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Saturday, 27 January 2018

सेकुलर मीडिया अब तक सिर्फ समुदाय विशेष के नाम को रट रही

जब सबके लिए एक ही है देश , तो किस आधार पर "समुदाय विशेष

जब बात समानता की हो , समरूपता की हो तो ये विशेष शब्द कहीं न कहीं सवाल भी खड़े करता है और सन्देह भी पैदा करता है . ये नाम किसने दिए और किस आधार पर दिए इसकी विवेचना जरूर होनी चाहिए क्योंकि जहां VIP कल्चर के नाम पर जनता किसी मंत्री या अधिकारी की गाड़ी पर लाल या नीली बत्ती तक नहीं देखना चाहती वहीं किसी पूरे समुदाय के साथ विशेष शब्द लगाना किस साजिश का संकेत माना जाय ?
कासगंज में हुतात्मा हुए चन्दन की हत्या के बाद उनके सामाजिक जीवन की तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हो रही हैं ..हैरानी की बात ये है कि करणी सेना के प्रदर्शन को राजपूत का ठप्पा मारने वाली तथाकथित सेकुलर मीडिया अब तक सिर्फ समुदाय विशेष के नाम को रट रही और उनकी रिपोर्टिंग में वो धार नही दिख रही जो उन्होंने राजपूतो के खिलाफ दिखाई थी ..
रिपोर्टिंग का प्रकार देखिए कि सिनेमा घरों में तोड़फोड़ का जाति , मत , मज़हब सब घोषित कुछ पलो में हो गया लेकिन अब तक चन्दन के कातिलों के साथ हत्यारा शब्द भी नही जोड़ा गया है ..इस दोगलेपन का इलाज क्या है ये तो समय के गर्भ में छिपा है लेकिन समुदाय विशेष क्यों व किसे कहा जाता है इसका जवाब अभी बाकी है ...सवाल ये भी है कि चंदन पर कहीं पहले से तो निशाना नहीं था ? क्या उसके सामाजिक कार्य किसी की नजरों में खटक रहे थे ?

Thursday, 25 January 2018

१८ पुराण के नाम और उनका महत्त्व

महृर्षि वेदव्यास ने 18 पुराणों का संस्कृत भाषा में संकलन किया है। ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश उन पुराणों के मुख्य देव हैं। त्रिमूर्ति के प्रत्येक भगवान स्वरूप को छः पुराण समर्पित किये गये हैं। आइए जानते है 18 पुराणों के बारे में।

जानिए महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित 18 पुराणों के बारें में !!!!!
पुराण शब्द का अर्थ है प्राचीन कथा। पुराण विश्व साहित्य के प्रचीनत्म ग्रँथ हैं। उन में लिखित ज्ञान और नैतिकता की बातें आज भी प्रासंगिक, अमूल्य तथा मानव सभ्यता की आधारशिला हैं। वेदों की भाषा तथा शैली कठिन है। पुराण उसी ज्ञान के सहज तथा रोचक संस्करण हैं। उन में जटिल तथ्यों को कथाओं के माध्यम से समझाया गया है। पुराणों का विषय नैतिकता, विचार, भूगोल, खगोल, राजनीति, संस्कृति, सामाजिक परम्परायें, विज्ञान तथा अन्य विषय हैं।

महृर्षि वेदव्यास ने 18 पुराणों का संस्कृत भाषा में संकलन किया है। ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश उन पुराणों के मुख्य देव हैं। त्रिमूर्ति के प्रत्येक भगवान स्वरूप को छः पुराण समर्पित किये गये हैं। आइए जानते है 18 पुराणों के बारे में।


1.ब्रह्म पुराण – ब्रह्म पुराण सब से प्राचीन है। इस पुराण में 246 अध्याय तथा 14000 श्र्लोक हैं। इस ग्रंथ में ब्रह्मा की महानता के अतिरिक्त सृष्टि की उत्पत्ति, गंगा आवतरण तथा रामायण और कृष्णावतार की कथायें भी संकलित हैं। इस ग्रंथ से सृष्टि की उत्पत्ति से लेकर सिन्धु घाटी सभ्यता तक की कुछ ना कुछ जानकारी प्राप्त की जा सकती है।

2.पद्म पुराण - पद्म पुराण में 55000 श्र्लोक हैं और यह ग्रंथ पाँच खण्डों में विभाजित है जिन के नाम सृष्टिखण्ड, स्वर्गखण्ड, उत्तरखण्ड, भूमिखण्ड तथा पातालखण्ड हैं। इस ग्रंथ में पृथ्वी आकाश, तथा नक्षत्रों की उत्पति के बारे में उल्लेख किया गया है। चार प्रकार से जीवों की उत्पत्ति होती है जिन्हें उदिभज, स्वेदज, अणडज तथा जरायुज की श्रेणा में रखा गया है। यह वर्गीकरण पुर्णत्या वैज्ञायानिक है। भारत के सभी पर्वतों तथा नदियों के बारे में भी विस्तरित वर्णन है। इस पुराण में शकुन्तला दुष्यन्त से ले कर भगवान राम तक के कई पूर्वजों का इतिहास है। शकुन्तला दुष्यन्त के पुत्र भरत के नाम से हमारे देश का नाम जम्बूदीप से भरतखण्ड और पश्चात भारत पडा था।

3.विष्णु पुराण - विष्णु पुराण में 6 अँश तथा 23000 श्र्लोक हैं। इस ग्रंथ में भगवान विष्णु, बालक ध्रुव, तथा कृष्णावतार की कथायें संकलित हैं। इस के अतिरिक्त सम्राट पृथु की कथा भी शामिल है जिस के कारण हमारी धरती का नाम पृथ्वी पडा था। इस पुराण में सू्र्यवँशी तथा चन्द्रवँशी राजाओं का इतिहास है। भारत की राष्ट्रीय पहचान सदियों पुरानी है जिस का प्रमाण विष्णु पुराण के निम्नलिखित शलोक में मिलता हैःउत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तद भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः।(साधारण शब्दों में इस का अर्थ है कि वह भूगौलिक क्षेत्र जो उत्तर में हिमालय तथा दक्षिण में सागर से घिरा हुआ है भारत देश है तथा उस में निवास करने वाले सभी जन भारत देश की ही संतान हैं।) भारत देश और भारत वासियों की इस से स्पष्ट पहचान और क्या हो सकती है? विष्णु पुराण वास्तव में ऐक ऐतिहासिक ग्रंथ है।

4.शिव पुराण – शिव पुराण में 24000 श्र्लोक हैं तथा यह सात संहिताओं में विभाजित है। इस ग्रंथ में भगवान शिव की महानता तथा उन से सम्बन्धित घटनाओं को दर्शाया गया है। इस ग्रंथ को वायु पुराण भी कहते हैं। इस में कैलाश पर्वत, शिवलिंग तथा रुद्राक्ष का वर्णन और महत्व, सप्ताह के दिनों के नामों की रचना, प्रजापतियों तथा काम पर विजय पाने के सम्बन्ध में वर्णन किया गया है। सप्ताह के दिनों के नाम हमारे सौर मण्डल के ग्रहों पर आधारित हैं और आज भी लगभग समस्त विश्व में प्रयोग किये जाते हैं।

5.भागवत पुराण –भागवत पुराण में 18000 श्र्लोक हैं तथा 12 स्कंध हैं। इस ग्रंथ में अध्यात्मिक विषयों पर वार्तालाप है। भक्ति, ज्ञान तथा वैराग्य की महानता को दर्शाया गया है। विष्णु और कृष्णावतार की कथाओं के अतिरिक्त महाभारत काल से पूर्व के कई राजाओं, ऋषि मुनियों तथा असुरों की कथायें भी संकलित हैं। इस ग्रंथ में महाभारत युद्ध के पश्चात श्रीकृष्ण का देहत्याग, द्वारिका नगरी के जलमग्न होने और यदु वंशियों के नाश तक का विवरण भी दिया गया है।

6.नारद पुराण - नारद पुराण में 25000 श्र्लोक हैं तथा इस के दो भाग हैं। इस ग्रंथ में सभी 18 पुराणों का सार दिया गया है। प्रथम भाग में मन्त्र तथा मृत्यु पश्चात के क्रम आदि के विधान हैं। गंगा अवतरण की कथा भी विस्तार पूर्वक दी गयी है। दूसरे भाग में संगीत के सातों स्वरों, सप्तक के मन्द्र, मध्य तथा तार स्थानों, मूर्छनाओं, शुद्ध एवं कूट तानो और स्वरमण्डल का ज्ञान लिखित है। संगीत पद्धति का यह ज्ञान आज भी भारतीय संगीत का आधार है। जो पाश्चात्य संगीत की चकाचौंध से चकित हो जाते हैं उन के लिये उल्लेखनीय तथ्य यह है कि नारद पुराण के कई शताब्दी पश्चात तक भी पाश्चात्य संगीत में केवल पाँच स्वर होते थे तथा संगीत की थ्योरी का विकास शून्य के बराबर था। मूर्छनाओं के आधार पर ही पाश्चात्य संगीत के स्केल बने हैं।

7.मार्कण्डेय पुराण –अन्य पुराणों की अपेक्षा यह छोटा पुराण है। मार्कण्डेय पुराण में 9000 श्र्लोक तथा 137 अध्याय हैं। इस ग्रंथ में सामाजिक न्याय और योग के विषय में ऋषिमार्कण्डेय तथा ऋषि जैमिनि के मध्य वार्तालाप है। इस के अतिरिक्त भगवती दुर्गा तथा श्रीक़ृष्ण से जुड़ी हुयी कथायें भी संकलित हैं।

8.अग्नि पुराण – अग्नि पुराण में 383 अध्याय तथा 15000 श्र्लोक हैं। इस पुराण को भारतीय संस्कृति का ज्ञानकोष (इनसाईक्लोपीडिया) कह सकते है। इस ग्रंथ में मत्स्यावतार, रामायण तथा महाभारत की संक्षिप्त कथायें भी संकलित हैं। इस के अतिरिक्त कई विषयों पर वार्तालाप है जिन में धनुर्वेद, गान्धर्व वेद तथा आयुर्वेद मुख्य हैं। धनुर्वेद, गान्धर्व वेद तथा आयुर्वेद को उप-वेद भी कहा जाता है।

9.भविष्य पुराण –भविष्य पुराण में 129 अध्याय तथा 28000 श्र्लोक हैं। इस ग्रंथ में सूर्य का महत्व, वर्ष के 12 महीनों का निर्माण, भारत के सामाजिक, धार्मिक तथा शैक्षिक विधानों आदि कई विषयों पर वार्तालाप है। इस पुराण में साँपों की पहचान, विष तथा विषदंश सम्बन्धी महत्वपूर्ण जानकारी भी दी गयी है। इस पुराण की कई कथायें बाईबल की कथाओं से भी मेल खाती हैं। इस पुराण में पुराने राजवँशों के अतिरिक्त भविष्य में आने वाले नन्द वँश, मौर्य वँशों, मुग़ल वँश, छत्रपति शिवा जी और महारानी विक्टोरिया तक का वृतान्त भी दिया गया है। ईसा के भारत आगमन तथा मुहम्मद और कुतुबुद्दीन ऐबक का जिक्र भी इस पुराण में दिया गया है। इस के अतिरिक्त विक्रम बेताल तथा बेताल पच्चीसी की कथाओं का विवरण भी है। सत्य नारायण की कथा भी इसी पुराण से ली गयी है।
10.ब्रह्म वैवर्त पुराण (Brahma Vaivarta Purana)–

ब्रह्माविवर्ता पुराण में 18000 श्र्लोक तथा 218 अध्याय हैं। इस ग्रंथ में ब्रह्मा, गणेश, तुल्सी, सावित्री, लक्ष्मी, सरस्वती तथा क़ृष्ण की महानता को दर्शाया गया है तथा उन से जुड़ी हुयी कथायें संकलित हैं। इस पुराण में आयुर्वेद सम्बन्धी ज्ञान भी संकलित है।

11.लिंग पुराण – लिंग पुराण में 11000 श्र्लोक और 163 अध्याय हैं। सृष्टि की उत्पत्ति तथा खगौलिक काल में युग, कल्प आदि की तालिका का वर्णन है। राजा अम्बरीष की कथा भी इसी पुराण में लिखित है। इस ग्रंथ में अघोर मंत्रों तथा अघोर विद्या के सम्बन्ध में भी उल्लेख किया गया है।

12.वराह पुराण –वराह पुराण में 217 स्कन्ध तथा 10000 श्र्लोक हैं। इस ग्रंथ में वराह अवतार की कथा के अतिरिक्त भागवत गीता महामात्या का भी विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। इस पुराण में सृष्टि के विकास, स्वर्ग, पाताल तथा अन्य लोकों का वर्णन भी दिया गया है। श्राद्ध पद्धति, सूर्य के उत्तरायण तथा दक्षिणायन विचरने, अमावस और पूर्णमासी के कारणों का वर्णन है। महत्व की बात यह है कि जो भूगौलिक और खगौलिक तथ्य इस पुराण में संकलित हैं वही तथ्य पाश्चात्य जगत के वैज्ञिानिकों को पंद्रहवी शताब्दी के बाद ही पता चले थे।

13.स्कन्द पुराण – स्कन्द पुराण सब से विशाल पुराण है तथा इस पुराण में 81000 श्र्लोक और छः खण्ड हैं। स्कन्द पुराण में प्राचीन भारत का भूगौलिक वर्णन है जिस में 27 नक्षत्रों, 18 नदियों, अरुणाचल प्रदेश का सौंदर्य, भारत में स्थित 12 ज्योतिर्लिंगों, तथा गंगा अवतरण के आख्यान शामिल हैं। इसी पुराण में स्याहाद्री पर्वत श्रंखला तथा कन्या कुमारी मन्दिर का उल्लेख भी किया गया है। इसी पुराण में सोमदेव, तारा तथा उन के पुत्र बुद्ध ग्रह की उत्पत्ति की अलंकारमयी कथा भी है।

14.वामन पुराण - वामन पुराण में 95 अध्याय तथा 10000 श्र्लोक तथा दो खण्ड हैं। इस पुराण का केवल प्रथम खण्ड ही उपलब्ध है। इस पुराण में वामन अवतार की कथा विस्तार से कही गयी हैं जो भरूचकच्छ (गुजरात) में हुआ था। इस के अतिरिक्त इस ग्रंथ में भी सृष्टि, जम्बूदूीप तथा अन्य सात दूीपों की उत्पत्ति, पृथ्वी की भूगौलिक स्थिति, महत्वशाली पर्वतों, नदियों तथा भारत के खण्डों का जिक्र है।

15.कुर्मा पुराण – कुर्मा पुराण में 18000 श्र्लोक तथा चार खण्ड हैं। इस पुराण में चारों वेदों का सार संक्षिप्त रूप में दिया गया है। कुर्मा पुराण में कुर्मा अवतार से सम्बन्धित सागर मंथन की कथा विस्तार पूर्वक लिखी गयी है। इस में ब्रह्मा, शिव, विष्णु, पृथ्वी, गंगा की उत्पत्ति, चारों युगों, मानव जीवन के चार आश्रम धर्मों, तथा चन्द्रवँशी राजाओं के बारे में भी वर्णन है।

16.मतस्य पुराण– मतस्य पुराण में 290 अध्याय तथा 14000 श्र्लोक हैं। इस ग्रंथ में मतस्य अवतार की कथा का विस्तरित उल्लेख किया गया है। सृष्टि की उत्पत्ति हमारे सौर मण्डल के सभी ग्रहों, चारों युगों तथा चन्द्रवँशी राजाओं का इतिहास वर्णित है। कच, देवयानी, शर्मिष्ठा तथा राजा ययाति की रोचक कथा भी इसी पुराण में है।

17.गरुड़ पुराण –गरुड़ पुराण में 279 अध्याय तथा 18000 श्र्लोक हैं। इस ग्रंथ में मृत्यु पश्चात की घटनाओं, प्रेत लोक, यम लोक, नरक तथा 84 लाख योनियों के नरक स्वरुपी जीवन आदि के बारे में विस्तार से बताया गया है। इस पुराण में कई सूर्यवँशी तथा चन्द्रवँशी राजाओं का वर्णन भी है। साधारण लोग इस ग्रंथ को पढ़ने से हिचकिचाते हैं क्योंकि इस ग्रंथ को किसी परिचित की मृत्यु होने के पश्चात ही पढ़वाया जाता है। वास्तव में इस पुराण में मृत्यु पश्चात पुनर्जन्म होने पर गर्भ में स्थित भ्रूण की वैज्ञानिक अवस्था सांकेतिक रूप से बखान की गयी है जिसे वैतरणी नदी आदि की संज्ञा दी गयी है। समस्त यूरोप में उस समय तक भ्रूण के विकास के बारे में कोई भी वैज्ञानिक जानकारी नहीं थी।

18.ब्रह्माण्ड पुराण -ब्रह्माण्ड पुराण में 12000 श्र्लोक तथा पू्र्व, मध्य और उत्तर तीन भाग हैं। मान्यता है कि अध्यात्म रामायण पहले ब्रह्माण्ड पुराण का ही एक अंश थी जो अभी एक पृथक ग्रंथ है। इस पुराण में ब्रह्माण्ड में स्थित ग्रहों के बारे में वर्णन किया गया है। कई सूर्यवँशी तथा चन्द्रवँशी राजाओं का इतिहास भी संकलित है। सृष्टि की उत्पत्ति के समय से ले कर अभी तक सात मनोवन्तर (काल) बीत चुके हैं जिन का विस्तरित वर्णन इस ग्रंथ में किया गया है। परशुराम की कथा भी इस पुराण में दी गयी है। इस ग्रँथ को विश्व का प्रथम खगोल शास्त्र कह सकते है। भारत के ऋषि इस पुराण के ज्ञान को इण्डोनेशिया भी ले कर गये थे जिस के प्रमाण इण्डोनेशिया की भाषा में मिलते है।

Wednesday, 24 January 2018

महाभारत गवाह है कि द्रौपदी के चीर पर हाथ डालने वाले का सम्पूर्ण कुल नाश हो गया था ..रामायण भी बताती है कि माँ सीता का हरण करने वाले रावण की लंका धू धूं कर जल गई थी

नारी के सम्मान के लिए तो लंका तक जला कर राख दी गयी थी, ख़िलजी भक्त भंसाली वीर हनुमान जी को भी याद करें - सुरेश चव्हाणके
उन्होंने कहा है कि वो भारत को इतिहास बताएंगे, AC से बाहर न निकलने वाले अब जौहर के आग की तपिश को नापेंगे..किस नियम, किस आधार पर इसे शायद वो न बता सकें लेकिन वो निकल पड़े हैं उन तमाम तथाकथित झोलाछाप इतिहासकारों की किताबें पढ़ कर जिन्होंने भगवान श्रीराम तक के अस्तित्व पर सवाल उठा दिए थे .. भंसाली भारत का इतिहास ठीक से पढ़े होते तो नारियो के सम्मान के लिए भारत की गौरवगाथा में कई ऐसे उदाहरण मिले होते की उनकी हिम्मत भी नही होती भारत की जौहर रचाने वाली रानी पद्मिनी के ऊपर साजिश रचने की ..

महाभारत गवाह है कि द्रौपदी के चीर पर हाथ डालने वाले का सम्पूर्ण कुल नाश हो गया था ..रामायण भी बताती है कि माँ सीता का हरण करने वाले रावण की लंका धू धूं कर जल गई थी ..उन्हें ये भी पता होना चाहिए कि माता पार्वती के अग्नि प्रवेश के बाद महादेव ने दक्ष को शीश विहीन कर डाला था ... भंसाली अलाउद्दीन की भक्ति त्याग कर यदि इन प्रमाणों पर विचार करेंगे तो उन्हें या तो अपने किये का डर होगा या अपने कुकर्मों पर पश्चाताप .. इतना तो तय है कि धर्म पर अधर्म को अब कभी हावी नहीं होने दिया जाएगा क्योंकि अब सब जागरूक हो चुके हैं ..

Monday, 22 January 2018

307 लोगों के कातिल अब्दुल सुभान को कहा जाता है भारत का 'ओसामा

2008 गुजरात ब्लास्ट का मास्टरमाइंड आतंकी अब्दुल सुभान कुरैशी गिरफ्तार

दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच के हत्थे चढ़ा मोस्टवांटेड आतंकी अब्दुल सुभान कुरैशी को बम का एक्सपर्ट माना जाता है, ऐसी भी खबरें उसे लेकर समाने आई है कि उसने बेंगलुरू और हैदराबाद की टॉप आईटी कंपनियों के साथ काम भी किया था. दिल्ली पुलिस और एनआई की टीम ने एक मुठभेड़ के बाद इस आंतकी को दिल्ली के गाजीपुर इलाके से गिरफ्तार किया है. अब्दुल कुरैशी को भारत का ओसामा बिन लादेन कहा जाता था, यह अपना वेश बदलने में मास्टर था. इसी के चलते इसने कई बार पुलिस को गच्चा दिया. 
नेपाल में अंग्रेजी शिक्षक के रूप में काम कर रहा था
आतंकी सुभान  पिछले कई सालों से नेपाल में रह रहा था. वह बिहार के रक्सौल के रास्ते नेपाल में घुसा और वहां ही रहने लगा. नेपाल में आतंकी सुभान कुरैशी अंग्रेजी के टीचर के रूप में काम कर रहा था. इसके बाद सुभान फर्जी दस्तावेजों के जरिए विदेश गया था. 
फर्जी दस्तावेजों के दम पर दो साल विदेश में रहा आतंकी
2015 से 2017 के बीच में यह सऊदी अरब चला गया था. विदेश में इसका कई लोगों से संपर्क हुआ. यह दोबारा भारत आया था क्योंकि इसे इंडियन मुजाहिद्दीन को दोबारा से खड़ा था. यह दिल्ली में अपने किसी साथी से मिलने के लिए आया था. इसके पास से 9 एमएम पिस्टल मिली है और कुछ कारतूस भी मिले है. इसके पास से पुलिस को नेपाल का फर्जी पासपोर्ट भी मिला है. पुलिस ने बताया कि इसको गिरफ्तार करने के दौरान दिल्ली पुलिस और एनआईए की टीम ने साझा अभियान चलाया. इस दौरान 12 से 13 राउंड फायरिंग भी हुई.
इंडियन मुजाहिद्दीन को दोबारा खड़ा करना चाहता था
दिल्ली पुलिस ने इस आतंकी की गिरफ्तारी पर कहा है कि, यह आतंकी इंडियन मुजाहिद्दीन का फाउंडर रहा है और दोबारा से अपने आतंकी संगठन को भारत में खड़ा करने की फिराक में था. यूपी महाराष्ट्र कर्नाटक में आईएम को सक्रिय कर रहा था. 2008 में आतंकी सुभान गुजरात भाग गया था और यहां इसने रियाज भटकल के साथ धमाकों की साजिश रची थी. आतंकी सुभान पर कई राज्यों की पुलिस की नजर थी.
अपने साथी से मिलने के लिए दिल्ली आया था आतंकी
पुलिस ने 26 जनवरी के मौके पर दिल्ली में इस आतंकी द्वारा किसी भी तरह की साजिश किए जाने की खबरों को खारिज किया है. पुलिस ने बताया है कि  यह दिल्ली में किसी भी वारदात को अंजाम देने के लिए नहीं आया था. दिल्ली के गाजीपुर में सुभान अपने एक साथी से मिलने के लिए आया था.
मुंबई में ट्रेन में हुए ब्लास्ट का भी संदिग्ध
आतंकी अब्दुल कुरैशी दिल्ली, अहमदाबाद और बेंगलुरु में हुए ब्लास्ट में शामिल था. कुरैशी साल 2006 में मुंबई में ट्रेन में हुए ब्लास्ट का भी संदिग्ध माना जाता है. अब्दुल सुभान कुरैशी साल 2008 में गुजरात में हुए सीरियल धमाकों का मास्टर माइंड बताया जा रहा है.  
अहमदाबाद 2008 ब्लास्ट
अहमदाबाद में  26 जुलाई साल 2008 को शहर की 21 अलग-अलग जगहों पर धमाके हुए थे. ये सभी धमाके 70 मिनट के अंतराल में हुए. इन धमाकों में 56 लोगों की मौत हुई थी और 200 लोग घायल हुए थे. आतंकियों ने जयपुर में हुए सीरियल ब्लास्ट की तरह ही यहां भी टिफिन में बम रखे थे और इन्हें प्लांट करने के लिए साइकिल का इस्तेमाल किया था. इससे पहले 13 मई 2008 को जयपुर में हुए ब्लास्ट के बाद कई टीवी चैनलों को मिले धमकी भरे ईमेल में इन धमाकों के पीछे इस आतंकी संगठन (इंडियन मुजाहिद्दीन) का नाम सामने आया था.  
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Sunday, 21 January 2018

धन, बुद्धि और भाग्य दिलाते हैं कपूर के ये 7 शास्त्रीय उपाय


कपूर के शास्त्रीय उपाय
1
कपूर के शास्त्रीय उपाय
पूजा-पाठ में कपूर का इस्तेमाल किया जाता है। इसे हिन्दू धर्म के अनुसार पवित्र माना जाता है। हवन सामग्री में कपूर का विशेष महत्व है। इसके इस्तेमाल के बिना ऐसा धार्मिक कार्य अधूरा ही माना जाता है।
2
कपूर के शास्त्रीय उपाय
धर्म के अलावा स्वास्थ्य की दृष्टि से भी कपूर फायदेमंद है। विज्ञान ने स्वयं बताया है कि पूजा या हवन करते समय जब हम कपूर जलाते हैं, तो उससे निकलने वाला धुआं आसपास की नकारत्मक ऊर्जा को समाप्त करता है।
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कपूर के शास्त्रीय उपाय
यह कपूर हमारे आसपास हवा में मौजूद दूषित कणों को काटता है। इसलिए डॉक्टर घर में कपूर जलाने की सलाह देते हैं। हाल ही में कपूर से जुड़ा एक घरेलू नुस्खा भी काफी प्रसिद्ध हुआ था।
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कपूर के शास्त्रीय उपाय
जिसके अनुसार नीम के पत्तों के तेल में कपूर की 2-3 टिकिया डालकर उसे जलाने से घर में मच्छर नहीं आते। साथ ही घर की वायु भी स्वच्छ हो जाती है।
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कपूर के शास्त्रीय उपाय
लेकिन आज हम आपको कपूर की मदद से मिलने वाले स्वास्थ्य संबंधी नहीं, वरन् कुछ शास्त्रीय प्रयोग बताने जा रहे हैं। हिन्दू शास्त्र, धर्म से कुछ अलग हैं। ये शास्त्रीय ज्ञान हमें अपने जीवन को संवारने में मदद करते हैं।
6
कपूर के शास्त्रीय उपाय
ज्योतिष शास्त्र, वास्तु शास्त्र, सामुद्रिक शास्त्र, ऐसी ही कुछ विधाएं हैं जिनके प्रयोग से हम जीवन में आ रहे संकटों के रुख मोड़ सकते हैं। तकलीफ होने पर लोग इन शास्त्रीय उपायों का प्रयोग करते हैं, लेकिन पहले भी यदि ये उपाय किए जाएं तो परेशानी का मुख नहीं देखना पड़ेगा।
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कपूर के शास्त्रीय उपाय
खैर यहां हम कपूर के प्रयोग से होने वाले कुछ शास्त्रीय उपायों की चर्चा करने जा रहे हैं। आशा है कि आपको ये उपाय पसंद आएंगे और आप इनका प्रयोग कर अपने जीवन और भी बेहतर बना सकेंगे।
8
कपूर के शास्त्रीय उपाय
कपूर की टिकिया छोटी सी होती है। बाजार में अगर आप कपूर खरीदने जाएंगे तो यह आपको छोटी-सी डिब्बी में सफेद रंग की चौकोर आकार में मिलेगी। लेकिन इस छोटे आकार में कई चमत्कार समाए हैं।
9
बुद्धि प्राप्ति के लिए
कपूर का इस्तेमाल कर आप बुद्धि एवं धन दोनों पा सकते हैं। इसके लिए एक खास प्रकार का उपाय शास्त्रों में दर्ज है जिसे विशेषत: बुधवार के दिन किया जाता है। यह उपाय कुंडली में मौजूद बुध दोष को भी शांत करता है।
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बुद्धि प्राप्ति के लिए
इसके लिए बुधवार के दिन सुबह नहाने के बाद हरे रंग के वस्त्र धारण करें। हरे रंग के वस्त्र या अन्य वस्तुओं का दान करें। इन वस्तुओं में घी, कांसा, कर्पूर व मिश्री का दान शामिल करने से अधिक लाभ प्राप्त होता है।
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सौभाग्य पाने के लिए
अगर आप अपना भाग्य चमकाना चाहते हैं, तो कपूर का एक शास्त्रीय प्रयोग कर सकते हैं। इसके लिए 12 साबूदाने लेकर कर्पूर की मदद से इन्हें जला दें। यह उपाय किसी भी दिन किया जा सकता है, किंतु अगर बृहस्पतिवार को किया जाए तो अधिक शुभ माना जाता है।
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शनि कृपा के लिए
अगर आप शनि देव के अशुभ प्रभाव से परेशान हैं या जीवन में अधिक सुख प्राप्त करने के लिए उनकी कृपा पाना चाहते हैं, तो कपूर के उपयोग से होने वाला एक शास्त्रीय उपाय आपकी मदद कर सकता है। इसके लिए शनि यंत्र धारण करें किंतु कोई साधारण शनि यंत्र नहीं, वरन् कर्पूर की कालि ख से लिपित यंत्र धारण करें।
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मां लक्ष्मी की कृपा के लिए
कपूर के शास्त्रीय उपाय आपको धन की देवी लक्ष्मी जी की भी कृपा दिला सकते हैं। लक्ष्मी जी की कृपा पाने के लिए लोग “श्री यंत्र” घर में लाते हैं। मां लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए खास प्रकार का श्री यंत्र चुना जाता है, जिसमें उनका प्रतीक भी बना हो।
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मां लक्ष्मी की कृपा के लिए
इस यंत्र को घर में लाने से पहले कपूर के इस्तेमाल से एक छोटा-सा उपाय करें। इससे आपको अधिक फल हासिल होगा। उपाय के अनुसार रविपुष्य, गुरुपुष्य नक्षत्र या अन्य शुभ मुहूर्त में रजत, ताम्र, स्वर्ण या भोजपत्र पर इस यंत्र को कपूर का दीपक दिखाकर घर में स्थापित करें। इस यंत्र की पूजा-अर्चना से दुख, दरिद्रता दूर होकर घर में चिरस्थाई लक्ष्मी का वास होता है।
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फिजूल खर्ची से बचाए
अगर आपके घर में धन तो आता है लेकिन अनचाहे खर्चे से जल्द से जल्द चला जाता है। तो कपूर का एक उपाय करें। इसके लिए सूर्यास्त के समय कर्पूर का दीप जलाएं, उसे सारे घर में घुमाएं। अंत में तुलसी पर आरती करके घर के मंदिर में स्थापित कर दें। इससे देवी लक्ष्मी का आशीर्वाद प्राप्त होगा।
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हर शाम करें ये उपाय
लेकिन अगर आप रोजाना भी यह कार्य करें, तो आपके घर में धन और खुशियां दोनों बनी रहेंगी। रोजाना संध्या के समय घर के हर बैडरूम में कपूर जलाने से रोग-शोक नष्ट होते हैं।
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बुरी ऊर्जा रखे दूर
घर में बुरी ऊर्जा का वास होने से दुख-क्लेश बढ़ता है, इसके छुटकारा पाने के लिए कपूर का प्रयोग करें। इसके लिए थोड़े से गंगा जल में कपूर मिकलाकर मेन गेट पर छिूड़क दें, ऐसा करने से किसी भी तरह की बुरी बला और नकारात्मक प्रभाव घर में प्रवेश नहीं करता।

वसंत पंचमी पर निबंध

वसंत पंचमी पर निबंध  
बसंत पंचमी / सरस्वती पूजा के विषय में हमने यह निबंध लिखा है ताकि हमें इस पूजा के विषय में जानकारी और इसका महत्व समझने में मदद मिल सके। यह दिन बहुत ही अच्छा होता है वसंत ऋतू के आगमन को दर्शाता है।
वसंत पंचमी, वसंत ऋतू के आगमन को दर्शाता है। इसी दिन देवी सरस्वती की पूजा भी की जाती है। यह त्यौहार भारत में हिन्दूओं द्वारा बहुत ही उत्साह और ख़ुशी से मनाया जाता है।
हिंदी भाषा में बसंत का मतलब होता है बसंत ऋतू और पंचमी का अर्थ होता है पांचवा दिन। आसान शब्दों में अगर हम समझे तो बसंत पंचमी बसंत ऋतू के पांचवे दिन मनाया जाता है। यह दिन माघ माह का पांचवा दिन होता है। यह दिन सरस्वती पूजा के नाम से भी जाना जाता है।किसानों के खेतों में वसंत ऋतू में आप पीले सरसों के फूल लहराते हुए देख सकते हैं जो इस ऋतू के आगमन को बताते हैं।
बसंत पंचमी, सरस्वती को समर्पित है जो ज्ञान की देवी हैं। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार सरस्वती देवी निरंतर सभी लोगों को ज्ञान प्रदान करती है। इस दिन को देवी सरस्वती का जन्म दिन भी माना जाता है।
इस त्यौहार को भारत में सभी स्कूल, कॉलेज और यूनिवर्सिटी में बहुत ही सुंदर तरीके से पारंपरिक रूप से मनाया जाता है और सभी छात्र माँ सरस्वती से आशीर्वाद लेते हैं। यह मौसम बहुत ही सुहाना होता है और खेतों में फसल लहराते हुए बहुत ही सुन्दर दीखते हैं।इस त्यौहार में लोग बहुत ही ख़ुशी के साथ पतंग उड़ाते हैं। इस दिन पीले रंग को बहुत ज्यादा मानते हैं।
इस दिन बाद्य यंत्रों, किताबों और संगीत से जुड़े यंत्रों की पूजा की जाति है। गुजरात में स्कूलों और कई जगह नृत्य कार्यक्रम होते हैं जहाँ गरबा नृत्य का लुफ्त भी लोग उठाते हैं।  

बसंत षय में हमने यह निबंध लिखा है ताकि हमें इस पूजा के विषय में जानकारी और इसका महत्व समझने में मदद मिल सके। यह दिन बहुत ही अच्छा होता है वसंत ऋतू के आगमन को दर्शाता है।
वसंत पंचमी, वसंत ऋतू के आगमन को दर्शाता है। इसी दिन देवी सरस्वती की पूजा भी की जाती है। यह त्यौहार भारत में हिन्दूओं द्वारा बहुत ही उत्साह और ख़ुशी से मनाया जाता है।
हिंदी भाषा में बसंत का मतलब होता है बसंत ऋतू और पंचमी का अर्थ होता है पांचवा दिन। आसान शब्दों में अगर हम समझे तो बसंत पंचमी बसंत ऋतू के पांचवे दिन मनाया जाता है। यह दिन माघ माह का पांचवा दिन होता है। यह दिन सरस्वती पूजा के नाम से भी जाना जाता है।किसानों के खेतों में वसंत ऋतू में आप पीले सरसों के फूल लहराते हुए देख सकते हैं जो इस ऋतू के आगमन को बताते हैं।
बसंत पंचमी, सरस्वती को समर्पित है जो ज्ञान की देवी हैं। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार सरस्वती देवी निरंतर सभी लोगों को ज्ञान प्रदान करती है। इस दिन को देवी सरस्वती का जन्म दिन भी माना जाता है।
इस त्यौहार को भारत में सभी स्कूल, कॉलेज और यूनिवर्सिटी में बहुत ही सुंदर तरीके से पारंपरिक रूप से मनाया जाता है और सभी छात्र माँ सरस्वती से आशीर्वाद लेते हैं। यह मौसम बहुत ही सुहाना होता है और खेतों में फसल लहराते हुए बहुत ही सुन्दर दीखते हैं।इस त्यौहार में लोग बहुत ही ख़ुशी के साथ पतंग उड़ाते हैं। इस दिन पीले रंग को बहुत ज्यादा मानते हैं।
इस दिन बाद्य यंत्रों, किताबों और संगीत से जुड़े यंत्रों की पूजा की जाति है। गुजरात में स्कूलों और कई जगह नृत्य कार्यक्रम होते हैं जहाँ गरबा नृत्य का लुफ्त भी लोग उठाते हैं।  

बसंत पंचमी पर करें ये कार्य, मिलेगी उन्नति और सफलता

सरवस्ती पूजा पर ये सभी मंत्र या इनमें किसी भी एक मंत्र का जाप करें:
“सरस्वती महाभागे विद्ये कमललोचने
विद्यारूपा विशालाक्षि विद्यां देहि नमोस्तुते॥”
या
“या देवी सर्वभूतेषू, मां सरस्वती रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

संत पंचमी पर करें ये कार्य, मिलेगी उन्नति और सफलता


बसंत पंचमी पर मां सरस्वती की वंदना और विधि विधान से पूजा करने का बेहद महत्व है। देवी अरस्वती को बुद्धि, ज्ञान, गायन, संगीत, कलाऔर वाणी का पोषक माना जाता है। इसलिए ऐसी मान्यता है कि इस दिन इनकी पूजा करने से देवी की कृपा हमेशा मनुष्य पर रहती है और वो अपने गुणों के बल पर सफलता और उन्नति प्राप्त करता है। इस दिन कुछ ऐसे भी कार्य हैं जिन्हें करना आपको हमेशा सफलता दिलाती है। यहां जानिए क्या हैं वो।
इस दिन मां सरस्वती की पूजा के साथ सरस्वती चालीसा पढ़ना और कुछ मंत्रों का जाप आपकी बुद्धि प्रखर करती है। अपनी सुविधानुसार आप ये मंत्र 11, 21 या 108 बार जाप कर सकते हैं।
सरवस्ती पूजा पर ये सभी मंत्र या इनमें किसी भी एक मंत्र का जाप करें:
“सरस्वती महाभागे विद्ये कमललोचने
विद्यारूपा विशालाक्षि विद्यां देहि नमोस्तुते॥”

या
“या देवी सर्वभूतेषू, मां सरस्वती रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
या
“ऐं ह्रीं श्रीं वाग्वादिनी सरस्वती देवी मम जिव्हायां।
सर्व विद्यां देही दापय-दापय स्वाहा।।”
एकादशाक्षर सरस्वती मंत्र
“ॐ ह्रीं ऐं ह्रीं सरस्वत्यै नमः।“
या
“वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि।
मंगलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणी विनायकौ।।”
या
“सरस्वत्यै नमो नित्यं भद्रकाल्यै नमो नम:।
वेद वेदान्त वेदांग विद्यास्थानेभ्य एव च।।
सरस्वति महाभागे विद्ये कमललोचने।
विद्यारूपे विशालाक्षी विद्यां देहि नमोस्तुते।।”
या
“प्रथम भारती नाम, द्वितीय च सरस्वती
तृतीय शारदा देवी, चतुर्थ हंसवाहिनी
पंचमम् जगतीख्याता, षष्ठम् वागीश्वरी तथा
सप्तमम् कुमुदीप्रोक्ता, अष्ठमम् ब्रह्मचारिणी
नवम् बुद्धिमाता च दशमम् वरदायिनी
एकादशम् चंद्रकांतिदाशां भुवनेशवरी
द्वादशेतानि नामानि त्रिसंध्य य: पठेनर:
जिह्वाग्रे वसते नित्यमं
ब्रह्मरूपा सरस्वती सरस्वती महाभागे
विद्येकमललोचने विद्यारूपा विशालाक्षि
विद्या देहि नमोस्तुते”
स्मरण शक्ति बढ़ाने के लिए
“जेहि पर कृपा करहिं जन जानि।
कवि उर अजिर नचावहिं वानी॥
मोरि सुधारहिं सो सब भांति।
जासु कृपा नहिं कृपा अघाति॥”
या
“ गुरु गृह पढ़न गए रघुराई।
अलप काल विद्या सब पाई॥”
विशेष क्या करें
विद्या और ज्ञान वृद्धि के लिए इस दिन गरीब बच्चों को किताबें और कॉपियां, कलम जैसी पढ़ाई के लिए उपयोगी चीजें बांटना भी अच्छा माना जाता है।
क्या ना करें
गुरु और माता-पिता हमेशा ही पूजनीय होते हैं, लेकिन इस दिन विशेषकर इनका अपमान ना करें। किताबें-कॉपियां ना बेचें या किसी गरीब का मजाक ना उड़ाएं।

दुनिया की सबसे ऊंची हनुमान की मूर्ति

दुनिया की सबसे ऊंची हनुमान की मूर्ति बनकर तैयार, 2000 टन है वजन


हिमाचल प्रदेश के सोलन जिल के सुल्तानपुर स्थित लाडो गांव आने वाले दिनों में धार्मिक पर्यटन के लिए पहचाना जाएगा. यहां दुनिया की सबसे ऊंची हनुमान की मूर्ति बनकर तैयार हो गई है और आने वाले 31 मार्च को हनुमान जयंती के अवसर पर इसका अनावरण होने वाला है.
मानव भारती यूनिवर्सिटी के परिसर में बनी इस मूर्ति की ऊंचाई 151 फीट है और वजन करीब 2000 टन. मूर्ति को गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड, एशिया बुक ऑफ रिकॉर्ड और लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉड में शामिल करने की प्रक्रिया चल रही है. इसकी औपचारिकताएं पूरी की जा रही हैं.
मूर्ति के निर्माण का कार्य पिछले करीब पांच साल से चल रहा है. अब मूर्ति का निर्माण पूरा हो गया है. प्रतिमा का निर्माण मातूराम फाइन आर्ट गुडग़ांव के पदमश्री मूर्तिकार नरेश कुमार ने किया है. शिमला के जाखू मंदिर में विराजमान 108 फीट ऊंची मूर्ति का निर्माण भी नरेश कुमार की टीम ने ही किया था.
सोलन में मानव भारती यूनिवर्सिटी धार्मिक पर्यटन का एक नया डेस्टीनेशन बनेगा. मानव भारती चेरिटेबल ट्रस्ट के संस्थापक डॉ. राजकुमार राणा की हनुमान जी में प्रगाढ़ आस्था है. उन्होंने ही सोलन में यह मूर्ति बनवाई है. इस मूर्ति की ऊंचाई 151 फीट है और इस समय दुनिया में यह हनुमान की सबसे ऊंची मूर्ति बन गई है.
इसके निर्माण पर मानव भारती चेरिटेबल ट्रस्ट ने करीब चार करोड़ रुपए खर्च किए हैं. इस समय हनुमान कीसबसे ऊंची मूर्ति आंध्र प्रदेश के कृष्णा जिला में स्थित है. इसकी ऊंचाई 135 फीट है.
इसके बाद शिमला के जाखू मंदिर और दिल्ली के संकट मोचन मंदिर में स्थित बजरंग बली की मूतियों का नंबर आता है. इनकी ऊंचाई 108-108 फीट है. इसके अलावा महाराष्ट्र के नंदुरा में 105 और उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में 104 फीट की हनुमान मूर्ति स्थित है.

Saturday, 20 January 2018

31 जनवरी को माघ शुक्ल पूर्णिमा पर खग्रास चन्द्रग्रहण होगा। यह ग्रहण पूरे भारतवर्ष में दिखाई देगा।

31 जनवरी को शाम 5 :18 बजे शुरू होगा ग्रहों का खेल, सावधान रहें ये 

साल 2018 का पहला ग्रहण 31 जनवरी को माघ शुक्ल पूर्णिमा पर खग्रास चन्द्रग्रहण होगा। यह ग्रहण पूरे भारतवर्ष में दिखाई देगा।
चन्द्रग्रहण 31 जनवरी की शाम को 5 बचकर18 मिनट पर शुरू होगा और रात 8 बजकर 42 मिनट पर समाप्त होगा यानि ग्रहण की  कुल अवधि 3 घंटे 24 मिनट होगी। यह ग्रहण कर्क राशि और पुष्य अश्लेषा नक्षत्र में हो रहा है। ऐसे में आइए जानते हैं इस ग्रहण का सभी राशियों पर कैसा असर होगा


मेष राशि- मेष राशि वाले व्यक्तियों के लिए यह ग्रहण अशुभफलदायक रहेगा। इस राशि के जातको को मानसिक अशान्ति और कष्ट का अनुभव होगा।
वृष राशि- वृष राशि वालों के लिए यह ग्रहण अनुकूल फल देने वाला साबित होगा। इस राशि वालों के लिए धन लाभ का योग बन रहा है।
मिथुन राशि- मिथुन राशि वालों के लिए यह चन्द्रग्रहण अशुभफलदायक है। आर्थिक नुकसान की संभावना हो सकती हैं। परिवार में तनाव पैदा हो सकता है।
-कर्क राशि- कर्क राशि वालों के लिए यह ग्रहण शारीरिक परेशानी या फिर किसी हादसे का शिकार बन सकते है। सावधानी बरतें। आपके घर में कोई अप्रिय घटना घट सकती है, हो सकता है किसी की मौत हो जाए।
सिंह राशि- इस राशि के जातको के लिए यह ग्रहण व्यय में बढ़ोत्तरी लाएगा। आर्थिक हानि की आशंका है। किसी वाद-विवाद के चक्कर में फंस सकते हैं। आपकी नौकरी भी जा सकती हैं।
कन्या राशि- कन्या राशि वालों के लिए यह ग्रहण शुभ फल की प्राप्ति की संभावना बन सकती है। धनलाभ और उन्नति के योग बनेंगे।
-तुला राशि- तुला राशि वालों के लिए यह ग्रहण शुभ रहेगा। सुख और समृद्धि में वृद्धि की संभावना है। किसी ऐसे व्यक्ति से मुलाकात संभव है जो भविष्य में आपके लिए फायदे दिलाने वाला साबित होगा।
वृश्चिक राशि- वृश्चिक राशि वालों के लिए यह ग्रहण अपमान, धनहानि और अपयश आदि का भय रहेगा। दम्पत्ति जीवन में परेशानियां आ सकती है।
धनु राशि- इस राशि वालों के लिए सावधानी रखने की आवश्यकता है। रोग, दुर्घटना का शिकार बन सकते है। मान सम्मान में गिरावट की आशंका हैं।
मकर राशि- ग्रहण का शादी शुदा जीवन में सुख के कमी का संकेत दे रहा है। जीवनसाथी के साथ विवाद हो सकता है। कानूनी मामलों में फसने का अंदेशा है।
कुंभ राशि- कुंभ राशि वालों के लिए यह ग्रहण अच्छा रहेगा। हर काम में सफलता मिलेगी। सुख की प्राप्ति संभव होगी और शत्रु परास्त होंगे।
मीन राशि- मीन राशि वालों के लिए यह ग्रहण अशुभ फल देने वाला साबित होगा। शारीरिक, मानसिक पीड़ा  और चिन्ताएं सताएंगी  

आतंक अपनी नापाक हरकतों से बाज नहीं आ रहा है. एक बार फिर भारत की धरती को लहूलुहान करने की साजिश

बौद्धों के हत्यारों को भारत में बसाने का दुष्परिणाम आये सामने... बोध गया मंदिर को दहलाने की साजिश हुई नाकाम


-आतंक अपनी नापाक हरकतों से बाज नहीं आ रहा है. एक बार फिर भारत की धरती को लहूलुहान करने की साजिश करी गई पर वो नाकाम रही. आपको बता दे कि बिहार में आतंकियों कि बम विस्पोट करने कि साजिश विफल हो गई. बिहार पुलिस उस वक़्त सकते में आ गई जब बिहार के बोधगया स्थित महाबोधि मंदिर के पास विस्फोटक मिला. आपको बता दे कि रोहिंग्याओं की वजह से भारत को आतंकी हमला का खतरा पहले ही नज़र आ रहा था और अब तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा के दौरे के समय बिहार के बोधगया स्थित महाबोधि मंदिर में विस्पोटक मिलना साफ़ संदेश है की आतंकि भारत को सुकून से नहीं देखना चाहते. आपको बता दे कि तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा बोधगया में मौजूद हैं. वह दो जनवरी से महाबोधि मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना में भी हिस्सा ले रहे हैं. मिली जानकारी के मुताबिक पुलिस को जांच में 2 जिंदा बम मिले.

सूचना पर पहुंची पुलिस ने मंदिर और आसपास के इलाके को फौरन अपने कब्जे में ले लिया. आनन-फानन में बम निरोधक दस्ते को भी बुला लिया गया. इसके बाद मंदिर के आसपास सघन तलाशी अभियान चलाया गया और विस्फोट को बरामद करके फल्गु नदी की ओर ले जाया गया. शुक्रवार को महाबोधि मंदिर के पास विस्फोटक मिलने की खबर आने से पहले बिहार के गवर्नर सतपाल मलिक ने भी यहां आकर पूजा-अर्चना की. सुरक्षा के लिहाज से महाबोधि मंदिर बेहद संवेदनशील है. इससे पहले साल 2013 में महाबोधि मंदिर में सीरिलय बम ब्लॉस्ट हुए थे.

Friday, 19 January 2018

देश के अंदर 12 लाख संत हैं. ऐसे आश्रम हैं जिनके पास क्षमता है, उनकी जिम्मेदारी है कि वो भी गो वंश की संरक्षण और संवर्धन में जुटें.

गाय-गंगा और मंदिर पर संतों से बोले योगी- धैर्य रखिए सब काम हो रहे हैं

संगम नगरी में वीएचपी के संत सम्मेलन में सीएम योगी आदित्यनाथ पहुंचे. यहां उन्होंने गाय-गंगा और मंदिर के पर बोलते हुए कहा, 'सब काम हो रहे हैं धैर्य रखिए. पीएम मोदी जी के कार्यकाल में बिना मांगे सभी बड़े काम हो रहे हैं. इसलिए हमें धैर्य रखना चाहिए कि सभी बड़े काम होंगे, जो संत समाज चाहता है.'
योगी ने आगे कहा, 'हमारे आते ही बूचड़खाने बंद हुए, पशु तस्करी रोकी गई. देश के अंदर 12 लाख संत हैं. ऐसे आश्रम हैं जिनके पास क्षमता है, उनकी जिम्मेदारी है कि वो भी गो वंश की संरक्षण और संवर्धन में जुटें. सरकार भी अपने स्तर से कोशिश कर रही है. लेकिन गो वंश की रक्षा समाज आधारित व्यवस्था होनी चाहिए.'
योगी ने कहा , 'कुंभ की व्यवस्था के लिए संतों का मार्गदर्शक मंडल बनेगा. पहली बार कोई प्रधानमंत्री गंगा के लिए इतना सोच रहा है. गंगा की निर्मलता और अविरलता के लिए काम हो रहा है.'
उन्होंने कहा, 'आजादी के बाद पहली बार जातिवाद और सांप्रदायिक ताकतें सर उठा रही हैं. इससे लड़ना होगा. हर गांव में 1-2 संत रहते हैं, उनकी जिम्मेदारी है कि विभाजनकारी ताकतों को रोकें. हमारी सरकार संतों के आदेश का अक्षरसह पालन करेगी.'  
योगी ने कहा, 'इजरायल के पीएम आए थे. मैंने देखा कि भारत के प्रति उनके मन में कितना सम्मान है.'

शिवजी को प्रसन्न करने के लिए मंत्र


शिव पूजा के बाद करें इस एक मंत्र का जाप, होगा सभी समस्याओं का अंत




शिवजी की कृपा

शिव भक्तों में यह मत प्रचलित है कि भगवान शिव अपने भक्तों की मनोकामना बहुत जल्द सुन लेते हैं। इसलिए तो भक्त उन्हें भोले भंडारी कहकर बुलाते हैं। भक्त की मनोकामना कैसी भी हो, अगर वह सच्चे मन से भगवान शिव को प्रसन्न करने में लगा है, तो भोले शंकर उसकी इच्छा अवश्य पूर्ण करते हैं।

शिव मंत्र

शिव के मंत्रों का सही उच्चारण, पूजा में सही सामग्री अर्पित करना, विधिवत पूजा को सम्पन्न करना, कोई भूल चूक ना करने वाला भक्त शिवजी का प्रिय होता है। लेकिन सबसे उत्तम बात जो शिवजी अपने भक्त के बारे में पसंद करते हैं वह है भक्त का उनके प्रति प्रेम।

शिव मंंत्रों का लाभ

मन से केवल शिवजी को याद करने वाला भक्त वह सब कुछ पा जाता है जिसकी वह कामना करता है। इतिहास इस बात का गवाह है कि शिवजी के भक्तों ने बड़े-बड़े चमत्कारों को करके दिखाया है। शिव कृपा अपार है, इसलिए शिव भक्त भगवान शिव का नाम लेते नहीं थकते।

शिवजी को प्रसन्न करने के लिए मंत्र

तो आज हम आपको शिवजी को प्रसन्न करने का एक ऐसा उपाय बताने जा रहे हैं, जिसे यदि आप कर लें तो शिवजी आपकी हर इच्छा को पूर्ण करेंगे। साथ ही आपके ऊपर जो बुरा वक्त चल रहा है, उस हर संकट का नाश करेंगे शिवजी।


ग्रहदोष से मुक्त कराए

उपाय के अनुसार आपको एक शिव मंत्र की स्तुति करनी है। माना जाता है कि यह शिव मंत्र स्तुति, शिव पूजा व आरती के बाद बोलने से लाभ होता है। इसके प्रभाव से बुरे वक्त, ग्रहदोष या बुरे सपने जैसी कई परेशानियां दूर होती हैं। आगे की स्लाइड में पाएं शिव स्तुति मंत्र.....




शिव स्तुति मंत्र

दु:स्वप्नदु:शकुनदुर्गतिदौर्

मनस्य,दुर्भिक्षदु‌र्व्यसन दुस्सहदुर्यशांसि।उत्पाततापविषभीतिमसद्ग्रहार्ति,व्याधीश्चनाशयतुमे जगतातमीश:॥


मंत्र का अर्थ

इस शिव स्तुति का सरल शब्दों में मतलब है कि संपूर्ण जगत के स्वामी भगवान शिव मेरे सभी बुरे सपनों, अपशकुन, दुर्गति, मन की बुरी भावनाएं, भूखमरी, बुरी लत, भय, चिंता और संताप, अशांति और उत्पात, ग्रह दोष और सारी बीमारियों से रक्षा करें।

रामचरितमानस की प्रेम-परिभाषा (कागभुसुण्डि-गरूड़ संवाद

परमात्मा की महत्ता पर जब तक विचार नहीं किया जाता तब तक “ब्रह्म है” ऐसा विश्वास भी नहीं होता। विश्वास के बिना प्रेम नहीं होता, जब तक प्रेम नहीं, भक्ति ऐसी ही है, जैसे जल के ऊपर तेल फिरता तो है पर मिल नहीं पाता।

 

खगपति गरुड़ ने प्रश्न किया- हे कागभुसुण्डि! आप मुझे धर्म का वह सरल स्वरूप समझायें जिसका अवगाहन कर मैं भी जीवन-मुक्ति प्राप्त कर सकूँ। कागभुसुण्डि ने अपनी कथा प्रारम्भ की, अपना सारा जीवन वृत्तान्त सुनाया। उत्तरकाण्ड के यह प्रसंग आध्यात्म-ज्ञान के बीज हैं। उन्हीं में से एक प्रसंग प्रेममार्गी-भक्ति है। प्रेम को ही जीवन की सम्पूर्ण साधनाओं का आधार मानते हुए उन्होंने कहा—
जाने बिनु न होइ परतीती। बिनु परतीति होइ नहिं प्रीती॥ प्रीति बिना नहिं भगति दिढाई। जिमि खगपति जल कै चिकनाई॥
परमात्मा की महत्ता पर जब तक विचार नहीं किया जाता तब तक “ब्रह्म है” ऐसा विश्वास भी नहीं होता। विश्वास के बिना प्रेम नहीं होता, जब तक प्रेम नहीं, भक्ति ऐसी ही है, जैसे जल के ऊपर तेल फिरता तो है पर मिल नहीं पाता।
इस सम्पूर्ण संदर्भ में भक्ति के लिए, ईश्वर प्राप्ति के लिए प्रेम की आवश्यकता पर प्रकाश डाला गया है। मनुष्य की स्थिति ऐसी है कि उसे जहाँ आनन्द मिलता है वहीं उसकी सम्पूर्ण चेष्टायें केन्द्रित रहती हैं। इसी भाव से केन्द्रीकरण का नाम प्रेम है। इस प्रेम का आधार लौकिक भी हो सकता है और पारलौकिक भी। एक का नाम आसक्ति है, दूसरे का नाम मुक्ति। मुक्ति प्रेम ही परमात्मा की प्राप्ति का सबसे सरल उपाय है।
रामचरित मानस ने स्थान-स्थान पर इसकी पुष्टि की है और लौकिक प्रेम से, दिव्य प्रेम के स्वरूप को अलग बताकर मनुष्य को अज्ञान से बचाने का प्रयत्न किया है। विरक्ति कवि तुलसी ने प्रेम तत्व की सीधी परिभाषा इस तरह की है—
तात कुतरक करहु जनि जाएँ। बैर प्रेम नहिं दुरइ दुराए॥
मुनिगन निकट बिहग मृग जाहीं। बाधक बधिक बिलोकि पराहीं॥ 
हित अनहित पशु-पच्छिउ जाना। मानुष तनु गनु ग्यान निधाना॥
कोई कितना ही षडयन्त्र करे बैर और प्रेम कभी छिप नहीं सकते। मुनियों के आश्रमों में पक्षी-मृग अभय घूमते हैं पर बधिक को देखते ही भाग खड़े होते हैं। जिस तत्व को पशु-पक्षी समझ सकते हैं मनुष्य जैसा गुणी-ज्ञानी जीव उसे कैसे नहीं जान सकता।
प्रेम मनुष्य की भावनाओं से, उसकी मुखाकृति, प्राण और प्रत्येक हाव-भाव से दिखाई देता है। वह जीवात्माओं को इस तरह जोड़ देता है जैसे जल और दूध मिलकर एक तन हो जाते हैं किन्तु यदि किसी ने केवल प्रेमाडम्बर किया, छल किया, कामना पूर्ति के लिए बहकाना चाहा तो वे ऐसे ही अलग हो जाती है जैसे दूध में खटाई डाल देने पर एकरूपता नष्ट हो जाती है और दोनों न्यारे-न्यारे हो जाते हैं।
पय जल सरिस बिकायँ, देखहु प्रीति की रीति भलि। बिलग होइ रसु जाइ, कपट खटाई परत पुनि॥
यहाँ प्रेम के दोनों रूपों का दिग्दर्शन है। पहला साँसारिक प्रेम जिसमें स्वार्थ और कामनायें प्रधान रहती हैं। इसे तुलसी दास जी ने छल बताया है और उसकी निन्दा की है। भगवान राम ने अपने पिता को मार्मिक शब्दों में इस गलती का बोध कराया है। श्रीदशरथ जी जब राम के वन-गमन के समाचार से अति शोकातुर हो रहे थे तो उन्होंने समझाया—
पितु असीस आयसु मोहि दीजै। हरष समय विसमउ कत कीजै॥ तात किएँ प्रिय प्रेम प्रमादू। जसु जग जाइ होइ अपवादु॥
पिताजी! यह मेरे तप, जीवात्मा के उत्थान का पुण्य अवसर है ऐसे हर्ष के समय में दुःख करने की कौन-सी जरूरत है आप तो मुझे वन-गमन की आज्ञा दें। आपका यह प्रेम जो मेरे शरीर तक सीमित है और जिससे मेरे आत्मोत्थान में बाधा पड़ती है वह प्रेम नहीं प्रमाद है। ऐसा न कीजिए, इससे तो आपका अपयश ही होगा। रघुकुल में आप इसके लिए अपवाद ठहराये जायेंगे।
आज के मोहासक्त व्यक्तियों के लिए राम का यह कथन जीवनदायक है। धन, पद, वैभव और ऐश्वर्य के लिए माता-पिता अपने पुत्रों को आध्यात्मिक जीवन से विमुख रखने का प्रयत्न करते हैं यह दोनों ही राम की दृष्टि में प्रेम के अपयशी हैं इसे ही साँसारिक प्रेम कहा गया है। इसे ही बन्धन का कारण बताया गया है।
फिर क्या प्रेमास्पद होना सिद्ध करने के लिए घर, द्वार, धन, वैभव, पुत्र, पिता, पत्नी आदि का परित्याग कर देना चाहिए। या उनसे प्रेम न करना चाहिए? नहीं, नहीं ऐसा कैसे हो सकता है। प्रेम न रहेगा तो संसार कैसे चलेगा, मनुष्य जीवन में आनन्द ही क्या रह जायगा। तो फिर प्रेम का ग्राह्य स्वरूप कौन-सा है। तुलसीदास जी ने अयोध्याकाण्ड में बड़ा सुन्दर रूपक प्रस्तुत कर, इस आशंका को दूर किया है। लिखते हैं—
घर घर साजहिं बाहन नाना। हरषु हृदय परभात पयाना॥
भरत जाई घर कीन्ह विचारु। नगर बाजि गज भवन भँडारु॥
संपति सब रघुपति कै आही। जौ बिनु जतन चलौं तज ताही॥
तौ परिनाम न मोरि भलाई। पाप सिरोमनि साई दोहाई॥
करई स्वामि हित सेवक सोई। दूषन कोटि देइ किन कोई॥
अस विचार सुचि सेवक बोले। जे सपनेहुँ निज धरम न डोले॥
कहि सब मरमु धरमु भल भाषा। जो जेहि लायक सो तेहि राखा॥
सब लोगों ने सुना कि प्रातःकाल सारी अयोध्या राम को मिलने जा रही है। सब तैयारियाँ हो चुकीं, सभी प्रसन्न थे। पर भरत उस समय विचार मग्न हो गये। उन्होंने सोचा यह सारा नगर, मकान, घोड़े, हाथी, संपत्ति, खजाना सब उन्हीं भगवान राम का ही तो है, फिर यदि इसे आरक्षित छोड़कर जाता हूँ तो भगवान मुझ पर प्रसन्न कहाँ होंगे? इससे तो उलटा मुझे पाप लगेगा। ऐसा विचार कर उन्होंने धर्मशील सेवकों को बुलाकर उन्हें पहले कर्त्तव्य बोध कराया और इसके बाद जो जिस योग्य था उसे वह काम सौंप दिया।
tulsidasji-01उपरोक्त कथन में भरत का निष्काम प्रेम स्पष्ट है। उन्हें घर, घोड़े हाथी आदि किसी भी संपत्ति का मोह नहीं है, तो भी उसे अरक्षित रखना वे परमात्मा की अवज्ञा मानते हैं। उन्हें राम से प्रेम था पर उसके साथ ही वे अपना कर्त्तव्य भी नहीं भूले। अर्थात् उस धन सम्पत्ति को न तो यों ही छोड़ा और न उसे अयोग्य व्यक्तियों को सौंपा। परमात्मा की सम्पत्ति उन्हें दी जो धर्मनिष्ठ थे। जिन पर उन्हें विश्वास था कि वे इस ईश्वरीय सम्पत्ति का दुरुपयोग न करेंगे। राम के प्रति यही प्रेम सर्वांगपूर्ण कहा जा सकता है। राम के मोह के साथ, राम के प्रति कर्त्तव्यों का जो सुव्यवस्थित ढंग से पालन कर सकता हो ऐसा भरत के से गुण वाला व्यक्ति ही उनका सच्चा भक्त हो सकता है।
निष्काम प्रेम का एक और सुन्दर उदाहरण अयोध्याकाण्ड में ही प्रस्तुत है। संसार की ऐसी कौन-सी माता होगी जिसे अपने पुत्र पर प्रेम न होगा। कौशल्या का अपने पुत्र राम के प्रति अगाध प्रेम था पर इस प्रेम में उन्होंने स्वार्थ की झलक नहीं आने दी। उन्हें राम और भरत में कोई अन्तर नहीं जान पड़ा। दरअसल, सच्चा प्रेम तो यही है। अपने बच्चे की सच्ची स्नेहित वही माता हो सकती है जिसे दूसरे बच्चों से भी समान प्रेम हो। यह संसार परमात्मा का बनाया हुआ है। अपने-पराये सब उसी के पुत्र हैं फिर एक से प्रेम और दूसरे से दुराव कैसे हो सकता है। जो अपनों से प्रेम करता है वह यदि मानव-मात्र से प्रेम करे तो ही उसका प्रेम सच्चा है। ईश्वरीय प्रेम और प्रेममयी भक्ति से जीवन मुक्ति का यही स्वरूप है। यह कथानक राम का माता कौशल्या से वन जाने के आज्ञा माँगने से प्रारम्भ होता है और कौशल्या के सुन्दर उत्तर से समाप्त होता है—
धरम धुरीन धरम गति जानी। कहेउ मातु सन अति मृदुबानी॥
पिता दीन्ह मोहि कानन राजू। जहँ सब भाँति मोर बड़ काजू॥
आयसु देहि मुदित मन माता। जेहि मुद मंगल कानन जाता॥
जनि सनेह बस डरपसि भोरे। आनँदु अंब अनुग्रह तोरे॥
धरम सनेह उभयँ मति घेरी। भई गति साँप छछूँदर केरी॥
राखऊँ सुतहिं करऊँ अनुरोधू। धरम जाई अरु बन्धु बिरोधू॥
बहुरि समुझि तिय धरम सयानी। राम भरत दोउ सुत सम जानी॥
सरल सुभाल राम महतारी। बोली बचन धीर धरि भारी॥
तात जाउँ बलि कीन्हेहूँ नीका। पितु आयसु सब धरमकु टीका॥
ram-bharat-chitrakut-01इस कथन से यह भी स्पष्ट है कि सच्चा प्रेमी सरल होता है, वह सबके कल्याण की कामना करता है। धर्म करते हुए अपने पराये की भेद वृत्ति जिसमें न हो वही सच्चा प्रेमी है।
इस प्रकार की निष्काम सेवा निस्सन्देह, लौकिक दृष्टि से काफी कष्टदायक होती है पर उससे अपने प्रियतम परमात्मा के प्रति आत्म दान का जो सुख मिलता है वह उस कष्ट की अपेक्षा अधिक सुखकर होता है। लौकिक प्रेम में ही आत्म-त्याग की इतनी भावना होती है कि उसकी रक्षा के लिये अपने प्राण त्याग तक के लिये तैयार रहते हैं इसमें प्रेमी को आन्तरिक सुख मिलता है फिर परमात्मा के प्रति यदि अनन्य भाव से आत्मदान किया जाय और उस पथ का अनुसरण करते हुये आपदायें आयें तो उनसे सन्तोष क्यों न होगा? तुलसीदास जी कहते हैं—
जलदु जनम भरि सुरति बिसारउ जाचत जल पवि पाहन ठारउ॥
चातकु रटनि घटें घटि जाई। बढ़ें प्रेमु सब भाँति भलाई॥
कनकहिं बान चढ़इ जिमि दाहें। तिमि प्रियतम पद प्रेम निबाहें॥
चातक जन्म-भर स्वाति नक्षत्र की आशा में प्यासा बना रहता है। स्वाति नक्षत्र में दो बूँद जल की आकाँक्षा से वह ऊपर की ओर चोंच फैलाता है पर बादल ऊपर से ओले बरसाते हैं। चातक को कष्ट होता है पर वह अपने नियम से विमुख नहीं होता। सोना जिस प्रकार अग्नि में चढ़कर खरा होता है उसी प्रकार अपने प्रियतम के लिए कर्त्तव्य पालन की उच्चतम कसौटी में खरा उतर कर सच्चा प्रेमी कहलाने का सौभाग्य मिलता है।
अन्त में तुलसीदास जी ने प्रेम के द्वारा सहज ही परमात्मा की प्राप्ति का प्रसंग प्रस्तुत करते हुये लिखा है—
पुर बैकुण्ठ जान कह कोई। कोउ कह पयनिधि बस प्रभु सोई॥
जाके हृदयँ भगति जस प्रीती। प्रभु तहँ प्रगट सदा तेहि रीती॥
तेहि समाज गिरिजा मैं रहेउँ। अवसर पाय वचन एक कहेउँ॥
हरि व्यापक सर्वत्र समाना। प्रेम ते प्रगट होर्हि मैं जाना॥
देस काल दिसि विदिसहु माहीं। कहहु सो कहाँ जहाँ प्रभु नाहीं॥
अग जगमय सब रहित बिरागी। प्रेम ते प्रभु प्रगटई जिमि आगी॥
देवताओं में चर्चा चल रही थी, परमात्मा से कैसे मिला जाय ताकि असुरों के साथ संग्राम में उनका अनुग्रह प्राप्त किया जा सके। कोई कहता था वे बैकुंठ में हैं वहाँ जाना चाहिये, कोई उन्हें क्षीर-सागर में बताता था। जिसके हृदय में जैसी भक्ति थी वह उसी रीति से ईश्वर से मिलने की बात कर रहा था। उस समाज में भगवान शंकर जी भी उपस्थित थे।
उन्होंने कहा-परमात्मा तो सर्व व्यापक है मेरा निश्चित मत है कि वह प्रेम से ही प्रगट होता है। वह देश, काल, दिश-विदिशाओं में सर्वत्र व्याप्त है और प्रेम द्वारा अग्नि के समान प्रगट हो जाता है।
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काकभुसुण्डि की इन व्याख्याओं से गरुड़ जी अधिक प्रसन्न हुये।
सुनि भुसुँडि के वचन सुहाये। हर्षित खगपति पंख फुलाए पुनि पुनि काग चरन सिरु नावा। जानि राम सम प्रेम बढ़ावा
गरुड़ इस संवाद से अति प्रसन्न हुये। उन्होंने काग को भी परमात्मा का स्वरूप ही मानकर अति प्रेम प्रदर्शित किया। प्रेम का ज्ञान प्राप्त कर उनके सारे संशय दूर हो गये। (साभार-अखंड ज्योति)