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Monday, 25 April 2016

भारतीय वामपंथी - 1962 युद्ध में कर रहे थे चीन का समर्थन, कई हुए थे गिरफ्तार





1962 ये वो साल था जब चीन ने भारत पर रातोंरात हमला कर दिया था, इस युद्ध में भारत के हज़ारो जवानो के अपने प्राणों की आहुति दी, इस युद्ध के बारे में हम काफी कुछ जानते है पर उस समय भारत के वामपन्थी क्या कर रहे थे !

आपको जान कर हैरानी होगी की वामपंथियों के गढ़ केरल में कई वामपंथी नेताओं को 1962 के युद्ध के बाद किया गया था गिरफ्तार, कई वामपंथी नेता बंगाल में भी किये गए थे गिरफ्तार

दरअसल चीन एक वामपंथी देश है और भारत के वामपंथी चीन को अपना गुरु मानते है, 1962 युद्ध के समय देश में वामपंथी नेता चीन के पक्ष में बयानबाजी करते थे भारत की बुराई करते थे

अब नक्सली जो भारत में आतंक मचाते है वो सब भी वामपंथी ही हैं और चीन से पैसा और हथियार पाते है, किसी भी युद्ध की परिस्तिथि में माओवादी/वामपंथी भारत के खिलाफ ही जंग छेड़ देंगे

जिस तरह भारत के वामपंथी सेना को बलात्कारी, कश्मीर की आज़ादी, हिन्दुओ से नफरत के कार्यक्रम चलाते रहते है भविष्य में ये वामपंथी देश के लिए बड़ा ख़तरा जरूर सिद्ध होंगे, इन लोगों का काला इतिहास भी ये बात बताता है।


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Sunday, 24 April 2016

सिंहस्थ महाकुंभ में दिखेगा 7 टन का त्रिशूल जानिये ख़ास बाते

सिंहस्थ महाकुंभ में दिखेगा 7 टन का                 त्रिशूल जानिये ख़ास बाते
5 अप्रैल, मंगलवार को पहली पेशवाई जूना अखाड़ा की निकलेगी, इसके साथ ही मध्य प्रदेश के उज्जैन में सिंहस्थ महाकुंभ 2016 का आगाज हो जाएगा। पेशवाई का स्वागत करने मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान भी यहां पहुंचेंगे। श्री चौहान क्षिप्रा तट स्थित जूना अखाड़े में करीब 7 टन वजनी स्टील से बने विशालकाय त्रिशूल का लोकार्पण भी इस अवसर पर करेंगे।


1. यह त्रिशूल नासिक से बन कर उज्जैन आया है।
2. इसकी कीमत लगभग 20 लाख रुपए है।
3. इसकी लंबाई करीब 131 फीट है।
4. यह स्टेनलेस स्टील से बना है।
5. इस त्रिशूल के साथ डमरू भी है, वह स्टील से बना है।
6. इसका डमरू और त्रिशूल नासिक में बना है और राड बजाज कंपनी से तैयार कराया गया है।
                                  क्या है प्रवेशाई?
प्रवेशाई का मतलब सिंहस्थ क्षेत्र में प्रवेश है। ऐसा माना जाता है कि इस दौरान देवता भी सिंहस्थ में शामिल होते हैं।
– श्रीमहंत हरि गिरि के मुताबिक, सिंहस्थ में बनने वाले योग में देवता भी शामिल होते हैं। देवताओं के राजा इंद्र हैं। राजा के दरबार में देवता विराजते हैं। देवताओं के दर्शन, पूजन और गुरुओं के दर्शन के लिए साधु-संतों का आगमन होता है।

प्रवेशाई नीलगंगा से शुरू होकर तीन बत्ती चौराहा, टावर, चामुंडा चौराहा, देवासगेट, मालीपुरा, दौलतगंज, नई सड़क और कंठाल पहुंचेगी। इसके बाद गोपाल मंदिर, पटनीबाजार, गुदरी, महाकाल, हरसिद्धि, रामानुजकोट, दानीगेट, छोटी रपट होकर दत्त अखाड़ा और वहां से भूखी माता रोड जाएगी। प्रवेशाई महाकाल, हरसिद्धि मंदिर और दत्त अखाड़ा पर रुकेगी। अखाड़े में पीर संध्या पुरीजी की समाधि पर पूजा की जाएगी।

                         ये हैं त्रिशूल से जुड़ी खास बातें

                   इन जगहों से निकलेगी प्रवेशाई

Saturday, 23 April 2016




बाबरी मस्जिद विध्वंश पर भड़के दंगे को शांत करेगें                               अजय देवगन



अजय देवगन आजाद भारत के इतिहास में सबसे ज्यादा संवेदनशील और विवादास्पद बाबरी मस्जिद के विध्वंश पर बनने वाली फिल्म में अजय देवगन नजर आएंगे। 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद के ढहा दिए जाने के बाद देशभर में दंगे भड़क उठे थे। अभी ये मामला कोर्ट में है और कोई भी इस पर कुछ कहने से बचना चाहता है। अब ये सारा वाक्या बड़े पर्दे पर दिखेगा।
डीएमए की खबर के अनुसार, इस फिल्म का नाम कबीर हो सकता है। फिल्म में कबीर के रोल में अजय देवगन नजर आएंगे। 'बाहुबली' और 'बजरंगी भाईजान' जैसी फिल्में लिख चुके विजेन्द्र प्रसाद फिल्म को निर्देशित करेंगे जबकि इसके प्रोड्यूसर सेंसर चीफ पहलाज निहलानी होंगे।बताया गया है कि ये ऐसे शख्स की कहानी है, जो 1992 में दंगे भड़कने के बाद अकेले ही इस आग को बुझा लेने की ठान लेता है।
अजय देवगन का फिल्म में यही किरदार होगा। माना जा रहा है कि फिल्म 1992 के घटनाक्रम के कुछ अनदेखे पहलू भी सामने लाएगी, जिस सच से लोग अंजान हैं। हालांकि इसको लेकर कुछ सवाल भी उठ रहे हैं।इस फिल्म के विषय और पहलाज निहलानी की मौजूदा सरकार से करीबी को देखते हुए फिल्म के सरकार के पक्ष में होंने का अंदाजा लगाया जा रहा है। वैसे अभी बहुत ज्यादा पुख्ता जानकारी फिल्म के बारे में सामने नहीं आई है।
विज्ञान के लिए पहेली है यह पत्थर : सात हाथी भी 

नहीं हिला सके



विज्ञान के लिए पहेली है यह पत्थर : सात हाथी भी नहीं हिला सके

भगवान कृष्ण की लीला अद्भुत है। आज भी श्रीकृष्ण से जुड़े ऐसे कई स्थान हैं, जिनका रहस्य विज्ञान भी नहीं सुलझा पाया है। कृष्ण की बटर बॉल नाम से प्रसिद्ध एक चट्टान ऐसी ही एक अद्भुत पहेली है। यह विशाल चट्टान है, जो चेन्नई के निकट महाबलिपुरम में स्थित है।

विशाल गोले जैसी आकृति की यह चट्टान एक ढलान वाली पहाड़ी पर है। ढलान के बावजूद यह अपने स्थान पर अटल है। इसे श्रीकृष्ण का बटर बॉल कहा जाता है। मान्यता है कि यह चट्टान स्वर्ग से यहां आई थी। यह कृष्ण के प्रिय मक्खन का स्वरूप है।



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पत्थर की ऊंचाई करीब 20 फीट है। ढलान पर स्थिति होने एवं काफी वजनी होने के बाद भी यह अपनी जगह से नहीं हिलती। इस प्रकार यह भौतिकी के नियमों को चुनौती देती प्रतीत हो रही है।
जब लोग इसे देखते हैं तो ऐसा लगता है कि यह किसी भी क्षण ढलान से नीचे आ जाएगी, परंतु काफी वर्षों के बाद भी यह अपनी जगह बरकरार है। ऐसा क्यों है? इसके पीछे कई अनुमान लगाए जाते हैं।
हर कोशिश पर भारी- कहा जाता है कि दक्षिण भारत पर राज करने वाले पल्लव राजवंश ने इस पत्थर को यहां से हटाने के लिए प्रयास किया था, परंतु उन्हें सफलता नहीं मिली। इसी प्रकार 1908 में मद्रास के गर्वनर ने इसे यहां से हटाने का हुक्म दिया, जिसके लिए सात हाथियों की मदद ली गई, लेकिन हाथियों का जोर भी इसे यहां से हिला नहीं सका।
आज भी यह पत्थर अपने स्थान पर है और लोग इसे दूर-दूर से देखने आते हैं। लोग इसे हिलाने के लिए जोर आजमाइश करते हैं। वहीं यह पत्थर उनकी हर कोशिश पर भारी पड़ता है। 

सात महामानव जो हजारों वर्षों से हैं जीवित

ये है वो सात महामानव जो हजारों वर्षों से हैं जीवित


7 mahamanav of hindu dhram
भारतीय हिंदू इतिहास, पुराण और प्रमुख ग्रंथो के अनुसार इस दुनिया मैं ऐसे सात व्यक्ति हैं जो चिरंजीवी हैं। मतलब इन्हे अमरता का वरदान प्राप्त है ये सभी दिव्य और आलोकिक शक्तियों से पूर्ण संपन्न हैं और ये महामानव या महापुरुष किसी न किसी वचन या शाप से बंधे हुए हैं। हिन्दू इतिहास के अनुसार योग में जिन अष्ट सिद्धियों की बात कही या लिखी गई है वे सारी अदभुद शक्तियाँ इनके पास हैं। यह एक परामनोविज्ञान जैसा है। अगर हम इसे सत्य माने तो ये दुनिया का एक अदभुत आश्चर्य है। वैसे आपकी जानकारी के लिए हम ये भी बताते चले की विज्ञान इसे नहीं मानता, परन्तु योग और आयुर्वेद कुछ हद तक इससे सहमत हो सकता है परन्तु जहाँ हजारों वर्षों की बात हो वहां यह योगाचार्यों और वैज्ञानिको के लिए भी शोध का विषय बन जाता है। यह बात संसार के सात आश्चर्यों की तरह है। आइए   देखें कि हिंदू धर्म के अनुसार कौन-कौन हैं ये सात जीवित महामानव

राजा बलि : 
बलि के दान के चर्चे बहुत दूर-दूर तक थे। राजा बलि सतयुग में भगवान वामन अवतार के समय हुए थे। देवताओं पर विजय कर बलि ने इंद्रलोक पर अधिकार कर लिया था। बलि के उस घमंड को चूर करने के लिए भगवान विष्णु ने ब्राह्मण का वेश धारण कर राजा बलि से तीन पग धरती दान में माँगी। बलि ने कहा कि जहाँ आपकी इच्छा हो तीन पग धरती ले लो। तब भगवान ने अपना विराट और विशाल देविये रूप धारण कर दो पगों में तीनों लोक नाप लिए और तीसरा पग बलि के सिर पर रखकर उसे पाताल लोक भेज दिया। तब से राजा बाली पाताल लोक मैं जीवित है और व्ही राज कर रहा है 


परशुराम : 
ब्रह्माण्ड के महान ऋषि परशुराम के पिता का नाम जमदग्नि और माता का नाम रेणुका है। रेणुका ने पाँच पुत्रों को जन्म दिया जिनके नाम वसुमान, वसुषेण, वसु, विश्वावसु तथा राम रखे गए। राम की घोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान सदा शिव ने उन्हें एक देवीय फरसा दिया था। इसीलिए उनका नाम भगवान परशुराम हो गया। परशुराम विष्णु के छठे अवतार माने जाते हैं। इनका प्रादुर्भाव वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को हुआ, इसलिए उक्त तिथि अक्षय तृतीया कहलाती है। इनका जन्म समय सतयुग और त्रेता काल का संधिकाल माना जाता है।

हनुमान (बजरंग बलि) :
 
हनुमान जी को भी अजर-अमर रहने का वरदान मिला था। भगवान श्री राम के परम भक्त हनुमान हजारों वर्षों बाद महाभारत काल में भी नजर आते हैं। ऐसा महाभारत में प्रसंग हैं कि जब महा बलशाली भीम ने उनकी पूँछ को मार्ग से हटाने के लिए कहा तो हनुमानजी ने भीम से उसे खुद ही हटा लेने को कहा लेकिन अपनी पूरी ताकत लगाकर भी बलशाली भीम उनकी पूँछ नहीं हटा पाए।
विभीषण : 
रावण के भाई विभीषण ने भगवान राम के नाम की महिमा और ताकत समझकर अपने भाई के विरु‍द्ध लड़ाई में भगवान राम का साथ दिया और जीवन भर राम-नाम जपते रहे। उन्हें भी अजर-अमर रहने का वरदान है। भगवान श्रीराम ने उन्हें यह वरदान दिया था।

ऋषि व्यास : 
ऋषि पराशर एवं सत्यवती के पुत्र तथा पूर्ण महाभारत के रचयिता महान ऋषि व्यास साँवले रंग के थे। वेदव्यास यमुना के बीच स्थित एक द्वीप में उत्पन्न हुए थे। अपने साँवले रंग के कारण ये 'कृष्ण' तथा जन्म स्थान के कारण 'द्वैपायन' कहलाए। इनकी माता सत्यवती  ने बाद में शान्तनु से विवाह किया जिनसे उनके दो अन्य पुत्र भी हुए। इनमें चित्रांगद युद्ध में मारा गया और छोटा विचित्र वीर्य संतानहीन मर गया। और कृष्ण द्वैपायन ने धार्मिक तथा वैराग्य का जीवन पसंद किया माता के आग्रह पर इन्होंने विचित्रवीर्य की दोनों सन्तानहीन रानियों द्वारा नियोग के नियम से दो पुत्र उत्पन्न किए जो धृतराष्ट्र तथा पाण्डु कहलाए। वैसे इनमें तीसरे विदुर भी थे।

अश्वत्थामा : 
महावीर अश्वथामा कौरवो के गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र हैं। इनके माथे पर एक अमरमणि है। इसीलिए वह अमर हैं। महाभारत मैं ब्रह्मास्त्र चलाने के कारण भगवान श्री कृष्ण ने उन्हें शाप दिया था कि कालांतर तक तुम इस धरती पर जीवित रहोगे। इसीलिए अश्वत्थामा सात चिरन्जीवियों या अमर लोगो में गिने जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि वे आज भी जीवित हैं कुरुक्षेत्र एवं अन्य तीर्थों में यदा-कदा उनके दिखाई देने के दावे किए जाते रहे हैं। मध्य प्रदेश के बुरहानपुर के किले में उनके दिखाई दिए जाने की घटना भी प्रचलित है।

गुरु कृपाचार्य : 
शरद्वान् गौतम के एक प्रसिद्ध पुत्र हुए हैं कृपाचार्य। कृपाचार्य अश्वथामा के मामा तथा कौरवों के कुलगुरु थे। शिकार खेलते हुए शांतनु को दो शिशु प्राप्त हुए। उन दोनों का नाम कृपी और कृप रखकर शांतनु ने उनका लालन-पालन किया। महाभारत युद्ध में कृपाचार्य कौरवों की ओर से सक्रिय थे।

ऋषि मार्कंडेय
ये भगवान शिव के बहुत बड़े भक्त थे, इनकी भक्ति से खुश होकर भगवान शिव नें इन्हें अपनी 12 वर्ष की आयु दे दी थी|



72 करोड़ थी रावण की सेना फिर भी 8 दिन ही                 चला था रामायण का युद्ध!




अश्विन शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को शुरू हुआ था रामायण का युद्ध, दशहरे के दिन यानि दशमी को रावण वध के साथ ही समाप्त हो गया था. पढ़ने वालो को लगता है की ये तो रातो रात ही हो गया लेकिन वो रात कितनी लम्बी थी इसका अंदाजा आप और मैं नही सिर्फ देवता ही लगा सकते है.

इस बात का अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है की रावण की सेना की संख्या 720000000 ( बहत्तर करोड़) थी, इसके बावजूद भी सिर्फ वानरों की सेना के सहारे ही भगवान राम ने सिर्फ आठ दिन में ही युद्ध समाप्त कर रावण का वध किया. 

युद्ध में एक बार श्री राम और दो बार लक्ष्मण हार गए थे, लेकिन फिर भी रावण ने मर्यादा रखी और मूर्छित और युद्ध से अपहृत ही राम सेना पर आक्रमण नही किया था. 


रावण की सेना में उसके सात पुत्र और कई भाई सेना नायक थे इतना ही नहीं रावण के कहने पर उसके भाई अहिरावण और महिरावण ने भी श्री राम और लक्ष्मण का छल से अपहरण कर खात्मे की कोशिश की थी. रावण स्वयं दशग्रीव था और उसके नाभि में अमृत होने के कारन लगभग अमर था.

रावण का पुत्र मेघनाद ( जन्म के समय रोने की नहीं बल्कि मुख से बदलो की गरज की आवाज आई थी) को स्वयं ब्रह्मा ने इंद्र को प्राण दान देने पर इंद्रजीत का नाम दिया था. ब्रह्मा ने उसे वरदान भी मांगने बोला तब उसने अमृत्व माँगा पर वो न देके ब्रह्मा ने उसे युद्ध के समय अपनी कुलदेवी का अनुष्ठान करने की सलाह दी, जिसके जारी रहते उसकी मृत्यु असंभव थी.

रावण का पुत्र अतिक्या जो की अदृश्य होने युद्ध करता था, अगर उसकी मौत का रहस्य देवराज इंद्र लक्ष्मण को न बताते तो उसकी भी मृत्यु होनी असंभव थी. रावण का भाई कुम्भकरण जिसे स्वयं नारद मुनि ने दर्शन शाश्त्र की शिक्षा दी थी, उससे इंद्र भी ईर्ष्या करता था ये जान कर की वो अधर्म के पक्ष में है भाई के मान के लिए अपनी आहुति दी थी.


अदृश्य इंद्रजीत के बाण से लक्ष्मण का जीवित रहना असंभव था, ये सोच कर ही श्रीराम का दिल बैठ रहा था की वो अयोध्या में अपनी माँ से कैसे नज़ारे मिलाएंगे, उनका कलेजा बैठ गया था. लक्ष्मण अगले दिन का सूर्य न देखते अगर हहमान संजीवनी बूटी वाला पर्वत न उठा लाते ( एक भाई के लिए वो रात कितनी लम्बी रही होगी).
इंद्रजीत के नागपाश के कारन श्री राम और लक्ष्मण का अगले दिन की सुबह देखना नामुमकिन था तब हनुमान वैकुण्ठ से विष्णु के वाहन गरुड़ को लेके आये और उनके प्राण बचे. समस्त वानर सेना जो राम के भरोसे लंका पर चढ़ाई कर चली थी उनके लिए ये रात कितनी लम्बी थी. 

अहिरावण और महिरावण शिविर में सोये रामलखन को मूर्छित कर अपहृत कर ले गए और दोनों भाइयो की बलि देने लगे, तब हनुमान ने अहिरावण और महिरावण की ही बलि देदी. वो रात भी वानर शिविर के लिए किसी युग से कम न थी, ऐसे बहुत से विस्मयकारण है जो रामायण के युद्ध को महान बनाते है, बशर्ते युद्ध आठ दिन ही चला लेकिन वो आठ दिन रामसेना के लिए कितने भारी थे उसके कुछ उदहारण भर दिए है हमने. जय श्रीराम 

जिस मंदार पर्वत से हुआ था समुन्द्र का मंथन, वो      भी ढूंढ निकाला वैज्ञानिकों ने समुद्रतल में!      




आदि काल से ही हमारे वेद पुराण देवताओ और राक्षसो द्वारा समुन्द्र मंथन का जिक्र करते है जिसके लिए उन्होंने मंदार पर्वत का का उपयोग किया था, समुद्र तल को घर्षण से बचने के लिए भगवान विष्णु ने ने कर्कर्ष(कछुआ) रूप धार पर्वत के निचे रहे थे और इस प्रकार निकले सब ( अमृत और विष) सामग्री को बांटा और विवाद पे लड़ाई की थी. 
शायद तब वो उस पर्वत को समुद्र तल में ही छोड़ गए थे जो अब मिला है और ये एक और सबूत बन गया है भारतीय पौराणिक इतिहास का.

समुन्द्र मंथन के लिए देवताओ ने मदार पर्वत को बिहार के भागलपुर के निकट से उठाया था, हालाँकि इस पर्वत की उंचर अभी भी 700 फुट है लेकिन मान्य ये थी की वो समुन्द्र तल तक ऊँचा था. सत्य को तथ्य की आवश्यकता नही होती लेकिन कुछ वैज्ञानिको का मुंह बंद करने के लिए समय समय पर सबूत भी मिलते रहते है. 1988 में गुजरात के एक गांव में द्वारका के अवशेष मिले थे और अब तो द्वारका नगरी भी मिल गई है.




गुजरात के गांव पिंजरत गांव में दक्षिण गुजरात समुन्द्र में सवासौ किमी की दुरी पर समुन्द्र में 800 मीटर की गहराई पे मिल गया है मंदार पर्वत. ओशनोलॉजी डिपार्टमेंट द्वारा भी इस तथ्य की पुष्टि हो चुकी है. कार्बन टेस्ट में भी बिहार के मंदार पर्वत और इस पर्वत में एक समानता पाई गई है, साथ ही ये पर्वत समुन्द्र में होने वाले अन्य पर्वतो से अलग है.



इस पर्वत के मध्य में नाग की रगड़ के निशान भी बने हुए है जो की वासुकि नाग की रगड़ से बने होगे( संभवतया) उसके ऊपर भी नाग बना हुआ है. एब्स्यूलूट मैथड,रिलेटिव मैथड, रिटन मॉर्कर्स, एईज इक्वीवेलन्ट स्ट्रेटग्राफिक मॉर्कर्स एवं  स्ट्रेटीग्राफिक रिलेशनशिघ्स मैथड तथा लिटरेचर व रेफरन्सिस का भी सहारा लिया गया। 


अंबेडकर ने असमानता को बढ़ावा दिया : शंकराचार्य



शारदा पीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरुपानंद सरस्वती ने आरक्षण की आड़ में बाबा साहिब अंबेडकर पर हमला बोला है। उन्होंने कहा की अंबेडकर ने हिन्दू धर्म छोड़कर समाज में असमानता को बढ़ावा दिया। शंकराचार्य ने कहा कि अगर अंबेडकर हिन्दू धर्म छोड़कर बौद्ध धर्म नहीं अपनाते तो वो लोगों के बीच समानता पैदा करने में ज्यादा सफल होते।

हरिद्वार में शंकाराचार्य ने कहा कि अंबेडकर अगर हिन्दू धर्म में ही रहते और हिन्दुओं के त्यौहार होली दिवाली मानते, गंगा को मानते, रामायण गीता सुनते, हिन्दू धर्म के अनुकूल आचरण करते तब वह हिन्दू समाज में हिन्दुओं के साथ समरस हो सकते थे। आंबेडकर ने हिन्दू धर्म छोड़ दिया और होली दिवाली नहीं मनाई, गंगा की निंदा की तो हिन्दू समाज उन्हें कैसे अपने साथ समरस कर लेता।


Thursday, 21 April 2016

जानिए अकबर को उनकी औकात दिखाने वाली भारतीय महारानी के बारे में


जानिए अकबर को उनकी औकात दिखाने वाली भारतीय महारानी के बारे में

जानिए अकबर को उनकी औकात दिखाने वाली भारतीय महारानी के बारे में

जानिए अकबर को उनकी औकात दिखाने वाली भारतीय महारानी के बारे में

भारत में महिलाओं को अक्सर दो रुपों में अधिक जाना जाता रहा है। एक है मां जिसमें औरत की ममता भरा स्वरूप नजर आता है। दूसरा है शक्ति, एक दिव्य रुप, जिसमें दुष्टो का वध करते हुए स्त्री-शक्ति को दिखाया जाता है।
भारत देश में ऐसी अनेक कहानियां मिल जाएगी जहां स्त्री ने दुर्गा अवतार की तरह दुष्टों का नाश किया। आज आपके सामने हम ऐसे ही एक कहानी लाने वाले हैं।
यह कहानी गोंडवाना की रानी की है, जिनका नाम रानी दुर्गावती था। इन्होंने अपने पति की मृत्यु के बाद अपने राज्य का शासन अनेक वर्षों तक सफलतापूर्वक संभाला।
रानी दुर्गावती भारतीय इतिहास की एक महान रानी के रूप में जानी जाती है।
कहा जाता है की अकबर रानी दुर्गावती को पसंद करता था। एक बार उसकी नियत में खोट आ गई और उसने रानी को पाने के लिए प्रस्ताव भेजा। लेकिन रानी ने प्रस्ताव ठुकरा दिया। यह बात अकबर को रास नहीं आई। इसी कारण अकबर ने रानी दुर्गावती के राज्य पर आक्रमण कर दिया। यह इतिहास में भी लिखा गया है। लेकिन रानी दुर्गावती इतनी आसानी से हार कहां मानने वाली थी। जैसा उसका नाम था वैसे ही माता दुर्गा की तरह उनमें हिम्मत भी थी।
आइए जानिए क्या हुआ जब अकबर ने आक्रमण किया
थर-थर दुश्मन कांपे,
पग-पग भागे अत्याचार,
नरमुण्डों की झडी लगाई,
लाशें बिछाई कई हजार,
जब विपदा घिर आई चहुंओर,
सीने मे खंजर लिया उतार…
यह कविता की कुछ पंक्तियां रानी की शौर्य गाथा और उनकी हिम्मत को व्यक्त करती हैं। इतिहास कहता है की उस समय अकबर की नजर रानी पर थी। रानी के कुछ दुश्मन रानी के विपरीत खड़े हो गए थे उसी युद्ध में और इन्ही दुश्मनों ने अकबर के भी कान भर दिए थे। यह विवाद तब शुरू होता है जब अकबर युद्ध का बहाना ढूंढते हुए रानी से सफेद हाथी मांगता है, लेकिन वह रानी का प्रिय हाथी होने के कारण रानी अकबर की मांग को ठुकरा देती है।
rani-durgavati
इस बात को बहाना बनाकर अकबर आसिफ खान के नेतृत्व में रानी के राज्य पर हमला कर देता है। अकबर की सेना रानी की सेना के आगे घुटने टेक देती हैं। ऐसा पहली बार हुआ था अकबर की सेना ने हार मान ली हो अकबर ने अगली बार पहले से दोगुनी सेना तैयार की और फिर से रानी के राज्य पर हमला किया। उस समय रानी के पास अधिक सैनिक नहीं थे। उन्होंने जबलपुर के पास मोर्चा लगाया और खुद ही अपनी सेना का नेतृत्व किया।
रानी के साथ युद्ध में अकबर के 3000 से भी अधिक सैनिक मारे गए और रानी की भी अपार  क्षति हुई।
अगले दिन 24 जून, 1564 को मुगलों ने फिर हमला किया। उस दिन पहले की तुलना में रानी की सेना अधिक थकान से भरी हुई थी, लेकिन उन्होंने इस बात का निश्चय कर लिया था की मौत हम स्वीकार कर लेंगे लेकिन अकबर की सेना के आगे घुटने नहीं टेकेंगे। एक मां का धर्म निभाते हुए रानी ने अपने पुत्र नारायण को एक सुरक्षित स्थान पर भेज दिया।
युद्ध में रानी तीर लगने से घायल हो जाती है। जब रानी को यह लगने लगता है कि उनका अंतिम समय निकट आ गया है तो वह अपने वजीर आधार सिंह से आग्रह करती है कि वह उनकी गर्दन काट दे। मगर आधार सिंह उनकी इस बात को नहीं मानता और कहता है कि “मैं अपनी रानी को कैसे मार सकता हूं।” अतः रानी अपनी कटार निकाल अपने सीने में घोप कर आत्म बलिदान दे देती है।
रानी ने अपने राज्य में 15 सालों तक राज किया था। रानी की मृत्यु के पश्चात यह राज्य भी दूसरे राज्यों की तरह कलह और दुखों का घर बन गया।

Wednesday, 20 April 2016

हिन्दू धर्म के वो कौनसे 20 रहस्य जो अनसुलझे है


<div style="text-align: justify;"><br></div><div style="text-align: justify;">हिन्दू धर्म या भारतीय संस्कृति में प्रचलित और कई&nbsp;ग्रंथों में उल्लेखित भारत के 29 ऐसे रहस्य हैं, जो अभी तक अनसुलझे हुए हैं और उनमें से कुछ का तो रहस्य मानव कभी नहीं जान पाएगा। प्राचीन सभ्यताओं, धर्म, समाज और संस्कृतियों का महान देश भारत वैसे भी रहस्य और रोमांच के लिए जाना जाता है। एक ओर जहां भारत में दुनिया की प्रथम भाषा संस्कृत का जन्म हुआ तो दूसरी ओर दुनिया का प्रथम ग्रंथ ऋग्वेद लिखा गया।</div><div style="text-align: justify;"><br></div><div style="text-align: justify;">वही जन्मी दुनिया की प्रथम लिपि ब्राह्मी लिपि का जन्म हुआ तो दूसरी ओर दुनिया के प्रथम विश्वविद्यालय नालंदा और तक्षशिला की स्थापना हुई। ज्यामिति, पाई का मान, रिलेटिविटी का सिद्धांत जैसे कई सिद्धांत और आविष्कार हैं, जो भारत ने गढ़े हैं। लेकिन हम इन सबको हटकर कुछ ऐसे 29 रहस्य बताने वाले हैं, जो अब तक बिलकुल अनसुलझे हैं।</div><div style="text-align: justify;"><br></div><div style="text-align: justify;">Next Slide: <b>हिन्दू धर्म का पहला रहस्य...</b></div>

हिन्दू धर्म या भारतीय संस्कृति में प्रचलित और कई ग्रंथों में उल्लेखित भारत के 29 ऐसे रहस्य हैं, जो अभी तक अनसुलझे हुए हैं और उनमें से कुछ का तो रहस्य मानव कभी नहीं जान पाएगा। प्राचीन सभ्यताओं, धर्म, समाज और संस्कृतियों का महान देश भारत वैसे भी रहस्य और रोमांच के लिए जाना जाता है। एक ओर जहां भारत में दुनिया की प्रथम भाषा संस्कृत का जन्म हुआ तो दूसरी ओर दुनिया का प्रथम ग्रंथ ऋग्वेद लिखा गया।
वही जन्मी दुनिया की प्रथम लिपि ब्राह्मी लिपि का जन्म हुआ तो दूसरी ओर दुनिया के प्रथम विश्वविद्यालय नालंदा और तक्षशिला की स्थापना हुई। ज्यामिति, पाई का मान, रिलेटिविटी का सिद्धांत जैसे कई सिद्धांत और आविष्कार हैं, जो भारत ने गढ़े हैं। लेकिन हम इन सबको हटकर कुछ ऐसे 29 रहस्य बताने वाले हैं, जो अब तक बिलकुल अनसुलझे हैं।

<div><b><br></b></div><div><b>ऋषि कश्यप और उनकी पत्नियों के पुत्रों का रहस्य :</b> कहते हैं कि धरती के प्रारंभिक काल में धरती एक द्वीप वाली थी, फिर वह दो द्वीप वाली बनी और अंत में सात द्वीपों वाली बन गई। प्रारंभिक काल में ब्रह्मा ने समुद्र में और धरती पर कई तरह के जीवों की भी उत्पत्ति की। उत्पत्ति के इस काल में उन्होंने अपने काफी मानस पुत्रों को भी जन्म दिया। उन्हीं में से एक थे मरीची। ऋषि कश्यप ब्रह्माजी के मानस पुत्र मरीची के विद्वान पुत्र थे।&nbsp;</div><div><br></div><div>मान्यता के मुताबित न्हें अनिष्टनेमी के नाम से भी जाना जाता है। इनकी माता 'कला' कर्दम ऋषि की पुत्री और कपिल देव की बहन थी। आपको बता दे की&nbsp;यहां रहस्य वाली बात यह कि क्या कोई इंसान सर्प, पक्षी, पशु आदि तरह की जातियों को जन्म दे सकता है? जबकि जीव विकासवादियों को ऐसे में शोध करना जरूर चाहिए। भगवान विष्णु सदा एक गरूड़ पर सवार रहते थे। ये गरूड़जी कश्यप की पत्नी विनीता से जन्मे थे।</div><div>&nbsp;</div><div>ऐसे तो कश्यप ऋषि की कई पत्नियां थीं जबकि प्रमुख रूप से 17 का हम उल्लेख करना चाहेंगे- 1. अदिति, 2. दिति, 3. दनु, 4. काष्ठा, 5. अरिष्टा, 6. सुरसा, 7. इला, 8. मुनि, 9. क्रोधवशा, 10. ताम्रा, 11. सुरभि, 12. सुरसा, 13. तिमि, 14. विनीता, 15. कद्रू, 16. पतांगी और 17. यामिनी आदि पत्नियां बनीं।</div><div><br></div><div>1. अदिति से 12 आदित्यों का जन्म हुआ- विवस्वान्, अर्यमा, पूषा, त्वष्टा, सविता, भग, धाता, विधाता, वरुण, मित्र, इंद्र और त्रिविक्रम (भगवान वामन)। ये सभी देवता कहलाए और इनका हिमालय के उत्तर में स्थान था।</div><div>&nbsp;</div><div>2. दिति से कई पुत्रों का जन्म हुआ- कश्यप ऋषि ने दिति के गर्भ से हिरण्यकश्यप और हिरण्याक्ष नामक 2 पुत्र एवं सिंहिका नामक एक पुत्री को जन्म दिया। ये दैत्य कहलाए और इनका स्थान हिमालय के ‍दक्षिण में था। श्रीमद्भागवत के मुताबित इन 3 संतानों के अलावा दिति के गर्भ से कश्यप के 49 अन्य पुत्रों का जन्म भी हुआ, जो कि मरुन्दण कहलाए। कश्यप के ये पुत्र बिल्कुल नि:संतान रहे जबकि हिरण्यकश्यप के 4 पुत्र थे- अनुहल्लाद, हल्लाद, भक्त प्रह्लाद और संहल्लाद।</div><div>&nbsp;</div><div>3. दनु : ऋषि कश्यप को उनकी पत्नी दनु के गर्भ से द्विमुर्धा, शम्बर, अरिष्ट, हयग्रीव, विभावसु, अरुण, अनुतापन, धूम्रकेश, विरुपाक्ष, दुर्जय, अयोमुख, शंकुशिरा, कपिल, शंकर, एकचक्र, महाबाहु, तारक, महाबल, स्वर्भानु, वृषपर्वा, महाबली पुलोम और विप्रचिति आदि 61 महान पुत्रों की प्राप्ति हुई। ये सभी पुत्र दानव कहलाए।</div><div>&nbsp;</div><div><img src="http://i.imgur.com/osI4Eh8.jpg" width="100%"></div><div><font size="2">Image Source:</font>&nbsp;<a href="https://en.wikipedia.org/wiki/Arundhati_(Hinduism)" title="" target="_blank"><font size="2">wikipidia</font></a></div><div><br></div><div>4. इनकी&nbsp;अन्य पत्नियां : रानी काष्ठा से घोड़े आदि एक खुर वाले पशु उत्पन्न हुए। पत्नी अरिष्टा से गंधर्व पैदा हुए। सुरसा नामक रानी से यातुधान (राक्षस) उत्पन्न हुए। इला से वृक्ष, लता आदि पृथ्वी पर उत्पन्न होने वाली वनस्पतियों का जन्म हुआ। मुनि के गर्भ से अप्सराएं जन्मीं। कश्यप की क्रोधवशा नामक रानी ने सांप, बिच्छू आदि विषैले जंतु पैदा किए।</div><div>&nbsp;</div><div>ताम्रा ने बाज, गिद्ध आदि शिकारी पक्षियों को अपने बच्चे के रूप में जन्म दिया। सुरभि ने भैंस, गाय तथा दो खुर वाले पशुओं की उत्पत्ति की। रानी सरसा ने बाघ इत्यादि हिंसक जीवों को पैदा किया। तिमि ने जलचर जंतुओं को अपनी संतान के रूप में उत्पन्न किया।</div><div><br></div><div>और यही नहीं&nbsp;रानी विनीता के गर्भ से गरूड़ (विष्णु का वाहन) और वरुण (सूर्य का सारथि) पैदा हुए। कद्रू की कोख से बहुत से नागों की उत्पत्ति हुई जिनमें प्रमुख 8 नाग थे- अनंत (शेष), वासुकि, तक्षक, कर्कोटक, पद्म, महापद्म, शंख और कुलिक।</div><div><br></div><div>रानी पतंगी से पक्षियों का जन्म हुआ। यामिनी के गर्भ से शलभों (पतंगों) का जन्म हुआ। ब्रह्माजी की आज्ञा से प्रजापति कश्यप ने वैश्वानर की 2 पुत्रियों पुलोमा और कालका के साथ भी विवाह किया। उनसे पौलोम और कालकेय नाम के 60 हजार रणवीर दानवों का जन्म हुआ, जो कि कालांतर में निवात कवच के नाम से भी विख्यात हुए।</div>

ऋषि कश्यप और उनकी पत्नियों के पुत्रों का रहस्य : कहते हैं कि धरती के प्रारंभिक काल में धरती एक द्वीप वाली थी, फिर वह दो द्वीप वाली बनी और अंत में सात द्वीपों वाली बन गई। प्रारंभिक काल में ब्रह्मा ने समुद्र में और धरती पर कई तरह के जीवों की भी उत्पत्ति की। उत्पत्ति के इस काल में उन्होंने अपने काफी मानस पुत्रों को भी जन्म दिया। उन्हीं में से एक थे मरीची। ऋषि कश्यप ब्रह्माजी के मानस पुत्र मरीची के विद्वान पुत्र थे। 

मान्यता के मुताबित न्हें अनिष्टनेमी के नाम से भी जाना जाता है। इनकी माता 'कला' कर्दम ऋषि की पुत्री और कपिल देव की बहन थी। आपको बता दे की यहां रहस्य वाली बात यह कि क्या कोई इंसान सर्प, पक्षी, पशु आदि तरह की जातियों को जन्म दे सकता है? जबकि जीव विकासवादियों को ऐसे में शोध करना जरूर चाहिए। भगवान विष्णु सदा एक गरूड़ पर सवार रहते थे। ये गरूड़जी कश्यप की पत्नी विनीता से जन्मे थे।
 
ऐसे तो कश्यप ऋषि की कई पत्नियां थीं जबकि प्रमुख रूप से 17 का हम उल्लेख करना चाहेंगे- 1. अदिति, 2. दिति, 3. दनु, 4. काष्ठा, 5. अरिष्टा, 6. सुरसा, 7. इला, 8. मुनि, 9. क्रोधवशा, 10. ताम्रा, 11. सुरभि, 12. सुरसा, 13. तिमि, 14. विनीता, 15. कद्रू, 16. पतांगी और 17. यामिनी आदि पत्नियां बनीं।

1. अदिति से 12 आदित्यों का जन्म हुआ- विवस्वान्, अर्यमा, पूषा, त्वष्टा, सविता, भग, धाता, विधाता, वरुण, मित्र, इंद्र और त्रिविक्रम (भगवान वामन)। ये सभी देवता कहलाए और इनका हिमालय के उत्तर में स्थान था।
 
2. दिति से कई पुत्रों का जन्म हुआ- कश्यप ऋषि ने दिति के गर्भ से हिरण्यकश्यप और हिरण्याक्ष नामक 2 पुत्र एवं सिंहिका नामक एक पुत्री को जन्म दिया। ये दैत्य कहलाए और इनका स्थान हिमालय के ‍दक्षिण में था। श्रीमद्भागवत के मुताबित इन 3 संतानों के अलावा दिति के गर्भ से कश्यप के 49 अन्य पुत्रों का जन्म भी हुआ, जो कि मरुन्दण कहलाए। कश्यप के ये पुत्र बिल्कुल नि:संतान रहे जबकि हिरण्यकश्यप के 4 पुत्र थे- अनुहल्लाद, हल्लाद, भक्त प्रह्लाद और संहल्लाद।
 
3. दनु : ऋषि कश्यप को उनकी पत्नी दनु के गर्भ से द्विमुर्धा, शम्बर, अरिष्ट, हयग्रीव, विभावसु, अरुण, अनुतापन, धूम्रकेश, विरुपाक्ष, दुर्जय, अयोमुख, शंकुशिरा, कपिल, शंकर, एकचक्र, महाबाहु, तारक, महाबल, स्वर्भानु, वृषपर्वा, महाबली पुलोम और विप्रचिति आदि 61 महान पुत्रों की प्राप्ति हुई। ये सभी पुत्र दानव कहलाए।


4. इनकी अन्य पत्नियां : रानी काष्ठा से घोड़े आदि एक खुर वाले पशु उत्पन्न हुए। पत्नी अरिष्टा से गंधर्व पैदा हुए। सुरसा नामक रानी से यातुधान (राक्षस) उत्पन्न हुए। इला से वृक्ष, लता आदि पृथ्वी पर उत्पन्न होने वाली वनस्पतियों का जन्म हुआ। मुनि के गर्भ से अप्सराएं जन्मीं। कश्यप की क्रोधवशा नामक रानी ने सांप, बिच्छू आदि विषैले जंतु पैदा किए।
 
ताम्रा ने बाज, गिद्ध आदि शिकारी पक्षियों को अपने बच्चे के रूप में जन्म दिया। सुरभि ने भैंस, गाय तथा दो खुर वाले पशुओं की उत्पत्ति की। रानी सरसा ने बाघ इत्यादि हिंसक जीवों को पैदा किया। तिमि ने जलचर जंतुओं को अपनी संतान के रूप में उत्पन्न किया।

और यही नहीं रानी विनीता के गर्भ से गरूड़ (विष्णु का वाहन) और वरुण (सूर्य का सारथि) पैदा हुए। कद्रू की कोख से बहुत से नागों की उत्पत्ति हुई जिनमें प्रमुख 8 नाग थे- अनंत (शेष), वासुकि, तक्षक, कर्कोटक, पद्म, महापद्म, शंख और कुलिक।

रानी पतंगी से पक्षियों का जन्म हुआ। यामिनी के गर्भ से शलभों (पतंगों) का जन्म हुआ। ब्रह्माजी की आज्ञा से प्रजापति कश्यप ने वैश्वानर की 2 पुत्रियों पुलोमा और कालका के साथ भी विवाह किया। उनसे पौलोम और कालकेय नाम के 60 हजार रणवीर दानवों का जन्म हुआ, जो कि कालांतर में निवात कवच के नाम से भी विख्यात हुए।


10 फन, उड़ने वाले, मणिधर और इच्छाधारी सांप होते हैं? आप सभी जानते है की जीव-जंतुओं में सबसे उच्च स्थान गाय का है और उसके बाद सांप ही है! सांप एक रहस्यमय प्राणी है। आपने देखा होगा की आज भी देशभर के गांवों में लोगों के शरीर में नाग देवता की सवारी आती है।

शिव के प्रमुख गणों में सांप भी है। भारत में नाग जातियों का एक लंबा इतिहास रहा है। कहते हैं कि कश्यप की क्रोधवशा नामक रानी ने सांप, बिच्छू आदि विषैले जंतु पैदा किए। अनंत (शेष), वासुकि, तक्षक, कर्कोटक और पिंगला- उक्त 5 नागों के कुल के लोगों का ही भारत में वर्चस्व था। ये सभी कश्यप वंशी थे, जबकि इन्हीं से नागवंश चला। और शेषनाग को 10 फन वाला माना गया है। भगवान विष्णु भी उन पर ही लेटे हुए दर्शाए गए हैं।

माना जाता है कि 100 सालो से ज्यादा उम्र होने के बाद सर्प में उड़ने की शक्ति आ जाती है। सर्प कई तरह के होते हैं जिनमे मणिधारी, इच्‍छाधारी, उड़ने वाले, एकफनी से लेकर दसफनी तक के सांप, जिसे शेषनाग कहते हैं। नीलमणिधारी सांप को सबसे उत्तम माना जाता है। इच्छाधारी नाग के बारे में कहा जाता है कि वह अपनी इच्छा से मानव, पशु या अन्य किसी भी जीव के अनुसार अपना रूप धारण कर सकता है। जबकि वैज्ञानिको ने इसकी पुष्टि की है लेकिन 10 फन वाले सांप अभी तक उन्हें नहीं देखे गए हैं।

<div style="text-align: justify;"><br></div><div style="text-align: justify;"><b>10 फन, उड़ने वाले, मणिधर और इच्छाधारी सांप होते हैं?</b>&nbsp;आप सभी जानते है की जीव-जंतुओं में सबसे उच्च स्थान गाय का है और उसके बाद सांप ही है! सांप एक रहस्यमय प्राणी है। आपने देखा होगा की आज भी&nbsp;देशभर के गांवों में लोगों के शरीर में नाग देवता की सवारी आती है।</div><div style="text-align: justify;"><br></div><div style="text-align: justify;">शिव के प्रमुख गणों में सांप भी है। भारत में नाग जातियों का एक लंबा इतिहास रहा है। कहते हैं कि कश्यप की क्रोधवशा नामक रानी ने सांप, बिच्छू आदि विषैले जंतु पैदा किए। अनंत (शेष), वासुकि, तक्षक, कर्कोटक और पिंगला- उक्त 5 नागों के कुल के लोगों का ही भारत में वर्चस्व था। ये सभी कश्यप वंशी थे, जबकि इन्हीं से नागवंश चला। और शेषनाग को 10 फन वाला माना गया है। भगवान विष्णु भी उन पर ही लेटे हुए दर्शाए गए हैं।</div><div style="text-align: justify;"><br></div><div><div style="text-align: justify;">माना जाता है कि 100 सालो से ज्यादा उम्र होने के बाद सर्प में उड़ने की शक्ति आ जाती है। सर्प कई तरह के होते हैं जिनमे&nbsp;मणिधारी, इच्‍छाधारी, उड़ने वाले, एकफनी से लेकर दसफनी तक के सांप, जिसे शेषनाग कहते हैं। नीलमणिधारी सांप को सबसे उत्तम माना जाता है। इच्छाधारी नाग के बारे में कहा जाता है कि वह अपनी इच्छा से मानव, पशु या अन्य किसी भी जीव के अनुसार अपना रूप धारण कर सकता है। जबकि वैज्ञानिको ने इसकी पुष्टि की है लेकिन 10 फन वाले सांप अभी तक उन्हें नहीं देखे गए हैं।</div></div>

क्या पारसमणि होती है? मणि एक प्रकार का चमकता हुआ खूबसूरत पत्थर होता है। मणि को हीरे की श्रेणी में रखा जा सकता है। यह भी अपने आप में एक रहस्य है। जिसके भी पास मणि होती थी वह कुछ भी कर सकता था। ज्ञात हो कि अश्वत्थामा के पास एक मणि थी जिसके बल पर वह काफी शक्तिशाली और अमर हो गया था। रावण ने कुबेर से चंद्रकांत नाम की मणि छीन ली थी।

मान्यता है कि मणियां कई प्रकार की होती थीं। नीलमणि, चंद्रकांत मणि, शेष मणि, कौस्तुभ मणि, पारसमणि, लाल मणि आदि। पारसमणि से लोहे की किसी भी चीज को छुआ देने से वह सोने की बन जाती थी। लोग कहते हैं कि कौवों को इसकी पहचान होती है और यह हिमालय के पास में पाई जाती है। और जबकि पौराणिक ग्रंथों में भी ‍मणि के किस्से काफी भरे पड़े हैं।

<div><br></div><b>क्या पारसमणि होती है?</b> मणि एक प्रकार का चमकता हुआ खूबसूरत पत्थर होता है। मणि को हीरे की श्रेणी में रखा जा सकता है। यह भी अपने आप में एक रहस्य है। जिसके भी पास मणि होती थी वह कुछ भी कर सकता था। ज्ञात हो कि अश्वत्थामा के पास एक&nbsp;मणि थी जिसके बल पर वह काफी शक्तिशाली और अमर हो गया था। रावण ने कुबेर से चंद्रकांत नाम की मणि छीन ली थी।<div><br></div><div><div>मान्यता है कि मणियां कई प्रकार की होती थीं। नीलमणि, चंद्रकांत मणि, शेष मणि, कौस्तुभ मणि, पारसमणि, लाल मणि आदि। पारसमणि से लोहे की किसी भी चीज को छुआ देने से वह सोने की बन जाती थी। लोग कहते हैं कि कौवों को इसकी पहचान होती है और यह हिमालय के पास में पाई जाती है। और जबकि पौराणिक ग्रंथों में भी ‍मणि के किस्से काफी भरे पड़े हैं।</div></div>


संजीवनी बूटी का रहस्य अभी भी बरकरार : शुक्राचार्य को मृत संजीवनी विद्या याद थी जिसके दम पर वे युद्ध में मारे गए दैत्यों को फिर से जीवित कर देते थे। और इस विद्या को सीखने के लिए गुरु बृहस्पति ने अपने एक शिष्य को शुक्राचार्य का शिष्य बनने के लिए भेजा। उसने यह विद्या सीख ली थी जबकि शुक्राचार्य और उनके दैत्यों को इसका जब पता चला तो उन्होंने उसका वध कर दिया।

रामायण में उल्लेख मिलता है कि जब राम-रावण युद्ध में मेघनाथ आदि के भयंकर अस्त्र प्रयोग से समूची राम सेना मरणासन्न हो गई थी, तो हनुमानजी ने जामवंत के कहने पर वैद्यराज सुषेण को बुलाया और फिर सुषेण ने कहा कि आप द्रोणगिरि पर्वत पर जाकर 4 वनस्पतियां लाएं : मृत संजीवनी (मरे हुए को जिलाने वाली), विशाल्यकरणी (तीर निकालने वाली), संधानकरणी (त्वचा को स्वस्थ करने वाली) तथा सवर्ण्यकरणी (त्वचा का रंग बहाल करने वाली)। हनुमान बेशुमार वनस्पतियों में से इन्हें पहचान नहीं पाए, तो वह पूरा पर्वत ही उठा लाए। और इस प्रकार लक्ष्मण को मृत्यु के मुख से खींचकर जीवनदान दिया गया।

इन 4 वनस्पतियों में से मृत संजीवनी (या सिर्फ संजीवनी कहें) सबसे महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह व्यक्ति को मृत्युशैया से पुनः स्वस्थ कर सकती है। लेकिन सवाल यह है कि यह चमत्कारिक पौधा कौन-सा है! और इस बारे में कृषि विज्ञान विश्वविद्यालय, बेंगलुरु और वानिकी महाविद्यालय, सिरसी के डॉ. केएन गणेशैया, डॉ. आर. वासुदेव तथा डॉ. आर. उमाशंकर ने बेहद व्यवस्थित ढंग से इस पर शोध कर 2 पौधों को चिह्नित भी किया है।

इन 6 में से भी 3 प्रजातियां ऐसी थीं, जो 'संजीवनी' या उससे मिलते-जुलते शब्द से सर्वाधिक बार और सबसे ज्यादा एकरूपता से मेल खाती थी : क्रेसा क्रेटिका, सिलेजिनेला ब्रायोप्टेरिस और डेस्मोट्रायकम फिम्ब्रिएटम। इनके सामान्य नाम क्रमशः रुदन्ती, संजीवनी बूटी और जीवका हैं। इन्हीं में से एक का चुनाव करना था। अगला सवाल यह था कि इनमें से कौन-सी पर्वतीय इलाके में पाई जाती है, जहां हनुमान ने इसे तलाशा होगा। क्रेसा क्रेटिका नहीं हो सकती, क्योंकि यह दखन के पठार या नीची भूमि में पाई जाती है।
 
सिलेजिनेला ब्रायोप्टेरिस कई महीनों तक एकदम सूखी या 'मृत' पड़ी रहती है और एक बारिश आते ही 'पुनर्जीवित' हो उठती है। डॉ. एनके शाह, डॉ. शर्मिष्ठा बनर्जी और सैयद हुसैन ने इस पर कुछ प्रयोग किए हैं और पाया है कि इसमें कुछ ऐसे अणु पाए जाते हैं, जो ऑक्सीकारक क्षति व पराबैंगनी क्षति से चूहों और कीटों की कोशिकाओं की रक्षा करते हैं तथा उनकी मरम्मत में मदद करते हैं। तो क्या सिलेजिनेला ब्रायोप्टेरिस ही रामायण काल की संजीवनी बूटी है? 
 
सच्चे वैज्ञानिकों की भांति गणेशैया व उनके साथी जल्दबाजी में किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचना चाहते।इसके लिए उनका कहा की दूसरे पौधे डेस्मोट्रायकम फिम्ब्रिएटम का दावा भी कमतर नहीं है। अब इन दो प्रजातियों के बीच फैसला करने के लिए और शोध की जरूरत है। इसके संपन्न होते ही रामायणकालीन संजीवनी बूटी शायद हमारे सामने होगी।
 
भारतीय वैज्ञानिकों ने हिमालय के ऊपरी इलाके में पौधे की खोज की वो अलग ही अनोखा नज़र आता है। वैज्ञानिकों का दावा है कि यह पौधा एक ऐसी औषधि के रूप में काम करता है, जो हमारे इम्यून सिस्टम को रेग्युलेट करता है। और हमारे शरीर को पर्वतीय परिस्थितियों के अनुरूप ढलने में भी काफी मदद करता है और हमें रेडियो एक्टिविटी से भी बचाता है। लेकिन आज तक कोई भी इन जड़ी बूटियों के बारे में सही उत्तर नहीं दे सका है!



<div><br></div><b>संजीवनी बूटी का रहस्य अभी भी बरकरार :</b> शुक्राचार्य को मृत संजीवनी विद्या याद थी जिसके दम पर वे युद्ध में मारे गए दैत्यों को फिर से जीवित कर देते थे। और&nbsp;इस विद्या को सीखने के लिए गुरु बृहस्पति ने अपने एक शिष्य को शुक्राचार्य का शिष्य बनने के लिए भेजा। उसने यह विद्या सीख ली थी जबकि शुक्राचार्य और उनके दैत्यों को इसका जब पता चला तो उन्होंने उसका वध कर दिया।<div><br></div><div>रामायण में उल्लेख मिलता है कि जब राम-रावण युद्ध में मेघनाथ आदि के भयंकर अस्त्र प्रयोग से समूची राम सेना मरणासन्न हो गई थी, तो हनुमानजी ने जामवंत के कहने पर वैद्यराज सुषेण को बुलाया और फिर सुषेण ने कहा कि आप द्रोणगिरि पर्वत पर जाकर 4 वनस्पतियां लाएं : मृत संजीवनी (मरे हुए को जिलाने वाली), विशाल्यकरणी (तीर निकालने वाली), संधानकरणी (त्वचा को स्वस्थ करने वाली) तथा सवर्ण्यकरणी (त्वचा का रंग बहाल करने वाली)। हनुमान बेशुमार वनस्पतियों में से इन्हें पहचान नहीं पाए, तो वह पूरा पर्वत ही उठा लाए। और इस प्रकार लक्ष्मण को मृत्यु के मुख से खींचकर जीवनदान दिया गया।</div><div><br></div><div><div>इन 4 वनस्पतियों में से मृत संजीवनी (या सिर्फ संजीवनी कहें) सबसे महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह व्यक्ति को मृत्युशैया से पुनः स्वस्थ कर सकती है। लेकिन सवाल यह है कि यह चमत्कारिक पौधा कौन-सा है! और इस बारे में कृषि विज्ञान विश्वविद्यालय, बेंगलुरु और वानिकी महाविद्यालय, सिरसी के डॉ. केएन गणेशैया, डॉ. आर. वासुदेव तथा डॉ. आर. उमाशंकर ने बेहद व्यवस्थित ढंग से इस पर शोध कर 2 पौधों को चिह्नित भी&nbsp;किया है।</div><div><br></div><div>इन 6 में से भी 3 प्रजातियां ऐसी थीं, जो 'संजीवनी' या उससे मिलते-जुलते शब्द से सर्वाधिक बार और सबसे ज्यादा एकरूपता से मेल खाती थी : क्रेसा क्रेटिका, सिलेजिनेला ब्रायोप्टेरिस और डेस्मोट्रायकम फिम्ब्रिएटम। इनके सामान्य नाम क्रमशः रुदन्ती, संजीवनी बूटी और जीवका हैं। इन्हीं में से एक का चुनाव करना था। अगला सवाल यह था कि इनमें से कौन-सी पर्वतीय इलाके में पाई जाती है, जहां हनुमान ने इसे तलाशा होगा। क्रेसा क्रेटिका नहीं हो सकती, क्योंकि यह दखन के पठार या नीची भूमि में पाई जाती है।</div><div>&nbsp;</div><div>सिलेजिनेला ब्रायोप्टेरिस कई महीनों तक एकदम सूखी या 'मृत' पड़ी रहती है और एक बारिश आते ही 'पुनर्जीवित' हो उठती है। डॉ. एनके शाह, डॉ. शर्मिष्ठा बनर्जी और सैयद हुसैन ने इस पर कुछ प्रयोग किए हैं और पाया है कि इसमें कुछ ऐसे अणु पाए जाते हैं, जो ऑक्सीकारक क्षति व पराबैंगनी क्षति से चूहों और कीटों की कोशिकाओं की रक्षा करते हैं तथा उनकी मरम्मत में मदद करते हैं। तो क्या सिलेजिनेला ब्रायोप्टेरिस ही रामायण काल की संजीवनी बूटी है?&nbsp;</div><div>&nbsp;</div><div>सच्चे वैज्ञानिकों की भांति गणेशैया व उनके साथी जल्दबाजी में किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचना चाहते।इसके लिए उनका कहा की दूसरे पौधे डेस्मोट्रायकम फिम्ब्रिएटम का दावा भी कमतर नहीं है। अब इन दो प्रजातियों के बीच फैसला करने के लिए और शोध की जरूरत है। इसके संपन्न होते ही रामायणकालीन संजीवनी बूटी शायद हमारे सामने होगी।</div><div>&nbsp;</div><div>भारतीय वैज्ञानिकों ने हिमालय के ऊपरी इलाके में पौधे की खोज की वो अलग ही अनोखा नज़र आता है। वैज्ञानिकों का दावा है कि यह पौधा एक ऐसी औषधि के रूप में काम करता है, जो हमारे इम्यून सिस्टम को रेग्युलेट करता है। और हमारे शरीर को पर्वतीय परिस्थितियों के अनुरूप ढलने में भी काफी&nbsp;मदद करता है और हमें रेडियो एक्टिविटी से भी बचाता है। लेकिन आज तक कोई भी इन जड़ी बूटियों के बारे में सही उत्तर नहीं दे सका है!</div></div>
क्या कल्पवृक्ष अभी भी है? : वेद और पुराणों में कल्पवृक्ष का काफी  उल्लेख मिलता है। कल्पवृक्ष स्वर्ग का एक विशेष प्रकार का वृक्ष है। और पौराणिक धर्मग्रंथों और हिन्दू मान्यताओं के मुताबित यह माना जाता है कि इस वृक्ष के नीचे बैठकर व्यक्ति जो भी इच्छा मांगता है वह पूर्ण हो जाती है, क्योंकि इस वृक्ष में अपार सकारात्मक ऊर्जा का काफी भंडार होता है। यह वृक्ष समुद्र मंथन से निकला था। और समुद्र मंथन से प्राप्त यह वृक्ष देवराज इन्द्र को दे दिया गया था और इन्द्र ने इसकी 'सुरकानन वन' (हिमालय के उत्तर में) में स्थापना कर दी थी।

कल्प की आयु : कल्पवृक्ष का अर्थ होता है, जो एक कल्प तक जीवित रहे। जबकि अब सवाल यह उठता है कि क्या सच में ऐसा कोई वृक्ष था या अभी भी है? यदि था तो उसे आज भी होना चाहिए, क्योंकि उसे तो एक कल्प तक जीवित रहना है। यदि ऐसा कोई-सा वृक्ष है तो वह कैसा दिखता है? और उसके क्या फायदे हैं? जबकि कुछ लोग कहते हैं कि अपरिजात के वृक्ष को ही कल्पवृक्ष माना जाता है, लेकिन अधिकतर इससे कोई भी सहमत नहीं हैं।

<div style="text-align: justify;"><b><br></b></div><div style="text-align: justify;"><b>क्या कल्पवृक्ष अभी भी है?</b> : वेद और पुराणों में कल्पवृक्ष का काफी&nbsp; उल्लेख मिलता है। कल्पवृक्ष स्वर्ग का एक विशेष प्रकार का वृक्ष है। और&nbsp;पौराणिक धर्मग्रंथों और हिन्दू मान्यताओं के मुताबित यह माना जाता है कि इस वृक्ष के नीचे बैठकर व्यक्ति जो भी इच्छा मांगता है वह पूर्ण हो जाती है, क्योंकि इस वृक्ष में अपार सकारात्मक ऊर्जा का काफी भंडार होता है। यह वृक्ष समुद्र मंथन से निकला था। और समुद्र मंथन से प्राप्त यह वृक्ष देवराज इन्द्र को दे दिया गया था और इन्द्र ने इसकी&nbsp;'सुरकानन वन' (हिमालय के उत्तर में)&nbsp;में&nbsp;स्थापना कर&nbsp;दी थी।</div><div style="text-align: justify;"><br></div><div>कल्प की आयु : कल्पवृक्ष का अर्थ होता है, जो एक कल्प तक जीवित रहे। जबकि अब सवाल यह उठता है कि क्या सच में ऐसा कोई वृक्ष था या अभी भी&nbsp;है? यदि था तो उसे&nbsp;आज भी होना चाहिए, क्योंकि उसे तो एक कल्प तक जीवित रहना है। यदि ऐसा कोई-सा वृक्ष है तो वह कैसा दिखता है? और उसके क्या फायदे हैं? जबकि कुछ लोग कहते हैं कि अपरिजात के वृक्ष को ही कल्पवृक्ष माना जाता है, लेकिन अधिकतर इससे कोई भी&nbsp;सहमत नहीं हैं।</div>


क्या कामधेनु गाय होती थी? : आपको बता दे की कामधेनु गाय की उत्पत्ति भी समुद्र मंथन से हुई थी। और यह एक चमत्कारी गाय होती थी जिसके दर्शन मात्र से ही सभी प्रकार के दु:ख-दर्द दूर हो जाते थे। और  दैवीय शक्तियों से संपन्न यह गाय जिसके भी पास होती थी उससे चमत्कारिक लाभ मिलता था। इस गाय का दूध अमृत के समान माना जाता था।

आपको पता होगा की हिन्दु्ओं के लिए सबसे पवित्र पशु गाय है। इस धरती पर भी सबसे पहले गायों की कुछ ही प्रजातियां होती थीं। उससे भी प्रारंभिक काल में केवल एक ही प्रजाति थी। जो आज से करीब 9,500 साल पूर्व गुरु वशिष्ठ ने गाय के कुल का विस्तार किया और उन्होंने गाय की नई प्रजातियों को भी बनाया, तब गाय की 8 या 10 नस्लें ही थीं जिनका नाम कामधेनु, कपिला, देवनी, नंदनी, भौमा आदि था। कामधेनु के लिए गुरु वशिष्ठ से विश्वामित्र सहित कई अन्य राजाओं ने कई बार युद्ध किया, जबकि उन्होंने कामधेनु गाय को किसी को भी नहीं दिया। और गाय के इस झगड़े में गुरु वशिष्ठ के सारे100 पुत्र मारे गए थे।

माना जाता है की गाय में 33 कोटि के देवी-देवता निवास करते हैं। कोटि का अर्थ 'करोड़' नहीं, 'प्रकार' होता है। इसका मतलब गाय में 33 प्रकार के देवता निवास करते हैं। ये देवता हैं- 12 आदित्य, 8 वसु, 11 रुद्र और 2 अश्‍विन कुमार। ये मिलकर कुल 33 होते हैं। इनके कारण गाय से कई तरह के रोगो को दूर करने के गुण भी मोजूत है और इसके हर एक अंग से पुण्य अपने का भी है!
<div><br></div><b>क्या कामधेनु गाय होती थी?</b> : आपको बता दे की&nbsp;कामधेनु गाय की उत्पत्ति भी समुद्र मंथन से हुई थी। और&nbsp;यह एक चमत्कारी गाय होती थी जिसके दर्शन मात्र से ही सभी प्रकार के दु:ख-दर्द दूर हो जाते थे। और &nbsp;दैवीय शक्तियों से संपन्न यह गाय जिसके भी पास होती थी उससे चमत्कारिक लाभ मिलता था। इस गाय का दूध अमृत के समान माना जाता था।<div><br></div><div><div>आपको पता होगा की हिन्दु्ओं के लिए सबसे पवित्र पशु गाय है। इस धरती पर भी सबसे पहले गायों की कुछ ही प्रजातियां होती थीं। उससे भी प्रारंभिक काल में केवल&nbsp;एक ही प्रजाति थी। जो&nbsp;आज से करीब 9,500 साल पूर्व गुरु वशिष्ठ ने गाय के कुल का विस्तार किया और उन्होंने गाय की नई प्रजातियों को भी बनाया, तब गाय की 8 या 10 नस्लें ही थीं जिनका नाम कामधेनु, कपिला, देवनी, नंदनी, भौमा आदि था। कामधेनु के लिए गुरु वशिष्ठ से विश्वामित्र सहित कई अन्य राजाओं ने कई बार युद्ध किया, जबकि उन्होंने कामधेनु गाय को किसी को भी नहीं दिया। और गाय के इस झगड़े में गुरु वशिष्ठ के सारे100 पुत्र मारे गए थे।</div><div><br></div><div>माना जाता है की गाय में 33 कोटि के देवी-देवता निवास करते हैं। कोटि का अर्थ 'करोड़' नहीं, 'प्रकार' होता है। इसका मतलब गाय में 33 प्रकार के देवता निवास करते हैं। ये देवता हैं- 12 आदित्य, 8 वसु, 11 रुद्र और 2 अश्‍विन कुमार। ये मिलकर कुल 33 होते हैं। इनके कारण गाय से कई तरह के रोगो को दूर करने के गुण भी मोजूत है और इसके हर एक अंग से पुण्य अपने का भी है!</div></div>

सोमरस के बारे में अक्सर पढ़ने और सुनने को मिलता है। लेकिन ये केसा होता है और क्या होता है इसका पता नहीं है !ऋग्वेद में शराब की काफी घोर निंदा करते हुए कहा गया है-
।।हृत्सु पीतासो युध्यन्ते दुर्मदासो न सुरायाम्।।
अर्थात : सुरापान करने या नशीले पदार्थों को पीने वाले अक्सर युद्ध, मार-पिटाई या उत्पात मचाया करते हैं।

जबकि वेदों में शराब को बुराइयों की एक जड़ भी कहा गया है, देवताओं को कैसे शराब चढ़ा सकते हैं। लेकिन सुरापान और सोमरस में काफी फर्क था।


सोमरस के बारे में अक्सर पढ़ने और सुनने को मिलता है। लेकिन ये केसा होता है और क्या होता है इसका पता नहीं है !ऋग्वेद में शराब की काफी&nbsp;घोर निंदा करते हुए कहा गया है-<div><div>।।हृत्सु पीतासो युध्यन्ते दुर्मदासो न सुरायाम्।।</div><div>अर्थात : सुरापान करने या नशीले पदार्थों को पीने वाले अक्सर युद्ध, मार-पिटाई या उत्पात मचाया करते हैं।</div><div><br></div><div>जबकि&nbsp;वेदों में शराब को बुराइयों की एक जड़ भी कहा गया है, देवताओं को कैसे शराब चढ़ा सकते हैं। लेकिन सुरापान और सोमरस में काफी फर्क था।</div></div>

ये तो सभी को पता है की समुद्र मंथन के समय कोई ऐसा रस निकला था जिसे पीकर देवताओं ने अमरता को प्राप्त कर लिया था? यदि ऐसा समुद्र से ऐसा कोई रस निकल सकता है तो क्या आज क्यों नहीं निकल सकता? उस दौरान अमृत कलश के लिए देव और दैत्यों के बीच काफी भयंकर युद्ध हुआ था। और सचमुच अमृत का निकलना एक रहस्य भी है। जबकि वैज्ञानिक ऐसी दवा बनाने में लगे हैं जिसे पीकर व्यक्ति अधिक समय तक जवान बना रह सके।

अमर होने का रहस्य : आज अमर कौन नहीं होना चाहता? समुद्र मंथन में अमृत निकला। इसे प्राप्त करने के लिए देवताओं ने दानवों के साथ एक छल किया। और देवता अमर हो गए। अभी अधिकतम 100 साल के जीवन में अनेकानेक रोग, कष्ट, संताप और झंझट होते हैं तो आज अमृत जल पिने से अमर हो जाने पर 100 साल बाद वैराग्य प्राप्त कर व्यक्ति हिमालय चला जाएगा। और वहां व्यक्ति क्या करेगा? आपको पता है वो बोर हो जाएगा! इस लिए आज यह संसार में नहीं आकर रहेगा। बस इसीलिए यही सिलसिला हमेशा चलता रहेगा।

<div><br></div>ये तो सभी को पता है की&nbsp;समुद्र मंथन के समय कोई ऐसा रस निकला था जिसे पीकर देवताओं ने अमरता को प्राप्त कर लिया था? यदि ऐसा समुद्र से ऐसा कोई रस निकल सकता है तो क्या आज क्यों&nbsp;नहीं निकल सकता? उस दौरान&nbsp;अमृत कलश के लिए देव और दैत्यों के बीच काफी भयंकर युद्ध हुआ था। और&nbsp;सचमुच अमृत का निकलना एक रहस्य भी है। जबकि वैज्ञानिक ऐसी दवा बनाने में लगे हैं जिसे पीकर व्यक्ति अधिक समय तक जवान बना रह सके।<div><br></div><div>अमर होने का रहस्य : आज&nbsp;अमर कौन नहीं होना चाहता? समुद्र मंथन में अमृत निकला। इसे प्राप्त करने के लिए देवताओं ने दानवों के साथ एक छल किया। और देवता अमर हो गए। अभी अधिकतम 100 साल के जीवन में अनेकानेक रोग, कष्ट, संताप और झंझट होते हैं तो आज अमृत जल पिने से अमर हो जाने पर 100 साल बाद वैराग्य प्राप्त कर व्यक्ति हिमालय चला जाएगा। और वहां व्यक्ति क्या करेगा? आपको पता है वो&nbsp;बोर हो जाएगा! इस लिए आज यह संसार में नहीं आकर रहेगा। बस इसीलिए यही सिलसिला हमेशा चलता रहेगा।</div>

आपको बता दे की बर्बरीक महान पांडव भीम के पुत्र घटोत्कच और नागकन्या अहिलवती के पुत्र थे। कहीं-कहीं पर मुर दैत्य की पुत्री 'कामकंटकटा' के उदर से भी इनके जन्म होने की बात सामने आई है। बर्बरीक और घटोत्कच के बारे में कहा जाता है कि ये दोनों ही एक विशालकाय मानव थे। घटोत्कच ने कौरवों की सेना में काफी कोहराम मचा दिया था। और आखिरकार कर्ण ने उस अस्त्र का उपयोग किया जिसे वह अर्जुन पर चलाना चाहते थे लेकिन यह घटोत्कच किया और मारा गया।

महाभारत का युद्ध जब तय हो गया तो बर्बरीक ने भी युद्ध में सम्मिलित होने की अपनी इच्छा जताई और मां को हारे हुए पक्ष का साथ देने का वचन दिया। बर्बरीक अपने नीले रंग के घोड़े पर सवार होकर 3 बाण और धनुष के साथ कुरुक्षेत्र की रणभूमि में आया।

आपको बता दे की बर्बरीक के लिए तो 3 बाण ही काफी थे जिसके बल पर वे कौरव और पांडवों की पूरी सेना को समाप्त कर सकते थे। यह सब भगवान कृष्ण जानते थे तो इन्होने ब्राह्मण के वेश में उनके सामने उपस्थित होकर उनसे दान में छलपूर्वक बर्बरीक से शीश मांग लिया।
 
कृष्ण से बर्बरीक ने प्रार्थना की कि वे अंत तक ये युद्ध देखना चाहते हैं, तब कृष्ण ने उनकी यह बात स्वीकार कर ली। और ल्गुन मास की द्वादशी को उन्होंने अपने शीश का दान दिया। भगवान ने उस शीश को अमृत से सींचकर वहा की सबसे उच्चे स्थान पर रख दिया ताकि वे महाभारत युद्ध देख सकें। जहां से बर्बरीक संपूर्ण युद्ध का अच्छे से जायजा ले सकते थे।

<div><br></div>आपको बता दे की&nbsp;बर्बरीक महान पांडव भीम के पुत्र घटोत्कच और नागकन्या अहिलवती के पुत्र थे। कहीं-कहीं पर मुर दैत्य की पुत्री 'कामकंटकटा' के उदर से भी इनके जन्म होने की बात सामने आई है। बर्बरीक और घटोत्कच के बारे में कहा जाता है कि ये दोनों ही एक&nbsp;विशालकाय मानव थे। घटोत्कच ने कौरवों की सेना में काफी कोहराम मचा दिया था। और&nbsp;आखिरकार कर्ण ने उस अस्त्र का उपयोग किया जिसे वह अर्जुन पर चलाना चाहते थे लेकिन यह घटोत्कच किया और मारा गया।<div><br></div><div><div>महाभारत का युद्ध जब तय हो गया तो बर्बरीक ने भी युद्ध में सम्मिलित होने की अपनी इच्छा जताई और मां को हारे हुए पक्ष का साथ देने का वचन दिया। बर्बरीक अपने नीले रंग के घोड़े पर सवार होकर 3 बाण और धनुष के साथ कुरुक्षेत्र की रणभूमि में आया।</div><div><br></div><div>आपको बता दे की बर्बरीक के लिए तो 3 बाण ही काफी थे जिसके बल पर वे कौरव और पांडवों की पूरी सेना को समाप्त कर सकते थे। यह सब भगवान कृष्ण जानते थे तो इन्होने ब्राह्मण के वेश में उनके सामने उपस्थित होकर उनसे दान में छलपूर्वक बर्बरीक से शीश मांग लिया।</div><div>&nbsp;</div><div>कृष्ण से बर्बरीक ने प्रार्थना की कि वे अंत तक ये युद्ध देखना चाहते हैं, तब कृष्ण ने उनकी यह बात स्वीकार कर ली। और ल्गुन मास की द्वादशी को उन्होंने अपने शीश का दान दिया। भगवान ने उस शीश को अमृत से सींचकर वहा की सबसे उच्चे स्थान पर रख दिया ताकि वे महाभारत युद्ध देख सकें। जहां से बर्बरीक संपूर्ण युद्ध का अच्छे से जायजा ले सकते थे।</div></div>

आपको यह पता नहीं होगा की मथुरा से निकलकर भगवान कृष्ण ने द्वारिका क्षेत्र में ही पहले से स्थापित खंडहर हो चुके नगर क्षेत्र में एक और नए नगर की स्थापना की थी। और इनका कहना था की अपने पूर्वजों की भूमि को फिर से रहने लायक बनाया जायेगा। प्राचीन इतिहास की खोज करने वाले इतिहासकारों के अनुसार द्वारिका विश्व का सबसे रहस्यमय शहर है। इस शहर पर अभी भी काफी शोध करना बाकि है।

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गुफाएं तो भारत में बहुत हैं, जबकि अजंता-एलोरा की गुफाओं के बारे में तो आज वैज्ञानिक भी हते हैं कि ये किसी एलियंस के समूह ने बनाई हैं। यहां पर एक विशालकाय कैलाश मंदिर है। और आर्कियोलॉजिस्टों के अनुसार इसे कम से कम 4,000 साल पूर्व बनाया गया था। 40 लाख टन की चट्टानों से बनाए गए इस मंदिर को किस तकनीक से बनाया गया होगा? यह आज की आधुनिक इंजीनियरिंग की भी बस की बात नहीं है।

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आपको बता दे की जब तक कर्ण के पास उसका कवच और कुंडल हैं, तब तक उसे कोई नहीं मार सकता। ऐसे में अर्जुन की सुरक्षा भी इसके सामने फ़ैल थी। उधर देवराज इन्द्र भी चिंतित थे, क्योंकि अर्जुन उनका पुत्र था। भगवान कृष्ण और देवराज इन्द्र दोनों जानते थे कि जब तक कर्ण के पास पैदायशी कवच और कुंडल हैं, इन्हे युद्ध में कोई भी नहीं हरा सकता और ये अजेय रहेगा।

तभी कृष्ण ने देवराज इन्द्र को एक उपाय सुजय और फिर देवराज इन्द्र ने एक ब्राह्मण के वेश में कर्ण के समीप पहुंच गए। जब यह दान में कुछ न कुछ दे रहे थे तो देवराज इंद्रा भी लग गए और जब नंबर आया तो दानी कर्ण ने पूछा- विप्रवर, आज्ञा कीजिए! तभी देवराज इंद्रा ने छल से कर्ण के कवच और कुंडल दान में मांग लिए और कर्ण ने इन्हे दे दिए थे।

<div><br></div>आपको बता दे की जब तक कर्ण के पास उसका कवच और कुंडल हैं, तब तक उसे कोई नहीं मार सकता। ऐसे में अर्जुन की सुरक्षा भी इसके सामने फ़ैल थी। उधर देवराज इन्द्र भी चिंतित थे, क्योंकि अर्जुन उनका पुत्र था। भगवान कृष्ण और देवराज इन्द्र दोनों जानते थे कि जब तक कर्ण के पास पैदायशी कवच और कुंडल हैं, इन्हे युद्ध में कोई भी नहीं हरा सकता और ये अजेय रहेगा।<div><br></div><div>तभी कृष्ण ने देवराज इन्द्र को एक उपाय सुजय और फिर देवराज इन्द्र ने&nbsp;एक ब्राह्मण के वेश में कर्ण के समीप&nbsp;पहुंच गए। जब यह दान में कुछ न कुछ दे रहे थे तो देवराज इंद्रा भी लग गए और जब नंबर आया तो दानी कर्ण ने पूछा- विप्रवर, आज्ञा कीजिए! तभी देवराज इंद्रा ने छल से कर्ण के कवच और कुंडल दान में मांग लिए और कर्ण ने इन्हे दे दिए थे।</div>



आपको पता है कि भगवान विष्णु के पास सुदर्शन चक्र एक ऐसा अचूक अस्त्र था कि जिसे छोड़ने के बाद यह लक्ष्य का पीछा करता था और तब तक जाता था जब तक काम तमाम करके वापस छोड़े गए स्थान पर नहीं आ जाता था। इस चक्र को विष्णु की तर्जनी अंगुली में घूमते हुए दिखाया गया है। सबसे पहले यह चक्र उन्हीं के पास था। लेकिन यह आया कहा से उनके पास?

पुराणों की माने तो विभिन्न देवताओं के पास अपने-अपने चक्र हुआ करते थे। सभी चक्रों की अलग-अलग क्षमता होती थी और सभी के चक्रों के नाम भी होते थे। और महाभारत युद्ध में भी भगवान कृष्ण के पास अपना सुदर्शन चक्र था। यह सुदर्शन चक्र उनके पास कहां से आया था और चक्रों का जन्मदाता कौन था? क्या आज भी इस प्रकार का कोई अस्त्र शास्त्र बनाया जा सकता है? या कि यह एक चमत्कारिक शक्ति से ही संचालित होता था किसी मशीन द्वारा नहीं? ऐसे कई सवाल हैं जो रहस्य अभी भी बरकरार है। जबकि आजकल ऐसी मिसाइलें बनने लगी हैं, जो लक्ष्य को भेदकर वापस लौट आती हैं, परन्तु चक्र जैसा अस्त्र तो सचमुच ही एक अद्भुत है।
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आज पश्चिमी देशो में कई तरह की जादू-विद्या लोकप्रिय है और समाज में हर वर्ग के लोग भी इसका अभ्यास करते रहते हैं। एक समय था, जब भारत में जादूगरों की भरमार थी। और इस देश में एक से बढ़ कर एक जादूगर, सम्मोहनविद, इंद्रजाल, नट, सपेरे और करतब दिखाने वाले होते थे। बंगाल का काला जादू तो सबसे ज्यादा विश्वप्रसिद्ध था। 

यूरोप की कल्पना में भारत सदा से बेहिसाब संपत्ति और अलौकिक घटनाओं का एक अविश्वसनीय देश रहा है, और जहां बुद्धिमान, जादूगर, सिद्ध आदि व्यक्तियों की संख्या सामान्य से कुछ अधिक थी। वही विदेशी भ्रमणकर्ताओं और व्यापारियों ने भारत से कई तरह का जादू सीखा और उसे अपने देश में ले जाकर विकसित भी किया। बाद में इसी तरह के जादू का इस्तेमाल धर्म प्रचार के लिए करना चालू किया गया। 

भारत में सड़क या चौराहे पर जादूगर एक जादू दिखाते थे जिसे रस्सी का जादू या करतब कहा जाता था। बीन या पुंगी की धुन पर वह रस्सी सांप के पिटारे से निकलकर आसमान में चली जाती थी और जादूगर उसे हवा में झूले की तरह रस्सी को लड़का के चढ़कर आसमान में और वहां से कहीं गायब हो जाता था।
 
अंग्रजों के काल में किसी ने यह जादू दिखाया था, लेकिन उसके बाद से इस जादू के बारे में कभी किसी ने सुना ही जाता है। अब इसे दिखाने वाला कोई नहीं है। इसी कारण यह जादू भी विलुप्त हो गया है और आज यह कही है या नहीं पता चल नहीं सका हैं!

<div><br></div>आज पश्चिमी देशो में कई&nbsp;तरह की जादू-विद्या लोकप्रिय है और समाज में हर वर्ग के लोग भी&nbsp;इसका अभ्यास करते रहते हैं। एक समय था, जब भारत में जादूगरों की भरमार थी। और&nbsp;इस देश में एक से बढ़ कर एक जादूगर, सम्मोहनविद, इंद्रजाल, नट, सपेरे और करतब दिखाने वाले होते थे। बंगाल का काला जादू तो सबसे ज्यादा विश्वप्रसिद्ध था।&nbsp;<div><br></div><div><div>यूरोप की कल्पना में भारत सदा से बेहिसाब संपत्ति और अलौकिक घटनाओं का एक अविश्वसनीय देश रहा है, और जहां बुद्धिमान, जादूगर, सिद्ध आदि व्यक्तियों की संख्या सामान्य से कुछ अधिक थी। वही&nbsp;विदेशी भ्रमणकर्ताओं और व्यापारियों ने भारत से कई तरह का जादू सीखा और उसे अपने देश में ले जाकर विकसित भी किया। बाद में इसी तरह के जादू का इस्तेमाल धर्म प्रचार के लिए करना चालू किया गया।&nbsp;</div><div><br></div><div>भारत में सड़क या चौराहे पर जादूगर एक जादू दिखाते थे जिसे रस्सी का जादू या करतब कहा जाता था। बीन या पुंगी की धुन पर वह रस्सी सांप के पिटारे से निकलकर आसमान में चली जाती थी और जादूगर उसे हवा में झूले की तरह रस्सी को लड़का के चढ़कर आसमान में और वहां से कहीं गायब हो जाता था।</div><div>&nbsp;</div><div>अंग्रजों के काल में किसी ने यह जादू दिखाया था, लेकिन&nbsp;उसके बाद से इस जादू के बारे में कभी किसी ने सुना ही जाता है। अब इसे दिखाने वाला कोई नहीं है। इसी कारण यह जादू भी विलुप्त हो गया है और आज यह कही है या नहीं पता चल नहीं सका हैं!</div></div>

वानर प्रजाति : क्या सचमुच रामायण काल में बताए गए जामवंत एक रीछ थे और हनुमानजी एक वानर? जबकि आज भी यह रहस्य बरकरार है। यदि बजरंग बली वानर नहीं होते तो उनको रामायण और रामचरित मानस में कपि, वानर, शाखामृग, प्लवंगम, लोमश और पुच्छधारी कहकर नहीं पुकारा जाता। लंकादहन का वर्णन भी फिर पूंछ से जुड़ा हुआ नहीं होता।

कहा जाता है कि कपि नामक एक वानर जाति थी। और हनुमानजी भी उसी जाति के ब्राह्मण थे। हनुमान चालीसा की एक पंक्ति है: को नहि जानत है जग में, 'कपि' संकटमोचन नाम तिहारो।। 

आपको बता दे की कुछ लोग कपि को चिंपांजी के रूप में देखते हैं। वैज्ञानिकों की माने तो 'कपि प्रजाति' होमिनोइडेया नामक महापरिवार प्राणी जगत की सदस्य जीव जातियों में से एक थी। जीव विज्ञानी कहते हैं कि होमिनोइडेया नामक महापरिवार के प्राणी जगत की 2 प्रमुख जाति शाखाएं जिसमें से प्रथम को 'हीन कपि' दूसरी को महाकपि कहा जाता था। हीन कपि अर्थात छोटे कपि और महाकपि अर्थात बड़े आकार के मानवनुमा कपि। इन महाकपियों की 4 उपशाखाएं भी हैं- गोरिल्ला, चिंपांजी, मनुष्य तथा ओरंगउटान। 

शोधकर्ताओं के मुताबित भारतवर्ष में आज से 9 से 10 लाख वर्ष पूर्व बंदरों की एक ऐसी विलक्षण जाति में विद्यमान थी, जो आज से करीब 15 हजार साल पूर्व विलुप्त होने लगी थी और रामायण काल के बाद करीब विलुप्त ही हो गई। इस वानर जाति का नाम 'कपि' था। मानवनुमा यह प्रजाति मुख और पूंछ से बंदर जैसी नजर आती थी। भारत से दुर्भाग्यवश कपि प्रजाति समाप्त हो गई, जबकि कहा जाता है कि इंडोनेशिया देश के बाली नामक द्वीप में अब भी पुच्छधारी जंगली मनुष्यों का अस्तित्व विद्यमान है। 

आपको बताना इस लिए जरुरी है, क्योंकि उत्तरी अमेरिका और पूर्वी एशिया के बीच फ्यूनल विनिमय के कुछ सबूत पाए गए हैं। कर्क ने बताया कि यह जीवाश्म अनुकूलित प्रजातियों के अंत के संबंध में बहुत कुछ जानकारी दे सकते हैं, क्योंकि यह अमेरिका के उस वक्त कितनी विविधता रही थी इस बात के जीते- जागते यह उदाहरण थे।
<div><br></div><b>वानर प्रजाति :</b> क्या सचमुच रामायण काल में बताए गए जामवंत एक रीछ थे और हनुमानजी एक वानर? जबकि आज भी यह रहस्य बरकरार है। यदि बजरंग बली वानर नहीं होते तो उनको रामायण और रामचरित मानस में कपि, वानर, शाखामृग, प्लवंगम, लोमश और पुच्छधारी कहकर नहीं पुकारा जाता। लंकादहन का वर्णन भी फिर पूंछ से जुड़ा हुआ नहीं होता।<div><br><div><div>कहा जाता है कि कपि नामक एक वानर जाति थी। और&nbsp;हनुमानजी भी&nbsp;उसी जाति के ब्राह्मण थे। हनुमान चालीसा की एक पंक्ति है: को नहि जानत है जग में, 'कपि' संकटमोचन नाम तिहारो।।&nbsp;</div><div><br></div><div>आपको बता दे की&nbsp;कुछ लोग कपि को चिंपांजी के रूप में देखते हैं। वैज्ञानिकों की माने&nbsp;तो 'कपि प्रजाति' होमिनोइडेया नामक महापरिवार प्राणी जगत की सदस्य जीव जातियों में से एक थी। जीव विज्ञानी कहते हैं कि होमिनोइडेया नामक महापरिवार के प्राणी जगत की 2 प्रमुख जाति शाखाएं जिसमें से प्रथम को 'हीन कपि' दूसरी को महाकपि कहा जाता था। हीन कपि अर्थात छोटे कपि और महाकपि अर्थात बड़े आकार के मानवनुमा कपि। इन&nbsp;महाकपियों की 4 उपशाखाएं भी हैं- गोरिल्ला, चिंपांजी, मनुष्य तथा ओरंगउटान।&nbsp;</div><div><br></div><div>शोधकर्ताओं के मुताबित भारतवर्ष में आज से 9 से 10 लाख वर्ष पूर्व बंदरों की एक ऐसी विलक्षण जाति में विद्यमान थी, जो आज से करीब 15 हजार साल पूर्व विलुप्त होने लगी थी और रामायण काल के बाद करीब विलुप्त ही हो गई। इस वानर जाति का नाम 'कपि' था। मानवनुमा यह प्रजाति मुख और पूंछ से बंदर जैसी नजर आती थी। भारत से दुर्भाग्यवश कपि प्रजाति समाप्त हो गई, जबकि कहा जाता है कि इंडोनेशिया देश के बाली नामक द्वीप में अब भी पुच्छधारी जंगली मनुष्यों का अस्तित्व विद्यमान है।&nbsp;</div><div><br></div><div>आपको बताना इस लिए जरुरी है, क्योंकि उत्तरी अमेरिका और पूर्वी एशिया के बीच फ्यूनल विनिमय के कुछ सबूत पाए गए हैं। कर्क ने बताया कि यह जीवाश्म अनुकूलित प्रजातियों के अंत के संबंध में बहुत कुछ जानकारी दे सकते हैं, क्योंकि यह अमेरिका के उस वक्त कितनी विविधता रही थी इस बात के जीते- जागते यह उदाहरण थे।</div></div></div>

आपसे पूछा जाये की क्या कोई हजारों वर्षों तक जीवित रहे सकता है? पौराणिक और संस्कृत ग्रंथों के मुताबित भारत में ऐसे कई लोग हैं, जो हजारों सालो से ‍जीवित हैं। हिमालय में आज भी ऐसे कई ऋषि और मुनि हैं जिनकी आयु करीब 600 साल से अधिक बताई जाती है।

यानी की इन 8 लोगों (अश्वथामा, दैत्यराज बलि, वेदव्यास, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य, परशुराम और मार्कण्डेय ऋषि) का स्मरण सुबह-सुबह करने से सारी बीमारियां समाप्त होती हैं और मनुष्य 100 साल की आयु को प्राप्त करता है। अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य और भगवान परशुराम- ये सभी चिरंजीवी हैं।

आपको बता दे की पुराणों कहा गया है की अश्‍वत्थामा, बलि, व्यास, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य, परशुराम और मार्कण्डेय ऋषि के अलावा अन्य और भी ऐसे लोग हैं जिनके बारे में कहा जाता है कि वे आज इस समय भी जीवित हैं। यह संभव है कि कोई व्यक्ति हजारों साल तक जीवित रह सकता है। आयुर्वेदानुसार मनुष्य की आयु करीब 120 साल बताई गई है जबकि वह अपने योगबल से करीब 150 सालो से ज्यादा जी सकता है। कहते हैं कि प्राचीन मानव की सामान्य आयु 300 से 400 साल हुआ करती थी, क्योंकि तब धरती का वातावरण व्यक्ति को आगे के काल तक जिंदा बनाए रखने के लिए था।<div><br></div>आपसे पूछा जाये की क्या कोई हजारों वर्षों तक जीवित रहे सकता है? पौराणिक और संस्कृत ग्रंथों के मुताबित भारत में ऐसे कई लोग हैं, जो हजारों सालो से ‍जीवित हैं। हिमालय में आज भी ऐसे कई ऋषि और मुनि हैं जिनकी आयु करीब 600 साल&nbsp;से अधिक बताई जाती है।<div><br><div><div>यानी की इन 8 लोगों (अश्वथामा, दैत्यराज बलि, वेदव्यास, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य, परशुराम और मार्कण्डेय ऋषि) का स्मरण सुबह-सुबह करने से सारी बीमारियां समाप्त होती हैं और मनुष्य 100 साल की आयु को प्राप्त करता है। अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य और भगवान परशुराम- ये सभी चिरंजीवी हैं।</div><div><br></div><div>आपको&nbsp;बता दे&nbsp;की&nbsp;पुराणों कहा गया है की अश्‍वत्थामा, बलि, व्यास, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य, परशुराम और मार्कण्डेय ऋषि के अलावा अन्य और भी ऐसे लोग हैं जिनके बारे में कहा जाता है कि वे आज इस समय भी जीवित हैं। यह संभव है कि कोई व्यक्ति हजारों साल तक जीवित रह सकता है। आयुर्वेदानुसार मनुष्य की आयु करीब 120 साल बताई गई है जबकि वह अपने योगबल से करीब 150 सालो से ज्यादा जी सकता है। कहते हैं कि प्राचीन मानव की सामान्य आयु 300 से 400 साल हुआ करती थी, क्योंकि तब धरती का वातावरण व्यक्ति को आगे के काल तक जिंदा बनाए रखने के लिए था।</div></div></div>


क्या आज इच्छामृत्यु प्राप्त की जा सकती है? भीष्म पितामह के बारे में कहा जाता है कि उनको इच्छामृत्यु का वरदान मिला हुआ था।

पुराणों के मुताबित ब्रह्माजी से अत्रि, अत्रि से चन्द्रमा, चन्द्रमा से बुध और बुध से इलानंदन पुरुरवा का जन्म हुआ। पुरुरवा से आयु, आयु से राजा नहुष और नहुष से ययाति उत्पन्न हुए। ययाति से पुरु हुए। पुरु के वंश में भरत और भरत के कुल में राजा कुरु हुए। कुरु के वंश में आगे चलकर राजा प्रतीप हुए जिनके दूसरे पुत्र थे शांतनु। शांतनु का बड़ा भाई बचपन में ही ख़त्म हो गया था। और शांतनु के गंगा से देवव्रत (भीष्म) हुए। एवं भीष्म ने ब्रह्मचर्य की प्रतिज्ञा ली थी इसकारण यह वंश आगे नहीं चल सका। और भीष्म अंतिम कौरव थे।
<div><br></div>क्या आज&nbsp;इच्छामृत्यु प्राप्त की जा सकती है? भीष्म पितामह के बारे में कहा जाता है कि उनको इच्छामृत्यु का वरदान मिला हुआ था।<div><br><div>पुराणों के मुताबित ब्रह्माजी से अत्रि, अत्रि से चन्द्रमा, चन्द्रमा से बुध और बुध से इलानंदन पुरुरवा का जन्म हुआ। पुरुरवा से आयु, आयु से राजा नहुष और नहुष से ययाति उत्पन्न हुए। ययाति से पुरु हुए। पुरु के वंश में भरत और भरत के कुल में राजा कुरु हुए। कुरु के वंश में आगे चलकर राजा प्रतीप हुए जिनके दूसरे पुत्र थे शांतनु। शांतनु का बड़ा भाई बचपन में ही ख़त्म हो गया था। और&nbsp;शांतनु के गंगा से देवव्रत (भीष्म) हुए। एवं&nbsp;भीष्म ने ब्रह्मचर्य की प्रतिज्ञा ली थी इसकारण यह वंश आगे नहीं चल सका। और भीष्म अंतिम कौरव थे।</div></div>











सिंधु, सरस्वती, गंगा, नर्मदा और ब्रह्मपुत्र : उक्त 5 नदियों को भारत और विशेषकर हिन्दू धर्म में बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। उक्त पांचों नदियों का जल एक-दूसरे से अलग है जबकि उनमें से नर्मदा नदी को छोड़कर बाकी नदियां हिमालय के एक ही स्थान से निकलने वाली नदियां हैं। नर्मदा एकमात्र ऐसी नदी है, जो सभी नदियों की अपेक्षा विपरीत दिशा में बहती है और इसे पाताल की नदी कहते हैं।
 
सरस्वती : सरस्वती नदी का तो अब भूगर्भीय हलचलों के कारण अस्तित्व लुप्त हो गया जबकि आज भी वह राजस्थान और हरियाणा के कुछ क्षेत्रों में अपने होने का एक अहसास दिलाती है। और कहते हैं कि करीब 18 ईसापूर्व इस नदी का अस्तित्व मिट गया। इस नदी के किनारे बैठकर ही वेद की ऋ‍चाओं का जन्म हुआ और भगवान ब्रह्मा ने अपने कई महत्वपूर्ण यज्ञ संपन्न भी किए। प्राचीन सभ्यताओं की जननी सरस्वती नदी आज भी एक रहस्य है आज उन लोगों को लिए जो जान-बूझकर इसका अस्तित्व नहीं स्वीकारना चाहते हैं।

शोधानुसार यह सभ्यता करीब 9,000 ईसा पूर्व अस्तित्व में आई थी और 3,000 ईसापूर्व उसने स्वर्ण युग देखा और करीब 1800 ईसा पूर्व आते-आते यह लुप्त हो गया। कहा जाता है कि 1,800 ईसा पूर्व के आसपास किसी भयानक प्राकृतिक आपदा के कारण एक और जहां सरस्वती नदी लुप्त हो गई वहीं दूसरी ओर इस क्षेत्र के लोगों ने पश्चिम की ओर पलायन कर दिया। पुरात्ववेत्ता मेसोपोटामिया (5000-300 ईसापूर्व) को सबसे प्राचीन बताते हैं, जबकि अभी इस सरस्वती सभ्यता पर शोध करना जरुरी आवश्यकता है।

गंगा नदी : यह एक रहस्य ही है कि आखिरकार गंगा नदी का पानी कभी भी क्यों नहीं सड़ता? जबकि वैज्ञानिक बताते हैं कि इस नदी में 3 प्रकार के ऐसे बैक्टीरिया पाए जाते हैं, जो अन्य सभी प्रकार के बैक्टीरियाओं को खा जाते हैं जिसके चलते इसका पानी सड़ता नहीं है। मान्यता hai की यह भारत की सबसे और उच्च पवित्र और रहस्यमय नदी है। इसे राम के वंशज राजा भगीरथ ने स्वर्ग से नीचे उतारा था।


<div><br></div><b>सिंधु, सरस्वती, गंगा, नर्मदा और ब्रह्मपुत्र : </b>उक्त 5 नदियों को भारत और विशेषकर हिन्दू धर्म में बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। उक्त पांचों नदियों का जल एक-दूसरे से अलग है जबकि उनमें से नर्मदा नदी को छोड़कर बाकी नदियां हिमालय के एक ही स्थान से निकलने वाली नदियां हैं। नर्मदा एकमात्र ऐसी नदी है, जो सभी नदियों की अपेक्षा विपरीत दिशा में बहती है और इसे पाताल की नदी कहते हैं।<div>&nbsp;</div><div><div><b>सरस्वती :</b> सरस्वती नदी का तो अब भूगर्भीय हलचलों के कारण अस्तित्व लुप्त हो गया जबकि आज भी वह राजस्थान और हरियाणा के कुछ क्षेत्रों में अपने होने का एक अहसास दिलाती है। और&nbsp;कहते हैं कि करीब 18 ईसापूर्व इस नदी का अस्तित्व मिट गया। इस नदी के किनारे बैठकर ही वेद की ऋ‍चाओं का जन्म हुआ और भगवान ब्रह्मा ने अपने कई महत्वपूर्ण यज्ञ संपन्न भी किए। प्राचीन सभ्यताओं की जननी सरस्वती नदी आज भी एक रहस्य है आज उन लोगों को लिए जो जान-बूझकर इसका अस्तित्व नहीं स्वीकारना चाहते हैं।</div></div><div><br></div><div><div>शोधानुसार यह सभ्यता करीब 9,000 ईसा पूर्व अस्तित्व में आई थी और 3,000 ईसापूर्व उसने स्वर्ण युग देखा और करीब 1800 ईसा पूर्व आते-आते यह लुप्त हो गया। कहा जाता है कि 1,800 ईसा पूर्व के आसपास किसी भयानक प्राकृतिक आपदा के कारण एक और जहां सरस्वती नदी लुप्त हो गई वहीं दूसरी ओर इस क्षेत्र के लोगों ने पश्चिम की ओर पलायन कर दिया। पुरात्ववेत्ता मेसोपोटामिया (5000-300 ईसापूर्व) को सबसे प्राचीन बताते हैं, जबकि अभी इस&nbsp;सरस्वती सभ्यता पर शोध करना जरुरी आवश्यकता है।</div><div><br></div><div><b>गंगा नदी :</b> यह एक रहस्य ही है कि आखिरकार गंगा नदी का पानी कभी भी क्यों नहीं सड़ता? जबकि वैज्ञानिक बताते हैं कि इस नदी में 3 प्रकार के ऐसे बैक्टीरिया पाए जाते हैं, जो अन्य सभी प्रकार के बैक्टीरियाओं को खा जाते हैं जिसके चलते इसका पानी सड़ता नहीं है। मान्यता <span id="5_TRN_n">hai की&nbsp;</span>यह भारत की सबसे और उच्च पवित्र और रहस्यमय नदी है। इसे राम के वंशज राजा भगीरथ ने स्वर्ग से नीचे उतारा था।</div></div>

गरूड़ वाहन : गरूड़ का हिन्दू धर्म में एक महत्वपूर्ण स्थान है। वे पक्षियों के राजा और भगवान विष्णु के वाहन हैं। भगवान गरूड़ को कश्यप ऋषि और विनीता का पुत्र कहा गया है। विनीता दक्ष कन्या थीं। गरूड़ के बड़े भाई का नाम अरुण है, जो भगवान सूर्य के रथ का सारथी है। पक्षीराज गरूड़ को जीव विज्ञान में लेपटोटाइल्स जावानिकस कहते हैं। यह इंटरनेशनल यूनियन कंजरवेशन ऑफ नेचर की रेड लिस्ट यानी विलुप्तप्राय पक्षी की श्रेणी में है। पंचतंत्र में गरूड़ की कई सारी कहानियां हैं।

प्राचीन मंदिरों के द्वार पर एक ओर गरूड़, तो दूसरी ओर हनुमानजी की मूर्ति आवेष्‍ठित की जाती रही है। घर में रखे मंदिर में गरूड़ घंटी और मंदिर के शिखर पर गरूड़ ध्वज होता है। इनके नाम से एक व्रत, पुराण भी है। एवं भगवान गरूड़ को विनायक, गरुत्मत्, तार्क्ष्य, वैनतेय, नागान्तक, विष्णुरथ, खगेश्वर, सुपर्ण और पन्नगाशन नाम से भी जाना जाता है।

अब सवाल यह भी उठता है कि आखिर क्या कभी पक्षी मानव हुआ करते थे? पुराणों में भगवान गरूड़ के पराक्रम के बारे में कई कथाओं का वर्णन मिलता है। की गरुड़ ने देवताओं से युद्ध करके उनसे अमृत कलश को छीन लिया था। उन्होंने भगवान राम को नागपाश से भी मुक्त कराया था। गरुड़ को अपनी शक्ति पर बड़ा घमंड हो गया था जबकि हनुमानजी ने उनका घमंड चूर-चूर कर दिया था।
 
चेन्नई से 60 किलोमीटर दूर एक तीर्थस्थल है जिसे 'पक्षी तीर्थ' कहा जाता है। आपको बता दे की यह तीर्थस्थल वेदगिरि पर्वत के ऊपर है। कई सदियों से दोपहर के वक्त गरूड़ का जोड़ा सुदूर आकाश से उतर आता है और फिर मंदिर के पुजारी द्वारा दिए गए खाद्यान्न को ग्रहण करके आकाश में लौट जाता है। 

aaj सैकड़ों लोग उनका दर्शन करने के लिए वहां पहले से ही उपस्थित हुए रहते हैं। वहां के पुजारी के अनुसार सतयुग में ब्रह्मा के 8 मानसपुत्र शिव के शाप से गरूड़ बन गए थे। उनमें से 2 सतयुग के अंत में, 2 त्रेता के अंत में, 2 द्वापर के अंत में शाप से मुक्त हो चुके हैं। ऐसा कहा जाता है कि अब जो 2 बचे हुए वे कलयुग के अंत में मुक्त

<div><br></div><b>गरूड़ वाहन :</b> गरूड़ का हिन्दू धर्म में एक महत्वपूर्ण स्थान है। वे पक्षियों के राजा और भगवान विष्णु के वाहन हैं। भगवान गरूड़ को कश्यप ऋषि और विनीता का पुत्र कहा गया है। विनीता दक्ष कन्या थीं। गरूड़ के बड़े भाई का नाम अरुण है, जो भगवान सूर्य के रथ का सारथी है। पक्षीराज गरूड़ को जीव विज्ञान में लेपटोटाइल्स जावानिकस कहते हैं। यह इंटरनेशनल यूनियन कंजरवेशन ऑफ नेचर की रेड लिस्ट यानी विलुप्तप्राय पक्षी की श्रेणी में है। पंचतंत्र में गरूड़ की कई सारी कहानियां हैं।<div><br></div><div><div>प्राचीन मंदिरों के द्वार पर एक ओर गरूड़, तो दूसरी ओर हनुमानजी की मूर्ति आवेष्‍ठित की जाती रही है। घर में रखे मंदिर में गरूड़ घंटी और मंदिर के शिखर पर गरूड़ ध्वज होता है। इनके नाम से एक व्रत, पुराण भी है। एवं भगवान गरूड़ को विनायक, गरुत्मत्, तार्क्ष्य, वैनतेय, नागान्तक, विष्णुरथ, खगेश्वर, सुपर्ण और पन्नगाशन नाम से भी जाना जाता है।</div><div><br></div><div>अब सवाल यह भी&nbsp;उठता है कि आखिर क्या कभी पक्षी मानव हुआ करते थे? पुराणों में भगवान गरूड़ के पराक्रम के बारे में कई कथाओं का वर्णन मिलता है। की गरुड़ ने&nbsp;देवताओं से युद्ध करके उनसे अमृत कलश को छीन लिया था। उन्होंने भगवान राम को नागपाश से भी मुक्त कराया था। गरुड़ को अपनी शक्ति पर बड़ा घमंड हो गया था जबकि हनुमानजी ने उनका घमंड चूर-चूर कर दिया था।</div><div>&nbsp;</div><div>चेन्नई से 60 किलोमीटर दूर एक तीर्थस्थल है जिसे 'पक्षी तीर्थ' कहा जाता है। आपको बता दे की यह तीर्थस्थल वेदगिरि पर्वत के ऊपर है। कई सदियों से दोपहर के वक्त गरूड़ का जोड़ा सुदूर आकाश से उतर आता है और फिर मंदिर के पुजारी द्वारा दिए गए खाद्यान्न को ग्रहण करके आकाश में लौट जाता है।&nbsp;</div><div><br></div><div><span id="5_TRN_m">aaj&nbsp;</span>सैकड़ों लोग उनका दर्शन करने के लिए वहां पहले से ही उपस्थित हुए रहते हैं। वहां के पुजारी के अनुसार सतयुग में ब्रह्मा के 8 मानसपुत्र शिव के शाप से गरूड़ बन गए थे। उनमें से 2 सतयुग के अंत में, 2 त्रेता के अंत में, 2 द्वापर के अंत में शाप से मुक्त हो चुके हैं। ऐसा&nbsp;कहा जाता है कि अब जो 2 बचे हुए वे कलयुग के अंत में मुक्त <span id="5_TRN_r">ho <span id="5_TRN_s">jayenge</span></span>।</div></div>