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Sunday, 11 April 2021

गुरु और सत गुरु में क्या अंतर है?

 गुरु और सत गुरु में क्या अंतर है?

मनुष्य अपनी जरूरतें के हिसाब से गुरु की खोज करता है, खराब से खराब मन वाला व्यक्ति भी ज्ञान एवं मार्गदर्शन देने वाले गुरु से जुड़कर अपने मन के विकारों को दूर कर (मन को सही करके) जीवन में सफलता हासिल करता है, गुरु अपने अनुभव के अनुसार हमारा मार्गदर्शन करता है, अगर हमारे ऊपर खराब ग्रह दशा का प्रभाव होता है, तो हम गुरु की बातों को सुनकर भी नजरअंदाज करते हैं और जहां- जिस अवस्था में होते हैं, उसी अवस्था में, बिना विशेष उन्नति के रह जाते हैं, लेकिन अगर हम, अपने मन की ना सुन के, गुरु की बात का पूरा अनुसरण करते हैं, तो हमारे जीवन में परिवर्तन होने लगता है और हम साधारण मनुष्य ना होकर विशेष बनने लग जाते हैं, इसी को गुरुकृपा कहते हैं, ध्यान रहे गुरु एक साधारण मनुष्य है जो हमें राह दिखाता है, सफल होने के लिए हमें उस राह पर चलना स्वयं पड़ता है,
सत्गुरु/सद्गुरु/सच्चा गुरु : गुरु के अन्य रूपों जैसे संगीत विद्या के गुरु, पढा़ने वाले गुरु, माता-पिता रूपी गुरु आदि से अलग माना जाता है। सत्गुरु नाम केवल ऐसे ज्ञानप्राप्त ऋषि/ संत को दिया जाता है जिसके जीवन का उद्देश्य आध्यात्मिक मार्ग पर गुरु-शिष्य परंपरा के अनुसार बनाए गए शिष्य को मार्गदर्शन देना है जिसके परिणाम से ईश्वर प्राप्ति हो कर आत्मज्ञान हो जाता है।
सदगुरु हमें आत्मा के सम्मुख कर देते हैं।
गुरु एक तत्व है, जिसे गुरुतत्व कहते है, जो परमात्मा का दया भाव है। जब परमात्मा कृपा करते हैं तभी व्यक्ति को गुरु का मार्गदर्शन प्राप्त होता है
मूल स्रोत: इस उत्तर का मूल स्रोत है संसार में भटकते- भटकते गुरुतत्व को हासिल करना, जय गुरुदेव ।
परमात्मा आपको आपसे के गुरु से मिलाएं,
ताकि आप जीवन में विशेष उन्नति कर पाए,
इसका यह मतलब यह कदापि नहीं है कि बिना गुरु के आप उन्नति नहीं कर सकते, बिना गुरु के भी आप उन्नति कर सकते हैं अगर कभी आप अपने को कमजोर महसूस करें, तो गुरु नाम ताकत की दवा से उन्नति करें

Friday, 31 July 2020

राम मंदिर की नींव में पड़ेंगी काशी में बनी सोने और चांदी की ये 4 चीजें, जानें इनका महत्व

राम मंदिर की नींव में पड़ेंगी काशी में बनी सोने और चांदी की ये 4 चीजें, जानें इनका महत्व

राम मंदिर भूमि पूजन कराने के लिए बनारस हिंदू विश्वविदयालय के धर्म विज्ञान संकाय के प्रोफेसर डॉ. रामनारायण द्विवेदी, प्रोफेसर विनय पांडेय और प्रोफेसर रामचंद्र पांडेय अयोध्या जा रहे हैं.
वाराणसी: अयोध्या में बनने जा रहे राम मंदिर की नींव में बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी का बेलपत्र और वास्तुपुरुष डाला जाएगा. इसके लिए चांदी का बेलपत्र और सोने से बना वास्तुपुरुष तैयार हो गया है. श्री काशी विद्वत परिषद के विद्वान इस चांदी के बेलपत्र और स्वर्ण वास्तुपुरुष को अपने साथ अयोध्या ले जाएंगे और राम मंदिर भूमि पूजन के दौरान नींव में विसर्जित कर देंगे.
राम मंदिर भूमि पूजन कराने के लिए बनारस हिंदू विश्वविदयालय के धर्म विज्ञान संकाय के प्रोफेसर डॉ. रामनारायण द्विवेदी, प्रोफेसर विनय पांडेय और प्रोफेसर रामचंद्र पांडेय अयोध्या जा रहे हैं. ये विद्वान राम मंदिर की नींव में विराजित होने के लिए वाराणसी से बेलपत्र और वास्तुपुरुष के अलावा सोने के शेषनाग, चांदी के कच्छप, सवा पाव चंदन और पंचरत्न अपने साथ अयोध्या लेकर जाएंगे. ये सभी चीजें बनकर तैयार हो गई हैं.

पहले इन सभी चीजों को बाबा विश्वनाथ को चढ़ाया जाएगा.
फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 5 अगस्त को प्रसाद के रूप में इन चीजों को राम मंदिर की नींव में स्थापित करेंगे. प्रोफेसर डॉ. राम नारायण द्विवेदी ने इन चीजों का महत्व समझाया. उन्होंने कहा,

''धरती शेषनाग पर टिकी है. खुद भगवान भी शेषनाग की शैय्या पर विराजते हैं. इसलिए सोने के शेषनाग को नींव के अंदर स्थापित किया जाएगा. इसके अलावा कच्छप लक्ष्मी जी की सवारी है. इससे वह स्थान हमेशा जागृत और दिव्यता प्राप्त करेगा.''

उन्होंने आगे बताया, ''स्वर्ण वास्तु देवता एक वास्तु पुरुष हैं. इसलिए किसी भी नींव पूजन में इनके होने से सभी वास्तु दोष खत्म हो जाते हैं. वहीं बेलपत्र और चंदन भगवान शिव को सबसे अधिक प्रिय हैं. इसके अलावा पंचरत्न और पंच औषधियों का भी नींव पूजन में बहुत महत्व है.''


Wednesday, 29 July 2020

अयोध्या के श्रीराम का ओरछा से क्या है नाता, जानें 600 साल पुराना इतिहास

ओरछा की धड़कन में भी राम विराजमान हैं. राम यहां धर्म से परे हैं. हिंदू हों या मुस्लिम, दोनों के ही वे आराध्य हैं. अयोध्या और ओरछा का करीब 600 वर्ष पुराना नाता है

16वीं शताब्दी में महारानी कुंवरि गणेश रामलला को लाईं थीं ओरछा
21 दिन तप के बाद प्रभु राम तीन शर्तों पर ओरछा चलने को हुए राजी

प्रभु राम का विशाल मंदिर बनना शुरू हो जाएगा. अयोध्या के रामलला के साथ ही ओरछा के राजाराम भी हमेशा चर्चा में रहते हैं. अयोध्या से मध्य प्रदेश के ओरछा की दूरी तकरीबन साढ़े चार सौ किलोमीटर है, लेकिन इन दोनों ही जगहों के बीच गहरा नाता है. जिस तरह अयोध्या के रग-रग में राम हैं, ठीक उसी प्रकार ओरछा की धड़कन में भी राम विराजमान हैं. राम यहां धर्म से परे हैं. हिंदू हों या मुस्लिम, दोनों के ही वे आराध्य हैं. अयोध्या और ओरछा का करीब 600 वर्ष पुराना नाता है. कहा जाता है कि 16वीं शताब्दी में ओरछा के बुंदेला शासक मधुकरशाह की महारानी कुंवरि गणेश अयोध्या से रामलला को ओरछा ले आईं थीं.

पौराणिक कथाओं के अनुसार ओरछा के शासक मधुकरशाह कृष्ण भक्त थे, जबकि उनकी महारानी कुंवरि गणेश, राम उपासक. इसके चलते दोनों के बीच अक्सर विवाद भी होता था. एक बार मधुकर शाह ने रानी को वृंदावन जाने का प्रस्ताव द‍िया पर उन्होंने विनम्रतापूर्वक उसे अस्वीकार करते हुए अयोध्या जाने की जिद कर ली. तब राजा ने रानी पर व्यंग्य किया क‍ि अगर तुम्हारे राम सच में हैं तो उन्हें अयोध्या से ओरछा लाकर दिखाओ.

जब प्रभु राम ने ओरछा चलने के लिए रखीं 3 शर्तें

इस पर महारानी कुंवरि अयोध्या रवाना हो गईं. वहां 21 दिन उन्होंने तप किया. इसके बाद भी उनके आराध्य प्रभु राम प्रकट नहीं हुए तो उन्होंने सरयू नदी में छलांग लगा दी. कहा जाता है क‍ि महारानी की भक्ति देखकर भगवान राम नदी के जल में ही उनकी गोद में आ गए. तब महारानी ने राम से अयोध्या से ओरछा चलने का आग्रह किया तो उन्होंने तीन शर्तें रख दीं.

पहली, मैं यहां से जाकर जिस जगह बैठ जाऊंगा, वहां से नहीं उठूंगा.

दूसरी, ओरछा के राजा के रूप विराजित होने के बाद क‍िसी दूसरे की सत्ता नहीं रहेगी.


तीसरी और आखिरी शर्त खुद को बाल रूप में पैदल एक विशेष पुष्य नक्षत्र में साधु संतों को साथ ले जाने की थी.

महारानी ने ये तीनों शर्तें सहर्ष स्वीकार कर ली. इसके बाद ही रामराजा ओरछा आ गए. तब से भगवान राम यहां राजा के रूप में विराजमान हैं. राम के अयोध्या और ओरछा, दोनों ही जगहों पर रहने की बात कहता एक दोहा आज भी रामराजा मन्दिर में लिखा है कि रामराजा सरकार के दो निवास हैं खास दिवस ओरछा रहत हैं रैन अयोध्या वास.

बुंदेला शासक मधुकर शाह पर अयोध्या के संतों का भरोसा

इतिहास में यह बात दर्ज है क‍ि जब अकबर के दरबार में तिलक लगाकर आने पर पाबंदी लगा दी गई थी, तब मधुकर शाह ने भरे दरबार में बगावत कर दी थी. उनके तेवर के चलते अकबर को अपना फरमान वापस लेना पड़ा था. अयोध्या के संतों को यह भरोसा था कि मधुकर शाह की हिंदूवादी सोच के बीच राम जन्मभूमि का श्रीराम का यह विग्रह ओरछा में पूरी तरह सुरक्षित रहेगा. इसीलिए उनकी महारानी कुंवर गणेश अयोध्या पहुंचीं और संतों से मिलकर विग्रह को ओरछा ले आईं.

बुंदेला शासक मधुकर शाह की महारानी कुंवरि गणेश ने ही श्री राम को अयोध्या से ओरछा लाकर विराजित किया था, यह धार्मिक कथा ही नहीं है, बल्कि उन संभावनाओं को भी मान्यता देती है जिनमें कहा गया कि कहीं अयोध्या की राम जन्म भूमि की असली मूर्ति ओरछा के रामराजा मंदिर में विराजमान तो नहीं? अयोध्या के रामलला के साथ ही ओरछा के राजाराम भी सुर्खियों में आ जाते हैं.

हर बार मीडिया में ये सवाल सुर्खियों में रहता है कि अयोध्या जन्म भूमि की प्रतिमा ही ओरछा के रामराजा मंदिर में विराजमान है. इतिहासकार बताते हैं क‍ि रामराजा के लिए ओरछा के मंदिर का निर्माण कराया गया था, पर बाद में उन्हें सुरक्षा कारणों से मंदिर की बजाए रसोई में विराजमान किया गया. इसके पीछे तर्क ये है कि माना जाता था कि रजवाड़ों की महिलाएं जिस रसोई में रहती हैं, उससे अधिक सुरक्षा और कहीं नहीं हो सकती.

ओरछा में राम हिन्दुओं के भी, मुसलमानों के भी



ओरछा में राम हिन्दुओं के भी हैं और मुसलमानों के भी. 40 सालों से ओरछा निवासी मुन्ना खान जो सिलाई का काम करते हैं. वह कहते हैं क‍ि रोज दरबार में सजदा करता हूं. हमारे तो सब यही हैं. राम उनके आराध्य हैं. ओरछा के ही नईम बेग भी राम को उतना ही मानते हैं जितना रहीम को. वे कहते हैं कि आपसी भाईचारा ऐसा ही रहे, जैसा ओरछा के रामराजा दरबार में है. यही तो ओरछा के राम की गंगा जमुनी तहजीब है. ओरछा के राम श्रद्धा चाहते हैं. इसलिए उन्होंने विशाल चतुर्भुज मन्दिर त्याग कर वात्सल्य भक्ति की प्रतिमूर्ति महारानी कुंवरि गणेश की रसोई में बैठना स्वीकार किया था. राम भक्तों के भावों में बसते हैं, भवनों की भव्यता में नहीं.राजाराम को दिया जाता है गार्ड ऑफ ऑनर

ओरछा और अयोध्या का संबंध करीब 600 वर्ष पुराना है. कहते हैं कि संवत 1631 में चैत्र शुक्ल नवमी को जब भगवान राम ओरछा आए तो उन्होंने संत समाज को यह आश्वासन भी दिया था क‍ि उनकी राजधानी दोनों नगरों में रहेगी. तब यह बुन्देलखण्ड की 'अयोध्या' बन गया. ओरछा के रामराजा मंदिर की एक और खासियत है. एक राजा के रूप में विराजने की वजह से उन्हें चार बार की आरती में सशस्त्र सलामी गार्ड ऑफ ऑनर दिया जाता है. ओरछा नगर के परिसर में यह गार्ड ऑफ ऑनर रामराजा के अलावा देश के किसी भी वीवीआईपी को नहीं दिया जाता, प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति तक को न



Wednesday, 22 July 2020

जन्मजयंती लोकमान्य तिलक जी

23 जुलाई – . जिन्होंने राष्ट्रनीति के साथ धर्म भी निभाया और गरम दल के द्वारा क्रांतिकारियों के बने प्रेरणास्रोत

‘स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा’ – बाल गंगाधर तिलक

बहुत पहले ही ये जान चुके थे की आज़ादी चरखे से नहीं आ सकती . और न ही लच्छेदार बातों से .. इन्हे पता था की ये अंग्रेज कितने क्रूर हैं और इनका असली इलाज़ क्या है . अफ़सोस सिर्फ अपनी जिद पर जूझने वाले कुछ तथाकथित सेकुलरों ने इनका साथ नहीं दिया और इन्हे अलग थलग पड़ने पर मजबूर होना पड़ा लेकिन इनकी आवाज बुलंद रही और ये देश के लिए जो भी संभव रहा वो करते रहे .. बाल गंगाधर तिलक का जन्म 23 जुलाई, सन् 1856 ई. को भारत के रत्नागिरि नामक स्थान पर हुआ था। इनका पूरा नाम ‘लोकमान्य श्री बाल गंगाधर तिलक’ था। तिलक का जन्म एक सुसंस्कृत, मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था।

उनके पिता का नाम ‘श्री गंगाधर रामचंद्र तिलक’ था। श्री गंगाधर रामचंद्र तिलक पहले रत्नागिरि में सहायक अध्यापक थे और फिर पूना तथा उसके बाद ‘ठाणे’ में सहायक उपशैक्षिक निरीक्षक हो गए थे। वे अपने समय के अत्यंत लोकप्रिय शिक्षक थे। उन्होंने ‘त्रिकोणमिति’ और ‘व्याकरण’ पर पुस्तकें लिखीं जो प्रकाशित हुईं। तथापि, वह अपने पुत्र की शिक्षा-दीक्षा पूरी करने के लिए अधिक समय तक जीवित नहीं रहे। लोकमान्य तिलक के पिता ‘श्री गंगाधर रामचंद्र तिलक’ का सन् 1872 ई. में निधन हो गया। बाल गंगाधर तिलक अपने पिता की मृत्यु के बाद 16 वर्ष की उम्र में अनाथ हो गए। उन्होंने तब भी बिना किसी व्यवधान के अपनी शिक्षा जारी रखी और अपने पिता की मृत्यु के चार महीने के अंदर मैट्रिक की परीक्षा पास कर ली। वे ‘डेक्कन कॉलेज’ में भर्ती हो गए फिर उन्होंने सन् 1876 ई. में बी.ए. आनर्स की परीक्षा वहीं से पास की सन् 1879 ई. में उन्होंने बंबई विश्वविद्यालय से एल.एल.बी. की परीक्षा पास की और क़ानून की पढ़ाई करते समय उन्होंने ‘आगरकर’ से दोस्ती कर ली जो बाद में ‘फ़र्ग्युसन कॉलेज’ के प्रिंसिपल हो गए। तिलक ने प्लेग की बीमारी के दौरान देशवासियों की जो सेवा की, उसे भी नहीं भुलाया जा सकता।

स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा’ – बाल गंगाधर तिलक .
बहुत पहले ही ये जान चुके थे की आज़ादी चरखे से नहीं आ सकती . और न ही लच्छेदार बातों से .. इन्हे पता था की ये अंग्रेज कितने क्रूर हैं और इनका असली इलाज़ क्या है . अफ़सोस सिर्फ अपनी जिद पर जूझने वाले कुछ तथाकथित सेकुलरों ने इनका साथ नहीं दिया और इन्हे अलग थलग पड़ने पर मजबूर होना पड़ा लेकिन इनकी आवाज बुलंद रही और ये देश के लिए जो भी संभव रहा वो करते रहे .. बाल गंगाधर तिलक का जन्म 23 जुलाई, सन् 1856 ई. को भारत के रत्नागिरि नामक स्थान पर हुआ था। इनका पूरा नाम ‘लोकमान्य श्री बाल गंगाधर तिलक’ था। तिलक का जन्म एक सुसंस्कृत, मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था।उनके पिता का नाम ‘श्री गंगाधर रामचंद्र तिलक’ था। श्री गंगाधर रामचंद्र तिलक पहले रत्नागिरि में सहायक अध्यापक थे और फिर पूना तथा उसके बाद ‘ठाणे’ में सहायक उपशैक्षिक निरीक्षक हो गए थे। वे अपने समय के अत्यंत लोकप्रिय शिक्षक थे। उन्होंने ‘त्रिकोणमिति’ और ‘व्याकरण’ पर पुस्तकें लिखीं जो प्रकाशित हुईं। तथापि, वह अपने पुत्र की शिक्षा-दीक्षा पूरी करने के लिए अधिक समय तक जीवित नहीं रहे। लोकमान्य तिलक के पिता ‘श्री गंगाधर रामचंद्र तिलक’ का सन् 1872 ई. में निधन हो गया। बाल गंगाधर तिलक अपने पिता की मृत्यु के बाद 16 वर्ष की उम्र में अनाथ हो गए। उन्होंने तब भी बिना किसी व्यवधान के अपनी शिक्षा जारी रखी और अपने पिता की मृत्यु के चार महीने के अंदर मैट्रिक की परीक्षा पास कर ली। वे ‘डेक्कन कॉलेज’ में भर्ती हो गए फिर उन्होंने सन् 1876 ई. में बी.ए. आनर्स की परीक्षा वहीं से पास की सन् 1879 ई. में उन्होंने बंबई विश्वविद्यालय से एल.एल.बी. की परीक्षा पास की और क़ानून की पढ़ाई करते समय उन्होंने ‘आगरकर’ से दोस्ती कर ली जो बाद में ‘फ़र्ग्युसन कॉलेज’ के प्रिंसिपल हो गए। तिलक ने प्लेग की बीमारी के दौरान देशवासियों की जो सेवा की, उसे भी नहीं भुलाया जा सकता। जैसे ही पूना में प्लेग के लक्षण प्रकट हुए उन्होंने ‘हिन्दू प्लेग अस्पताल’ शुरू किया और कई दिनों तक इसके लिए धन जुटाने का कार्य किया। जहाँ पूना के अधिकांश नेता नगर छोड़कर भाग गए थे, तिलक वहीं रहे। उन्होंने लोगों को दिलासा-भरोसा दिलाया। वे खोजी दलों के साथ स्वयंसेवक के रूप में गए, अस्पताल का प्रबंध किया, पृथक्करण शिविर में नि:शुल्क रसोई की व्यवस्था की, और जनता के सामने आ रही कठिनाइयों के बारे में श्री रेंड तथा महामहिम गवर्नर को बताते रहे। अपने समाचारपत्रों में उन्होंने प्लेग की समाप्ति के लिए सरकार द्वारा उठाए गए विभिन्न क़दमों का समर्थन दृढ़ता के साथ किया, इसी के साथ उन्होंने सलाह दी कि इन उपायों को सहानुभूतिपूर्ण और मैत्रीपूर्ण ढंग से लागू किया जाए। उन्होंने जनता को सलाह दी कि वह अनावश्यक विरोध न करे। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नरम दल के लिए तिलक के विचार ज़रा ज़्यादा ही उग्र थे।

नरम दल के लोग छोटे सुधारों के लिए सरकार के पास वफ़ादार प्रतिनिधिमंडल भेजने में विश्वास रखते थे। तिलक का लक्ष्य स्वराज था, छोटे- मोटे सुधार नहीं और उन्होंने कांग्रेस को अपने उग्र विचारों को स्वीकार करने के लिए राज़ी करने का प्रयास किया। इस मामले पर सन् 1907 ई. में कांग्रेस के ‘सूरत अधिवेशन’ में नरम दल के साथ उनका संघर्ष भी हुआ। राष्ट्रवादी शक्तियों में फूट का लाभ उठाकर सरकार ने तिलक पर राजद्रोह और आतंकवाद फ़ैलाने का आरोप लगाकर उन्हें छह वर्ष के कारावास की सज़ा दे दी और मांडले, बर्मा, वर्तमान म्यांमार में निर्वासित कर दिया। ‘मांडले जेल’ में तिलक ने अपनी महान कृति ‘भगवद्गीता – रहस्य’ का लेखन शुरू किया, जो हिन्दुओं की सबसे पवित्र पुस्तक का मूल टीका है। तिलक ने भगवद्गीता के इस रूढ़िवादी सार को ख़ारिज कर दिया कि यह पुस्तक सन्न्यास की शिक्षा देती है; उनके अनुसार, इससे मानवता के प्रति नि:स्वार्थ सेवा का संदेश मिलता है।

तिलक अपना सारा समय हलके-फुलके लेखन में लगाने वाले व्यक्ति नहीं थे। उन्होंने अब अपने ख़ाली समय का उपयोग किसी अच्छे कार्य में लगाने का संकल्प लेकर उसे अपनी प्रिय पुस्तकों भगवद्गीता और ऋग्वेद के पठन-पाठन में लगाया। वेदों के काल-निर्धारण से संबंधित अपने अनुसंधान के परिणामस्वरूप उन्होंने वेदों की प्राचीनता पर एक निबंध लिखा। जो गणित-ज्योतिषीय अवलोकन के प्रमाणों पर आधारित था। उन्होंने इस निबंध का सारांश इंटरनेशनल कांग्रेस ऑफ ओरिएंटलिस्ट के पास भेजा जो सन् 1892 ई. में लंदन में हुई। अगले वर्ष उन्होंने इस पूरे निबंध को पुस्तकाकार में दि ओरिऑन या दि रिसर्च इनटु द एंटिक्विटी ऑफ द वेदाज शीर्षक के अंतर्गत प्रकाशित किया। उन्होंने इस पुस्तक में ओरिऑन की ग्रीक परंपरा और ‘लक्षत्रपुंज’ के संस्कृत अर्थ ‘अग्रायण या अग्रहायण’ के बीच संबंध को ढूंढा है।

तिलक अपना सारा समय हलके-फुलके लेखन में लगाने वाले व्यक्ति नहीं थे। उन्होंने अब अपने ख़ाली समय का उपयोग किसी अच्छे कार्य में लगाने का संकल्प लेकर उसे अपनी प्रिय पुस्तकों भगवद्गीता और ऋग्वेद के पठन-पाठन में लगाया। वेदों के काल-निर्धारण से संबंधित अपने अनुसंधान के परिणामस्वरूप उन्होंने वेदों की प्राचीनता पर एक निबंध लिखा। जो गणित-ज्योतिषीय अवलोकन के प्रमाणों पर आधारित था। उन्होंने इस निबंध का सारांश इंटरनेशनल कांग्रेस ऑफ ओरिएंटलिस्ट के पास भेजा जो सन् 1892 ई. में लंदन में हुई। अगले वर्ष उन्होंने इस पूरे निबंध को पुस्तकाकार में दि ओरिऑन या दि रिसर्च इनटु द एंटिक्विटी ऑफ द वेदाज शीर्षक के अंतर्गत प्रकाशित किया। उन्होंने इस पुस्तक में ओरिऑन की ग्रीक परंपरा और ‘लक्षत्रपुंज’ के संस्कृत अर्थ ‘अग्रायण या अग्रहायण’ के बीच संबंध को ढूंढा है।

अगले वर्ष उन्होंने सत्याग्रह के कार्यक्रम की रूपरेखा बनाई, जिसे नए दल का सिद्धांत कहा जाता था। उन्हें उम्मीद थी कि इससे ब्रिटिश शासन का सम्मोहनकारी प्रभाव ख़त्म होगा और लोग स्वतंत्रता प्राप्ति हेतु बलिदान के लिए तैयार होंगे। तिलक द्वारा शुरू की गई राजनीतिक गतिविधियों, विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार और सत्याग्रह को बाद में मोहनदास करमचंद गाँधी ने अंग्रेज़ों के साथ अहिंसक असहयोग आंदोलन में अपनाया। श्री रेंड और लेफ्टिनेंट आयर्स्ट की हत्या कुछ अज्ञात लोगों द्वारा 22 जून को कर दी गई। इससे बंबई और पूना में, विशेष रूप से ‘एंग्लो इंडियन समुदाय’ में जबरदस्त उत्तेजना फ़ैली। 26 जुलाई को बंबई सरकार ने तिलक पर मुक़दमा चलाने की मंजूरी प्रदान की और 27 जुलाई को पूर्वी भाषाओं के अनुवादक श्री बेग ने बंबई के ‘चीफ प्रेसीडेंसी मजिस्ट्रेट’ श्री जे. सेंडर्स स्लेटर के सामने सूचना रखी। 27 जुलाई की रात में तिलक को बंबई में गिरफ़्तार कर लिया गया और दूसरे दिन उन्हें मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया। इसके फौरन बाद मजिस्ट्रेट के सामने ज़मानत की अर्जी दाख़िल की गई।

सरकार ने दृढ़ता और सफलता के साथ इसका विरोध किया। 29 तारीख को इसी तरह की एक अर्जी उच्च न्यायालय में दाख़िल की गई, जिसे फिर से आवेदन करने की अनुमति के साथ अस्वीकार कर दिया गया। 2 अगस्त को यह केस हाई कोर्ट सेशन के सुपर्द कर दिया गया और अध्यक्ष न्यायाधीश, न्यायमूर्ति बदरुद्दीन तैयबजी के सामने जमानत की अर्जी फिर दाख़िल की थी। ज़मानत की अर्जी का प्रबल विरोध एडवोकेट जनरल ने किया लेकिन न्यायाधीश ने तिलक को ज़मानत दे दी। तिलक कारावास में अत्यधिक दुर्बल हो गए थे। अपना स्वास्थ्य सुधारने के लिए उन्होंने पहले कुछ दिन ‘सिंहगढ़ सेनीटोरियम’ में बिताए, दिसंबर में मद्रास में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल होने के बाद उन्होंने श्रीलंका का दौरा किया। अपने आंदोलन को जहाँ छोड़ा था, वहीं से उसे फिर शुरू करने और आगे बढ़ाने में अगले दो वर्ष उन्होंने लगाए। उनके बहुत से काम उनके जेल जाने के कारण रुक गए थे। रायगढ़ क़िले में सन् 1900 ई. में एक विशाल ‘शिवाजी महोत्सव’ आयोजित किया गया। शिवाजी की स्मृति को स्थायी बनाने के लिए एक स्मारक बनाने की दिशा में भी कुछ काम आगे बढ़ा।

लेकिन किसी भी अन्य कार्य से अधिक महत्तवपूर्ण उनका वेदों की प्राचीनता-संबंधी कार्य था। इन आरोपों पर तिलक को अदालत के सुपुर्द करने से श्री एस्टन संतुष्ट नहीं हुए। उन्होंने सरकार को सुझाव दिया कि इस मामले से उत्पन्न कुछ अन्य सहायक आरोपों जैसे की पुलिस को ग़लत सूचना देना, धोखाधड़ी करना, गैरक़ानूनी सभा करना आदि की जाँच कराई जाएँ। तिलक बाद में पूना की मूल अधिकार क्षेत्र की अदालत में दत्तक-ग्रहण का मुक़दमा जीत गए। इससे उनके शब्द और कार्य पूरी तरह उचित प्रमाणित हो गए। अगले वर्ष तिलक ने अपने निजी मामलों, विशेषकर समाचारपत्र और छापेखाने से संबंधित कार्यों को संगठित एवं ठीक-ठाक किया। ‘केसरी’ की प्रसार संख्या में अत्यधिक बढ़ोतरी हो गई थी। अत: उसकी छपाई के लिए एक बड़ी मशीन का आयात करना ज़रूरी हो गया था। महाराजा गायकवाड़ ने ‘पूना का गायकवाड़ बाड़ा’ उन्हें उचित दाम पर उनके हाथों बेच दिया। इससे तिलक ज़रूरत के मुताबिक अपने समाचारपत्र और उसके छापेखाने को स्थायी जगह दे सके.

लेकिन किसी भी अन्य कार्य से अधिक महत्तवपूर्ण उनका वेदों की प्राचीनता-संबंधी कार्य था। इन आरोपों पर तिलक को अदालत के सुपुर्द करने से श्री एस्टन संतुष्ट नहीं हुए। उन्होंने सरकार को सुझाव दिया कि इस मामले से उत्पन्न कुछ अन्य सहायक आरोपों जैसे की पुलिस को ग़लत सूचना देना, धोखाधड़ी करना, गैरक़ानूनी सभा करना आदि की जाँच कराई जाएँ। तिलक बाद में पूना की मूल अधिकार क्षेत्र की अदालत में दत्तक-ग्रहण का मुक़दमा जीत गए। इससे उनके शब्द और कार्य पूरी तरह उचित प्रमाणित हो गए। अगले वर्ष तिलक ने अपने निजी मामलों, विशेषकर समाचारपत्र और छापेखाने से संबंधित कार्यों को संगठित एवं ठीक-ठाक किया। ‘केसरी’ की प्रसार संख्या में अत्यधिक बढ़ोतरी हो गई थी। अत: उसकी छपाई के लिए एक बड़ी मशीन का आयात करना ज़रूरी हो गया था। महाराजा गायकवाड़ ने ‘पूना का गायकवाड़ बाड़ा’ उन्हें उचित दाम पर उनके हाथों बेच दिया। इससे तिलक ज़रूरत के मुताबिक अपने समाचारपत्र और उसके छापेखाने को स्थायी जगह दे सके.

विदेशी विचारों और प्रथाओं के अंधानुकरण से नई पीढ़ी में अधार्मिकता पैदा हो रही है और उसका विनाशक प्रभाव भारतीय युवकों के चरित्र पर पड़ रहा है। तिलक का विश्वास था कि अगर स्थिति को इसी प्रकार बिगड़ने दिया गया तो अंतत: नैतिक दीवालिएपन की स्थिति आ जाएगी, जिससे कोई भी राष्ट्र उबर नहीं सकता। यह एक गंभीर समस्या थी और भारत सरकार तक ने उस समय इस ओर ध्यान दिया था। सरकार की नज़र में इस बीमारी का इलाज भारतीय स्कूलों में नैतिक शिक्षा की पाठ्यपुस्तकों की पढ़ाई शुरू करना था। तिलक ने सरकार के इस सुझाव की कठोर आलोचना ‘मराठा’ के अनेक अंकों में की। तिलक के विचार में, भारतीय युवकों को स्वावलंबी और अधिक ऊर्जावान बनाने के लिए उनको अधिक आत्म-सम्मान का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। यह तभी किया जा सकता है, जब उन्हें अपने धर्म और पूर्वजों का अधिक आदर करना सिखाया जाएँ। अत्यधिक और निरुद्देश्य आत्मआलोचना एक तपस्वी या दार्शनिक के लिए अच्छी हो सकती है, लेकिन व्यावहारिक जीवन में इससे प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

अतिरिक्त देशप्रेम के कारण कभी थोड़ी-बहुत अप्रिय स्थिति उत्पन्न हो सकती है, लेकिन इसके अच्छे नतीजे भी निकलते हैं, जबकि पूर्ण आत्मत्याग का नतीजा केवल आलस्य और मौत हो सकती है। तिलक का जीवन घटना-प्रधान रहा है। वे मौलिक विचारों के व्यक्ति थे। वह संघर्षशील और परिश्रमशील थे। वे आसानी से कुछ भी ठुकरा सकते थे। वह तब विशेष प्रसन्नता का अनुभव करते थे, जब उन्हें कठिन चुनौतियों का सामना करना पड़ता था। उनके अधिकांश कार्य परोपकार की भावना से भरे होते थे। उनकी एकमात्र इच्छा थी लोगों की भलाई के लिए कार्य करना और यह बात स्वीकार की जाती है कि वे अपनी इस इच्छा को काफ़ी हद तक पूरी करने में सफल रहे थे। उनमें योग्यता, अध्यवसाय, उद्यमशीलता और देशप्रेम का ऐसा अनूठा संगम था कि अंग्रेज़ सरकार उनसे हमेशा चौकस रहती थी। तिलक के अनेक मित्र उनके प्रति शक्तिशाली ब्रिटिश सरकार के रवैये को संभवत: यह कह कर स्वीकार करेंगे कि यह उनके वास्तविक मूल्यों का जीता-जागता प्रमाणपत्र है।

सन 1919 ई. में कांग्रेस की अमृतसर बैठक में हिस्सा लेने के लिए स्वदेश लौटने के समय तक तिलक इतने नरम हो गए थे कि उन्होंने ‘मॉन्टेग्यू- चेम्सफ़ोर्ड सुधारों’ के ज़रिये स्थापित ‘लेजिस्लेटिव काउंसिल’ (विधायी परिषदों) के चुनाव के बहिष्कार की गाँधी की नीति का विरोध नहीं किया। इसके बजाय तिलक ने क्षेत्रीय सरकारों में कुछ हद तक भारतीयों की भागीदारी की शुरुआत करने वाले सुधारों को लागू करने के लिए प्रतिनिधियों को सलाह दी कि वे उनके ‘प्रत्युत्तरपूर्ण सहयोग’ की नीति का पालन करें। लेकिन नए सुधारों को निर्णायक दिशा देने से पहले ही 1 अगस्त, सन् 1920 ई. में बंबई में राजनीती में राष्ट्रनीति के इस महान समन्वयक की का स्वर्गवास हो गया


हत्यारे खिलजी की कब्र है पुरातत्व संरक्षित पर चन्द्रशेखर आज़ाद दाह स्थली पर सोते हैं कुत्ते और होता है जुआ
आज जयंती पर ये विषय हो रहा है प्रासंगिक और उठ रहे हैं सवाल कि ऐसा क्यों ?



एक वीर बलिदानी जिसने जीवन का एक भी पल अपने लिए नहीं जिया और देश के लिए मात्र अल्पायु में ही संसार की उस समय की सबसे बड़ी सैन्य सत्ता ब्रिटिश से लड़ते हुए अमरता को प्राप्त हो गया उसकी दाह स्थली पर आज कुत्ते सोते हुए और जुआ खेलते जुआरी मिल जायेगें लेकिन वो आक्रान्ता जिसने नारियों का बलात्कार किया , हिन्दुओं का सर काटा और तमाम पवित्र आत्माओं को जौहर के लिए मजबूर कर दिया उसकी कब्र पुरातत्व द्वारा संरक्षित है .. क्या ये पीड़ा उन अमर बलिदानियों को नहीं होती होगी ?

पहले बात करते हैं भारत के कलंक कहे जा सकने वाले अलाउद्दीन खिलजी की . विदेश से आया ये लुटेरा आज भी दिल्ली के महरौली इलाके में कुतुबमीनार के पास पुरातत्व द्वारा संरक्षित कब्र में आराम फरमा रहा है जिसकी कब्र को भारत के पहले के तथाकथित धर्म निरपेक्ष और आज़ादी के ठेकेदार शासकों ने संरक्षित कर के रखा है . उस स्थान की साफ़ सफाई का पूरा ध्यान रखा जाता है और सुरक्षा का भी पूरा प्रबंध है जिस से भारत की धर्म निरपेक्षता खिलजी की कब्र में सलामत रहे . नकली वामपंथी और झोलाछाप इतिहासकार पुरष्कार भी लौटाना शुरू कर देंगे अगर खिलजी का उचित सम्मान नहीं रखा गया तो ..

और चन्द्रशेखर आज़ाद जो यकीनन संसार के सबसे महानतम क्रांतिकारी थे . जो बल बुद्धि के ऐसे जीवंत रूप थे जिन्होंने भारत के लिए अपने जीवन की पहली और अंतिम सांस ली . उस क्रांतिवीर की दाहस्थली इलाहाबाद के चन्द्रशेखर आज़ाद पार्क से लगभग 5 किलोमीटर दूर तेलियरगंज के रसूलाबाद श्मशान घाट पर है . ये स्थान उत्तर प्रदेश की राष्ट्रवादी सरकार के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य का संसदीय इलाका भी माना जाता है लेकिन उस स्थान पर जहाँ संसार का सबसे महान क्रांतिवीर का अंतिम संस्कार हुआ था वहाँ एक टूटी फूटी मीनार जो किसी ने अपने खुद के पैसे से बनवाई थी , बेहद जर्जर हालत में पड़ी है . उस स्थान पर आज भी जुआ होता है और उस वीर की दाह स्थली पर कुत्ते और अन्य जानवर सोते हैं .. आज तक वहां कोई तथाकथित राजनेता झाँकने भी नहीं गया…

Saturday, 18 July 2020

शिव और शनि पूजा :सावन महीने का शनि प्रदोष 18 जुलाई को, स्कंदपुराण में बताया गया है इस संयोग का महत्व


इस सावन में 2 बार बनेगा शनि प्रदोष का संयोग, शिवपुराण के अनुसार इस व्रत से खत्म हो जाते हैं हर तरह के दोष
18 जुलाई को सावन महीने के कृष्णपक्ष की त्रयोदशी और शनिवार यानी शनि प्रदोष का संयोग बन रहा है। प्रदोष पर्व पर पूरे दिन व्रत रखा जाता है और शाम को भगवान शिव की पूजा की जाती है। स्कंद पुराण के अनुसार सावन में शनिवार को शिव पर्व होने से ये दिन और भी महत्वपूर्ण हो गया है। इस शुभ योग में भगवान शिव और शनि की पूजा एवं व्रत करने से हर इच्छा पूरी होती है। हर तरह के पाप भी खत्म हो जाते हैं। ये साल का तीसरा शनि प्रदोष है। इसके बाद 1 अगस्त को फिर से ये शुभ योग बनेगा। फिर साल का आखिरी शनि प्रदोष 12 दिसंबर को बनेगा।

प्रदोष व्रत और पूजा की विधि
व्रत करने वाले को ब्रह्म मुहूर्त में उठकर नहाना चाहिए। इसके बाद भगवान शिव की पूजा और ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प करना चाहिए। त्रयोदशी यानी प्रदोष व्रत में शिवजी और माता पार्वती की पूजा की जाती है। कुछ लोग इस व्रत के दौरान पूरे दिन पानी भी नहीं पीते हैं। इस दिन सुबह और शाम दोनों समय शिव पूजा की जाती है। शाम को फिर से नहाकर सफेद कपड़े पहनकर भगवान शिव को बेलपत्र, गंगाजल, चंदन, अक्षत, धूप और दीप के साथ पूजा करें। शाम को शिव पूजा के बाद पानी पी सकते हैं।

प्रदोष व्रत का महत्व
प्रदोष व्रत करने से हर तरह के दोष खत्म हो जाते हैं। शिवपुराण के अनुसार सबसे पहले ये व्रत चंद्रमा ने किया था। शाम को सूर्य अस्त होने के बाद और रात शुरू होने से पहले वाले समय को प्रदोष काल कहा जाता है। ऐसा माना जाता है की प्रदोष काल में शिवजी कैलाश पर्वत पर अपने रजत भवन में नृत्य करते हैं। इसीलिए इस समय शिवजी की पूजा करने से मनोकामना पूरी होती है।

सावन का शनि प्रदोष है खास
स्कंद पुराण के ब्रह्मखंड में बताया गया हैं कि एक गोप ने शनिवार को प्रदोष के दिन बिना मंत्र शिव पूजा के बाद भी भगवान शंकर को पा लिया था। इसके साथ ही कृष्णपक्ष में शनिवार को आने वाला प्रदोष व्रत और भी खास हो जाता है। शनिदेव के गुरू भगवान शिव हैं। इसलिए शनिवार को ये व्रत और शिवजी की पूजा करने से शनि संबंधी दोष दूर हो जाते हैं।

राम मंदिर के मॉडल में हुए कई बड़े बदलाव, 3 साल में बनेगा अयोध्या का भव्‍य राम मंदिर


  • चारों दिशाओं में होंगे द्वार
  • कामेश्वर चौपाल ने बताया कि मंदिर में 4 द्वार होंगे जो कि चारों दिशाओं में खुलेंगे.
  • एक द्वार टेढ़ी बाजार,
  • दूसरा द्वार क्षीरेश्वररनाथ मंदिर की तरफ,
  • तीसरा द्वार गोकुल भवन औरचौथा
  •  द्वार- दशरथ महल की तरफ 

  • राम मंदिर की लंबाई 268 फीट, चौड़ाई 140 फीट और ऊंचाई-128 फीट तय की गई है. इसके अलावा मंदिर में 212 खंभे होंगे. जिसमें से पहली मंजिल में 106 खंभे और दूसरी मंजिल में 106 खंभे बनाए जाएंगे. प्रत्येक खंभे में 16 मूर्तियां होंगी और मंदिर में दो चबूतरे भी होंगे.2.75 लाख घन मीटर भू-भाग पर बनने वाला राम मंदिर दो मंजिल का होगा. इस मंदिर की लंबाई 270 फुट, चौड़ाई 140 फुट और ऊंचाई 128 फुट होगी. 330 बीम और दोनों मंजिल पर 106-106 यानी कुल 212 खंभों वाले मंदिर में पांच दरवाजे होंगे. ये दरवाजे मंदिर के पांच हिस्सों यानी गर्भगृह, कौली, रंग मंडप, नृत्य मंडप और सिंह द्वार में लगाए जाएंगे.राम मंदिर के मुख्य द्वार का निर्माण मकराना के सफेद संगमरमर से किया जाएगा. गर्भगृह के ठीक ऊपर 16.3 फीट का प्रकोष्ठ बनाया जाएगा, जिस पर 65.3 फुट ऊंचे शिखर का निर्माण होगा.
  • राम मंदिर परिसर
    जानकारी के मुताबिक, राम मंदिर के प्रांगण में रामकथा कुंज 45 एकड़ में बनेगा. यहां 125 मूर्तियां भगवान राम के जीवन काल की बनाई जाएंगी. जन्म काल से लेकर लंका विजय और राजगद्दी तक की मूर्तियों का लगाया जाएगा. इसके अलावा मंदिर परिसर में धर्मशाला और गौशाला भी बनाया जाएगा.

    (ये मुख्य रास्ता होगा) खुलेगा, इसके अलावा भूतल पर रामलला, प्रथम तल पर राम दरबार होगा. खास बात यह है कि इसके लिए सीमेंट और मौरंग का इस्तेमाल नहीं किया जाएगा.बैठक में मंदिर के भूमि पूजन की तारीखों के साथ मॉडल में बदलाव पर भी बड़ा फैसला लिया गया. जानकारी के मुताबिक, राम मंदिर की ऊंचाई और आकार में बदलाव किया गया है.राम मंदिर ट्रस्ट के सदस्य कामेश्वर चौपाल ने बताया कि प्रस्तावित राम मंदिर मॉडल 128 फीट ऊंचा है, जिसे बढ़ाकर 161 फीट ऊंचा करने का फैसला लिया गया है. इसके अलावा गर्भगृह के आसपास अब 5 गुंबद बनाए जाएंगे, जबकि पहले तीन गुंबद बनने थे.

    राम मंदिर का मॉडल
    राम मंदिर ट्रस्ट के सदस्य कामेश्वर चौपाल ने कहा कि राम मंदिर प्रारूप के भू-तल वाले हिस्सों के पत्थरों की तराशी पूरी हो चुकी है. राम मंदिर के भू-तल में सिंहद्वार, गर्भगृह, नृत्यद्वार, रंगमंडप बनेगा. वहीं प्रथम तल पर राम दरबार की मूर्तियों को स्थान दिया जाएगा. यही नहीं प्रस्तावित राम मंदिर के मॉडल के मुताबिक मंदिर में 24 दरवाजों का चौखट होगा, जो कि संगमरमर के पत्थरों से बनाया जाएगा. इन संगमरमर के पत्थरों पर राजस्थान के मकराना में काम चल रहा है.


Tuesday, 12 May 2020

e-pass across India during the lockdown

From Kerala to Kashmir, how to get an e-pass across India during the lockdown

Here is a list of state-wise e-pass links in the country: 

1.     Andaman & Nicobar Islands: Nicobars districtNorth and Middle AndamanSouth Andaman – download the application form here.

2.     Andhra Pradesh: apply for an e-pass here 

3.     Assam: apply for an e-pass here 

4.     Bihar: apply for an e-pass here 

5.     Chandigarh: apply for an e-pass here 

6.     Chhattisgarh: apply for an e-pass here 

7.     Daman and Diu: apply for an e-pass here 

8.     Delhi: apply for an e-pass here 

9.     Goa. apply for a Travel Permit here and for Temporary Pass here.

10. Gujarat:
a) Write to the DC/Sub DM to seek permission to open factory/warehouse, movement of employees and cargo/truck.
b) Include details such as Company name and factory address, line of business (specify why it is an essential commodity, names and copies of ID cards of the employees, any other specifications) and follow up with them.
c) For any further queries, the person can call 079 2325 1900 to seek an update. Click 
here for DC numbers

11. Haryana: apply for an e-pass here (apply for an e-pass in Gurugram here)

12. Himachal Pradesh: Apply for an e-pass here. For a vehicle movement e-pass in Kangra, Kullu and Una, apply here

13. Jammu and Kashmir: apply for an e-pass here 

14. Jharkhand: apply for an e-pass here 

15. Karnataka: apply for an e-pass here 

16. Kerala: apply for an e-pass here 

17. Ladakh: apply for an e-pass here 

18. Madhya Pradesh: apply for an e-pass here 

19. Maharashtra
a) Learn more about operating a factory/plant during the lockdown 
here

20. b) Apply for the movement of a restricted number of employees in Maharashtra (except Pune) here
c) Apply for the movement of a restricted number of employees in Pune here

21. Meghalaya: apply for an e-pass here 

22. Odisha: apply for an e-pass here 

23. Puducherry: apply for an e-pass here 

24. Punjab: apply for an e-pass here 

25. Rajasthan: apply for an e-pass here 

26. Tamil Nadu: apply for an e-pass here 

27. Telangana: apply for an e-pass here 

28. Uttar Pradesh: apply for an e-pass here 

29. Uttarakhand: apply for an e-pass here 

30. West Bengal: apply for an e-pass here

 


Friday, 1 May 2020

इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदी बना कोरोना, लाशों को दफ्न करने के लिए जगह पड़ी कम

    दुनिया के सामने लाशों के अंतिम संस्कार की समस्या
   कई देशों में कम पड़ रही हैं लाशों को दफनाने की जगह
क्या अमेरिका, क्या इटली, क्या फ्रांस, क्या स्पेन और क्या ईरान. तमाम देशों के नाम लेते जाइए, पर मुर्दों की किस्मत और मौत की कहानी एक जैसी ही मिलेगी. कब्रिस्तानों में ताबूतों का अंबार है. दफनाने के लिए जमीन कम पड़ती जा रही है. कहीं एंबुलेंस से लाशें आ रही हैं तो कही क्रेन के जरिए उन्हें कब्र में उतारा जा रहा है. कहीं कब्र को पाटने के लिए मशीनों का इस्तेमाल हो रहा है. तो कहीं इत्र की जगह दवाओं का स्प्रे किया जा रहा है.

फ्रांस में अंतिम संस्कार के इंतज़ार में लाशें!

फ्रांस की राजधानी पेरिस के एक नर्सिंग होम में बाहर से देखने में सबकुछ बिलकुल शांत लग रहा है. लेकिन जैसे जैसे आप इसके अंदर जाते जाएंगे. यहां वहां पड़ी लाशें आपको परेशान करने लगेंगी. किसी की लाश बिस्तर पर है. तो कोई फर्श पर पड़ी है. पेरिस के इस नर्सिंग होम में करीब दो महीनों से कोरोना के सैकड़ों मरीजों का इलाज चल रहा था.
अंतिम प्रक्रिया की वजह से बस चंद ही लाशें ऐसी हैं, जिन्हें अंतिम संस्कार मय्यसर हुआ है. बाकी लाशें अभी भी अपने अंतिम संस्कार के इंतजार में यहां पड़ी हैं. क्योंकि पेरिस के कब्रिस्तान में अब जगह कम पड़ने लगी हैं. और इन नई लाशों को दफनाने के इंतजाम में अभी वक्त लग रहा है. जिसकी वजह से यहां हालत ये है कि इंसानी लाशों की बू अंदर नहीं घुसने दे रही है. मगर यहां के मेडिकल स्टाफ के पास लोगों की जान बचाने के लिए कोई चारा भी नहीं हैं.

इटली में कम पड़ी कब्रिस्तान की जमीन!

कोरोना से त्रस्त देशों में बाजार भले बर्बाद हों मगर कब्रिस्तान में लोगों का आना-जाना लगा हुआ है. उसके बावजूद इटली में कोरोना की आपदा में लोगों को अपनों के अंतिम संस्कार के लिए इंतजार करना पड़ रहा है. मरने वालों की तादाद हर दिन इतनी बढ़ती जा रही है कि अंतिम संस्कार की सारी व्यवस्थाएं ध्वस्त पड़ चुकी हैं. जाहिर है इतनी ज्यादा लाशों को पूरे धार्मिक रीति रिवाजों के साथ अलग-अलग दफनाना बहुत मुश्किल है. इसीलिए इस चर्च में 90 शवों को एक साथ रखकर अंतिम क्रिया पूरी की जा रही है.

स्पेन में बिना रिश्तेदारों के अंतिम संस्कार!

इटली के बाद स्पेन में कोरोना की वजह से बहुत बुरा हाल है. मरने वालों की तादाद 20 हजार के करीब पहुंचने को है. लिहाजा शवों से वायरस के फैलने के खतरे को देखते हुए अंतिम संस्कार की प्रक्रिया ड्राइव थ्रू के जरिए की जा रही है. ड्राइव थ्रू में होता ये है कि अस्पताल से एक एक ताबूत को शव ले जाने वाली गाड़ी में रखा जाता है और फिर इन्हें चर्च में ले जाया जाता है. चर्च में पादरी बाहर आकर अंतिम रस्में पूरी करते हैं. इस दौरान सिर्फ पांच लोगों को ही वहां रहने की इजाजत दी जाती है.

लाशों को दफ्नाने के लिए ईरान ने बनाया कब्रिस्तान!

कोरोना की तबाही के बीच ईरान की सैटेलाइट तस्वीर सामने आई है. अंतरिक्ष से ली गई इस तस्वीर में नया कब्रिस्तान दिखने का दावा किया गया है. इसके मुताबिक ये कब्रिस्तान ईरान के कुम शहर का है. इसका एरिया 100 एकड़ बताया जा रहा है. इसलिए अंदाजा लगाइए कि ईरान में मरने वालों की तादाद इस तेजी से बढ़ी कि उन्हें लाशों को दफनाने के लिए नया कब्रिस्तान बनाना पड़ा. ईरान में भी कोरोना से मरने वालों का आंकड़ा 5 हजार के करीब पहुंच चुका है. लिहाजा कई लाशों को यहां भी सामूहिक रूप से दफनाया जा रहा है.

इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदी

यकीनन दुनिया के इतिहास की ये सबसे बड़ी त्रासदी का दौर है. तारीख में इसे काले अक्षरों से लिखा जाएगा. लिखा जाएगा कि कैसे इस दौर में लोगों को मरने के बाद दो गज जमीन भी मय्यसर नहीं हो पा रही थी. कैसे लोग मरने के बाद अपनों को छोड़कर भाग रहे थे. कैसे एक-एक कब्र में कई मुर्दों को दफनाया गया था.

स्पार्टा की 300 वाली जंग को यूरोप ने दुनिया भर में प्रचारित किया, पर उस से भी भयानक 300 की जंग लड़ी गयी थी भारत मे, जिसे मिटा दिया बिके कलमकारों ने


स्पार्टा की 300 वाली जंग को यूरोप ने दुनिया भर में प्रचारित किया, पर उस से भी भयानक 300 की जंग लड़ी गयी थी भारत मे, जिसे मिटा दिया बिके कलमकारों ने




कुछ साल पहले 1 हॉलीवुड फिल्म आई थी द- 300 ,ये फिल्म आधारित थी ग्रीक और पर्शिया के युध पर ,पर्शिया के राजा ने एक विशाल सेना के साथ ग्रीक पर हमला किया ज्यादातर ग्रीक राजाओं ने बिना युध के हार मान ली,परंतु स्पार्टा ने सिर् झुकाने से मना कर दिया ,स्पार्टा के पास सिर्फ 300 सैनिक थे परंतु उन्होने पर्शिया के सेनाओं से जमकर मुकाबला किया .क्यूंकि ये युरोप की घटना थी इसलिये इसे इतिहास में बड़ा स्थान मिला...,ऐसा ही एक युध भारत में भी हुआ था , The 300- (पावन खींद का युध )-- भारत की भूमि मे अगर सबसे दूरदर्शी ,साहसी और महान व्यक्ति की गणना की जायेगी तो शिवा जी महराज का नाम सबसे अग्रणी होगा भारतीय इतिहास में बहुत कम लोगों के पास शिवाजी जैसा साहस,दूरदर्शिता और त्याग की क्षमता थी . ,हालांकि की शिवाजी के पिता आदिलशाही में 2000 सिपाहियों वाले छोटे सरदार थे परंतु शिवाजी ने साधारण मराठा युवकों को अजेय योधा बनकर महान मराठा साम्राज्या की स्थापना की . शिवजी की बढ़ती ताकत को रोकने के लिये आदिलशाही ने बहुत प्रयत्न किये परंतु हर बार उन्हे असफलता ही हाथ लगी ,अफ़ज़ल ख़ान और रुस्तमे जमा के मारे जाने के बाद आदिलशाही ने एक बड़ी सेना सिद्दी जुहार के नेत्रत्वा में भेजी जिसने पन्हाल क़िले के चारों ओर घेरा डाल दिया. हालांकि 4 महीने की घेरा बंदी के बाद भी दोनो पक्षों को कोई सफलता हाथ नही लगी परंतु क़िले में खत्म हो रहे राशन की वजह से शिवाजी ने विशालगड के दुर्ग मे जाने का निश्चय किया ,आदिलशाही सेना को धोके में रखने के लिये .शिवाजी जैसे कद काठी वाले नाई को एक छोटि टुकड़ी के साथ बाहर भेजा गया और शिवाजी दूसरे रास्ते से 500 सैनिकों के साथ विशालगड के दुर्ग मे जाने का निश्चय किया ,आदिलशाही सेना को धोके में रखने के लिये .शिवाजी जैसे कद काठी वाले नाई को एक छोटि टुकड़ी के साथ बाहर भेजा गया और शिवाजी दूसरे रास्ते से 500 सैनिकों के साथ विशालगड की ओर निकल गये. , परंतु शीघ्र ही आदिल शाही सेना को इस बात का पता लग गया और उसने शिवाजी का पीछा किया ,आदिलशाही सेना को करीब आते देख मराठा सरदार बाजीप्रभु देशपाण्डे ने 300 सैनकों के साथ पावन खींद के पास इस्लामी सेना को रोकने का निश्चय किया इस ऐतिहासिक युध में 300 मराठा वीरों ने 10,000 आदिलशाही इस्लामिक सेना को मौत के घाट उतारा और जब तक शिवाजी सुरक्षित विशालगड क़िले में पहुंच नही गये आदिलशाही सेना को एक इंच भी आगे बढ़ने नही दिया ,मराठा सैनिको ने शरीर पर अनेकों घाव और लगातार खून बहते रहने पर भी तलवार नही छोड़ी ,सिर्फ 300 सैनिकों के हाथों करीब करीब आधी सेना गवाने के बाद आदिलशाही इस्लामिक सेना की आगे बढ़ने और युध करने की हिम्मत नही हुई । इस युध का भारतीय इतिहास की किताबों में ज्यादा जिक्र नही है क्यूंकि झोलाछाप इतिहासकारों के खुद के नियमो के अनुसार ये उनकी तथाकथित धर्मनिरपेक्षता के स्वघोषित मूल्यों के खिलाफ है।