Follow Me On Facebook

Sunday, 24 September 2017

नवरात्र में माता दुर्गा के पांचवे स्वरूप में मां स्कंदमाता की आराधना की जाती है

पांचवें दिन ऐसे करें स्कंदमाता की पूजा


नवरात्र में माता दुर्गा के पांचवे स्वरूप में मां स्कंदमाता की आराधना की जाती है

भगवती दुर्गा के पांचवे स्वरुप को स्कंदमाता के रूप में जाना जाता है. शास्त्रों के अनुसार नवरात्र में माता दुर्गा के पांचवे स्वरूप में मां स्कंदमाता की आराधना की जाती है. इनकी उपासना करने से भक्त की सर्व इच्छाएं पूर्ण हो जाती हैं. भक्त को मोक्ष की प्राप्ति होती है.
स्कंदमाता का स्वरूप
स्कंद का अर्थ है कुमार कार्तिकेय अर्थात माता पार्वती और भगवान शिव के जेष्ठ पुत्र कार्तिकय. जो भगवान स्कंद कुमार की माता है वही है मां स्कंदमाता. शास्त्र अनुसार देवी स्कंदमाता ने अपनी दाई तरफ की ऊपर वाली भुजा से बाल स्वरुप में भगवान कार्तिकेय को गोद में लिया हुआ है.
स्कंदमाता स्वरुपिणी देवी की चार भुजाएं हैं. ये दाहिनी तरफ की ऊपर वाली भुजा से भगवान स्कंद को गोद में पकड़े हुए हैं. बाईं तरफ की ऊपर वाली भुजा वरमुद्रा में और नीचे वाली भुजा जो ऊपर की ओर उठी है, उसमें कमल-पुष्प लिए हुए हैं.
कमल के आसन पर विराजमान होने के कारण इन्हें पद्मासना देवी भी कहा जाता है. सिंह इनका वाहन है. शेर पर सवार होकर माता दुर्गा अपने पांचवें स्वरुप स्कंदमाता के रुप में भक्तजनों के कल्याण के लिए सदैव तत्पर रहती हैं. इन्हें कल्याणकारी शक्ति की अधिष्ठात्री कहा जाता है. देवी स्कंदमाता सूर्यमंडल की अधिष्ठात्री देवी हैं तथा इनकी मनोहर छवि पूरे ब्रह्मांड में प्रकाशमान होती है.
उपासना का मंत्र
या देवी सर्वभू‍तेषु स्कंदमाता रूपेण संस्थिता. नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:
अर्थात् सिंह पर सवार रहने वाली और अपने दो हाथों में कमल का फूल धारण करने वाली यशस्विनी स्कंदमाता हमारे लिए शुभदायी हो.

Saturday, 23 September 2017

मां कूष्माण्डा..सुने हर दिल की पुकार

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कूष्माण्डा रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।





नवरात्र का चौथा दिन मां कूष्माण्डा के नाम है। अपनी मंद मुस्कान से अण्ड को उत्पन्न करने के कारण इनकी प्रसिद्धि कूष्माण्डा के नाम से हुई है। मां का यह रूप बहुत ही सरस है। जो हर किसी की पुकार सुनती हैं। मां मन की चंचलता को शांत करती हैं और व्यक्ति को गति प्रदान करती हैं। मां के इस रूप के बारे में पुराणों में जिक्र है कि जब सृष्टि का अस्तित्व नहीं था, तब इन्हीं देवी ने ब्रह्मांड की रचना की थी। अतः ये ही सृष्टि की आदि-स्वरूपा, आदिशक्ति हैं। इनका निवास सूर्यमंडल के भीतर के लोक में है। माँ कूष्माण्डा की उपासना से भक्तों के समस्त रोग-शोक मिट जाते हैं। इनकी भक्ति से आयु, यश, बल की वृद्धि होती है। माँ कूष्माण्डा अल्प सेवा और भक्ति से प्रसन्न होने वाली हैं। यदि मनुष्य सच्चे हृदय से इनका शरणागत बन जाए तो फिर उसे अत्यन्त सुगमता से परम पद की प्राप्ति हो सकती है। इस दिन मां का नाम लेकर ध्यान करना चाहिए। मां के इस रूप से पूजने वाले व्यक्ति के पौरूष में कभी कमी नहीं होती है, वो दिन-दूनी रात चौगुनी तरक्की करता है। वो जब तक धरती पर रहेगें, तब तक उसका कुल आबाद रहता है। इनका शरीर सूर्य की कांति के समान है। इनकी आठ भुजाएं हैं इसलिए ये अष्टभुजा भी कहलाती हैं। इनके दाहिनी ओर के चार हाथों में क्रमश: कमण्डलु, धनुष, बाण और कमल सुशोभित हैं तथा बाई ओर के हाथों में अमृत कलश, जप माला, गदा और चक्र हैं। इनके कानों में सोने के आभूषण और सिर पर सोने का मुकुट है। ये सिंह पर विराजमान हैं।




Friday, 22 September 2017

नवरात्रि तीसरा दिन: आज करें मां चंद्रघंटा की पूजा, जानें पूजा का महत्व

नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा का पूजा की जाती है। 

पिण्डजप्रवरारुढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता | प्रसादं तनुते मह्यं चन्द्रघण्टेति विश्रुता ||


मां चंद्रघंटा का रूप बहुत ही सौम्य है। मां को सुगंधप्रिय है। उनका वाहन सिंह है। उनके दस हाथ हैं। हर हाथ में अलग-अलग शस्त्र हैं। वे आसुरी शक्तियों से रक्षा करती हैं। मां चंद्रघंटा की आराधना करने वालों का अहंकार नष्ट होता है और उनको सौभाग्य, शांति और वैभव की प्राप्ति होती है।
ऐसा है मां का स्वरुप: 
मां दुर्गा के तीसरे स्वरुप का नाम चंद्रघंटा है। इनके मस्तक में घंटे के आकार का अर्धचंद्र है, इसीलिए इन्हें चंद्रघंटा कहा जाता है। मां चंद्रघंटा सिंह पर विराजती हैं। मां चंद्रघंटा देवी का स्वरूप सोने के समान कांतिवान है। देवी मां की दस भुजाएं हैं और दसों हाथों में खड्ग, बाण है। मां चंद्रघंटा के गले में सफेद फूलों की माला रहती है।  
पूजन का मंत्र:  
पिण्डजप्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता।
प्रसादं तनुते मह्यं चंद्रघण्टेति विश्रुता।।
किस रंग के पहनें कपड़े और क्या चढ़ाएं प्रसाद: 
देवी चंद्रघंटा को प्रसन्न करने के लिए श्रद्धालुओं को भूरे रंग के कपड़े पहनने चाहिए। मां चंद्रघंटा को अपना वाहन सिंह बहुत प्रिय है और इसीलिए गोल्डन रंग के कपड़े पहनना भी शुभ है। इसके अलावा मां सफेद चीज का भोग जैसै दूध या खीर का भोग लगाना चाहिए। इसके अलावा माता चंद्रघंटा को शहद का भोग भी लगाया जाता है।
देवी पूजा का महत्‍व 
नवरात्रि में तीसरे दिन इस देवी की पूजा का महत्व है। देवी की कृपा से साधक को अलौकिक वस्तुओं के दर्शन होते हैं। दिव्य सुगंधियों का अनुभव होता है और कई तरह की ध्वनियां सुनाईं देने लगती हैं। इन क्षणों में साधक को बहुत सावधान रहना चाहिए। इस देवी की आराधना से साधक में वीरता और निर्भयता के साथ ही सौम्यता और विनम्रता का विकास होता है।

उपासना

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ चंद्रघंटा रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
अर्थ : हे माँ! सर्वत्र विराजमान और चंद्रघंटा के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ। हे माँ, मुझे सब पापों से मुक्ति प्रदान करें।
इस दिन सांवली रंग की ऐसी विवाहित महिला जिसके चेहरे पर तेज हो, को बुलाकर उनका पूजन करना चाहिए। भोजन में दही और हलवा खिलाएँ। भेंट में कलश और मंदिर की घंटी भेंट करना चाहिए।


Thursday, 21 September 2017

देवी ब्रह्मचारिणी के दाहिने हाथ में अक्ष माला है और बायें हाथ में कमण्डल होता है। देवी ब्रह्मचारिणी साक्षात ब्रह्म का स्वरूप हैं

आज है दूसरा नवरात्र मां ब्रह्मचारिणी का दिन, जानिए पूजा और व्रत विधि से कर सकते हैं उनको प्रसन्न



Puja, Vrat Vidhi: देवी ब्रह्मचारिणी के दाहिने हाथ में अक्ष माला है और बायें हाथ में कमण्डल होता है। देवी ब्रह्मचारिणी साक्षात ब्रह्म का स्वरूप हैं
ब्रह्मचारिणी” माँ दुर्गा का दूसरा रूप हैं। इनकी उपासना नवरात्रि के दूसरे दिन की जाती है। ब्रह्म का अर्थ है तपस्या और चारिणी यानी आचरण करने वाली अर्थात तप का आचरण करने वाली मां ब्रह्मचारिणी। यह देवी शांत और निमग्न होकर तप में लीन हैं। मुख पर कठोर तपस्या के कारण अद्भुत तेज और कांति का ऐसा अनूठा संगम है जो तीनों लोको को उजागर कर रहा है। देवी ब्रह्मचारिणी के दाहिने हाथ में अक्ष माला है और बायें हाथ में कमण्डल होता है। देवी ब्रह्मचारिणी साक्षात ब्रह्म का स्वरूप हैं अर्थात तपस्या का मूर्तिमान रूप हैं। इस देवी के कई अन्य नाम हैं जैसे तपश्चारिणी, अपर्णा और उमा। इस दिन साधक का मन ‘स्वाधिष्ठान ’चक्र में स्थित होता है। इस चक्र में अवस्थित साधक मां ब्रह्मचारिणी जी की कृपा और भक्ति को प्राप्त करता है।
देवी ब्रह्मचारिणी, माँ पार्वती के जीवन काल का वो समय था जब वे भगवान शिव को अपने पति के रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या कर रही थी। तपस्या के प्रथम चरण में उन्होंने केवल फलों का सेवन किया फिर बेल पत्र और अंत में निराहार रहकर कई वर्षो तक तप कर भगवान शिव को प्रसन्न किया। देवी दुर्गा का यह दूसरा रूप भक्तों एवं सिद्धों को अमोघ फल देने वाला है। देवी ब्रह्मचारिणी की उपासना से तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार, संयम की वृद्धि होती है। माँ ब्रह्मचारिणी की कृपा से मनुष्य को सर्वत्र सिद्धि और विजय की प्राप्ति होती है, तथा जीवन की अनेक समस्याओं एवं परेशानियों का नाश होता है।भगवती को नवरात्र के दूसरे दिन चीनी का भोग लगाना चाहिए और ब्राह्मण को दान में भी चीनी ही देनी चाहिए। मान्यता है कि ऐसा करने से मनुष्य दीर्घायु होता है। इनकी उपासना करने से मनुष्य में तप, त्याग, सदाचार आदि की वृद्धि होती है।
ब्रह्मचारिणी पूजा विधि : 
देवी ब्रह्मचारिणी जी की पूजा का विधान इस प्रकार है, सर्वप्रथम आपने जिन देवी-देवताओ एवं गणों व योगिनियों को कलश में आमत्रित किया है उनकी फूल, अक्षत, रोली, चंदन, से पूजा करें उन्हें दूध, दही, शर्करा, घृत, व मधु से स्नान करायें व देवी को जो कुछ भी प्रसाद अर्पित कर रहे हैं उसमें से एक अंश इन्हें भी अर्पण करें। प्रसाद के पश्चात आचमन और फिर पान, सुपारी भेंट कर इनकी प्रदक्षिणा करें। कलश देवता की पूजा के पश्चात इसी प्रकार नवग्रह, दशदिक्पाल, नगर देवता, ग्राम देवता, की पूजा करें। इनकी पूजा के पश्चात मॉ ब्रह्मचारिणी की पूजा करें। देवी की पूजा करते समय सबसे पहले हाथों में एक फूल लेकर प्रार्थना करें “दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू. देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा”.. इसके पश्चात् देवी को पंचामृत स्नान करायें और फिर भांति भांति से फूल, अक्षत, कुमकुम, सिन्दुर, अर्पित करें देवी को अरूहूल का फूल (लाल रंग का एक विशेष फूल) व कमल काफी पसंद है उनकी माला पहनायें। प्रसाद और आचमन के पश्चात् पान सुपारी भेंट कर प्रदक्षिणा करें और घी व कपूर मिलाकर देवी की आरती करें। निम्नलिखित मंत्रो से ब्रह्मचारिणी का ध्यान, ब्रह्मचारिणी की स्तोत्र पाठ एवं ब्रह्मचारिणी की कवच पाठ करे।
ब्रह्मचारिणी का ध्यान :
वन्दे वांछित लाभायचन्द्रार्घकृतशेखराम्।
जपमालाकमण्डलु धराब्रह्मचारिणी शुभाम्॥
गौरवर्णा स्वाधिष्ठानस्थिता द्वितीय दुर्गा त्रिनेत्राम।
धवल परिधाना ब्रह्मरूपा पुष्पालंकार भूषिताम्॥
परम वंदना पल्लवराधरां कांत कपोला पीन।
पयोधराम् कमनीया लावणयं स्मेरमुखी निम्ननाभि नितम्बनीम्॥
ब्रह्मचारिणी की स्तोत्र पाठ :
तपश्चारिणी त्वंहि तापत्रय निवारणीम्।
ब्रह्मरूपधरा ब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्॥
शंकरप्रिया त्वंहि भुक्ति-मुक्ति दायिनी।
शान्तिदा ज्ञानदा ब्रह्मचारिणीप्रणमाम्यहम्॥
ब्रह्मचारिणी की कवच :
त्रिपुरा में हृदयं पातु ललाटे पातु शंकरभामिनी।
अर्पण सदापातु नेत्रो, अर्धरी च कपोलो॥
पंचदशी कण्ठे पातुमध्यदेशे पातुमहेश्वरी॥
षोडशी सदापातु नाभो गृहो च पादयो।
अंग प्रत्यंग सतत पातु ब्रह्मचारिणी।
अंत में क्षमा प्रार्थना करें “आवाहनं न जानामि न जानामि वसर्जनं, पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वरी” ।

Wednesday, 20 September 2017

माँ शैलपुत्री - नवरात्र का पहला दिन, माँ दुर्गा के स्वरूप शैलपुत्री की पूजा विधि

मां शैलपुत्री - पहले नवरात्र की व्रत कथा:-
देवी दुर्गा के नौ रूप होते हैं। दुर्गाजी पहले स्वरूप में 'शैलपुत्री' के नाम से जानी जाती हैं। ये ही नवदुर्गाओं में प्रथम दुर्गा हैं। पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री रूप में उत्पन्न होने के कारण इनका नाम 'शैलपुत्री' पड़ा। नवरात्र-पूजन में प्रथम दिवस इन्हीं की पूजा और उपासना की जाती है।

उपासना मंत्र : वन्दे वांछितलाभाय चन्दार्धकृतशेखराम्।

                        वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्।।

नंदी नामक वृषभ पर सवार ‘शैलपुत्री’ के दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल का पुष्प है। इन्हें समस्त वन्य जीव-जंतुओं की रक्षक माना जाता है। दुर्गम स्थलों पर स्थित बस्तियों में सबसे पहले शैलपुत्री के मंदिर की स्थापना इसीलिए की जाती है कि वह स्थान सुरक्षित रह सके।

मां शैलपुत्री - पहले नवरात्र की व्रत कथा

एक बार प्रजापति दक्ष ने एक बहुत बड़ा यज्ञ किया। इसमें उन्होंने सारे  देवताओं को अपना-अपना यज्ञ-भाग प्राप्त करने के लिए निमंत्रित किया, किन्तु शंकरजी को उन्होंने इस यज्ञ में निमंत्रित नहीं किया। सती ने जब सुना कि उनके पिता एक अत्यंत विशाल यज्ञ का अनुष्ठान कर रहे हैं, तब वहाँ जाने के लिए उनका मन विकल हो उठा।
अपनी यह इच्छा उन्होंने शंकरजी को बताई। सारी बातों पर विचार करने के बाद उन्होंने कहाप्रजापति दक्ष किसी कारणवश हमसे रुष्ट हैं। अपनेयज्ञ में उन्होंने सारे देवताओं को निमंत्रित किया है। उनके यज्ञ-भाग भी उन्हें समर्पित किए हैं, किन्तु हमें जान-बूझकर नहीं बुलाया है। कोई सूचना तक नहीं भेजी है। ऐसी स्थिति में तुम्हारा वहाँ जाना किसी प्रकार भी श्रेयस्कर नहीं होगा।'
शंकरजी के इस उपदेश से सती का प्रबोध नहीं हुआ। पिता का यज्ञ देखने, वहाँ जाकर माता और बहनों से मिलने की उनकी व्यग्रता किसी प्रकार भी कम न हो सकी। उनका प्रबल आग्रह देखकर भगवान शंकरजी ने उन्हें वहाँ जाने की अनुमति दे दी।
सती ने पिता के घर पहुँचकर देखा कि कोई भी उनसे आदर और प्रेम के साथ बातचीत नहीं कर रहा है। सारे लोग मुँह फेरे हुए हैं। केवल उनकी माता ने स्नेह से उन्हें गले लगाया। बहनों की बातों में व्यंग्य और उपहास के भाव भरे हुए थे।
परिजनों के इस व्यवहार से उनके मन को बहुत क्लेश पहुँचा। उन्होंने यह भी देखा कि वहाँ चतुर्दिक भगवान शंकरजी के प्रति तिरस्कार का भाव भरा हुआ है। दक्ष ने उनके प्रति कुछ अपमानजनक वचन भी कहे। यह सब देखकर सती का हृदय क्षोभ, ग्लानि और क्रोध से संतप्त हो उठा। उन्होंने सोचा भगवान शंकरजी की बात न मान, यहाँ आकर मैंने बहुत बड़ी गलती की है।
वे अपने पति भगवान शंकर के इस अपमान को सह न सकीं। उन्होंने अपने उस रूप को तत्क्षण वहीं योगाग्नि द्वारा जलाकर भस्म कर दिया। वज्रपात के समान इस दारुण-दुःखद घटना को सुनकर शंकरजी ने क्रुद्ध होअपने गणों को भेजकर दक्ष के उस यज्ञ का पूर्णतः विध्वंस करा दिया।
सती ने योगाग्नि द्वारा अपने शरीर को भस्म कर अगले जन्म में शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लिया। इस बार वे 'शैलपुत्री' नाम से विख्यात हुर्ईं। पार्वती, हैमवती भी उन्हीं के नाम हैं। उपनिषद् की एक कथा के अनुसार इन्हीं ने हैमवती स्वरूप से देवताओं का गर्व-भंजन किया था।

माँ दुर्गा के स्वरूप शैलपुत्री की पूजा विधि

मां शैलपुत्री की तस्वीर स्थापित करें और उसके नीचें लकडी की चौकी पर लाल वस्त्र बिछायें। इसके ऊपर केशर से शं लिखें और उसके ऊपर मनोकामना पूर्ति गुटिका रखें। तत्पश्चात् हाथ में लाल पुष्प लेकर शैलपुत्री देवी का ध्यान करें। मंत्र इस प्रकार है-
ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डाय विच्चे ओम् शैलपुत्री देव्यै नम:
मंत्र के साथ ही हाथ के पुष्प मनोकामना गुटिका एवं मां के तस्वीर के ऊपर छोड दें। इसके बाद भोग प्रसाद अर्पित करें तथा मां शैलपुत्री के मंत्र का जाप करें। यह जप कम से कम 108 होना चाहिए।
मंत्र - ओम् शं शैलपुत्री देव्यै: : मंत्र संख्या पूर्ण होने के बाद मां के चरणों में अपनी मनोकामना को व्यक्त करके मां से प्रार्थना करें तथा श्रद्धा से आरती कीर्तन करें।
स्रोत पाठ
प्रथम दुर्गा त्वंहि भवसागर: तारणीम्।
धन ऐश्वर्य दायिनी शैलपुत्री प्रणमाभ्यम्॥
त्रिलोजननी त्वंहि परमानंद प्रदीयमान्।
सौभाग्यरोग्य दायनी शैलपुत्री प्रणमाभ्यहम्॥
चराचरेश्वरी त्वंहि महामोह: विनाशिन।
मुक्ति भुक्ति दायनीं शैलपुत्री प्रमनाम्यहम्॥

Monday, 18 September 2017

पुण्यतिथि, महान सिख पन्थ के चतुर्थ सिख गुरु पूज्यनीय रामदास जी

19 सितम्बर - पुण्यतिथि, महान सिख पन्थ के चतुर्थ सिख गुरु 
पूज्यनीय रामदास जी


भारत की सांस्कृतिक विरासत की सबसे बड़ी धरोहरों में से एक और भारत की बलिदानी फ़ौज के एक मजबूत धड़े सिख पन्थ के चतुर्थ गुरु पूज्यनीय श्री रामदास जी का निर्वाण दिवस है आज . न्याय , नीति और त्याग के मार्ग पर चलने वाले गुरु जी ने दुनिया को सदा ही सत्य और संस्कार के मार्ग दिखाए जिसके चलते दुनिया में धर्म स्थापना में मदद मिली .

वन्दनीय गुरु रामदास (जन्म- 24 सितम्बर, 1534 ई.) सिक्खों के चौथे गुरु थे। इन्होंने सिक्ख धर्म के सबसे प्रमुख पद गुरु को 1 सितम्बर, 1574 ई. में प्राप्त किया था। इस पद पर ये 1 सितम्बर, 1581 ई. तक बने रहे थे। ये सिक्खों के तीसरे गुरु अमरदास के दामाद थे। इन्होंने 1577 ई. में 'अमृत सरोवर' नामक एक नये नगर की स्थापना की थी, जो आगे चलकर अमृतसर के नाम से प्रसिद्ध हुआ।









महालया मांगलिक पर्व दुर्गा पूजा से सात दिन पहले नए चांद के महत्व को दर्शाता है.

महालया आज, शारदीय नवरात्र गुरुवार से शुरू

महालया मांगलिक पर्व दुर्गा पूजा से सात दिन पहले नए चांद के महत्व को दर्शाता है. माना जाता है कि इसके साथ ही त्योहारों का मौसम शुरू होता है और यह हमारे जीवन में उल्लास, शांति और समृद्धि लेकर आता है.
महालय का पर्व नवरात्र के प्रारंभ और पितृपक्ष के अंत का प्रतीक है. इस बार शारदीय नवरात्र‍ि गुरुवार यानी कि 21 सितंबर से शुरू होगा.
अश्व‍िन महीने की अमावस्या को महालया होती है. दशहरे के पहले जो अमावस्या की रात आती है उसे 'महालया अमावस्या' के नाम से जाना जाता है. एक तरह से इसी दिन से दशहरा की शुरुआत हो जाती है.
जानिये क्या है महालया और इसका महत्व
पितृपक्ष भाद्र पद मास की पूर्णिमा को शुरू होता है और 16 दिन रहता है. इसके बाद अश्व‍िन मास की अमावस्‍या को खत्म हो जाता है. इसी अमावस्‍या को ही महालया अमावस्‍या भी कहते हैं.
पितृ विसर्जन 2017 के बारे में जानें सब कुछ यहां, कैसे होगा विष योग का निवारण, दान का महत्व
गरूड पुराण में पितृपक्ष के बाद आने वाले महालया अमावस्या का खास महत्व है. हिन्‍दु धर्म की मान्‍यतानुसार इस दिन हमारे पूर्वज या पितृगण वायु के रूप में हमारे घर के दरवाजे पर आकर दस्‍तक देते हैं तथा अपने घर परिवार वालों से श्राद्ध की इच्छा रखते हैं. वे चाहते हैं कि उनके घर परिवार वाले उनका श्राद्ध करें और उन्‍हे तृप्‍त करके दोबारा विदा करें. अकाल मृत्यु से ग्रसित व्यक्तियों का श्राद्ध भी इसी दिन होता है.
ऐसी मान्यता है कि पूर्वज खुश होकर आर्शीवाद देते हैं और परिवार धन, विद्या, सुख से संपन्‍न रहता है. गरूड पुराण के अनुसार यह भी माना जाता है कि यदि श्राद्ध पक्ष में पितरों की तिथी आने पर जब उन्‍हे अपना भोजन नहीं मिलता है तो वे क्रोधित होकर श्राप देते हैं. जिसके कारण वह घर परिवार कभी भी उन्‍नति नहीं कर पाता है तथा उस घर से धन, बुद्धि, विद्या आदि का विनाश हो जाता है.
पिंडदान से पितरों की मुक्ति
एक मान्यता यह भी कि इस समय भारत में नई फसलों का पकना भी शुरू हो जाता है. इसलिए पूर्वजों के प्रति सम्मान और आभार प्रकट करने के प्रतीक रूप में, सबसे पहला अन्न उन्हें पिंड के रूप में भेंट करने की प्रथा रही है. इसके बाद ही लोग नवरात्रि, विजयादशमी और दीवाली जैसे त्योहारों के जश्न मनाते हैं.

Sunday, 17 September 2017

रोहिंग्या मुसलमानो को बाहर न किया तो जल्द ये भारत के लिए नासूर बन जायेंगे : राजा सिंह

राजा सिंह
रोहिंग्या मुसलमान मूल रूप से बांग्लादेशी/बंगाली
मुसलमान है

जिन्हे अंग्रेज मजदुर बनाकर बर्मा यानि म्यांमार में लेकर गए थे,
1735 तक 1 भी मुसलमान बर्मा में नहीं था
1735 में अंग्रेज मुसलमानो को बर्मा लेकर गए थे
ये मूल रूप से बर्मा के अराकान प्रदेश में बस गए, और 1920 तक
आते आते इनकी संख्या 45% हो गयी
एक बार संख्या अधिक हुई, तो रोहिंग्या मुसलमानो ने अरकान को पहले
पूर्वी पाकिस्तान में मिलाने की कोशिश
की, असफल रहे तो बौद्धों का कत्लेआम करना शुरू कर
दिया
ताकि अराकान को एक इस्लामिक देश बना सके
बौद्धों का इतना कत्लेआम किया गया की बौद्ध
भी शांति छोड़ने पर मजबूर हो गए, और जान बचाने के लिए
उन्होंने भी हथियार उठा लिया
अब ये रोहिंग्या मुसलमान भारत में घुसाए जा चुके है, और इन्होने
जनसँख्या जिहाद भी शुरू कर दिया है
हर एक रोहिंग्या महिला 10 से 12 बच्चे कर रही है
इनकी संख्या 2 सालों में 280% की रफ़्तार से
बढ़ी है, रोहिंग्या मुसलमान बेहद कट्टर होते है
और ये अन्य धर्म के लोगों के समस्या खड़ी कर देते है,
जैसा इन्होने म्यांमार में किया
हैदराबाद से बीजेपी विधायक टाइगर राजा सिंह ने
भी इन रोहिंग्यों को जल्द भारत से बाहर करने
की मांग करी है, राजा सिंह ने बाकायदा एक
वीडियो सन्देश भी जारी किया है
राजा सिंह ने कहा है की, रोहिंग्या मुसलमान जब बौद्धों के
साथ भी नहीं रह सके तो हिन्दुओ के साथ
कैसे रह लेंगे, अगर इनको जल्द बाहर नहीं किया गया तो
ये आने वाले समय में भारत देश के लिए बड़ी
मुसीबत बन जायेंगे !

नरेंद्र मोदी की जीवनी

श्री Narendra modi  का जीवन एक तपस्या से कम नहीं है | अपने २ साल के कार्यकाल मेंNarendra modi ने वो कर दिखया जिसे करने में लोगो को 10 साल से ज़्यदा लग जाता है | नरेंद्र  मोदी भारत के लिए  ऐसा नाम है जो भारत को बुलंदियों पर लेकर जा रहे हैं |Narendra modi का जीवन हर उम्र के लोगो के लिए एक मिसाल है |
चलिए पढ़ते है 
साल 1950 देश को आज़ाद हुए ३ ही साल हुए थे नयी भारत की नींव पढ़ रही थी इन्ही दिनों ,गाँधी नगर से 80 किलो मीटर दूर बड़नगर नाम का छोटा से कसबे  में 17 सितबर 1950 में Narendra Modi  का जन्म हुआ .नरेंद्र मोदी के पिता का नाम दामोदर दास मोदी और माँ का नाम हेरा बैन है
दामोदर दास मोदी की बड़नगर के रेलवे स्टेशन पर चाय की एक छोटी सी दुकान थी . उन दिनों 7 साल के Narendra Modi सुबह ही रेलवे स्टेशन पहुचकर अपने पिताजी का हाथ बटाते . और दोपहर में स्कूल में कोई पीरियड खली होता तो नरेंद्र दौड़ते हुए स्टेशन पहुच जाते और जैसे ही स्कूल का समय होता फिर से स्कूल पहुच जाते . बचपन के कई साल नरेंद्र के ऐसे ही बीते .  उनकी माँ घर घर जाकर बर्तन साफ़ करती .
बचपन के शंघर्षो ने नरेंद्र को और मजबूत बना दिया . १२ फ़ीट चौड़े और ४० फ़ीट लंबे एक छोटे से मकान में Narendra Modi अपने ५ भाई बहन और माँ बाप के साथ रहते .नरेंद्र बचपन से ही एक बार जो सोच लेते वह कर कर ही रहते थे .
नरेंद्र मोदी के बारे में एक कहानी सुनी जाती है की एक बार नरेंद्र ने मगरमछो से भरे तालाब में छलांग लगा दी और घड़ियाल का एक बच्चा अपने घर भी ले आये .नरेंद्र मोदी स्कूल में होने वाली हर एक्टिविटी में भाग लेते . और स्कूल के बाद ८ साल से  राष्टीय स्वयम सेवन संघ में जाते. नरेंद्र बचपन से ही बहुत धार्मिक थे .

Narendra Modi का चाय की दूकान से देश के Prime Minister बनने का सफर

१३ साल की उम्र में नरेंद्र मोदी की शादी जशोदा बैन से  करा दी गयी . शादी के ४ साल बाद नरेंद्र मोदी जब ११ क्लास में पढ़ रहे थे उन्होंने घर छोड़ने का निश्चय किया . ३ साल बाद वह फिर अपने घर लौटे . और कुछ समय बाद ही वह बड़नगर छोड़कर अहमदाबाद आ गए . वह एक कैंटीन में चाय देना शुरू कर दिया . वहां भी  नरेंद्र ने  RSS में जाना शुरू कर दिया . और वही संघ के लोगो के साथ रहने लगे . सुबह ५ बजे उठकर संघ के लोगो के लिए चाय बनाते और नाश्ता तैयार करते और कमरे में खुद ही झाड़ू लगाते .
१९७५ में देश में इमरजेंसी लगायी गयी थी उस समय नरेंद्र मोदी को संघ में काम करने का मौका मिला और उन्होंने इन दिनों बहुत कुछ सीखा . और एक साल बाद नरेंद्र को गुजरात के ६ जिलो का संघ प्रचारक बना दिया गया .१८८७ में नरेंद्र को गुजरात  बी.ज.प का सचिव बना दिया गया .२००१ में नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्य मंत्री बने और २०१४ तक गुजरात के मुख्यमंत्री रहे . और 14 may 2014 को भारत के प्रधान मंत्री पद पर नियुक्त हुए .

Narendra Modi Qualities

1.. Public Speaking Skills –

Narendra modi  की आवाज़ में ऐसी शक्ति है की वो हर किसी को अपनी बात सुनने पर विवश कर देते है | जो लोग उन्हें पसंद नहीं करते वो भी उनकी स्पीच हमेशा सुनते हैं | इसका मुख्य कारण है की वो अपनी हर एक स्पीच खुद ही लिखते हैं |

2. उत्साह Enthusiasm –

नरेंद्र मोदी का उत्साह कविले तारीफ है | ६६ वर्ष की उम्र में भी हर दिन नयी यात्रा बिना रुके बिना थके | मात्र ३-४ घंटे सोकर दिन भर काम करना उनके उत्साह का ही नतीजा है |श्री बराक ओबामा ने एक बार इंटरव्यू में बताया की नरेंद्र मोदी मात्र 3-4 घंटे ही सोते हैं | और पुरे दिन बिना रुके काम करते है |

3.. दृढ़निश्चय Determination –

नरेंद्र मोदी बचपन से ही दृढ़निश्चय  वाले थे | मात्र ८ साल की उम्र में नरेंद्र मोदी ने आरएसएस ज्वाइन की | बचपन में एक बार नरेंद्र मोदी ने नदी पर करके मंदिर जाने की सोच ली और उन्हें पता था की नदी में मगरमच्छ है फिर भी वो नदी पर करके गए | और चाय बेचने से शुरआत करने वाले श्री नरेंद्र मोदी आज भारत के प्रधान मंत्री (Prime minister) हैं ये उनके दृढ़निश्चय का ही नतीजा है |

4.धीरज युक्त  Patience

नरेंद्र मोदी जी की सबसे बढ़ी विशेषता है उनका धीरज युक्त होना |
हर किसी के जीवन में उतार चढ़ाव आते रहते हैं पर जीवन में धैर्य को बांये रखना बहुत ज़रूरी है |
5  नेतृत्व शक्ति Leadership Quality
नरेंद्र मोदी जी की नेतृत्व की शक्ति अतुलनीय है | आज भी वो बीजेपी के किसी भी

6. निडर Fearless  –

नरेंद्र मोदी स्वाभाव से ही निडर है |एक बार नरेंद्र मोदी जी ने  कन्यकुमरी से श्रीनगर तक की यात्रा निकली और श्री नगर के लाल चौक पर तिरंगा झंडा फैराया दिया |
7..Technology का सही उपयोग करने वाले  –
Narendra Modi  Technology को पसंद करते है और उसे प्रोत्साहन भी देते हैं | उस में वो Facebook  के CEO Mark Zuckerberg से भी मिले | वो हमेशा Tweet करते है और post करते है अपनी हर महत्व्पूर्ण घटना को | नरेंद्र मोदी से हम सिख सकते हैं की technology का use क्या होता है और उसका गुलाम बनना क्या होता है |
8. स्वास्थ्य प्रिय –
नरेंद्र मोदी एक दिन भी योग और प्राणायाम  नहीं छोड़ते  |Narendra Modi जी बताते है की जब कभी भी में थका हुआ महसूस करता हु तो तुरंत गहरी साँस लेने लगता हु यह मुझे एक बार फिर तारो ताज़ा कर देती है |
नरेंद्र मोदी जी के जीवन से हम भी सीखते चले और अपने जीवन को उन्नत बनाते चले |

Wednesday, 13 September 2017

14 सितंबर, 1949 के दिन हिंदी को राजभाषा का दर्जा मिला था.

14 सितंबर को मनाया जाता है 'हिंदी दिवस'...

14 सितंबर, 1949 के दिन हिंदी को राजभाषा का दर्जा मिला था. तब से हर साल यह दिन हिंदी दिवस के तौर पर मनाया जाता है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि हिंदी दिवस क्यों मनाया जाता है?? इसके पीछे एक वजह है. दरअसल साल 1947 में जब अंग्रेजी हुकूमत से आजाद हुआ तो देश के सामने भाषा को लेकर सबसे बड़ा सवाल था.
क्योंकि भारत में सैकड़ों भाषाएं और बोलियां बोली जाती है. 6 दिसंबर 1946 में आजाद भारत का संविधान तैयार करने के लिए संविधान का गठन हुआ. संविधान सभा ने अपना 26 नवंबर 1949 को संविधान के अंतिम प्रारूप को मंजूरी दे दी. आजाद भारत का अपना संविधान 26 जनवरी 1950 से पूरे देश में लागू हुआ.
लेकिन भारत की कौन सी राष्ट्रभाषा चुनी जाएगी ये मुद्दा काफी अहम था.काफी सोच विचार के बाद हिंदी और अंग्रेजी को नए राष्ट्र की भाषा चुना गया.संविधान सभा ने देवनागरी लिपी में लिखी हिंदी को अंग्रजों के साथ राष्ट्र की आधिकारिक भाषा के तौर पर स्वीकार किया था. 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने एक मत से निर्णय लिया कि हिंदी ही भारत की राजभाषा होगी.
देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने कहा कि इस दिन के महत्व देखते हुए हर साल 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाया जाए.बतादें पहला हिंदी दिवस 14 सितंबर 1953 में मनाया गया था.
अग्रेजी भाषा को लेकर हुआ विरोध
14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने एक मत से निर्णय लिया कि हिंदी ही भारत की राजभाषा होगी. अंग्रेजी भाषा को हटाए जाने की खबर पर देश के कुछ हिस्सों में विरोध प्रर्दशन शुरू हो गया था. तमिलनाडू में जनवरी 1965 में भाषा विवाद को लेकर दंगे हुए थे.
जनमानस की भाषा हैं हिंदी
साल 1918 में महात्मा गांधी ने हिन्दी साहित्य सम्मेलन में हिन्दी भाषा को राष्ट्रभाषा बनाने को कहा था. इसे गांधी जी ने जनमानस की भाषा भी कहा था.

Sunday, 10 September 2017

पुराणों के अनुसार जो व्यक्ति ब्राह्मण की अर्थी उठाता है, उसे अपने हर कदम पर एक यज्ञ के बराबर पुण्य प्राप्त होता है।

शव यात्रा देखते ही करें ये काम, पूरी हो जाएगी हर मनोकामना


जीवन का अंतिम सत्य है मृत्यु… भागवत गीता में श्री कृष्ण ने कहा है ,”मृत्यु एक ऐसा सत्य है, जिसे टाला नहीं जा सकता जिसने जन्म लिया है उसकी मृत्यु निश्चित है।” यही जीवन का सार है जो जीव इस धरती पर आया है, उसे एक दिन यहां से जाना है। यह प्रकृति का अटल नियम है… जिस प्रकार मृत्यु जीवन का महत्वपूर्ण पड़ाव है वैसे ही मृत्यु के साथ इस लोक से व्यक्ति की अंतिम विदाई भी महत्व रखती है जिसे शवयात्रा कहते हैं।
किसी भी इंसान की मृत्यु के बाद शवयात्रा निकाली जाती है और इस संबंध में भी शास्त्रों में कई नियम बताए गए हैं जिन्हें अपनाने से धर्म लाभ तो प्राप्त होता है साथ ही इससे मृत आत्मा को शांति भी मिलती है।शवयात्रा से सम्बन्धित हम आपकों ऐसे कुछ नियम और लोक मान्यताओं के बारे में बताने जा रहे है जिसके करने से मनुष्य को लाभ मिलता है।

1.शव यात्रा देखते ही प्रणाम करें

जब भी कोई शव यात्रा अथवा अर्थी दिखे तो उसे दोनों हाथ जोड़कर, सिर झुका कर  प्रणाम करें और मुंह से शिव-शिव का जाप करें।इसके पीछे शास्त्रोक्त मान्यता यह है कि जिस मृतात्मा ने अभी शरीर छोड़ा है, वह अपने साथ उस प्रणाम करने वाले व्यक्ति के सभी कष्टों, दुखों और अशुभ लक्षणों को अपने साथ ले जाए तथा उस व्यक्ति को “शिव” यानि मुक्ति प्रदान करें।

2. आत्मा की शान्ति के लिए करें प्रार्थना

शव यात्रा को देखकर वहां से गुजरने वाले लोग थोड़ी देर ठहर जाते हैं और ईश्वर से प्रार्थना करते है। यह हिन्दू धर्म का एक प्रमुख नियम है, जिसके अनुसार शवयात्रा को देखने के बाद हमें मृत आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करनी चाहिए। इससे मृत आत्मा को शांति मिलती है।

3.पूरे हो जाएंगे रूके काम

धार्मिक दृष्टिकोण के अलावा ज्योतिष की भाषा में भी शवयात्रा देखना शुभ बताया गया है। मान्यता है कि यदि कोई व्यक्ति शव यात्रा को देखता है, तो उसके रुके काम पूरे होने की संभावनाएं बन जाती है। उसके जीवन से दुख भी दूर होते हैं और उसकी मनोकामना पूर्ण होती है।

4. यज्ञ के बराबर मिलता है पुण्य

पुराणों के अनुसार जो व्यक्ति ब्राह्मण की अर्थी उठाता है, उसे अपने हर कदम पर एक यज्ञ के बराबर पुण्य प्राप्त होता है।

Monday, 4 September 2017

पूर्व राष्ट्रपति एवं प्रख्यात शिक्षाविद डॉ.सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी की जंयती पर उन्हें शत्–शत् नमन् |

डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन 

Dr Sarvepalli Radhakrishnan – डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन एक महान भारतीय दर्शनशास्त्री थे जो 1952-1962 तक भारत के उपराष्ट्रपति तथा 1962 से 1967 तक भारत के दुसरे राष्ट्रपति रह चुके है। उनका विद्यार्थियों और शिक्षकों के साथ बहुत ज्यादा लगाव था और शिक्षण क्षेत्र में भी उन्होंने अच्छे कार्य किये थे। इसीलिए पुरे भारत में 5 सितम्बर उनके जन्मदिन पर शिक्षक दिन मनाया जाता हैं। आज हम डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के महान जीवन के बारे में संक्षेप में जानते हैं।

डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन – Dr Sarvepalli Radhakrishnan Biography in Hindi

पूरा नाम   – डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन
जन्म        – 5 September 1888
जन्मस्थान – तिरुतनी ग्राम, तमिलनाडु
पिता       – सर्वेपल्ली वीरास्वामी
माता       – सिताम्मा
विवाह     – सिवाकमु
डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन 20 वी सदी के दर्शनशास्त्र और धार्मिकता के एक असाधारण विद्वान थे। उनके शैक्षणिक नियुक्ति में कलकत्ता विश्वविद्यालय (1921-1932) में किंग जॉर्ज के मानसिकऔर नैतिक विज्ञानं का पद भी शामिल है और साथ ही वे पूर्वी धर्म के प्रोफेसर और ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय (1936-1952) में नीतिशास्त्र के प्रोफेसर भी थे।
उनके दर्शनशास्त्र का आधार अद्वैत वेदांत था, जिसे वे आधुनिक समझ के लिए पुनर्स्थापित करवाना चाहते थे। उन्होंने पश्चिमी परम्पराओ की आलोचना करते हुए हिंदुत्वता की रक्षा की, ताकि वे देश में एक आधुनिक Hindi समाज का निर्माण कर सके। वे भारतीयों और पश्चिमी दोनों देशो में हिंदुत्वता की एक साफ़-सुथरी तस्वीर बनाना चाहते थे। जिसे दोनों देशो के लोग आसानी से समझ सके और भारतीय और पश्चिमी देशो के मध्य संबंध विकसित हो सके।
राधाकृष्णन को उनके जीवन के कई उच्चस्तर के पुरस्कारों से नवाज़ा गया जिसमे 1931 में दी गयी “सामंत की उपाधि” भी शामिल है और 1954 में दिया गया भारत का नागरिकत्व का सबसे बड़ा पुरस्कार “भारत रत्न” भी शामिल है तथा उन्हें 1963 में ब्रिटिश रॉयल आर्डर की सदस्यता भी दी गयी। राधाकृष्णन का ऐसा मानना था की, “शिक्षक ही देश की सबसे बड़ी सोच होते है”। और तभी से 1962 से उनके जन्मदिन 5 सितम्बर को “शिक्षक दिवस” के रूप में मनाया जाता है।

प्रारंभिक जीवन – Early Life History Sarvepalli Radhakrishnan

डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्म तमिलनाडु के तिरुतनी ग्राम में जो तत्कालीन मद्रास से लगभग थोड़ी दुरी पर है वहा एक तेलगु परिवार में हुआ। उनके पिता का नाम सर्वेपल्ली वीरास्वामी और माता का नाम सिताम्मा है। उन्होंने अपना प्रारंभिक जीवन तिरुतनी और तिरुपति में बिताया। उनके पिता राजस्व विभाग में काम करते थे। उनकी प्रारंभिक शिक्षा तिरुतनी में ही हुई और 1896 में वे पढने के लिए तिरुपति चले गये।
डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन शिक्षा – Dr Sarvepalli Radhakrishnan Education
उनके विद्यार्थी जीवन में कई बार उन्हें शिष्यवृत्ति स्वरुप पुरस्कार मिले। उन्होंने वूरहीस महाविद्यालय, वेल्लोर जाना शुरू किया लेकिन बाद में 17 साल की आयु में ही वे मद्रास क्रिस्चियन महाविद्यालय चले गये। जहा 1906 में वे स्नातक हुए और बाद में वही से उन्होंने दर्शनशास्त्र में अपनी मास्टर डिग्री प्राप्त की। उनकी इस उपलब्धि ने उनको उस महाविद्यालय का एक आदर्श विद्यार्थी बनाया।
दर्शनशास्त्र में राधाकृष्णन अपनी इच्छा से नहीं गये थे उन्हें अचानक ही उसमे प्रवेश लेना पड़ा। उनकी आर्थिक स्थिति ख़राब हो जाने के कारण जब उनके एक भाई ने उसी महाविद्यालय से पढाई पूरी की तभी मजबूरन राधाकृष्णन को आगे उसी की दर्शनशास्त्र की किताब लेकर आगे पढना पड़ा।
एम.ए. में राधाकृष्णन में अपने कई शोधप्रबंध लिखे जिसमे “वेदांत का नीतिशास्त्र और उसकी सैधान्तिक पूर्वकल्पना” भी शामिल है। उन्हें हमेशा से ऐसा लगता था की आधुनिक युग के सामने वेदांत को एक नए रूप में रखने की जरुरत है। लेकिन राधाकृष्णन को हमेशा से ये दर था की कही उनके इस शोध प्रबंध को देख कर उनके दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर डॉ. अल्फ्रेड जॉर्ज कही उन्हें डाट ना दे।
लेकिन डटने की बजाये जब डॉ. अल्फ्रेड जॉर्ज ने उनका शोध प्रबंध देखा तो उन्होंने उसकी बहोत तारीफ़ की। और जब राधाकृष्णन केवल 20 साल के थे तभी उनका शोध प्रबंध प्रकाशित किया गया। राधाकृष्णन के अनुसार, हॉग और उनके अन्य शिक्षको की आलोचनाओ ने, “हमेशा उन्हें परेशान किया और उनके विश्वास को कम करते गये जिस से भारतीय प्राचीन परम्पराओ से उनका विश्वास कम हो रहा था”। राधाकृष्णन ने स्वयम यह बताया की कैसे वे एक विद्यार्थी की तरह रहे।
डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन विवाह और परिवार – Dr Sarvepalli Radhakrishnan Family
राधाकृष्णन का विवाह 16 साल की आयु में उनके दूर की रिश्तेदार सिवाकमु के साथ हुआ। राधाकृष्णन और सिवाकमु को 5 बेटी और एक बेटा, जिसका नाम सर्वपल्ली गोपाल था। सर्वपल्ली गोपाल एक महान इतिहासकार के रूप में भी जाने जाते है। सिवाकमु की मृत्यु 1956 में हुई। भूतकालीन भारतीय टेस्ट खिलाडी व्ही.व्ही.एस. लक्ष्मण उनके बड़े भतीजे है।

शिक्षक दिन – September 5 Teachers Day

जब वे भारत के राष्ट्रपति बने, तब उनके कुछ मित्रो और विद्यार्थियों ने उनसे कहा की वे उन्हें उनका जन्मदिन (5 सितम्बर) मनाने दे। तब राधाकृष्णन ने बड़ा ही प्यारा जवाब दिया, “5 सितम्बर को मेरा जन्मदिन मनाने की बजाये उस दिन अगर शिक्षको का जन्मदिन मनाया जाये, तो निच्छित ही यह मेरे लिए गर्व की बात होगी।”
और तभी से उनका जन्मदिन भारत में शिक्षक दिन – Teachers Day के रूप में मनाया जाता है।
1931 में उन्हें सावंत स्नातक के रूप में नियुक्त किया गया। और स्वतंत्रता के बाद से ही उन्होंने अपने नाम के आगे “सर” शब्द का उपयोग भी बंद कर दिया।
डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन पुरस्कार – Dr Sarvepalli Radhakrishnan Awards
  • 1938- ब्रिटिश अकादमी के सभासद के रूप में नियुक्ति।
  • 1954- नागरिकत्व का सबसे बड़ा सम्मान, “भारत रत्न”।
  • 1954- जर्मन के, “कला और विज्ञानं के विशेषग्य”।
  • 1961- जर्मन बुक ट्रेड का “शांति पुरस्कार”।
  • 1962- भारतीय शिक्षक दिन संस्था, हर साल 5 सितंबर को शिक्षक दिन के रूप में मनाती है।
  • 1963- ब्रिटिश आर्डर ऑफ़ मेरिट का सम्मान।
  • 1968- साहित्य अकादमी द्वारा उनका सभासद बनने का सम्मान (ये सम्मान पाने वाले वे पहले व्यक्ति थे)।
  • 1975- टेम्पलटन पुरस्कार। अपने जीवन में लोगो को सुशिक्षित बनाने, उनकी सोच बदलने और लोगो में एक-दुसरे के प्रति प्यार बढ़ाने और एकता बनाये रखने के लिए दिया गया। जो उन्होंने उनकी मृत्यु के कुछ महीने पहले ही, टेम्पलटन पुरस्कार की पूरी राशी ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय को दान स्वरुप दी।
  • 1989- ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय द्वारा रशाकृष्णन की याद में “डॉ. राधाकृष्णन शिष्यवृत्ति संस्था” की स्थापना।
डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन को अपने जीवन में शिक्षा और शिक्षको से बहोत लगाव था। उस समय जिस समय में वह विद्यार्थी थे, तब शिक्षको को कोई खास दर्जा नहीं जाता था। तब उन्होंने अपने जन्मदिन को शिक्षक दिन के रूप में मनाने का एक बड़ा निर्णय लिया था। वे भारत को एक शिक्षित राष्ट्र बनाना चाहते थे, इसीलिए उन्होंने अपना पूरा जीवन बच्चो को पढ़ाने और जीवन जीने का सही तरीका बताने में व्यतीत किया।
-- 
हिन्दू परिवार संघटन संस्था
 Cont No-9448487317