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Wednesday, 31 January 2018

आइये इतिहास के प्रमाणित सत्य को जानें यदि ब्राह्मण न होते तो आज हम हिंदु भी न होते

क्या आधुनिक भारत में ब्राह्मणों की दुर्दशा तर्कसंगत है?

क्या आधुनिक भारत में ब्राह्मणों की दुर्दशा तर्कसंगत है?
जिन लोगों ने भारत को लूटा, तोडा, नष्ट किया, वे आज इस देश में ‘अतीत भुला दो’ ने नाम पर सम्मानित हैं और एक अच्छा जीवन जी रहे हैं। जिन्होंने भारत की मर्यादा को खंडित किया, उसके विश्विद्यालयों को जलाया, उसके विश्वज्ञान के भंडार पुस्तकालयों को जला कर राख किया, उन्हें आज के भारत में सब सुविधायों से युक्त सुखी जीवन मिल रहा है। किंतु वे ब्राह्मण जिन्होंने सदैव अपना जीवन देश, धर्म और समाज की उन्नति के लिए अर्पित किया, वे आधुनिक भारत में काल्पनिक पुराने पापों के लिए बहिष्कृत हैं, निंदनीय हैं।
ब्राह्मणों द्वारा दलित शोषण का झूठ
आधुनिक इतिहासकार हमें सिखाते हैं कि भारत के ब्राह्मण सदा से दलितों का शोषण करते आये हैं। उनके बारे में यही पढाया जाता है कि वे धूर्त हैं, समाज पर बोझ हैं और घृणित वर्ण-व्यवस्था के प्रवर्तक भी। “ब्राह्मणों का ५,००० वर्ष लम्बा अत्याचार”, इस एक विचारधारा के अंतर्गत प्रत्येक जाती को पिछड़ी जाती या दलित वर्ग में शामिल करके उन्हें असीमित आरक्षण की सुविधा उपलब्ध करवाने का कार्य चल रहा है। यह काल्पनिक कथा इतने जोर से और बार बार सुनाये जाने के कारण, अधिकतर लोग इसे सत्य भी मानने लगे हैं। इसे इसके वर्तमान रूप में खड़ा करने के पीछे बहुत से लोगों की मेहनत लगी है। ब्राह्मण-विरोध का यह काम पिछले दो शतकों में कार्यान्वित किया गया।
अंग्रेज़ों द्वारा ब्राह्मण विरोधी दुष्प्रचार

वो कहते हैं कि ब्राह्मणों ने कभी किसी अन्य जाती के लोगों को पढने लिखने का अवसर नहीं दिया। इस कारण ब्राह्मण शब्द का नाम सुनते ही आँखों के सामने एक घमंडी, अशिष्ट, और अत्याचारी कट्टरवादी पुरुष आ खड़ा होता है जो कि निचले वर्ग के लोगों और दलितों पर तब तक कोड़े बरसता है जब तक कि उनके प्राण न निकल जाएँ। ब्राह्मण-विरोधी यह आन्दोलन तब जोर पकड़ा, जब वामपंथियों, पादरियों और मौलवियों ने, अलगाववादी और वर्णवादी शक्तियों ने अंग्रेजों से इस का पाठ पढ़ा और फिर इसे अपने अपने ढंग से आगे बढ़ाया।
सनातन ग्रंथों के रचयिता ब्राह्मण पर झूठे आरोप

बड़े बड़े विश्वविद्यालयों के बड़े बड़े शोधकर्तायों ने यह काम बड़े शौक से सिरे चढ़ाया, और यह बात बार बार कहते रहे कि ब्राह्मण सदा से समाज का शोषण करते आये हैं और आज भी कर रहे हैं, कि उन्होंने हिन्दू ग्रन्थों की रचना केवल इसी लिए की कि वे समाज में अपना स्थान सबसे ऊपर घोषित कर सकें और कि भारत देश की अधिकतम समस्यायों की जड़ केवल और केवल ब्राह्मण है।
तर्क व प्रमाण रहित असत्य भ्रांतियां

किंतु यह सारे तर्क खोखले और बेमानी हैं, इनके पीछे एक भी ऐतिहासिक प्रमाण नहीं। एक झूठ को सौ बार बोला जाए तो वह अंततः सत्य प्रतीत होने लगता, इसी भांति इस झूठ को भी आधुनिक भारत में सत्य का स्थान मिल चूका है। आइये आज हम बिना किसी पूर्व प्रभाव के और बिना किसी पक्ष में खड़े हुए न्याय बुद्धि से इसके बारे सोचे, सत्य घटनायों पर टिके हुए सत्य को देखें। क्योंकि अपने विचार हमें सत्य के आधार पर ही खड़े करने चाहियें, न कि किसी दूसरे के कहने मात्र से।
सरल सज्जन ब्राह्मण का पाखंडों प्रस्तुतीकरण

खुले दिमाग से सोचने से आप पायेंगे कि ९५ % ब्राह्मण सरल हैं, सज्जन हैं, निर्दोष हैं। आश्चर्य है कि कैसे समय के साथ साथ काल्पनिक कहानियाँ भी सत्य का रूप धारण कर लेती हैं। यह जाने के लिए बहुत अधिक सोचने की आवश्यकता नहीं कि ब्राह्मण-विरोधी यह विचारधारा विधर्मी घुसपैठियों, साम्राज्यवादियों, ईसाई मिशनरियों और बेईमान नेतायों के द्वारा बनाई गयी और आरोपित की गयी, ताकि वे भारत के समाज के टुकड़े टुकड़े करके उसे आराम से लूट सकें।

आइये इतिहास के प्रमाणित सत्य को जानें


सच तो यह है कि इतिहास के किसी भी काल में ब्राह्मण न तो धनवान थे और न ही शक्तिशाली। ब्राह्मण भारत के समुराई नहीं है। वन का प्रत्येक जन्तु मृग का शिकार करना चाहता है, उसे खा जाना चाहता है, और भारत का ब्राह्मण वह मृग है। आज के ब्राह्मण की वह स्थिति है जो कि नाजियों के राज्य में यहूदियों की थी। क्या यह स्थिति स्वीकार्य है? ब्राह्मणों की इस दुर्दशा से किसी को भी सरोकार नहीं, जो राजनीतिक डाल हिन्दू समर्थक माने गए हैं, उन्हें भी नहीं।

मुगल व ब्रिटिश शोषण का दोष ब्राह्मणों के सिर क्यों?

कई शतकों से भारत में या मुसलमानों का और या ईसाइयों का राज्य रहा। ब्राह्मणों का राज्य कभी नहीं रहा। तो फिर भारत में जो कुछ भी अनुचित हुआ उसका दोष ब्राह्मणों के सिर क्यों?

ब्राह्मण सदा से निर्धन वर्ग में रहे हैं! उन्होंने भारत पर कभी राज्य नहीं किया!

क्या आप ऐसा एक भी उदाहरण दे सकते हो जब ब्राह्मणों ने भारत के किसी भी प्रदेश पर शासन किया हो? (चाणक्य ने चन्द्रगुप मौर्या की सहायता की थी एक अखण्ड भारत की स्थापना करने में। भारत का सम्राट बनने के बाद, चन्द्रगुप्त चाणक्य के चरणों में गिर गया और उसने उसे अपना राजगुरु बन कर महलों की सुविधाएँ भोगते हुए, अपने पास बने रहने को कहा। चाणक्य का उत्तर था: ‘मैं तो ब्राह्मण हूँ, मेरा कर्म है शिष्यों को शिक्षा देना और भिक्षा से जीवनयापन करना। अतः मैं अपने गाँव लौट रहा हूँ।’
बहुधा हिंदु देवतायों की जाति ब्राह्मण नहीं


क्या आप किसी भी इतिहास अथवा पुराण में धनवान ब्राह्मण का एक भी उदाहरण बता सकते हैं? किसी पुराण में भी किसी धनी ब्राह्मण का कहीं नाम है? श्री कृष्ण की कथा में भी निर्धन ब्राह्मण सुदामा ही प्रसिद्ध है। संयोगवश, श्रीकृष्ण जोकि भारत के सबसे प्रिय आराध्य देव हैं, यादव-वंश के थे, जो कि आजकल OBC के अंतर्गत आरक्षित जनजाति मानी गयी है।
यदि ब्राह्मण वैसे ही घमंडी थे जैसे कि उन्हें बताया जाता है, तो यह कैसे सम्भव है कि उन्होंने अपने से नीची जातियों के व्यक्तियों को भगवान् की उपाधि दी और उनकी अर्चना पूजा की स्वीकृति भी? देवों के देव महादेव शिव को पुराणों के अनुसार किराट जाती का कहा गया है, जो कि आधुनिक व्यवस्था में ST की श्रेणी में पाए जाते हैं। और जैसा कि ऊपर कहा गया श्रीकृष्ण यादव होने के कारण OBC की श्रेणी में।
निर्धनता ही निरंतर ब्राह्मण के जीवन का भाग रही
दूसरों का शोषण करने के लिए शक्तिशाली स्थान की, अधिकार-सम्पन्न पदवी की आवश्यकता होती है। जबकि ब्राह्मणों का काम रहा है या तो मन्दिरों में पुजारी का और या धार्मिक कार्य में पुरोहित का और या एक वेतनहीन शिक्षक का। उनके धनार्जन का एकमात्र साधन रहा है भिक्षाटन। क्या ये सब बहुत ऊंची पदवियां हैं? इन स्थानों पर रहते हुए वे कैसे दूसरे वर्गों का शोषण करने में समर्थ हो सकते हैं?
एक और शब्द जो हर काठ-कहानी की पुस्तक में पाया जाता है वह है - ‘निर्धन ब्राह्मण' जो कि उनका एक गुण माना गया है। समाज में सबसे मानने स्थान सन्यासी ब्राह्मणों का था, और उनके जीवन यापन का साधन भिक्षा ही थी। (कुछ विक्षेप अवश्य हो सकते हैं, किंतु हम यहाँ साधारण ब्राह्मण की बात कर रहे हैं। ब्राह्मणों से यही अपेक्षा की जाती रही कि वे अपनी जरूरतें कम से कम रखें और अपना जीवन ज्ञान की आराधना में अर्पित करें। इस बारे में एक अमरीकी लेखक आलविन टोफलर ने भी कहा है कि ‘हिंदुत्व में निर्धनता को एक शील मन गया है।’

अपवाद रूप से पाये जाने वाले लोभी ब्राह्मण को सभी ब्राह्मणों का सत्य नहीं माना जा सकता
क्या आप जानते हैं कि ब्राह्मणों में भी पुजारी का व्यवसाय अपनाने वाले मात्र २० % हैं? इनमें से कुछ ऐसे हो सकते हैं जिन्होंने अपने स्थान का लाभ उठाया हो और वे लालची हों, ठीक वैसे ही जैसे अन्य धर्मों में कुछ पादरी और मौलवी गलत इरादे रखते हैं। (आखिर ब्राह्मण भी हैं तो मनुष्य ही, अतः हर स्थिति में हर ब्राह्मण से ईमानदारी की उम्मीद नहीं करी जा सकती, जैसे कि दूसरे पेशे वाले लोगों से। एक भिन्न प्रकार की सामाजिक व्यवस्था के कारण से केरल के नाम्बूदरी ब्राह्मण ही एक ऐसा वर्ग है जो कि धनी रहा ) लेकिन भारत के इतिहास के किसी भी काल में ब्राह्मणों को वह सत्ता नहीं मिली जो कि अन्य धर्म-सम्प्रदायों के नेतायों को मिली।
शिक्षा का अधिकार सभी को समान रूप से प्राप्त था
स्वयम् अंग्रेज़ों के द्वारा भारतीय गुरुकलों के सर्वे के अनुसार, अंग्रेज़ों की दासता से पूर्व भारत के समाज में साक्षरता ताकी तादाद लगभग शत प्रतिशत थी। प्रत्येक गाँव में ब्राह्मणों द्वारा चलाये जा रहे गुरुकुल ही इस साक्षरता का आधार थे। जातिवाद का नामोनिशान उस काल में नहीं था। अब्राह्मण को पढने से किसी ने नहीं रोका। श्रीकृष्ण यादव वंशी थे, उनकी शिक्षा गुरु संदीपनी के आश्रम में हुई, श्रीराम क्षत्रिय थे उनकी शिक्षा पहले ऋषि वशिष्ट के यहाँ और फिर ऋषि विश्वामित्र के पास हुई। बल्कि ब्राह्मण का तो काम ही था सबको शिक्षा प्रदान करना। हां यह अवश्य है कि दिन-रात अध्ययन व अभ्यास के कारण, वे सबसे अधिक ज्ञानी माने गए, और ज्ञानी होने के कारण प्रभावशाली और आदरणीय भी। इसके कारण कुछ अन्य वर्ग उनसे जलने लगे, किंतु इसमें भी उनका क्या दोष?
प्रत्येक जाति के भारतीय विद्वानों के उदाहरण
यदि विद्या केवल ब्राह्मणों की पूंजी रही होती तो वाल्मीकि रामायण कैसे लिखते और तिरुवलुवर तिरुकुरल कैसे लिखते? और अब्राह्मण संतो द्वारा रचित इतना सारा भक्ति-साहित्य कहाँ से आता? जिन ऋषि व्यास ने महाभारत की रचना करी वे भी एक मछुआरन माँ के पुत्र थे। इन सब उदाहरणों से यह स्पष्ट है कि ब्राह्मणों ने कभी भी विद्या देने से मना नहीं किया।
जिनकी शिक्षा हिन्दू धर्म में सर्वोच्च मानी गयी हैं, उनके नाम और जाती यदि देखी जाए, तो वशिष्ट, वाल्मीकि, कृष्णा, राम, बुद्ध, महावीर, तुलसीदास, कबीरदास, विवेकानंद आदि, इनमें कोई भी ब्राह्मण नहीं। तो फिर ब्राह्मणों के ज्ञान और विद्या पर एकाधिकार का प्रश्न ही उत्पन्न नहीं होता! यह केवल एक झूठी भ्रान्ति है जिसे गलत तत्वों ने अपने फायदे के लिए फैलाया, और इतना फैलाया कि सब इसे सत्य मानने लगे।
जिन दो पुस्तकों में वर्ण व्यवस्था का वर्णन आता है उनमें पहली तो है मनुस्मृति जिसके रचियता थे मनु जो कि एक क्षत्रिय थे, और दूसरी है श्रीमदभगवदगीता जिसके रचियता थे व्यास जो कि निम्न वर्ग की मछुयारन के पुत्र थे। यदि इन दोनों ने ब्राह्मण को उच्च स्थान दिया तो केवल उसके ज्ञान एवं शील के कारण, किसी स्वार्थ के कारण नहीं। ब्राह्मणों तो उनकी अहिंसा के लिए प्रसिद्ध हैं। पुरातन काल में जब कभी भी उन पर कोई विपदा आई, उन्होंने शास्त्र नहीं उठाया, क्षत्रियों से सहायता माँगी।

एक सहस्र वर्ष से ब्राह्मणों पर हो रहे अत्याचार व सशस्त्र आक्रमण
बेचारे असहाय ब्राह्मणों को अरब आक्रमणकारियों ने काट डाला, उन्हें गोवा में पुर्तगालियों ने cross पर चढ़ा कर मारा, उन्हें अंग्रेज missionary लोगों ने बदनाम किया, और आज अपने ही भाई-बंधु उनके शील और चरित्र पर कीचड उछल रहे हैं। इस सब पर भी क्या कहीं कोई प्रतिक्रिया दिखाई दी, क्या वे लड़े, क्या उन्होंने आन्दोलन किया?
ओरंगजेब ने बनारस, गंगाघाट और हरिद्वार में १५०,००० ब्राह्मणों और उनके परिवारों की ह्त्या करवाई, उसने हिन्दू ब्राह्मणों और उनके बच्चों के शीश-मुंडो की इतनी ऊंची मीनार खडी करी जो कि दस मील से दिखाई देती थी, उसने उनके जनेयुयों के ढेर लगा कर उनकी आग से अपने हाथ सेके। किसलिए, क्योंकि उन्होंने अपना धर्म छोड़ कर इस्लाम को अपनाने से मना किया। यह सब उसके इतिहास में दर्ज़ है। क्या ब्राह्मणों ने शास्त्र उठाया? फिर भी ओरंगजेब के वंशज हमें भाई मालूम होते हैं और ब्राह्मण देश के दुश्मन? यह कैसा तर्क है, कैसा सत्य है?
कोंकण-गोया में पुर्तगाल के वहशी आक्रमणकारियों ने निर्दयता से लाखों कोंकणी ब्राह्मणों की हत्या कर दी क्योंकि उन्होंने ईसाई धर्म को मानने से इनकार किया। क्या आप एक भी ऐसा उदाहरण दे सकते हो कि किसी कोंकणी ब्राह्मण ने किसी पुर्तगाली की हत्या की? फिर भी पुर्तगाल और अन्य यूरोप के देश हमें सभ्य और अनुकरणीय लगते हैं और ब्राह्मण तुच्छ! यह कैसा सत्य है?
यदि ब्राह्मण न होते तो आज हम हिंदु भी न होते
जब पुर्तगाली भारत आये, तब St, Xavier ने पुर्तगाल के राजा को पत्र लिखा “यदि ये ब्राह्मण न होते तो सारे स्थानीय जंगलियों को हम आसानी से अपने धर्म में परिवर्तित कर सकते थे।” यानिकि ब्राह्मण ही वे वर्ग थे जो कि धर्म परिवर्तन के मार्ग में बलि चढ़े। जिन्होंने ने अपना धर्म छोड़ने की अपेक्षा मर जाना बेहतर समझा। St, Xavier को ब्राह्मणों से असीम घृणा थी, क्योंकि वो उसके रास्ते का काँटा थे, इतनी घृणा कोई चर्च का evangelist ही कर सकता है। वह उन्हें सबसे घटिया लोग कहता था। अब तो आप इसका कारण जान चुके हैं। हजारों की संख्या में गौड़ सारस्वत कोंकणी ब्राह्मण उसके अत्याचारों से तंग हो कर गोवा छोड़ गए, अपना सब कुछ गंवा कर। क्या किसी एक ने भी मुड़ कर वार किया? फिर भी St. Xavier के नाम पर आज भारत के हर नगर में स्कूल और कॉलेज हैं और भारतीय अपने बच्चों को वहां पढ़ाने में गर्व अनुभव करते हैं। और ब्राह्मण देश के लिए घृणित हो गए हैं। यह कैसा तर्क है?
इनके अतिरिक्त कई हज़ार सारस्वत ब्राह्मण काश्मीर और गांधार के प्रदेशों में विदेशी आक्रमणकारियों के हाथों मारे गए। आज ये प्रदेश अफगानिस्तान और पाकिस्तान कहलाते हैं, और वहां एक भी सारस्वत ब्राह्मण नहीं बचा है। क्या कोई एक घटना बता सकते हैं कि इन प्रदेशों में किसी ब्राह्मण ने किसी विदेशी की हत्या की? हत्या की छोडिये, क्या कोई भी हिंसा का काम किया?
काश्मीरी ब्राह्मणों की दुर्गति
  1. और आधुनिक समय में भी इस्लामिक आतंकवादियों ने काश्मीर घाटी के मूल निवासी ब्राह्मणों को विवश करके काश्मीर से बाहर निकाल दिया। ये आतंकवादी पाकिस्तान से तालीम लेकर आये थे। यह काम तब पूरा माना गया जब कि आतंकवाद के हाथों काश्मीर घाटी की ‘सफाई' कर दी गयी। इनके बर्बर अत्याचारों से बचने के लिए ५००,००० काश्मीरी पंडित अपना घर छोड़ कर बेघर हो गए, देश के अन्य भागों में शरणार्थी हो गये, और उनमे से ५०,००० तो आज भी जम्मू और दिल्ली के बहुत ही अल्प सुविधायों वाले अवसनीय तम्बुयों में रह रहे हैं। आतंकियों ने अनगनित ब्राह्मण पुरुषों को मार डाला और उनकी स्त्रियों का शील भंग किया। क्या एक भी पंडित ने शस्त्र उठाया, क्या एक भी आतंकवादी की ह्त्या की? फिर भी आज ब्राह्मण दोष का अधिकारी माना गया है और मुसलमान आतंकवादी वह भटका हुआ इंसान जिसे क्षमा करना हम अपना धर्म समझते हैं। यह कैसा तर्क है? स्वयम् अंबेडकर के शब्दों में लिखी ब्राह्मणों की दुर्दशा
माननीय भीमराव आंबेडकर जो कि भारत के सम्विधान के रचियता थे, उन्होंने एक मुस्लमान इतिहासकार का सन्दर्भ देकर लिखा है कि धर्म के नशे में पहला काम जो पहले अरब घुसपैठिय मोहम्मद बिन कासिम ने किया, वो था ब्राह्मणों का खतना। “किंतु उनके मना करने पर उसने सत्रह वर्ष से अधिक आयु के सभी को मौत के घात उतार दिया।” मुग़ल काल के प्रत्येक घुसपैठ, प्रत्येक आक्रमण और प्रत्येक धर्म-परिवर्तन में लाखों की संख्या में धर्म-प्रेमी ब्राह्मण मार दिए गए। क्या आप एक भी ऐसी घटना बता सकते हो जिसमें किसी ब्राह्मण ने किसी दूसरे सम्प्रदाय के लोगों की हत्या की हो? १९वीं सदी में मेलकोट में दिवाली के दिनटीपू सुलतान की सेना ने चढाई कर दी और वहां के ८०० नागरिकों को मार डाला जो कि अधिकतर मंडयम इयेंगार थे। वे सब संस्कृत के उच्च कोटि के विद्वान थे। (आज तक मेलकोट में दीवाली नहीं मनाई जाती।) इस हत्याकाण्ड के कारण यह नगर एक श्मशाम घात बन गया। उसका शांत और सुंदर वातावरण भंग हो गया। सदियों से चली आ रही पर्यावरण-प्रेमी जीवन प्रणाली समाप्त हो गयी। कलयाणियाँ - जो कि जल भरने का साधन थीं ढा दी गईं, सब तरफ जल की सुविधा समाप्त हो गयी और पहाड़ियाँ सूख गईं। संस्कृत और संस्कृति का एक आवास सदा के लिए नष्ट हो गया। ये अहिंसावादी ब्राह्मण पूर्ण रूप से शाकाहारी थे, और सात्विक भोजन खाते थे जिसके कारण उनकी वृतियां भी सात्विक थीं और वे किसी के प्रति हिंसा के विषय में सोच भी नहीं सकते थे। उन्होंने तो अपना बचाव तक नहीं किया। फिर भी आज इस देश में टीपू सुलतान की मान्यता है। उसकी वीरता के किस्से कहे-सुने जाते हैं। और उन ब्राह्मणों को कोई स्मरण नहीं करता जो धर्म के कारण मौत के मुंह में चुपचाप चले गए। ये कैसा तर्क है?
अब जानते हैं आज के ब्राह्मणों की स्थिति
क्या आप जानते हैं कि बनारस के अधिकाँश रिक्शा वाले ब्राह्मण हैं? क्या आप जानते हैं कि दिल्ली के रेलवे स्टेशन पर आपको ब्राह्मण कुली का कम करते हुए मिलेंगे? दिल्ली में पटेलनगर के क्षेत्र में 50 % रिक्शा वाले ब्राह्मण समुदाय के हैं। आंध्र प्रदेश में ७५ % रसोइये और घर की नौकरानियां ब्राह्मण हैं। इसी प्रकार देश के दुसरे भागों में भी ब्राह्मणों की ऐसी ही दुर्गति है, इसमें कोई शंका नहीं। गरीबी-रेखा से नीचे बसर करने वाले ब्राह्मणों का आंकड़ा ६०% है।
ब्राह्मणों द्वारा सांस्कृतिक पेशे का त्याग व विदेश गमन
हजारों की संख्या में ब्राह्मण बालक अमरीका आदि पाश्चात्य देशों में जाकर बसने लगे हैं क्योंकि उन्हें वहां software engineer या scientist का काम मिल जाता है। सदियों से जिस समुदाय के सदस्य अपनी कुशाग्र बुद्धि के कारण समाज के शिक्षक और शोधकर्ता रहे हैं, उनके लिए आज ये सब कर पाना कोई बड़ी बात नहीं। फिर भारत सरकार को उनके सामर्थ्य की आवश्यकता क्यों नहीं ? क्यों भारत में तीव्र मति की अपेक्षा मंद मति को प्राथमिकता दी जा रही है? और ऐसे में देश का विकास होगा तो कैसे?
सरकारी आँकड़ों के अनुसार ब्राह्मण आज भी निर्धनता


कर्नाटक प्रदेश के सरकारी आंकड़ों के अनुसार वहां के वासियों का आर्थिक चित्रण कुछ ऐसा है: ईसाई भारतीय - १५६२ रू/ वोक्कालिग जन - ९१४ रू/ मुसलमान - ७९४ रू/ पिछड़ी जातियों के जन - ६८० रू/ पिछड़ी जनजातियों के जन - ५७७ रू/ और ब्राह्मण - ५३७ रू।
तमिलनाडु में रंगनाथस्वामी मन्दिर के पुजारी का मासिक वेतन ३०० रू और रोज का एक कटोरी चावल है। जबकि उसी मन्दिर के सरकारी कर्मचारियों का वेतन कम से कम २५०० रू है। ये सब ठोस तथ्य हैं लेकिन इन सब तथ्यों के होते हुए, आम आदमी की यही धरना है कि पुजारी ‘धनवान’ और ‘शोषणकर्ता’ है, क्योंकि देश के बुद्धिजीवी वर्ग ने अनेक वर्षों तक इसी असत्य को अनेक प्रकार से चिल्ला चिल्ला कर सुनाया है।
क्या ब्राह्मणों का यह बहिष्कार संविधान के संगत है?
और इन सब तथ्यों को ताक पर रख कर अगर साम्राजयवादी- ईसाईंवादी-वामपंथी समुदाय की धर्नायों को सत्य मा न भी लिया जाए तो भी क्या समाज के किसी भी समुदाय के साथ ऐसा व्यवहार उचित है जैसा कि ब्राह्मणों के साथ हमारे नेता करते आ रहे हैं? क्या उनके पुरखों के किये हुए कर्मों का दंड हम उनके वंशजों को दे रहे हैं?


इसमें भी कोई संदेह नहीं कि कुछ ब्राह्मणों ने जातिवाद को बढ़ावा दिया और उसका लाभ भी उठाया। उसी प्रकार जिस प्रकार आज के राजनैतिक दल करते है। और यह भी सच है कि कुछ ब्राह्मण समुदाय ऐसे भी हैं जो दुसरे समुदाय के लोगों के साथ मेलजोल और सम्बन्ध जोड़ना पसंद नहीं करते।
इसमें भी कोई संदेह नहीं कि कुछ केवल नाम के ब्राह्मण बिना किसी शिक्षा और ज्ञान के फोके मन्त्र याद करके कर्मकांडी ब्राह्मण बने फिरते हैं और लच्चेरदार बातों से लोगों को बहलाते फुसलाते हैं, धन कमाने के वास्ते। दुकानें खोल कर बैठते ज्योतिष इत्यादि की और जनता को मूर्ख बना कर ठगते है।
मुठ्ठी भर भ्रष्ट ब्राह्मणों का दंड पूरे समुदाय को क्यूं?
किंतु क्या कुछ थोड़े से लोगों की गलतियों की इतनी बड़ी सज़ा न्यायसंगत है? क्या हमने उन विदेशी घुसपैठियों को क्षमा नहीं किया जिन्होंने लाखों-करोड़ों हिंदुयों की हत्या की और देश को हर प्रकार से लूटा? जिनके आने से पूर्व भारत संसार का सबसे धनवान देश था और जिनके आने के बाद आज भारत पिछड़ा हुआ third world country कहलाता है। जब उन्हें क्षमा करना सम्भव है तो अहिंसावादी, ज्ञानमूर्ति, धर्मधारी ब्राह्मणों को क्षमा करने में इतनी देर क्यों? कब तक आप उनसे घृणा करोगे? कब तक उन्हें दोष देते जायोगे? क्या इसका कोई अंत नहीं? इस प्रकार की बदले की भावना ब्राह्मणों के लिए ही क्यों?
ब्राह्मण गुरु थे, उन्हीं से समाज सुशिक्षित सुसंस्कृत होता था
क्या हम भूल गए कि वे ब्राह्मण समुदाय ही था जिसके कारण हमारे देश का बच्चा गुरुकुल में बिना किसी भेदभाव के समान रूप से शिक्षा पाकर एक योग्य नागरिक बनता था? क्या हम भूल गए कि ब्राह्मण ही थे जो ऋषि मुनि कहलाते थे, जिन्होंने विज्ञान को अपनी मुट्ठी में कर रखा था? भारत के स्वर्णिम युग में ब्राह्मण को यथोचित सम्मान दिया जाता था और उसी से सामाज में व्यवस्था भी ठीक रहती थी। सदा से विश्व भर में जिन जिन क्षेत्रों में भारत का नाम सर्वोपरी रहा है और आज भी है वे सब ब्राह्मणों की ही देन हैं, जैसे कि अध्यात्म, योग, प्राणायाम, आयुर्वेद आदि। यदि ब्राह्मण जरा भी स्वार्थी होते तो इन सब पर कमसे कम अपना नाम तो लिखते। इनको पेटंट करवाते, दुनिया में मुफ्त बांटने कि बजाए इन की कीमत वसूलते। वेद-पुराणों के ज्ञान-विज्ञान को अपने मस्तक में धारने वाले व्यक्ति ही ब्राह्मण कहे गए और आज उनके ये सब योगदान भूल कर हम उन्हें दुत्कारने में लगे है।
सत्य को जाने बिन विदेशियों की भ्रांतियाँ पर विश्वास क्यूं?

छत्तीसगढ़ के 200 से ज्यादा इंजीनियरों को ऐसी सजा मिली है कि अब उन्हें हर जगह साफ सफाई दिखाई देने लगी है

डाउनलोड नहीं कराया स्वच्छता एप, 200 इंजीनियरों की कट गई सैलरी



छत्तीसगढ़ के 200 से ज्यादा इंजीनियरों को ऐसी सजा मिली है कि अब उन्हें हर जगह साफ सफाई दिखाई देने लगी है. इन सभी इंजीनियरों का एक माह का वेतन काट कर सरकारी खजाने में जमा किया जाएगा. ये सभी इंजीनियर नगर निगमों और नगर पालिकाओं में पदस्थ है.
दरअसल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वच्छता अभियान को सक्रिय बनाने के लिए प्रभारी इंजीनियरों को राज्य सरकार ने निर्देशित किया था कि वे अपने इलाके की जनता को मोबाइल पर स्वच्छता एप डाउनलोड करवाएं, ताकि स्वच्छता सर्वे 2018 के लिए उनके इलाके के निगम मण्डलों को बेहतर रैंकिंग मिले. लेकिन इंजीनियरों ने इस सरकारी निर्देश को कचरे के डिब्बे में डाल दिया.
इंजीनियरों ने न तो खुद के मोबाइल पर यह एप डाउनलोड किया और न ही जनता को इसके लिए प्रेरित किया. नतीजतन कई इलाके बुरी तरह से पिछड़ गए. ऐसे इलाकों को चिन्हित कर राज्य के नगरीय प्रशासन विभाग ने इंजीनयरों को आड़े हाथों लिया है. उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी किया गया, साथ ही एक माह का वेतन काटने के निर्देश दिए गए हैं. वेतन कांटने के निर्देश के बाद नगरीय प्रशासन विभाग में खलबली मची हुई है.
यह पहला मौका है जब सोशल मीडिया और तकनीकी एप जैसे मामलों को लेकर इंजीनियरों के खिलाफ कार्रवाई की गई है. आमतौर पर इंजीनियरों के खिलाफ निर्माण कार्यों, नक्शा और दूसरे प्रशासनिक कार्यों को लेकर कार्रवाई होती आई है.
नगरीय प्रशासन विभाग के संचालक निरंजन दास के मुताबिक प्रदेश के सभी नगरीय निकाय के इंजीनयरों को स्वच्छता एप डाउनलोड कराने के लिए लक्ष्य दिया गया था. शहरी और ग्रामीण इलाकों दोनों के लिए मोबाइल धारको की संख्या निर्धारित की गई थी. लेकिन कई इंजीनियरों ने इस काम में कोई रूचि नहीं दिखाई और इसी के चलते उनके खिलाफ कार्रवाई की गई है.  

इसका मकसद उत्तर-पश्चिमी प्रांत और अवध में सुगम प्रशासन करना था. अब उस समय के कई कानून अप्रासंगिक हो गए हैं.

योगी सरकार का बड़ा कदम, खत्म हो जाएंगे अंग्रेजों के 1000 पुराने कानून

उत्तर प्रदेश कानूनों में सुधार के मामले में भारत का ऐतिहासिक राज्य बनने जा रहा है. सूबे में बीजेपी की सरकार है और सरकार के मुखिया सीएम योगी आदित्यनाथ ने फैसला किया है कि ब्रिटिश काल के कम से कम 1 हजार कानूनों को खत्म किया जाएगा. इसमें कई कानून 150 साल पुराने हैं. इससे पहले मोदी सरकार, भी 1800 पुराने कानूनों को खत्म कर चुकी है.
यूपी की योगी सरकार ने ऐसे पुराने कानूनों की सूची तैयार की है और इन्हें हटाने के लिए आगामी बजट सत्र में एक बिल लाया जाएगा. यूपी के कानून मंत्री बृजेश पाठक ने कहा है कि इन पुराने कानूनों को हटाने का समय आ गया है.
उन्होंने कहा कि आज हमारे पास कई ऐसे नए कानून हैं, जिनके अस्तित्व में आने के बाद से ब्रिटिश काल के कई कानून अपनी प्रासंगिकता खो चुके हैं. इसलिए इन्हें हटाया जा रहा है.
यूपी सरकार के कानून मंत्रालय ने ब्रिटिश काल के इन पुराने कानूनों की सूची तैयार कर ली है.  यूपी सरकार के कानून मंत्रालय ने इस प्रस्ताव में लिखा है कि ब्रिटिश गवर्नर जनरल-इन-काउंसिल द्वारा 16 अक्टूबर 1890 को 'संयुक्त प्रांत अधिनियम 1890' पारित किया गया था. इसका मकसद उत्तर-पश्चिमी प्रांत और अवध में सुगम प्रशासन करना था. अब उस समय के कई कानून अप्रासंगिक हो गए हैं.
आपको बता दें कि यूपी सरकार ने एक हफ्ते पहले ही अपना पहला और राज्य का 68वां यूपी दिवस मनाया है. दिसंबर में लोकसभा ने भी दो बिल पारित किए थे, जिनमें 245 पुराने कानूनों को हटाया गया. इनमें 1911 का राजद्रोही बैठक रोकने का कानून भी शामिल था.
केंद्रीय कानून मंत्री रवि शंकर प्रसाद ने कहा था कि मोदी सरकार आने के बाद से 1,800 से ज्यादा पुराने कानूनों को समाप्त किया जा चुका है. इससे पहले 1950 में भी संसद ने 1029 पुराने कानूनों को हटाया था. 

Tuesday, 30 January 2018

वन्देमातरम को चुनौती दूंगा सुप्रीम कोर्ट में और इसको बदलवा कर बनवाऊंगा कोई दूसरा राष्ट्रगीत- मौलाना तौकीर वहीँ भारत के उस राष्ट्रगीत जिसे गाते हुए अनंत बलिदानी फांसी के फंदे पर झूले और सीने पर गोली खाई

वन्देमातरम को चुनौती दूंगा सुप्रीम कोर्ट में और इसको बदलवा कर बनवाऊंगा कोई दूसरा राष्ट्रगीत- मौलाना तौकीर
जहाँ तिरंगा की रैली पर हमला कर के उसमे भगवा अदि जोड़ कर उसको साम्प्रदायिक घोषित करने की पुरजोर कोशिश की जाती है वहीँ भारत के उस राष्ट्रगीत जिसे गाते हुए अनंत बलिदानी फांसी के फंदे पर झूले और सीने पर गोली खाई, उसी राष्ट्रगीत के खिलाफ कोई सीधे सीधे  सुप्रीम कोर्ट जा कर बदलवाने की बात करता है और उसकी इस बात को भाईचारे के रूप में लिया जाता है . ये बेहद अक्षम्य और अपराधिक बयान है बरेली के बेहद बेशर्मी वाले बयानों के लिए कुख्यात इत्तेहादे मिल्लत काउंसिल के अध्यक्ष मौलाना तौकीर रजा खां ने. सबसे पहले तो उन्होंने उत्तर प्रदेश सरकार को चुनौती देते हुए  कहा कि कितनी भी पाबंदी पुलिस की क्यों न हो, वो कासगंज जरूर जायेगे साथ ही धमकी देते हुए कहा कि जो रोक सके वो रोक ले. उन्होंने बरेली के हिन्दू विरोधी बयान देने वाले DM की शान में बड़ी देर तक कसीदे भी पढ़े . 

उत्तर प्रदेश सरकार को चुनौती देते हुए वो धीरे धीरे भारत की राष्ट्रीय अस्मिता के प्रतीक राष्ट्रगीत वन्देमातरम पर भी आ गये और इसको किसी भी हाल में न स्वीकार करने की खुली चेतावनी देते हुए यहाँ तक कह डाला कि वो जल्द ही सुप्रीम कोर्ट में वन्देमातरम के खिलाफ याचिका दाखिल करेंगे और इसको बदलवा कर कोई दूसरा 

राष्ट्रगीत करवा कर ही दम लेंगे . भारत के राष्ट्रगीत का ऐसा विरोध करने पर भी तथाकथित सेकुलर वर्ग और तथाकथित सेकुलर मीडिया का बड़ा वर्ग भी चुप्पी साध कर बैठा है . इस मामले में कल तक परम ज्ञानी बन रहे जिलाधिकारी बरेली महोदय भी खामोश हैं जिस से कहीं न कहीं प्रतीत होता है कि उनका कोई न कोई मूक समर्थन इस बेहद आपत्तिजनक और राष्ट्रविरोधी बयान में है . उन्होंने कासगंज मामले में दोषियों को सजा दिलाने की मांग उठाई है, साथ ही उन्होंने वंदे मातरम को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक रिट याचिका दायर करने की बात कही है। उन्होंने कहा कि वंदे मातरम में बदलाव कर फिर से नया राष्ट्रीय गीत बनाया जाए।

खामोश है और हिन्दू दलों के छोटे छोटे बयानों को भी ब्रेकिंग बनाने वाले तमाम अन्य भी निष्क्रिय अवस्था में दिख रहे हैं .

17 करोड़ हो गये हैं हम, अब नया देश लेने का समय आ गया है. इतने ही थे जब पाकिस्तान लिया था - नासिर मुफ़्ती

जहाँ एकतरफ बरेली के जिलाधिकारी जैसे तमाम तथाकथित धर्मनिरपेक्ष लोग मुस्लिमों को अपना डीएनए एक बता कर हिंसा और नफरत के लिए हिन्दुओं को और हिन्दू संगठनों को ही दोषी बना और ठहरा रहे हैं वहीँ दूसरी तरह कश्मीर के नासिर मुफ़्ती जैसे जेहादी और घोर राष्ट्रद्रोही लोग उन तमाम लोगों की सभी चिकनी चुपड़ी बातों पर  पानी फेर रहे हैं और धर्मनिरपेक्षता के सभी सिद्धांतो को ध्वस्त करते जा रहे हैं . ज्ञात हो कि कश्मीर का एक बड़ा मज़हबी नाम जो राष्ट्र के खिलाफ , सेना के खिलाफ और राष्ट्र की सरकार के खिलाफ न सिर्फ जहर उगलने के लिए बदनाम था अपितु दुर्दांत आतंकियों की खुली पैरवी के लिए भी जाना जाता था,जिसका नाम नासिर मुफ़  अब उसी नसिर मुफ़्ती ने दिल्ली में बैठे अपने संरक्षकों के दम पर दे डाला है अब तक का सबसे बड़ा और बेहद ही घोर राष्ट्र विरोधी बयान..नासिर मुफ़्ती ने साफ साफ़ कहा है कि अब हम अर्थात मुसलमानों की आबादी 17 करोड़ के पार हो चुकी है और ये समय है एक नया देश मांगने की . नासिर मुफ़्ती ने इतिहास में की गयी गद्दारी को याद दिलाते हुए बताया कि जब मुसलमानों ने भारत को बंटवा कर पाकिस्तान बनवाया था तब भी आबादी 17 करोड़ थी इसलिए मुस्लिम आबादी के लिए   बेहतर समय है कि वो अपने लिए एक नया देश ले लें .... नासिर मुफ़्ती के इस बयान के बाद उन तमाम तथाकथित नकली धर्मनिरपेक्ष समाज को सच का आईना देखने को मिला है जिन्होंने भारत के बंटवारे का बेहद आधारहीन आरोप हिन्दूवादी सोच पर अब तक थोपने का कुत्सित प्रयास किया था . नासिर मुफ़्ती के इस बयान के बाद एक बार फिर  से धर्मनिरपेक्ष धडा पूरी तरह से खामोश है और हिन्दू दलों के छोटे छोटे बयानों को भी ब्रेकिंग बनाने वाले तमाम अन्य भी निष्क्रिय अवस्था में दिख रहे हैं .

Monday, 29 January 2018

आयुर्वेद कहता है। किस धातु में हम खाना खा रहे हैं, उसका हमारी सेहत पर खास असर होता है।

किस धातु के बर्तन में भोजन करने से सेहत पर कैसा असर होता है, जानिए



भोजन
हम क्या खाते हैं इसका प्रभाव हमारे स्वास्थ्य पर अवश्य पड़ता है, लेकिन हम किस प्रकार के बर्तन में भोजन कर रहे हैं, इसका भी असर हमारे स्वास्थ्य एवं स्वभाव दोनों पर देखने को मिलता है।
भोजन
ऐसा हम नहीं, आयुर्वेद कहता है। किस धातु में हम खाना खा रहे हैं, उसका हमारी सेहत पर खास असर होता है। तो चलिए आपको एक-एक करके बताते हैं कि सोना, चांदी, स्टील, मिट्टी... किस प्रकार के बर्तन में खाना खाने से सेहत और स्वभाव पर कैसा असर होता है।
सोना
आयुर्वेद के अनुसार सोना एक गर्म धातु है। इससे बने पात्र में भोजन बनाने और करने से शरीर के आन्तरिक और बाहरी दोनों हिस्से कठोर, बलवान, ताकतवर और मजबूत बनते हैं। सोने से बने बर्तन में भोजन करना आंखों के लिए भी लाभदायक है, यह आंखों की रोशनी बढ़ाता है।
चांदी
सोने से विपरीत, चांदी एक ठंडी धातु है। अगर इस धातु से बने पात्र में आप भोजन कर रहे हैं, तो यह आपके शरीर को आंतरिक ठंडक पहुंचाती है। शरीर को शांत रखती है इसके पात्र में भोजन बनाने और करने से दिमाग तेज होता है। चांदी भी आंखों के लिए फायदेमंद है। इसके अलावा पित्तदोष, कफ और वायुदोष को नियंत्रित करता है चांदी के बर्तन में भोजन करना।
कांसा
अगर आप कांसे के बर्तन में भोजन कर रहे हैं, तो आपको बता दें कि भोजन करने के लिए इससे अच्छी धातु कोई नहीं है। क्योंकि यह आपको एक नहीं, बल्कि अनेक फायदे देता है।
कांसे
कांसे के बर्तन में खाना खाने से बुद्धि तेज होती है, रक्त में शुद्धता आती है, रक्तपित शांत रहता है और भूख भी बढ़ती है। लेकिन एक बात का ध्यान रखें, कांसे के बर्तन में खट्टी चीजें नहीं परोसनी चाहिए। क्योंकि खट्टी चीजें इस धातु से क्रिया करके विषैली हो जाती हैं, जो नुकसान देती है।
तांबा
तांबे के संदर्भ में एक बात तो सभी जानते हैं, कि इस धातु से बने बर्तन में रखा पानी पीने से व्यक्ति रोग मुक्त बनता है। ऐसा पानी पीने से रक्त शुद्ध होता है, स्मरण-शक्ति अच्छी होती है, लीवर संबंधी समस्या दूर होती है।
तांबा
यह पानी शरीर के विषैले तत्वों को खत्म कर देता है, जो कि अपने आप ही मोटापा कम करने में सहायक सिद्ध होता है। लेकिन केवल पानी ही नहीं, इस प्रकार के बर्तन में भोजन करना भी फायदेमंद है। यह बर्तन भोजन के पौष्टिक गुणों को बनाए रखता है। लेकिन तांबे के बर्तन में भूल से भी दूध नहीं पीना चाहिए। आयुर्वेद के अनुसार ऐसा करने से शरीर को नुकसान होता है।
पीतल
पीतल के बर्तन में भोजन पकाने और करने से कृमि रोग, कफ और वायुदोष की बीमारी नहीं होती। पीतल के बर्तन में खाना बनाने से केवल 7 प्रतिशत पोषक तत्व नष्ट होते हैं।
लोहा
लोहा यानि आयरन... इसमें भोजन करेंगे तो शरीर को ढेर सारा आयरन मिलेगा, जो कि भरपूर ऊर्जा पाने के लिए बेहद जरूरी है। लोहे के बर्तन में बने भोजन खाने से शरीर की शक्ति बढ़ती है। लौह तत्व शरीर में जरूरी पोषक तत्वों को बढ़ाता है।
लोहा
इसके अलावा लोहा कई रोगों को भी खत्म करता है। यह शरीर में सूजन और पीलापन नहीं आने देता, कामला रोग को खत्म करता है, और पीलिया रोग को भी दूर रखता है। लेकिन लोहे के बर्तन में खाना नहीं खाना चाहिए क्योंकि इसमें खाना खाने से बुद्धि कम होती है और दिमाग का नाश होता है। लोहे के पात्र में दूध पीना अच्छा होता है।
स्टील
अब यह एक ऐसी धातु है, जो अमूमन सभी घरों में बर्तन के रूप में पाई जाती है। आजकल मार्केट में बर्तन के नाम पर सबसे अधिक स्टील ही पाया जाता है। स्टील के संदर्भ में सब यह कहते हैं कि इस तरह के पात्र में भोजन करना नुकसानदेह होता है, लेकिन यह सच नहीं है।
स्टील
स्टील के बर्तन नुकसान दायक नहीं होते क्योंकि ये ना ही गर्म से क्रिया करते हैं और ना ही ठंडे से। इसलिए ये किसी भी रूप में हानि नहीं पहुंचाते। लेकिन यह भी सच है कि इसमें खाना बनाने और खाने से शरीर को कोई फायदा नहीं पहुंचता, किंतु कोई नुकसान भी नहीं पहुंचता।
एल्यूमिनियम
बर्तनों की श्रेणी में एल्यूमिनियम भी काफी प्रसिद्ध है। आज भी कई घरों में इस धातु के बर्तन मिल जाते हैं। एल्यूमिनियम बॉक्साइट का बना होता है, इसमें बने खाने से शरीर को सिर्फ नुकसान होता है।
एल्यूमिनियम
आयुर्वेद के अनुसार यह आयरन और कैल्शियम को सोखता है, इसलिए इससे बने पात्र का उपयोग नहीं करना चाहिए।
एल्यूमिनियम
एल्यूमिनियम से बने पात्र में भोजन करने से इससे हड्डियां कमजोर होती हैं, मानसिक बीमारियां होती हैं, लीवर और नर्वस सिस्टम को क्षति पहुंचती है। उसके साथ साथ किडनी फेल होना, टी बी, अस्थमा, दमा, बात रोग, शुगर जैसी गंभीर बीमारियां होती हैं।
एल्यूमिनियम
एल्यूमिनियम के नाम पर लोगों के घरों में प्रेशर कुकर आसानी से मिल जाता है। लेकिन बता दें कि एल्यूमिनियम के प्रेशर कुकर से खाना बनाने से 87 प्रतिशत पोषक तत्व खत्म हो जाते हैं। तो यह बात साफ है कि इस बर्तन का प्रयोग बंद कर देना चाहिए।
मिट्टी
उपरोक्त बताए गए जितने भी बर्तन हमने बताए, उसमें से यदि सबसे पहले किसी बर्तन को चुनने की हम सलाह देंगे, तो वह है मिट्टी के बर्तन। जी हां... यही एकमात्र ऐसा पात्र है जिसमें भोजन करने से 1 प्रतिशत भी नुकसान नहीं होता। केवल फायदे ही फायदे मिलते हैं।
मिट्टी
आपको बता दें कि मिट्टी के बर्तनों में खाना पकाने से ऐसे पोषक तत्व मिलते हैं, जो हर बीमारी को शरीर से दूर रखते थे। इस बात को अब आधुनिक विज्ञान भी साबित कर चुका है कि मिट्टी के बर्तनों में खाना बनाने से शरीर के कई तरह के रोग ठीक होते हैं।
मिट्टी
आयुर्वेद के अनुसार, अगर भोजन को पौष्टिक और स्वादिष्ट बनाना है तो उसे धीरे-धीरे ही पकना चाहिए। भले ही मिट्टी के बर्तनों में खाना बनने में वक़्त थोड़ा ज्यादा लगता है, लेकिन इससे सेहत को पूरा लाभ मिलता ह
मिट्टी
दूध और दूध से बने उत्पादों के लिए सबसे उपयुक्त है मिट्टी के बर्तन। मिट्टी के बर्तन में खाना बनाने से पूरे 100 प्रतिशत पोषक तत्व मिलते हैं। और यदि मिट्टी के बर्तन में खाना खाया जाए तो उसका अलग से स्वाद भी आता है।

सिद्धारमैया सरकार अल्पसंख्यकों, किसानों और प्रो-कन्नड़ समर्थकों के खिलाफ दंगों के दौरान दायर पुराने आपराधिक केस वापस लेने की तैयारी कर रही है.

अल्पसंख्यकों-किसानों से केस वापस लेंगे सिद्धारमैया!


कर्नाटक में चुनावी बिसात बिछ चुकी है. कांग्रेस और बीजेपी के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर भी शुरू हो गया है. अब बीजेपी ने कर्नाटक के मुख्यमंत्री के. सिद्धारमैया को अल्पसंख्यकों के खिलाफ दर्ज केस वापस लेने को मुद्दा बनाया है. बीजेपी ने सीधे तौर पर सीएम सिद्धारमैया को हिंदू विरोधी बताया है.
दरअसल, कर्नाटक की सिद्धारमैया सरकार अल्पसंख्यकों, किसानों और प्रो-कन्नड़ समर्थकों के खिलाफ दंगों के दौरान दायर पुराने आपराधिक केस वापस लेने की तैयारी कर रही है.
कांग्रेस की कर्नाटक सरकार ने इस संबंध में पुलिस को सर्कुलर जारी कर जानकारी मांगी है. सर्कुलर में ऐसे केस की डिटेल्स मांगी गई है. गुरुवार को भेजे गए इस सर्कुलर से पहले पिछले दो महीने में सिद्धारमैया सरकार तीन बार ऐसा सर्कुलर पुलिस विभाग को भेज चुकी है.
कांग्रेस सरकार के इस कदम को कर्नाटक बीजेपी ने बड़ा मुद्दा बनाया है. पार्टी ने आरोप लगाया है कि सिद्धारमैया सरकार दंगा फैलाने वाले लोगों के खिलाफ दर्ज केस वापस ले रही है. बीजेपी ने सिद्धारमैया पर हिंदुओं के खिलाफ काम करने का भी आरोप लगाया.
बीजेपी ने आरोप लगाया है कि पिछले पांच साल में अल्पसंख्यक समुदाय के जो रेडिकल लोग पिछले 5 सालों में सांप्रदायिक फसाद में शामिल रहे, कांग्रेस उनके केस वापस ले रही है. पार्टी ने ये भी दावा किया कि सिद्धारमैया ने 2015 में पीएफआई के खिलाफ दर्ज 175 से ज्यादा केस वापस कराए हैं.
हालांकि, सीएम सिद्धारमैया ने सफाई देते हुए कहा कि दंगों के दौरान दर्ज हुए ऐसे केस सिर्फ अल्पसंख्यकों के नहीं, बल्कि किसानों और कन्नड़ समर्थकों के केस वापसी पर भी जानकारी मांगी गई है.
इससे पहले 25 जनवरी को मैसूर में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने राज्य की सिद्धारमैया सरकार को भ्रष्ट और दमनकारी बताया. शाह ने यहां पार्टी की एक रैली को संबोधित करते हुए कांग्रेस पर आपातकाल की तरह ही व्यवहार करने का आरोप लगाया.
शाह ने बीजेपी-आरएसएस कार्यकर्ताओं की हत्या का मुद्दा भी उठाया. उन्होंने कहा कि चार साल में बीजेपी और आरएसएस के 20 से अधिक कार्यकर्ता मारे गए हैं. कर्नाटक ने इस संबंध में एक वीडियो भी जारी किया है और राहुल गांधी से कर्नाटक आने के पहले हत्याओं पर जवाब मांगा है.
बता दें कि कर्नाटक में इसी साल मई में चुनाव प्रस्तावित हैं. ऐसे में दोनों पार्टियां बयानबाजी के साथ हर मुमकिन हथकंडे अपनाने में लगी हैं. दोनों प्रमुख राष्ट्रीय दलों के मुख्य नेता भी राज्य के दौरे कर रहे हैं. अगले महीने की शुरुआत में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी कर्नाटक में चुनावी हुंकार भरने जा रहे हैं.

इसके बाद पार्टी में आंतरिक फूट और दोफाड़ के बाद चुनाव आयोग ने कांग्रेस को 'एक गाय और उसके दूध पीते बछड़े' का चुनाव निशान दिया.

कांग्रेस से 'पंजा' छीनने के लिए चुनाव आयोग पहुंचे BJP नेता, दिया ये तर्क


बीजेपी नेता अश्विनी उपाध्याय ने चुनाव आयोग से कांग्रेस के चुनाव निशान को बदलने की अपील की है. बीजेपी नेता का तर्क है कि किसी भी पार्टी को इंसानी शरीर के किसी अंग को अपना चुनाव निशान बनाने की इजाजत नहीं मिलनी चाहिए.
उन्होंने कहा है कि चुनाव आयोग ने पहले कांग्रेस को 'बैलों की जोड़ी और उनके कंधे पर रखा संबंधक (योक)' का निशान दिया था. उन्होंने कहा है कि इस चुनाव निशान के साथ कांग्रेस ने चार आम चुनावों में हिस्सा लिया था.
इसके बाद पार्टी में आंतरिक फूट और दोफाड़ के बाद चुनाव आयोग ने कांग्रेस को 'एक गाय और उसके दूध पीते बछड़े' का चुनाव निशान दिया.
पार्टी में एक और विभाजन होने के बाद चुनाव आयोग ने 'हथेली' या 'हाथ का पंजा' का चुनाव निशान कांग्रेस को दिया. उन्होंने कहा है कि छह राष्ट्रीय पार्टियों में से केवल एक को ही इंसानी शरीर के अंग का निशान दिया गया है. उन्होंने कहा है कि 75 राज्य स्तरीय दलों में से भी किसी को इंसानी शरीर का कोई अंग चुनावी निशान के तौर पर नहीं दिया गया है.
उन्होंने कहा है कि आचार संहिता साफ तौर पर कहती है कि मतदान की तारीख से 48 घंटे पहले चुनाव प्रचार समाप्त हो जाएगा. चुनाव के दिन भी मतदान स्थल के 100 मीटर के पास चुनाव निशान नहीं दिखाया जा सकता है, लेकिन कांग्रेसी उम्मीदवार अपनी हथेली दिखाकर अपने चुनाव निशान का प्रचार करते हैं.
उन्होंने ऐसी घटनाओं का भी हवाला दिया है, जब चुनाव अधिकारी से कांग्रेसी उम्मीवारों और एजेंटों की इस हरकत की शिकायत की गई थी. अश्विनी का कहना है कि चुनाव अधिकारी ने असमर्थता जताई थी कि वह किसी को अपना हाथ दिखाने से नहीं रोक सकते हैं. उन्होंने कहा है कि 2007 में एमसीडी के चुनाव में दिल्ली के तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष रामबाबू शर्मा को इसी आधार पर चुनाव आयोग ने नोटिस जारी किया था और बाद में चेतावनी देकर छोड़ दिया था.
बीजेपी नेता अश्विनी का कहना है कि चुनाव के दिन भी कांग्रेसी उम्मीदवार और एजेंट हाथ हिलाकर अपने चुनाव निशान का प्रदर्शन करते हैं और वोट की अपील करते हैं. उन्होंने कहा है कि ऐसा कांग्रेस को विशिष्ट चुनाव निशान मिलने की वजह से हुआ है. उन्होंने कहा है कि इसे रोकने के लिए चुनाव आयोग को कांग्रेस का निशान बदलना चाहिए और हाथ के पंजे या हथेली को चुनाव निशानों की अपनी सूची से भी हटा लेना चाहिए.
बीजेपी नेता ने कहा है कि अगर कांग्रेस के चुनाव निशान - हाथ के पंजे को नहीं बदला जाता है तो इससे संविधान के अनुच्छेद 324 और रिप्रजेंटेशन ऑफ पीपल्स एक्ट 1951 की धारा 130 के अनुसार स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने का उल्लंघन होता रहेगा.

सुदर्शन न्यूज़ की विशेष रूप से चलाई गयी खबर के बाद जनमानस की भारी मांग के चलते भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बागपत जिले में उस जगह पर खुदाई करवाने को सहमत हो गया है

सुदर्शन न्यूज़ की खबर का सार्थक असर . बागपत स्थित महाभारत कालीन लाक्षागृह की जांच करेगा ASI
जिस खबर को सुदर्शन न्यूज़ ने बेहद प्रमुखता से उठाया और चलाया भी आख़िरकार उस पर अब सरकार की भी नीद खुली है और बेहद महत्वपूर्ण और पौराणिक स्थल जो उपेक्षा का शिकार एक लम्बे समय से था , पर अब जांच कर के उसकी असलियत दुनिया के आगे लाएगी जिस से समाज अपने गौरवशाली पूर्वजों के उस पावन इतिहास को सच्चे रूपों में  जान सके जो हमारी अमूल्य धरोहर ही और नकली व् झोलाछाप इतिहासकारों की साजिश के चलते लुप्त होने की कगार पर आ चुकी थी . विदित हो कि सुदर्शन न्यूज़ की विशेष रूप से चलाई गयी खबर के बाद जनमानस की भारी मांग के चलते भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बागपत जिले में उस जगह पर खुदाई करवाने को सहमत हो गया है जहां के बारे में स्थानीय इतिहासकारों और लोगों का मानना है कि यहां पर महाभारतयुगीन 'लक्षगृह' के अवशेष मौजूद हैं. इस 'लक्षगृह' से बचने के लिए पांडवों ने एक सुरंग का प्रयोग किया था. एएसआई खुदाई के लिए अब वहां कैंप लगाकर खुदाई शुरू करने जा रहा है. भारत की सांस्कृतिक विरासत के के संयोजन में सुदर्शन के अथक प्रयासों को मिला ये एक बड़ा मुकाम है .एएसआई के 2 अथॉरिटीज, नई दिल्ली स्थित रेड फोर्ट के इंस्टीट्यूट ऑफ ऑर्कियोलॉजी और एएसआई की खुदाई टीम बागपत में एक कैंप लगाने जा रही है. एएसआई (खुदाई) के निदेशक जीतेंद्र नाथ ने कहा, "2 एएसआई अथॉरिटीज संयुक्त रूप से खुदाई का काम करेंगे और उन्हें पूरे मामले में अध्ययन करने का लाइसेंस भी दिया गया है.खुदाई  का कार्य 3 महीने तक चल सकता है, और उसकी प्रगति के आधार पर यह समय बढ़ाया जा सकता है. इंस्टीट्यूट के छात्र भी पूरी प्रक्रिया में शामिल रहेंगे. 2014 में बागपत के चंदायन गांव में तांबे से बना क्राउन पहने एक मानवीय कंकाल की खोज करने वाले बारुत स्थित शहजाद राय रिसर्च इंस्टीट्यूट के निदेशक अमित राय का का कहना है कि क्षेत्र में महाभारत युगीन की कुछ पेंटेड चीजें मिली हैं. जो चीजें मिली हैं वो 4,000 से 4,500 साल पुरानी हैं." 

Sunday, 28 January 2018

सभी अपनाएं ये गुण विदुर द्वारा एक बुद्धिमान पुरुष के स्वभाव और गुणों को व्यक्त करने वाले इन संकेतों को यदि आज का पुरुष भी अपना ले, तो उसे आज के फास्ट जमाने में भी सफल होने से कोई नहीं रोक सकता।

विदुर नीति: एक बुद्धिमान पुरुष की पहचान कराते हैं ये 12 संकेत
महाभारत ग्रंथ की बातें
महाभारत’ एक महान धार्मिक ग्रंथ है। कलियुग का मनुष्य इस ग्रंथ को करीब से जानकर, जीवन की कई बातें सीख सकता है। जीवन में सफलता कैसे पाएं, किस तरह से अपने दुश्मन की पहचान करें, आपके पास बैठा व्यक्ति आपका शुभचिंतक है या आपको हानि पहुंचाएगा, ऐसी कई बातों को जानने-पहचानने की सीख देता है महाभारत ग्रंथ।

महाभारत ग्रंथ की बातें 
यह सीख हमें इस ग्रंथ में उल्लिखित कथाओं के माध्यम से प्राप्त होती है। महाभारत की हर कहानी में एक खास संदेश है, जो जीवन के किसी ना किसी पहलू को समझा जाता है। लेकिन इन कहानियों का हिस्सा रहे पात्र भी हमें कुछ संदेश देते हैं।
महाभारत ग्रंथ की कहानी
महाभारत ग्रंथ कई सारे पात्रों को मिलाकर बना है। भीष्म पितामह, सत्यवती, राजा पाण्डु, धृतराष्ट्र, पांच पाण्डव, 100 कौरव, द्रौपदी, श्रीकृष्ण, ऐसे ही कई पात्र हैं इस महान ग्रंथ में। सभी जानते हैं कि महाभारत की कहानी गंगा पुत्र देवव्रत (भीष्म) की ‘विवाह ना करने’ की प्रतिज्ञा से हुई, जिसके बाद ही राजा शांतनु का विवाह सत्यवती से हुआ।

महाभारत ग्रंथ की कहानी 
विवाह के बाद सत्यवती के चित्रांगद और विचित्रवीर्य नामक दो पुत्र हुए। दोनों पुत्रों ने बाल्यकाल में ही अपने पिता को खो दिया, जिसके कारणवश भीष्म ने ही उनका पालन-पोषण किया। बड़े होने पर भीष्म द्वारा चित्रांगद को राज्य की गद्दी पर बैठाया गया, किंतु एक युद्ध में मारे जाने के बाद वह गद्दी विचित्रवीर्य को सौंपी गई।

महाभारत ग्रंथ की कहानी
विचित्रवीर्य का विवाह दो कन्याओं अम्बिका और अम्बालिका से किया गया, किंतु दोनों ही संतान प्राप्ति हुए बिना क्षय रोग से पीड़ित होकर मृत्यु को प्राप्त हुए। अब राज्य का अगला दावेदार कौन होगा, इसका हल निकालने के लिए महारानी सत्यवती ने ‘नियोग प्रथा’ का सहारा लिया।
महाभारत ग्रंथ की कहानी 
जिसकी मदद से धृतराष्ट्र, पाण्डु और विदुर का जन्म हुआ। विदुर का जन्म एक दासी द्वारा हुआ, इसलिए उन्हें राज्य की गद्दी का हक़ मिलना नामुमकिन माना गया। किंतु अपनी सूझबूझ के कारण वे राजा के प्रधानमंत्री जरूर बन गए।
विदुर का जन्म
कहा जाता है कि तीनों पुत्रों में से विदुर ही सबसे अधिक बुद्धिमान थे। उनमें हर तरह का गुण था। कहते हैं कि पांडव-कौरवों के बीच छिड़ने वाले युद्ध के संकेत वर्षों पहले ही विदुर द्वारा दे दिए गए थे। उन्होंने कुछ ऐसे संकेतों की बात की थी, जो राज्य के बुरे काल के बारे में बताते थे। इन्हीं संकेतों को समाहित कर ‘विदुर नीति’ ग्रंथ का जन्म हुआ।

विदुर नीति
इस महान ग्रंथ में विदुर द्वारा जीवन, मृत्यु, खुशी, दुख, युद्ध, इत्यादि विषयों से जुड़े कुछ संकेत प्रस्तुत किए गए हैं। कहते हैं इन सभी विषयों की व्याख्या विदुर द्वारा धृतराष्ट्र को की गई थी।
विदुर नीति
विदुर ने धृतराष्ट्र को एक बुद्धिमान और सूझबूझ वाले ‘पुरुष’ के बारे में 11 संकेत दिए। एक बुद्धिमान पुरुष में क्या गुण होते हैं, उसका स्वभाव और वह ऐसा क्या करता है जो उसे अन्य पुरुषों से अलग बनाता है, इसके कुछ संकेत विदुर द्वारा धृतराष्ट्र को दिए गए थे।

विदुर नीति के अनुसार बुद्धिमान व्यक्ति 
विदुर के अनुसार वह पुरुष जिसमें खास प्रकार के 11 गुण होते हैं, वही होता है बुद्धिमान पुरुष। ऐसा पुरुष ही राज्य का कार्यभार संभालने के लायक होता है। ऐसा पुरुष ही सही राजा कहलाता है।
विदुर नीति के अनुसार बुद्धिमान व्यक्ति 11
विदुर द्वारा दिए गए ये 11 संकेत आज के कलियुग पर भी लागू होते हैं। यदि आज का पुरुष भी विदुर द्वारा बताए गए इन गुणों को अपना ले, तो वह भी समाज में उत्तम पद ग्रहण कर सकता है। उसे सफल बनने से कोई नहीं रोक सकता।
1 गुण
विदुर के अनुसार वह पहली आदत या गुण जो एक पुरुष को बुद्धिमान बनाती है, वह है उसमें ‘मेहनती होने का गुण’। यदि व्यक्ति मेहनती है तभी जीवन में सफल बन सकता है। अपने कार्य के प्रति ढीलापन दिखाने वाला व्यक्ति जीवन में कभी सफल नहीं हो सकता।
2 गुण
बुद्धिमानी का दूसरा गुण जो विदुर द्वारा बताया गया वह है पुरुष का अपने आने वाले भविष्य के प्रति निष्ठावान होना। धूप, बारिश, तूफान कुछ भी आए, लेकिन अगर व्यक्ति का काम इन कारणों से नहीं रुक रहा है तो वही है एक सफल इंसान।
3 गुण
हर बात को झट से समझ जाना और दूसरों के समझने से पहले उसका प्रयोग भी कर लेना, यह एक बुद्धिमान व्यक्ति की तीसरी निशानी है।
4 गुण
जिस व्यक्ति में अपने कार्य के प्रति आदर हो, लेकिन उसे लेकर कोई घमंड ना हो वही है अच्छा और बुद्धिमान इंसान। ऐसे व्यक्ति को अगर उसके कार्य के लिए सराहना भी मिले, तब भी वह घमंड नहीं करता।
5 गुण
वह व्यक्ति जो अच्छे कर्म करता है, किसी का बुरा नहीं सोचता, पाप नहीं करता, विदुर के अनुसार वही है बुद्धिमान पुरुष।
6 गुण
अपनी बुद्धि के बल पर जो शिक्षा प्राप्त करे, अपनी शिक्षा के बल पर जो बुद्धिमान बने वही है बुद्धिमान पुरुष। जो अपनों से बड़ों का आदर और छोटों का सम्मान करे, वही है बुद्धिमान पुरुष।
7 गुण
जीवन में खुशी, ग़म, सफलता, असफलता, सभी लगा रहता है, लेकिन जो व्यक्ति हर परिस्थिति में अपने मार्ग पर डटा रहे, वही है बुद्धिमान पुरुष।
8 गुण
जो जीत के लिए संघर्ष करे लेकिन हार को भी स्वीकार करे, वह है बुद्धिमान पुरुष। जीवन में हर किसी को हर कुछ नहीं मिलता, इसलिए नामुमकिन चीजों के पीछे ना भागने वाला व्यक्ति ही बुद्धिमान कहलाता है।
9 गुण
ऐसा व्यक्ति जो अपने कार्य करना अच्छे-से जानता है। कार्य के दौरान किसी को नीचा नहीं दिखाता, वही है बुद्धिमान इंसान।
10 गुण
कार्य चाहे कैसा भी हो, समाज से संबंधित हो, धर्म संबंधी हो या अपने परिवार से जुड़ा हो। हर परिस्थिति में अपने कार्य को जिम्मेदारी पूर्वक करने वाला इंसान ही बुद्धिमान है।
11 गुण
वह पुरुष जो अपनी बात को सबके सामने व्यक्त करना जानता हो, विषय चाहे कैसा भी हो, खुद के विचार प्रकट करना जानता हो, वही बुद्धिमान है।
12 गुण
किसी भी कार्य को आरंभ करने से पहले उसपर सोच-विचार करना और उसके हर पहलू को समझकर ही आगे बढ़ने वाला पुरुष बुद्धिमान है। बिना सोचे समझे कार्य करके हानि को पाने वाला पुरुष मूर्ख कहलाता है।

सभी अपनाएं ये गुण
विदुर द्वारा एक बुद्धिमान पुरुष के स्वभाव और गुणों को व्यक्त करने वाले इन संकेतों को यदि आज का पुरुष भी अपना ले, तो उसे आज के फास्ट जमाने में भी सफल होने से कोई नहीं रोक सकता।

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भाजपा जहां पत्थरबाजो से मुकदमे वापस ले रही है वहीँ सेना के वीर जवानो पर 302 और 307 जैसी बेहद गम्भीर धाराओं में मुकदमे दर्ज कर रही है

कश्मीरी पत्थरबाजों के मुकदमे वापस लेने वाली सरकार ने सेना के मेजर और सैनिक पर दर्ज किया हत्या का मुदकमा . उबल पड़ा है राष्ट्र
अपनी छाती पर गोली खा कर देश के एक एक नागरिक की रक्षा करने वाली फ़ौज पर जब आतंकी गोली बरसा कर और पत्थरबाज पत्थर बरसा कर थक गये तो क्या अब उनके वो कार्य सरकार करेगी जो बड़े बड़े आतंकी नहीं कर सके . सेना के मनोबल पर जिस पूर्ववर्ती सरकार ने कर्नल पुरोहित, कर्नल डी के पठानिया , मेजर उपेन्द्र और मेजर उपाध्याय जैसे वीरों को अपराधी बना डाला था अब उस राह पर फिर से क्यों चल रही वर्तमान सरकार जो कहीं न कहीं कश्मीर की सत्ता में महबूबा की सहयोगी बन कर शामिल है . मेजर गोगोई के बाद अब निशाना बना है एक और जांबाज़ मेजर .

ज्ञात हो कि कश्मीर के शोपियां में सेना के काफिले पर भारी पत्थरबाजी करने वाले तमाम आतंक समर्थक पत्थरबाजो से अपना जीवन बचाने के लिए प्रतिउत्तर में गोली चलाने वाले सेना के जांबाजो पर हत्या अर्थात 302 के साथ साथ बेहद घातक 307 धारा दर्ज करवा कर एक बार फिर से देश की आन , बान और शान के रूप में राष्ट्र कीरक्षक सेना के मनोबल पर भीषण वार किया गया है.. सेना की 10 वी गढ़वाल यूनिट पर भारी पथराव के बीच में अपनी आत्मरक्षा में चलाई गयी गोली में 2 पत्थरबाज मौके पर ही मारे और 9 पत्थरबाज घायल हो गये . इस मुद्दे गढ़वाल यूनिट के एक मेजर और एक अन्य सैनिक पर हत्या और हत्या के प्रयास के तहत कश्मीर पुलिस द्वारा मुकदमा दर्ज किया गया है . इस मामले की जानकारी होते ही राष्ट्रवादी संगठनो में आक्रोश की लहर दौड़ गयी है .

राष्ट्रवादी संगठनों के सबसे बड़े असंतोष की बात ये रही कि केंद्र के साथ राज्य की सत्ता में भी सहयोगी भाजपा जहां पत्थरबाजो से मुकदमे वापस ले रही है वहीँ सेना के वीर जवानो पर 302 और 307 जैसी बेहद गम्भीर धाराओं में मुकदमे दर्ज कर रही है जबकि इसी मुद्दे पर सेना के प्रवक्ता का बयान है कि जो कुछ भी हुआ वो सब आत्मरक्षा के लिए किया गया है . अब सवाल यहाँ ये उठ रहा है कि क्या सेना के उन वीर बलिदानियों को पत्थरबाजो के पत्थर खाने थे ? क्या ये सम्भव नहीं था कि उन पत्थरबाजो की आड़ में कोई आतंकी उन पर प्राणघातक हमला कर देता ? क्या आत्मरक्षा भी अपराध है अब कश्मीर में और सेना का जवान केवल खुद को खत्म करने केलिए वहां तैनात है ? यकीनन आक्रोशित समाज सरकार से इसके उत्तर ले कर रहेगा .