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Friday, 27 May 2016

देश के दलालों; आरक्षण हटाओ, रोजगार बढ़ाओ, प्रतिभा बचाओ, बेरोज़गारी अपने आप ख़त्म हो जायेगी!

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“आरक्षण नहीं रोजगार बढ़ाओ, बेरोज़गारी अपने आप  ख़त्म हो जायेगी ; जब प्रतिभा को अवसर सहज ही उपलब्ध होगा तो समाज को आरक्षण की आवश्यकता ही नहीं होगी ; राजस्व की वृद्धि केवल कर बढाकर संभव नहीं, क्यों न लोगों की आय बढ़ाने  का प्रयास किया जाए।
धन का सृजन समाज की समृद्धि के लिए आवश्यक है और इसीलिए  सरकार की नीतियां भी ऐसी होनी चाहिए जो समाज में धन के सृजन को प्रोत्साहित करे पर धन का निर्माण किस कीमत पर हो  इसे अनदेखा नहीं किया जा सकता , लाभ बुरा नहीं बुराई लालच में है ! किसी भी परिस्थिति में धन का मूल्य जीवन मूल्यों से अधिक महत्वपूर्ण नहीं हो सकता।
सरकार की नीतियां ऐसी होनी चाहिए जो समाज को आत्म निर्भर बनाने  पर केंद्रित हो पर जब शाशन तंत्र अपनी शक्तियों का प्रयोग समाज को आश्रित करने में लगाएगा तो विकास कैसा और कैसे ?
दण्ड का प्रावधान अपराध के प्रति विकर्षण पैदा करने के लिए था और कानून की व्यवस्था न्याय को सुनिश्चित करने के लिए पर जब कानूनी प्रावधान का प्रयोग अपराधियों के संरक्षण और निर्बल  के शोषण के लिए होने लगे तो व्यवस्था तंत्र के प्रति समाज में अविश्वास स्वाभाविक है और न ही अपराध को रोक पान संभव होगा ।
मांग और आपूर्ति पर आधारित अर्थ व्यवस्था पूंजीवाद की दृष्टि से सही हो सकती है पर आदर्श परिस्थिति में जीवन की आवश्यकता और संसाधनों की उपयोगिता सिद्ध करना ही सही अर्थों में अर्थ की व्यवस्था कही जा सकती है।
बाज़ारवाद और विदेशी  निवेश भले ही आज देश को  आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण लगे पर जब तक समाज में लोगों के अंदर आत्मविश्वास के संचार का प्रयास न किया जाए , किसी भी राष्ट्र का विकास संभव ही नहीं, फिर आंकड़े चाहे जो कहें !
महत्वपूर्ण यह नहीं की हमारे पास क्या नहीं है बल्कि मह्त्व इस बात का होना चाहिए की हमारे पास क्या है, तभी हम अपनी कमज़ोरी को भी प्रयोग के माध्यम से अपनी शक्ति में रूपांतरित कर सकेंगे।
जनतंत्र में जनादेश महत्वपूर्ण है पर समाज में जनता की आवश्यकताएँ हर परिस्थिति में सर्वोपरि होनी चाहिए। हाँ, यह सही है की जनतंत्र में बहुमत को निर्णय का अधिकार प्राप्त होता है पर जब समस्या बहुमत का स्तर हो तो क्या किया जाए ? ऐसी परिस्थिति ही राजनीति में सामाजिक हस्तछेप   को आवश्यक बनाती  है।
सामाजिक विकास की दृष्टि से यह अत्यन्त आवश्यक है की सरकारी तंत्र सामाजिक व्यवस्था के लिए कैसी योजनाएं बनाती है और इतना ही नहीं, उनका क्रियान्वयन भी प्रयास की सफलता की दृष्टि से महत्वपूर्ण होगा और इस हिसाब से सरकार का नेतृत्व के लिए समाज अपने लिए कैसे नेता को चुनता है यह निर्णायक होता है।
इसीलिए, त्रुटिपूर्ण नेतृत्व ही सामाजिक विकास की दिशा में किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी चुनौती बन जाती है , जब तक इस समस्या का निवारण न किया जाए न तो परिस्थितियों में सुधार संभव है और न ही राष्ट्र की प्रगति ;
केवल ‘विकास’ के नाम पर दिए जाने वाले भाषणों से कभी भी किसी भी राष्ट्र का विकास नहीं हुआ , प्रयास को सही दिशा देनी होगी और यह तभी संभव है जब हम त्रुटिपूर्ण नेतृत्व को सामाजिक समस्या मानकर सर्वप्रथम उसके निवारण का प्रयास करें , क्योंकि वही सामाजिक कुव्यवस्था का मूल स्त्रोत है ;
जब तक हम समाज के  मूल समस्या पर अपने प्रयास को केंद्रित नहीं करेंगे और समस्या के प्रभाव से विचलित होकर प्रतिक्रिया  करते रहेंगे, परिस्थितियों में परिवर्तन संभव ही नहीं। प्रयास की औपचारिकता अपने परिणाम से केवल समय की व्यर्थता ही सिद्ध करेगी, ऐसे में, यह हमें सोचना है की हमारे लिए महत्वपूर्ण क्या है , राष्ट्र या राजनीति, जीवन की सफलता या सार्थकता !”|

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