गुरु और सत गुरु में क्या अंतर है?
मनुष्य अपनी जरूरतें के हिसाब से गुरु की खोज करता है, खराब से खराब मन वाला व्यक्ति भी ज्ञान एवं मार्गदर्शन देने वाले गुरु से जुड़कर अपने मन के विकारों को दूर कर (मन को सही करके) जीवन में सफलता हासिल करता है, गुरु अपने अनुभव के अनुसार हमारा मार्गदर्शन करता है, अगर हमारे ऊपर खराब ग्रह दशा का प्रभाव होता है, तो हम गुरु की बातों को सुनकर भी नजरअंदाज करते हैं और जहां- जिस अवस्था में होते हैं, उसी अवस्था में, बिना विशेष उन्नति के रह जाते हैं, लेकिन अगर हम, अपने मन की ना सुन के, गुरु की बात का पूरा अनुसरण करते हैं, तो हमारे जीवन में परिवर्तन होने लगता है और हम साधारण मनुष्य ना होकर विशेष बनने लग जाते हैं, इसी को गुरुकृपा कहते हैं, ध्यान रहे गुरु एक साधारण मनुष्य है जो हमें राह दिखाता है, सफल होने के लिए हमें उस राह पर चलना स्वयं पड़ता है,
सत्गुरु/सद्गुरु/सच्चा गुरु : गुरु के अन्य रूपों जैसे संगीत विद्या के गुरु, पढा़ने वाले गुरु, माता-पिता रूपी गुरु आदि से अलग माना जाता है। सत्गुरु नाम केवल ऐसे ज्ञानप्राप्त ऋषि/ संत को दिया जाता है जिसके जीवन का उद्देश्य आध्यात्मिक मार्ग पर गुरु-शिष्य परंपरा के अनुसार बनाए गए शिष्य को मार्गदर्शन देना है जिसके परिणाम से ईश्वर प्राप्ति हो कर आत्मज्ञान हो जाता है।
सदगुरु हमें आत्मा के सम्मुख कर देते हैं।
गुरु एक तत्व है, जिसे गुरुतत्व कहते है, जो परमात्मा का दया भाव है। जब परमात्मा कृपा करते हैं तभी व्यक्ति को गुरु का मार्गदर्शन प्राप्त होता है
मूल स्रोत: इस उत्तर का मूल स्रोत है संसार में भटकते- भटकते गुरुतत्व को हासिल करना, जय गुरुदेव ।
परमात्मा आपको आपसे के गुरु से मिलाएं,
ताकि आप जीवन में विशेष उन्नति कर पाए,
इसका यह मतलब यह कदापि नहीं है कि बिना गुरु के आप उन्नति नहीं कर सकते, बिना गुरु के भी आप उन्नति कर सकते हैं अगर कभी आप अपने को कमजोर महसूस करें, तो गुरु नाम ताकत की दवा से उन्नति करें

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