट टॉयलेट की सफाई करना सुरक्षित और स्वच्छ काम है.
गौरतलब है कि मन की बात में पीएम ने कहा कि 17-18 फरवरी को हैदराबाद में टॉयलेट पिट एंपटिंग एक्सरसाइज का आयोजन किया गया. इसमें छह घर के टॉयलेट पिट ख़ाली करके उनकी सफ़ाई की गई और अधिकारियों ने स्वयं ने दिखाया कि ट्विन पिट टॉयलेट के उपयोग हो चुके गड्ढों को, उसे ख़ाली कर पुनः प्रयोग में लाया जा सकता है. उन्होंने यह भी दिखाया कि यह नई तकनीक के शौचालय कितने सुविधाजनक हैं और इन्हें ख़ाली करने में सफ़ाई को लेकर कोई असुविधा महसूस नहीं होती है, कोई संकोच नहीं होता है, जो मानसिकता होती है, वो भी आड़े नहीं आती है और हम भी और सामान्य सफ़ाई करते हैं, वैसे ही एक टॉयलेट के गड्ढे साफ़ कर सकते हैं.
मोदी ने कहा कि इस प्रयास का परिणाम हुआ, देश के मीडिया ने इसको बहुत प्रचारित भी किया, उसको महत्व भी दिया. और स्वाभाविक है, जब एक IAS अफ़सर खुद टॉयलेट के गड्ढे की सफ़ाई करता हो, तो देश का ध्यान जाना बहुत स्वाभाविक है. और ये जो टॉयलेट पिट की सफ़ाई है और उसमें से जो जिसे आप-हम कूड़ा-कचरा मानते हैं, लेकिन खाद की दृष्टि से देखें, तो ये एक प्रकार से ये काला सोना होता है. वेस्ट से वैल्थ क्या होती है, ये हम देख सकते हैं, और ये सिद्ध हो चुका है.
मोदी ने बताया कि छह सदस्यीय परिवार के लिये एक सामान्य ट्विट पिट टॉयलेट लगभग पांच वर्ष में भर जाता है. इसके बाद कचरे को आसानी से दूर कर, दूसरे पिट में रिडायरेक्ट किया जा सकता है. छह-बारह महीनों में पिट में जमा कचरा पूरी तरह से डीकंपोज हो जाता है. ये कचरा हैंडल करने में बहुत ही सुरक्षित होता है और खाद की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण खाद ‘NPK’. किसान भली-भांति ‘NPK’ से परिचित हैं, नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटेशियम - ये पोषक तत्वों से पूर्ण होता है; और यह कृषि क्षेत्र में बहुत ही उत्तम खाद माना जाता है.

Saturday, 25 February 2017

विनायक दामोदर सावरकर

विनायक दामोदर सावरकर

जन्म28 मई 1883
ग्राम भागुर, जिला नासिक बम्बई प्रान्त ब्रिटिश भारत
मृत्युफ़रवरी 26, 1966 (उम्र 82)
बम्बई,  भारत
मृत्यु का कारण
इच्छामृत्यु यूथेनेशिया प्रायोपवेशनम्
सल्लेखना


अन्य नामवीर सावरकर
शिक्षाकला स्नातक, फर्ग्युसन कॉलिज, पुणेबार एट ला लन्दन
प्रसिद्धि कारणभारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन, हिन्दुत्व
राजनैतिक पार्टीअखिल भारतीय हिन्दू महासभा
धार्मिक मान्यताहिन्दू नास्तिक
जीवनसाथीयमुनाबाई
बच्चे
पुत्र: प्रभाकर (अल्पायु में मृत्यु)
एवं विश्वास सावरकर,
पुत्री: प्रभात चिपलूणकर

विनायक दामोदर सावरकर :-(जन्म: २८ मई १८८३ - मृत्यु: २६ फ़रवरी १९६६) भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन के अग्रिम पंक्ति के सेनानी और प्रखर राष्ट्रवादी नेता थे। उन्हें प्रायःवीर सावरकर के नाम से सम्बोधित किया जाता है। हिन्दू राष्ट्र की राजनीतिक विचारधारा (हिन्दुत्व) को विकसित करने का बहुत बडा श्रेय सावरकर को जाता है। वे न केवल स्वाधीनता-संग्राम के एक तेजस्वी सेनानी थे अपितु महान क्रान्तिकारी, चिन्तक, सिद्धहस्त लेखक, कवि, ओजस्वी वक्ता तथा दूरदर्शी राजनेता भी थे। वे एक ऐसे इतिहासकार भी हैं जिन्होंने हिन्दू राष्ट्र की विजय के इतिहास को प्रामाणिक ढँग से लिपिबद्ध किया है। उन्होंने१८५७ के प्रथम स्वातंत्र्य समर का सनसनीखेज व खोजपूर्ण इतिहास लिखकर ब्रिटिश शासन को हिला कर रख दिया था
जीवन वृत्त
विनायक सावरकर का जन्म महाराष्ट्र (तत्कालीन नाम बम्बई) प्रान्त में नासिक के निकट भागुर गाँव में हुआ था। उनकी माता जी का नाम राधाबाई तथा पिता जी का नाम दामोदर पन्त सावरकर था। इनके दो भाई गणेश (बाबाराव) व नारायण दामोदर सावरकर तथा एक बहन नैनाबाई थीं। जब वे केवल नौ वर्ष के थे तभी हैजे की महामारी में उनकी माता जी का देहान्त हो गया। इसके सात वर्ष बाद सन् १८९९ में प्लेग की महामारी में उनके पिता जी भी स्वर्ग सिधारे। इसके बाद विनायक के बड़े भाई गणेश ने परिवार के पालन-पोषण का कार्य सँभाला। दुःख और कठिनाई की इस घड़ी में गणेश के व्यक्तित्व का विनायक पर गहरा प्रभाव पड़ा। विनायक ने शिवाजी हाईस्कूल नासिक से १९०१ में मैट्रिक की परीक्षा पास की। बचपन से ही वे पढ़ाकू तो थे ही अपितु उन दिनों उन्होंने कुछ कविताएँ भी लिखी थीं। आर्थिक संकट के बावजूद बाबाराव ने विनायक की उच्च शिक्षा की इच्छा का समर्थन किया। इस अवधि में विनायक ने स्थानीय नवयुवकों को संगठित करके मित्र मेलों का आयोजन किया। शीघ्र ही इन नवयुवकों में राष्ट्रीयता की भावना के साथ क्रान्ति की ज्वाला जाग उठी।[4] सन् १९०१ में रामचन्द्र त्रयम्बक चिपलूणकर की पुत्री यमुनाबाई के साथ उनका विवाह हुआ। उनके ससुर जी ने उनकी विश्वविद्यालय की शिक्षा का भार उठाया। १९०२ में मैट्रिक की पढाई पूरी करके उन्होने पुणे के फर्ग्युसन कालेज से बी०ए० किया।
मातृभूमि! तेरे चरणों में पहले ही मैं अपना मन अर्पित कर चुका हूँ। देश-सेवा ही ईश्वर-सेवा है, यह मानकर मैंने तेरी सेवा के माध्यम से भगवान की सेवा की।

सेलुलर जेल में


नासिक जिले  के कलेक्टर जैकसन की हत्या के लिए नासिक षडयंत्र काण्ड के अंतर्गत इन्हें ७ अप्रैल१९११ कोकाला पानी की सजा पर सेलुलर जेल भेजा गया। उनके अनुसार यहां स्वतंत्रता सेनानियों को कड़ा परिश्रम करना पड़ता था। कैदियों को यहां नारियल छीलकर उसमें से तेल निकालना पड़ता था। साथ ही इन्हें यहां कोल्हू में बैल की तरह जुत कर सरसों व नारियल आदि का तेल निकालना होता था। इसके अलावा उन्हें जेल के साथ लगे व बाहर के जंगलों को साफ कर दलदली भूमी व पहाड़ी क्षेत्र को समतल भी करना होता था। रुकने पर उनको कड़ी सजा व बेंत व कोड़ों से पिटाई भी की जाती थीं। इतने पर भी उन्हें भरपेट खाना भी नहीं दिया जाता था।।[6] सावरकर ४ जुलाई१९११ से २१ मई१९२१ तक पोर्ट ब्लेयर की जेल में रहे।




स्वतन्त्रता संग्राम

१९२१ में मुक्त होने पर वे स्वदेश लौटे और फिर ३ साल जेल भोगी। जेल में उन्होंने हिंदुत्व पर शोध ग्रन्थ लिखा। इस बीच ७ जनवरी १९२५ को इनकी पुत्री, प्रभात का जन्म हुआ। मार्च, १९२५ में उनकी भॆंट राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक, डॉ॰ हेडगेवार से हुई। १७ मार्च १९२८ को इनके बेटे विश्वास का जन्म हुआ। फरवरी, १९३१ में इनके प्रयासों से बम्बई में पतित पावन मन्दिर की स्थापना हुई, जो सभी हिन्दुओं के लिए समान रूप से खुला था। २५ फ़रवरी १९३१ को सावरकर ने बम्बई प्रेसीडेंसी में हुए अस्पृश्यता उन्मूलन सम्मेलन की अध्यक्षता की
१९३७ में वे अखिल भारतीय हिन्दू महासभा के कर्णावती (अहमदाबाद) में हुए १९वें सत्र के अध्यक्ष चुने गये, जिसके बाद वे पुनः सात वर्षों के लिये अध्यक्ष चुने गये। १५ अप्रैल १९३८ को उन्हें मराठी साहित्य सम्मेलन का अध्यक्ष चुना गया। १३ दिसम्बर १९३७ को नागपुर की एक जन-सभा में उन्होंने अलग पाकिस्तान के लिये चल रहे प्रयासों को असफल करने की प्रेरणा दी थी। २२ जून १९४१ को उनकी भेंट नेताजी सुभाष चंद्र बोस से हुई। ९ अक्टूबर १९४२ को भारत की स्वतन्त्रता के निवेदन सहित उन्होंने चर्चिल को तार भेज कर सूचित किया। सावरकर जीवन भर अखण्ड भारत के पक्ष में रहे। स्वतन्त्रता प्राप्ति के माध्यमों के बारे में गान्धी और सावरकर का एकदम अलग दृष्टिकोण था। १९४३ के बाद दादर, बम्बई में रहे। १६ मार्च१९४५ को इनके भ्राता बाबूराव का देहान्त हुआ। १९ अप्रैल १९४५ को उन्होंने अखिल भारतीय रजवाड़ा हिन्दू सभा सम्मेलन की अध्यक्षता की। इसी वर्ष८ मई को उनकी पुत्री प्रभात का विवाह सम्पन्न हुआ। अप्रैल १९४६ में बम्बई सरकार ने सावरकर के लिखे साहित्य पर से प्रतिबन्ध हटा लिया। १९४७में इन्होने भारत विभाजन का विरोध किया। महात्मा रामचन्द्र वीर नामक (हिन्दू महासभा के नेता एवं सन्त) ने उनका समर्थन किया।