Tuesday, 17 October 2017

17 अक्टूबर (मंगलवार) को धनतेरस का पर्व मनाया जाएगा।

धनतेरस पूजा के लिए सबसे उपयुक्त समय प्रदोष काल के दौरान होता है जब स्थिर लग्न होता है
17 अक्टूबर (मंगलवार) को धनतेरस का पर्व मनाया जाएगा। धनतेरस पूजा के लिए सबसे उपयुक्त समय प्रदोष काल के दौरान होता है जब स्थिर लग्न होता है। ऐसा माना जाता है कि अगर स्थिर लग्न के दौरान धनतेरस पूजा की जाए तो लक्ष्मीजी घर में ठहर जाती है।  

 दिनांक 17 अक्टूबर 2017 को सायं 7.20 पर वृष लग्न है। इसे स्थिर लग्न माना गया है और दीवाली के दौरान यह अधिकतर प्रदोष काल के साथ अधिव्याप्त होता है। अतः धनतेरस की पूजा के लिए शुभ मुहूर्त शाम 07:20 से लेकर 08:17 के बीच तक रहेगा। इस शुभ मुहूर्त में पूजा करने से धन, स्वास्थ्य और आयु बढ़ती है।

 धन त्रयोदशी के दिन भगवान धन्वंतरि का जन्म हुआ था इसीलिए इस दिन को धन तेरस के रूप में पूजा जाता है। दीपावली के दो दिन पहले आने वाले इस त्योहार को लोग काफी धूमधाम से मनाते हैं। इस दिन गहनों और बर्तन की खरीदी जरूर की जाती है। धनवंतरि चिकित्सा के देवता भी हैं इसलिए उनसे अच्छे स्वास्थ्य की कामना की जाती है।

 देवताओं और राक्षसों के बीच समुद्र मंथन

 शास्त्रों के अनुसार समुद्र मंथन के दौरान त्रयो‍दशी के दिन भगवान धन्वंतरि प्रकट हुए थे, इसलिए इस दिन को धन त्रयोदशी कहा जाता है। धन और वैभव देने वाली इस त्रयोदशी का विशेष महत्व माना गया है। 

 कहा जाता है कि समुद्र मंथन के समय बहुत ही दुर्लभ और कीमती सामग्री निकली थी। इसके अलावा के अलावा शरद पूर्णिमा का चंद्रमा, कार्तिक द्वादशी के दिन कामधेनु गाय, त्रयोदशी को धन्वंतरि और कार्तिक मास की अमावस्या तिथि को भगवती लक्ष्मी जी का समुद्र से अवतरण हुआ था। यही कारण है कि दीपावली के दिन लक्ष्मी पूजन और उसके दो दिन पहले त्रयोदशी को भगवान धन्वंतरि का जन्म दिवस धनतेरस के रूप में मनाया जाता है। 

 भगवान धन्वंतरि को प्रिय है पीतल 

 भगवान धन्वंतरि को नारायण भगवान विष्णु का ही एक रूप माना जाता है। इनकी चार भुजाएं हैं, जिनमें से दो भुजाओं में वे शंख और चक्र धारण किए हुए हैं। दूसरी दो भुजाओं में औषधि के साथ वे अमृत कलश लिए हुए हैं। ऐसा माना जाता है कि यह अमृत कलश पीतल का बना हुआ है इसीलिए पीतल भगवान धन्वंतरि की प्रिय धातु है। 

 चांदी खरीदना शुभ  

 धनतेरस के दिन लोग घरेलू बर्तन खरीदते हैं, वैसे इस दिन चांदी खरीदना शुभ माना जाता है क्योंकि चांदी चंद्रमा का प्रतीक माना जाता है। चन्द्रमा शीतलता का मानक है। 
 
मान्यता के अनुसार धनतेरस  

 मान्यता है कि इस दिन खरीदी गई कोई भी वस्तु शुभ फल प्रदान करती है और लंबे समय तक चलती है। लेकिन अगर भगवान की प्रिय वस्तु पीतल की खरीदी की जाए तो इसका तेरह गुना अधिक लाभ मिलता है। 

 क्यों है पूजा-पाठ में पीतल का इतना महत्व? 

 पीतल का निर्माण तांबा और जस्ता धातुओं के मिश्रण से किया जाता है। सनातन धर्म में पूजा-पाठ और धार्मिक कर्म हेतु पीतल के बर्तन का ही उपयोग किया जाता है। ऐसा ही एक किस्सा महाभारत में वर्णित है कि सूर्यदेव ने द्रौपदी को पीतल का अक्षय पात्र वरदानस्वरूप दिया था जिसकी विशेषता थी कि द्रौपदी चाहे जितने लोगों को भोजन करा दें, खाना घटता नहीं था।

 यम की पूजा का भी विधान : 
 
धनतेरस के दिन कुबेर के अलावा देवता यम के पूजा का भी विधान है। धनतेरस के दिन यम की पूजा के संबंध में मान्यता है कि इनकी पूजा से घर में असमय मौत का भय नहीं रहता है।

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Saturday, 14 October 2017

अखबार बेचने से लेकर राष्ट्रपति बनने तक का सफर

अब्दुल कलाम: अखबार बेचने से लेकर राष्ट्रपति बनने तक का सफर

देश के पूर्व राष्ट्रपति और भारत रत्न से सम्मानित अवुल पाकिर जैनुल्लाब्दीन अब्दुल कलाम को पूरा देश एपीजे अब्दुल कलाम के नाम से जानता है. वैज्ञानिक और इंजीनियर कलाम ने 2002 से 2007 तक 11वें राष्ट्रपति के रूप में देश की सेवा की. मिसाइल मैन के रूप में प्रसिद्ध कलाम देश की प्रगति और विकास से जुड़े विचारों से भरे व्यक्ति हैं. उनके जन्मदिन के अवसर पर उनसे जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण बातें और उनके 10 विचार हम आपसे शेयर कर रहे हैं.
- एपीजे अब्दुल कलाम का जन्म 15 अक्टूबर 1931 को दक्षिण भारतीय राज्य तमिलनाडु के रामेश्वरम में हुआ.
पेशे से नाविक कलाम के पिता ज्यादा पढ़े लिखे नहीं थे. ये मछुआरों को नाव किराये पर दिया करते थे. पांच भाई और पांच बहनों वाले परिवार को चलाने के लिए पिता के पैसे कम पड़ जाते थे इसलिए शुरुआती शिक्षा जारी रखने के लिए कलाम को अखबार बेचने का काम भी करना पड़ा.
- आठ साल की उम्र से ही कलाम सुबह 4 बचे उठते थे और नहा कर गणित की पढ़ाई करने चले जाते थे. सुबह नहा कर जाने के पीछे कारण यह था कि प्रत्येक साल पांच बच्चों को मुफ्त में गणित पढ़ाने वाले उनके टीचर बिना नहाए आए बच्चों को नहीं पढ़ाते थे. ट्यूशन से आने के बाद वो नमाज पढ़ते और इसके बाद वो सुबह आठ बजे तक रामेश्वरम रेलवे स्टेशन और बस अड्डे पर न्यूज पेपर बांटते थे.
- 1962 में कलाम इसरो में पहुंचे. इन्हीं के प्रोजेक्ट डायरेक्टर रहते भारत ने अपना पहला स्वदेशी उपग्रह प्रक्षेपण यान एसएलवी-3 बनाया. 1980 में रोहिणी उपग्रह को पृथ्वी की कक्षा के समीप स्थापित किया गया और भारत अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष क्लब का सदस्य बन गया. कलाम ने इसके बाद स्वदेशी गाइडेड मिसाइल को डिजाइन किया. उन्होंने अग्नि और पृथ्वी जैसी मिसाइलें भारतीय तकनीक से बनाईं.
- 1992 से 1999 तक कलाम रक्षा मंत्री के रक्षा सलाहकार भी रहे. इस दौरान वाजपेयी सरकार ने पोखरण में दूसरी बार न्यूक्लियर टेस्ट भी किए और भारत परमाणु हथियार बनाने वाले देशों में शामिल हो गया. कलाम ने विजन 2020 दिया. इसके तहत कलाम ने भारत को विज्ञान के क्षेत्र में तरक्की के जरिए 2020 तक अत्याधुनिक करने की खास सोच दी गई. कलाम भारत सरकार के मुख्य वैज्ञानिक सलाहकार भी रहे.
- 1982 में कलाम को डीआरडीएल (डिफेंस रिसर्च डेवलपमेंट लेबोरेट्री) का डायरेक्टर बनाया गया. उसी दौरान अन्ना यूनिवर्सिटी ने उन्हें डॉक्टर की उपाधि से सम्मानित किया. कलाम ने तब रक्षामंत्री के वैज्ञानिक सलाहकार डॉ. वीएस अरुणाचलम के साथ इंटीग्रेटेड गाइडेड मिसाइल डेवलपमेंट प्रोग्राम (आईजीएमडीपी) का प्रस्ताव तैयार किया. स्वदेशी मिसाइलों के विकास के लिए कलाम की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई गई.
- इसके पहले चरण में जमीन से जमीन पर मध्यम दूरी तक मार करने वाली मिसाइल बनाने पर जोर था. दूसरे चरण में जमीन से हवा में मार करने वाली मिसाइल, टैंकभेदी मिसाइल और रिएंट्री एक्सपेरिमेंट लॉन्च वेहिकल (रेक्स) बनाने का प्रस्ताव था. पृथ्वी, त्रिशूल, आकाश, नाग नाम के मिसाइल बनाए गए. कलाम ने अपने सपने रेक्स को अग्नि नाम दिया. सबसे पहले सितंबर 1985 में त्रिशूल फिर फरवरी 1988 में पृथ्वी और मई 1989 में अग्नि का परीक्षण किया गया.
- इसके बाद 1998 में रूस के साथ मिलकर भारत ने सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल बनाने पर काम शुरू किया और ब्रह्मोस प्राइवेट लिमिटेड की स्थापना की गई. ब्रह्मोस को धरती, आसमान और समुद्र कहीं भी दागी जा सकती है. इस सफलता के साथ ही कलाम को मिसाइल मैन के रूप में प्रसिद्धि मिली और उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया.
- कलाम को 1981 में भारत सरकार ने देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान, पद्म भूषण और फिर, 1990 में पद्म विभूषण और 1997 में भारत रत्न प्रदान किया. भारत के सर्वोच्च पर नियुक्ति से पहले भारत रत्न पाने वाले कलाम देश के केवल तीसरे राष्ट्रपति हैं. उनसे पहले यह मुकाम सर्वपल्ली राधाकृष्णन और जाकिर हुसैन ने हासिल किया.

Saturday, 7 October 2017

करवा चौथ में प्रयुक्त होने वाली सामग्री:

करवा चौ‍थ : आज शाम ही खरीद लें पूजा की ये जरूरी चीजें

सुहागिनों का त्‍योहार करवा चौथ इस बार 8 अक्‍टूबर को यानी कि कल है. आप करवा चौ‍थ कर रही हैं लेकिन यह मालूम नहीं है कि करवा चौथ की पूजा कैसे की जाती हैं और इसमें किन सामग्र‍ियों की आवश्‍यकता होती है, तो हम यहां उन जरूरी साम्रगियों की सूची दे रहे हैं. आज शाम ये सारी सामग्री जुटा लें...
करवा चौथ में प्रयुक्त होने वाली सामग्री:
1. व्रत के दिन प्रातः स्नानादि करने के पश्चात यह संकल्प बोलकर करवा चौथ व्रत का आरंभ करें.
2. पूरे दिन निर्जल रहें.
3. आठ पूरियों की अठावरी बनाएं. हलुवा बनाएं.
4. पीली मिट्टी से गौरी बनाएं और उनकी गोद में गणेशजी बनाकर बिठाएं. गौरी को चुनरी ओढ़ाएं. बिंदी आदि सुहाग सामग्री से गौरी का श्रृंगार करें.
5. जल से भरा हुआ लोटा रखें.
6. करवा में गेहूं और ढक्कन में शक्कर का बूरा भर दें. उसके ऊपर दक्षिणा रखें.
7. रोली से करवा पर स्वस्तिक बनाएं.
8. गौरी-गणेश की परंपरानुसार पूजा करें. पति की दीर्घायु की कामना करें.
9. करवा पर तेरह बिंदी रखें और गेहूं या चावल के तेरह दाने हाथ में लेकर करवा चौथ की कथा कहें या सुनें.
10. कथा सुनने के बाद करवा पर हाथ घुमाकर अपनी सासू जी के पैर छूकर आशीर्वाद लें और करवा उन्हें दे दें.
11. रात्रि में चन्द्रमा निकलने के बाद छलनी की ओट से उसे देखें और चन्द्रमा को अर्ध्य दें. इसके बाद पति से आशीर्वाद लें. उन्हें भोजन कराएं और स्वयं भी भोजन कर लें.
12. सास अपनी बहू को सरगी भेजती है. सरगी में मिठाई, फल, सेवइयां आदि होती है. इसका सेवन महिलाएं करवाचौथ के दिन सूर्य निकलने से पहले करती हैं.
13. अन्य व्रतों के समान करवा चौथ का भी उजमन किया जाता है. करवा चौथ के उजमन में एक थाल में तेरह जगह चार-चार पूड़ियां रखकर उनके ऊपर सूजी का हलुवा रखा जाता है. इसके ऊपर साड़ी-ब्लाउज और रुपये रखे जाते हैं. हाथ में रोली, चावल लेकर थाल में चारों ओर हाथ घुमाने के बाद यह बायना सास को दिया जाता है. तेरह सुहागिन स्त्रियों को भोजन कराने के बाद उनके माथे पर बिंदी लगाकर और सुहाग की वस्तुएं देकर विदा कर दिया जाता है.
करवा चौथ पूजन के लिए ये सामग्री आज ही जरूर खरीद लें...
1. चंदन
2. शहद
3. अगरबत्ती
4. पुष्प
5. कच्चा दूध
6. शक्कर
7. शुद्ध घी
8. दही
9. मिठाई
10. गंगाजल
11. कुंकू
12. अक्षत (चावल)13. सिंदूर
14. मेहंदी
15. महावर
16. कंघा
17. बिंदी
18. चुनरी
19. चूड़ी
20. बिछुआ
21. मिट्टी का टोंटीदार करवा व ढक्कन
22. दीपक
23. रुई
24. कपूर25. गेहूं
26. शक्कर का बूरा
27. हल्दी
28. पानी का लोटा
29. गौरी बनाने के लिए पीली मिट्टी
30. लकड़ी का आसन
31. चलनी
32. आठ पूरियों की अठावरी
33. हलुआ
34. दक्षिणा (दान) के लिए पैसे, इ‍त्यादि।

करवा चौथ: व्रत कथा और पूजन विध‍ि







वामन पुराण' में करवा चौथ व्रत का वर्णन आता है
करवा चौथ का व्रत कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष में किया जाता है. करवा चौथ स्त्रियों का सर्वाधिक लोकप्रिय व्रत है. सौभाग्यवती स्त्रियां अटल सुहाग, पति की दीर्घ आयु, स्वास्थ्य व मंगलकामना के लिए करवा चौथ के दिन व्रत करती हैं.
'वामन पुराण' में करवा चौथ व्रत का वर्णन आता है. करवा चौथ व्रत को रखने वाली स्त्रियों को सुबह स्नान आदि के बाद आचमन करके पति, पुत्र-पौत्र तथा सुख-सौभाग्य की इच्छा का संकल्प लेकर इस व्रत को करना चाहिए. करवा चौथ के व्रत में शिव, पार्वती, कार्तिकेय, गणेश तथा चंद्रमा का पूजन करने का विधान है.
स्त्रियां चंद्रोदय के बाद चंद्रमा के दर्शन कर अर्ध्य देकर ही जल-भोजन ग्रहण करती हैं. पूजा के बाद तांबे या मिट्टी के करवे में चावल, उड़द की दाल, सुहाग की सामग्री जैसे- कंघी, शीशा, सिंदूर, चूड़ियां, रिबन व रुपया रखकर दान करना चाहिए तथा सास के पांव छूकर फल, मेवा व सुहाग की सारी सामग्री उन्हें देनी चाहिए.
करवा चौथ पूजन विधि:
1. बालू अथवा सफेद मिट्टी की वेदी पर शिव-पार्वती, स्वामी कार्तिकेय, गणेश एवं चंद्रमा की स्थापना करें. इसके बाद इन देवताओं की पूजा करें.
2. करवों में लड्डू का नैवेद्य रखकर नैवेद्य अर्पित करें. एक लोटा, एक वस्त्र और एक विशेष करवा दक्षिणा के रूप में अर्पित कर पूजन समापन करें. करवा चौथ व्रत की कथा पढ़ें अथवा सुनें.
3. सायंकाल चंद्रमा के उदित हो जाने पर चंद्रमा का पूजन कर अर्घ्य प्रदान करें. इसके पश्चात ब्राह्मण, सुहागिन स्त्रियों और पति के माता-पिता को भोजन कराएं. भोजन के पश्चात ब्राह्मणों को दक्षिणा दें.
4. सासूजी को एक लोटा, वस्त्र और विशेष करवा भेंट कर आशीर्वाद लें. यदि वे जीवित न हों तो उनके तुल्य किसी अन्य स्त्री को भेंट करें. इसके पश्चात स्वयं और परिवार के अन्य सदस्य भोजन करें.
करवा चौथ की कथा
पहली कथाः
पूरे दिन व्रत रखने के बाद शाम के समय महिलाएं पूजा के लिए तैयार होती हैं. आस-पड़ोस की महिलाएं एक जगह इकट्ठी होती हैं और साथ में करवाचौथ की कथा सुनती हैं. इसके लिए सबसे ज्यादा प्रचलित है वीरावती की कथा. दरअसल, रानी वीरावती सात भाइयों की अकेली बहन थी. शादी के बाद जब वह भाइयों के पास आईं, तो उसी दौरान एक दिन उन्होंने एक व्रत रखा. हालांकि उन्हें इस कठिन व्रत को निभाने में कुछ मुश्किल हो रही थी, लेकिन उन्हें चंद्रमा निकलने के बाद ही कुछ खाना था. ऐसे में उनके भाइयों से उनका कष्ट देखा नहीं गया और उन्होंने धोखे से उनका व्रत तुड़वा दिया. जैसे ही वीरावती ने खाना खत्म किया, उन्हें अपने पति के बीमार होने का समाचार मिला और महल पहुंचने तक उनके पति की मृत्यु हो चुकी थी. इसके बाद देवी पार्वती की सलाह पर उन्होंने करवा चौथ को विधिवत पूरा किया और अपने पति की जिंदगी वापस लेकर आईं.
दूसरी कथाः
करवा चौथ के व्रत का उल्लेख महाभारत में भी मिलता है. पांडवों पर लगातार आ रही मुसीबतों को दूर करने के लिए द्रौपदी ने भगवान कृष्ण से मदद मांगी, तब श्री कृष्ण ने उन्हें करवाचौथ के व्रत के बारे में बताया, जिसे देवी पार्वती ने भगवान शिव की बताई विधियों के अनुसार रखा था. कहा जाता है कि इस दौपद्री के इस व्रत को रखने के बाद न सिर्फ पांडवों की तकलीफें दूर हो गईं, बल्कि उनकी शक्ति भी कई गुना बढ़ गई.
तीसरी कथाः
करवाचौथ के व्रत को सत्यवान और सावित्री की कथा से भी जोड़ा जाता है. इस कथा के अनुसार जब यमराज सत्यवान की आत्मा को लेने आए, तो सावित्री ने खाना-पीना सब त्याग दिया. उसकी जिद के आगे यमराज को झुकना ही पड़ा और उन्होंने सत्यवान के प्राण लौटा दिए.
चौथी कथाः
एक समय की बात है कि एक करवा नाम की पतिव्रता स्त्री अपने पति के साथ नदी के किनारे के गांव में रहती थी. एक दिन उसका पति नदी में स्नान करने गया. स्नान करते समय वहां एक मगर ने उसका पैर पकड़ लिया. वह मनुष्य करवा-करवा कह के अपनी पत्नी को पुकारने लगा.
उसकी आवाज सुनकर उसकी पत्नी करवा भागी चली आई और आकर मगर को कच्चे धागे से बांध दिया. मगर को बांधकर वो यमराज के यहां पहुंची और यमराज से कहने लगी, ‘हे भगवन! मगर ने मेरे पति का पैर पकड़ लिया है. उस मगर को नरक में ले जाओ.’ यमराज बोले, ‘अभी मगर की आयु शेष है, अतः मैं उसे नहीं मार सकता.’ इस पर करवा बोली, ‘अगर आप ऐसा नहीं करोगे तो मैं आप को श्राप देकर नष्ट कर दूंगी.’

सुनकर यमराज डर गए और उस पतिव्रता करवा के साथ आकर मगर को यमपुरी भेज दिया और करवा के पति को दीर्घायु दी. हे करवा माता! जैसे तुमने अपने पति की रक्षा की, वैसे सबके पतियों की रक्षा करना

Sunday, 1 October 2017

व्रतों में प्रमुख व्रत नवरात्रि, पूर्णिमा, अमावस्या तथा एकादशी के हैं. उसमें भी सबसे बड़ा व्रत एकादशी का माना जाता है.

पापांकुशा एकादशी: जानें महत्‍व और व्रत विधि

व्रतों में प्रमुख व्रत नवरात्रि, पूर्णिमा, अमावस्या तथा एकादशी के हैं. उसमें भी सबसे बड़ा व्रत एकादशी का माना जाता है.
चन्द्रमा की स्थिति के कारण व्यक्ति की मानसिक और शारीरिक स्थिति खराब और अच्छी होती है. ऐसी दशा में एकादशी व्रत से चन्द्रमा के हर ख़राब प्रभाव को रोका जा सकता है.
यहां तक कि ग्रहों के असर को भी काफी हद तक कम किया जा सकता है. क्योंकि एकादशी व्रत का सीधा प्रभाव मन और शरीर, दोनों पर पड़ता है.
इसके अलावा एकादशी के व्रत से अशुभ संस्कारों को भी नष्ट किया जा सकता है
पापांकुशा एकादशी आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को कहते हैं. इस एकादशी का महत्त्व स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को बताया था. इस एकादशी पर भगवान 'पद्मनाभ' की पूजा की जाती है. पापरूपी हाथी को इस व्रत के पुण्यरूपी अंकुश से वेधने के कारण ही इसका नाम 'पापांकुशा एकादशी' हुआ है. इस दिन मौन रहकर भगवद स्मरण तथा भोजन का विधान है. इस प्रकार भगवान की अराधना करने से मन शुद्ध होता है तथा व्यक्ति में सद्-गुणों का समावेश होता है.
पापांकुशा एकादशी का महत्‍व
वैसे तो हर एकादशी अपने आप में महत्वपूर्ण है. परन्तु पापांकुशा एकादशी स्वयं के साथ साथ दूसरों को भी लाभ पंहुचाती है.
इस एकादशी पर भगवान विष्णु के पद्मनाभ स्वरुप की उपासना होती है
- पापांकुशा एकादशी  के व्रत से मन शुद्ध होता है
- व्यक्ति के पापों का प्रायश्चित होता है
- साथ ही माता, पिता और मित्र की पीढ़ियों को भी मुक्ति मिलती है
पापांकुशा एकादशी पर भगवान पद्मनाभ की पूजा करें, पूजन विधि
- आज प्रातः काल या सायं काल श्री हरि के पद्मनाभ स्वरुप का पूजन करें
- मस्तक पर सफ़ेद चन्दन या गोपी चन्दन लगाकर पूजन करें
- इनको पंचामृत , पुष्प और ऋतु फल अर्पित करें
- चाहें तो एक वेला उपवास रखकर , एक वेला पूर्ण सात्विक आहार ग्रहण करें
- शाम को आहार ग्रहण करने के पहले उपासना और आरती जरूर करें
- आज के दिन ऋतुफल और अन्न का दान करना भी विशेष शुभ होता है
पापांकुशा एकादशी पर इन बातों का ध्यान रखें
- अगर उपवास रखें तो बहुत उत्तम होगा. नहीं तो एक वेला सात्विक भोजन ग्रहण करें
- एकादशी के दिन चावल और भारी खाद्य का सेवन न करें
- रात्रि के समय पूजा उपासना का विशेष महत्व होता है
- क्रोध न करें, कम बोलें और आचरण पर नियंत्रण रखें

लाल आतंकवाद’’ और ‘‘राजनीतिक फासीवाद’’ का पर्दाफाश करने के लिए शाह इस पदयात्रा की शुरूआत करने वाले हैं.

CPM के ‘लाल आतंकवाद’ के पर्दाफाश के लिए केरल में पदयात्रा शुरू करेंगे अमित शाह : बीजेपी

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह तीन अक्तूबर को केरल के कन्नूर जिले के पयन्नूर से 15 दिन की राज्यव्यापी पदयात्रा शुरू करेंगे. पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने शनिवार को कहा कि केरल में सत्ताधारी माकपा के ‘‘लाल आतंकवाद’’ और ‘‘राजनीतिक फासीवाद’’ का पर्दाफाश करने के लिए शाह इस पदयात्रा की शुरूआत करने वाले हैं.
तिरूवनंतपुरम: भाजपा अध्यक्ष अमित शाह तीन अक्तूबर को केरल के कन्नूर जिले के पयन्नूर से 15 दिन की राज्यव्यापी पदयात्रा शुरू करेंगे. पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने शनिवार को कहा कि केरल में सत्ताधारी माकपा के ‘‘लाल आतंकवाद’’ और ‘‘राजनीतिक फासीवाद’’ का पर्दाफाश करने के लिए शाह इस पदयात्रा की शुरूआत करने वाले हैं.
भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य वी. मुरलीधरन ने यहां कहा कि शाह के अलावा केंद्रीय मंत्री एवं पार्टी के अन्य वरिष्ठ नेता भी इस ‘जनरक्षा यात्रा’ में हिस्सा लेंगे. इस यात्रा की अगुवाई प्रदेश भाजपा अध्यक्ष कुम्मानम राजशेखरन करेंगे.
मुरलीधरन ने बताया कि केंद्रीय मंत्री निर्मला सीतारमण, स्मृति ईरानी, अनंत कुमार, धर्मेंद्र प्रधान, राज्यवर्धन सिंह राठौड़, महेश शर्मा, वी के सिंह और के. जे. अल्फोंस भी अलग-अलग दिन यात्रा में हिस्सा ले सकते हैं. यात्रा के समन्वयक मुरलीधरन ने कहा कि केरल के 14 में से 11 जिलों से यह यात्रा गुजरेगी. उन्होंने आरोप लगाया कि माकपा केरल में ‘‘लाल आतंकवाद’’ को बढ़ावा दे रही है. 

उत्तराखंड में स्थित चारों धाम- केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री के कपाट हर साल सर्दियों के लिए अक्तूबर नवंबर में बंद कर दिए जाते हैं क्योंकि वहां बर्फबारी होती है और वहां जाना दुर्गम हो जाता है.

सर्दियों के लिए बद्रीनाथ के कपाट 19 नवंबर को बंद होंगे

गोपेश्वर: बद्रीनाथ मंदिर के कपाट सर्दियों के लिए इस साल 19 नवंबर को बंद हो जाएंगे और इसके साथ ही वार्षिक चारधाम यात्रा पूरी हो जाएगी. विजयादशमी के मौके पर मंदिर के अधिकारियों की उपस्थिति में धर्माधिकारी ने इसके लिए शुभ घड़ी तय की. तारीख की घोषणा बाद में की गयी. बद्रीनाथ-केदारनाथ समिति के मुख्य कार्यकारी बी डी सिंह ने यह जानकारी दी.
हिमालय में स्थित इस मंदिर के कपाट 19 नवंबर को शाम में सात बजकर 30 मिनट पर बंद होंगे. उन्होंने बताया कि केदारनाथ के कपाट 21 अक्तूबर को सुबह आठ बजे बंद होंगे. उत्तराखंड में स्थित चारों धाम- केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री के कपाट हर साल सर्दियों के लिए अक्तूबर नवंबर में बंद कर दिए जाते हैं क्योंकि वहां बर्फबारी होती है और वहां जाना दुर्गम हो जाता है.

दक्षिण कश्मीर के जिस अनंतनाग जिले को आतंकियों का गढ़ माना जाता है वहां रावण का पुतला फूंका गया. ये पुतला दहन कश्मीरी पंडितों ने किया.

कश्मीरी पंडितों ने अनंतनाग में 28 साल बाद फूंका 'आतंक का रावण'

पूरे देश के साथ जम्मू-कश्मीर में भी दशहरे का त्योहार मनाया गया. मगर, इस बार ये मौका बेहद खास रहा, क्योंकि कश्मीरी पंडितों को भी यहां बुराई के प्रतीक रावण का पुतला दहन करने का गौरव प्राप्त हुआ.
ऐसा 28 साल बाद हुआ है. दक्षिण कश्मीर के जिस अनंतनाग जिले को आतंकियों का गढ़ माना जाता है वहां रावण का पुतला फूंका गया. ये पुतला दहन कश्मीरी पंडितों ने किया.
यहां विस्थापित पंडितों की कॉलोनी में शनिवार को दशहरा मनाया गया. इस दौरान लोग बेहद खुश नजर आए. उनकी आवाज में एक विश्वास नजर आया. वो बेहद खुश थे कि 28 साल बाद अपनी जन्मभूमि पर खड़े हैं और जश्न मना रहे हैं.
दरअसल, नब्बे के दशक में आतंकियों के खिलाफ चले ऑपरेशन के दौरान इन कश्मीरी पंडितों को अपना घर और विरासत छोड़कर जाना पड़ा था. जिस दौरान बड़ी संख्या में कश्मीरी पंडितों की जान भी गई थीं. मगर, कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास कार्यक्रम के तहत इन्हें फिर से वहां बसने का मौका मिला है. हालांकि, अभी कई लोगों के पूरे परिवार यहां नहीं लौटे हैं.
जम्मू में भी जश्न
जम्मू में लोगों ने पूरे हर्षोल्लास के साथ दशहरे का जुलूस निकाला और रावण के पुतले का दहन किया. त्योहार के मौके पर सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए थे. जम्मू के सभी जिलों में शांतिपूर्ण तरीके से कार्यक्रम संपन्न हो गया. वहीं सनातन धर्म सभा और सनातन धर्म नाटक समाज की तरफ से इस मौके पर शोभा यात्रा निकाली गई.
बता दें कि हाल ही में अनंतनाग में ही अमरनाथ यात्रियों के जत्थे को आतंकियों ने निशाना बनाया था.

Thursday, 28 September 2017

यह समस्त वरदानों और सिद्धियों को देने वाली हैं. यह कमल के पुष्प पर विराजमान हैं और इनके हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म है.

नवमी: किस स्वरूप में होगी मां की पूजा, जानें इनकी महिमा

नवरात्रि के अंतिम दिन नवदुर्गा के सिद्धिदात्री स्वरुप की उपासना होती है. नवदुर्गा में मां सिद्धिदात्री का स्वरुप अंतिम और 9वां स्वरुप है.
यह समस्त वरदानों और सिद्धियों को देने वाली हैं. यह कमल के पुष्प पर विराजमान हैं और इनके हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म है.
यक्ष, गंधर्व, किन्नर, नाग, देवी-देवता और मनुष्य सभी इनकी कृपा से सिद्धियों को प्राप्त करते हैं. इनका स्वरुप मां सरस्वती का भी स्वरुप माना जाता है. इनकी कृपा से विद्या, बुद्धि की प्राप्ति होती है. इस बार नवरात्रि का अंतिम दिन 29 अक्टूबर को होगा.
इस दिन मां सिद्धिदात्री की उपासना करने से नवरात्रि के 9 दिनों का फल प्राप्त हो जाता है. इसी दिन महानवमी की पूजा भी की जाती है.
इसको करने से जीवन में सफलता और विजय प्राप्त होती है. इस दिन देवी की उपासना अवश्य करें.
इस दिन के विशेष हवन से व्यक्ति अपनी मनोकामनाओं को पूरा कर सकता है.

देवी के 9वें स्वरुप में मां सिद्धिदात्री की उपासना की जाती है, जो दरसल देवी का पूर्ण स्वरुप है.

नवरात्र‍ि नवमी: जानें, नवदुर्गा के 9वें रूप का महत्व

देवी के 9वें स्वरुप में मां सिद्धिदात्री की उपासना की जाती है, जो दरसल देवी का पूर्ण स्वरुप है. केवल इस दिन मां की उपासना करने से, सम्पूर्ण नवरात्रि की उपासना का फल मिलता है.
यह पूजा नवमी तिथि पर की जाती है. महानवमी पर शक्ति पूजा भी की जाती है, जिसको करने से निश्चित रूप से विजय की प्राप्ति होती है.
आज के दिन महासरस्वती की उपासना भी होती है, जिससे अद्भुत विद्या और बुद्धि की प्राप्ति हो सकती है. इस बार देवी के 9वें स्वरुप की पूजा 29 सितम्बर को की जाएगी.
मां सिद्धिदात्री का स्वरुप
नवदुर्गा में मां सिद्धिदात्री का स्वरुप अंतिम और 9वां स्वरुप है. यह समस्त वरदानों और सिद्धियों को देने वाली हैं.
यह कमल के पुष्प पर विराजमान हैं और इनके हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म है. यक्ष, गंधर्व, किन्नर, नाग, देवी-देवता और मनुष्य सभी इनकी कृपा से सिद्धियों को प्राप्त करते हैं.
इस दिन मां सिद्धिदात्री की उपासना करने से नवरात्रि के 9 दिनों का फल प्राप्त हो जाता है.
महत्व
मां सिद्धिदात्री अपने भक्तों को सभी सिद्धियां प्रदान करने वाली हैं. देवीपुराण में भी लिखा है की भगवान शिव को इनकी कृपा से ही सभी सिद्धियों की प्राप्ति हुई थी. इनकी कृपा की वजह से ही भगवान शिव को ‘अर्द्धनारीश्वर’ नाम से पुकारा जाता है. देवी सिद्धिदात्री का वाहन सिंह है इनकी चार भुजाएं है जिनमें बाईं ओर की एक भुजा में कमल का पुष्प है तथा दूसरी भुजा में शंख है. वहीं दाहिनी ओर की एक भुजा में गदा एवं दूसरी भुजा में चक्र विराजमान है.
मार्कंडेय पुराण के अनुसार आठ सिद्धियां है अणिमा, लघिमा, महिमा, गरिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, वशित्व और ईशित्व. लेकिन ब्रह्ववैवर्त पुराण के अनुसार जिन सिद्धियों का वर्णन किया गया है वह इस प्रकार से हैं 1. सर्वकामावसायिता 2. सर्वज्ञत्व 3. दूरश्रवण 4. परकायप्रवेशन 5. वाक्‌सिद्धि 6. कल्पवृक्षत्व 7. सृष्टि 8. संहारकरणसामर्थ्य 9. अमरत्व 10 सर्वन्यायकत्व. इस तरह से कुल 18 सिद्धियां हैं, जिनका वर्णन हमारे पुराणों में मिलता है.
मां सिद्धिदात्री को लगाएं उनका पसंदीदा भोग
नवमी तिथि पर मां को विभिन्न प्रकार के अनाजों का भोग लगाएं जैसे- हलवा, चना-पूरी, खीर और पुए और फिर उसे गरीबों को दान करें. इससे जीवन में हर सुख-शांति मिलती है.
इस मंत्र का करें जाप
आज के दिन मां को प्रसन्न करने और शक्ति साधना की प्राप्ति के लिए मां का इस मंत्र से ध्यान करें.
सिद्धगन्धर्वयक्षाघैरसुरैरमरैरपि।
सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी॥
या देवी सर्वभू‍तेषु मां सिद्धिदात्री रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।


Wednesday, 27 September 2017

भस्मकूट पर्वत पर स्थित शक्तिपीठ मां मंगलागौरी मंदिर

पालनपीठ' के रूप में प्रसिद्ध है गया का मां मंगलागौरी मंदिर

नवरात्र के मौके पर प्रत्येक देवी स्थानों पर भक्तों की भारी भीड़ इकट्ठा हो रही है. ऐसे में बिहार के गया शहर से कुछ ही दूरी पर भस्मकूट पर्वत पर स्थित शक्तिपीठ मां मंगलागौरी मंदिर पर सुबह से ही भक्तों का तांता लग जाता है.
मान्यता है कि यहां मां सती का वक्ष स्थल (स्तन) गिरा था, जिस कारण यह शक्तिपीठ 'पालनहार पीठ' या 'पालनपीठ' के रूप में प्रसिद्ध है.
पौराणिक ग्रंथों के मुताबिक, भगवान भोले शंकर जब अपनी पत्नी सती का जला हुआ शरीर लेकर तीनों लोकों में उद्विग्न होकर घूम रहे थे तो सृष्टि को बचाने के लिए भगवान विष्णु ने मां सती के शरीर को अपने सुदर्शन चक्र से काटा था.
इसी क्रम में मां सती के शरीर के टुकड़े देश के विभिन्न स्थानों पर गिरे थे, जिसे बाद में शक्तिपीठ के रूप में जाना गया. इन्हीं स्थानों पर गिरे हुए टुकड़े में स्तन का एक टुकड़ा गया के भस्मकूट पर्वत पर गिरा था.
मंगलागौरी शक्तिपीठ के पुजारी लखन बाबा उर्फ लाल बाबा कहते हैं कि इस पर्वत को भस्मकूट पर्वत कहते हैं. इस शक्तिपीठ को असम के कामरूप स्थित मां कमाख्या देवी शक्तिपीठ के समान माना जाता है.
कालिका पुराण के अनुसार, गया में सती का स्तन मंडल भस्मकूट पर्वत के ऊपर गिरकर दो पत्थर बन गए थे. इसी प्रस्तरमयी स्तन मंडल में मंगलागौरी मां नित्य निवास करती हैं जो मनुष्य शिला का स्पर्श करते हैं, वे अमरत्व को प्राप्त कर ब्रह्मलोक में निवास करते हैं.
इस शक्तिपीठ की विशेषता यह है कि मनुष्य अपने जीवन काल में ही अपना श्राद्ध कर्म यहां संपादित कर सकता है.
मान्यता है कि इस मंदिर में आकर जो भी सच्चे मन से मां की पूजा व अर्चना करते हैं, मां उस भक्त पर खुश होकर उसकी मनोकामना को पूर्ण करती है.
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यह भी माना जाता है कि यहां पूजा करने वाले किसी भी भक्त को मां मंगला खाली हाथ नहीं भेजतीं. इस मंदिर में साल भर श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है. यहां गर्भगृह में ऐसे तो काफी अंधेरा रहता है, परंतु यहां वर्षों से एक दीप प्रज्वलित हो रहा है. कहा जाता है कि यह दीपक कभी बुझता नहीं है.
इस मंदिर में सिर्फ यहां के नहीं, बल्कि विदेशी भी आकर मां मंगला गौरी में पूजा अर्चना करते हैं. मां मंगला गौरी मंदिर में पूजा करने के लिए श्रद्धालुओं को 100 से ज्यादा सीढ़ी चढ़कर ऊपर जाना पड़ता है.
मंदिर के एक अन्य पुजारी संजय गिरी बताते हैं कि इस मंदिर का उल्लेख, पद्म पुराण, वायु पुराण, अग्नि पुराण और अन्य लेखों में मिलता है. तांत्रिक कार्यों में भी इस मंदिर को प्रमुखता दी जाती है. हिंदू संप्रदाय में इस मंदिर में शक्ति का वास माना जाता है.
इस मंदिर में उपा शक्ति पीठ भी है, जिसे भगवान शिव के शरीर का हिस्सा माना जाता है. शक्ति पोषण के प्रतीक को एक स्तन के रूप में पूजा जाता है.
मंदिर के गर्भगृह में देवी की प्रतिमा रखी है, यहां भव्य नक्काशी बनी हुई है. मंदिर के सामने वाले भाग में एक मंडप बना हुआ है. मंदिर परिसर में भगवान शिव और महिषासुर की प्रतिमा, मर्दिनी की मूर्ति, देवी दुर्गा की मूर्ति और दक्षिणा काली की मूर्ति भी विराजमान है. यहां कई और भी मंदिर हैं.
यहां नवरात्र में प्रतिदिन भक्तों की भीड़ जुटती है, परंतु महाष्टमी व्रत के दिन यहां बड़ी संख्या में मां के भक्त पहुंचते हैं.