Saturday, 18 November 2017

अंग्रेजी शासन के विरूद्ध 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में अग्रिम भूमिका निभा कर अपने प्राणों की आहुति देने वाली वीरांगना रानी लक्ष्मी बाई जी की जयंती हिन्दू परिवार संघठन संस्था की और से पर कोटि-कोटि नमन।



  • तुम भूल गए शायद मुझको, मैं झाँसी वाली रानी हूँ
  • जो नपुंसकों पर भारी थी, मैं वो मर्दानी हूँ
    लुटती अस्मत, लगती कीमत… ये नारी की कैसी किस्मत ?
    आजाद देश के वीरों से कुछ प्रश्न पूछने आई हूँ…………
    तब आजादी की बीज बनी, अब तुम्हें जगाने आई हूँ
    आजाद देश में नारी गुलाम… ये किसने रीत चलाई है……………..
    क्या तुमने अब भी गद्दारों की चिता नहीं जलाई है ?भारत की हर एक स्त्री को फिर “मनु” आज बना दो तुम
    सभी स्त्रियों के स्वाभिमान को फिर से आज जगा दो तुम………………..
    शस्त्र-शास्त्र से सुसज्जित कर दो, हर-एक घर-आँगन को
    निडर और निर्भय कर दो, हर-एक वन-उपवन को
    बच्चों के खेल-खिलौनों में शामिल कर दो… झाँसी की तलवार को
    बच्चों के नस-नस में भर दो, निडरता और स्वाभिमान को
    किताबों से बाहर निकालो मुझे और……….
    लिखने दो शौर्य गाथाएँ अपने घर-आँगन में
    ताकि तुम गर्व से कह सको कि मैं तेरी मनु / छबिली हूँ…………..
    अब ढूँढो मुझको अपने घर-आंगन में, मैं लक्ष्मीबाई अलबेली हूँ.
    – अभिषेक मिश्र
  • झांसी की रानी – सुभद्राकुमारी चौहान
    सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,
    बूढ़े भारत में भी आई फिर से नयी जवानी थी,
    गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी,
    दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।
    चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी,
    बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥कानपूर के नाना की, मुँहबोली बहन छबीली थी,
    लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी,नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी,बरछी, ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी।वीर शिवाजी की गाथायें उसको याद ज़बानी थी,
    बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार,
    देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार,नकली युद्ध-व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार,सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवाड़।महाराष्ट्र-कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी,
    बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में,
    ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में,राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाई झाँसी में,सुघट बुंदेलों की विरुदावलि-सी वह आयी थी झांसी में।चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव को मिली भवानी थी,
    बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजियाली छाई,
    किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई,तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाई,रानी विधवा हुई, हाय! विधि को भी नहीं दया आई।निसंतान मरे राजाजी रानी शोक-समानी थी,
    बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥बुझा दीप झाँसी का तब डलहौज़ी मन में हरषाया,
    राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया,फ़ौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया,लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया।अश्रुपूर्ण रानी ने देखा झाँसी हुई बिरानी थी
    बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥अनुनय विनय नहीं सुनती है, विकट शासकों की माया,
    व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया,डलहौज़ी ने पैर पसारे, अब तो पलट गई काया,राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया।रानी दासी बनी, बनी यह दासी अब महरानी थी,
    बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥छिनी राजधानी दिल्ली की, लखनऊ छीना बातों-बात,
    कैद पेशवा था बिठूर में, हुआ नागपुर का भी घात,उदैपुर, तंजौर, सतारा,कर्नाटक की कौन बिसात?जब कि सिंध, पंजाब ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात।बंगाले, मद्रास आदि की भी तो वही कहानी थी,
    बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥रानी रोयीं रनिवासों में, बेगम ग़म से थीं बेज़ार,
    उनके गहने कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाज़ार,सरे आम नीलाम छापते थे अंग्रेज़ों के अखबार,‘नागपुर के ज़ेवर ले लो लखनऊ के लो नौलख हार’।यों परदे की इज़्ज़त परदेशी के हाथ बिकानी थी,
    बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥कुटियों में भी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान,
    वीर सैनिकों के मन में था अपने पुरखों का अभिमान,नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान,बहिन छबीली ने रण-चण्डी का कर दिया प्रकट आहवान।हुआ यज्ञ प्रारम्भ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी,
    बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी,
    यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरतम से आई थी,झाँसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थी,मेरठ, कानपुर,पटना ने भारी धूम मचाई थी,जबलपुर, कोल्हापुर में भी कुछ हलचल उकसानी थी,
    बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥इस स्वतंत्रता महायज्ञ में कई वीरवर आए काम,
    नाना धुंधूपंत, ताँतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम,अहमदशाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम,भारत के इतिहास गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम।लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो कुरबानी थी,
    बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥इनकी गाथा छोड़, चले हम झाँसी के मैदानों में,
    जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में,लेफ्टिनेंट वाकर आ पहुँचा, आगे बढ़ा जवानों में,रानी ने तलवार खींच ली, हुया द्वंद असमानों में।ज़ख्मी होकर वाकर भागा, उसे अजब हैरानी थी,
    बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार,
    घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर गया स्वर्ग तत्काल सिधार,यमुना तट पर अंग्रेज़ों ने फिर खाई रानी से हार,विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार।अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी राजधानी थी,
    बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥विजय मिली, पर अंग्रेज़ों की फिर सेना घिर आई थी,
    अबके जनरल स्मिथ सम्मुख था, उसने मुहँ की खाई थी,काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आई थी,युद्ध श्रेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी।पर पीछे ह्यूरोज़ आ गया, हाय! घिरी अब रानी थी,
    बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥तो भी रानी मार काट कर चलती बनी सैन्य के पार,
    किन्तु सामने नाला आया, था वह संकट विषम अपार,घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था, इतने में आ गये सवार,रानी एक, शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार-पर-वार।घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीर गति पानी थी,
    बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥रानी गई सिधार चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी,
    मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी,अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी,हमको जीवित करने आयी बन स्वतंत्रता-नारी थी,दिखा गई पथ, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी,
    बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥जाओ रानी याद रखेंगे ये कृतज्ञ भारतवासी,
    यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनासी,होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी,हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी।तेरा स्मारक तू ही होगी, तू खुद अमिट निशानी थी,
    बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

Thursday, 16 November 2017

लाला लाजपत राय की जीवनी

लाल-बाल-पाल इन जहाल त्रीमुर्तियो में से एक लाला लाजपत राय
लाल-बाल-पाल इन जहाल त्रीमुर्तियो में से एक लाला लाजपत राय – Lala Lajpat Rai थे, जो भारत के स्वतंत्रता अभियान शामिल हुए थे. जिसके फलस्वरूप बाद में उनके स्वतंत्रता अभियान ने एक विशाल रूप ले लिया था. और वह अभियान अंत में भारत को एक स्वतंत्र राष्ट्र बनाकर ही रुका.

-लाला लाजपत राय की जीवनी – 

पूरा नाम  – लाला लाजपत राधाकृष्ण राय
जन्म       – 28 जनवरी 1865
जन्मस्थान – धुडेकी (जि. फिरोजपुर, पंजाब)
पिता      – राधाकृष्ण
माता      – गुलाब देवी
शिक्षा     – 1880 में कलकत्ता और पंजाब विश्वविद्यालय प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण, 1886 में कानून की उपाधि ली.
लाला लाजपत राय भारतीय पंजाबी लेखक और एक राजनेता थे, जो ज्यादातर भारतीय स्वतंत्रता अभियान के मुख्य नेता के रूप में याद किये जाते है. वे ज्यादातर पंजाब केसरी के नाम से जाने जाते है. लाल-बाल-पाल की तिकड़ी में लाल मतलब लाला लाजपत राय ही है. उनके प्रारंभिक जीवन में वे पंजाब राष्ट्रिय बैंक और लक्ष्मी बिमा कंपनी से भी जुड़े थे.
जब वे साइमन कमीशन के विरुद्ध अपनी आवाज़ उठा रहे थे तभी पुलिस ने उन्हें बहोत पीड़ा दी, और इसके तीन हफ्तों बाद ही उनकी मृत्यु हो गयी. 17 नवम्बर का मृत्यु दिन आज भी भारत में शहीद दिन के रूप में मनाया जाता है.

लाला लाजपत राय प्रारंभिक जीवन – Lala Lajpat Rai in Hindi

लाला लाजपत राय का जन्म 28 जनवरी 1865 को धुडिके ग्राम में (मोगा जिला, पंजाब) हुआ. उनके पिता धर्म से अग्रवाल थे. 1870 के अंत और 1880 के प्रारंभ में, जहा उनके पिता एक उर्दू शिक्षक थे तभी राय ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा रेवारी (तब का पंजाब, अभी का हरयाणा) के सरकारी उच्च माध्यमिक स्कूल से ग्रहण की.
राय हिंदुत्वता से बहोत प्रेरित थे, और इसी को ध्यान में रखते हुए उन्होंने राजनीती में जाने की सोची. (जब वे लाहौर में कानून की पढाई कर रहे थे तभी से वे हिंदुत्वता का अभ्यास भी कर रहे थे. उनके इस बात पर बहोत भरोसा था की हिंदुत्वता ये राष्ट्र से भी बढ़कर है.
लाला लाजपत राय भारत को एक पूर्ण हिंदु राष्ट्र बनाना चाहते थे). हिंदुत्वता, जिसपे वे भरोसा करते थे, उसके माध्यम से वे भारत में शांति बनाये रखना चाहते थे और मानवता को बढ़ाना चाहते थे.
ताकि भारत में लोग आसानी से एक-दुसरे की मदद करते हुए एक-दुसरे पर भरोसा कर सके. क्यूकी उस समय भारतीय हिंदु समाज में भेदभाव, उच्च-नीच जैसी कई कु-प्रथाए फैली हुई थी, लाला लाजपत राय इन प्रथाओ की प्रणाली को ही बदलना चाहते थे.
अंत में उनका अभ्यास सफल रहा और वे भारत में एक अहिंसक शांति अभियान बनाने इ सफल रहे और भारत को स्वतंत्र राष्ट्र बनाने के लिए ये बहोत जरुरी था. वे आर्य समाज के भक्त और आर्य राजपत्र (जब वे विद्यार्थी थे तब उन्होंने इसकी स्थापना की थी) के संपादक भी थे.
सरकारी कानून(लॉ) विद्यालय, लाहौर में कानून (लॉ) की पढाई पूरी करने के बाद उन्होंने लाहौर और हिस्सार में अपना अभ्यास शुरू रखा और राष्ट्रिय स्तर पर दयानंद वैदिक स्कूल की स्थापना भी की, जहा वे दयानंद सरस्वती जिन्होंने हिंदु सोसाइटी में आर्य समाज की पुनर्निर्मिति की थी, उनके अनुयायी भी बने.
भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस मे शामिल होने के बाद, उन्होंने पंजाब के कई सारे राजनैतिक अभियानों में हिस्सा लिया.
मई 1907 में अचानक ही बिना किसी पूर्वसूचना के मांडले, बर्मा (म्यांमार) से उन्हें निर्वासित (देश से निकाला गया) किया गया. वही नवम्बर में, उनके खिलाफ पर्याप्त सबूत ना होने की वजह से वाइसराय, लार्ड मिन्टो ने उनके स्वदेश वापिस भेजने का निर्णय लिया. स्वदेश वापिस आने के बाद लाला लाजपत राय सूरत की प्रेसीडेंसी पार्टी से चुनाव लड़ने लगे लेकिन वहा भी ब्रिटिशो ने उन्हें निष्कासित कर दिया.
वे राष्ट्रिय महाविद्यालय से ही स्नातक थे, जहा उन्होंने ब्रिटिश संस्था के पर्यायी ब्रद्लौघ हॉल, लाहौर की स्थापना की. और 1920 के विशेष सेशन में उन्हें कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त किया गया.
1921 में उन्होंने समाज की सेवा करने वाले लोगो को ढूंडना शुरू किया, और उन्ही की मदत से एक बिना किसी लाभ के उद्देश से एक संस्था की स्थापना की. जो लाहौर में ही थी, लेकिन विभाजन के बाद वो दिल्ली में आ गयी, और भारत के कई राज्यों में उस संस्था की शाखाये भी खोली गयी.
लाला लाजपत राय का हमेशा से यही मानना था की,
इसलिए हमें हमेशा अपने आप पर भरोसा होना चाहए, अगर हम में कोई काम करने की काबिलियत है तो निच्छित ही वह काम हम सही तरीके से कर पाएंगे. कोई भी बड़ा काम करने से पहले उसे शुरू करना बहोत जरुरी होता है. जिस समय लाला लाजपत राय स्वतंत्रता अभियान में शामिल हुए उस समय उन्हें ये पता भी नहीं था के वे सफल हो भी पाएंगे या नही,
लेकिन उन्होंने पूरी ताकत के साथ अपने काम को पूरा करने की कोशिश तो की. और उनके इन्ही कोशिशो के फलस्वरूप बाद में उनके स्वतंत्रता अभियान ने एक विशाल रूप ले लिया था. और वह अभियान अंत में भारत को एक स्वतंत्र राष्ट्र बनाकर ही रुका.

एक नजर में लाला लाजपत रॉय – Information About Lala Lajpat Rai

1. स्वामी दयानंद सरस्वती ने स्थापन किया हुवा ‘आर्य समाज’ सार्वजनिक कार्य आगे था. आर्य समाज के विकास के आदर्श की तरफ और समाज सुधार के योजनाओं की तरफ लालाजी आकर्षित हुए. वो सोला साल की उम्र में आर्य समाज के सदस्य बने.
2. 1882 में हिन्दी और उर्दू इनमें से कीस भाषा मान्यता होनी चाहिये, इस विषय पर बड़ी बहस चल रही थी. लालाजी हिन्दी के बाजु में थे. उन्होंने सरकार को वैसा एक अर्जी की और उस पर हजारो लोगो की दस्तखत ली.
3. 1886 में कानून की उपाधि परीक्षा देकर दक्षिण पंजाब के हिस्सार यह उन्होंने वकील का व्यवसाय शुरु किया.
4. 1886 में लाहोर को आर्य समाज की तरफ से दयानंद अँग्लो-वैदिक कॉलेज निकालनेका सोचा. उसके लिए लालाजी ने पंजाब में से पाच लाख रुपये जमा किये. 1 जून 1886 में कॉलेज की स्थापना हुयी. लालाजी उसके सचिव बने.
5. आर्य समाज के अनुयायी बनकर वो अनाथ बच्चे, विधवा, भूकंपग्रस्त पीडीत और अकाल से पीड़ित इन लोगो की मदत को जाते थे.
6. 1904 में ‘द पंजाब’ नाम का अंग्रेजी अखबार उन्होंने शुरु किया. इस अखबार ने पंजाब में राष्ट्रीय आन्दोलन शुरु किया.
7. 1905 में काँग्रेस की ओर से भारत की बाजू रखने के लिये लालाजी को इग्लंड भेजने का निर्णय लिया. उसके लिये  उनको जो पैसा दिया गया उसमे का आधा पैसा उन्होंने दयानंद अँग्लो-वैदिक कॉलेज और आधा अनाथ विद्यार्थियों के शिक्षा के लिये दिया. इंग्लंड को जाने का उनका खर्च उन्होंने ही किया.
8. 1907 में लाला लाजपत रॉय किसानो को भडकाते है, सरकार के विरोधी लोगों को भड़काते है ये आरोप करके सरकार ने उन्हें मंडाले के जेल में रखा था. छे महीनों बाद उनको छोड़ा गया पर उनके पीछे लगे हुये सरकार से पीछा छुड़ाने के लिये वो अमेरिका गये.
वहा के भारतीयों में स्वदेश की, स्वातंत्र्य का लालच निर्माण करने के उन्होंने ‘यंग इंडिया’ ये अखबार निकाला. वैसेही भारतीय स्वातंत्र्य आंदोलन का गति देने के लिये ‘इंडियन होमरूल लीग’ की स्थापना की.
9. स्वदेश के विषय में परदेश के लोगों में विशेष जागृती निर्माण करके 1920 में वो अपने देश भारत लौटे. 1920 में कोलकाता यहाँ हुये कॉग्रेस के खास अधिवेशन के लिये उन्हें अध्यक्ष के रूप में चुना गया. उन्होंने असहकार आंदोलन में हिस्सा लिया और जेल गए. उसके पहले लालाजी ने लाहोर में ‘तिलक  राजनीती शास्त्र स्कुल’ नाम की राष्ट्रिय स्कुल शुरु किया था.
10. लालाजी ने ‘पीपल्स सोसायटी’ (लोग सेवक संघ) नाम की समाज सेवक की संस्था निकाली थी.
11. 1925  में कोलकाता में हुये ‘हिंदु महासभा’ के आन्दोलन के अध्यक्ष स्थान लालाजी ने भुशवाया.
12. 1925 में ‘वंदे मातरम’ नाम के उर्दू दैनिक के संपादक बनकर उन्होंने काम किया.
13. 1926 में जिनिव्हा को आंतरराष्ट्रिय श्रम संमेलन हुवा. भारत के श्रमिको के प्रतिनिधी बनकर लालाजीने  उसमे हिस्सा लिया. ब्रिटन और प्रान्स में हुये ऐसे ही संमेलन में उन्होंने हिस्सा लिया.
14. 1927 में भारत कुछ सुधारना कर देने हेतु ब्रिटिश सरकार ने सायमन कमीशन की नियुक्ती की पर सायमन कमीशन सातों सदस्य अग्रेंज थे. एक भी भारतीय नहीं था. इसलिये भारतीय राष्ट्रिय कॉग्रेस ने सायमन कमीशन पर बहिष्कार डालने का निर्णय लिया.
15. 30 अक्तुबर १९२८ में सायमन कमीशन पंजाब पोहचा. लोगोंने लाला लाजपत रॉय इनके नेतृत्व में निषेध के लिये बहोत बड़ा मोर्चा निकाला. पुलिस ने किये हुये निर्दयी लाठीचार्ज में लाला लाजपत रॉय घायल हुये और दो सप्ताह के बाद अस्पताल में उनकी मौत हुयी.
ग्रंथ संपत्ती – Lala Lajpat Rai Book’s: 
  • इटली के देशभक्त जोसेफ मँझीनी और गँरिबाल्डी इनके चरित्र वैसे ही श्रीकृष्ण, छत्रपति शिवाजी और दयानंद सरस्वती इनके जीवन पर लालाजी ने किताबे लिखी
  • यंग इंडिया
  • अन हँपी इंडिया
  • आर्य समाज
विशेषता – Lala Lajpat Rai Information:
  • लाल-बाल-पाल इन जहाल त्रीमुर्तियो में से एक लालाजी थे.
  • ’पंजाब केसरी’ ये पुरस्कार लोगो की तरफ में लालाजी को मिला.
(Lala Lajpat Rai Death) मृत्यु: 17 नंव्ह्बर 1928 को लालाजी की मौत हुयी.

हिन्दू हृदय सम्राट बाला साहेब ठाकरे

17 नवम्बर- हिन्दू हृदय सम्राट बाला साहेब ठाकरे की पुण्यतिथि पर उन्हें बारम्बार नमन वन्दन और अभिनंदन


ये वो आवाज थी जो पूरे देश में गूंजती थी . हाथ में रुद्राक्ष और शरीर पर भगवा वस्त्र उन विधर्मियो के मन में खौफ पैदा करता था जो देश और धर्म के दुश्मन थे . किसी में साहस नहीं होता था जो महाराष्ट्र में हिंदुत्व और हिन्दू के खिलाफ एक भी शब्द बोल दे . जो साहब कर गए वो शायद ही कोई और कर सकता है . आज भी वो चेहरा और वो रूप जनता की आँखों में समाया हुआ है और ऐसा कभी लगा ही नहीं की साहब जा चुके हैं .
बाला केशव ठाकरे एक भारतीय राजनेता थे जिन्होंने शिवसेना की स्थापना की. वे मराठी को ज्यादा प्राधान्य देते थे और उनकी पार्टी पश्चिमी महाराष्ट्र में सक्रिय रूप से कार्य कर रही है. उनके सहयोगी उन्हें "बालासाहेब" के नाम से पुकारते हैं. उनके अनुयायी उन्हें हिन्दू ह्रदय सम्राट बुलाते हैं. स्वर्गीय बाल ठाकरे का जन्म पुणे शहर में 23 जनवरी 1926 को रमाबाई और केशव सीताराम ठाकरे (प्रबोधनकार ठाकरे के नाम से भी जाने जाते थे), इनके यहा हुआ. वो अपने 9 भाई-बहनों में सबसे बड़े थे. उनका परिवार मराठी चंद्र्सैन्य कायस्थ प्रभु से संबंध रखता था. केशव ठाकरे एक सामाजिक कार्यकर्त्ता थे जो 1950 में हुए संयुक्त महाराष्ट्र  अभियान में भी शामिल थे और मुंबई को भारत की राजधानी बनाने के लिए प्रयास करते रहे. बालासाहेब ठाकरे के पिता अपने अभियान को सफल बनाने के लिए हमेशा से ही सामाजिक हिंसा का उपयोग करते थे. लेकिन उन्होंने यह अभियान छोड़ दिया था क्यू की उस समय ज्यादातर लोग उनपर भेदभाव का आरोप लगा रहे थे.

बालासाहेब ठाकरे ने मीना ठाकरे से विवाह कर लिया. बाद में उन्हें 3 बच्चे हुए, बिंदुमाधव ठाकरे, जयदेव ठाकरे और उद्धव ठाकरे. वे मराठी में सामना नामक अखबार निकालते थे। इस अखबार में उन्होंने अपनी मृत्यु से कुछ दिन पूर्व अपने सम्पादकीय में लिखा था- "आजकल मेरी हालत चिन्ताजनक है किन्तु मेरे देश की हालत मुझसे अधिक चिन्ताजनक है; ऐसे में भला मैं चुप कैसे बैठ सकता हूँ?"

१९६६ में उन्होंने महाराष्ट्र में शिव सेना नामक एक कट्टर हिन्दूराष्ट्र वादी संगठन की स्थापना की। हालांकि शुरुआती दौर में बाल ठाकरे को अपेक्षित सफलता नहीं मिली लेकिन अंततः उन्होंने शिव सेना को सत्ता की सीढ़ियों पर पहुँचा ही दिया। १९९५ में भाजपा-शिवसेना के गठबन्धन ने महाराष्ट्र में अपनी सरकार बनाई। बाल ठाकरे अपने उत्तेजित करने वाले बयानों के लिये जाने जाते थे और इसके कारण उनके खिलाफ सैकड़ों की संख्या में मुकदमे दर्ज किये गये थे। 28 जुलाई 1999 को चुनाव आयोग ने ठाकरे के वोटिंग करने पर प्रतिबन्ध लगाया गया और साथ ही 11 दिसम्बर 1999 से 10 दिसम्बर 2005, 6 साल तक किसी भी चुनाव में शामिल होने से मना किया, क्योकि उन्हें धर्म के नाम पर वोट मांगते पाया गया था. और उनके इस प्रतिबन्ध के खत्म होने के बाद पहली बार उन्होंने BMC चुनावो में वोटिंग की थी.


ठाकरे ने यह दावा किया था की शिवसेना कोई जब हिंदु धर्म का मजाक बनाये तब उसका प्रबल विरोध किया जाना चाहिये. जिस समय महाराष्ट्र में बेरोजगारी जोरो से फ़ैल रही थी, उसी समय बालासाहेब ने महाराष्ट्र का विकास करने की ठानी और वहा के लोगो को कई तरह से रोजगार उपलब्ध करवाये. 17 नवम्बर 2012 को आये अचानक ह्रदय विकार के कारण बालासाहेब ठाकरे इस दुनिया को विदा कह गए . जैसे ही मुंबई में उनके मृत्यु की खबर फैलती गयी वैसे ही सभी लोग उनके निवास स्थान पर जमा होने लगे और कुछ ही घंटो में तेज़ी से चलने वाली मुंबई शांत सी हो गयी थी, सभी ने अपनी दुकाने बंद कर दी थी. और पूरे महाराष्ट्र में हाई अलर्ट जारी किया गया. और महाराष्ट्र पुलिस ने पुरे महाराष्ट्र में 20000 पुलिस ऑफिसर्स, और 15 रिज़र्व पुलिस के दलों के साथ शांति बनाये रखने के लिए निवेदन किया. 
 
बालासाहेब ठाकरे के प्रति लोगो के प्यार को देखकर उस समय के भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी अपने शहर में शांति बनाये रखने का आदेश दिया. गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी उनकी काफी प्रतिष्टा की और पुरे सम्मान के साथ उन्हें अंतिम विदाई दी गयी. 18 अक्टूबर को ठाकरे के शरीर को शिवाजी पार्क मे  ले जाया गया था. उनका दाह संस्कार शिवाजी पार्क में किया गया. जहा शिवसेना ने अपने कई अभियान को अंजाम भी दिया था. बाल गंगाधर तिलक के बाद सार्वजानिक स्थान पर यह पहला दाह संस्कार था. लाखो लोग उनके दाह संस्कार में उपस्थित थे. 

समाचार पत्रिकाओ के अनुसार उपस्थित लोगो की संख्या तक़रीबन 1.5 लाख से 2 लाख तक रही होंगी. उनके दाह संस्कार को देश के सभी न्यूज़ चैनल द्वारा प्रसारित किया गया. लोकसभा और विधानसभा के किसी प्रकार के कोई सदस्य ना होने के बावजूद उन्हें इतना सम्मान दिया गया था. कोई कार्यकालिन पदवी ना होने के बावजूद उन्हें 21  तोपों की सलामी दी गयी, जो देश में बहुत ही कम लोगो को दी जाती है. साथ ही बिहार के भी दोनों मुख्य सभागृह में भी उन्हें श्रधांजलि दी गयी. . महाराष्ट्र में लोग उन्हें "टाइगर ऑफ़ मराठा" के नाम से जानते थे. वे पहले व्यक्ति थे जिनकी मृत्यु पर लोगो ने बिना किसी नोटिस के स्वयम अपनी मर्ज़ी से पूरी मुंबई बंद रखी आज उस महानायक हिन्दू हृदय सम्राट की पुण्यतिथि पर सुदर्शन परिवार का उन्हें बारम्बार नमन .

16 नवम्बर-

16 नवम्बर- बलिदान दिवस क्रांतिवीर करतार सिंह साराभा जिनकी दिलाई आज़ादी की कईयों ने ली ठेकेदारी


कोई लाख भले ही बिना खड्ग बिना ढाल के गाने गा ले और कोई कितना भी आज़ादी की ठेकेदारी सडक से संसद तक ले ले लेकिन उनकी चीख और नकली दस्तावेज किसी भी हालत में उन वीर बलिदानियों के बलिदान को नहीं भुला सकते है जो उग्र जवानी में ही इस वतन के नाम अपनी एक एक सांस लिख कर चले गये वो भी बिना किसी स्वार्थ और भविष्य की योजना अदि के . इनके नाम कहीं से भी कोई दोष नहीं है इन्होने हमेशा ही भारत माता को जंजीरों से मुक्त करवाने का सपना देखा था जिसके लिए इन्होने उन अंग्रेजों को सीधी चुनौती दी जिनके दरबार में अक्सर आज़ादी के कुछ ठेकेदार हाजिरी लगाते दिखते थे .

करतार सिंह का जन्म लुधियाना जिले के ग्राम सराभा में 24 मई 1896 को ग्रेवाल परिवार में हुआ था। पिता सरदार मंगल सिंह की मौत उसके बाल्यकाल में हो गयी। बाबा ने ही उसका लालन पालन किया। प्रारंभिक तालीम गावं में हासिल करने के बाद लुधियाना के खालसा कालेज में आगे की पढाई की। हाई स्कूल पास करने के बाद  उसने उच्च अघ्ययन के लिए अमेरिका जाने का निर्णय किया। एक जनवरी 1896 को अमेरिका पंहुच कर यूबा सिटी में खेतीबाड़ी का काम किया और तीन माह तक प्रतिदिन 12 घंटे काम करके कुछ डालर जमा किए। इसके बाद यूनिवर्सिटी आपफ कैलिर्फोनिया बर्कले में दाखिल हुए।

लेकिन इन सबके बीच एक सवाल यह उठता है कि पाकिस्तान ऐसे लोगों के नाम पर ही अपने मिसाइल कार्यक्रम का नाम क्यों रखता है

जिन जिन हत्यारों ने भारत में किया था हिन्दुओं का कत्लेआम उन्ही के नाम पर हैं पाकिस्तान की मिसाइलों के नाम
पकिस्तान मिसाइल तैयार करते तो हैं पर वो सिर्फ दुनिया भर में अपना आतंकवाद फ़ैलाने के मकसद से करते हैं। आज के समय में तकनीक काफी आगे बढ़ चुकी है. लेकिन उस तकनीक का गलत फायदा उठा कर सबसे ज्यादा कश्मीर को निशाना बनाया जा रहा है। हालाकि यह तो कहना मुश्किल है कि इन कट्टरवादियों की यह चाल और कितनी कामयाब होंगी पर फिर भी भारतीय सैनिक इनको करारा जवाब देने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। पाकिस्तान को भारत से कितनी नफरत है उसका अंदाजा उनकी मिसाइल के नाम से लगाया जा सकत है. पाकिस्तान अब्दाली, गजनवी, गौरी, शाहीन, बाबर नाम की तमाम मिसाइलों का निर्माण कर चुका है।

लेकिन इन सबके बीच एक सवाल यह उठता है कि पाकिस्तान ऐसे लोगों के नाम पर ही अपने मिसाइल कार्यक्रम का नाम क्यों रखता है जिसने भारत पर समय-समय पर आक्रमण करके उसकी ऐतिहासिक, सांस्कृति औऱ धार्मिक धरोहर को नुकसान पहुंचाया। गौर तलाब है कि गजनवी ने 11वीं शताब्दी में भारत पर हमला किया और उसने भारत पर लगातार 17 बार हमला किया, उसने सोमनाथ मंदिर को भी तोड़ा और जमकर लूटपाट की। वहीं अहमद शाह अब्दाली ने 18वीं शताब्दी में सिखों को बड़ी संख्या में मौत के घाट उतारा। 1748 से 1765 के बीच उसने भारत पर 7 बार हमला किया। । वहीं तैमूर लंग ने 1398 में दिल्ली पर हमला किया और बड़ी संख्या में लोगों को मौत के घाट उतार दिया।









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Sunday, 12 November 2017

13 नवम्बर - जन्मदिवस, सदा अपराजेय रहे कश्मीर विजयी राजा रणजीत सिंह जी

13 नवम्बर - जन्मदिवस, सदा अपराजेय रहे कश्मीर विजयी राजा रणजीत सिंह जी


पंजाब के लोक जीवन और लोक कथाओं में महाराजा रणजीत सिंह से सम्बन्धित अनेक कथाएं कही व सुनी जाती है. इसमें से अधिकांश कहानियां उनकी उदारता, न्यायप्रियता और सभी धर्मो के प्रति सम्मान को लेकर प्रचलित है. उन्हें अपने जीवन में प्रजा का भरपूर प्यार मिला. अपने जीवन काल में ही वे अनेक लोक गाथाओं और जनश्रुतियो का केंद्र बन गये थे. महाराजा रणजीत सिंह का नाम भारतीय इतिहास के सुनहरे अक्षरों में लिखा गया है। पंजाब के इस महावीर नें अपने साहस और वीरता के दम पर कई भीषण युद्ध जीते थे। रणजीत सिंह के पिता सुकरचकिया मिसल के मुखिया थे। बचपन में रणजीत सिंह चेचक की बीमारी से ग्रस्त हो गये थे, उसी कारण उनकी बायीं आँख दृष्टिहीन हो गयी थी।

किशोरावस्था से ही चुनौतीयों का सामना करते आये रणजीत सिंह जब केवल 12 वर्ष के थे तब उनके पिताजी की मृत्यु (वर्ष 1792) हो गयी थी। खेलने -कूदने कीउम्र में ही नन्हें रणजीत सिंह को मिसल का सरदार बना दिया गया था, और उस ज़िम्मेदारी को उन्होने बखूबी निभाया। महाराजा रणजीत सिंह ने देश के मंदिरों को दान दिया. उन उन्होंने काशी विश्वनाथ मंदिर (वाराणसी) के कलश को 22 मन सोना देकर उसे स्वर्ण मंडित किया और अमृतसर के हरिमंदिर पर सोना चढ़वाकर उसे स्वर्ण मंदिर में बदल दिया.

महाराजा रणजीत सिंह स्वभाव से अत्यंत सरल व्यक्ति थे। महाराजा की उपाधि प्राप्त कर लेने के बाद भी रणजीत सिंह अपने दरबारियों के साथ भूमि पर बिराजमान होते थे। वह अपने उदार स्वभाव, न्यायप्रियता ओर समस्त धर्मों के प्रति समानता रखने की उच्च भावना के लिए प्रसिद्द थे। अपनी प्रजा के दुखों और तकलीफों को दूर करन  के लिए वह हमेशा कार्यरत रहते थे। अपनी प्रजा की आर्थिक समृद्धि और उनकी रक्षा करना ही मानो उनका धर्म था। महाराजा रणजीत सिंह ने सन 1801 में बैसाखी के दिन लाहौर में बाबा साहब बेदी के हाथों माथे पर तिलक लगवाकर अपने आपको एक स्वतंत्र भारतीय शासक के रूप में प्रतिष्ठत किया. 40 वर्ष के अपने शासनकाल में महाराज रणजीत सिंह ने इस स्वतंत्र राज्य की सीमाओं को और विस्तृत किया. साथ ही साथ उसमे ऐसी शक्ति भरी की किसी भी आक्रमणकारी की इस ओर आने की हिम्मत नहीं हुई.  

महाराजा रणजीत सिंह नें लगभग 40 वर्ष शासन किया। अपने राज्य को उन्होने इस कदर शक्तिशाली और समृद्ध बनाया था कि उनके जीते जी किसी आक्रमणकारी सेना की उनके साम्राज्य की और आँख उठा नें की हिम्मत नहीं होती थी। महाराजा के रूप में उनका राजतिलक तो हुआ किन्तु वे राज सिंहासन पर कभी नहीं बैठे. अपने दरबारियों के साथ मनसद के सहारे जमीन पर बैठना उन्हें ज्यादा पसंद था. 21 वर्ष की उम्र में ही रणजीत सिंह 'महाराजा' की उपाधि से विभूषित हुए. कालांतर में वे 'शेर – ए – पंजाब' के नाम से विख्यात हुए. महाराजा रणजीत सिंह के शासनकाल में किसी को मृत्युदंड नहीं दिया गया, यह तथ्य अपने आप में कम आश्चर्यजनक नहीं है. उस युग में जब शक्ति के मद में चूर शासकगण बात बात में अपने विरोधियो को मौत के घाट उतार देते थे, रणजीत सिंह ने सदैव अपने विरोधियो के प्रति उदारता और दया का दृष्टिकोण रखा. जिस किसी राज्य या नवाब का राज्य जीत कर उन्होंने अपने राज्य में मिलाया उसे जीवनयापन के लिए कोई न कोई जागीर निश्चित रूप से दे दी. 

1798 ई. – 1799 ई में अफगानिस्तान के शासक जमानशाह ने लाहौर पर आक्रमण कर दिया और बड़ी आसानी से उस पर अधिकार कर लिया पर अपने सौतेले भाई महमूद के विरोध के कारण जमानशाह को वापस काबुल लौट जाना ना पड़ा था| काबूल लौटते समय उसकी कुछ तोपें झेलम नदी में गिर पड़ी थीं| रणजीत सिंह ने इन तोपों को नदी से निकलवा कर सुरक्षित काबुल भिजवा दिया | इस बात पर जमानशाह बहुत प्रसन्न हो गये और उन्होने रणजीत सिंह को लाहौर पर अधिकार कर लेने की अनुमति दे दी | इस के बाद तुरंत ही रणजीत सिंह ने लाहौर पर आक्रमण कर दिया और 7 जुलाई 1799 के दिन लाहौर पर आधिपत्य जमा लिया | 
उस समय मुल्तान के शासक मुजफ्फरखा थे उन्होने सिख सेना का वीरतापूर्ण सामना किया था पर अंत में उन्हें हार का सामना करना पड़ा था। महाराजा रणजीत सिंह की और से वह युद्ध मिश्र दीवानचंद और खड्गसिंह नें लड़ा था और मुल्तान पर विजय प्राप्त की थी। इस तरह महाराजा रणजीत सिंह नें ई॰ 1818 में मुल्तान को अपने आधीन कर 
लिया। वर्ष 1813 में महाराजा रणजीत सिंह ने कूटनीति द्वारा काम लेते हुए कटक राज्य पर भी अधिकार कर लिया था | ऐसा कहा जाता है की उन्होंने कटक राज्य के गर्वनर जहादांद को एक लाख रूपये की राशि भेंट दे कर ई॰ 1813 में कटक पर अधिकार प्राप्त कर लिया था| 

महाराजा रणजीत सिंह नें 1819 ई. में मिश्र दीवानचंद के नेतृत्व मे विशाल सेना कश्मीर की और आक्रमण करने भेजी थी। उस समय कश्मीर में अफगान शासक जब्बार खां का आधिपत्य था। उन्होनें रणजीत सिंह की भेजी हुई सिख सेना का पुरज़ोर मुकाबला किया परन्तु उन्हे पराजय का स्वाद ही चखना पड़ा। अब कश्मीर पर भी रणजीत सिंह का  पूर्ण अधिकार हो गया था। आगे बढ़ते हुए ई॰ 1820-21 में महाराजा रणजीत सिंह ने क्रमवार डेरागाजी खा, इस्माइलखा और बन्नू पर विजय हासिल कर के अपना अधिकार सिद्ध कर लिया था। पेशावर पर जीत हासिल करने हेतु ई॰ 1823. में महाराजा रणजीत सिंह ने वहाँ एक विशाल सेना भेज दी। उस समय सिक्खों ने वहाँ जहांगीर और नौशहरा की लड़ाइयो में पठानों को करारी हार दी और पेशावर राज्य पर जीत प्राप्त कर ली। महाराजा की अगवाई में ई॰ 1834 में पेशावर को पूर्ण सिक्ख साम्राज्य में सम्मलित कर लिया गया।

भारतीय इतिहास में अपनी जगह बनाने वाले प्रचंड पराक्रमी महाराजा रणजीत सिंह 58 साल की उम्र में सन 1839 में मृत्यु को प्राप्त हुए। उन्होने अपने अंतिम साँसे लाहौर में ली थी। सदियों बाद भी आज उन्हे अपने साहस और पराक्रम के लिए याद किया जाता है। सब से पहली सिख खालसा सेना संगठित करने का श्रेय भी महाराजा रणजीत सिंह को जाता है। उनकी मृत्यु के पश्चात उनके पुत्र महराजा खड़क सिंह ने उनकी गद्द्दी संभाली। महाराजा रणजीत सिंह में आदर्श राजा के सभी गुण मौजूद थे- बहादुरी, प्रजा प्रेम, करुणा, सहनशीलता, चातुर्य और न्यायसंगतता। भारत वर्ष के इस महान तेजवंत शासक को आज उनके जन्म दिवस पर हिन्दू परिवार संघठन संस्था   का बारम्बार नमन वंदन और अभिनन्दन ..

Monday, 6 November 2017

बिना टिकट पकड़े गए 82 हजार लोग, रेलवे ने वसूला 4.82 करोड़ का जुर्माना

बिना टिकट पकड़े गए 82 हजार लोग, रेलवे ने वसूला 4.82 करोड़ का जुर्माना

अगर आप रेल में अक्सर बिना टिकट सफर करते हैं तो जरा सावधान हो जाएं. क्योंकि रेलवे ने टिकटों की जांच पर सख्ती रखनी शुरू कर दी है और ऐसा करना आपकी जेब पर भारी पड़ सकता है. हाल ही में रेलवे ने बिना टिकट ट्रेन में सफर कर रहे यात्रियों से 4.82 करोड़ रुपये का जुर्माना वसूला है. 
यह मामला पुणे का है. पुणे रेल मंडल ने पिछले एक साल से सघन टिकट जांच शुरू कर दी है. लिहाजा, टिकट जांच के दौरान इस साल अप्रैल से अक्टूबर तक 82,500 लोगों को बिना टिकट यात्रा करते पकड़ा  गया. रेलवे ने बिना टिकट यात्रा कर रहे रेल यात्रियों  से 4 करोड़ 82 लाख रुपये का जुर्माना वसूला है.
इसी तरह अनियमित तौर पर यात्रा करने वाले 77 हजार लोगों के ख‍िलाफ भी कार्रवाई की गई और उनसे 1 करोड़ 94 लाख रुपये वसूले गए. वहीं 12,500 लोगों को बिना बुक किए गए सामान को ले जाने पर 11 लाख 33 हजार रुपये जुर्माना के तौर पर लिया गया. इस तरह लगभग 1 लाख 72 हजार मामलों में कुल 9 करोड़ 27 लाख रुपये की राशि वसूली गई है. उक्त कार्रवाई वरिष्ठ मंडल वाणिज्य प्रबंधक कृष्णाथ पाटील के नेतृत्व में टिकट निरीक्षकों के दल द्वारा की गई है.   
रेवले अध‍िकारियों के अनुसार अक्टूबर के महीने में जुर्माना के तौर पर अब तक की सबसे बड़ी राश‍ि वसूली गई है. अक्टूबर में ऐसे 33,058 मामले सामने आए, जिनसे कुल 1 करोड़ 86 लाख रुपये दंड के रूप में वसूला गया. जबकि पिछले साल 2016 के अक्टूबर में कुल 31,201 मामले सामने आए थे, जिनसे 1 करोड़ 75 लाख 65 हजार का जुर्माना लिया गया था. इससे पहले अप्रैल 2015 में मंडल ने 29,040 मामलों में 1 करोड़ 80 लाख 58 हजार रुपये की राशि प्राप्त की थी. इस पर मंडल रेल प्रबंधक मिलिन्द देऊस्कर और अपर मंडल रेल प्रबंधक श्री प्रफुल्ल चंद्रा ने टिकट चेकिंग स्टाफ को सराहा और उनसे और बेहतर प्रदर्शन को प्रोत्साहित किया. 

Tuesday, 17 October 2017

17 अक्टूबर (मंगलवार) को धनतेरस का पर्व मनाया जाएगा।

धनतेरस पूजा के लिए सबसे उपयुक्त समय प्रदोष काल के दौरान होता है जब स्थिर लग्न होता है
17 अक्टूबर (मंगलवार) को धनतेरस का पर्व मनाया जाएगा। धनतेरस पूजा के लिए सबसे उपयुक्त समय प्रदोष काल के दौरान होता है जब स्थिर लग्न होता है। ऐसा माना जाता है कि अगर स्थिर लग्न के दौरान धनतेरस पूजा की जाए तो लक्ष्मीजी घर में ठहर जाती है।  

 दिनांक 17 अक्टूबर 2017 को सायं 7.20 पर वृष लग्न है। इसे स्थिर लग्न माना गया है और दीवाली के दौरान यह अधिकतर प्रदोष काल के साथ अधिव्याप्त होता है। अतः धनतेरस की पूजा के लिए शुभ मुहूर्त शाम 07:20 से लेकर 08:17 के बीच तक रहेगा। इस शुभ मुहूर्त में पूजा करने से धन, स्वास्थ्य और आयु बढ़ती है।

 धन त्रयोदशी के दिन भगवान धन्वंतरि का जन्म हुआ था इसीलिए इस दिन को धन तेरस के रूप में पूजा जाता है। दीपावली के दो दिन पहले आने वाले इस त्योहार को लोग काफी धूमधाम से मनाते हैं। इस दिन गहनों और बर्तन की खरीदी जरूर की जाती है। धनवंतरि चिकित्सा के देवता भी हैं इसलिए उनसे अच्छे स्वास्थ्य की कामना की जाती है।

 देवताओं और राक्षसों के बीच समुद्र मंथन

 शास्त्रों के अनुसार समुद्र मंथन के दौरान त्रयो‍दशी के दिन भगवान धन्वंतरि प्रकट हुए थे, इसलिए इस दिन को धन त्रयोदशी कहा जाता है। धन और वैभव देने वाली इस त्रयोदशी का विशेष महत्व माना गया है। 

 कहा जाता है कि समुद्र मंथन के समय बहुत ही दुर्लभ और कीमती सामग्री निकली थी। इसके अलावा के अलावा शरद पूर्णिमा का चंद्रमा, कार्तिक द्वादशी के दिन कामधेनु गाय, त्रयोदशी को धन्वंतरि और कार्तिक मास की अमावस्या तिथि को भगवती लक्ष्मी जी का समुद्र से अवतरण हुआ था। यही कारण है कि दीपावली के दिन लक्ष्मी पूजन और उसके दो दिन पहले त्रयोदशी को भगवान धन्वंतरि का जन्म दिवस धनतेरस के रूप में मनाया जाता है। 

 भगवान धन्वंतरि को प्रिय है पीतल 

 भगवान धन्वंतरि को नारायण भगवान विष्णु का ही एक रूप माना जाता है। इनकी चार भुजाएं हैं, जिनमें से दो भुजाओं में वे शंख और चक्र धारण किए हुए हैं। दूसरी दो भुजाओं में औषधि के साथ वे अमृत कलश लिए हुए हैं। ऐसा माना जाता है कि यह अमृत कलश पीतल का बना हुआ है इसीलिए पीतल भगवान धन्वंतरि की प्रिय धातु है। 

 चांदी खरीदना शुभ  

 धनतेरस के दिन लोग घरेलू बर्तन खरीदते हैं, वैसे इस दिन चांदी खरीदना शुभ माना जाता है क्योंकि चांदी चंद्रमा का प्रतीक माना जाता है। चन्द्रमा शीतलता का मानक है। 
 
मान्यता के अनुसार धनतेरस  

 मान्यता है कि इस दिन खरीदी गई कोई भी वस्तु शुभ फल प्रदान करती है और लंबे समय तक चलती है। लेकिन अगर भगवान की प्रिय वस्तु पीतल की खरीदी की जाए तो इसका तेरह गुना अधिक लाभ मिलता है। 

 क्यों है पूजा-पाठ में पीतल का इतना महत्व? 

 पीतल का निर्माण तांबा और जस्ता धातुओं के मिश्रण से किया जाता है। सनातन धर्म में पूजा-पाठ और धार्मिक कर्म हेतु पीतल के बर्तन का ही उपयोग किया जाता है। ऐसा ही एक किस्सा महाभारत में वर्णित है कि सूर्यदेव ने द्रौपदी को पीतल का अक्षय पात्र वरदानस्वरूप दिया था जिसकी विशेषता थी कि द्रौपदी चाहे जितने लोगों को भोजन करा दें, खाना घटता नहीं था।

 यम की पूजा का भी विधान : 
 
धनतेरस के दिन कुबेर के अलावा देवता यम के पूजा का भी विधान है। धनतेरस के दिन यम की पूजा के संबंध में मान्यता है कि इनकी पूजा से घर में असमय मौत का भय नहीं रहता है।

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Saturday, 14 October 2017

अखबार बेचने से लेकर राष्ट्रपति बनने तक का सफर

अब्दुल कलाम: अखबार बेचने से लेकर राष्ट्रपति बनने तक का सफर

देश के पूर्व राष्ट्रपति और भारत रत्न से सम्मानित अवुल पाकिर जैनुल्लाब्दीन अब्दुल कलाम को पूरा देश एपीजे अब्दुल कलाम के नाम से जानता है. वैज्ञानिक और इंजीनियर कलाम ने 2002 से 2007 तक 11वें राष्ट्रपति के रूप में देश की सेवा की. मिसाइल मैन के रूप में प्रसिद्ध कलाम देश की प्रगति और विकास से जुड़े विचारों से भरे व्यक्ति हैं. उनके जन्मदिन के अवसर पर उनसे जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण बातें और उनके 10 विचार हम आपसे शेयर कर रहे हैं.
- एपीजे अब्दुल कलाम का जन्म 15 अक्टूबर 1931 को दक्षिण भारतीय राज्य तमिलनाडु के रामेश्वरम में हुआ.
पेशे से नाविक कलाम के पिता ज्यादा पढ़े लिखे नहीं थे. ये मछुआरों को नाव किराये पर दिया करते थे. पांच भाई और पांच बहनों वाले परिवार को चलाने के लिए पिता के पैसे कम पड़ जाते थे इसलिए शुरुआती शिक्षा जारी रखने के लिए कलाम को अखबार बेचने का काम भी करना पड़ा.
- आठ साल की उम्र से ही कलाम सुबह 4 बचे उठते थे और नहा कर गणित की पढ़ाई करने चले जाते थे. सुबह नहा कर जाने के पीछे कारण यह था कि प्रत्येक साल पांच बच्चों को मुफ्त में गणित पढ़ाने वाले उनके टीचर बिना नहाए आए बच्चों को नहीं पढ़ाते थे. ट्यूशन से आने के बाद वो नमाज पढ़ते और इसके बाद वो सुबह आठ बजे तक रामेश्वरम रेलवे स्टेशन और बस अड्डे पर न्यूज पेपर बांटते थे.
- 1962 में कलाम इसरो में पहुंचे. इन्हीं के प्रोजेक्ट डायरेक्टर रहते भारत ने अपना पहला स्वदेशी उपग्रह प्रक्षेपण यान एसएलवी-3 बनाया. 1980 में रोहिणी उपग्रह को पृथ्वी की कक्षा के समीप स्थापित किया गया और भारत अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष क्लब का सदस्य बन गया. कलाम ने इसके बाद स्वदेशी गाइडेड मिसाइल को डिजाइन किया. उन्होंने अग्नि और पृथ्वी जैसी मिसाइलें भारतीय तकनीक से बनाईं.
- 1992 से 1999 तक कलाम रक्षा मंत्री के रक्षा सलाहकार भी रहे. इस दौरान वाजपेयी सरकार ने पोखरण में दूसरी बार न्यूक्लियर टेस्ट भी किए और भारत परमाणु हथियार बनाने वाले देशों में शामिल हो गया. कलाम ने विजन 2020 दिया. इसके तहत कलाम ने भारत को विज्ञान के क्षेत्र में तरक्की के जरिए 2020 तक अत्याधुनिक करने की खास सोच दी गई. कलाम भारत सरकार के मुख्य वैज्ञानिक सलाहकार भी रहे.
- 1982 में कलाम को डीआरडीएल (डिफेंस रिसर्च डेवलपमेंट लेबोरेट्री) का डायरेक्टर बनाया गया. उसी दौरान अन्ना यूनिवर्सिटी ने उन्हें डॉक्टर की उपाधि से सम्मानित किया. कलाम ने तब रक्षामंत्री के वैज्ञानिक सलाहकार डॉ. वीएस अरुणाचलम के साथ इंटीग्रेटेड गाइडेड मिसाइल डेवलपमेंट प्रोग्राम (आईजीएमडीपी) का प्रस्ताव तैयार किया. स्वदेशी मिसाइलों के विकास के लिए कलाम की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई गई.
- इसके पहले चरण में जमीन से जमीन पर मध्यम दूरी तक मार करने वाली मिसाइल बनाने पर जोर था. दूसरे चरण में जमीन से हवा में मार करने वाली मिसाइल, टैंकभेदी मिसाइल और रिएंट्री एक्सपेरिमेंट लॉन्च वेहिकल (रेक्स) बनाने का प्रस्ताव था. पृथ्वी, त्रिशूल, आकाश, नाग नाम के मिसाइल बनाए गए. कलाम ने अपने सपने रेक्स को अग्नि नाम दिया. सबसे पहले सितंबर 1985 में त्रिशूल फिर फरवरी 1988 में पृथ्वी और मई 1989 में अग्नि का परीक्षण किया गया.
- इसके बाद 1998 में रूस के साथ मिलकर भारत ने सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल बनाने पर काम शुरू किया और ब्रह्मोस प्राइवेट लिमिटेड की स्थापना की गई. ब्रह्मोस को धरती, आसमान और समुद्र कहीं भी दागी जा सकती है. इस सफलता के साथ ही कलाम को मिसाइल मैन के रूप में प्रसिद्धि मिली और उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया.
- कलाम को 1981 में भारत सरकार ने देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान, पद्म भूषण और फिर, 1990 में पद्म विभूषण और 1997 में भारत रत्न प्रदान किया. भारत के सर्वोच्च पर नियुक्ति से पहले भारत रत्न पाने वाले कलाम देश के केवल तीसरे राष्ट्रपति हैं. उनसे पहले यह मुकाम सर्वपल्ली राधाकृष्णन और जाकिर हुसैन ने हासिल किया.

Saturday, 7 October 2017

करवा चौथ में प्रयुक्त होने वाली सामग्री:

करवा चौ‍थ : आज शाम ही खरीद लें पूजा की ये जरूरी चीजें

सुहागिनों का त्‍योहार करवा चौथ इस बार 8 अक्‍टूबर को यानी कि कल है. आप करवा चौ‍थ कर रही हैं लेकिन यह मालूम नहीं है कि करवा चौथ की पूजा कैसे की जाती हैं और इसमें किन सामग्र‍ियों की आवश्‍यकता होती है, तो हम यहां उन जरूरी साम्रगियों की सूची दे रहे हैं. आज शाम ये सारी सामग्री जुटा लें...
करवा चौथ में प्रयुक्त होने वाली सामग्री:
1. व्रत के दिन प्रातः स्नानादि करने के पश्चात यह संकल्प बोलकर करवा चौथ व्रत का आरंभ करें.
2. पूरे दिन निर्जल रहें.
3. आठ पूरियों की अठावरी बनाएं. हलुवा बनाएं.
4. पीली मिट्टी से गौरी बनाएं और उनकी गोद में गणेशजी बनाकर बिठाएं. गौरी को चुनरी ओढ़ाएं. बिंदी आदि सुहाग सामग्री से गौरी का श्रृंगार करें.
5. जल से भरा हुआ लोटा रखें.
6. करवा में गेहूं और ढक्कन में शक्कर का बूरा भर दें. उसके ऊपर दक्षिणा रखें.
7. रोली से करवा पर स्वस्तिक बनाएं.
8. गौरी-गणेश की परंपरानुसार पूजा करें. पति की दीर्घायु की कामना करें.
9. करवा पर तेरह बिंदी रखें और गेहूं या चावल के तेरह दाने हाथ में लेकर करवा चौथ की कथा कहें या सुनें.
10. कथा सुनने के बाद करवा पर हाथ घुमाकर अपनी सासू जी के पैर छूकर आशीर्वाद लें और करवा उन्हें दे दें.
11. रात्रि में चन्द्रमा निकलने के बाद छलनी की ओट से उसे देखें और चन्द्रमा को अर्ध्य दें. इसके बाद पति से आशीर्वाद लें. उन्हें भोजन कराएं और स्वयं भी भोजन कर लें.
12. सास अपनी बहू को सरगी भेजती है. सरगी में मिठाई, फल, सेवइयां आदि होती है. इसका सेवन महिलाएं करवाचौथ के दिन सूर्य निकलने से पहले करती हैं.
13. अन्य व्रतों के समान करवा चौथ का भी उजमन किया जाता है. करवा चौथ के उजमन में एक थाल में तेरह जगह चार-चार पूड़ियां रखकर उनके ऊपर सूजी का हलुवा रखा जाता है. इसके ऊपर साड़ी-ब्लाउज और रुपये रखे जाते हैं. हाथ में रोली, चावल लेकर थाल में चारों ओर हाथ घुमाने के बाद यह बायना सास को दिया जाता है. तेरह सुहागिन स्त्रियों को भोजन कराने के बाद उनके माथे पर बिंदी लगाकर और सुहाग की वस्तुएं देकर विदा कर दिया जाता है.
करवा चौथ पूजन के लिए ये सामग्री आज ही जरूर खरीद लें...
1. चंदन
2. शहद
3. अगरबत्ती
4. पुष्प
5. कच्चा दूध
6. शक्कर
7. शुद्ध घी
8. दही
9. मिठाई
10. गंगाजल
11. कुंकू
12. अक्षत (चावल)13. सिंदूर
14. मेहंदी
15. महावर
16. कंघा
17. बिंदी
18. चुनरी
19. चूड़ी
20. बिछुआ
21. मिट्टी का टोंटीदार करवा व ढक्कन
22. दीपक
23. रुई
24. कपूर25. गेहूं
26. शक्कर का बूरा
27. हल्दी
28. पानी का लोटा
29. गौरी बनाने के लिए पीली मिट्टी
30. लकड़ी का आसन
31. चलनी
32. आठ पूरियों की अठावरी
33. हलुआ
34. दक्षिणा (दान) के लिए पैसे, इ‍त्यादि।