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Monday, 12 March 2018

आज भारत जैसे देश में जहां हिन्दुओं की एक बड़ी आबादी रहती है वे ही इस भाषा व संस्कृति को भूलते जा रहे हैं तथा पश्चिमी भाषा, संस्कृति व सभ्यता को अपनाने की ओर अपना झुकाव बढ़ा रहे हैं।

हिंदू धर्म के इन तथ्यों से अनजान हैं अधिकांश भारतीय


पूर्ण जानकारी का महत्व

जब हमें किसी विषय की पर्याप्त जानकारी नहीं होती तो हम कही-सुनी बातों पर भी विश्वास करने लगते हैं। उसी जानकारी के आधार पर विभिन्न निष्कर्षों पर भी आते हैं लेकिन किसी विषय का सार निकालने से पहले हमें उसकी पूर्ण नहीं तो पर्याप्त जानकारी होनी बेहद जरूरी है।

धर्म

धर्म एक ऐसा विषय है जिसकी अधूरी जानकारी के आधार पर लोग छोटी सी बात को भी बढ़ा-चढ़ाकर बताते हैं। एक झूठ को सच साबित करने में लगे रहते हैं और विभिन्न अंधविश्वासों को धार्मिक विश्वास की मान्यता देते हैं।

अनजाने तथ्य

इस आर्टिकल में हिन्दू धर्म से जुड़े कुछ ऐसे ही तथ्य हैं जिनसे आज भी मनुष्य अनजान है। और अगर जानकारी रखता भी है तो अधूरी या फिर गलत, जो इस धर्म को गलत राह पर ले जाने के लिए प्रेरित कर रही है।


हिन्दू धर्म का सिद्धांत

किसी का कहना है कि हिन्दू धर्म बहुदेववादी तरीके का पालन करता है, तो किसी का मानना है कि यह धर्म एकेश्वरवादी सिद्धांत से बना है। लेकिन तथ्यों की मानें तो हिन्दू धर्म इन सभी सिद्धातों से पूरित है।

मार्ग अनेक

यह एक ऐसा धर्म है जो किसी को एक सिद्धांत में नहीं बांधता। हिन्दू धर्म का मानना है कि ईश्वर तक पहुंचने के साधन काफी सारे हैं लेकिन परिणाम एक ही है। इसलिए दुनिया को ‘भगवान’ का नाम देने वाले इस धर्म में अनेक देवी-देवताओं को पूजा जाता है।



चार वेद

हिन्दू धर्म के चार वेद – ऋग्वेद, अथर्ववेद, सामवेद तथा यजुर्वेद, सभी वेद अपने आप में आज भी मनुष्य का मार्गदर्शन करते हैं। हिन्दू धर्म के अनुयायी इन सभी वेदों एवं पौराणिक ग्रंथों को अपना गुरु रूप मानकर अपनी कठिनाइयों का समाधान पाते हैं।


महान ग्रंथ

हिन्दू धर्म के दो महान ग्रंथ- रामायण एवं महाभारत, स्वयं मनुष्य को धर्म के मार्ग पर चलना सिखाते हैं। परन्तु आज का आधुनिक मनुष्य इन सिद्धांतों को खुद पर कितना लागू करता है यह एक अलग बात है।

शक्ति की प्रतीक देवी

आजकल लोग स्त्री को अपने बराबर समझें या ना समझें, लेकिन हिन्दू धर्म ने हमेशा से ही स्त्री रूपी ‘शक्ति’ को देवों के समान महान माना है। हिन्दू धर्म की त्रिमूर्ति हैं ब्र्ह्मा, विष्णु एवं महेश (शिव)। भगवान ब्रह्मा जहां सृष्टि की संरचना के लिए पुराणों में उल्लिखित हैं वहीं विष्णुजी को इस संसार का पालनहार माना गया है।

हिन्दू धर्म की त्रिमूर्ति

तथा भगवान शिव भक्तों की इच्छाओं को पूरित करने एवं अपने रौद्र रूप से बुरे प्रभाव को नष्ट करने के लिए जाने जाते हैं। लेकिन हिन्दू धर्म ने एक देवी को हमेशा ही शक्ति का प्रतीक माना है।

प्रत्येक देवी का शक्ति रूप

वह देवी चाहे कोई भी हो, मां लक्ष्मी, माता पार्वती, मां दुर्गा या इनका कोई स्वरूप। प्रत्येक देवी को एक शक्ति के रूप में प्रकट किया गया है जो पापियों का संहार करने के लिए हमेशा ही मौजूद हैं।

सबसे पुराना धर्म

यदि हिन्दू धर्म को अन्य विश्व प्रसिद्ध धर्मों से तुलनात्मक दृष्टि से देखा जाए तो यह दुनिया के सबसे पुराने धर्म में गिना जाता है। लेकिन यदि आप हिन्दू धर्म के किसी अनुयायी से ऐसा ही कोई प्रश्न करें कि हिन्दू धर्म कितना पुराना है तो वह इसकी गणना लाखों या करोड़ों वर्ष पुरानी भी दे सकता है।

हिन्दू धर्म का समय चक्र

क्योंकि हिन्दू धर्म में समय का चक्र अन्य धर्मों के समय चक्र से काफी भिन्न है। भगवान ब्रह्मा ने समय को ‘कल्प’ के रूप में प्रदर्शित किया था और इस प्रत्येक कल्प में 14 ‘मनवंतरों’ को शामिल किया गया है।

कल्प से बना मनवंतर

इस गणना के अनुसार हम युगों के जाल को पार करते हुए आज केवल सातवें मनवंतर (वैवस्वत) तक ही पहुंच पाए हैं। लेकिन आम मनुष्य केवल युगों को चार विभाजन में पाता है – सतयुग, त्रेता युग, द्वापर युग एवं कलियुग।

चार युगों में विभाजन

और खुद को आज का मनुष्य कलियुग का भाग मानता है, जो कि धार्मिक संरचना के अनुसार दैत्यों का संसार कहा जाता है। केवल यही नहीं, ऐसे कई तथ्य हैं जो हिन्दू धर्म को अन्य धर्म से काफी भिन्न बताते हैं।

धन एक पाप?

कुछ धर्मों के अनुसार ‘पैसे’ को पाप के रूप में परिवर्तित किया जाता है। धन के पीछे पड़ना पाप के समान माना जाता है लेकिन दूसरी ओर हिन्दू धर्म स्वयं में ही धर्म को धन से भी जोड़ता है।

धन तथा समृद्धि की देवी

धन तथा स्मृद्धि के देवी-देवता इस बात का उदाहरण है कि हिन्दू धर्म में धन एवं सम्पदा की रवायत वर्षों पुरानी है। धन की देवी लक्ष्मी तथा धनकुबेर को लोग धन पाने के लिए रोज़ाना पूजते हैं।

धन के देवी-देवताओं का पूजन

विधि पूर्वक उनकी पूजा करते हैं तथा उनके मंत्रों का जाप करते हैं ताकि यह देव उन्हें आशीर्वाद प्रदान कर उनके जीवन पर छायी कंगाली के प्रभाव को दूर कर सकने में सहायक साबित हों।

तीसरा सबसे विशाल धर्म

हिन्दू धर्म एक ऐसा धर्म है जो विश्व भर में सबसे बड़े धर्मों में से तीसरे स्थान पर आता है लेकिन इसी धर्म की 95 प्रतिशत जनसंख्या एक देश, एक राष्ट्र ‘भारत’ को बनाती है।

संस्कृत का महत्व

इसके बावजूद भी विश्व भर में इस धर्म को जाना जाता है। ना केवल धार्मिक कथनों बल्कि हिन्दू धर्म को दुनिया भर में प्रस्तुत करने वाली भाषा ‘संस्कृत’ ने भी विश्व भर की अन्य भाषाओं को विकसित करने या फिर कुछ भाषाओं की प्रसिद्ध नामावलियों को रचने का प्रेरणात्मक श्रेय पाया है।

परंतु हिन्दू ही बन रहा पाश्चात्य सभ्यता का पुजारी


लेकिन इसके बावजूद भी आज भारत जैसे देश में जहां हिन्दुओं की एक बड़ी आबादी रहती है वे ही इस भाषा व संस्कृति को भूलते जा रहे हैं तथा पश्चिमी भाषा, संस्कृति व सभ्यता को अपनाने की ओर अपना झुकाव बढ़ा रहे हैं।

Sunday, 11 March 2018

मनु स्मृति के अनुसार

मनु स्मृति – इन 15 लोगों के साथ कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए


मनु स्मृति –

कुछ लोग होते हैं जो छोटी-छोटी बातों पर किसी से भी विवाद कर लेते हैं। वह ऐसा जान-बूझकर नहीं करते बल्कि उनका स्वभाव ही ऐसा होता है। मनु स्मृति के अनुसार 15 लोग ऐसे बताए गए हैं, जिनसे कभी विवाद नहीं करना चाहिए।
ये 15 लोग इस प्रकार हैं-

1. यज्ञ करने वाला

यज्ञ करने वाला ब्राह्मण सदैव सम्मान करने योग्य होता है। यदि उससे किसी प्रकार की कोई चूक हो जाए तो भी उसके साथ कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए। यदि आप ऐसा करेंगे तो इससे आपकी प्रतिष्ठा ही धूमिल होगी। अतः यज्ञ करने वाले वाले ब्राह्मण से वाद-विवाद न करने में ही भलाई है।

2. पुरोहित

यज्ञ, पूजन आदि धार्मिक कार्यों को संपन्न करने के लिए एक योग्य व विद्वान ब्राह्मण को नियुक्त किया जाता है, जिसे पुरोहित कहा जाता है। भूल कर भी कभी पुरोहित से विवाद नहीं करना चाहिए। पुरोहित के माध्यम से ही पूजन आदि शुभ कार्य संपन्न होते हैं, जिसका पुण्य यजमान (यज्ञ करवाने वाला) को प्राप्त होता है। पुरोहित से वाद-विवाद करने पर वह आपका काम बिगाड़ सकता है, जिसका दुष्परिणाम यजमान को भुगतना पड़ सकता है। इसलिए पुरोहित से कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।

3. आचार्य

प्राचीनकाल में उपनयन संस्कार के बाद बच्चों को शिक्षा के लिए गुरुकुल भेजा जाता था, जहां आचार्य उन्हें पढ़ाते थे। वर्तमान में उन आचार्यों का स्थान स्कूल टीचर्स ने ले लिया है। मनु स्मृति के अनुसार आचार्य यानी स्कूल टीचर्स से भी कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए। वह यदि दंड भी दें तो उसे स्वीकार कर लेना चाहिए। आचार्य (टीचर्स) हमेशा अपने छात्रों का भला ही सोचते हैं। इनसे वाद-विवाद करने पर विद्यार्थी का भविष्य भी खतरे में पड़ सकता है।

4. अतिथि

हिंदू धर्म में अतिथि यानी मेहमान को भगवान की संज्ञा दी गई है इसलिए कहा जाता है मेहमान भगवान के समान होता है। उसका आवभगत ठीक तरीके से करनी चाहिए। भूल से भी कभी अतिथि के साथ वाद-विवाद नहीं करना चाहिए। अगर कोई अनजान व्यक्ति भी भूले-भटके हमारे घर आ जाए तो उसे भी मेहमान ही समझना चाहिए और यथासंभव उसका सत्कार करना चाहिए। अतिथि से वाद-विवाद करने पर आपकी सामाजिक प्रतिष्ठा को ठेस लग सकती है।

5. माता

माता ही शिशु की सबसे प्रथम शिक्षक होती है। माता 9 महीने शिशु को अपने गर्भ में धारण करती है और जीवन का प्रथम पाठ पढ़ाती है। यदि वृद्धावस्था या इसके अतिरिक्त भी कभी माता से कोई भूल-चूक हो जाए तो उसे प्यार से समझा देना चाहिए न कि उसके साथ वाद-विवाद करना चाहिए। माता का स्थान गुरु व भगवान से ही ऊपर माना गया है। इसलिए माता सदैव पूजनीय होती हैं। अतः माता के साथ कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।

6. पिता

पिता ही जन्म से लेकर युवावस्था तक हमारा पालन-पोषण करते हैं। इसलिए मनु स्मृति के अनुसार पिता के साथ कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए। पिता भी माता के ही समान पूज्यनीय होते हैं। हम जब भी किसी मुसीबत में फंसते हैं, तो सबसे पहले पिता को ही याद करते हैं और पिता हमें उस समस्या का समाधान भी सूझाते हैं। वृद्धावस्था में भी पिता अपने अनुभव के आधार पर हमारा मार्गदर्शन करते हैं। इसलिए पिता के साथ वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।

7. मामा आदि संबंधी

मामा आदि संबंधी जैसे- काका-काकी, ताऊ-ताईजी, बुआ-फूफाजी, ये सभी वो लोग होते हैं, जो बचपन से ही हम पर स्नेह रखते हैं। बचपन में कभी न कभी ये भी हमारी जरूरतें पूरी करते हैं। इसलिए ये सभी सम्मान करने योग्य हैं। इनसे वाद-विवाद करने पर समाज में हमें सभ्य नहीं समझा जाएगा और हमारी प्रतिष्ठा को भी ठेस लग सकती है। इसलिए भूल कर भी कभी मामा आदि सगे-संबंधियों से वाद-विवाद नहीं करना चाहिए। यदि ऐसी स्थिति बने तो भी समझा-बूझाकर इस मामले को सुलझा लेना चाहिए।

8. भाई

हिंदू धर्म के अनुसार बड़ा भाई पिता के समान तथा छोटा भाई पुत्र के समान होता है। बड़ा भाई सदैव मार्गदर्शक बन कर हमें सही रास्ते पर चलने के प्रेरित करता है और यदि भाई छोटा है तो उसकी गलतियां माफ कर देने में ही बड़प्पन है। विपत्ति आने पर भाई ही भाई की मदद करता है। बड़ा भाई अगर परिवार रूपी वटवृक्ष का तना है तो छोटा भाई उस वृक्ष की शाखाएं। इसलिए भाई छोटा हो या बड़ा उससे किसी भी प्रकार का वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।

9. बहन

भारतीय सभ्यता में बड़ी बहन को माता तथा छोटी बहन को पुत्री माना गया है। बड़ी बहन अपने छोटे भाई-बहनों को माता के समान ही स्नेह करती है। संकट के समय सही रास्ता बताती है। छोटे भाई-बहनों पर जब भी विपत्ति आती है, बड़ी बहन हर कदम पर उनका साथ देती है। छोटी बहन पुत्री के समान होती है। परिवार में जब भी कोई शुभ प्रसंग आता है, छोटी बहन ही उसे खास बनाती है। छोटी बहन जब घर में होती है तो घर का वातावरण सुखमय हो जाता है। इसलिए मनु स्मृति में कहा गया है कि बहन के साथ कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।

10. पुत्र

हिंदू धर्म ग्रंथों में पुत्र को पिता का स्वरूप माना गया है यानी पुत्र ही पिता के रूप में पुनः जन्म लेता है। शास्त्रों के अनुसार पुत्र ही पिता को पुं नामक नरक से मुक्ति दिलाता है। इसलिए उसे पुत्र कहते हैं-
पुं नाम नरक त्रायेताति इति पुत्रः
पुत्र द्वारा पिंडदान, तर्पण आदि करने पर ही पिता की आत्मा को मोक्ष प्राप्त होता है। पुत्र यदि धर्म के मार्ग पर चलने वाला हो तो वृद्धावस्था में माता-पिता का सहारा बनता है और पूरे परिवार का मार्गदर्शन करता है। इसलिए मनु स्मृति के अनुसार पुत्र से कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।

11. पुत्री

भारतीय संस्कृति में पुत्री को लक्ष्मी का रूप माना जाता है। कहते हैं कि भगवान जिस पर प्रसन्न होता है, उसे ही पुत्री प्रदान करता है। संभव है कि पुत्र वृद्धावस्था में माता-पिता का पालन-पोषण न करे, लेकिन पुत्री सदैव अपने माता-पिता का साथ निभाती है। परिवार में होने वाले हर मांगलिक कार्यक्रम की रौनक पुत्रियों से ही होती है। विवाह के बाद भी पुत्री अपने माता-पिता के करीब ही होती है। इसलिए पुत्री से कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।

12. पत्नी

हिंदू धर्म में पत्नी को अर्धांगिनी कहा जाता है, जिसका अर्थ है पति के शरीर का आधा अंग। किसी भी शुभ कार्य व पूजन आदि में पत्नी का साथ में होना अनिवार्य माना गया है, उसके बिना पूजा अधूरी ही मानी जाती है। पत्नी ही हर सुख-दुख में पति का साथ निभाती है। वृद्धावस्था में यदि पुत्र आदि रिश्तेदार साथ न हो तो भी पत्नी कदम-कदम पर साथ चलती है। इसलिए मनु स्मृति के अनुसार पत्नी से भी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।

13. पुत्रवधू

पुत्र की पत्नी को पुत्रवधू कहते हैं। भारतीय संस्कृति के अनुसार पुत्रवधू को भी पुत्री के समान ही समझना चाहिए। पुत्रियों के अभाव में पुत्रवधू से ही घर में रौनक रहती है। कुल की मान-मर्यादा भी पुत्रवधू के ही हाथों में होती है। परिवार के सदस्यों व अतिथियों की सेवा भी पुत्रवधू ही करती है। पुत्रवधू से ही वंश आगे बढ़ता है। इसलिए यदि पुत्रवधू से कभी कोई चूक भी हो जाए तो भी उसके साथ वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।

14. गृह सेवक यानी नौकर

मनु स्मृति के अनुसार गृह सेवक यानी नौकर से भी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए क्योंकि पुराने सेवक आपकी व आपके परिवार की कई गुप्त बातें जानता है। वाद-विवाद करने पर वह गुप्त बातें सार्वजनिक कर सकता है। जिससे आपके परिवार की प्रतिष्ठा खराब हो सकती है। इसलिए नौकर से भी कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।

15. दामाद

पुत्री के पति को दामाद यानी जमाई कहते हैं। धर्म ग्रंथों में दामाद को भी पुत्र के समान माना गया है। पुत्र के न होने पर दामाद ही उससे संबंधित सभी जिम्मेदारी निभाता है तथा ससुर के उत्तर कार्य (पिंडदान, तर्पण, श्राद्ध आदि) करने का अधिकारी भी होता है। दामाद से इसलिए भी विवाद नहीं करना चाहिए क्योंकि इसका असर आपकी पुत्री के दांपत्य जीवन पर भी पढ़ सकता है।
श्लोक :
ऋत्विक्पुरोहिताचार्यैर्मातुलातिथिसंश्रितैः।
बालवृद्धातुरैर्वैधैर्ज्ञातिसम्बन्धिबांन्धवैः।।
मातापितृभ्यां यामीभिर्भ्रात्रा पुत्रेण भार्यया।
दुहित्रा दासवर्गेण विवादं न समाचरेत्।।

अथार्त- 1. यज्ञ करने वाले, 2. पुरोहित, 3. आचार्य, 4. अतिथियों, 5. माता, 6. पिता, 7. मामा आदि संबंधियों, 8. भाई, 9. बहन, 10. पुत्र, 11. पुत्री, 12. पत्नी, 13. पुत्रवधू, 14. दामाद तथा 15. गृह सेवकों यानी नौकरों से वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।

मनुस्मृति में इसका जिक्र एक श्लोक के माध्यम से किया गया है

इन 8 लोगों से कभी ना करें मुकाबला, हमेशा होगी हार

जीवन जीने का सबसे सरल और आदर्श तरीका क्या है, इसे कोई भी नहीं कह सकता। अलग-अलग परिस्थितियों और लोगों के साथ यह अलग-अलग हो सकता है, एक ही चीज और काम अलग-अलग हालातों में सही या गलत हो सकते हैं। पर कैसे जानें कि कब क्या सही है और क्या गलत? इसी उहापोह में कई बार ऐसे काम भी कर जाते हैं जिसके लिए बाद में पछताते हैं। उस वक्त आपको सबसे बड़ा दुख इस बात का होता है कि काश, यह बात पहले समझ आ जाती!
हालांकि जीवन एक अनंत बढ़ती नदी की तरह है जिसकी राह में कुछ भी आए, वह बढ़ती रहती है। नदी को जिधर रास्ता मिल जाए, वह उसी ओर बह जाती है, लेकिन अपनी गति और अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए इसके कुछ रास्ते पहले से तय होते हैं। समय-समय पर अचानक आए कुछ बदलावों, राह की बड़ी परेशानियों के साथ यह अपने मार्ग में कई बार बदलाव भी करती है, लेकिन उसकी पहचान अपने पूर्व-प्रशस्त मार्ग से ही होती है।



जीवन भी बहुत हद तक इस नदी की तरह ही है, अगले पल सब कुछ सामान्य रह सकता है लेकिन यह भी संभव है कि कुछ ऐसा हो जाए जो आपके जीने की दिशा ही बदल दे। जिस प्रकार नदी अपनी राह में आने वाले छोटे कंक्रीट और पत्थरों के लिए हमेशा तैयार रहती है, उसी प्रकार जीवन में कुछ समान्य बाधाओं के लिए हमेशा सचेत रहना चाहिए। पर नदी को पता है कि बड़े पत्थर और पहाड़ों के सामने आने से उसे अपना रास्ता बदल लेना है। इस प्रकार उसका अस्तित्व अपनी पहचान के साथ बना रहता है लेकिन अगर वह ऐसा नहीं करती है तो शाखाओं में बंटकर अपनी पहचान खो सकती है।
इसी प्रकार जीवन में कुछ ऐसी बाधाएं और और कुछ ऐसे नियम हैं जिनके लिए मनुष्य को हमेशा सचेत रहना चाहिए। इन बाधाओं के प्रति अपना एक निर्धारित रुख अपनाते हुए तथा नियमों का ईमानदारी पूर्वक पालन करते हुए आप बेवजह की परेशानियों में उलझकर अपनी पहचान खोने से बच सकते हैं। इसी संदर्भ में मनुस्मृति में राह चलते हुए 8 खास जातकों की चर्चा की गयी है जिनके लिए आपको सदैव ही अपना मार्ग छोड़ देना चाहिए या कहें रास्ता पार करने के लिए उन्हें वरीयता देते हुए पहले उनके गुजरने का इंतजार करें, तभी स्वयं आगे बढ़ें। मनुस्मृति में इसका जिक्र एक श्लोक के माध्यम से किया गया है जो इस प्रकार है - “चक्रिणो दशमीस्थस्य रोगिणो भारिणः स्त्रियाः। स्नातकस्य च राज्ञश्च पन्था देयो वरस्य च।।
अर्थात् मार्ग में चलते हुए अगर आपके सामने रथ पर सवार व्यक्ति, रोगी, स्त्री, वृद्ध, बोझ उठाये व्यक्ति, स्नातक (ज्ञानी), राजा और वर आएं, तो हमेशा ही उसे मार्ग दे देना चाहिए। ऐसा ना करना स्वयं के जीवन के लिए परेशानियां खड़ी करने के समान है। पर इसकी एक खास वजह है, आगे हम क्रमवार इसकी चर्चा कर रहे हैं....
रथ: रथ हमेशा आपसे ऊंचा होगा। अगर उसपर सारथी हुआ तो संभव है कि वह रुककर आपको रास्ता दे दे, लेकिन अगर उसपर राजा समान व्यक्ति हुआ या घोड़ा लगाम से बाहर हुआ तो वह आपके लिए नहीं रुकेगा और आपका जीवन खतरे में पड़ सकता है। हालांकि आज के संदर्भ में बात करें तो रथ की तुलना कार और बस से की जा सकती है और घोड़ों की जगह ब्रेक को समझा जा सकता है। साफ शब्दों में आज के परिपेक्ष्य में अगर माना जाए, तो राह चलते हुए वाहनों को रोककर आगे बढ़ना शास्त्र-सम्मत भी नहीं है, इसलिए ऐसा करने से बचें।
वृद्ध: बड़े-बुजुर्ग हमेशा ही सम्माननीय माने गए हैं, इसलिए चाहे आप कितनी भी जल्दी में हों लेकिन अगर आपके सामने कोई वृद्द्ध महिला-पुरुष आ जाएं तो आप रुककर उन्हें अवश्य ही मार्ग दें या आगे बढ़ने के लिए उन्हें रास्ता दें। शास्त्रों में जहां बड़ों का सम्मान ना करने वाला ‘हेय (तुच्छ)’ मनुष्य माना गया है, वहीं ज्योतिष शास्त्र में इसे सूर्य को कमजोर करने का कारक माना गया है जो मनुष्य को अवनति की ओर धकेलता है। ऐसा व्यक्ति कभी भी सम्मानजनक और खुशहाल जीवन नहीं जी पाता।
रोगी: राह में किसी भी प्रकार का बीमार व्यक्ति मिले, उसे मार्ग अवश्य देना चाहिए। आपको नहीं पता कि उसके रोग की अवस्था क्या है। हो सकता है कि वह इतना अधिक बीमार हो कि थोड़ी भी देर होने पर उसकी जान पर बन आए। ऐसे में आप पाप के भागीदार होंगे।
बोझ उठाए व्यक्ति: मानवता हर मनुष्य का पहला धर्म और प्रथम कर्त्तव्य है। शरीर पर बोझ उठाकर चल रहा व्यक्ति आपकी अपेक्षा अधिक कष्ट में होगा, इसलिए उसे राह देकर उसे गंतव्य तक पहुंचने में आप उसकी मदद करते हैं। यही आपका नैतिक धर्म भी है और इंसानियत भी, यही शास्त्र सम्मत भी है। ऐसा ना करके कहीं ना कहीं आप इंसानियत के धर्म को अनदेखा कर शास्त्रों की भी अवहेलना कर रहे हैं जो आपको पाप और कष्ट पाने का भागीदार बनाता है।
स्त्री: हिंदू शास्त्रों में स्त्रियों को मां लक्ष्मी का प्रतीक माना गया है, इसलिए जिस भी प्रकार से हो इनका सम्मान करना आपको हमेशा ही मां लक्ष्मी के साथ ही सरस्वती की कृपा का पात्र भी बनाता है। ऐसे मनुष्य जीवन में हर खुशी पाते हैं, साथ ही धन-वैभव समेत हर वो चीज पाते हैं जिसकी उन्हें चाह होती है। इसलिए जब भी कोई स्त्री दिखे तो उसे सम्मान देते हुए हमेशा ही उसे रास्ता पहले पार करने दें।
स्नातक (ज्ञानी): यहां ‘स्नातक’ से अर्थ ज्ञानी या विद्वान पुरुष या स्त्रियों से हैं। ज्ञान ही मनुष्यता और धर्म का भाव लाता है, अत: जो ज्ञानी है वह हमेशा ही सम्माननीय है। इसलिए जब भी रास्ते में चलते हुए आपके सम्मुख कोई ज्ञानी पुरुष या महिला आए तो उसे सम्मान देते हुए हमेशा ही उनका मार्ग छोड़कर पीछे हट जाएं। इससे उनका आशीर्वाद आपको मिलेगा और हो सकता है भविष्य में अपने ज्ञान के प्रकाश से वो आपकी सफलता की राहें भी आपको दिखा दें।
राजा: हालांकि आज के संदर्भ में यह राजनेता हो सकते हैं, किंतु यहां ‘राजा’ से संदर्भ है ‘आपका पालन-पोषण करने वाला’। वह नीति-निर्माता और नीति-निर्देशक भी होता है, इसलिए एक प्रकार से वही आपके जीवन की डोर होता है। उसके बिना आप एक अच्छा जीवन जीने की आप नहीं सोच सकते। इसका तात्पर्य परिवार के मुखिया या जो भी अभिभावक हों उनसे भी हो सकता है। ऐसे लोगों को सम्मान देना आपको हमेशा उनका कृपापात्र बनाए रखेगा जो आपके सफल और सुखी जीवन के लिए बेहद आवश्यक है।
वर: हिंदू शास्त्रों में वर या विवाह के लिए जा रहे पुरुषों को भगवान शिव का प्रतीक माना गया है। इसलिए जब भी ये आपको राह में मिल जाएं, इनका रास्ता रोककर आगे बढ़ने की कोशिश ना करें, बल्कि इन्हें आगे जाने दें।

Friday, 9 March 2018

मेरु पर्वत को अलौकिक पर्वत की संज्ञा दी गई है और इसे सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा समेत समस्त देवी-देवताओं का स्थान कहा गया है।

मेरु पर्वत के रहस्य से जुड़ा है धरती और देवताओं का रिश्ता


धार्मिक सिद्धांत

विभिन्न धर्मों की अलग-अलग मान्यताओं को हम नजरअंदाज नहीं कर सकते। वैश्विक स्तर पर अलग-अलग धर्मों का अस्तित्व मौजूद है और सभी अपने आप में प्रमुख हैं, जिनके अलग-अलग सिद्धांत एक-दूसरे से काफी हद तक जुड़े हुए हैं। अगर गंभीरता और निष्पक्षता से इन धर्मों का विश्लेषण किया जाए तो यह कहना गलत नहीं होगा कि आदर्शों और मान्यताओं में भिन्नता होने के बावजूद भी बहुत कुछ ऐसा है जो इन्हें परस्पर जोड़कर रखे हुए है।

मेरु पर्वत

मेरु पर्वत, एक ऐसा स्थान है, जिसका उल्लेख आपको लगभग सभी प्रमुख धर्मों में मिल जाएगा। यहां तक कि इससे जुड़ी मान्यताएं भी लगभग समान हैं। पौराणिक कहानियों और दस्तावेजों में मेरु पर्वत का जिक्र एक ऐसे पर्वत के तौर पर मिलता है, जो सोने के समान चमकीले सुनहरे रंग का है।

हिन्दू धर्म

हिमालय की गोद में स्थित मेरु पर्वत की विशेषता यही समाप्त नहीं हो जाती, बल्कि इसे ब्रह्मा का निवास स्थान भी माना जाता है। हिन्दू धर्म से जुड़े दस्तावेजों में मेरु पर्वत को अलौकिक पर्वत की संज्ञा दी गई है और इसे सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा समेत समस्त देवी-देवताओं का स्थान कहा गया है।

अलौकिक स्थान

पौराणिक हिन्दू खगोलीय ग्रंथ, सूर्य सिद्धांत के अनुसार मेरु पर्वत पृथ्वी की नाभि पर स्थित है। इसके अलावा यह भी उल्लिखित है कि सुमेरु अर्थात मेरु पर्वत, उत्तरी ध्रुव और कुमेरु पर्वत दक्षिणी ध्रुव पर स्थित है। जिसका अर्थ है कि मेरु पर्वत का आकार उत्तर से दक्षिण ध्रुव तक फैला हुआ है।

धरती पर स्वर्ग

मेरु पर्वत को स्वर्ग की संज्ञा दी जाती है जिसकी संरचना धरती पर होने के बावजूद भी धरती पर नहीं हुई है। पौराणिक कथाओं में मेरु पर्वत के विषय में बहुत कुछ कहा गया है, वरन मत्स्य पुराण और भागवत पुराण में इसकी ऊंचाई 84 हजार योजन बताई गई है जो धरती के कुल व्यास से करीब 85 गुणा है।

कूर्म पुराण

कूर्म पुराण के अनुसार इस नश्वर क्षेत्र के बीचोबीच जंबूद्वीप स्थित है जिसके मध्य में स्थित है सुनहरा मेरु पर्वत। इसकी ऊंचाई 84 हजार योजन, फैलाव 16 हजार योजन, ऊपर की ओर की चौड़ाई 32 हजार और नीचे की चौड़ाई 16 हजार योजन है।

चार द्वारपाल

हम मुख्त: चार दिशाओं से परिचित हैं और हिन्दू धर्म में इन चारों दिशाओं के अलग-अलग द्वारपाल या संरक्षक बताए गए हैं। जैसे कि पूर्वी दिशा का संरक्षण इन्द्र देव के हाथ है, पश्चिमी दिशा की रक्षा वरुण देव करते हैं। दक्षिण दिशा की रक्षा स्वयं मृत्यु के देवता यम द्वारा की जाती है और उत्तरी दिशा के द्वारपाल धनकुबेर हैं।

जैन और बौद्ध धर्म

ये चारों देव मेरु पर्वत को अलग-अलग दिशाओं को एक अभिभावक की तरह देखते हैं। केवल हिन्दू धर्म में ही नहीं बल्कि जैन और बौद्ध धर्म के लोग भी मेरु पर्वत को स्वर्ग की संज्ञा देते हैं, यहां तक कि प्राचीन यूनानी कथाओं में मेरु को ऑलिम्पस पर्वत का नाम दिया गया है।

रहस्य

जावा (इंडोनेशिया) में प्रचलित लोक कथाओं में भी मेरु पर्वत का जिक्र देवताओं के पौराणिक निवास के रूप में किया गया है। पंद्रहवी शताब्दी से संबंधित कवि भाषा में लिखी गई प्राचीन पांडुलिपियों में जावा द्वीप के उद्भव और मेरु पर्वत के कुछ हिस्सों को जावा द्वीप से क्यों जोड़ा गया, इसका रहस्य बताया गया है।

जावा

जावा की इस प्राचीन पांडुलिपि के अनुसार बतारा गुरु (शिव) ने विष्णु और ब्रह्मा को यह आदेश दिया कि वह इस द्वीप पर मानवता को जन्म दें, समस्त द्वीप को मनुष्यों से भर दें। उस समय जावा द्वीप हर समय हिलता और सागर पर बहता रहता था।

महामेरु पर्वत

ऐसे हालात में मनुष्यों का वहां रहना कठिन था इसलिए द्वीप को स्थिर रखने के लिए ब्रह्मा और विष्णु ने महामेरु पर्वत के भाग को जांबूद्वीप पर ले जाकर उसे जावा द्वीप से जोड़ने का निश्चय किया। इसके परिणाम के तौर पर जावा के सबसे लंबे पर्वत, सुमेरु पर्वत की स्थापना हुई।

सैंटा क्लॉज

ईसाई धर्म में सैंटा क्लॉज की अवधारणा बहुत प्रचलित है जो क्रिसमस के दिन धरती पर उतरता है। सैंटा क्लॉज का धरती पर आगमन भी उत्तरी ध्रुव यानि मेरु या ऑलिम्पस पर्वत की ओर से ही होता है।

जापानी कथा

जापानी और चीनी पौराणिक कथाओं में ईश्वर का स्थान ध्रुव तारे के ठीक नीचे और धरती के बिल्कुल मध्य में होता है। मेरु पर्वत भी धरती के बीचोबीच ही स्थित है।

स्वर्ग से धरती का संबंध

नॉर्स पौराणिक कथाओं में अनश्वरों की धरती उत्तरी ध्रुव पर स्थित है, जहां नर्क, स्वर्ग और धरती एक-दूसरे से जुड़ते हैं। मेरु पर्वत का स्थान यही है। केल्ट पौराणिक कथाओं में भी स्वर्ग का जिक्र एक ऐसे स्थान के रूप में किया गया है जहां साल के छ: महीने लगातार बर्फ गिरती है। यह भी ध्रुवीय स्थिति को ही दर्शाता है।

मंदिरों की संरचना

ऐसा कहा जाता है आदिकाल में मेरु पर्वत से जुड़ी अवधारणा इतनी पुख्ता और मजबूत थी कि कई बेहद प्राचीन मंदिरों का निर्माण भी इस पर्वत की संरचना की तरह ही हुआ है। हिन्दू, जैन और बौद्ध मंदिर इस बात के सशक्त उदाहरण हैं।

ब्रह्मलोक

मेरु पर्वत को ना सिर्फ ब्रह्मा का स्थान कहा गया है बल्कि अन्य पौराणिक चरित्रों के साथ भी इसके संबंध को बताया गया है। जैसे कि मेरु पर्वत के सबसे ऊपर ब्रह्मलोक अर्थात ब्रह्मा का स्थान है और इसके अलग-अलग तल पर विभिन्न देवी-देवता रहते हैं।

अन्य पात्र

मेरु पर्वत की चोटी पर 33 देवताओं का निवास स्थान है। यहां इन्द्र देव भी रहते हैं। इसकी हर ढलान पर इस पर्वत के चार अभिभावक यम, कुबेर, इन्द्र और वरुण देव रहते हैं।

असुरों का वास

इसके नीचे अन्य पौराणिक पात्र जैसे अप्सरा, गंधर्व, यक्ष, नाग, सिद्ध, विद्यधर रहते हैं। सबसे नीचे असुरों का वास है।
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असुरों के गुरु शुक्राचार्यजी के दस रहस्य बतायेगें।

असुरों के गुरु शुक्राचार्यजी के दस रहस्य बतायेगें।




अमंत्रं अक्षरं नास्ति , नास्ति मूलं अनौषधं।
अयोग्यः पुरुषः नास्ति, योजकः तत्र दुर्लभ:॥
- शुक्राचार्य (शुक्र नीति)
अर्थात कोई अक्षर ऐसा नहीं है जिससे (कोई) मन्त्र न शुरू होता हो, कोई ऐसा मूल (जड़) नहीं है, जिससे कोई औषधि न बनती हो और कोई भी आदमी अयोग्य नहीं होता, उसको काम में लेने वाले (मैनेजर) ही दुर्लभ हैं।

शुक्राचार्य एक रहस्यमयी ऋषि हैं। उनके बारे में लोग सिर्फ इतना ही जानते हैं कि वे असुरों के गुरु थे। लेकिन हम आपको बताएंगे उनके बारे में कुछ अन्य तरह की रहस्यमी बातें जो शायद ही आप जानते होंगे। शुक्राचार्य के संबंध में काशी खंड महाभारत, पुराण आदि ग्रंथों में अनेक कथाएं वर्णित है।

देवताओं के अधिपति इन्द्र, गुरु बृहस्पति और विष्णु परम ईष्ट हैं। दूसरी ओर दैत्यों के अधिपति हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप के बाद विरोचन बने जिनके गुरु शुक्राचार्य और शिव परम ईष्ट हैं। एक ओर जहां देवताओं के भवन, अस्त्र आदि के निर्माणकर्ता विश्‍वकर्मा थे तो दूसरी ओर असुरों के मयदानव। इन्द्र के भ्राताश्री वरुणदेव देवता और असुर दोनों को प्रिय हैं।

असुरों में कई महान शिव भक्त असुर हुए हैं। शुक्राचार्य उनमें से एक थे। आओ उनके बारे में जानते हैं दस रहस्य...

पहला रहस्य.... ऋषि भुगु के पुत्र थे शुक्राचार्य :महर्षि भृगु के पुत्र और भक्त प्रहल्लद के भानजे शुक्राचार्य। महर्षि भृगु की पहली पत्नी का नाम ख्याति था, जो उनके भाई दक्ष की कन्या थी। ख्याति से भृगु को दो पुत्र दाता और विधाता मिले और एक बेटी लक्ष्मी का जन्म हुआ। लक्ष्मी का विवाह उन्होंने भगवान विष्णु से कर दिया था। भृगु के और भी पुत्र थे जैसे उशना, च्यवन आदि। माना जाता है कि उशना ही आगे चलकर शुक्राचार्य कहलाए। एक अन्य मान्यता अनुसार वे भृगु ऋषि तथा हिरण्यकशिपु की पुत्री दिव्या के पुत्र थे।

मत्स्य पुराण के अनुसार शुक्राचार्य का वर्ण श्वेत है। इनका वाहन रथ है, उसमें अग्नि के समान आठ घोड़े जुते रहते हैं। रथ पर ध्वजाएं फहराती रहती हैं। इनका आयुध दण्ड है। शुक्र वृष और तुला राशि के स्वामी हैं तथा इनकी महादशा 20 वर्ष की होती है।

दूसरा रहस्य.. शुक्र नीति के प्रवर्तक :शुक्राचार्य महान ज्ञानी के साथ-साथ एक अच्छे नीतिकार भी थे। शुक्राचार्य की कही गई नीतियां आज भी बहुत महत्व रखती हैं। आचार्य शुक्राचार्य शुक्र नीति शास्त्र के प्रवर्तक थे। इनकी शुक्र नीति अब भी लोक में महत्वपूर्ण मानी जाती है।

शुक्राचार्य की कन्या का नाम देवयानी तथा पुत्र का नाम शंद और अमर्क था। इनके पुत्र शंद और अमर्क हिरण्यकशिपु के यहां नीतिशास्त्र का अध्यापन करते थे। ऋग्वेद में भृगुवंशी ऋषियों द्वारा रचित अनेक मंत्रों का वर्णन मिलता है जिसमें वेन, सोमाहुति, स्यूमरश्मि, भार्गव, आर्वि आदि का नाम आता है।

तीसरा रहस्य... माता ख्याति :कहा जाता है कि दैत्यों के साथ हो रहे देवासुर संग्राम में महर्षि भृगु की पत्नी ख्याति, जो योगशक्ति संपन्न तेजस्वी महिला थीं, दैत्यों की सेना के मृतक सैनिकों को जीवित कर देती थीं जिससे नाराज होकर श्रीहरि विष्णु ने शुक्राचार्य की माता व भृगुजी की पत्नी ख्याति का सिर अपने सुदर्शन चक्र से काट दिया।

जम्बूद्वीप के इलावर्त (रशिया) क्षे‍त्र में 12 बार देवासुर संग्राम हुआ। अंतिम बार हिरण्यकशिपु के पुत्र प्रहलाद के पौत्र और विरोचन के पुत्र राजा बलि के साथ इंद्र का युद्ध हुआ और देवता हार गए तब संपूर्ण जम्बूद्वीप पर असुरों का राज हो गया। इस जम्बूद्वीप के बीच के स्थान में था इलावर्त राज्य। हालांकि कुछ लोग मानते हैं कि अंतिम बार संभवत: शम्बासुर के साथ युद्ध हुआ था जिसमें राजा दशरथ ने भी भाग लिया था।

चौथा रहस्य... शुक्राचार्य को याद थी मृत को जिंदा करने की विद्या :इस विद्या के अविष्कार भगवान शंकर थे। ज्ञात हो कि गणेशजी का सिर काट कर हाथी का सिर लगा कर शिव ने गणेश को पुनः जीवित कर दिया था। भगवान शंकर ने ही दक्ष प्रजापति का शिरोच्छेदन कर वध कर दिया था और पुनः अज (बकरे) का सिर लगा कर उन्हें जीवन दान दे दिया।

इस विद्या द्वारा मृत शरीर को भी जीवित किया जा सकता है। यह विद्या असुरों के गुरु शुक्राचार्य को याद थी। शुक्राचार्य इस विद्या के माध्यम से युद्ध में आहत सैनिकों को स्वस्थ कर देते थे और मृतकों को तुरंत पुनर्जीवित कर देते थे। शुक्राचार्य ने रक्तबीज नामक राक्षस को महामृत्युंजय सिद्धि प्रदान कर युद्धभूमि में रक्त की बूंद से संपूर्ण देह की उत्पत्ति कराई थी।

कहते हैं कि महामृत्युंजय मंत्र के सिद्ध होने से भी यह संभव होता है। महर्षि वशिष्ठ, मार्कंडेय और गुरु द्रोणाचार्य महामृत्युंजय मंत्र के साधक और प्रयोगकर्ता थे। संजीवनी नामक एक जड़ी बूटी भी मिलती है जिसके प्रयोग से मृतक फिर से जी उठता है।

मत्स्य पुराण अनुसार शुक्राचार्य ने आरंभ में अंगिरस ऋषि का शिष्यत्व ग्रहण किया किंतु जब वे (अंगिरस) अपने पुत्र बृहस्पति के प्रति पक्षपात दिखाने लगे तब इन्होंने अंगिरस का आश्रम छोड़कर गौतम ऋषि का शिष्यत्व ग्रहण किया। गौतम ऋषि की सलाह पर ही शुक्राचार्य ने शंकर की आराधना कर मृतसंजीवनी विद्या प्राप्त की जिसके बल पर देवासुर संग्राम में असुर अनेक बार जीते।

पांचवां रहस्य... एकाक्षता नाम :माना जाता है कि एक समय जब विष्णु अवतार त्रिविक्रम वामन ने ब्राह्मण बनकर राजा बालि से तीन पग धरती दान में मांगी तो उस वक्त शुक्राचार्य बलि को सचेत करने के उद्देश्य से जलपात्र की टोंटी में बैठ गए। जल में कोई व्याघात समझ कर उसे सींक से खोदकर निकालने के यत्न में इनकी आंख फूट गई। फिर आजीवन वे काने ही बने रहे। तब से इनका नाम एकाक्षता का द्योतक हो गया।

दरअसल भगवान विष्णु ने वामनावतार में जब राजा बलि से तीन पग भूमि मांगी तब शुक्राचार्य सूक्ष्म रूप में बलि के कमंडल में जाकर बैठ गए, जिससे की पानी बाहर न आए और बलि भूमि दान का संकल्प न ले सकें। तब वामन भगवान ने बलि के कमंडल में एक तिनका डाला, जिससे शुक्राचार्य की एक आंख फूट गई। इसलिए इन्हें एकाक्ष यानी एक आंख वाला भी कहा जाता है।

छठा रहस्य... शिव ने निगल लिया था शुक्राचार्य को :गौतम ऋषि की सलाह पर ही शुक्राचार्य ने शंकर की आराधना कर मृतसंजीवनी विद्या प्राप्त की जिसके बल पर देवासुर संग्राम में असुर अनेक बार जीते।

मृत संजीवनी विद्या के कारण दानवों की संख्या बढ़ती गई और देवता असहाय हो गए। ऐसे में उन्होंने भगवान शंकर की शरण ली। शुक्राचार्य द्वार मृत संजीवीनी का अनुचित प्रयोग करने के कारण भगवान शंकर को बहुत क्रोध आया। क्रोधावश उन्होंने शुक्राचार्य को पकड़कर निगल लिया। इसके बाद शुक्राचार्य शिवजी की देह से शुक्ल कांति के रूप में बाहर आए और अपने पूर्ण स्वरूप को प्राप्त किया। तब उन्होंने प्रियवृत की पुत्री ऊर्जस्वती से विवाह कर अपना नया जीवन शुरू किया। उससे उन को चार पुत्र हुए।

सातवां रहस्य.. शुक्राचार्य की पुत्री की प्रसिद्ध कहानी :इक्ष्वाकु वंश के राजा नहुष के छः पुत्र थे- याति, ययाति, सयाति, अयाति, वियाति तथा कृति। याति परमज्ञानी थे तथा राज्य, लक्ष्मी आदि से विरक्त रहते थे इसलिए राजा नहुष ने अपने द्वितीय पुत्र ययाति का राज्यभिषके कर दिया।

एक बार की बात है कि दैत्यराज वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा और गुरु शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी अपनी सखियों के साथ अपने उद्यान में घूम रही थी। शर्मिष्ठा अति सुन्दर राजपुत्री थी, तो देवयानी असुरों के महा गुरु शुक्राचार्य की पुत्री थी। दोनों एक दूसरे से सुंदरता के मामले में कम नहीं थी। वे सब की सब उस उद्यान के एक जलाशय में, अपने वस्त्र उतार कर स्नान करने लगीं।

उसी समय भगवान शंकर पार्वती के साथ उधर से निकले। भगवान शंकर को आते देख वे सभी कन्याएं लज्जावश से बाहर निकलकर दौड़कर अपने-अपने वस्त्र पहनने लगीं। शीघ्रता में शर्मिष्ठा ने भूलवश देवयानी के वस्त्र पहन लिए। इस पर देवयानी अति क्रोधित होकर शर्मिष्ठा से बोली, 'रे शर्मिष्ठा! एक असुर पुत्री होकर तूने ब्राह्मण कन्या का वस्त्र धारण करने का साहस कैसे किया? तूने मेरे वस्त्र धारण करके मेरा अपमान किया है।'

देवयानी के अपशब्दों को सुनकर शर्मिष्ठा अपने अपमान से तिलमिला गई और देवयानी के वस्त्र छीन कर उसे एक कुएं में धकेल दिया। देवयानी को कुएं में धकेल कर शर्मिष्ठा के चले जाने के पश्चात् राजा ययाति आखेट करते हुए वहां पर आ पहुंचे और अपनी प्यास बुझाने के लिए वे कुएं के निकट गए तभी उन्होंने उस कुएं में वस्त्रहीन देवयानी को देखा।

जल्दी से उन्होंने देवयानी की देह को ढंकने के लिए अपने वस्त्र दिए और उसको कुएं से बाहर निकाला। इस पर देवयानी ने प्रेमपूर्वक राजा ययाति से कहा, 'हे आर्य! आपने मेरा हाथ पकड़ा है अतः मैं आपको अपने पति रूप में स्वीकार करती हूं। हे क्षत्रियश्रेष्ठ! यद्यपि मैं ब्राह्मण पुत्री हूं किन्तु बृहस्पति के पुत्र कच के शाप के कारण मेरा विवाह ब्राह्मण कुमार के साथ नहीं हो सकता। इसलिए आप मुझे अपने प्रारब्ध का भोग समझ कर स्वीकार कीजिए।' ययाति ने प्रसन्न होकर देवयानी के इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया।

देवयानी वहां से अपने पिता शुक्राचार्य के पास आई तथा उनसे समस्त वृत्तांत कहा। शर्मिष्ठा के किए हुए कर्म पर शुक्राचार्य को अत्यन्त क्रोध आया और वे दैत्यों से विमुख हो गए। इस पर दैत्यराज वृषपर्वा अपने गुरुदेव के पास आकर अनेक प्रकार से मान-मनोन्वल करने लगे।

बड़ी मुश्किल से शुक्राचार्य का क्रोध शान्त हुआ और वे बोले, 'हे दैत्यराज! मैं आपसे किसी प्रकार से रुष्ठ नहीं हूं किन्तु मेरी पुत्री देवयानी अत्यन्त रुष्ट है। यदि तुम उसे प्रसन्न कर सको तो मैं पुनः तुम्हारा साथ देने लगूंगा।'

वृषपर्वा ने देवयानी को प्रसन्न करने के लिए उससे कहा, 'हे पुत्री! तुम जो कुछ भी मांगोगी मैं तुम्हें वह प्रदान करूंगा।' देवयानी बोली, 'हे दैत्यराज! मुझे आपकी पुत्री शर्मिष्ठा दासी के रूप में चाहिए।' अपने परिवार पर आए संकट को टालने के लिए शर्मिष्ठा ने देवयानी की दासी बनना स्वीकार कर लिया।

शुक्राचार्य ने अपनी पुत्री देवयानी का विवाह राजा ययाति के साथ कर दिया। शर्मिष्ठा भी देवयानी के साथ उसकी दासी के रूप में ययाति के भवन में आ गई। देवयानी के पुत्रवती होने पर शर्मिष्ठा ने भी पुत्र की कामना से राजा ययाति से प्रणय निवेदन किया जिसे ययाति ने स्वीकार कर लिया। राजा ययाति के देवयानी से दो पुत्र यदु तथा तुवर्सु और शर्मिष्ठा से तीन पुत्र द्रुह्यु, अनु तथा पुरु हुए।

बाद में जब देवयानी को ययाति तथा शर्मिष्ठा के संबंध के विषय में पता चला तो वह क्रोधित होकर अपने पिता के पास चली गई। शुक्राचार्य ने राजा ययाति को बुलवाकर कहा, 'रे ययाति! तू स्त्री लम्पट है। इसलिए मैं तुझे शाप देता हूं तुझे तत्काल वृद्धावस्था प्राप्त हो।'

उनके शाप से भयभीत हो राजा ययाति गिड़गिड़ाते हुए बोले, 'हे दैत्य गुरु! आपकी पुत्री के साथ विषय भोग करते हुए अभी मेरी तृप्ति नहीं हुई है। इस शाप के कारण तो आपकी पुत्री का भी अहित है।' तब कुछ विचार कर के शुक्रचार्य जी ने कहा, 'अच्छा! यदि कोई तुझे प्रसन्नतापूर्वक अपनी यौवनावस्था दे तो तुम उसके साथ अपनी वृद्धावस्था को बदल सकते हो।'

इसके पश्चात् राजा ययाति ने अपने ज्येष्ठ पुत्र से कहा, 'वत्स यदु! तुम अपने नाना के द्वारा दी गई मेरी इस वृद्धावस्था को लेकर अपनी युवावस्था मुझे दे दो।' इस पर यदु बोला, 'हे पिताजी! असमय में आई वृद्धावस्था को लेकर मैं जीवित नहीं रहना चाहता। इसलिये मैं आपकी वृद्धावस्था को नहीं ले सकता।'

ययाति ने अपने शेष पुत्रों से भी इसी प्रकार की मांग की, लेकिन सभी ने कन्नी काट ली। लेकिन सबसे छोटे पुत्र पुरु ने पिता की मांग को स्वीकार कर लिया।

पुनः युवा हो जाने पर राजा ययाति ने यदु से कहा, 'तूने ज्येष्ठ पुत्र होकर भी अपने पिता के प्रति अपने कर्तव्य को पूर्ण नहीं किया। अतः मैं तुझे राज्याधिकार से वंचित करके अपना राज्य पुरु को देता हूं। मैं तुझे शाप भी देता हूं कि तेरा वंश सदैव राजवंशियों के द्वारा बहिष्कृत रहेगा।'

आठवां रहस्य... संगीतज्ञ और कवि थे शुक्राचार्य :शुक्राचार्य को श्रेष्ठ संगीतज्ञ और कवि होने का भी गौरव प्राप्त है। भागवत पुराण के अनुसार भृगु ऋषि के कवि नाम के पुत्र भी हुए जो कालान्तर में शुक्राचार्य नाम से प्रसिद्ध हुए। महाभारत के अनुसार शुक्राचार्य औषधियों, मन्त्रों तथा रसों के भी ज्ञाता हैं। इनकी सामर्थ्य अद्भुत है। इन्होंने अपनी समस्त सम्पत्ति अपने शिष्य असुरों को दे दी और स्वयं तपस्वी-जीवन ही स्वीकार किया।

नौवां रहस्य... शुक्राचार्य का शुक्राचार्य नाम कैसे पड़ा :कवि या भार्गव के नाम से प्रसिद्ध शुक्राचार्य का शुक्र नाम कैसे पड़ा इस संबंध में वामन पुराण में विस्तार से उल्लेख मिलता है।

कथा अनुसार जब शुक्राचार्य को शंकर भगवान निगल जाते हैं तब शंकरजी के उदर में जाकर कवि (शुक्राचार्य) ने शंकर भगनान की स्तुति प्रारंभ कर दी जिससे प्रसन्न हो कर शिव ने उन को बाहर निकलने कि अनुमति दे दी। जब वे एक दिव्य वर्ष तक महादेव के उदर में ही विचरते रहे लेकिन कोई छोर न मिलने पर वे पुनः शिव स्तुति करने लगे। तब भगवान शंकर ने हंस कर कहा कि मेरे उदर में होने के कारण तुम मेरे पुत्र हो गए हो अतः मेरे शिश्न से बाहर आ जाओ। आज से समस्त चराचर जगत में तुम शुक्र के नाम से ही जाने जाओगे। शुक्रत्व पाकर भार्गव भगवान शंकर के शिश्न से निकल आए। तब से कवि शुक्राचार्य के नाम से विख्यात हुए।

दसवां रहस्य... क्या शुक्राचार्य अरब चले गए थे? :इस बात में कितनी सचाई है यह हम नहीं जानते। शुक्राचार्य को प्राचीन अरब के धर्म और संस्कृति का प्रवर्तक माना जाता है हालांकि इस पर विवाद है। कुछ विद्वानों का मानना है कि अरब को पहले पाताल लोक की संज्ञा दी गई थी। गुजरात के समुद्र के उस पार पाताल लोक होने की कथा पुराणों में मिलती है।

गुजरात के समुद्री तट पर स्थित बेट द्वारका से 4 मील की दूरी पर मकरध्वज के साथ में हनुमानजी की मूर्ति स्थापित है। अहिरावण ने भगवान श्रीराम-लक्ष्मण को इसी स्थान पर छिपाकर रखा था। जब हनुमानजी श्रीराम-लक्ष्मण को लेने के लिए आए, तब उनका मकरध्वज के साथ घोर युद्ध हुआ। अंत में हनुमानजी ने उसे परास्त कर उसी की पूंछ से उसे बांध दिया। उनकी स्मृति में यह मूर्ति स्थापित है। मकरध्वज हनुमानजी का पुत्र था।

माना जाता है कि जब राजा बलि को पाताल लोक का राज बना दिया गया था तब शुक्राचार्य भी उनके साथ चले गए थे। दूसरी मान्यता अनुसार दैत्यराज बलि ने शुक्राचार्य का कहना न माना तो वे उसे त्याग कर अपने पौत्र और्व के पास अरब में आ गए और दस वर्ष तक वहां रहे।

शुक्राचार्य के पौत्र का नाम और्व/अर्व या हर्ब था, जिसका अपभ्रंश होते होते अरब हो गया। अरब देशों का महर्षि भृगु के पुत्र शुक्राचार्य तथा उनके पौत्र और्व से ऐतिहासिक संबंध के बारे में 'हिस्ट्री ऑफ पर्शिया' में उल्लेख मिलता है जिसके लेखक साइक्स हैं।

Thursday, 8 March 2018

नई स्त्री की पुरानी कहानी

भारत जैसा देश जहां धरती, नदियों व गाय को मां कहकर संबोधित किया जाता है, उसी देश में मां का अपमान यानी स्त्री का अपमान भी खुलेआम होता है।
कहने को तो वक्त की करवट के साथ स्त्री के जीवन में बहुत कुछ बदला है। फिर उसका रहन-सहन हो, सोच-विचार या फिर उसकी सीमाओं के दायरे। दायरे फैले जरूर हैं, सीमाएं टूटी जरूर हैं लेकिन सीमाएं मिटी नहीं हैं। कुछ हद तक सीमाओं का व सीमाओं में स्त्री का रहना उचित है परंतु दुख की बात यह है कि यह सीमाएं भी पुरुष तय करता है। स्त्री के जीवन में स्त्री का हंसना-बोलना, उसकी 'हां'- 'ना' यहां तक कि पसंद-नापसंद आदि भी सभी कुछ पुरुष तय करता है। इन सबसे स्त्री को तकलीफ होती है, उसका दम घुटता है परंतु आत्मा तब और छलनी हो जाती है जब पुरुष सब कुछ तय करने के बाद स्त्री से पूछता है और कहता है तुम कैसी हो? तुम क्या चाहती हो? तुम खुश तो हो न? मैं तुम्हें खुश देखना चाहता हूं।
स्त्री की यह पुरानी कहानी आज 21वीं सदी में भी उतनी ही नई है।

बिस्तर से दफ्तर तक, हृदय से आसमान तक और चुप्पी से नारेबाजी तक का सफर तय करने वाली स्त्री आज भी सोचने, विचारने और स्त्री दिवस मनाने का ही नाम बनकर रह गई है। जहां एक ओर स्त्री विमर्श पर ढेरों किताबें लिखी जा रही हैं वहीं दूसरी ओर महिला दिवस का विज्ञापन अखबारों में अपनी जगह ढूंढने का वर्षभर इंतजार करता रहता है। तब किसी समाज को, देश को खबर लगती है कि स्त्री का भी मत है, उसका भी मन है, उसकी भी इच्छाएं हैं, उसको भी सम्मानित करना है।
आनंद और उमंग की प्रतीक स्त्री, जो स्वयं में एक उत्सव है, जिसका इस धरा पर होना किसी महोत्सव से कम नहीं, उसे भी अपना वजूद महिला दिवस के रूप में मनाना पड़ता है। परंतु पुरुषों का कोई 'मेन्स डे' नहीं चुना गया। शायद इसलिए क्योंकि हर दिन पुरुष का दिन होता है या फिर पुरुषों में ऐसा कुछ भी नहीं कि उनकी उपस्थिति को मनाया जाए।
भले ही समय को हम सतयुग और कलयुग के आधार पर बांटते हों, पर स्त्री के लिए समय की यह सीमा और परिभाषा कुछ मायने नहीं रखती।
देवों ने अपनी वासना के लिए स्त्री का हरण किया हो या राजा-महाराजाओं ने अपनी हवस व रुतबे के लिए स्त्री को जीता हो। बहाने कुछ भी हों, स्त्री कई कारणों से आज भी लुट रही है। भारत जैसा देश जहां धरती, नदियों व गाय को मां कहकर संबोधित किया जाता है, उसी देश में मां का अपमान यानी स्त्री का अपमान भी खुलेआम होता है।
इतना ही नहीं हमारे धार्मिक शास्त्र व ग्रंथ भी पुरुष के मान-सम्मान एवं अभिमान के बखान से भरे पड़े हैं। यहां मर्यादा पुरुषोत्तम राम की चर्चा तो होती है परन्तु सीता के त्याग एवं पवित्रता का कोई बखान नहीं होता। यहां लक्ष्मण और भरत के त्याग और समर्पण का जिक्र तो होता है पर उर्मिला व माण्डवी के त्याग व समर्पण का कोई चिह्न नहीं मिलता।
स्त्री से उसकी इच्छा, उसकी मर्जी या उसका मत कभी नहीं जाना जाता। वह क्या चाहती है, क्यों चाहती है या वह क्या और क्यों नहीं चाहती, यह सब पुरुष पर ही निर्भर करता आया है। न तो लक्ष्मण ने उर्मिला की सोची और न ही बुद्ध ने यशोधरा की। राम-रावण युद्ध से लक्ष्मण उभर गए तो बुद्धत्व को प्राप्त कर बुद्ध निखर गए। इसी बीच उर्मिला और यशोधरा का योगदान, उनकी पीड़ा व टीस का कोई खास ब्योरा नहीं मिलता।
दुनिया यह तो जानती है कि राम ने अपने चरणों के स्पर्श से एक पत्थर को जिंदा कर दिया था यानी पत्थर की मूर्ति बनी अहिल्या को उन्होंने पुन: सशरीर कर दिया था। राम के इस शक्ति रूप की तो बहुत चर्चा है पर अहिल्या पाषाण में क्यों तब्दील हुई, यह गिने-चुने लोग ही जानते होंगे। कितने अचरज की बात है एक स्त्री को पत्थर से स्त्री में परिवर्तित करने वाले का तो जिक्र है परन्तु एक स्त्री को पत्थर बना देने वाले पुरुष का कोई जिक्र नहीं है। अहिल्या पाषाण क्यों हुई? इसके पाषाण होने के जिम्मेदार भी पुरुष ही हैं। क्योंकि इंद्र ने अहिल्या के पति का रूप धरकर उसके साथ छल किया, जिसके चलते अहिल्या के पति गौतम ऋषि ने अहिल्या को श्राप दे दिया। छला भी पुरुष ने, श्राप भी पुरुष ने दिया, पर इनका कोई जिक्र नहीं, बस जिस पुरुष ने तार दिया उसको हमने महात्मा बना दिया और वह स्त्री जो पत्थर बनकर प्रतीक्षा में घुलती रही, उसको हमने पतित बना दिया।
देवताओं के इस देश में जहां श्रीराम ने अपने नाम से पूर्व सीता माता अर्थात् सिया राम का नाम लेने को कहकर और श्री कृष्ण ने अपने नाम से पहले राधा रानी अर्थात् राधेश्याम का नाम लेने को कहकर, स्त्री को सम्मानित तो किया परंतु वहीं देवताओं ने किसी भी मंगल कार्य एवं पूजा आदि में पुरुष देवता यानी गणेश जी को ही प्रथम पूजनीय माना, तब भी प्राथमिकता कहीं न कहीं पुरुष को ही मिली।
कला एवं साहित्य के क्षेत्र में देखें तो पुरुषों ने स्त्री जीवन के, उसके सौंदर्य के ढेर लगा रखे हैं, कैनवासों पर, मंदिरों की दीवारों पर स्त्रियों की तस्वीरें-मूर्तियां अंकित कर रखी हैं। पुरुष की भीतर से भीतर तक की वासना में स्त्री सबसे पहले आती है। यही नहीं रामायण एवं गीता जैसे महान ग्रंथ जिनकी हम पूजा करते व मिसाल देते हैं उनका जन्म भी कहीं न कहीं प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से सीता एवं द्रौपदी नामक स्त्रियों से ही संबंध रखता है। स्त्री, जो सदा से, सदियों एवं युगों से मुख्य रही है उसे पुरुष ने कभी मुख्य नहीं होने दिया। यदि पुरुष ने स्त्री को कभी आदर भी दिया है या पूजा भी की है तो वह है उसका 'मां' का रूप।
पर सच तो यह है स्त्री मां होने से पहले भी कुछ है, वह है उसका स्त्री होना। अब तक स्त्री को मां, बेटी, बहन एवं पत्नी आदि रूपों में जोड़कर ही देखा गया है। उसकी पहचान ही इन रिश्तों से है। स्त्री की एक पूरी खिलावट भी है जो उसके स्त्री होने में ही उभरकर आती है। बाकी इन रिश्तों में तो स्त्री खंडित हो जाती है। बंधी-बंधी और बंटी-बंटी जीती है। स्त्री को स्त्री के रूप में देखना व स्वीकारना बहुत जरूरी है जिसे आज तक नहीं देखा गया।
कहते हैं बातूनी होना स्त्री का स्वभाव है और पेट में बातों को न पचा पाना स्त्री की आदत। जहां दो स्त्रियां मिली नहीं कि बातें दो की चार हो ही जाती हैं। पर क्या इतनी बातों में कभी स्त्री अपने दिल की बात कह पाती है? क्या वो, जो और जितना कहती है उससे स्वयं को हल्का कर पाती है? सच तो यह है स्त्री बोलती बहुत है पर कह कुछ नहीं पाती। रोती तो बहुत है पर कभी बह नहीं पाती। बस लदी रहती है अपनी कश्मकश से और जूझती रहती है भीतर अटके शब्दों के साथ।
स्त्री भले ही स्वयं को लाख बहानों में उलझाए या हजार जिम्मेदारियों में खुद को व्यस्त रखे पर स्वयं को फिर भी कई बार तन्हा पाती है। बात बनाने में माहिर स्त्री दर्द में सुकून तलाशना सीख जाती है? पर बात कहने में हार जाती है। उसे कभी न कहने का दुख सताता है, तो कभी कहकर न समझ पाने की उलझन सताती है। स्त्री लिपटी रहती है इंतजार में और निभाती रहती है दस्तूर। कोशिशों में रोज इजाफा होता है, उम्मीदें रोज नसीहत देती हैं और ख्वाहिशें दिन-रात का मुआना करके आंखों में सबक लेकर लौट आती हैं। न कहने का जरिया बनता है न खुद को स्वीकारने की मोहलत। बस मन हल्का होने को छटपटाता रहता है। अंदाजा लगाता रहता है सही-गलत का, तोलता रहता है पाप और पुण्य को। आंसू हैं कि नापते नहीं थकते होंठों से आंखों की दूरी और खामोशी है कि होंठों से पसीजने का नाम नहीं लेती। इस बीच स्त्री का कुछ-कुछ नहीं बहुत कुछ अनकहा रह जाता है और स्त्री हमेशा की तरह किसी पुरानी कहानी का नया किरदार बनकर ही रह जाती है।