Monday, 18 September 2017

पुण्यतिथि, महान सिख पन्थ के चतुर्थ सिख गुरु पूज्यनीय रामदास जी

19 सितम्बर - पुण्यतिथि, महान सिख पन्थ के चतुर्थ सिख गुरु 
पूज्यनीय रामदास जी


भारत की सांस्कृतिक विरासत की सबसे बड़ी धरोहरों में से एक और भारत की बलिदानी फ़ौज के एक मजबूत धड़े सिख पन्थ के चतुर्थ गुरु पूज्यनीय श्री रामदास जी का निर्वाण दिवस है आज . न्याय , नीति और त्याग के मार्ग पर चलने वाले गुरु जी ने दुनिया को सदा ही सत्य और संस्कार के मार्ग दिखाए जिसके चलते दुनिया में धर्म स्थापना में मदद मिली .

वन्दनीय गुरु रामदास (जन्म- 24 सितम्बर, 1534 ई.) सिक्खों के चौथे गुरु थे। इन्होंने सिक्ख धर्म के सबसे प्रमुख पद गुरु को 1 सितम्बर, 1574 ई. में प्राप्त किया था। इस पद पर ये 1 सितम्बर, 1581 ई. तक बने रहे थे। ये सिक्खों के तीसरे गुरु अमरदास के दामाद थे। इन्होंने 1577 ई. में 'अमृत सरोवर' नामक एक नये नगर की स्थापना की थी, जो आगे चलकर अमृतसर के नाम से प्रसिद्ध हुआ।









महालया मांगलिक पर्व दुर्गा पूजा से सात दिन पहले नए चांद के महत्व को दर्शाता है.

महालया आज, शारदीय नवरात्र गुरुवार से शुरू

महालया मांगलिक पर्व दुर्गा पूजा से सात दिन पहले नए चांद के महत्व को दर्शाता है. माना जाता है कि इसके साथ ही त्योहारों का मौसम शुरू होता है और यह हमारे जीवन में उल्लास, शांति और समृद्धि लेकर आता है.
महालय का पर्व नवरात्र के प्रारंभ और पितृपक्ष के अंत का प्रतीक है. इस बार शारदीय नवरात्र‍ि गुरुवार यानी कि 21 सितंबर से शुरू होगा.
अश्व‍िन महीने की अमावस्या को महालया होती है. दशहरे के पहले जो अमावस्या की रात आती है उसे 'महालया अमावस्या' के नाम से जाना जाता है. एक तरह से इसी दिन से दशहरा की शुरुआत हो जाती है.
जानिये क्या है महालया और इसका महत्व
पितृपक्ष भाद्र पद मास की पूर्णिमा को शुरू होता है और 16 दिन रहता है. इसके बाद अश्व‍िन मास की अमावस्‍या को खत्म हो जाता है. इसी अमावस्‍या को ही महालया अमावस्‍या भी कहते हैं.
पितृ विसर्जन 2017 के बारे में जानें सब कुछ यहां, कैसे होगा विष योग का निवारण, दान का महत्व
गरूड पुराण में पितृपक्ष के बाद आने वाले महालया अमावस्या का खास महत्व है. हिन्‍दु धर्म की मान्‍यतानुसार इस दिन हमारे पूर्वज या पितृगण वायु के रूप में हमारे घर के दरवाजे पर आकर दस्‍तक देते हैं तथा अपने घर परिवार वालों से श्राद्ध की इच्छा रखते हैं. वे चाहते हैं कि उनके घर परिवार वाले उनका श्राद्ध करें और उन्‍हे तृप्‍त करके दोबारा विदा करें. अकाल मृत्यु से ग्रसित व्यक्तियों का श्राद्ध भी इसी दिन होता है.
ऐसी मान्यता है कि पूर्वज खुश होकर आर्शीवाद देते हैं और परिवार धन, विद्या, सुख से संपन्‍न रहता है. गरूड पुराण के अनुसार यह भी माना जाता है कि यदि श्राद्ध पक्ष में पितरों की तिथी आने पर जब उन्‍हे अपना भोजन नहीं मिलता है तो वे क्रोधित होकर श्राप देते हैं. जिसके कारण वह घर परिवार कभी भी उन्‍नति नहीं कर पाता है तथा उस घर से धन, बुद्धि, विद्या आदि का विनाश हो जाता है.
पिंडदान से पितरों की मुक्ति
एक मान्यता यह भी कि इस समय भारत में नई फसलों का पकना भी शुरू हो जाता है. इसलिए पूर्वजों के प्रति सम्मान और आभार प्रकट करने के प्रतीक रूप में, सबसे पहला अन्न उन्हें पिंड के रूप में भेंट करने की प्रथा रही है. इसके बाद ही लोग नवरात्रि, विजयादशमी और दीवाली जैसे त्योहारों के जश्न मनाते हैं.

Sunday, 17 September 2017

रोहिंग्या मुसलमानो को बाहर न किया तो जल्द ये भारत के लिए नासूर बन जायेंगे : राजा सिंह

राजा सिंह
रोहिंग्या मुसलमान मूल रूप से बांग्लादेशी/बंगाली
मुसलमान है

जिन्हे अंग्रेज मजदुर बनाकर बर्मा यानि म्यांमार में लेकर गए थे,
1735 तक 1 भी मुसलमान बर्मा में नहीं था
1735 में अंग्रेज मुसलमानो को बर्मा लेकर गए थे
ये मूल रूप से बर्मा के अराकान प्रदेश में बस गए, और 1920 तक
आते आते इनकी संख्या 45% हो गयी
एक बार संख्या अधिक हुई, तो रोहिंग्या मुसलमानो ने अरकान को पहले
पूर्वी पाकिस्तान में मिलाने की कोशिश
की, असफल रहे तो बौद्धों का कत्लेआम करना शुरू कर
दिया
ताकि अराकान को एक इस्लामिक देश बना सके
बौद्धों का इतना कत्लेआम किया गया की बौद्ध
भी शांति छोड़ने पर मजबूर हो गए, और जान बचाने के लिए
उन्होंने भी हथियार उठा लिया
अब ये रोहिंग्या मुसलमान भारत में घुसाए जा चुके है, और इन्होने
जनसँख्या जिहाद भी शुरू कर दिया है
हर एक रोहिंग्या महिला 10 से 12 बच्चे कर रही है
इनकी संख्या 2 सालों में 280% की रफ़्तार से
बढ़ी है, रोहिंग्या मुसलमान बेहद कट्टर होते है
और ये अन्य धर्म के लोगों के समस्या खड़ी कर देते है,
जैसा इन्होने म्यांमार में किया
हैदराबाद से बीजेपी विधायक टाइगर राजा सिंह ने
भी इन रोहिंग्यों को जल्द भारत से बाहर करने
की मांग करी है, राजा सिंह ने बाकायदा एक
वीडियो सन्देश भी जारी किया है
राजा सिंह ने कहा है की, रोहिंग्या मुसलमान जब बौद्धों के
साथ भी नहीं रह सके तो हिन्दुओ के साथ
कैसे रह लेंगे, अगर इनको जल्द बाहर नहीं किया गया तो
ये आने वाले समय में भारत देश के लिए बड़ी
मुसीबत बन जायेंगे !

नरेंद्र मोदी की जीवनी

श्री Narendra modi  का जीवन एक तपस्या से कम नहीं है | अपने २ साल के कार्यकाल मेंNarendra modi ने वो कर दिखया जिसे करने में लोगो को 10 साल से ज़्यदा लग जाता है | नरेंद्र  मोदी भारत के लिए  ऐसा नाम है जो भारत को बुलंदियों पर लेकर जा रहे हैं |Narendra modi का जीवन हर उम्र के लोगो के लिए एक मिसाल है |
चलिए पढ़ते है 
साल 1950 देश को आज़ाद हुए ३ ही साल हुए थे नयी भारत की नींव पढ़ रही थी इन्ही दिनों ,गाँधी नगर से 80 किलो मीटर दूर बड़नगर नाम का छोटा से कसबे  में 17 सितबर 1950 में Narendra Modi  का जन्म हुआ .नरेंद्र मोदी के पिता का नाम दामोदर दास मोदी और माँ का नाम हेरा बैन है
दामोदर दास मोदी की बड़नगर के रेलवे स्टेशन पर चाय की एक छोटी सी दुकान थी . उन दिनों 7 साल के Narendra Modi सुबह ही रेलवे स्टेशन पहुचकर अपने पिताजी का हाथ बटाते . और दोपहर में स्कूल में कोई पीरियड खली होता तो नरेंद्र दौड़ते हुए स्टेशन पहुच जाते और जैसे ही स्कूल का समय होता फिर से स्कूल पहुच जाते . बचपन के कई साल नरेंद्र के ऐसे ही बीते .  उनकी माँ घर घर जाकर बर्तन साफ़ करती .
बचपन के शंघर्षो ने नरेंद्र को और मजबूत बना दिया . १२ फ़ीट चौड़े और ४० फ़ीट लंबे एक छोटे से मकान में Narendra Modi अपने ५ भाई बहन और माँ बाप के साथ रहते .नरेंद्र बचपन से ही एक बार जो सोच लेते वह कर कर ही रहते थे .
नरेंद्र मोदी के बारे में एक कहानी सुनी जाती है की एक बार नरेंद्र ने मगरमछो से भरे तालाब में छलांग लगा दी और घड़ियाल का एक बच्चा अपने घर भी ले आये .नरेंद्र मोदी स्कूल में होने वाली हर एक्टिविटी में भाग लेते . और स्कूल के बाद ८ साल से  राष्टीय स्वयम सेवन संघ में जाते. नरेंद्र बचपन से ही बहुत धार्मिक थे .

Narendra Modi का चाय की दूकान से देश के Prime Minister बनने का सफर

१३ साल की उम्र में नरेंद्र मोदी की शादी जशोदा बैन से  करा दी गयी . शादी के ४ साल बाद नरेंद्र मोदी जब ११ क्लास में पढ़ रहे थे उन्होंने घर छोड़ने का निश्चय किया . ३ साल बाद वह फिर अपने घर लौटे . और कुछ समय बाद ही वह बड़नगर छोड़कर अहमदाबाद आ गए . वह एक कैंटीन में चाय देना शुरू कर दिया . वहां भी  नरेंद्र ने  RSS में जाना शुरू कर दिया . और वही संघ के लोगो के साथ रहने लगे . सुबह ५ बजे उठकर संघ के लोगो के लिए चाय बनाते और नाश्ता तैयार करते और कमरे में खुद ही झाड़ू लगाते .
१९७५ में देश में इमरजेंसी लगायी गयी थी उस समय नरेंद्र मोदी को संघ में काम करने का मौका मिला और उन्होंने इन दिनों बहुत कुछ सीखा . और एक साल बाद नरेंद्र को गुजरात के ६ जिलो का संघ प्रचारक बना दिया गया .१८८७ में नरेंद्र को गुजरात  बी.ज.प का सचिव बना दिया गया .२००१ में नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्य मंत्री बने और २०१४ तक गुजरात के मुख्यमंत्री रहे . और 14 may 2014 को भारत के प्रधान मंत्री पद पर नियुक्त हुए .

Narendra Modi Qualities

1.. Public Speaking Skills –

Narendra modi  की आवाज़ में ऐसी शक्ति है की वो हर किसी को अपनी बात सुनने पर विवश कर देते है | जो लोग उन्हें पसंद नहीं करते वो भी उनकी स्पीच हमेशा सुनते हैं | इसका मुख्य कारण है की वो अपनी हर एक स्पीच खुद ही लिखते हैं |

2. उत्साह Enthusiasm –

नरेंद्र मोदी का उत्साह कविले तारीफ है | ६६ वर्ष की उम्र में भी हर दिन नयी यात्रा बिना रुके बिना थके | मात्र ३-४ घंटे सोकर दिन भर काम करना उनके उत्साह का ही नतीजा है |श्री बराक ओबामा ने एक बार इंटरव्यू में बताया की नरेंद्र मोदी मात्र 3-4 घंटे ही सोते हैं | और पुरे दिन बिना रुके काम करते है |

3.. दृढ़निश्चय Determination –

नरेंद्र मोदी बचपन से ही दृढ़निश्चय  वाले थे | मात्र ८ साल की उम्र में नरेंद्र मोदी ने आरएसएस ज्वाइन की | बचपन में एक बार नरेंद्र मोदी ने नदी पर करके मंदिर जाने की सोच ली और उन्हें पता था की नदी में मगरमच्छ है फिर भी वो नदी पर करके गए | और चाय बेचने से शुरआत करने वाले श्री नरेंद्र मोदी आज भारत के प्रधान मंत्री (Prime minister) हैं ये उनके दृढ़निश्चय का ही नतीजा है |

4.धीरज युक्त  Patience

नरेंद्र मोदी जी की सबसे बढ़ी विशेषता है उनका धीरज युक्त होना |
हर किसी के जीवन में उतार चढ़ाव आते रहते हैं पर जीवन में धैर्य को बांये रखना बहुत ज़रूरी है |
5  नेतृत्व शक्ति Leadership Quality
नरेंद्र मोदी जी की नेतृत्व की शक्ति अतुलनीय है | आज भी वो बीजेपी के किसी भी

6. निडर Fearless  –

नरेंद्र मोदी स्वाभाव से ही निडर है |एक बार नरेंद्र मोदी जी ने  कन्यकुमरी से श्रीनगर तक की यात्रा निकली और श्री नगर के लाल चौक पर तिरंगा झंडा फैराया दिया |
7..Technology का सही उपयोग करने वाले  –
Narendra Modi  Technology को पसंद करते है और उसे प्रोत्साहन भी देते हैं | उस में वो Facebook  के CEO Mark Zuckerberg से भी मिले | वो हमेशा Tweet करते है और post करते है अपनी हर महत्व्पूर्ण घटना को | नरेंद्र मोदी से हम सिख सकते हैं की technology का use क्या होता है और उसका गुलाम बनना क्या होता है |
8. स्वास्थ्य प्रिय –
नरेंद्र मोदी एक दिन भी योग और प्राणायाम  नहीं छोड़ते  |Narendra Modi जी बताते है की जब कभी भी में थका हुआ महसूस करता हु तो तुरंत गहरी साँस लेने लगता हु यह मुझे एक बार फिर तारो ताज़ा कर देती है |
नरेंद्र मोदी जी के जीवन से हम भी सीखते चले और अपने जीवन को उन्नत बनाते चले |

Wednesday, 13 September 2017

14 सितंबर, 1949 के दिन हिंदी को राजभाषा का दर्जा मिला था.

14 सितंबर को मनाया जाता है 'हिंदी दिवस'...

14 सितंबर, 1949 के दिन हिंदी को राजभाषा का दर्जा मिला था. तब से हर साल यह दिन हिंदी दिवस के तौर पर मनाया जाता है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि हिंदी दिवस क्यों मनाया जाता है?? इसके पीछे एक वजह है. दरअसल साल 1947 में जब अंग्रेजी हुकूमत से आजाद हुआ तो देश के सामने भाषा को लेकर सबसे बड़ा सवाल था.
क्योंकि भारत में सैकड़ों भाषाएं और बोलियां बोली जाती है. 6 दिसंबर 1946 में आजाद भारत का संविधान तैयार करने के लिए संविधान का गठन हुआ. संविधान सभा ने अपना 26 नवंबर 1949 को संविधान के अंतिम प्रारूप को मंजूरी दे दी. आजाद भारत का अपना संविधान 26 जनवरी 1950 से पूरे देश में लागू हुआ.
लेकिन भारत की कौन सी राष्ट्रभाषा चुनी जाएगी ये मुद्दा काफी अहम था.काफी सोच विचार के बाद हिंदी और अंग्रेजी को नए राष्ट्र की भाषा चुना गया.संविधान सभा ने देवनागरी लिपी में लिखी हिंदी को अंग्रजों के साथ राष्ट्र की आधिकारिक भाषा के तौर पर स्वीकार किया था. 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने एक मत से निर्णय लिया कि हिंदी ही भारत की राजभाषा होगी.
देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने कहा कि इस दिन के महत्व देखते हुए हर साल 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाया जाए.बतादें पहला हिंदी दिवस 14 सितंबर 1953 में मनाया गया था.
अग्रेजी भाषा को लेकर हुआ विरोध
14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने एक मत से निर्णय लिया कि हिंदी ही भारत की राजभाषा होगी. अंग्रेजी भाषा को हटाए जाने की खबर पर देश के कुछ हिस्सों में विरोध प्रर्दशन शुरू हो गया था. तमिलनाडू में जनवरी 1965 में भाषा विवाद को लेकर दंगे हुए थे.
जनमानस की भाषा हैं हिंदी
साल 1918 में महात्मा गांधी ने हिन्दी साहित्य सम्मेलन में हिन्दी भाषा को राष्ट्रभाषा बनाने को कहा था. इसे गांधी जी ने जनमानस की भाषा भी कहा था.

Sunday, 10 September 2017

पुराणों के अनुसार जो व्यक्ति ब्राह्मण की अर्थी उठाता है, उसे अपने हर कदम पर एक यज्ञ के बराबर पुण्य प्राप्त होता है।

शव यात्रा देखते ही करें ये काम, पूरी हो जाएगी हर मनोकामना


जीवन का अंतिम सत्य है मृत्यु… भागवत गीता में श्री कृष्ण ने कहा है ,”मृत्यु एक ऐसा सत्य है, जिसे टाला नहीं जा सकता जिसने जन्म लिया है उसकी मृत्यु निश्चित है।” यही जीवन का सार है जो जीव इस धरती पर आया है, उसे एक दिन यहां से जाना है। यह प्रकृति का अटल नियम है… जिस प्रकार मृत्यु जीवन का महत्वपूर्ण पड़ाव है वैसे ही मृत्यु के साथ इस लोक से व्यक्ति की अंतिम विदाई भी महत्व रखती है जिसे शवयात्रा कहते हैं।
किसी भी इंसान की मृत्यु के बाद शवयात्रा निकाली जाती है और इस संबंध में भी शास्त्रों में कई नियम बताए गए हैं जिन्हें अपनाने से धर्म लाभ तो प्राप्त होता है साथ ही इससे मृत आत्मा को शांति भी मिलती है।शवयात्रा से सम्बन्धित हम आपकों ऐसे कुछ नियम और लोक मान्यताओं के बारे में बताने जा रहे है जिसके करने से मनुष्य को लाभ मिलता है।

1.शव यात्रा देखते ही प्रणाम करें

जब भी कोई शव यात्रा अथवा अर्थी दिखे तो उसे दोनों हाथ जोड़कर, सिर झुका कर  प्रणाम करें और मुंह से शिव-शिव का जाप करें।इसके पीछे शास्त्रोक्त मान्यता यह है कि जिस मृतात्मा ने अभी शरीर छोड़ा है, वह अपने साथ उस प्रणाम करने वाले व्यक्ति के सभी कष्टों, दुखों और अशुभ लक्षणों को अपने साथ ले जाए तथा उस व्यक्ति को “शिव” यानि मुक्ति प्रदान करें।

2. आत्मा की शान्ति के लिए करें प्रार्थना

शव यात्रा को देखकर वहां से गुजरने वाले लोग थोड़ी देर ठहर जाते हैं और ईश्वर से प्रार्थना करते है। यह हिन्दू धर्म का एक प्रमुख नियम है, जिसके अनुसार शवयात्रा को देखने के बाद हमें मृत आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करनी चाहिए। इससे मृत आत्मा को शांति मिलती है।

3.पूरे हो जाएंगे रूके काम

धार्मिक दृष्टिकोण के अलावा ज्योतिष की भाषा में भी शवयात्रा देखना शुभ बताया गया है। मान्यता है कि यदि कोई व्यक्ति शव यात्रा को देखता है, तो उसके रुके काम पूरे होने की संभावनाएं बन जाती है। उसके जीवन से दुख भी दूर होते हैं और उसकी मनोकामना पूर्ण होती है।

4. यज्ञ के बराबर मिलता है पुण्य

पुराणों के अनुसार जो व्यक्ति ब्राह्मण की अर्थी उठाता है, उसे अपने हर कदम पर एक यज्ञ के बराबर पुण्य प्राप्त होता है।

Monday, 4 September 2017

पूर्व राष्ट्रपति एवं प्रख्यात शिक्षाविद डॉ.सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी की जंयती पर उन्हें शत्–शत् नमन् |

डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन 

Dr Sarvepalli Radhakrishnan – डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन एक महान भारतीय दर्शनशास्त्री थे जो 1952-1962 तक भारत के उपराष्ट्रपति तथा 1962 से 1967 तक भारत के दुसरे राष्ट्रपति रह चुके है। उनका विद्यार्थियों और शिक्षकों के साथ बहुत ज्यादा लगाव था और शिक्षण क्षेत्र में भी उन्होंने अच्छे कार्य किये थे। इसीलिए पुरे भारत में 5 सितम्बर उनके जन्मदिन पर शिक्षक दिन मनाया जाता हैं। आज हम डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के महान जीवन के बारे में संक्षेप में जानते हैं।

डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन – Dr Sarvepalli Radhakrishnan Biography in Hindi

पूरा नाम   – डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन
जन्म        – 5 September 1888
जन्मस्थान – तिरुतनी ग्राम, तमिलनाडु
पिता       – सर्वेपल्ली वीरास्वामी
माता       – सिताम्मा
विवाह     – सिवाकमु
डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन 20 वी सदी के दर्शनशास्त्र और धार्मिकता के एक असाधारण विद्वान थे। उनके शैक्षणिक नियुक्ति में कलकत्ता विश्वविद्यालय (1921-1932) में किंग जॉर्ज के मानसिकऔर नैतिक विज्ञानं का पद भी शामिल है और साथ ही वे पूर्वी धर्म के प्रोफेसर और ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय (1936-1952) में नीतिशास्त्र के प्रोफेसर भी थे।
उनके दर्शनशास्त्र का आधार अद्वैत वेदांत था, जिसे वे आधुनिक समझ के लिए पुनर्स्थापित करवाना चाहते थे। उन्होंने पश्चिमी परम्पराओ की आलोचना करते हुए हिंदुत्वता की रक्षा की, ताकि वे देश में एक आधुनिक Hindi समाज का निर्माण कर सके। वे भारतीयों और पश्चिमी दोनों देशो में हिंदुत्वता की एक साफ़-सुथरी तस्वीर बनाना चाहते थे। जिसे दोनों देशो के लोग आसानी से समझ सके और भारतीय और पश्चिमी देशो के मध्य संबंध विकसित हो सके।
राधाकृष्णन को उनके जीवन के कई उच्चस्तर के पुरस्कारों से नवाज़ा गया जिसमे 1931 में दी गयी “सामंत की उपाधि” भी शामिल है और 1954 में दिया गया भारत का नागरिकत्व का सबसे बड़ा पुरस्कार “भारत रत्न” भी शामिल है तथा उन्हें 1963 में ब्रिटिश रॉयल आर्डर की सदस्यता भी दी गयी। राधाकृष्णन का ऐसा मानना था की, “शिक्षक ही देश की सबसे बड़ी सोच होते है”। और तभी से 1962 से उनके जन्मदिन 5 सितम्बर को “शिक्षक दिवस” के रूप में मनाया जाता है।

प्रारंभिक जीवन – Early Life History Sarvepalli Radhakrishnan

डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्म तमिलनाडु के तिरुतनी ग्राम में जो तत्कालीन मद्रास से लगभग थोड़ी दुरी पर है वहा एक तेलगु परिवार में हुआ। उनके पिता का नाम सर्वेपल्ली वीरास्वामी और माता का नाम सिताम्मा है। उन्होंने अपना प्रारंभिक जीवन तिरुतनी और तिरुपति में बिताया। उनके पिता राजस्व विभाग में काम करते थे। उनकी प्रारंभिक शिक्षा तिरुतनी में ही हुई और 1896 में वे पढने के लिए तिरुपति चले गये।
डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन शिक्षा – Dr Sarvepalli Radhakrishnan Education
उनके विद्यार्थी जीवन में कई बार उन्हें शिष्यवृत्ति स्वरुप पुरस्कार मिले। उन्होंने वूरहीस महाविद्यालय, वेल्लोर जाना शुरू किया लेकिन बाद में 17 साल की आयु में ही वे मद्रास क्रिस्चियन महाविद्यालय चले गये। जहा 1906 में वे स्नातक हुए और बाद में वही से उन्होंने दर्शनशास्त्र में अपनी मास्टर डिग्री प्राप्त की। उनकी इस उपलब्धि ने उनको उस महाविद्यालय का एक आदर्श विद्यार्थी बनाया।
दर्शनशास्त्र में राधाकृष्णन अपनी इच्छा से नहीं गये थे उन्हें अचानक ही उसमे प्रवेश लेना पड़ा। उनकी आर्थिक स्थिति ख़राब हो जाने के कारण जब उनके एक भाई ने उसी महाविद्यालय से पढाई पूरी की तभी मजबूरन राधाकृष्णन को आगे उसी की दर्शनशास्त्र की किताब लेकर आगे पढना पड़ा।
एम.ए. में राधाकृष्णन में अपने कई शोधप्रबंध लिखे जिसमे “वेदांत का नीतिशास्त्र और उसकी सैधान्तिक पूर्वकल्पना” भी शामिल है। उन्हें हमेशा से ऐसा लगता था की आधुनिक युग के सामने वेदांत को एक नए रूप में रखने की जरुरत है। लेकिन राधाकृष्णन को हमेशा से ये दर था की कही उनके इस शोध प्रबंध को देख कर उनके दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर डॉ. अल्फ्रेड जॉर्ज कही उन्हें डाट ना दे।
लेकिन डटने की बजाये जब डॉ. अल्फ्रेड जॉर्ज ने उनका शोध प्रबंध देखा तो उन्होंने उसकी बहोत तारीफ़ की। और जब राधाकृष्णन केवल 20 साल के थे तभी उनका शोध प्रबंध प्रकाशित किया गया। राधाकृष्णन के अनुसार, हॉग और उनके अन्य शिक्षको की आलोचनाओ ने, “हमेशा उन्हें परेशान किया और उनके विश्वास को कम करते गये जिस से भारतीय प्राचीन परम्पराओ से उनका विश्वास कम हो रहा था”। राधाकृष्णन ने स्वयम यह बताया की कैसे वे एक विद्यार्थी की तरह रहे।
डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन विवाह और परिवार – Dr Sarvepalli Radhakrishnan Family
राधाकृष्णन का विवाह 16 साल की आयु में उनके दूर की रिश्तेदार सिवाकमु के साथ हुआ। राधाकृष्णन और सिवाकमु को 5 बेटी और एक बेटा, जिसका नाम सर्वपल्ली गोपाल था। सर्वपल्ली गोपाल एक महान इतिहासकार के रूप में भी जाने जाते है। सिवाकमु की मृत्यु 1956 में हुई। भूतकालीन भारतीय टेस्ट खिलाडी व्ही.व्ही.एस. लक्ष्मण उनके बड़े भतीजे है।

शिक्षक दिन – September 5 Teachers Day

जब वे भारत के राष्ट्रपति बने, तब उनके कुछ मित्रो और विद्यार्थियों ने उनसे कहा की वे उन्हें उनका जन्मदिन (5 सितम्बर) मनाने दे। तब राधाकृष्णन ने बड़ा ही प्यारा जवाब दिया, “5 सितम्बर को मेरा जन्मदिन मनाने की बजाये उस दिन अगर शिक्षको का जन्मदिन मनाया जाये, तो निच्छित ही यह मेरे लिए गर्व की बात होगी।”
और तभी से उनका जन्मदिन भारत में शिक्षक दिन – Teachers Day के रूप में मनाया जाता है।
1931 में उन्हें सावंत स्नातक के रूप में नियुक्त किया गया। और स्वतंत्रता के बाद से ही उन्होंने अपने नाम के आगे “सर” शब्द का उपयोग भी बंद कर दिया।
डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन पुरस्कार – Dr Sarvepalli Radhakrishnan Awards
  • 1938- ब्रिटिश अकादमी के सभासद के रूप में नियुक्ति।
  • 1954- नागरिकत्व का सबसे बड़ा सम्मान, “भारत रत्न”।
  • 1954- जर्मन के, “कला और विज्ञानं के विशेषग्य”।
  • 1961- जर्मन बुक ट्रेड का “शांति पुरस्कार”।
  • 1962- भारतीय शिक्षक दिन संस्था, हर साल 5 सितंबर को शिक्षक दिन के रूप में मनाती है।
  • 1963- ब्रिटिश आर्डर ऑफ़ मेरिट का सम्मान।
  • 1968- साहित्य अकादमी द्वारा उनका सभासद बनने का सम्मान (ये सम्मान पाने वाले वे पहले व्यक्ति थे)।
  • 1975- टेम्पलटन पुरस्कार। अपने जीवन में लोगो को सुशिक्षित बनाने, उनकी सोच बदलने और लोगो में एक-दुसरे के प्रति प्यार बढ़ाने और एकता बनाये रखने के लिए दिया गया। जो उन्होंने उनकी मृत्यु के कुछ महीने पहले ही, टेम्पलटन पुरस्कार की पूरी राशी ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय को दान स्वरुप दी।
  • 1989- ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय द्वारा रशाकृष्णन की याद में “डॉ. राधाकृष्णन शिष्यवृत्ति संस्था” की स्थापना।
डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन को अपने जीवन में शिक्षा और शिक्षको से बहोत लगाव था। उस समय जिस समय में वह विद्यार्थी थे, तब शिक्षको को कोई खास दर्जा नहीं जाता था। तब उन्होंने अपने जन्मदिन को शिक्षक दिन के रूप में मनाने का एक बड़ा निर्णय लिया था। वे भारत को एक शिक्षित राष्ट्र बनाना चाहते थे, इसीलिए उन्होंने अपना पूरा जीवन बच्चो को पढ़ाने और जीवन जीने का सही तरीका बताने में व्यतीत किया।
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हिन्दू परिवार संघटन संस्था
 Cont No-9448487317

Friday, 25 August 2017

26 अगस्त- पवित्रता की सर्वोच्च पराकाष्ठा माँ पद्मावती "जौहर दिवस"

26 अगस्त- पवित्रता की सर्वोच्च पराकाष्ठा माँ पद्मावती "जौहर दिवस"



भारत की नारियों का वो स्वरूप और पवित्रता की वो पराकाष्ठा ही ये जो संसार में हर सर को भारत की नारियों के सम्मान में झुका गया था . वो सर आज भी झुका है भले ही अपना ईमान और कलम एक ही परिवार में बेच चुके चाटुकार इतिहासकार कुछ भी लिख लें और कुछ भी कह लें पर क्रूरतम इस्लामिक आतंक से लड़ कर तन और धन के भूखे 

जौहर की गाथाओं से भरे पृष्ठ भारतीय इतिहास की अमूल्य धरोहर हैं। ऐसे अवसर एक नहीं, कई बार आये हैं, जब हिन्दू ललनाओं ने अपनी पवित्रता की रक्षा के लिए 'जय हर-जय हर' कहते हुए हजारों की संख्या में सामूहिक अग्नि प्रवेश किया था। यही उद्घोष आगे चलकर 'जौहर' बन गया। जौहर की गाथाओं में सर्वाधिक चर्चित प्रसंग चित्तौड़ की रानी पद्मिनी का है, जिन्होंने 26 अगस्त, 1303 को 16,000 क्षत्राणियों के साथ जौहर किया था। माँ पद्मिनी का मूल नाम पद्मावती था। वह सिंहलद्वीप के राजा रतनसेन की पुत्री थी। एक बार चित्तौड़ के चित्रकार चेतन राघव ने सिंहलद्वीप से लौटकर राजा रतनसिंह को उसका एक सुंदर चित्र बनाकर दिया। इससे प्रेरित होकर राजा रतनसिंह सिंहलद्वीप गया और वहां स्वयंवर में विजयी होकर उन्हें अपनी पत्नी बनाकर ले आया। इस प्रकार माँ पद्मिनी चित्तौड़ की रानी बन गयी। वो रानी जिनके चरित्र और शौर्य के आस पास भी सोचने की क्षमता ना रखने वाले तथाकथित स्टार उनके जीवन पर फिल्म बनाने का कुत्सित प्रयास कर रहे हैं .

पद्मिनी की सुंदरता की ख्याति अलाउद्दीन खिलजी ने भी सुनी थी। वह उसे किसी भी तरह अपने हरम में डालना चाहता था। उसने इसके लिए चित्तौड़ के राजा के पास धमकी भरा संदेश भेजा; पर राव रतनसिंह ने उसे ठुकरा दिया। अब वह धोखे पर उतर आया। उसने रतनसिंह को कहा कि वह तो बस पद्मिनी को केवल एक बार देखना चाहता है। रतनसि उसे छोड़ने द्वार पर आये। इसी समय उसके सैनिकों ने धोखे से रतनसिंह को बंदी बनाया और अपने शिविर में ले गये। अब यह शर्त रखी गयी कि यदि पद्मिनी अलाउद्दीन के पास आ जाए, तो रतनसिंह को छोड़ दिया जाएगा। यह समाचार पाते ही चित्तौड़ में हाहाकार मच गया; पर पद्मिनी ने हिम्मत नहीं हारी। उसने कांटे से ही कांटा निकालने की योजना बनाई। अलाउद्दीन के पास समाचार भेजा गया कि पद्मिनी रानी हैं। अतः वह अकेले नहीं आएंगी। उनके साथ पालकियों में 800 सखियां और सेविकाएं भी आएंगी।अलाउद्दीन और उसके साथी यह सुनकर बहुत प्रसन हुए। उन्हें पद्मिनी के साथ 800 हिन्दू युवतियां अपने आप ही मिल रही थीं; पर उधर पालकियों में पद्मिनी और उसकी सखियों के बदले सशस्त्र हिन्दू वीर बैठाये गये। हर पालकी को चार कहारों ने उठा रखा था। वे भी सैनिक ही थे। पहली पालकी के मुगल शिविर में पहुंचते ही रतनसिंह को उसमें बैठाकर वापस भेज दिया गया और फिर  सब योद्धा अपने शस्त्र निकालकर शत्रुओं पर टूट पड़े। कुछ ही देर में शत्रु शिविर में हजारों सैनिकों की लाशें बिछ गयीं। इससे बौखलाकर अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ पर हमला बोल दिया। इस युद्ध में राव रतनसिंह तथा हजारों सैनिक मारे गये। जब रानी पद्मिनी ने देखा कि अब हिन्दुओं के जीतने की आशा नहीं है, तो उसने  जौहर का निर्णय किया। रानी और किले में उपस्थित सभी नारियों ने सम्पूर्ण शृंगार किया। हजारों बड़ी चिताएं सजाई गयीं। 'जय हर-जय हर' का उद्घोष करते हुए सर्वप्रथम वीरांगना महारानी पद्मिनी ने चिता में छलांग लगाई और फिर क्रमशः सभी हिन्दू वीरांगनाएं अग्नि प्रवेश कर गयीं। जब युद्ध में जीत कर वो क्रूर लुटेरा अलाउद्दीन पद्मिनी को पाने की आशा से किले में घुसा, तो वहां जलती चिताएं उसे मुंह चिढ़ा रही थीं। 
पवित्रता की उस चरम पराकाष्ठा , त्याग की उस सर्वोच्च प्रतिमूर्ति महारानी पद्मावती को आज उनके बलिदान अर्थात जौहर दिवस पर सम्पूर्ण सुदर्शन परिवार का बारम्बार नमन , वन्दन और अभिनन्दन है साथ ही ऐसी देवीस्वरूपा महारानियों की गौरवगाथा को सदा सही रूपों में जन मानस के आगे लाने के लिए अपने पुराने संकल्प को भी दोहराता है .. 

शौर्य , त्याग और पवित्रता का स्वरूप महारानी पद्मावती अमर रहें ..

Anandnagshankar
Ph-9448487317





















मुझे वेश्या बना दिया है : अटल बिहारी वाजपेयी को बलात्कार पीड़िता ने बताया था राम रहीम का सच

आज  हरियाणा  के पंचकुला  में सीबीआई  के  स्पेशल  कोर्ट  ने डेरा  सच्चा  सौदा  के  स्वयंभू  बाबा  को  15  साल  पुराने  बलात्कार  के  मुकदमे  का  दोषी  सिद्ध  कर  दिया . उसके  बाद  पूरे  हरियाणा  में  जबरदस्त तोड़-फोड़  और  हिंसा  हुई , उसकी  आग  दिल्ली  तक पहुँची . ऐसा  लगा  कि  हरियाणा  सरकार  की  शह  पर उपद्रवी  इकट्ठे  हुए  और  उन्होंने  आगजनी  की.  15  साल  तक बलात्कार की  पीडिताओं   ने  संघर्ष  किया. 2002 में  भारतीय  जनता  पार्टी  की  सरकार  थी . तब  प्रधानमंत्री  अटल  बिहारी  वाजपेयी  को  उन्होंने  खत  लिखा . हालांकि  वाजपेयी  ने  उस  ख़त  को  नजरअंदाज  कर  दिया  था . पढ़ें  किन शब्दों  में  अपनी  पीड़ा , खौफ  और संघर्ष  और  अपने  यौन  शोषण  की  दास्तान लिखी थी   तब  गुमनाम  पीडिता  ने . 

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 मैं पंजाब की रहने वाली हूं और अब पांच साल से डेरा सच्चा सौदा सिरसा (हरियाणा, धन धन सतगुरु तेरा ही आसरा) में साधु लड़की के रूप में कार्य कर रही हूं. सैकड़ों लड़कियां भी डेरे में 16 से 18 घंटे सेवा करती हैं. हमारा यहां शारीरिक शोषण किया जा रहा है. मैं बीए पास लड़की हूं. मेरे परिवार के सदस्य महाराज के अंध श्रद्धालु हैं, जिनकी प्रेरणा से मैं डेरे में साधु बनी थी.साधु बनने के दो साल बाद एक दिन महाराज गुरमीत की प्रमाशया साधु गुरजोत ने रात के 10 बजे मुझे बताया कि महाराज ने गुफा (महाराज के रहने के स्थान) में बुलाया है.मैं क्योंकि पहली बार वहां जा रही थी, मैं बहुत खुश थी. यह जानकर कि आज खुद परमात्मा ने मुझे बुलाया है.गुफा में ऊपर जाकर जब मैंने देखा महाराज बेड पर बैठे हैं. हाथ में रिमोट है, सामने टीवी पर ब्लू फिल्म चल रही है. बेड पर सिरहाने की ओर रिवॉल्वर रखा हुआ है.
मैं ये सब देख कर हैरान रह गई… मेरे पांव के नीचे की ज़मीन खिसक गई. यह क्या हो रहा है. महाराज ऐसे होंगे, मैंने सपने में भी नहीं सोचा था. महाराज ने टीवी बंद किया व मुझे साथ बिठाकर पानी पिलाया और कहा कि मैंने तुम्हें अपनी खास प्यारी समझकर बुलाया है. मैं ये सब देख कर हैरान रह गई… मेरे पांव के नीचे की ज़मीन खिसक गई.

यह क्या हो रहा है. महाराज ऐसे होंगे, मैंने सपने में भी नहीं सोचा था. महाराज ने टीवी बंद किया व मुझे साथ बिठाकर पानी पिलाया और कहा कि मैंने तुम्हें अपनी खास प्यारी समझकर बुलाया है. मेरा ये पहला दिन था. महाराज ने मेरे को बांहों में लेते हुए कहा कि हम तुझे दिल से चाहते हैं. तुम्हारे साथ प्यार करना चाहते हैं क्योंकि तुमने हमारे साथ साधु बनते वक्त तन मन धन सतगुरु को अर्पण करने को कहा था. सो अब ये तन मन हमारा है.

मेरे विरोध करने पर उन्होंने कहा कि कोई शक नहीं, हम ही खुदा हैं. जब मैंने पूछा कि क्या यह खुदा का काम है, तो उन्होंने कहाः श्री कृष्ण भगवान थे, उनके यहां 360 गोपियां थीं. जिनसे वह हर रोज़ प्रेम लीला करते थे. फिर भी लोग उन्हें परमात्मा मानते हैं. यह कोई नई बात नहीं है.यह कि हम चाहें तो इस रिवॉल्वर से तुम्हारे प्राण पखेरू उड़ाकर दाह संस्कार कर सकते हैं. तु्म्हारे घर वाले हर प्रकार से हमारे पर विश्वास करते हैं व हमारे गुलाम हैं. वह हमारे से बाहर जा नहीं सकते, यह बात आपको अच्छी तरह पता है.

यह कि हमारी सरकार में बहुत चलती है. हरियाणा व पंजाब के मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री हमारे चरण छूते हैं. नेता हमसे समर्थन लेते हैं, पैसा लेते हैं और हमारे खिलाफ कभी नहीं जाएंगे. हम तुम्हारे परिवार से नौकरी लगे सदस्यों को बर्खास्त करवा देंगे.

पीडिता का पत्र 

सभी सदस्यों को मरवा देंगे और सबूत भी नहीं छोड़ेंगे, ये तुझे अच्छी तरह पता है कि हमने पहले भी डेरे के प्रबंधक को खत्म करवा दिया था, जिनका आज तक अता-पता ना है. ना ही कोई सबूत बकाया है. जो कि पैसे के बल पर हम राजनीतिक व पुलिस और न्याय को खरीद लेंगे. इस तरह मेरे साथ मुंह काला किया और पिछले तीन माह में 20-30 दिन बाद किया जा रहा है.

हमें सफेद कपड़े पहनना, सिर पर चुन्नी रखना, किसी आदमी की तरफ आंख ना उठाकर देखना, आदमी से पांच-दस फुट की दूरी पर रहना महाराज का आदेश है. हम दिखाने में देवी हैं, मगर हमारी हालत वेश्या जैसी है.मैंने एक बार अपने परिवार वालों को बताया कि यहां डेरे में सब कुछ ठीक नहीं है तो मेरे घर वाले गुस्से में कहने लगे कि अगर भगवान के पास रहते हुए ठीक नहीं है, तो ठीक कहां है.

तेरे मन में बुरे विचार आने लग गए हैं. सतगुरु का सिमरन किया कर. मैं मजबूर हूं. यहां सतगुरु का आदेश मानना पड़ता है. यहां कोई भी दो लड़कियां आपस में बात नहीं कर सकती, घर वालों को टेलीफोन मिलाकर बात नहीं कर सकती. पिछले दिनों जब बठिण्डा की लड़की साधु ने जब महाराज की काली करतूतों का सभी लड़कियों के सामने खुलासा किया तो कई साधु लड़कियों ने मिलकर उसे पीटा.

कुरूक्षेत्र जिले की एक साधु लड़की जो घर आ गई है, उसने घर वालों को सब कुछ सच बता दिया है. उसका भाई बड़ा सेवादार था. जो कि सेवा छोड़कर डेरे से नाता तोड़ चुका है. संगरूर जिले की एक लड़की जिसने घर आ कर पड़ोसियों को डेरे की काली करतूतों के बारे में बताया तो डेरे के सेवादार गुंडे बंदूकों से लैस लड़की के घर आ गए. घर के अंदर कुण्डी लगाकर धमकी दी।

अतः आप से अनुरोध है कि इन सब लड़कियों के साथ-साथ मुझे भी मेरे परिवार के साथ मार दिया जाएगा, अगर मैं इसमें अपना नाम लिखूंगी….हमारा डॉक्टरी मुआयना किया जाए ताकि हमारे अभिभावकों को व आपको पता चल जाएगा कि हम कुमारी देवी साधू हैं या नहीं. अगर नहीं तो किसके द्वारा बर्बाद हुई हैं.”

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गुरमीत राम रहीम सिंह इंसां.

बाबा राम रहीम की असली कहानी

गुरमीत राम रहीम सिंह इंसां. एक शख्स जो भारत के दो राज्यों – पंजाब और हरियाणा में निर्विवाद रूप से सबसे पोलराइज़िंग फिगर. कुछ लोगों के लिए वो ‘पिताजी’ हैं. उन पर कोई आंच आने पर वो ‘कुछ भी करने’ को तैयार रहते हैं, और दूसरे वो, जिनके लिए बाबा एक विवादित धर्मगुरु हैं, जो हास्यास्पद फिल्में बनाते हैं, जिन पर बने मीम वो सोशल मीडिया पर शेयर करते हैं.
इसलिए ज़रूरी है कि राम रहीम की कहानी दोनों ढंग से कही जाए. शुरूआत हम पहले पक्ष से करेंगे.
गुरमीत सिंह राम रहीम इंसां कैसे बने?
सिरसा वाले बताते हैं कि उनका शहर दो हिस्सों में बंटा हुआ है – एक वो जहां आम लोग रहते हैं, और दूसरा वो जहां डेरा सच्चा सौदा के कट्टर समर्थक रहते हैं. ज़्यादातर डेरा 700 एकड़ के कैंपस के आसपास. डेरा आज सिरसा की पहचान है. लेकिन खुद राम रहीम सिरसा से नहीं हैं. उनकी पैदाइश राजस्थान के श्रीगंगानगर की है, तारीख थी 15 अगस्त 1967. जमींदार मगहर सिंह और नसीब कौर की इकलौती औलाद गुरमीत सिंह (जन्म के समय उनका नाम यही था) की ज़ाती ज़िंदगी में ऐसा कुछ नहीं जो डेरा से हट कर हो, और उसका ज़िक्र किया जाए. हो भी नहीं सकता था क्योंकि गुरमीत सिंह सात साल के ही थे जब उन्हें डेरा सच्चा सौदा के तब के प्रमुख शाह सतनाम सिंह ने अपनी शरण में ले लिया था.
सतनाम ने ही उन्हें वो नाम दिया जिससे वो आज जाने जाते हैं – गुरमीत राम रहीम सिंह. इसलिए आज से पलट कर पीछे देखने पर हम यही पाते हैं कि राम रहीम की कहानी डेरा सच्चा सौदा की कहानी है.
डेरा सच्चा सौदा काफी पुराना है. आज़ादी के अगले ही साल 29 अप्रैल 1948 को शाह मस्ताना जी महाराज ने डेरा की स्थापना सिरसा में की. मस्ताना के बाद आए राम रहीम के सिर पर हाथ रखने वाले शाह सतनाम सिंह. सतनाम सिंह के ज़माने में डेरा में देशी के साथ-साथ विदेशी अनुयायी भी आने लगे. 23 सितंबर 1990 को एक जलसे में सतनाम सिंह ने ऐलान किया कि उनके बाद डेरा प्रमुख होंगे गुरमीत राम रहीम. राम रहीम उस वक्त 23 बरस के बांके नौजवान थे. इस चीज़ ने लोगों का ध्यान खींचा. डेरा सच्चा सौदा (और दूसरे डेरों में भी) परंपरा ये थी कि एक प्रमुख के जाने के बाद उनकी वसीयत पढ़ी जाती थी, जिसमें उनके उत्तराधिकारी का नाम होता था. राम रहीम अपने गुरु के रहते उत्तराधिकारी बना दिए गए थे. इसके बाद गुरमीत राम रहीम ने अपने नाम के आगे इंसां लगाना शुरू किया.
संत हैं गृहस्थ हैं
राम रहीम को मानने वालों के लिए राम रहीम संत हैं. लेकिन राम रहीम की अपनी गृहस्थी भी है. उनकी दो बेटियां हैं – चरणप्रीत और अमरप्रीत. एक बेटा भी है जिसकी शादी भटिंडा के विधायक रहे हरमिंदर सिंह जस्सी की बेटी से हुई है. इनके अलावा रामरहीम की एक गोद ली बेटी हैं हनीप्रीत. चरणप्रीत और अमरप्रीत के पति डॉक्टर शान ए मीत इंसां और रूह ए मीत इंसां डेरे से ही जुड़े हुए हैं.
 राम रहीम और राजनीति
अपने यहां लोगों में धर्म और आध्यात्म की भूख इतनी है कि बाबाओं का पनपना आम है. लेकिन राम रहीम जहां पहुंचे हैं, वो कम ही लोग कर पाते हैं. कम ही बाबा होंगे जिनके अनुयायी उन्हें ‘पिताजी’ कहते हों. ये बात कहने भर की नहीं है. रेप केस में फैसला आने को था तो उनके अनुयायियों ने साफ कहा कि राम रहीम को ‘कुछ हुआ’ तो वो कुछ भी कर गुज़रेंगे. इन कट्टर अनुयायियों की संख्या लाखों में है. डेरा अपनी ओर से इनकी संख्या करोड़ों में बताता है.
इतने कट्टर समर्थकों का एक बड़ा बेस राजनेताओं को भी खींचता है. और राम रहीम राजनेताओं से दूर रहने का कोई प्रयास नहीं करते. हरियाणा विधानसभा चुनावों से पहले अमित शाह राम रहीम से मिलने गए थे. इसके हफ्ते भर के अंदर भाजपा के 90 में से 44 उम्मीदवार राम रहीम से मिलने सिरसा गए थे. इस बार के हरियाणा और पंजाब विधानसभा चुनावों में डेरा सच्चा सौदा ने भाजपा और अकाली दल के लिए खुलकर समर्थन का ऐलान किया था. लगभग ढाई दशक में ये पहली बार था कि डेरा ने खुल कर किसी राजनैतिक दल का समर्थक किया था. राम रहीम की ‘गुफा’ के अंदर जाने वाले बताते हैं कि वहां कई बड़े नेताओं के राम रहीम के चरण छूते कई फोटो हैं. इसमें लगभग साभी पार्टियों के नेता हैं.
 डेरा और उसकी सल्तनत
डेरा सच्चा सौदा का सिरसा का कैंपस 700 एकड़ में फैला है. इसके अलावा डेरा के देशभर में 50 के लगभग और आश्रम हैं. कुछ आश्रम अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और कैनेडा में भी हैं. डेरा का एक स्कूल है जहां से राम रहीम के बच्चे भी पढ़े हैं. सिरसा में एक अस्पताल है जहां गरीबों का सस्ता इलाज किया जाता है. 175 बिस्तरों वाला एक अस्पताल श्रीगंगानगर में भी है. न्यूज़ वेबसाइट फर्सटपोस्ट के मुताबिक डेरा का एक मार्केट कॉम्प्लेक्स और गैस स्टेशन भी है. इस पूरी जायदाद का रख-रखाव एक ट्रस्ट के ज़रिए होता है जिसके प्रमुख राम रहीम हैं.
डेरा सच्चा सौदा की फिलॉसफी कुछ-कुछ ‘सबका मालिक एक’ जैसी है. डेरा कहता है कि वो सभी धर्मों को एक करने की ओर काम कर रहा हैं. लेकिन बावजूद इसके डेरा अपने आप में एक पंथ चला रहा है. डेरा से जुड़ने वाले अनुयायी ‘प्रेमी’ कहलाते हैं. प्रेमी बनने की एक पूरी प्रक्रिया है. इसमें पहले ‘जाम’ पिलाया जाता है. ये एक तरह का पानी होता है. इसके बाद होता है ‘नामदान’. ये वैसा ही होता है जैसे हम गुरुमंत्र लेते हैं. हर अनुयायी को चार-पांच शब्दों का एक कॉम्बिनेशन मिलता है जिसका उसे मंत्र की तरह जाप करना होता है. ये उस अनुयायी के लिए सिमरन होता है. इसके बाद एक ‘1’ लिखा एक लॉकेट पहनाया जाता है. इस लॉकेट में 1 के आंकड़े में हर धर्म का चिह्न बना होता है. इसके बाद अनुयायी से उसका सरनेम छोड़कर उसकी जगह ‘इंसा’ लगाने को कहा जाता है. इसके बाद अनुयायी डेरा का प्रेमी बन जाता है.
बाकी आध्यात्मिक संस्थानों की तरह डेरा भी समाजसेवा के छोटे-मोटे काम जैसे ब्लड डोनेशन वगैरह करवाता रहता है. अलग-अलग जगह होने वाले राम रहीम के प्रवचनों (जिन्हें ‘नामचर्चा’ कहा जाता है) में काफी भीड़ जुटती है.
राम रहीम के कल्ट को नकारना मुश्किल है. क्योंकि इस कल्ट में लाखों लोग मानते हैं. लेकिन एक दूसरी जमात भी है जो राम रहीम को संशय की नज़र से देखती है. गॉडफादर नॉवेल लिखने वाले मारियो पुज़ो ने लिखा था, Behind every great fortune, there is a crime. डेरा सच्चा सौदा के बारे में ये कई लोगों को ये बात सही लगती है. डेरा एक के बाद एक विवादों से जुड़ा रहा है और कई संगीन अपराधों में डेरे के लोगों पर आरोप भी लगे हैं-
# 1998 में डेरा की जीप से कुचलकर गांव बेगू के एक बच्चे की मौत हो गई थी. गांव वालों से डेरा वालों का विवाद हो गया था. इसकी खबरें छापने पर एक स्थानीय अखबार के स्टाफ को डेरा के लोग धमकाने चले गए थे.
# इसके बाद 2002 में गुरमीत राम रहीम पर आश्रम में साध्वियों के रेप का इल्ज़ाम लगा. इसी साल आश्रम के एक मैनेजर रंजीत सिंह की हत्या हुई और फिर साध्वियों के रेप की खबर छापने वाले एक अखबार के संपादक रामचंद्र छत्रपति की हत्या हो गई. हत्या के इन दोनों मामलों में राम रहीम आरोपी हैं.मई 2007 में बठिंडा के डेरा सलावतपुरा में राम रहीम ने सिख गुरु गोबिंद सिंह जैसे कपड़े पहनकर तस्वीरें खिंचवाई. इन तस्वीरों के अखबारों में छपने से सिख आहत हुए. पंजाब और दूसरी जगहों पर सिखों और डेरे के अनुयायियों में टकराव हुआ. डेरे के एक प्रेमी की चलाई गोली से एक सिख लड़के कोमल सिंह की मौत हो गई. इसके बाद पंजाब में राम रहीम की गिरफ्तारी के लिए काफी प्रदर्शन हुए थे.
# 2010 में डेरा के ही पूर्व साधु राम कुमार बिश्नोई ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में याचिका दायर कर डेरा के पूर्व मैनेजर फकीर चंद की गुमशुदगी की सीबीआई जांच की मांग की. बिश्नोई का आरोप था कि डेरा प्रमुख के आदेश पर फकीरचंद की हत्या कर दी गई. इस मामले में भी उच्च न्यायालय ने सीबीआई जांच के आदेश दिए. बौखलाए डेरा प्रेमियों ने हरियाणा, पंजाब व राजस्थान में एक साथ सरकारी सम्पति को नुकसान पहुंचाया. सीबीआई जांच के दौरान मामले में सुबूत नहीं जुटा पाई और क्लोज़र रिपोर्ट फाइल कर दी. बिश्नोई ने उच्च न्यायालय में क्लोज़र को चुनौती दे रखी है.17 जुलाई, 2010 को फतेहाबाद के रहने वाले हंसराज चौहान (पूर्व डेरा साधु) ने पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर राम रहीम पर पर डेरा के 400 साधुओं को नपुंसक बनाने का आरोप लगाया. चौहान का कहना था कि राम रहीम के कहने पर डेरा के चिकित्कों की टीम द्वारा साधुओं को नपुंसक बनाया जाता है. इन साधुओं को नपुंसक बनाने के बाद भगवान के दर्शन होने की बात कही जाती है.
चौहान ने कोर्ट में इसके शिकार बने 166 साधुओं के नाम भी पेश किए थे. चौहान ने अपनी याचिका में बताया था कि रामचंद्र छत्रपति मर्डर केस में आरोपी निर्मल और कुलदीप भी डेरा सच्चा सौदा के नपुंसक साधु थे. कोर्ट के आदेश पर छत्रपति मर्डर केस में जेल में बंद डेरा के साधुओं से पूछताछ हुई जिसमें उन्होंने भी स्वीकार किया कि वे नपुंसक हैं लेकिन वे अपनी मर्जी से बने हैं. चौहान ने ये भी बताया गया था कि डेरा के एक साधु विनोद नरूला ने राम रहीम की पेशी के समय सिरसा न्यायालय में स्वयं को गोली मारकर आत्महत्या की थी. वह साधु भी नपुंसक ही था.ऊपर लिखी चीज़ों के चलते राम रहीम के चर्चे थे. लेकिन वो इंटरनेट पर सेलेब्रेटी तब बने जब 2015 में उनकी पहली फिल्म एमएसजीः मैसेंजर ऑफ गॉड आई. बाबा के भौकाल के इर्द गिर्द बनी इस फिल्म पर खूब मीम बने. इसी साल एमएसजी-2 द मैसेंजर आई. 2016 में आई एमएसजीः द वारियर लायन हार्ट. 2017 में अब तक राम रहीम की दो फिल्में आ चुकी हैं – ‘हिंद का नापाक को जवाब- एमएसजी लायन हार्ट-2’ और जट्टू इंजीनियर.
राम रहीम इन फिल्म में लीड एक्टर, डायरेक्टर, प्रोड्यूसर, लिरिसिस्ट, कंपोज़र सब कुछ होते हैं. ये फिल्में किसी आम दर्शक के लिए वाहियात से कम कुछ नहीं होतीं. लेकिन बाबा के अनुयायी इन्हें देखते हैं और कुछ फिल्मों का कलेक्शन 100 करोड़ के ऊपर भी गया है. फिल्मों से पहले 2012 से 2014 तक राम रहीम ने छह म्यूज़िक एल्बम बनाए जो यूनिवर्सल ने रिलीज़ किए थे.