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Thursday, 11 January 2018

संघ पर ममता का अब तक का सबसे गम्भीर आरोप. आरोप में शामिल किया है मुहम्मद पैगम्बर का नाम

संघ पर ममता का अब तक का सबसे गम्भीर आरोप. आरोप में शामिल किया है मुहम्मद पैगम्बर का नाम

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मंगलवार को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और सहयोगी संगठनों पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि आरएसएस राज्य में बड़े पैमाने पर दंगा कराना चाहती है। ममता ने कहा कि इस उद्देश्य से संगठन से जुड़े लोग इस्लाम धर्म के पैगंबर हजरत मुहम्मद (सल्ल.) के अपमान से जुडी
अपमानजनक सामग्री को लोगों में बाँट रहे है। उत्तर बंगाल के अलीपुरद्वार में एक रैली में बोलते हुए, ममता बनर्जी ने आरोप लगाया, कि एक किताब मेरे संज्ञान में आई है।


जो कक्षा दो छात्रों के लिए एक निजी किताब है। जिसका वितरण आरएसएस कर रहा है। ममता ने कहा कि हमने इसे उलुबेरिया में एक स्कूल से प्राप्त किया है। पश्चिम बंगाल सरकार से प्रेरित "किताब के रूप में प्रकाशित इस पुस्तक में पैगंबर मोहम्मद के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी शामिल है और इसे स्कूल के बच्चों के बीच वितरित
किया जा रहा है ताकि एक हिन्दू-मुस्लिम के बीच दंगा हो। मुख्यमंत्री ने कहा कि हमने उनके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की है। कहा कि बस उनकी नीच योजना की कल्पना करो, वे स्वयं पुस्तकों की छपाई कर रहे हैं। और उन्हें बाजार में बांट रहे हैं। ऐसी किताबें उन बच्चों के स्कूल बैग में लगाई जा रही हैं जिन्हें इसे घर
पढ़ने के लिए कहा जा रहा है। अगर वे इसे स्कूलों में पढ़ते हैं तो वे पकड़े जाएंगे। हालांकि राज्य पुलिस ने इस घटना के बारें में कुछ भी जानकारी देने से इनकार कर दिया।

Wednesday, 10 January 2018

मकर संक्रांति के दिन भूलकर भी ना करें ये 10 काम!

मकर संक्रांति के दिन अपनी वाणी पर संयम रखें और गुस्सा ना करें. किसी को बुरे बोल ना बोले सबके साथ मधुरता का व्यवहार करें.
 सूर्य का किसी राशि विशेष पर भ्रमण करना संक्रांति कहलाता है. सूर्य जब मकर राशि में जाता है तब मकर संक्रांति होती है.  इस समय सूर्य उत्तरायण होता है अतः इस समय किये गए जप और दान का फल अनंत गुना होता है. इस बार मकर संक्रांति 14 जनवरी को मनाई जाएगी. सूर्य और शनि का सम्बन्ध इस पर्व से होने के कारण यह काफी महत्वपूर्ण है. कहते हैं इसी त्यौहार पर सूर्य अपने पुत्र शनि से मिलने के लिए आते हैं. आम तौर पर शुक्र का उदय भी लगभग इसी समय होता है इसलिए यहाँ से शुभ कार्यों की शुरुआत होती है. मकर संक्रांति में जहां कुछ कामों को करना शुभ माना गया है तो वहीं कुछ कार्यों को वर्जित किया गया है. आइए जानते हैं इस दिन भूलकर भी कौन से काम नहीं करने चाहिए...

 कुछ लोग सुबह उठते ही चाय और स्नैक्स खाना शुरू कर देते हैं लेकिन शुभ दिन ऐसा ना करें. इस दिन बिना स्नान किए भोजन का सेवन नहीं करना चाहिए. मान्यता है कि इस दिन गंगा या किसी नदी में जाकर स्नान करना चाहिए इसलिए गंगा या पवित्र नदी ना सही लेकिन कम से कम घर पर स्नान जरूर करना चाहिए.
 महिलाओं को मकर संक्रांति के दिन बाल नहीं धुलना चाहिए. पुण्यकाल में दांत भी नहीं मांजने चाहिए.

 इस दिन घर के अंदर या बाहर किसी पेड़ की कटाई-छंटाई भी नहीं करनी चाहिए. 
 मकर संक्रांति के दिन आप किसी भी तरह का नशा नहीं करें. शराब, सिगरेट, गुटका आदि जैसे सेवन से आपको बचना चाहिए. इस दिन मसालेदार भोजन का सेवन नही करना चाहिए. इस दिन तिल, मूंग दाल की खिचड़ी इत्यादि का सेवन करना चाहिए और इन सब चीजों का यथाशक्ति दान करना चाहिए.
 अगर सूर्य देव की कृपा पाना चाहते हैं तो संध्या काल में अन्न का सेवन न करें. 
 मकर संक्रांति के दिन गाय या भैंस का दूध नहीं दुहना चाहिए
 मकर संक्रांति के दिन अगर कोई भी आपके घर पर भिखारी, साधु या बुजुर्ग आए तो उसे खाली हाथ ना लौटा दें. जो अपनी सामर्थ्य के अनुसार कुछ ना कुछ दान अवश्य करें.

इस दिन भूलकर भी लहसुन, प्याज और मांस का सेवन नहीं करना चाहिए.


यह प्रकृति का त्योहार है और हरियाली का उत्सव. अत: इस दिन फसल काटने के काम को टाल देना चाहिए.


मकर संक्रांति के दिन अपनी वाणी पर संयम रखें और गुस्सा ना करें. किसी को बुरे बोल ना बोले सबके साथ मधुरता का व्यवहार करें.

Tuesday, 9 January 2018

तिलक लगाने में भूलकर भी ना करें इस अंगुली का प्रयोग


तिलक लगाने में भूलकर भी ना करें इस अंगुली का प्रयोग

तिलक का प्रयोग

पूजा में तिलक का प्रयोग खास महत्व रखता है। पूजा की पवित्रता के अलावा यह सिद्द्धिदायक तथा भगवान के आशीर्वाद का प्रतीक माना जाता है। यह व्यक्ति के आज्ञा चक्र को सक्रिय करता है जो उसमें एकाग्रता बढ़ाकर पूजा के लिए पूरी तरह तौयार भी करता है। माथे के अलावे शरीर पर 13 अन्य बिंदु भी हैं जहां तिलक लगाना स्वास्थ्य तथा समृद्द्धिदायक माना गया है।
तिलक का प्रयोग

तिलक का प्रयोग

मान्यताओं के अनुसार शिव भक्तों के लिए राख का तिलक तथा विष्णु भक्तों के लिए चंदन का तिलक लगाना शुभ माना गया है। इसके अलावा तिलक लगाने में प्रयोग की जाने वाली अंगुलियों का भी खास महत्व है।

तिलक लगाने में अंगुलियों का महत्त्व

शास्त्रों में रिंग फिंगर या कहें अनामिका अंगुली से तिलक लगाना हर प्रकार से शुभ फल देने वाला कहा गया है। इसके अलावा शायद आपको पता ना हो, लेकिन हाथ ही सभी अंगुलियों का तिलक लगाने में प्रयोग करने के अलग-अलग महत्व हैं। आगे हम आपको इसकी जानकारी दे रहे हैं।

मध्यमा अंगुली

यह शनि से जुड़ी हुई अंगुली मानी जाती है। इसलिए तिलक लगाने में इसका प्रयोग किया जाना व्यक्ति को सौभाग्यशाली बनाता है। शनि को स्वास्थ्य और समृद्धि से जुड़ा ग्रह भी माना गया है, इसलिए इस अंगुली से तिलक लगाना व्यक्ति को स्वस्थ बनाता है तथा आर्थिक रूप से संपन्न भी।

अनामिका अंगुली

इससे तिलक लगाना मानसिक शक्ति तथा शांति प्रदान करता है। यह सूर्य से जुड़ी अंगुली है और इससे तिलक लगाना व्यक्ति का आज्ञा चक्र जाग्रत कर उसका तेज बढ़ाता है जो उसे सम्मान और प्रसिद्धि देता है। आज्ञा चक्र को जाग्रत करने के कारण ही पूजा में तिलक लगाने के लिए विशेष रूप से इसी अंगुली का प्रयोग करते हैं। ऐसा माना जाता है कि इससे भक्त का जुड़ाव बनता है।

अंगूठा

शुक्र से जुड़ा होने के कारण इस अंगुली से तिलक लगाना व्यक्ति को सभी प्रकार की भौतिक सुविधाएं दिलाता है। यह व्यक्ति को अच्छा स्वास्थ्य भी देता है क्योंकि एक असवस्थ व्यक्ति किसी भी प्रकार की लग्जरी लाफ को एंजॉय नहीं कर सकता।

अंगूठा

मान्यता है कि अगर किसी बीमार व्यक्ति को नियमित रूप से अंगूठे का प्रयोग करते हुए चंदन का तिलक लगाया जाए तो कुछ ही दिनों में वह स्वस्थ हो जाता है।
तर्जनी अंगुली 

इस अंगुली से तिलक लगाना मोक्ष प्रदान करने वाला माना जाता है। सुनने में यह अध्यात्मिक और सकारात्मक लग सकता है लेकिन जीवन-मरण के नियमों से जुड़े रहते हुए तिलक लगाने में इस अंगुली के प्रयोग का महत्व जानना आपके लिए विशेष आवश्यक है।


मोक्ष हर हाल में व्यक्ति को जीवन-मोह से मुक्त करता है जो मृत्यु के पश्चात् ही संभव है और इसलिए मृत्यु का परिचायक है। यही कारण है कि इस अंगुली से तिलक लगाए जाने से मना किया जाता है।

तर्जनी अंगुली

यह आपको असमय मृत्यु की ओर धकेलता है। केवल मृतकों को ही आखिरी विदाई में तर्जनी अंगुली से तिलक लगाया जाता है जिसका प्रयोजन होता है कि उसकी आत्मा सभी संसारिक मोह से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त कर सके।

कौन रोक सकता है हमें आतंकियों के जनाजे में जाने से ? ये जहरीला बयान है

कौन रोक सकता है हमें आतंकियों के जनाजे में जाने से ? ये जहरीला बयान है शासन कर रही एक पार्टी के नेता का पीडीपी नेता रफी अहमद मीर
 जिन आतंकवादियो से आज पूरी दुनिया परेशान है उन्ही आतंकियों की मौत पर पीडीपी के एक नेता शोक प्रकट करने की बात कह रहे है। उन्हें देश के जवानों से ज्यादा चिंता उन आतंकियों की है जिन्होंने कश्मीर को जेह्हनुम बना दिया। नेता जी अपनी बातों में इतने खो गए की उन्हें देश के जवानों
और आतंकियों में कोई फर्क ही नजर नहीं आया। शायद वो भूल गए की देश के जवान उनकी जिंदगी बचाते है और आतंकी उनकी जान लेने के लिए मौका तलाशते है। 
शनिवार को जम्मू कश्मीर में सत्तारूढ़ पीडीपी के एक नेता ने यह कहकर आतंकियों का होशला बड़ा दिया कि कश्मीर में स्थानीय आतंकवादियों की हत्या पर शोक प्रकट करने पर 'कोई रोक नहीं' है। नेता ने खुलेआम उन आतंकियों के प्रति सहानुभूति दिखाकर आतंकियों की हिम्मत को चार गुना बड़ा दिया है। जहाँ एक ओर सेना कश्मीर के
युवाओं को आतंक के दलदल से बचा रही है वहीँ इस प्रकार की बयानबाजी युवाओं को आतंक की राह दिखा रही है
पीडीपी के प्रवक्ता रफी अहमद मीर ने एक कार्यक्रम में संवाददाताओं से कहा,कि ''चाहे सीआरपीएफ का जवान हो....या स्थानीय आतंकवादी, शोक प्रकट करने पर कोई रोक नहीं है। आगे कहा कि , यह सुरक्षा पर निर्भर करता है, कई बार हम शोक करने जा सकते हैं और कई बार नहीं.'' उन्होंने कहा कि
सरकार में आने से पहले भी पार्टी की सुरक्षाबलों द्वारा मारे गये स्थानीय आतंकवादियों के परिजनों से मिलने का नियम था। राज्य में भाजपा के साथ गठबंधन वाली पीडीपी की सरकार चल रही है। बता दें की पीडीपी पर अलगाववादियों के प्रति नरम रुख अपनाने का आरोप लगता रहा है।


Sunday, 7 January 2018

सरकार को संदेह है कि, गांव के मदरसों में रखे गए शिक्षकों की भर्ती में फर्जीवाडा किया गया है



मदरसे में जो शिक्षक भर रखे थे, उसमे से तमाम तो उसके पात्र थे ही नहीं. फिर किसे भर्ती किया था अखिलेश यादव ने ?

सरकार को संदेह है कि, गांव के मदरसों में रखे गए शिक्षकों की भर्ती में फर्जीवाडा किया गया है ! उनके शैक्षिक प्रमाण पत्रों में गडबड है। सरकार ने मदरसों में तैनात शिक्षकों की असलियत का पता लगाने की ठानी है ! जिसके चलते अल्पसंख्यक कल्याण विभाग ने आधुनिकीकरण योजना के तहत मदरसों में नियुक्त सभी शिक्षकों शैक्षिक प्रमाण पत्रों की जांच शुरू कर दी। इसी के साथ सरकार के कहने के बाद भी ऑनलाइन जानकारी नहीं देनेवाले कई सौ मदरसे इस बार अपनी परीक्षा नहीं करा सकेंगे।

दरअसल, अल्पसंख्यक कल्याण विभाग ने आधुनिकीकरण योजना के तहत मदरसों में शिक्षकों को नियुक्त किया था। उनको वेतन के दौर पर मोटी राशि भी सरकार देती है। सरकार के पास लगातार शिकायत जा रही है कि मदरसों में रखे गए शिक्षकों की भर्ती में प्रबंधकों, अधिकारीयों और दलालों का गठजोड बनकर बडा फर्जीवाडा हुआ हैं। काफी शिक्षक ऐसे हैं जिनको सही से ऊर्दू पढना भी नहीं आता और उनके फर्जी प्रमाण पत्र लगाकर भर्ती कर दिया गया। जिसके बाद पूरे सूबे में जांच शुरू हो गई हैं। आधुनिकीकरण योजना के तहत मदरसों में नियुक्त सभी शिक्षकों को उनके मूल शैक्षिक प्रमाण पत्रों के साथ बुलाया गया। शिक्षकों से उनके मूल शैक्षिक प्रमाण देख
और फोटो स्टेट प्रतियां ली गई। सत्यापित करने का काम किया गया। अब शिक्षकों के सभी प्रमाण पत्रों का मिलान शिक्षा विभाग से कराया जाएगा।
आधुनिकीकरण योजना के तहत मान्यता प्राप्त मदरसों की अभी तक की जांच में पश्चिमी उत्तरप्रदेश के कई जिलों में बडे प्रमाण पर गडबडी मिली है। मेरठ में ही १५ मदरसों में गडबडी मिली हैं ! इन मदरसा संचालकों को नोटिस जारी कर दिए हैं। एक महीने में स्थिति सुधारने को कहा है। उसके बाद होनेवाले निरीक्षण में फिर गडबडी मिलने पर मदरसा संचालकों पर कार्रवाई होगी और मदरसों की मान्यता खत्म कर दी जाएगी। उत्तर प्रदेश मदरसा शिक्षा बोर्ड की तरफ से फर्जीवाडा रोकने के लिए सरकार ने सभी मदरसों को ऑनलाइन अपना डेटा लोड करने को कहा था। अब वेबसाइट पोर्टल पर डाटा अपलोड नहीं करनेवाले मदरसों में इस बार परीक्षा कराने पर रोक लगाई जा रही हैं।

दरअसल, आलिया (कक्षा ८ से ऊपर के) स्तर के मदरसों में से सूबे में ८३६ में अपना डाटा सरकार की वेबसाइट पर अपलोड नहीं किया हैं। वेस्ट यूपी के हर जिले से सरकार के आदेश की नाफरमानी करनेवाले काफी मदरसे हैं। इसलिए सरकार भी इन पर अब सख्त कदम उठा रही हैं। डेटा लोड नहीं करनेवाले कुल २६८२ मदरसों की मान्यता पर तलवार लटक गई है !दरअसल, मदरसा बोर्ड के वेब पोर्टल पर इस बार २६८२ मदरसों ने अपना विवारण (डेटा) अपलोड नहीं किया। बोर्ड ने आलिया स्तर से ८३६ मदरसों को परीक्षा फार्म भरने की इजाजात नहीं दी हैं। आलिया स्तर के मदरसों में मुंशी मौलवी, आमिल, कामिल, फाजिल की परीक्षा होती है !

३७ बार विदेश यात्रा करने वाला संजय सिंह अपनी १ साल के कमाई मात्रा २२४ रुपए है आपने ऐसा कभी देखा गजब का ईमानदार नेता

१ साल में मात्र २२४ रुपए कमाई करने वाले संजय सिंह ने ३७ बार की विदेश यात्राएं 


आम आदमी पार्टी और उनके नीता कितने ईंमानदार है ये तो आप जानते ही हिअ , आप आदमी पार्टी ने आपने ३ लोगो का चयन कर दिया है, जो अगले ६ साल तक भारतीय संसद के अंदर रहेंगे  क्या करेंगे ये तो समाया बताएगा इन ३ लोगो में १ संजय सिंह भी है
संजय सिंह पूर्व नक्सली है और आअज भी नक्सलियोका समर्थक है इस पर कई तरह के आरोप
खुद आप आदमी पार्टी की हमिहा कार्यकर्ता ने लगाए थे , पंजाब की महिला वर्कर्स लगाया 
था संजय सिंह नेताओ को लड़किया और दारु को सप्लाइ करता था , इस पर  महिला कार्यकर्ता के शोषण का भी आरोप लगाया था वे भी आम आदमी की महिला नेताओ ने ही 
दिल्ली में एक आप महिला कार्यकर्त्ता ने संजय सिंह को जोरदार थपड़ भी मारा था जिसका विडिओ  आपने देखा होगा काफी वायरल हुवा था ,  संजय सिंह किस प्रकार का शख्स है तो आप समझते ही होंगे , अब संजय सिंह  भारत का संसद बन रहे है और इस शख्स ने आपने 
कागज भी जमा करवाए है 

संजय सिंह के अपनी और अपनी पत्नी की कुल कमाई ५००९८ रूपए की बताई है 
न घर न गाड़ी का जेवर न कुछ पत्नी की कमाई ४९८७४ और खुद की कमाई बताई है
१ साल में मात्रा २२४ यानि रोज संजय सिंह १ रुपये से भी कम कमाते है , साल में ३६५ दिन होते है और इस शख्स ने मात्रा २२४ की कमाई की है , 

यानि रोज १ रुपए से भी कम, अब वैसे संजय सिंह ने २२४ रुपये क्या करके कमाए है ये वे ही जाने  

अब इसी संजय सिंह  के बारे में हम आपको ये भी बता दे की पिछले डेढ़  साल में शख्स ने अमरीका रूस खाड़ी देशो को मिलकर कुल ३७ बार विदेश यात्रा की है  और विदेश यात्राओं में इसने क्या किया वे तो गुप्त है , किस से मिले , कौन से कयर्कम  में गया ये सब गुप्त है 
३७ बार विदेश यात्रा करने वाला संजय सिंह अपनी १ साल के कमाई मात्रा २२४ रुपए 

है  आपने ऐसा कभी देखा गजब का ईमानदार नेता 

Saturday, 6 January 2018

शास्त्रों के अनुसार ये हैं एक गुणी पत्नी के लक्षण

पति-पत्नी का रिश्ता
हिन्दू धर्म में पत्नी को पति की वामांगी कहा गया है, यानी कि पति के शरीर का बांया हिस्सा। इसके अलावा पत्नी को पति की अर्द्धांगिनी भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है पत्नी, पति के शरीर का आधा अंग होती है। दोनों शब्दों का सार एक ही है, जिसके अनुसार पत्नी के बिना एक पति अधूरा है।
धार्मिक पहलू
पत्नी ही उसके जीवन को पूरा करती है, उसे खुशहाली प्रदान करती है, उसके परिवार का ख्याल रखती है और उसे वह सभी सुख प्रदान करती है जिसके वह योग्य है। पति-पत्नी का रिश्ता दुनिया भर में बेहद महत्वपूर्ण बताया गया है। चाहे सोसाइटी कैसी भी हो, लोग कितने ही मॉर्डर्न क्यों ना हो जाएं, लेकिन पति-पत्नी के रिश्ते का रूप वही रहता है, प्यार और आपसी समझ से बना हुआ।
क्या कहा था भीष्म पितामह ने?
हिन्दू धर्म के प्रसिद्ध ग्रंथ महाभारत में भी पति-पत्नी के महत्वपूर्ण रिश्ते के बारे में काफी कुछ कहा गया है। भीष्म पितामह ने कहा था कि पत्नी को सदैव प्रसन्न रखना चाहिए क्योंकि उसी से वंश की वृद्धि होती है। वह घर की लक्ष्मी है और यदि लक्ष्मी प्रसन्न होगी तभी घर में खुशियां आएगी।
विष्णु पुराण में पत्नी के गुण
इसके अलावा भी अनेक धार्मिक ग्रंथों में पत्नी के गुण व अवगुणों के बारे में विस्तारपूर्वक बताया गया है। आज हम आपको विष्णु पुराण, जिसे लोक प्रचलित भाषा में गरुण पुराण भी कहा गया है, उसमें उल्लिखित पत्नी के कुछ गुणों की व्याख्या करेंगे।
गुणी पत्नी के लक्ष्ण
गरुण पुराण में पत्नी के जिन गुणों के बारे में बताया गया है, उसके अनुसार जिस व्यक्ति की पत्नी में ये गुण हों, उसे स्वयं को देवराज इंद्र यानी भाग्यशाली समझना चाहिए। कहते हैं पत्नी के सुख के मामले में देवराज इंद्र अति भाग्यशाली थे, इसलिए गरुण पुराण के तथ्य यही कहते हैं।
कौन से गुण
आगे की स्लाइड्स में जानिए वे कौन से गुण हैं जो यदि किसी की पत्नी में हो तो उससे अधिक इस दुनिया में कोई दूसरा भाग्यशाली नहीं होगा.....
जानिए अर्थ
गरुण पुराण में पत्नी के गुणों को समझाती एक पंक्ति मिलती है, जो इस प्रकार है – “सा भार्या या गृहे दक्षा सा भार्या या प्रियंवदा। सा भार्या या पतिप्राणा सा भार्या या पतिव्रता।।“ अर्थात, जो पत्नी गृहकार्य में दक्ष है, जो प्रियवादिनी है, जिसके पति ही प्राण हैं और जो पतिपरायणा है, वास्तव में वही पत्नी है।
गृह कार्य में दक्ष
गृह कार्य में दक्ष से तात्पर्य है वह पत्नी जो घर के काम काज संभालने वाली हो। घर के सदस्यों का आदर-सम्मान करती हो, बड़े से लेकर छोटों का भी ख्याल रखती हो। जो पत्नी घर के सभी कार्य जैसे- भोजन बनाना, साफ-सफाई करना, घर को सजाना, कपड़े-बर्तन आदि साफ करना, यह कार्य करती हो वह एक गुणी पत्नी कहलाती है।
गुणी पत्नी कहलाती है
इसके अलावा बच्चों की जिम्मेदारी ठीक से निभाना, घर आए अतिथियों का मान-सम्मान करना, कम संसाधनों में भी गृहस्थी को अच्छे से चलाने वाली पत्नी गरुण पुराण के अनुसार गुणी कहलाती है। ऐसी पत्नी हमेशा ही अपने पति की प्रिय होती है।
प्रियवादिनी
प्रियवादिनी से तात्पर्य है मीठा बोलने वाली पत्नी.......... आज के जमाने में जहां स्वतंत्र स्वभाव और तेज-तरार बोलने वाली पत्नियां भी है। जो नहीं जानती कि किस समय किस से कैसे बात करनी चाहिए.........
संयमित भाषा में बात करने वाली
इसलिए गरुण पुराण में दिए गए निर्देशों के अनुसार अपने पति से सदैव संयमित भाषा में बात करने वाली, धीरे-धीरे व प्रेमपूर्वक बोलने वाली पत्नी ही गुणी पत्नी होती है। पत्नी द्वारा इस प्रकार से बात करने पर पति भी उसकी बात को ध्यान से सुनता है व उसके इच्छाएं पूरी करने की कोशिश करता है।
सभी से प्यार से बात करने वाली
परंतु केवल पति ही नहीं, घर के अन्य सभी सदस्यों या फिर परिवार से जुड़े सभी लोगों से भी संयम से बात करने वाली स्त्री एक गुणी पत्नी कहलाती है। ऐसी स्त्री जिस घर में हो वहां कलह और दुर्भाग्य नहीं आता.....
पतिपरायणा
पतिपरायणा यानी पति की हर बात मानने वाली पत्नी भी गरुण पुराण के अनुसार एक गुणी पत्नी होती है। जो पत्नी अपने पति को ही सब कुछ मानती हो, उसे देवता के समान मानती हो तथा कभी भी अपने पति के बारे में बुरा ना सोचती हो वह पत्नी गुणी है।
धर्म का पालन करने वाली
विवाह के बाद एक स्त्री ना केवल एक पुरुष की पत्नी बनकर नए घर में प्रवेश करती है, वरन् वह उस नए घर की बहु भी कहलाती है। उस घर के लोगों और संस्कारों से उसका एक गहरा रिश्ता बन जाता है।
यह है उसका पहला धर्म
इसलिए शादी के बाद नए लोगों से जुड़े रीति-रिवाज और धर्म को स्वीकारना ही स्त्री की जिम्मेदारी है। इसके अलावा एक पत्नी को एक विशेष प्रकार के धर्म का भी पालन करना चाहिए। विवाह के पश्चात उसका सबसे पहला धर्म होता है कि वह अपने पति व परिवार के हित में सोचे व ऐसा कोई काम न करे जिससे पति या परिवार का अहित हो।
पति की प्रिय होती है ऐसी पत्नी
गरुण पुराण के अनुसार जो पत्नी प्रतिदिन स्नान कर पति के लिए सजती-संवरती है, कम खाती है, कम बोलती है तथा सभी मंगल चिह्नों से युक्त है। जो निरंतर अपने धर्म का पालन करती है तथा अपने पति का प्रिय करती है, उसे ही सच्चे अर्थों में पत्नी मानना चाहिए। जिसकी पत्नी में यह सभी गुण हों, उसे स्वयं को देवराज इंद्र ही समझना चाहिए।

स्वास्थ्य के लिए भी बेहद लाभप्रद है “ॐ” का उच्चारण

स्वास्थ्य के लिए भी बेहद लाभप्रद है “ॐ” का उच्चारण



“ॐ” इस एक शब्द में पूरे ब्रह्माण्ड का सार समाहित है। तीन अक्षर अ, उ और म के युग्म से मिलकर बना यह एक शब्द मनुष्य जीवन के सभी कष्टों को दूर कर सकता है।

मंत्रों का सार

कभी आपने सोचा है कि ॐ, एक छोटा सा शब्द जो सभी मंत्रों का सार है, सृष्टि का निर्माता है उसके ये तीन अक्षर (अ, उ और म) कहना क्या चाहते हैं।

ब्रह्मलीन

ॐ शब्द में "अ" का अर्थ है उत्पन्न होना, "उ" से तात्पर्य है उठना या उड़ना अर्थात विकास करना और “म” से आप मौन समझ सकते हैं, जिसका अर्थ है ब्रह्मलीन हो जाना।

उच्चारण

जब आप इन तीन शब्दों का नियमित उच्चारण करते हैं तो आपको अपने भीतर सकारात्मकता और नयापन महसूस होने लगता है।

ॐ के उच्चारण

ॐ का उच्चारण आपको मानसिक के साथ-साथ शारीरिक तौर पर भी स्वस्थ रखता है। विश्वास नहीं होता? चलिए जानते हैं ॐ के उच्चारण के शारीरिक फायदे।

तनाव

आजकल के समय में लोगों की लाइफस्टाइल बहुत जटिल हो गयी है, जिसकी वजह से तनाव और नींद ना आने जैसी समस्या बड़ी कॉमन हो चुकी है।

मानसिक थकान

लेकिन ॐ का सही उच्चारण आपको मानसिक तनाव से मुक्त तो करता ही है, साथ ही साथ आपके अंदर की घबराहट को भी दूर करता है। ॐ का बार-बार जाप करना आपकी मानसिक थकान को भी दूर करता है।

रक्तचाप

ॐ का उच्चारण हृदय और ख़ून के प्रवाह को भी संतुलित रखता है और साथ ही रक्त संचार को भी सही करता है। ॐ का नियमित उच्चारण करने से ना तो आपको उच्च रक्तचाप और ना ही निम्न रक्तचाप की समस्या का सामना करना पड़ता है।

पाचन क्रिया

ॐ का उच्चारण पाचन क्रिया को भी दुरुस्त रखता है और शरीर पर सकारात्मक प्रभाव डालता है।

थायरॉइड ग्रंथि

अगर आपको थायरॉइड ग्रंथि की समस्या है तो इस समस्या का समाधान भी ॐ के उच्चारण की सहायता से किया जा सकता है।

अजीब सी कंपन

ॐ का उच्चारण गले और स्वर में एक अजीब सी कंपन पैदा करता है जिसका सीधा और सकारात्मक असर थायरॉइड ग्रंथि‍ पर पड़ता है।

प्राणायाम

विशेष प्राणायाम के साथ ॐ का उच्चारण करने से फेफड़े मजबूत होते हैं और उच्चारण के दौरान होने वाली कंपन से रीढ़ की हड्डी भी मजबूत होती है।

रामबाण

किसी भी प्रकार की थकान हो, ॐ का उच्चारण रामबाण की तरह काम करता है। अपनी आंखों को हल्का बंद कर एकाग्र होकर ॐ का उच्चारण करने से थकान से राहत मिलती है।

ताजगी और स्फूर्ति

इसके अलावा ॐ का नियमित उच्चारण करना आपको आलस भरी जिन्दगी से भी निजात दिलाता है। यह आपके शरीर को ताजगी और स्फूर्ति प्रदान करता है।

Thursday, 4 January 2018

गोत्र क्या होता है, क्यों है इसका महत्व

सनातन धर्म में गोत्र का बहुत महत्व है। 'गोत्र' का शाब्दिक अर्थ तो बहुत व्यापक है।

सनातन धर्म में गोत्र का बहुत महत्व है। 'गोत्र' का शाब्दिक अर्थ तो बहुत व्यापक है। विद्वानों ने समय-समय पर इसकी यथोचित व्याख्या भी की है। 'गो' अर्थात् इन्द्रियां, वहीं 'त्र' से आशय है 'रक्षा करना', अत: गोत्र का एक अर्थ 'इन्द्रिय आघात से रक्षा करने वाले' भी होता है जिसका स्पष्ट संकेत 'ऋषि' की ओर है।

ब्राह्मण का संबंध एक ऋषिकुल से होता है। प्राचीनकाल में चार ऋषियों के नाम से गोत्र परंपरा प्रारंभ हुई। ये ऋषि हैं-अंगिरा,कश्यप,वशिष्ठ और भगु हैं। कुछ समय उपरान्त जमदग्नि, अत्रि, विश्वामित्र और अगस्त्य भी इसमें जुड़ गए। व्यावहारिक रूप में 'गोत्र' से आशय पहचान से है। जो ब्राह्मणों के लिए उनके ऋषिकुल से होती है।

कालान्तर में जब वर्ण व्यवस्था ने जाति-व्यवस्था का रूप ले लिया तब यह पहचान स्थान व कर्म के साथ भी संबंधित हो गई। यही कारण है कि ब्राह्मणों के अतिरिक्त अन्य वर्गों के गोत्र अधिकांश उनके उद्गम स्थान या कर्मक्षेत्र से संबंधित होते हैं। 'गोत्र' के पीछे मुख्य भाव एकत्रीकरण का है किन्तु वर्तमान समय में आपसी प्रेम व सौहार्द की कमी के कारण गोत्र का महत्त्व भी धीरे-धीरे कम होकर केवल कर्मकाण्डी औपचारिकता तक ही सीमित रह गया है।
जब गोत्र पता न हो तो ...

ब्राह्मणों में जब किसी को अपने 'गोत्र' का ज्ञान नहीं होता तब वह 'कश्यप' गोत्र का उच्चारण करता है। ऐसा इसलिए होता क्योंकि कश्यप ऋषि के एक से अधिक विवाह हुए थे और उनके अनेक पुत्र थे। अनेक पुत्र होने के कारण ही ऐसे ब्राह्मणों को जिन्हें अपने 'गोत्र' का पता नहीं है 'कश्यप' ऋषि के ऋषिकुल से संबंधित मान लिया जाता है।

रावण के अंत के बाद जब सीता से मिलने आई थी शूर्पनखा....




रावण का अहंकार,
यूं तो रावण का अहंकार, उसका लालच ही उसके अंत के लिए जिम्मेदार है लेकिन अगर उसकी बहन शूर्पनखा को भी असुर सम्राट के विनाश का कारण कहा जाए तो शायद ही कोई इस बात को नकार पाएगा। शूर्पनखा ही राम-रावण युद्ध का मुख्य कारण थी।

राम-रावण युद्ध
यूं तो राम-रावण युद्ध से संबंधित घटनाओं से जुड़ी बहुत सी कहानियां हम कई बार सुन चुके हैं और जाहिर तौर पर आगे भी सुनते रहेंगे लेकिन एक कहानी ऐसी है जिसे शायद ही कोई जानता होगा। यह कहानी है सीता और शूर्पनखा की उस खास मुलाकात की।


सीता का त्याग
जब भगवान श्रीराम ने लोक-लाज के कारण अपनी पत्नी सीता का त्याग कर दिया था तब वह एक जंगल में वास करनेचली गई थीं। इसी जंगल में शूर्पनखा, सीता से मिलने आई थी। क्या हुआ था इस मुलाकात के दौरान आइए जानें।

अशोक वाटिका
जो सीता अशोक वाटिका में कैद थी और जो सीता पति के त्याग के बाद जंगल में समय बिता रही थी, उन दोनों में बहुत अंतर था। एक अपने पति पर विश्वास कर उसका इंतजार कर रही थी वहीं ये सीता अपने पति द्वारा त्यागी गई है और एक आश्रम में रहने के लिए मजबूर है।

शूर्पनखा
शूर्पनखा, सीता की इस स्थिति को देखकर बहुत प्रसन्न थी। उसने सीता को ताने मारने शुरू कर दिए, कैसे एक बार राम ने उसे अस्वीकार किया था और कैसे अब श्रीराम ने सीता को त्याग दिया है।


भगवान राम
शूर्पनखा ने सीता को यह भी दिलाना शुरू किया कि कैसे उनके पति भगवान राम ने उसका असम्मान किया था। शूर्पनखा ने सीता से कहा कि आज उनकी यह स्थिति देखकर वह बहुत खुश और संतुष्ट है।

माता सीता
सीता अत्याधिक धैर्य से शूर्पनखा की हर बात सुनते हुए धीमे-धीमे मुस्कुरा रही थीं। उन्होंने शूर्पनखा से कहा कि उसकी बातें कुछ वैसी ही मीठी हैं जैसे मंदोदरी के बगीचे में बेर थे। सीता के चेहरे पर मुस्कुराहट देखकर शूर्पनखा आग बबूला हो गई। उसने सोचा था सीता रोगी, दर्द महसूस करेगी, लेकिन जो हो रहा था वो कल्पना से परे था।

सीता की नियती
लेकिन सीत ने अपनी नियती को स्वीकार कर लिया था, अब उन्हें किसी प्रकार का दर्द महसूस नहीं होता था। सीता ने शूर्पनखा से बोला “मैं यह कैसे सोच सकती है या ऐसी उम्मीद कैसे लगा सकती हूं कि मैं जिनसे और जितना प्रेम करती हूं, वो भी मुझसे उतना ही प्रेम करें”।

सीता की नियती
सीता ने कहा “हमें अपने भीतर उस शक्ति को जागृत करना चाहिए जो हमें उन लोगों से प्रेम करना सिखाए जो हमसे प्रेम नहीं करते, दूसरों को भोजन देकर अपनी भूख मिटाना ही वास्तविक मनुष्यता है”।

शूर्पनखा
सीता की ये बातें सुनकर शूर्पनखा जोर-जोर से रोने लगी, उसे प्रतिशोध चाहिए था, उन लोगों से जिसने उसका असम्मान किया। उसने सीता से कहा कि मुझे न्याय कैसे मिलेगा? जिन्होंने मेरे सम्मान के साथ खिलवाड़ किया, उन्हें दंड कब मिलेगा।

सम्मान के साथ खिलवाड़
इस सवाल के जवाब में सीता ने कहा जिसने तुम्हारा असम्मान किया था, उन्हें दंड मिल चुका है, जिस दिन दशरथ पुत्रों ने तुम्हारे सम्मान के साथ खिलवाड़ किया था, तब से लेकर अब तक वे चैन की नींद नहीं सो पाए हैं।
प्रतिशोध की भावना
सीता ने शूर्पनखा से कहा कि वो अतीत को भूलकर आए बढ़े, उसे अपने मस्तिष्क को खोलने की आवश्यकता है। अगर वह अपने अतीत से बाहर नहीं आई, प्रतिशोध की भावना को अंदर लिए बैठी रही तो वह भी अपने भाई रावण की तरह बन जाएगी।

प्रकृति
अंत में सीता ने कहा राम और रावण तो आते-जाते रहेंगे, लेकिन प्रकृति स्थिर है। मुझे अब प्रकृति का आनंद लेना चाहिए।

रत्न धारण करने से पहले बरतें कुछ सावधानियां



1
जातक की जन्म कुंडली
किसी भी जातक की जन्म कुंडली उसके जीवन का आईना होती है। वह कैसा जीवन व्यतीत करेगा, उसके जीवन में कब और कौन-कौन से दुख या सुख आएंगे, यह सब उसकी कुंडली को देखकर जाना जा सकता है।

2
ग्रहों की स्थिति
कुंडली के भावों और ग्रहों की स्थिति यह स्पष्ट बताती है कि व्यक्ति के जीवन में कितनी परेशानियां या कितनी समस्याएं आ सकती हैं। अगर ग्रह उत्तम स्थिति में है तो ऐसा व्यक्ति वाकई सौभाग्यशाली होता है लेकिन अगर ग्रहों की बैठकी की वजह से जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने लगे तो हालात बहुत हद तक नियंत्रण से बाहर हो जाते हैं।

3
विभिन्न शाखाएं
जहां कुंडली को देखकर आने वाली समस्याओं के बारे में जाना जा सकता है वहीं यह कुंडली स्वयं उन परेशानियों से बचने का माध्यम भी है। ज्योतिष विज्ञान के अंतर्गत विभिन्न 
4
ग्रहों का दुष्प्रभाव
आप मंत्रों या तंत्रों का सहारा लेकर ग्रहों के दुष्प्रभाव को कम कर सकते हैं, लेकिन माना जाता है उपयुक्त रत्न धारण करने से प्रतिकूल प्रभाव डाल रहे ग्रहों के प्रभाव को करीब 50 प्रतिशत तक कम किया जा सकता है।

5
रत्न ज्योतिष
रत्नों के द्वारा ग्रहीय बाधा को हल करने का तरीका जिसे सामान्य भाषा में रत्न ज्योतिष कहा जाता है, अपने आप में बेहद कारगर और प्रमाणित विद्या है।

6
रत्न
विशेषज्ञों का कहना है कि रत्न धारण कर आप अपनी कुंडली के अशुभ ग्रहों के प्रभाव को कम कर सकते हैं बशर्ते वह रत्न आपने पूरे विधि-विधान और समझबूझ कर पहना हो।

7
विधि युक्त क्रिया
सबसे पहले तो हम आपको ये बता दें कि रत्नों को धारण करने की एक विधि युक्त क्रिया होती है। दिन, दिशा, मुहुर्त आदि सबकी भूमिका इसमें शामिल है। इसके अलावा रत्न धारण करने से पहले उस रत्न को मंत्रों द्वारा सक्रिय भी किया जाता है।
8
ज्योतिष विद्या
बाजार में विभिन्न प्रकार के रत्न उपलब्ध है, जिनमें से असली और नकली की परख केवल विशेषज्ञों द्वारा ही संभव है। कोई सामान्य व्यक्ति भ्रमित होकर गलत रत्न धारण कर लेता है और फिर जब परिणाम सही ना मिलें तो रत्न या फिर ज्योतिष विद्या पर ही संदेह करने लगता है।


9
सावधानियां
रत्न खरीदते समय बहुत सी सावधानियां बरतनी चाहिए। आइए जानते हैं किस-किस तरह आपको सचेत रहने की जरूरत है।

10
विशेषज्ञ की सलाह
अगर आपको रत्नों की समझ नहीं है तो बेहतर है आप किसी विशेषज्ञ की सलाह लें या फिर अपने किसी परिचित की दुकान से ही रत्न खरीदें।
11
प्रमाणित और विश्वस्नीय
जिस दुकान या व्यक्ति से आप रत्न खरीद रहे हैं, इस बात का ध्यान अवश्य रखें कि वह प्रमाणित और विश्वस्नीय विक्रेता हो।

12
कीमत का आंकलन
जब आप बाजार में रत्न की कीमत का आंकलन कर लेंगे तब आपको यह अनुमान भी हो जाएगा कि रत्न असली है या नकली।

13
पुखराज या नीलम
अमूमन सस्ते रत्नों की नकल बाजार में कम मिलती है लेकिन महंगे रत्न जैसे कि पुखराज या नीलम की नकल बहुतायत में उपलब्ध है। ऐसे में आपको बिना किसी जानकार की सहायता के रत्न खरीदने में मुश्किल आ सकती है।

14
टूटा हुआ या दाग-धब्बे
टूटा हुआ या दाग-धब्बे से लैस रत्न कभी धारण नहीं करना चाहिए। इसका या तो न्यूनतम या फिर प्रतिकूल प्रभाव आपके जीवन पर पड़ता है। कभी कभार आप किसी भी तरह के परिणाम का इंतजार करते हुए ही रह जाते है।
15
ग्रह
अगर आप कुंडली में मौजूद ग्रहों को रत्नों की सहायता से बढ़ाना या घटाना चाहते हैं तो आपको उपरोक्त बिन्दुओं पर अवश्य ध्यान देना होगा अन्यथा परिणाम मनोनुकूल नहीं होंगे।

Wednesday, 3 January 2018

ॐ को क्यों माना जाता है महामंत्र, इसे बोलने के फायदे

ॐ को क्यों माना जाता है महामंत्र, इसे बोलने के फायदे
Benefits of om chanting in Hindi : सनातन धर्म और ईश्वर में आस्था रखने वाला हर व्यक्ति देव उपासना के दौरान शास्त्रों, ग्रंथों में या भजन और कीर्तन के दौरान ऊं महामंत्र को कई बार पढ़ता, सुनता या बोलता है। धर्मशास्त्रों में यही ऊं प्रणव नाम से भी पुकारा गया है। असल में इस पवित्र अक्षर व नाम से गहरे अर्थ व दिव्य शक्तियां जुड़ीं हैं, जो अलग-अलग पुराणों और शास्त्रों में कई तरह से बताई गई हैं। खासतौर पर शिवपुराण में ऊं के प्रणव नाम से जुड़ी शक्तियों, स्वरूप व प्रभाव के गहरे रहस्य बताए हैं।
   शिव पुराण के अनुसार – प्र यानी प्रपंच, न यानी नहीं और व: यानी तुम लोगों के लिए। सार यही है कि प्रणव मंत्र सांसारिक जीवन में प्रपंच यानी कलह और दु:ख दूर कर जीवन के सबसे अहम लक्ष्य यानी मोक्ष तक पहुंचा देता है। यही वजह है कि ऊं को प्रणव नाम से जाना जाता है।
– दूसरे अर्थों में प्रनव को ‘प्र’ यानी प्रकृति से बने संसार रूपी सागर को पार कराने वाली नव यानी नाव बताया गया है।
   इसी तरह ऋषि-मुनियों की दृष्टि से’प्र – प्रकर्षेण,’न – नयेत् और व: युष्मान् मोक्षम् इति वा प्रणव: बताया गया है। इसका सरल शब्दों में मतलब है हर भक्त को शक्ति देकर जनम-मरण के बंधन से मुक्त करने वाला होने से यह प्रणव है।

– धार्मिक दृष्टि से परब्रह्म या महेश्वर स्वरूप भी नव या नया और पवित्र माना जाता  है। प्रणव मंत्र से उपासक नया ज्ञान और शिव स्वरूप पा लेता है। इसलिए भी यह प्रणव कहा गया है।                                                                                    आध्यात्मिक दर्शन है कि प्रणय यानी ऊं बोलने या ध्यान से शरीर, मन और विचारों पर शुभ प्रभाव होता है। वैज्ञानिक नजरिए से भी प्रणव मंत्र यानी ऊं बोलते वक्त पैदा हुई शब्द शक्ति और ऊर्जा के साथ शरीर के अंगों जैसे मुंह, नाक, गले और फेफड़ो से आने-जाने वाली शुद्ध वायु मानव शरीर के स्वास्थ्य के लिए जरूरी है। अनेक हार्मोन और खून के दबाव को नियंत्रित करती है। इसके असर से मन-मस्तिष्क शांत रहने के साथ ही खून के भी स्वच्छ होने से दिल भी सेहतमंद रहता है। जिससे मानसिक एकाग्रता व कार्य क्षमता बढ़ती है। व्यक्ति मानसिक और दिल की बीमारियों से मुक्त रहता है।
सुखासन में बैठकर चालीस मिनट प्रतिदिन ऊं का जप किया जाए तो सात दिन में ही अपनी प्रकृति में बदलाव आता महसूस होने लगता है। छह सप्ताह में तो पचास प्रतिशत तक बदलाव आ जाता है। ये लोग उन दो प्रतिशत लोगों में शुमार हो जाते हैं , जो संकल्प कर लें तो अपने से पचास गुना ज्यादा लोगों की सोच और व्यवहार में बदलाव ला सकते हैं।
– एक अध्ययन के नतीजे बताते हैं कि व्यक्ति के इस स्तर तक पहुंचने में मंत्र जप और स्थिरता पूर्वक बैठने के दोनों ही कारण बराबर उपयोगी हैं। दोनों में से एक भी गड़बड़ हुआ तो कठिनाई हो सकती है। हमारे यहां तो पालथी लगाकर सब लोग बहुत आसानी से बैठ जाते हैं, जबकि बाहर के देशों में भी ध्यान की कक्षा में प्रवेश करने वाले व्यक्ति दीक्षा लेने के बाद जप और ध्यान सीखते समय ही बैठने की इस तकनीक का अभ्यास शुरू कर देते हैं।
सुखासन में बैठकर मंत्र जप करने से या विधिवत अजपा करने से (मन में लगातार जप)। उसके कामयाब होने के लक्षण दिखार्ई देने लगते हैं। वे लक्षण यह है कि मंत्र जिस देवता की आराधना में है, उसकी विशेषताएं साधक में दिखाई देने लगती हैं।
– दार्शनिक पाल ब्रंटन ने अपनी पुस्तक इन द सर्च ऑफ सीक्रेट इंडिया में उन साधु संतों के बारे में और उनकी साधना विधियों के बारे में लिखा है। पाल ब्रंटन ने लिखा है कि सिद्धों और चमत्कारी साधुओं की शक्ति सामथ्र्य का रहस्य बहुत कुछ उनके स्थिरता पूर्वक बैठने में था।

रामनाथी, गोवा के सनातन आश्रम में राष्ट्र स्तरीय ‘तृतीय अधिवक्ता अधिवेशन’ संपन्न

गंगा नदी की रक्षा हेतु सभी को संघटित होना आवश्यक – ज्येष्ठ अधिवक्ता श्री. अरुणकुमार गुप्ता, अलाहाबाद उच्च न्यायालय


रामनाथी, गोवा के सनातन आश्रम में राष्ट्र स्तरीय ‘तृतीय अधिवक्ता अधिवेशन’ संपन्न


रामनाथी (गोवा) : रामनाथी, गोवा के सनातन आश्रम में २६ से २८ दिसम्बर की कालावधी में ‘तृतीय अधिवक्ता अधिवेशन’ आयोजित किया गया था। इस अधिवेशन में अलाहाबाद उच्च न्यायालय के ज्येष्ठ अधिवक्ता श्री. अरुणकुमार गुप्ता ने संबोधित किया। अपने संबोधन में उन्होंने ऐसा प्रतिपादित किया कि, ‘गंगा नदी का पानी विश्व में सर्वोत्कृष्ट है तथा अद्भुत भी है ! गंगा नदी को हिन्दू संस्कृति में विशेष स्थान है। केवल इतना ही नहीं, तो उसका वैज्ञानिक दृष्टि से भी अतिशय महत्त्व है। अतः गंगा नदी के संदर्भ में अधिक संशोधन करने की आवश्यकता है। ऐसा होते हुए भी भारत में कहीं भी ‘रिव्हर सायन्स इंजिनीयरिंग’ का विद्यालय नहीं है अथवा कहीं भी उस संदर्भ का शिक्षण प्राप्त नहीं होता। ऐसी परिस्थिति में गंगा नदी की रक्षा हेतु सभी को संघटित होने की आवश्यकता है !’
इस अधिवेशन के लिए हिन्दू विधीज्ञ परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री. वीरेंद्र इचलकरंजीकर, हिन्दू विधीज्ञ परिषद के राष्ट्रीय सचिव श्री. संजीव पुनाळेकर, बेंगलुरु उच्च न्यायालय के ज्येष्ठ अधिवक्ता श्री. अमृतेश एन.पी., हिन्दू जनजागृति समिति के केंद्रीय समन्वयक श्री. नागेश गाडे, हिन्दू विधीज्ञ परिषद के संस्थापक-सदस्य श्री. सुरेश कुलकर्णी, केंद्र सरकार के भूतपूर्व सांस्कृतिक सलाहगार प्रा. रामेश्वर मिश्र, धर्मपाल शोधपिठ की भूतपूर्व संचालिका प्रा. कुसुमलता केडिया, सनातन संस्था के राष्ट्रीय प्रवक्ता श्री. चेतन राजहंस आदि उपस्थित थे।
अधिवक्ता श्री. गुप्ता ने आगे ऐसा कहा कि, ‘‘जब गंगा नदी की सुरक्षा का कार्य प्रारंभ किया, उस समय नदी के संबंध में वैज्ञानिक जानकारी प्राप्त होने के लिए मैने सभी को आवाहन किया। तदनुसार मुझे बताया गया कि, ‘गंगा नदी के पानी के संदर्भ में बनारस विश्व हिन्दू विद्यापीठ में अधिक जानकारी प्राप्त होगी !’ तत्पश्चात मैंने गंगा नदी के पानी का अभ्यास किया। इस अभ्यास के पश्चात मुझे अत्यंत वैशिष्ट्यपूर्ण ऐसी जानकारी प्राप्त हुई ! गंगा नदी विश्व की सर्वाधिक ऊंचाई से नीचे आती है। अतः उसमें ‘गतिजन्य (कायनेटिक) ऊर्जा’ सर्वाधिक रहती है। गंगा नदी के पानी में अन्य नदियों के पानी की अपेक्षा सर्वाधिक ऑक्सिजन (प्राणवायु) रहता है। इस पानी से स्नान करने के पश्चात व्यक्ति को अधिक सुखद अनुभव प्राप्त होता है। गंगा नदी का पानी हमारे शरीर में होनेवाली हानिकारक बॅक्टेरिया नष्ट करता है। गंगा नदी सर्वाधिक मोड लेते लेते बहती है। अतः उसका सर्वाधिक संपर्क वनस्पति, सूक्ष्म जंतु, विविध प्रकार की भूमि तथा ऑक्सिजन के साथ आता है। अतः गंगा नदी के पानी को संयुक्त राष्ट्रद्वारा सर्वोच्च स्तर प्राप्त हुआ है। गंगा नदी की विशेषता यह है कि, उसे अलग अलग स्थानों पर ३०० नदियां आकर मिलती हैं, फिर भी उसका स्वरूप अथवा गुणधर्म में परिवर्तन नहीं होता है ! वो सब कुछ अपने में समां कर आगे-आगे बहती रहती है। ऐसी गंगा नदी की रक्षा हमें करनी ही चाहिए !’’

अधिवक्ताओं के लिए ‘ब्राह्मतेज एवं क्षात्रतेज’ का होना आवश्यक ! – अधिवक्ता श्री. वीरेंद्र इचलकरंजीकर

राष्ट्र एवं धर्म हेतु कार्य करते समय संख्यात्मकता को नहीं, तो अपनी धैर्यशीलता को महत्त्व है तथा वह साधना से प्राप्त होती है। ईश्वर ने हमें हिन्दू राष्ट्र की स्थापना हेतु चुना है। हिन्दू राष्ट्र के लिए कार्य करना, यह ईश्वर की सेवा है। अधिवक्ताओं के लिए ‘ब्राह्मतेज एवं क्षात्रतेज’ दोनों का होना आवश्यक है। उसके लिए अधिवक्ताओं ने साधना भी अधिक मात्रा में करने की आवश्यकता है !

आगामी तीव्र आपत्काल में सुरक्षा हेतु साधना करना आवश्यक ! – श्री. नागेश गाडे

‘साधना एवं सनातन प्रभात की आवश्यकता’ इस विषय पर संबोधित करते हुए श्री. नागेश गाडे ने कहा कि, ‘‘यज्ञ में कितनी आहुति डालनी है, इसकी अपेक्षा उसके पीछे होनेवाला भाव महत्त्वपूर्ण है। एक छोटीसी गिलहरी ने रामसेतु के कार्य में अपनी शक्ति के अनुसार कार्य कर केवल भाव के कारण श्रीराम कृपा संपादन की ! अतः धर्मकार्य करते समय यदि गिलहरी के अनुसार हम भाव रखेंगे, तो हम पर भी ईश्वर की कृपा होगी। आगामी कुछ वर्षों में तीव्र आपत्काल आएगा। उस समय ईश्वर केवल अपने भक्तों की ही रक्षा करेगा; इसलिए ईश्वर का भक्त होने के लिए साधना करना आवश्यक है !’’

तृतीय अधिवक्ता अधिवेशन में विविध विषयों पर किया गया मार्गदर्शन . . .

१. अधिवक्ता श्री. संजीव पुनाळेकर तथा अधिवक्ता श्री. वीरेंद्र इचलकरंजीकर ने ‘सामाजिक दुष्प्रवृतियों के विरोध में अधिवक्ताओं का योगदान’ इस विषय पर मार्गदर्शन किया।
२. अधिवक्ता श्री. अमृतेश एन.पी ने ‘न्याययंत्रणा में स्थित भ्रष्टाचार’ इस विषय पर मार्गदर्शन किया।
३. अधिवक्ता श्री. नीलेश सांगोलकर ने ‘सुराज्य अभियान के अंतर्गत आयोजित उपक्रम, प्राप्त फलनिष्पत्ति तथा आगामी दिशा’ इस संदर्भ में जानकारी दी।
४. अधिवक्ता श्री. सुरेश कुलकर्णी ने ‘अधिवक्ता संघटन तथा हिन्दू विधीज्ञ परिषद की आगामी दिशा’ इस विषय पर मार्गदर्शन किया।
५. अधिवक्ता श्री. संजीव पुनाळेकर तथा अधिवक्ता श्री. वीरेंद्र इचलकरंजीकर ने ‘हिन्दू विधीज्ञ परिषदद्वारा न्यायालयों में प्रविष्ट की गई जनहित याचिका तथा प्राप्त फलनिष्पत्ति’ के संदर्भ में जानकारी दी।
६. प्रा. रामेश्वर मिश्र तथा प्रा. कुसुमलता केडिया ने ‘भारत का धर्म, भारत का संविधान’ इस विषय पर मार्गदर्शन किया।
७. प्रा. कुसुमलता केडिया ने ‘वैधानिक दृष्टि से पूर्व भारत का इतिहास’ इस विषय पर मार्गदर्शन किया।
८. कु. स्वाती गायकवाड तथा कु. वैष्णवी येळेगांवकर ने ‘स्वभावदोष तथा अहं निर्मूलन’ इस विषय पर मार्गदर्शन किया।
क्षणिकाएं
१. इस अधिवेशन के लिए सनातन की सद्गुरु (श्रीमती) बिंदा सिंगबाळजी की वंदनीय उपस्थिती रही।
२. हिन्दू जनजागृति समिति के केंद्रीय समन्वयक श्री. नागेश गाडे ने हिन्दू विधीज्ञ परिषद के अध्यक्ष अधिवक्ता श्री. वीरेंद्र इचलकरंजीकर को शाल देकर सम्मानित किया।
३. बेंगलुरु उच्च न्यायालय के अधिवक्ता श्री. अमृतेश एन.पी. ने हिन्दू विधीज्ञ परिषद के राष्ट्रीय सचिव अधिवक्ता श्री. संजीव पुनाळेकर को सम्मानित किया।
४. इस अधिवेशन में अधिवक्ता श्री. अमृतेश एन.पी. ने वर्ष २०१८ की दिनदर्शिका का प्रकाशन किया। अधिवक्ता श्री. अमृतेश एन.पी.द्वारा यह दिनदर्शिका अधिवक्ता श्री. सुरेश कुलकर्णी के हाथों अधिवक्ता श्री. संजीव पुनाळेकर को भेंट देकर उन्हें सम्मानित किया गया।

अधिवक्ता अधिवेशन में ज्येष्ठ अधिवक्ता श्री. अरुणकुमार गुप्ता का सम्मान


इस अधिवेशन में ज्येष्ठ अधिवक्ता श्री. अरुणकुमार गुप्ता को हिन्दू विधीज्ञ परिषद के संस्थापक-सदस्य अधिवक्ता श्री. सुरेश कुलकर्णी के हाथों पुष्पहार अर्पण कर, साथ ही शाल, श्रीफळ तथा भेंटवस्तु देकर सम्मानित किया गया।
अधिवक्ता श्री. अरुणकुमार गुप्ता का परिचय
अखिल हिन्दुओं की मानबिंदू पवित्र गंगा नदी की रक्षा हेतु अधिवक्ता श्री. अरुणकुमार गुप्ता सर्वोच्च योगदान दे रहे हैं। उन्होंने उत्तराखंड उच्च न्यायालय तथा सर्वोच्च न्यायालय में अधिवक्ता के रूप में कार्य किया है। गंगा नदी के संदर्भ में उन्होंने आजतक २० से अधिक जनहित याचिका न्यायालय में प्रविष्ट की हैं। साथ ही गंगा नदी के संदर्भ मे १५० से अधिक आदेश न्यायालय से प्राप्त किए हैं। गंगा नदी के संदर्भ में अधिवक्ता श्री. गुप्ता को अलाहाबाद उच्च न्यायालय ने ‘अ‍ॅमिकस क्युरी’ (न्यायालय मित्र) के नाम से नियुक्त किया है। गंगा नदी के संदर्भ में केंद्र सरकारद्वारा ‘गंगा प्रोटेक्शन अ‍ॅण्ड रिझुवेनेशन अ‍ॅक्ट’ इस नाम का अधिनियम पारित किया गया है। इस अधिनियम के समिति के प्रमुखपद पर सरकार ने उनकी नियुक्ति की है !

सनातन आश्रम कल्पना से भी अधिक अच्छा है ! – अधिवक्ता श्री. अरुणकुमार गुप्ता

अधिवक्ता श्री. अरुणकुमार गुप्ता ने रामनाथी के सनातन के आश्रम में ‘राष्ट्र एवं धर्म’ के संदर्भ में किए जानेवाले कार्य का परिचय करा लिया। आश्रम के संदर्भ में अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते समय उन्होंने कहा कि, ‘आश्रम कल्पना से भी अधिक सुंदर है ! यहां की व्यवस्था अत्यंत अच्छी है। आश्रम आनंददायी है। अगले समय मैं मेरे परिवार के साथ आश्रम में आऊंगा। ईश्वर की कृपा से मुझे गंगामाता की सेवा करने की संधी प्राप्त हुई है। मैंने कल्पना भी नहीं की थी कि, गुरुदेवजी ने इतनी सुंदर(सनातन) संस्था निर्माण की है !