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Sunday, 29 January 2017

सनातन धर्म

सनातन धर्म: बरमूडा ट्राइंगल का निर्माण किया             था अश्विनी कुमारो  पर क्यों?



ये तो आप जानते ही है की एटलांटा में एक ऐसा त्रिकोण क्षेत्र है जंहा से की कोई भी विमान या जहान भी होके गुजर तो वो संपर्को से टूट गया और उसका आज तक कोई आता पता नही है! दुनिया भर के वैज्ञानिक इसके बारे में अब तक कुछ नही नही जान पाए है, लेकिन आपको ये जान के आश्चर्य होगा की इसके बारे में लगभग 23 हजार साल पहले ही भारतीय विद्वानों ने लिख दिया था!

वो और कुछ नही बल्कि उस समय के अपग्रेड किये गए वेद थे जिसमे इस रहस्य के बारे में लिखा गया है, क्या आप जानना नही चाहेंगे क्या लिखा है उसमे इस हक़ीक़त के बारे में?

वेदोक्त कथा के अनुसार मंगल गृह की उत्पति धरती पर ही हुई थी, एक बार भगवान् शिव को पसीना आया और उस पसीने के बून्द धरती पर गिरी और उससे ही हुआ मंगल का जन्म जो बाद में एक गृह बन गया! लेकिन मंगल गृह पे प्रचुर मात्रा में लोह अयस्क है जो की उस स्थान से प्रति से शोषित हो गए!ऐसे में पृथ्वी इतनी कमजोर हो गई की वो अपनी ही धुरी पर घूमने लगी और घिसने लगी, ऐसे में देव चिकित्सक अश्विनी कुमारो को उसके उपाय के लिए भेजा गया!

तब देव वैध अश्विन कुमारो ने एक त्रिदों आकार का लोहा वँहा लगा दिया जंहा मंगल का जन्म हुआ था, तब धरती फिर सही हो गई लेकिन उस स्थान पर इस त्रिकोण के चलते गुरुत्वाकषण इतना बढ़ गया की अब उस स्थान के ऊपर से जाने वाला हर कोई उस में खिंच जाता है और वो कभी भी वापस नही लौट पाता है!ये वृतांत ऋग्वेद में लिखा है, लेकिन उसके ऊपर से गुजरने वाले साधनो के संपर्क कैसे टूटते है वो लिखा है अर्थवेद में...

अर्थवेद में कई रत्नों का उल्लेख किया गया है, जिनमें से एक रत्न है दर्भा जोHIgh Density है और न्यूट्रॉन स्टार का एक बहुत ही छोटा रूप है। दर्भा रत्न का उच्च गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र, उच्च कोटि की एनर्जेटिक रेज़ का उत्त्सर्जन और हलचल वाली चीज़ों को नष्ट करना आदि गुणों को बरमूडा ट्रायंगल में होने वाली घटनाओं से जोड़ा जाता है। इस क्षेत्र में दर्भा रत्न जैसी परिस्थिति होने के कारण अधिक ऊर्जावान विद्युत चुंबकीय तरंगों का उत्त्सर्जन होता है और वायरलेस से निकलने वाली इलेक्ट्रो-मैग्नेटिक तरंगों के इसके संपर्क में आते ही वायरलेस ख़राब हो जाता है और उस क्षेत्र में मौजूद हर चीज़ नष्ट हो जाती है।