Friday, 30 December 2016

Celebrate New Year on Gudi Padwa instead of 31st December

    

     Celebrate New Year on Gudi Padwa                         instead of 31st December


. What is New Year?

        The arrival of New Year is celebrated on a very large scale all over the world. These days it is a trend to have parties, fireworks, drinking, eating and enjoying on the eve of New Year. The New Year is just after the Christmas holidays and hence people combine these two celebrations.
        The actual New Year varies throughout the world. 1st January became the first day of the year as per the Roman Julian Calendar, although, these days many countries have started following the Gregorian calendar. However, the reasoning behind considering 1st January as the first day of the year is neither consistent nor accurate. There are many beliefs about the day of New Year. Chinese New Year falls around January-February, Muslim New Year varies as per the occurrence of Moharram in Islamic Calendar, Indian New Year varies as per regions, some celebrate it in October-November, some in March, etc. Irrespective of the different times to celebrate New Year, most people celebrate ‘January 1’ as the New Year.
        Is it not strange that a world of more than 7 billion people, 195 countries, more than 40 developed countries, a world which has explored Moon and is currently exploring planet Mars, etc. is neither unified on the New Year Day nor is aware of the actual New Year Day!

2. Is it necessary to celebrate on 31st December?

        December 31 is the last day of the year. As the clock ticks towards midnight, people anxiously wait for it to strike 00:00 hours or 12:00 AM. At that very moment, people happily wish each other happy new year and a wave of joy spreads around, fireworks light up the sky and the party continues on full swing with intake of large amount of alcohol, loud music with dancing and eating. This continues till wee hours in the morning and when the Sun rises in the sky, most of the party goers are just going to bed. The state of some of these party goers is bad as they are inebriated and some others to such an extent that they have passed out due to the consumption of alcohol.
In fact, there is no logical reasoning why December 31 is considered to be the last day of the year or January 1 to be the first day of New Year. In spite of this most people across the globe take a rest on the very first day of their New Year!

3. What should be the New Year?

        When a child is born, that day is considered to be his birthday. The day, month and the year becomes the child’s birth date. Then onwards every year the same day and month becomes that child’s birthday and a reason for celebrations. If we apply a similar logic, then the Universe was not created on January 1; hence, New Year celebrations on 31 December / January 1 are akin to celebrating a child’s birthday on any random day.
        There is nothing wrong in welcoming the New Year; however it should be done on the correct day in such a way that it will be beneficial for us. The true New Year Day is the day when this Universe was created. Please refer to our article ‘When actually should we celebrate New Year?’ given ahead.
Celebrations on the eve of 31st December, is accepted by Hindus as a new year celebration for them as well. By aping the West you are not only destroying your own tradition but are also impressing materialistic values upon the future generation. This article is therefore meant to highlight these facts.

Wednesday, 28 December 2016

में और मेरा परिवार हिन्दू नहीं है और न मेरा कोई पूर्वज हिन्दू थे

                                          में और मेरा परिवार हिन्दू नहीं है 
                          और न मेरा कोई पूर्वज हिन्दू थे


मुग़ल की सता  चिन गाई और आगरा पर अंग्रेज़ शाशन हो गया
इसी दरबार एक दरबानी रहता था जो मुसलमान था
मुग़ल की सता छीन ने के बाद मोतीलाल नेहरू के पिता गंगाधर नेहरू अगर से भाग कर इलाहाबाद पहुचे जहा
अपना नाम गगधर नेहरू रख लिया
गंगाधर नेहरू इलाहबाद में ही रहने लगे और अंग्रेजी राज्य में नोकरी करने लगे यही से नेहरू परिवार की शुरू वात हुवी गाँधी वादी होने से पहले नेहरू परिवार मूलत मुसलमान थे

गंगधार के बेटा मोती लाल नेहरू हुवे और उनके बेटे पंडित जवलाल नेहरू हुवे जो देश के पहले प्रधान मंत्री बने
और उनके बेटी इंदिरा गाँधी हुई जो देश के पहली प्रधान मंत्री बनी

नेहरू परिवार में प्रधान मंत्री बनने का रिवाज़ है  क्यों की लाल बहादुर शास्त्री जी के म्रत्यु के बाद इंदिरा गाँधी
देश के प्रधान मंत्री बन गयी इंदिरा गाँधी म्रत्यु के बाद कांग्रेस पार्टी ने वंश परम्परा को बनाये रखने के लिए राजीव गाँधी को प्रधान मंत्री बनाया  राजीव गाँधी मारने के बाद  किन्तु नेहरू से बने गाँधी परिवार
ने अब तक देश से कई सच को छुपाके रखा है


बड़ा खुलासा लेखक एम् के रैना किया है
बात उस वक़्त का है की जब राजीव गाँधी कांग्रेस पार्टी कार्यक्रम में शामिल होने कश्मीर गए हुवे थे
इस कार्यक्रम में राजीव गाँधी के साथ फ़ारूक़ अब्दुला और वरिष्ट्र लेखक एम् के रैना भी उपस्थित थे 

हालाकि ये तो जगजहीर है की वर्तमान गाँधी परिवार वाकिये में हिन्दू नहीं थे अंग्रेज़ और इलाहबाद में हिन्दुओ से अपनी रक्षा के लिए  गंगाधर नेहरू बन गया और नेहरू से गाँधी 
बन गया 

Monday, 26 December 2016

पाकिस्तान: कर्ज न चुकाया तो घर से उठा ली जाती हैं हिन्दू लड़कियां, 20 लाख हिन्दू गुलाम

          पाकिस्तान: कर्ज न चुकाया तो घर से उठा ली 
                            जाती हैं 
         हिन्दू लड़कियां, 20 लाख हिन्दू गुलाम


ग्लोबल स्लैवरी इंडेक्स 2016 के अनुसार पाकिस्तान में गरीबों को खासकर हिन्दुओं को या तो खेतों में बंधुआ मजदूर के रूप में इस्तेमाल किया जाता है या फिर ईंट भट्ठे घरों में नौकर बनाकर रखा जाता है।
मीरपुर खास (पाकिस्तान)।
पाकिस्तान में अल्पसंख्यक हिन्दुओं तथा इसाई अल्पसंख्यकों पर ज्यादती जारी है। वहां हिन्दू और ईसाई परिवार की लड़कियों को जबरन उठाकर ले जाते हैं और उनका जबरदस्ती धर्म परिवर्तन करवा दिया जाता है।
14 साल की जीवती को उठा ले गए
दक्षिण पाकिस्तान के प्यारो लुंध इलाके में जीवती नाम की लड़की का तब अपहरण हो गया था जब वह 14 साल की थी। वह अपने घर वालों के साथ बाहर सो रही थी तब रात को कुछ लोगों ने उसका अपहरण कर लिया। लेकिन बात में पता चला कि जिस साहूकार से घर वालों ने कभी कर्ज लिया था उसी ने उनकी बेटी को अगवा कर उससे जबरन निकाह कर लिया था।
कोई नहीं है सुनने वाला
अमेरी बताती हैं उनके पति ने कई साल पहले एक शख्स से करीब तीन लाख रुपए कर्ज में लिए थे। उसे पैसे चुकाए लेकिन वह यही कहता रहा कि उसका कर्ज अभी तक पूरा नहीं हुआ। यहां लोग ऐसा ही करते हैं और अमेरी जैसे लोगों का कोई सुनने वाला नहीं है।
पाकिस्तान के हर हिन्दू की दुखभरी कहानी
दक्षिणी पाकिस्तान में अमेरी की कहानी तो एक उदाहरण मात्र हैं यहां जिस किसान हिन्दू परिवार से पूछो वही कुछ ऐसी दुख भरी कहानी सुनाता है। कोई छोटा-मोटा कर्ज भी लेता है तो वह हमेशा के लिए हो जाता है। कई बार विवादों को निपटाने के तौर पर हिन्दुओं की बेटियों को छीन लिया जाता है।
पुलिस और कोर्ट भी नहीं करता मदद
अमेरी ने बताया कि वह अपनी बेटी को वापस पाने लिए पुलिस के पास गईं और फिर अदालत लेकिन उनकी कोई सुनने वाला। उन्होंने बताया कि साहूकार ने उनकी बेटी को मुसलमान बना दिया है और उसे अपनी दूसरी बीवी के तौर पर रख रहा है।
20 लाख हिन्दू गुलाम
रिपोर्ट में कहा गया है कि इस आधुनिक जमाने में भी पाकिस्तान में करीब 20 लाख लोग गुलामों की जिंदगी जी रहे हैं। वहीं ग्लोबल स्लैवरी इंडेक्स 2016 के अनुसार पाकिस्तान सबसे ज्यादा गुलामों वाला तीसरा देश है। पाकिस्तान में गरीबों को खासकर हिन्दुओं को या तो खेतों में बंधुआ मजदूर के रूप में इस्तेमाल किया जाता है या फिर ईंट भट्ठे घरों में नौकर बनाकर रखा जाता है।
हर साल करीब 1000 हिन्दु व इसाई लड़कियों का अपहरण
साउथ एशिया पार्टनरशिप ऑर्गनाइजेशन के आंकड़ों के अनुसार, पाकिस्तान में हर साल करीब 1000 हिन्दु व इसाई लड़कियों (इनमें से ज्यादातर नाबालिग होती हैं) को उनके घरों से उठा लिया जाता है और उनका धर्मान्तरण करने के बाद उसने से शादी कर ली जाती है।

Wednesday, 21 December 2016

सिख विरोधी दंगों के मामले में सज्जन कुमार को मिली राहत,

सिख विरोधी दंगों के मामले में सज्जन कुमार को मिली राहत, 
अदालत ने मंजूर की अग्रिम जमानत
सिख विरोधी दंगों के मामले में सज्जन कुमार को मिली राहत, अदालत ने मंजूर की अग्रिम जमानत

दिल्ली कैंट में वर्ष 1984 में हुए सिख विरोधी दंगे के मामले में आरोपी वरिष्ठ कांग्रेसी नेता सज्जन कुमार को कोर्ट से राहत मिल गई है. द्वारका कोर्ट ने कांग्रेस नेता सज्जन कुमार की अग्रिम जमानत याचिका मंजूर कर ली. इस मामले में कोर्ट ने मंगलवार को फैसला सुरक्षित कर लिया था. इस केस में सज्जन कुमार के अलावा पांच अन्य लोग भी आरोपी हैं.

कोर्ट ने वरिष्ठ नेता सज्जन कुमार से एक लाख रुपये का निजी मुचलका भी भरवाया. अदालत ने जांच एजेंसियों के साथ सहयोग करने की शर्त पर सज्जन कुमार को जमानत दे दी. कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि बिना अदालत की इजाजत के सज्जन कुमार को देश से बाहर नहीं जाएंगे.

1884 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देश भर में सिख विरोधी दंगे फैले थे. इस दौरान दिल्ली कैंट के राजनगर में पांच सिखों केहर सिंह, गुरप्रीत सिंह, रघुविंदर सिंह, नरेंद्र पाल सिंह और कुलदीप सिंह की हत्या कर दी गई थी. जिसमें सज्जन कुमार समेत पांच कांग्रेसी नेताओं का नाम आया था.

उस दंगे में मारे गए केहर सिंह की पत्नी जगदीश कौर ने इस मामले की शिकायत की थी. मृतक के भाई जगशेर सिंह इस मामले में अहम गवाह थे. सीबीआइ ने 2005 में जगदीश कौर की शिकायत और न्यायमूर्ति जीटी नानावटी आयोग की सिफारिश पर दिल्ली कैंट मामले में सच्जन कुमार कैप्टन भागमल, पूर्व विधायक महेंद्र यादव, गिरधारी लाल, कृष्ण खोखर और पूर्व पार्षद बलवंत खोखर के खिलाफ मामला दर्ज किया था.

सीबीआई ने सभी आरोपियों के खिलाफ 13 जनवरी 2010 को आरोपपत्र दाखिल किया था. इसी साल सितंबर माह में दिल्ली हाई कोर्ट ने 1984 के सिख दंगों से जुड़े केस में कांग्रेस नेता सज्जन कुमार की ओर दी गई उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें उन्होंने एक केस को दूसरी बेंच में ट्रांसफर करने की अपीलकी थी. कोर्ट की बेंच ने कहा था कि याचिका आधारहीन, दुर्भावनापूर्ण और गलत है. जिसमें कोई तथ्य नजर नहीं आता है.

हाईकोर्ट की बेंच ने कहा था कि यह कानून का दुरुपयोग है. इस मामले के बाद जस्टिस गीता मित्तल और जस्टिस पी.एस. तेजी की बेंच ने सज्जन कुमार और दूसरे आरोपियों की उस याचिका को भी खारिज कर दिया था, जिसमें मामले की सुनवाई कर रही बेंच के एक सदस्य पर पूर्वाग्रह से ग्रसित होने का आरोप लगाया गया था.

उस वक्त बेंच ने कहा था कि इन याचिकाओं में दी गई दलीलें कोर्ट की अवमानना की तरह है, लेकिन वह और कोई कार्यवाही शुरू नहीं कर रहा है ताकि मामले में और देरी नहीं हो.

Tuesday, 20 December 2016

Jihadi attack on Sabarimala devotee in Kerala

           Jihadi attack on Sabarimala devotee in Kerala


J Satheesh | HENB | Perumpadappu (Malappuram) : A three member Jihadi gang unleashed brutality on Mithun (23), son of Ayroor Thottathil Velayudhan, a Rashtreeya Swayamsevak Sangh karyakarta while returning from a rituals connected with Sabarimala pilgrimage.
Mithun was returning home at night, along with his friends after having taken part in the famed festivity of Ayyappan Vilakku in Ayroor.
According to eyewitnesses, Mithun was sitting in Theertham Kalavedi bus stop along with his friends, after the sacred ritual was over. “The three member Jihadi gang approached him in a friendly manner and made enquiries as to when he was leaving for Sabarimala. When Mithun informed them of the date, the scenario suddenly turned morbid, with the gang charged at him, roaring that he would never leave for Sabarimala. In a moment they unsheathed a sword that was hidden beneath their robes. The attack was aimed to severe Mithun’s head. But as he proceeded to thwart the slash, his palm bore the brunt of the attack. With localities swarming to the spot, the marauders made their escape,” said eyewitnesses.
The attack was happened at around 11.30 pm on Thursday night.
The three Jihadi attackers have been identified as Shafeeq (26), Abu Salih (30) and Shihab (32). All the three have been nabbed by police, as reported.
Mithun was rushed to a private hospital in Perumbadappu, after which he was taken to Thrissur Medical College Hospital. However, facilities for the surgery required for repairing together the severed veins was available only in Kozhikode Medical College Hospital. A grievously injured Mithun was finally admitted to Kozhikode Medical College Hospital, with his palm almost having been chopped off and dangling. He is now under strict medical observation.
Mithun’s father Ayroor Thottathil Velayudhan who is Sevapramukh of RSS Thekkam Theeyam shakha, told HENB, “the cause of attack is not clear, but it is suspected as Mithun’s involvement with Hindu Org”.
Trying to murder a Sabarimala bound pilgrim, in order to unleash terror in the district, is suspected to be the prime motive of the Jihadis.



Saturday, 17 December 2016

बांग्लादेश में अलिखित नियम – ‘अजान के समय मंदिरो में बजती घंटियां रोक दी जाती है’ !

बांग्लादेश में अलिखित नियम – ‘अजान के समय मंदिरो में बजती घंटियां रोक दी जाती है’ !


बांग्लादेश की राजधानी ढाका की यही पहचान है की, यहां हिंदूओंकी संख्या कम है आैर परेशानियां बहुत ज्यादा। सन १९७१ में जब बांग्लादेश अस्तित्व में आया था तब बंगबंधु शेख मुजीबुरर्हमान ने इस देश की नींव धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र और संविधान के साथ की थी। लेकिन उनकी हत्या और तख्ता पलट के पश्चात इस्लामी कट्टरपंथ का प्रभाव बढता गया जिस के कारण बांग्लादेशपर भी इस्लामी रंग चढ गया। अब यहां बचे-खुचे हिंदू परिवार मानते हैं कि, यहां रहना दिन ब दिन कठिन होता जा रहा है। बांग्लादेश राष्ट्रीय हिंदू महाजोट के सेक्रेटरी जनरल गोविंद चंद्र प्रामाणिक कहते हैं, ‘बांग्लादेश में सहिष्णुता खत्म होती जा रही है। अल्पसंख्यकोंके लिए यहां कोई कानून नहीं है। सरकारें बदलती हैं और समस्या वहीं रह जाती है। हमारे परिवारोंके बच्चे पढने के बाद भी अच्छे नंबर नहीं ला पाते। उन्हें सरकारी नौकरियां नहीं मिलतीं। यदि मिलती भी है तो पदोन्नति नहीं दी जाती। साफ तौरपर दिखाई देता है कि हमारे साथ भेदभाव हो रहा है पर हम कुछ नहीं कर पाते।’ ढाका में हिंदू महाजोट के ही बिजय कृष्ण भट्टाचार्य कहते हैं, ‘बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिन्दू का एक-दूसरे से परिचय नहीं है। वे एक साथ मिल कर किसी मसलेपर बात नहीं करते जिसकी बहुत आवश्यकता है। दरअसल यहां अभी तक ऐसा कोई मंच नहीं था जिस से सभी को जोड़ा जा सके। अभी तक हमारा महाजोट भी ऐसा कुछ नहीं कर पाया था जिससे अल्पसंख्यकोंको कोई फायदा हो सके। महाजोट के अध्यक्ष प्रफुल्ल कुमार राय कहते हैं, ‘संगठित रहने में शक्ति है यह अब हर हिंदू को समझना होगा। वरना बांग्लादेश में एक भी हिंदू परिवार नहीं रह पाएगा।’ बांग्लादेश में अलिखित नियम है, अजान की आवाज आनेपर मंदिर में बज रही घंटियां रोक दी जाती है । घरों में बहुत सुबह शंख या घंटी नहीं बजाई जा सकती। लेकिन ढाका में अब युवा संगठित हो रहे हैं। कुछ युवाओंने मिल कर हिंदू जनजागरण समिति बनाई है और उनका मानना है कि सरकारपर जब तक दबाव नहीं बनाया जाएगा कोई हल नहीं निकलेगा। मंच के अध्यक्ष दीनबंधु रॉय कहते हैं, ‘हमने आठ मुख्य बिंदू तैयार किए हैं। हमारी सरकार से इन्हीं बिंदुओंपर काम करने की विनती है। हम सरकार से अल्पसंख्यकोंके लिए आरक्षण चाहते हैं। इस आरक्षण में ३५० विधायिका सीटों में से ३० सीटें अल्पसंख्यकोंके लिए आरक्षित की जाएं। सरकारी नौकरी में २० प्रतिशत कोटा अल्पसंख्यकोंके लिए हो। दुर्गा पूजापर तीन दिन का सरकारी अवकाश, एनिमी प्रॉपर्टी यानि जो व्यक्ति देश छोड़ कर कहीं और बस जाए तो कोई बात नहीं लेकिन यदि वह व्यक्ति भारत जाना चाहे तो उसकी संपत्ति राजसात कर ली जाती है। हालांकि भारत में भी यही नियम है। मंदिर और मठोंकी रक्षा के लिए कानून बने और अल्पसंख्यक आयोग या मंत्रालय का गठन किया जाए। मंच से जुडे सुशील मंडल कहते हैं, ‘हम मुस्लिम विरोधी नहीं हैं। बस हमें अपने अधिकार चाहिए। सरकार हमारे लिए इतना तो कर ही सकती है कि हम इज्जत से इस देश में रह सकें।’ बांग्लादेश के युवा अब फेसबुक और अन्य सोशल माध्यमोंसे एक-दूसरे से जुड रहे हैं। सोशल मीडिया माध्यम में ब्लॉग ने ही अपनी विशिष्ट जगह बना ली थी। इन ब्लॉगरों की हत्याओंसे भी इन युवाओंके हौसले पस्त नहीं हुए हैं। इन घटनाक्रम के बीच भी कई लोग हैं जो दृढ़ता से खड़े हैं। सन २००८ में जब महाजोट बना था तब से वह लगातार लोगोंका डेटाबेस बना रहा है। महाजोट के एक्जीक्यूटिव प्रेसिडेंट देबाशीष साहा कहते हैं, ‘भारत हमारी कोई मदद नहीं करता। दरअसल हम राजनीतिक का शिकार हैं। हम भारत को अपना सगा समझते हैं लेकिन उसने हमें भुला दिया है। यदि पाकिस्तान भारत से अलग हुआ तो मुसलमानोंको उनका देश मिला। बांग्लादेश पाकिस्तान से अलग हुआ तो उन्हें एक स्वतंत्र सत्ता मिली। किंतु हिंदुओंको क्या मिला।’ प्रदीप कुमार देव और सुमन सरकार मानते हैं कि, यह राह लंबी है मगर उन्होंने ६० जिलोंका एक डेटाबेस तैयार कर लिया है। वह एक बडा कार्यक्रम करने की योजना बना रहे हैं, जिस में ज्यादा से ज्यादा हिंदू परिवार को इकट्ठा किया जा सके। हाल ही में शेख हसीना ने युद्ध अपराध ट्रिब्यूलन का गठन किया है जिस में उन सभी लोगोंको दोषी करार दे कर फांसी की सजा सुनाई गई जिन्होंने सन १९७१ के युद्ध में बंगालियों पर अत्याचार किए थे। फांसी के खिलाफ जमात ने जब सिर उठाया तो ढाका विश्वविद्यालय के धर्मनिरपेक्ष छात्रोंने आंदोलन किया। लेकिन इन सब के बीच इसका परिणाम हिंदुओंको भुगतना पड़ रहा है। अंतरराष्ट्रीय क्राइम ट्रिब्यूनल प्रॉसीक्यूटर और बांग्लादेश हिंदू बौद्ध क्रिश्चियन एकता परिषद के जनरल सेक्रेटरी राणा दासगुप्ता के विचार थोड़े अलग हैं। वह कहते हैं, ‘मुसलमान लोग चाहते हैं कि हिंदू उस देश को छोड़ कर चले जाएं जहां वे पैदा हुए आैर पले-बढ़े। कुछ लोगोंको मार कर उन्होंने दहशत भी फैलाई है। बांग्लादेश में हिंदू लगातर डर और आतंक से साए में हैं। हम भारत की ओर देखते हैं। संभव है सरकार बदलनेपर कुछ हालात बदलें।’

इस हिंसा की शुरुआत कैसे हुई?

इस हिंसा की शुरुआत कैसे हुई?



पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता से जुड़े हावड़ा के धूलगढ़ में साम्प्रदायिक तनाव बरकरार है। मिलाद-उन-नबी के अगले दिन कुछ मुस्लिम युवकों ने हिन्दुओं के मकान और दुकान पर हमला कर उसमें आग लगा दी।
पुलिस अधिकारी ने कहा, “पुलिस ने वहां पहुंचकर हालात को सामान्य किया और भीड़ को तितर-बितर किया। लेकिन उसके दो घंटे बाद वहां हालात बिगड़ गए। दोनों पक्षों के दंगाई आमने-सामने हो गए और पुलिस से भी उलझ गए। वे लोग बम लेकर आए थे। हमलोगों ने आंसू गैस के गोले छोड़े। अंत में हमें हालात पर काबू पाने के लिए बल का प्रयोग करना पड़ा।
देश के तमाम मीडिया Houses इस ख़बर को धार्मिक चश्मे से देख रहे हैं, और इसीलिए ये तमाम चैनल या अख़बार इन ख़बरों के मामले में Selective हो जाते हैं। लेकिन सवाल ये है कि क्या किसी हिंसक घटना को धर्म के चश्में से देखकर अनदेखा कर देना जायज़ है। क्या इस बड़ी ख़बर को नज़रअंदाज़ कर देने से ये समस्या खत्म हो जाएगी?
इस हिंसा की शुरुआत कैसे हुई?
12 अक्टूबर को हिंसा की शुरुआत पश्चिम बंगाल के उत्तरी 24 परगना ज़िले से हुई, जहां कथित तौर पर मुहर्रम के जुलूस में एक low-intensity का बम फेंका गया। हालांकि इसमें कोई जख्मी नहीं हुआ, लेकिन इसके बाद हिंसक भीड़ ने हिंदुओं के घरों को जला दिया। और देखते ही देखते हिंसा की ये आग 5 ज़िलों में फैल गई।
अभी पश्चिम बंगाल के उत्तरी 24 परगना, हावड़ा, पश्चिमी मिदनापुर, हुगली और मालदा जिले हिंसाग्रस्त हैं। अब आपको इस पूरी घटना के पीछे छिपी हुई राजनीति भी बता देते हैं। क्योंकि इस राजनीति को समझे बिना आप इस पूरी घटना को समझ नहीं पाएंगे। पिछले हफ्ते ही पश्चिम बंगाल सरकार को कलकत्ता हाईकोर्ट से फटकार लगी थी। अदालत ने पश्चिम बंगाल सरकार पर तुष्टिकरण की राजनीति का आरोप लगाया था।
गौरतलब है कि 11 अक्टूबर को विजयदशमी के दिन दिन देवी दुर्गा की प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है। विजयदशमी के अगले दिन यानी 12 अक्टूबर को मुहर्रम का त्यौहार था। लेकिन इससे पहले पश्चिम बंगाल सरकार ने आदेश दिया था कि 11 अक्टूबर को शाम 4 बजे के बाद मूर्ति विसर्जन नहीं होगा। सरकार के इस आदेश के खिलाफ कुछ लोग कलकत्ता हाईकोर्ट गए तो अदालत ने सरकार को जमकर फटकार लगाई और सरकार के इस आदेश को रद्द कर दिया था। अदालत ने कहा था कि पहले कभी भी मूर्ति विसर्जन पर इस तरह की पाबंदियां नहीं लगाई गईं। अपने आदेश में अदालत ने ये भी कहा था कि राज्य सरकार बहुसंख्यकों की कीमत पर अल्पसंख्यकों को खुश करने की साफ- साफ कोशिश कर रही है।
अदालत का ये भी कहना था कि सरकार को इस बात का एहसास होना चाहिए कि राजनीति के साथ धर्म को मिलाना खतरनाक हो सकता है। यानी राजनीति और धर्म के कॉकटेल से वोटों का नशा होता है और हमारे नेता वर्षों से इसी नशे में झूम रहे हैं। अदालत के इस फैसले के बाद पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार की खूब किरकिरी हुई थी। इसीलिए अब ये सवाल उठ रहा है कि क्या पश्चिम बंगाल की सरकार ने जानबूझकर, एक पक्ष को खुश करने के लिए या मुस्लिम तुष्टीकरण के लिए कानून-व्यवस्था की अनदेखी की? या फिर ये मान लिया जाए कि पश्चिम बंगाल सरकार सबकुछ जानते और समझते हुए भी कानून व्यवस्था को बनाए रखने में फेल हो गई?
गौरतलब है कि इसी वर्ष की शुरुआत में 3 जनवरी को पश्चिम बंगाल के मालदा में हिंसा हुई थी। और उस वक्त भी देश के न्यूज़ चैनलों ने मौन व्रत धारण कर लिया था। दबी हुई खबरों को उजागर करना हमारी संपादकीय नीति है और इसी के तहत हमने आपको नफरत की आग में सुलगते मालदा का पूरा सच दिखाया था।
उस वक्त हमारे देश के डिज़ाइनर पत्रकार उत्तर प्रदेश के दादरी में हुई अखलाक की हत्या पर देश का माहौल खराब बताने में तुले हुए थे। लेकिन इन बुद्धिजीवियों और डिज़ाइनर पत्रकारों ने मालदा की घटना को उस गंभीरता से नहीं देखा, जैसा कि अखलाक की हत्या को देखा था। और करीब 10 महीनों के बाद भी देश का ये Trend बदला नहीं है। आज भी हमारे देश के तमाम डिज़ाइनर पत्रकार धार्मिक चश्मा पहनकर संपादकीय फैसले लेते हैं।
इस हिंसा को देखकर मन में एक सवाल उठता है कि आखिर वो कौन सी वजह है जिससे भीड़ हिंसक हो जाती है और वो कौन से लोग हैं जो भीड़ का इस्तेमाल अपने अनैतिक हित साधने के लिए करते हैं? हिंसक भीड़ के मनोविज्ञान पर आधारित अलग अलग रिसर्च में ये साबित हुआ है कि भीड़ का अपना कोई दिमाग नहीं होता। कुछ लोग मिलकर पूरी भीड़ की मानसिकता तय करते हैं। भीड़ को उकसाने के लिए सिर्फ एक अफवाह उड़ाना ही काफी होता है यानी भीड़ बिना सोचे समझे किसी भी अफवाह को सच मान सकती है। हर भीड़ में कुछ असामाजिक तत्व होते हैं जो भीड़ को गैरकानूनी रुख अपनाने और हिंसा फैलाने के लिए उकसाते हैं। भीड़ में ज़्यादातर वो युवा होते हैं जो सिस्टम को चुनौती देने के लिए हिंसा पर उतारू हो जाते हैं।
जिन लोगों ने अपनी ज़िंदगी में कभी चींटी भी नहीं मारी होती। वो लोग भीड़ में शामिल होकर हिंसक हो जाते हैं और भीड़ में शामिल होकर तोड़फोड़ आगजनी और हत्या तक करने में नहीं हिचकते दरअसल भीड़ में हर इंसान वहीं करना चाहता है जो दूसरे लोग कर रहे होते हैं। भीड़ में शामिल लोगों को लगता है कि जो अपराध वो अकेले नहीं कर सकते, वो भीड़ में शामिल होकर कर सकते हैं। क्योंकि भीड़ का कोई चेहरा नहीं होता। तो ऐसे में क्या ये मान लिया जाए कि हिंसक प्रदर्शन अपनी जायज़ या नाजायज़ मांगों को मनवाने का सबसे बेहतर तरीका है ? इस सवाल का जवाब है नहीं।

Friday, 16 December 2016

इंदिरा ने नोटबंदी के सुझावों को खारिज किया था, तभी खराब हुए हालात


इंदिरा ने नोटबंदी के सुझावों को खारिज किया था, तभी खराब हुए हालात




बोला। पीएम मोदी ने इंदिरा के शासनकाल का जिक्र कर जहां अपनी सरकार के नोटबंदी के फैसले का बचाव किया, वहीं कांग्रेस पर आक्रामक रुख भी दिखाया। पीएम ने कहा कि इंदिरा गांधी ने 1971 में नोटबंदी के प्रस्ताव को खारिज किया था, इस वजह से देश की अर्थव्यवस्था आज इस हाल में पहुंची है।

पीएम ने संसदीय दल को संबोधित करते हुए कहा कि 1971 में ही देश को नोटबंदी की जरूरत थी। उन्होंने उस समय में एक सीनियर प्रशासक की किताब का जिक्र करते हुए बताया कि यह प्रस्ताव तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सामने लाया गया था। इंदिरा गांधी ने यह कहते हुए प्रस्ताव को खारिज कर दिया कि क्या कांग्रेस को आगे चुनाव नहीं लड़ना है।

Monday, 12 December 2016

शबरीमला श्रद्धालुओ की वाहनों पर दुगना राज्य प्रवेश कर !

 
केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम से १७५ किमी की दूरी पर पंपा है और वहीं से चार-पांच किमी की दूरी पर पश्चिम घाट से सह्यपर्वत श्रृंखलाओं के घने वनों के बीच, समुद्रतल से लगभग १००० मीटर की ऊंचाई पर शबरीमला मंदिर है। मक्का-मदीना के बाद यह दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा तीर्थ माना जाता है, जहां सरकार का कोई सुविधा नहीं होते हुए भी हर साल करोड़ों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं।

शबरीमला श्रद्धालुओ की वाहनों पर दुगना राज्य प्रवेश कर !
हर साल नवम्बर से जनवरी तक शबरीमला में अय्यप्पा स्वामी का उत्सव मनाया जाता है । पूरे दक्षिण भारत में  यह बहुत बड़ी उत्सव मानी जीत है । करूडों अय्यप्पा स्वामी के भक्त प्राइवेट वाहनों में शबरीमला में भगवान के दर्शन पाने आते है । इस बार श्रद्धालुओ के वाहनों पर केरल की हिंदु विरोधी सरकार ने दुगना कर लगाया है । किंतु यही सरकार मुसलमानों को हज सबसीडी दिल खोल के देती है ।

पिछले साल केरल में प्रवेश के लिए हर मैक्सिकेब को सप्ताह के लिए ₹ ३५०० जितना कर चुकाना पडता था किंतु इस साल वाहन कर को बडा के ₹ ७००० कर दिया गया है । और सरकार ने पूरे साल का कर एक ही बार में चुकाना श्रदालूवों के लिए अनिवार्य कर दिया है । इसका हिसाब लगाया गया तो हर एक मैक्सिकेब पर ₹ १.४० लाख से ₹ १.६० लाख वाहन कर भरना पड़ेगा । इन्ही केरल सरकार की हिंदु विरोधी नियमों के कारण अन्य राज्यों के मैक्सिकेब के मालिक और श्रद्धालु परेशानी में फश गए हैं । क्या कोई हिंदुत्वनिष्ट संघटन केरल सरकार की इस हिंदु विरोधी कानून का विरोध करेगा 




Friday, 4 November 2016

छठ पर्व

समस्त देश वासियों को छठ पर्व की हार्दिक

शुभकामनायें.....

छठ पर्व या छठ कार्तिक शुक्ल की षष्ठी को मनाया जाने वाला एक हिन्दू पर्व है। सूर्योपासना का यह अनुपम लोकपर्व मुख्य रूप से पूर्वी भारत के बिहार, झारखण्ड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में मनाया जाता है। प्रायः हिंदुओं द्वारा मनाए जाने वाले इस पर्व को इस्लाम सहित अन्य धर्मावलंवी भी मनाते देखे गए हैं धीरे धीरे यह त्यौहार प्रवासी भारतीयों के साथ साथ विश्वभर मे प्रचलित व प्रसिद्ध हो गया है

नामकरण

छठ पर्व छठ, षष्टी का अपभ्रंश है। कार्तिक मास की अमावस्या को दीवाली मनाने के तुरंत बाद मनाए जाने वाले इस चार दिवसिए व्रत की सबसे कठिन और महत्वपूर्ण रात्रि कार्तिक शुक्ल सष्ठी की होती है। इसी कारण इस व्रत का नामकरण छठ व्रत हो गया

लोक आस्थाका पर्व - छठ

हमारे देशमें सूर्योपासनाके लिए प्रसिद्ध पर्व है छठ। मूलत: सूर्य षष्ठी व्रत होनेके कारण इसे छठ कहा गया है। यह पर्व वर्षमें दो बार मनाया जाता है। पहली बार चैत्रमें और दूसरी बार कार्तिकमें। चैत्र शुक्लपक्ष षष्ठीपर मनाए जानेवाले छठ पर्वको चैती छठ व कार्तिक शुक्लपक्ष षष्ठीपर मनाए जानेवाले पर्वको कार्तिकी छठ कहा जाता है। पारिवारिक सुख-स्मृद्धि तथा मनोवांछित फलप्राप्तिके लिए यह पर्व मनाया जाता है। इस पर्वको स्त्री और पुरुष समानरूपसे मनाते हैं। छठ व्रतके संबंधमें अनेक कथाएं प्रचलित हैं; उनमेंसे एक कथाके अनुसार जब पांडव अपना सारा राजपाट जुएमें हार गए, तब द्रौपदीने छठ व्रत रखा। तब उसकी मनोकामनाएं पूरी हुईं तथा पांडवोंको राजपाट वापस मिल गया। लोकपरंपराके अनुसार सूर्य देव और छठी मइयाका संबंध भाई-बहनका है। लोक मातृका षष्ठीकी पहली पूजा सूर्यने ही की थी। छठ पर्वकी परंपरामें बहुत ही गहरा विज्ञान छिपा हुआ है, षष्ठी तिथि (छठ) एक विशेष खगौलीय अवसर है। उस समय सूर्यकी पराबैगनी किरणें (ultra violet rays) पृथ्वीकी सतहपर सामान्यसे अधिक मात्रामें एकत्र हो जाती हैं। उसके संभावित कुप्रभावोंसे मानवकी यथासंभव रक्षा करनेका सामर्थ्य इस परंपरामें है। पर्वपालनसे सूर्य (तारा) प्रकाश (पराबैगनी किरण) के हानिकारक प्रभावसे जीवोंकी रक्षा संभव है। पृथ्वीके जीवोंको इससे बहुत लाभ मिल सकता है। सूर्यके प्रकाशके साथ उसकी पराबैगनी किरण भी चंद्रमा और पृथ्वीपर आती हैं। सूर्यका प्रकाश जब पृथ्वीपर पहुंचता है, तो पहले उसे वायुमंडल मिलता है। वायुमंडलमें प्रवेश करनेपर उसे आयन मंडल मिलता है। पराबैगनी किरणोंका उपयोग कर वायुमंडल अपने ऑक्सीजन तत्त्वको संश्लेषित कर उसे उसके एलोट्रोप ओजोनमें बदल देता है। इस क्रियाद्वारा सूर्यकी पराबैगनी किरणोंका अधिकांश भाग पृथ्वीके वायुमंडलमें ही अवशोषित हो जाता है। पृथ्वीकी सतहपर केवल उसका नगण्य भाग ही पहुंच पाता है। सामान्य अवस्थामें पृथ्वीकी सतहपर पहुंचनेवाली पराबैगनी किरणकी मात्रा मनुष्यों या जीवोंके सहन करनेकी सीमामें होती है। अत: सामान्य अवस्थामें मनुष्योंपर उसका कोई विशेष हानिकारक प्रभाव नहीं पडता, बल्कि उस धूपद्वारा हानिकारक कीटाणु मर जाते हैं, जिससे मनुष्य या जीवनको लाभ ही होता है।[कृपया उद्धरण जोड़ें] छठ जैसी खगौलीय स्थिति (चंद्रमा और पृथ्वीके भ्रमण तलोंकी सम रेखाके दोनों छोरोंपर) सूर्यकी पराबैगनी किरणें कुछ चंद्र सतहसे परावर्तित तथा कुछ गोलीय अपवर्तित होती हुई, पृथ्वीपर पुन: सामान्यसे अधिक मात्रामें पहुंच जाती हैं। वायुमंडलके स्तरोंसे आवर्तित होती हुई, सूर्यास्त तथा सूर्योदयको यह और भी सघन हो जाती है। ज्योतिषीय गणनाके अनुसार यह घटना कार्तिक तथा चैत्र मासकी अमावस्याके छ: दिन उपरांत आती है। ज्योतिषीय गणनापर आधारित होनेके कारण इसका नाम और कुछ नहीं, बल्कि छठ पर्व ही रखा गया है।
उत्सव का स्वरूप

नहाय खाय
पहला दिन कार्तिक शुक्ल चतुर्थी ‘नहाय-खाय’ के रूप में मनाया जाता है। सबसे पहले घर की सफाइ कर उसे पवित्र बना लिया जाता है। इसके पश्चात छठव्रती स्नान कर पवित्र तरीके से बने शुद्ध शाकाहारी भोजन ग्रहण कर व्रत की शुरुआत करते हैं। घर के सभी सदस्य व्रती के भोजनोपरांत ही भोजन ग्रहण करते हैं। भोजन के रूप में कद्दू-दाल और चावल ग्रहण किया जाता है। यह दाल चने की होती है।
दूसरे दिन कार्तीक शुक्ल पंचमी को व्रतधारी दिन भर का उपवास रखने के बाद शाम को भोजन करते हैं। इसे ‘खरना’ कहा जाता है। खरना का प्रसाद लेने के लिए आस-पास के सभी लोगों को निमंत्रित किया जाता है। प्रसाद के रूप में गन्ने के रस में बने हुए चावल की खीर के साथ दूध, चावल का पिट्ठा और घी चुपड़ी रोटी बनाई जाती है। इसमें नमक या चीनी का उपयोग नहीं किया जाता है। इस दौरान पूरे घर की स्वच्छता का विशेष ध्यान रखा जाता है।

संध्या अर्घ्य
तीसरे दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को दिन में छठ प्रसाद बनाया जाता है। प्रसाद के रूप में ठेकुआ, जिसे कुछ क्षेत्रों में टिकरी भी कहते हैं, के अलावा चावल के लड्डू, जिसे लड़ुआ भी कहा जाता है, बनाते हैं। इसके अलावा चढ़ावा के रूप में लाया गया साँचा और फल भी छठ प्रसाद के रूप में शामिल होता है।

शाम को पूरी तैयारी और व्यवस्था कर बाँस की टोकरी में अर्घ्य का सूप सजाया जाता है और व्रति के साथ परिवार तथा पड़ोस के सारे लोग अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देने घाट की ओर चल पड़ते हैं। सभी छठव्रती एक नीयत तालाब या नदी किनारे इकट्ठा होकर सामूहिक रूप से अर्घ्य दान संपन्न करते हैं। सूर्य को जल और दूध का अर्घ्य दिया जाता है तथा छठी मैया की प्रसाद भरे सूप से पूजा की जाती है। इस दौरान कुछ घंटे के लिए मेले का दृश्य बन जाता है।

उषा अर्घ्य
चौथे दिन कार्तिक शुक्ल सप्तमी की सुबह उदियमान सूर्य को अघ्र्य दिया जाता है। ब्रती वहीं पुनः इक्ट्ठा होते हैं जहाँ उन्होंने शाम को अर्घ्य दिया था। पुनः पिछले शाम की प्रक्रिया की पुनरावृत्ति होती है। अंत में व्रति कच्चे दूध का शरबत पीकर तथा थोड़ा प्रसाद खाकर व्रत पूर्ण करते हैं।

व्रत
छठ उत्सव के केंद्र में छठ व्रत है जो एक कठिन तपस्या की तरह है। यह प्रायः महिलाओं द्वारा किया जाता है किंतु कुछ पुरुष भी यह व्रत रखते हैं। व्रत रखने वाली महिला को परवैतिन भी कहा जाता है। चार दिनों के इस व्रत में व्रती को लगातार उपवास करना होता है। भोजन के साथ ही सुखद शैय्या का भी त्याग किया जाता है। पर्व के लिए बनाए गए कमरे में व्रती फर्श पर एक कंबल या चादर के सहारे ही रात बिताई जाती है। इस उत्सव में शामिल होने वाले लोग नए कपड़े पहनते हैं। पर व्रती ऐसे कपड़े पहनते हैं, जिनमें किसी प्रकार की सिलाई नहीं की होती है। महिलाएं साड़ी और पुरुष धोती पहनकर छठ करते हैं। ‘शुरू करने के बाद छठ पर्व को सालोंसाल तब तक करना होता है, जब तक कि अगली पीढ़ी की किसी विवाहित महिला को इसके लिए तैयार न कर लिया जाए। घर में किसी की मृत्यु हो जाने पर यह पर्व नहीं मनाया जाता है।’

ऐसी मान्यता है कि छठ पर्व पर व्रत करने वाली महिलाओं को पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है। पुत्र की चाहत रखने वाली और पुत्र की कुशलता के लिए सामान्य तौर पर महिलाएं यह व्रत रखती हैं। किंतु पुरुष भी यह व्रत पूरी निष्ठा से रखते हैं।

सूर्य पूजा का संदर्भ
छठ पर्व मूलतः सूर्य की आराधना का पर्व है, जिसे हिंदू धर्म में विशेष स्थान प्राप्त है। हिंदू धर्म के देवताओं में सूर्य ऐसे देवता हैं जिन्हें मूर्त रूप में देखा जा सकता है।

सूर्य की शक्तियों का मुख्य श्रोत उनकी पत्नी ऊषा और प्रत्यूषा हैं। छठ में सूर्य के साथ-साथ दोनों शक्तियों की संयुक्त आराधना होती है। प्रात:काल में सूर्य की पहली किरण (ऊषा) और सायंकाल में सूर्य की अंतिम किरण (प्रत्यूषा) को अघ्र्य देकर दोनों का नमन किया जाता है।

सूर्योपासना की परंपरा
भारत में सूर्योपासना ऋग वैदिक काल से होती आ रही है। सूर्य और इसकी उपासना की चर्चा विष्णु पुराण, भगवत पुराण, ब्रह्मा वैवर्त पुराण आदि में विस्तार से की गई है। मध्य काल तक छठ सूर्योपासना के व्यवस्थित पर्व के रूप में प्रतिष्ठित हो गया, जो अभी तक चला आ रहा है। तालाब में पूजा करते हैं।

देवता के रूप में
सृष्टि और पालन शक्ति के कारण सूर्य की उपासना सभ्यता के विकास के साथ विभिन्न स्थानों पर अलग-अलग रूप में प्रारंभ हो गई, लेकिन देवता के रूप में सूर्य की वंदना का उल्लेख पहली बार ऋगवेद में मिलता है। इसके बाद अन्य सभी वेदों के साथ ही उपनिषद आदि वैदिक ग्रंथों में इसकी चर्चा प्रमुखता से हुई है। निरुक्त के रचियता यास्क ने द्युस्थानीय देवताओं में सूर्य को पहले स्थान पर रखा है।

मानवीय रूप की कल्पना
उत्तर वैदिक काल के अंतिम कालखंड में सूर्य के मानवीय रूप की कल्पना होने लगी। इसने कालांतर में सूर्य की मूर्ति पूजा का रूप ले लिया। पौराणिक काल आते-आते सूर्य पूजा का प्रचलन और अधिक हो गया। अनेक स्थानों पर सूर्य देव के मंदिर भी बनाए गए।

आरोग्य देवता के रूप में
पौराणिक काल में सूर्य को आरोग्य देवता भी माना जाने लगा था। सूर्य की किरणों में कई रोगों को नष्ट करने की क्षमता पाई गई। ऋषि-मुनियों ने अपने अनुसंधान के क्रम में किसी खास दिन इसका प्रभाव विशेष पाया। संभवत: यही छठ पर्व के उद्भव की बेला रही हो। भगवान कृष्ण के पौत्र शाम्ब को कुष्ठ हो गया था। इस रोग से मुक्ति के लिए विशेष सूर्योपासना की गई, जिसके लिए शाक्य द्वीप से ब्राह्मणों को बुलाया गया था।

पौराणिक और लोक कथाएँ

रामायण से

एक मान्यता के अनुसार लंका विजय के बाद रामराज्य की स्थापना के दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को भगवान राम और माता सीता ने उपवास किया और सूर्यदेव की आराधना की। सप्तमी को सूर्योदय के समय पुनः अनुष्ठान कर सूर्यदेव से आशिर्वाद प्राप्त कियाथा।

महाभारत से
एक अन्य मान्यता के अनुसार छठ पर्व की शुरुआत महाभारत काल में हुई थी। सबसे पहले सूर्य पुत्र कर्ण ने सूर्य देव की पूजा शुरू की। कर्ण भगवान सूर्य का परम भक्त था। वह प्रतिदिन घंटों कमर तक पानी में ख़ड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देता था। सूर्य की कृपा से ही वह महान योद्धा बना था। आज भी छठ में अर्घ्य दान की यही पद्धति प्रचलित है।
कुछ कथाओं में पांडवों की पत्नी द्रोपदी द्वारा भी सूर्य की पूजा करने का उल्लेख है। वे अपने परिजनों के उत्तम स्वास्थ्य की कामना और लंबी उम्र के लिए नियमित सूर्य पूजा करती थीं।

Sunday, 30 October 2016



                        गोवर्धन पूजन विशेष



हमारे वेदों में कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा के दिन वरुण, इन्द्र, अग्नि आदि देवताओं की पूजा का विधान है। इसी दिन बलि पूजा, गोवर्धन पूजा, मार्गपाली आदि होते हैं। इस दिन गाय-बैल आदि पशुओं को स्नान कराकर, फूल माला, धूप, चंदन आदि से उनका पूजन किया जाता है। गायों को मिठाई खिलाकर उनकी आरती उतारी जाती है। यह ब्रजवासियों का मुख्य त्योहार है। अन्नकूट या गोवर्धन पूजा भगवान कृष्ण के अवतार के बाद द्वापर युग से प्रारम्भ हुई। उस समय लोग इन्द्र भगवान की पूजा करते थे तथा छप्पन प्रकार के भोजन बनाकर तरह-तरह के पकवान व मिठाइयों का भोग लगाया जाता था। ये पकवान तथा मिठाइयां इतनी मात्रा में होती थीं कि उनका पूरा पहाड़ ही बन जाता था।

अन्न कूट परिचय
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अन्न कूट एक प्रकार से सामूहिक भोज का आयोजन है जिसमें पूरा परिवार और वंश एक जगह बनाई गई रसोई से भोजन करता है। इस दिन चावल, बाजरा, कढ़ी, साबुत मूंग, चौड़ा तथा सभी सब्जियां एक जगह मिलाकर बनाई जाती हैं। मंदिरों में भी अन्नकूट बनाकर प्रसाद के रूप में बांटा जाता है।

अन्नकूट पूजन विधि
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इस दिन प्रात:गाय के गोबर से गोवर्धन बनाया जाता है। अनेक स्थानों पर इसके मनुष्याकार बनाकर पुष्पों, लताओं आदि से सजाया जाता है। शाम को गोवर्धन की पूजा की जाती है। पूजा में धूप, दीप, नैवेद्य, जल, फल, फूल, खील, बताशे आदि का प्रयोग किया जाता है।
गोवर्धन में ओंगा (अपामार्ग) अनिवार्य रूप से रखा जाता है।
पूजा के बाद गोवर्धनजी के सात परिक्रमाएं उनकी जय बोलते हुए लगाई जाती हैं। परिक्रमा के समय एक व्यक्ति हाथ में जल का लोटा व अन्य खील (जौ) लेकर चलते हैं। जल के लोटे वाला व्यक्ति पानी की धारा गिराता हुआ तथा अन्य जौ बोते हुए परिक्रमा पूरी करते हैं।
गोवर्धनजी गोबर से लेटे हुए पुरुष के रूप में बनाए जाते हैं। इनकी नाभि के स्थान पर एक कटोरी या मिट्टी का दीपक रख दिया जाता है। फिर इसमें दूध, दही, गंगाजल, शहद, बताशे आदि पूजा करते समय डाल दिए जाते हैं और बाद में इसे प्रसाद के रूप में बांट देते हैं।
अन्नकूट में चंद्र-दर्शन अशुभ माना जाता है। यदि प्रतिपदा में द्वितीया हो तो अन्नकूट अमावस्या को मनाया जाता है।
इस दिन प्रात:तेल मलकर स्नान करना चाहिए।
इस दिन पूजा का समय कहीं प्रात:काल है तो कहीं दोपहर और कहीं पर सन्ध्या समय गोवर्धन पूजा की जाती है।
इस दिन सन्ध्या के समय दैत्यराज बलि का पूजन भी किया जाता है। वामन जो कि भगवान विष्णु के एक अवतार है, उनकी राजा बालि पर विजय और बाद में बालि को पाताल लोक भेजने के कारण इस दिन उनका पुण्यस्मरण किया जाता है। यह माना जाता है कि भगवान वामन द्वारा दिए गए वरदान के कारण असुर राजा बालि इस दिन पातल लोक से पृथ्वी लोक आता है।

गोवर्धन गिरि भगवान के रूप में माने जाते हैं और इस दिन उनकी पूजा अपने घर में करने से धन, धान्य, संतान और गोरस की वृद्धि होती है। आज का दिन तीन उत्सवों का संगम होता है।
इस दिन दस्तकार और कल-कारखानों में कार्य करने वाले कारीगर भगवान विश्वकर्मा की पूजा भी करते हैं। इस दिन सभी कल-कारखाने तो पूर्णत: बंद रहते ही हैं, घर पर कुटीर उद्योग चलाने वाले कारीगर भी काम नहीं करते। भगवान विश्वकर्मा और मशीनों एवं उपकरणों का दोपहर के समय पूजन किया जाता है।

गोबर्धन पूजा की पौराणिक कथा
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एक बार एक महर्षि ने ऋषियों से कहा कि कार्तिक शुक्ल पक्ष प्रतिपदा को गोवर्धन व अन्नकूट की पूजा करनी चाहिए। तब ऋषियों ने महर्षि से पूछा-' अन्नकूट क्या है? गोवर्धन कौन हैं? इनकी पूजा क्यों तथा कैसे करनी चाहिए? इसका क्या फल होता है? इस सबका विधान विस्तार से कहकर कृतार्थ करें।'
महर्षि बोले- 'एक समय की बात है- भगवान श्रीकृष्ण अपने सखा और गोप-ग्वालों के साथ गाय चराते हुए गोवर्धन पर्वत की तराई में पहुंचे। वहां पहुंचकर उन्होंने देखा कि हज़ारों गोपियां 56 (छप्पन) प्रकार के भोजन रखकर बड़े उत्साह से नाच-गाकर उत्सव मना रही थीं। पूरे ब्रज में भी तरह-तरह के मिष्ठान्न तथा पकवान बनाए जा रहे थे। श्रीकृष्ण ने इस उत्सव का प्रयोजन पूछा तो गोपियां बोली-'आज तो घर-घर में यह उत्सव हो रहा होगा, क्योंकि आज वृत्रासुर को मारने वाले मेघदेवता, देवराज इन्द्र का पूजन होगा। यदि वे प्रसन्न हो जाएं तो ब्रज में वर्षा होती है, अन्न पैदा होता है, ब्रजवासियों का भरण-पोषण होता है, गायों का चारा मिलता है तथा जीविकोपार्जन की समस्या हल होती है।
यह सुनकर श्रीकृष्ण ने कहा- 'यदि देवता प्रत्यक्ष आकर भोग लगाएं, तब तो तुम्हें यह उत्सव व पूजा ज़रूर करनी चाहिए।' गोपियों ने यह सुनकर कहा- 'कोटि-कोटि देवताओं के राजा देवराज इन्द्र की इस प्रकार निंदा नहीं करनी चाहिए। यह तो इन्द्रोज नामक यज्ञ है। इसी के प्रभाव से अतिवृष्टि तथा अनावृष्टि नहीं होती।' 
श्रीकृष्ण बोले- 'इन्द्र में क्या शक्ति है, जो पानी बरसा कर हमारी सहायता करेगा? उससे अधिक शक्तिशाली तो हमारा यह गोवर्धन पर्वत है। इसी के कारण वर्षा होती है। अत: हमें इन्द्र से भी बलवान गोवर्धन की पूजा करनी चाहिए।' इस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण के वाक-जाल में फंसकर ब्रज में इन्द्र के स्थान पर गोवर्धन की पूजा की तैयारियां शुरू हो गईं। सभी गोप-ग्वाल अपने-अपने घरों से सुमधुर, मिष्ठान्न पकवान लाकर गोवर्धन की तलहटी में श्रीकृष्ण द्वारा बताई विधि से गोवर्धन पूजा करने लगे।
उधर श्रीकृष्ण ने अपने आधिदैविक रूप से पर्वत में प्रवेश करके ब्रजवासियों द्वारा लाए गए सभी पदार्थों को खा लिया तथा उन सबको आशीर्वाद दिया। सभी ब्रजवासी अपने यज्ञ को सफल जानकर बड़े प्रसन्न हुए। नारद मुनि इन्द्रोज यज्ञ देखने की इच्छा से वहां आए। गोवर्धन की पूजा देखकर उन्होंने ब्रजवासियों से पूछा तो उन्होंने बताया- 'श्रीकृष्ण के आदेश से इस वर्ष इन्द्र महोत्सव के स्थान पर गोवर्धन पूजा की जा रही है।' 
यह सुनते ही नारद उल्टे पांव इन्द्रलोक पहुंचे तथा उदास तथा खिन्न होकर बोले-'हे राजन! तुम महलों में सुख की नींद सो रहे हो, उधर गोकुल के निवासी गोपों ने इद्रोज बंद करके आप से बलवान गोवर्धन की पूजा शुरू कर दी है। आज से यज्ञों आदि में उसका भाग तो हो ही गया। यह भी हो सकता है कि किसी दिन श्रीकृष्ण की प्रेरणा से वे तुम्हारे राज्य पर आक्रमण करके इन्द्रासन पर भी अधिकार कर लें।'
नारद तो अपना काम करके चले गए। अब इन्द्र क्रोध में लाल-पीले हो गए। ऐसा लगता था, जैसे उनके तन-बदन में अग्नि ने प्रवेश कर लिया हो। इन्द्र ने इसमें अपनी मानहानि समझकर, अधीर होकर मेघों को आज्ञा दी- 'गोकुल में जाकर प्रलयकालिक मूसलाधार वर्षा से पूरा गोकुल तहस-नहस कर दें, वहां प्रलय का सा दृश्य उत्पन्न कर दें।'
पर्वताकार प्रलयंकारी मेघ ब्रजभूमि पर जाकर मूसलाधार बरसने लगे। कुछ ही पलों में ऐसा दृश्य उत्पन्न हो गया कि सभी बाल-ग्वाल भयभीत हो उठे। भयानक वर्षा देखकर ब्रजमंडल घबरा गया। सभी ब्रजवासी श्रीकृष्ण की शरण में जाकर बोले- 'भगवन! इन्द्र हमारी नगरी को डुबाना चाहता है, आप हमारी रक्षा कीजिए।'
गोप-गोपियों की करुण पुकार सुनकर श्रीकृष्ण बोले- 'तुम सब गऊओं सहित गोवर्धन पर्वत की शरण में चलो। वही सब की रक्षा करेंगे।' कुछ ही देर में सभी गोप-ग्वाल पशुधन सहित गोवर्धन की तलहटी में पहुंच गए। तब श्रीकृष्ण ने गोवर्धन को अपनी कनिष्ठा अंगुली पर उठाकर छाता सा तान दिया और सभी गोप-ग्वाल अपने पशुओं सहित उसके नीचे आ गए। सात दिन तक गोप-गोपिकाओं ने उसी की छाया में रहकर अतिवृष्टि से अपना बचाव किया। सुदर्शन चक्र के प्रभाव से ब्रजवासियों पर एक बूंद भी जल नहीं पड़ा। इससे इन्द्र को बड़ा आश्चर्य हुआ। यह चमत्कार देखकर और ब्रह्माजी द्वारा श्रीकृष्ण अवतार की बात जानकर इन्द्र को अपनी भूल पर पश्चाताप हुआ। वह स्वयं ब्रज गए और भगवान कृष्ण के चरणों में गिरकर अपनी मूर्खता पर क्षमायाचना करने लगे। सातवें दिन श्रीकृष्ण ने गोवर्धन को नीचे रखा और ब्रजवासियों से कहा- 'अब तुम प्रतिवर्ष गोवर्धन पूजा कर अन्नकूट का पर्व मनाया करो।' तभी से यह उत्सव (पर्व) अन्नकूट के नाम से मनाया जाने लगा।

श्री गोवर्धन महाराज जी की आरती
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श्री गोवर्धन महाराज, ओ महाराज,
तेरे माथे मुकुट विराज रहेओ।

तोपे पान चढ़े तोपे फूल चढ़े,
तोपे चढ़े दूध की धार।
तेरे माथे मुकुट विराज रहेओ।

तेरी सात कोस की परिकम्मा,
और चकलेश्वर विश्राम
तेरे माथे मुकुट विराज रहेओ।

तेरे गले में कण्ठा साज रहेओ,
ठोड़ी पे हीरा लाल।
तेरे माथे मुकुट विराज रहेओ।

तेरे कानन कुण्डल चमक रहेओ,
तेरी झाँकी बनी विशाल।
तेरे माथे मुकुट विराज रहेओ।

गिरिराज धरण प्रभु तेरी शरण।
करो भक्त का बेड़ा पार
तेरे माथे मुकुट विराज रहेओ।

गोवर्धन पूजा का शुभ मुहूर्त
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प्रातःकाल मुहूर्त : 
प्रातः 06:36 बजे से 08:47 बजे तक

सायं काल मुहूर्त : 
दोपहर बाद 03:21 से सायं 05:32 बजे तक