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Wednesday, 7 February 2018

सेना के 3 जवान हुए थे बलिदान 50 हजार के मुचलके पर जमानत दी गई है.

लालकिला आतंकी हमले के आरोपी बिलाल को न्यायाधीश महोदय ने दी जमानत ..सेना के 3 जवान हुए थे बलिदान
दिल्ली पुलिस और गुजरात ATS के तमाम प्रयासों पर तब उस वक्त पानी फिर गया जब दिल्‍ली स्थित लाल किला पर सन 2000 में हुए आतंकी हमले के मुख्‍य संदिग्‍ध बिलाल अहमद कावा को जमानत मिल गई.. 22 दिसंबर 2000 में लाल किले पर हुए आतंकी हमले में संदिग्‍ध आरोपी के रूप में इसी साल गिरफ्तार कावा ने दिल्ली की पटियाला  हाउस कोर्ट में जमानत की अर्जी दी थी जिसके बाद कल न्यायाधीश महोदय ने कावा को जमानत दे दी . राष्ट्रीय अस्मिता को चुनौती देते इस हमले में सेना के तीन लाल किले की रक्षा करते हुए अमरता को प्राप्त हुए थे. कावा को 50 हजार के मुचलके पर जमानत दी गई है. बता दें कि जनवरी 2018 में ही दिल्ली पुलिस और गुजरात एटीएस ने मिलकर लश्कर-ए-तैयबा के संदिग्ध आतंकी बिलाल अहमद कावा को दिल्ली के इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट से गिरफ्तार किया था






सिब्बल ने की थी मांग, 2019 चुनाव तक टले सुनवाई सिब्बल ने कहा कि रिकॉर्ड में दस्तावेज अधूरे हैं

जानिए अयोध्या केस में तारीख दर तारीख कब-कब क्या हुआ

तारीख दर तारीख जानें कब-कब क्या-क्या हुआ....
1528 में अयोध्या में बाबरी मस्जिद का निर्माण किया गया. 1949 में बाबरी मस्जिद में गुप्त रूप से भागवान राम की मूर्ति रख दी गई. 1984 में मंदिर निर्माण के लिए एक कमेटी का गठन किया गया.
1959 में निर्मोही अखाड़ा की ओर से विवादित स्थल के स्थानांतरण के लिए अर्जी दी थी, जिसके बाद 1961 में यूपी सुन्नी सेंट्रल बोर्ड ने भी बाबरी मस्जिद स्थल पर कब्जा के लिए अपील दायर की थी.
1986 में विवादित स्थल को श्रद्धालुओं के लिए खोला गया. 1986 में ही बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी का गठन किया गया.
1990 में लालकृष्ण आडवाणी ने देशव्यापी रथयात्रा की शुरुआत की. 1991 में रथयात्रा की लहर से बीजेपी यूपी की सत्ता में आई. इसी साल मंदिर निर्माण के लिए देशभर के लिए इंटें भेजी गई.
6 दिसंबर, 1992: अयोध्या पहुंचकर हजारों की संख्या में कार सेवकों ने बाबरी मस्जिद का विध्वंस कर दिया था. इसके बाद हर तरफ सांप्रदायिक दंगे हुए. पुलिस द्वारा लाठी चार्ज और फायरिंग में कई लोगों की मौत हो गई. जल्दबाजी में एक अस्थाई राम मंदिर बनाया गया. प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव ने मस्जिद के पुनर्निर्माण का वादा किया.
16 दिसंबर, 1992: बाबरी मस्जिद विध्वंस के लिए जिम्मेदार परिस्थितियों की जांच के लिए एमएस लिब्रहान आयोग का गठन किया गया.
1994: इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ में बाबरी मस्जिद विध्वंस से संबंधित केस चलना शुरू हुआ.
4 मई, 2001: स्पेशल जज एसके शुक्ला ने बीजेपी नेता लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी सहित 13 नेताओं से साजिश का आरोप हटा दिया.
1 जनवरी, 2002: तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने एक अयोध्या विभाग शुरू किया. इसका काम विवाद को सुलझाने के लिए हिंदुओं और मुसलमानों से बातचीत करना था.
1 अप्रैल 2002: अयोध्या के विवादित स्थल पर मालिकाना हक को लेकर इलाहबाद हाई कोर्ट के तीन जजों की पीठ ने सुनवाई शुरू कर दी.
5 मार्च 2003: इलाहबाद हाई कोर्ट ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को अयोध्या में खुदाई का निर्देश दिया, ताकि मंदिर या मस्जिद का प्रमाण मिल सके.
22 अगस्त, 2003: भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने अयोध्या में खुदाई के बाद इलाहबाद हाई कोर्ट में रिपोर्ट पेश किया. इसमें कहा गया कि मस्जिद के नीचे 10वीं सदी के मंदिर के अवशेष प्रमाण मिले हैं. मुस्लिमों में इसे लेकर अलग-अलग मत थे. इस रिपोर्ट को ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने चैलेंज किया.
सितंबर 2003: एक अदालत ने फैसला दिया कि मस्जिद के विध्वंस को उकसाने वाले सात हिंदू नेताओं को सुनवाई के लिए बुलाया जाए.
जुलाई 2009: लिब्रहान आयोग ने गठन के 17 साल बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को अपनी रिपोर्ट सौंपी.
26 जुलाई, 2010: इस मामले की सुनवाई कर रही इलाहबाद हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ ने फैसला सुरक्षित किया और सभी पक्षों को आपस में इसका हल निकाले की सलाह दी. लेकिन कोई आगे नहीं आया.
28 सितंबर 2010: सुप्रीम कोर्ट ने इलाहबाद हाई कोर्ट को विवादित मामले में फैसला देने से रोकने वाली याचिका खारिज करते हुए फैसले का मार्ग प्रशस्त किया.
30 सितंबर 2010: इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया. इसके तहत विवादित जमीन को तीन हिस्सों में बांटा दिया गया. इसमें एक हिस्सा राम मंदिर, दूसरा सुन्नी वक्फ बोर्ड और निर्मोही अखाड़े को मिला.
9 मई 2011: सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी. 21 मार्च 2017: सुप्रीम कोर्ट ने आपसी सहमति से विवाद सुलझाने की बात कही.
19 अप्रैल 2017: सुप्रीम कोर्ट ने बाबरी मस्जिद गिराए जाने के मामले में लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती सहित बीजेपी और आरएसएस के कई नेताओं के खिलाफ आपराधिक केस चलाने का आदेश दिया.
9 नवंबर 2017: उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात के बाद शिया वक्फ बोर्ड के चेयरमैन वसीम रिजवी ने बड़ा बयान दिया था. रिजवी ने कहा कि अयोध्या में विवादित स्थल पर राम मंदिर बनना चाहिए, वहां से दूर हटके मस्जिद का निर्माण किया जाए.
16 नवंबर 2017: आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर ने मामले को सुलझाने के लिए मध्यस्थता करने की कोशिश की, उन्होंने कई पक्षों से मुलाकात की.  
5 दिसंबर 2017: सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई. कोर्ट ने 8 फरवरी तक सभी दस्तावेजों को पूरा करने के लिए कहा.
सुप्रीम कोर्ट में आज रामजन्म भूमि-बाबरी मस्जिद स्वामित्व विवाद की सुनवाई शुरू होगी. सुप्रीम कोर्ट आज तय करेगा कि क्या इस मामले की सुनवाई रोजाना होगी या नहीं. मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ करेगी. इससे पहले इस मामले की आखिरी सुनवाई 5 दिसंबर, 2017 को हुई थी. सुनवाई करने वाली बेंच में चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के अलावा जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस एस.अब्दुल नजीर भी हैं.
कई भाषाओं में हुआ दस्वावेजों का अनुवाद
राम मंदिर मामले के लिए हज़ारों पन्नों के दस्तावेजों का सात अलग-अलग भाषाओं और लिपियों में अनुवाद कर लिया गया है. सुप्रीम कोर्ट में 5 दिसम्बर को हुई पिछली सुनवाई के बाद से अब तक उत्तर प्रदेश सरकार ने 53 खंडों में तमाम दस्तावेज़ों के अनुवाद कर लिए हैं. ये दस्तावेज़ संस्कृत, फ़ारसी, अरबी, पालि, उर्दू सहित सात भाषाओं या लिपियों में हैं.
सूत्रों की मानें तो शिया वक्फ बोर्ड सुप्रीम कोर्ट से मांग करेगा कि मुख्य मामले की सुनवाई से पहले उसकी उसकी याचिका पर सुनवाई की जाए. अपनी याचिका में शिया वक्फ बोर्ड ने निचली अदालत द्वारा 30 मार्च, 1996 को दिए उस फैसले को चुनौती दी है जिसके तहत ज़मीन का मालिकाना हक सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड को दिया गया था.
यूपी सेंट्रल शिया वक्फ बोर्ड इस बाबत कुछ हिंदू संगठनों के संपर्क में है. बोर्ड चाहता है कि कोर्ट में इस याचिका पर सुनवाई के दौरान ये संगठन उसका साथ दें. शिया वक़्फ़ बोर्ड के सूत्रों के मुताबिक इस याचिका पर कोर्ट का फैसला उनके हक में आ जाता है तो मुख्य मामले की सुनवाई की जरूरत नहीं होगी, क्योंकि वो विवादित जमीन पर से अपना मालिकाना हक छोड़ने के लिए तैयार है. वो भी इस शर्त के साथ कि जन्मस्थान पर राम मंदिर बने और मुस्लिम बहुल इलाके में मस्जिद बने.
सिब्बल ने की थी मांग, 2019 चुनाव तक टले सुनवाई
पिछली सुनवाई में सुन्नी वक्फ बोर्ड की ओर से कपिल सिब्बल ने मांग की थी कि मामले की सुनवाई 5 या 7 जजों बेंच को 2019 के आम चुनाव के बाद करनी चाहिए. क्योंकि मामला राजनीतिक हो चुका है. सिब्बल ने कहा कि रिकॉर्ड में दस्तावेज अधूरे हैं. कपिल सिब्बल और राजीव धवन ने इसको लेकर आपत्ति जताते हुए सुनवाई का बहिष्कार करने की बात कही थी.

2004 से लेकर 2014 वही LED बल्ब उसकी तकनीक का और उसी कंपनी से कांग्रेस 350 रुपये में ख़रीदा करती थी ....

बल्ब  कंपनियों के साथ मिलकर देश को लूट रही थी , कांग्रेस, 1 बल्ब पर 310 रुपये  की लूट 

कांग्रेस की जब सरकार थी यानि 2004  से लेकर 2014  के बिच तो भारत की छवि  दुनिया में एक 
भष्ठ  देश की थी , लोग भारत को भष्ठ  देश के रूप में देखते थे .. और ये छवि किसी और ने नहीं  बल्कि 
कांग्रेस पार्टी के सरगना सोनिया गाँधी  की सरकार ने भारत की बनाई थी ,,, सोनिया गाँधी 
100%  विदेशी है और राहुल गाँधी 50% 


प्रधान मंत्री मोदी  ने आज लोकसभा  में एक बड़ा खुलासा किया है .. मोदी ने बताया  की कांग्रेस की सरकार  बल्ब में भी लूट करती थी जो LED  बल्ब आज हम उन्ही बल्ब कंपनियों से 40  रुपये  में खरीदते  है ,,,, वही  LED  बल्ब उसकी तकनीक का और उसी  कंपनी से कांग्रेस 350 रुपये  में ख़रीदा करती थी .... 

                                                                      

Tuesday, 6 February 2018

जिसे इतिहास में चौरी चौरा कांड के नाम से जाना जाता है। अफ़सोस की बात ये रही कि 260 हिंदुस्तानियों के कत्ल पर एकदम चुप बैठे कुछ लोगों

5 फ़रवरी- आज ही हुआ था चौरीचौरा काण्ड जिसमे फट पड़ा था भारतीयों के आक्रोश का ज्वालामुखी लेकिन गांधी ने उन्हें ही ठहरा दिया गलत
क्रांतिकारियों में अब्दुल्ला उर्फ सुकई, भगवान, विकरम, दुधई, कालीचरण, लाल मुहम्मद, लौटू, महादेव, लाल बिहारी, नजर अली, सीताराम, श्यामसुंदर, संपत रामपुर वाले, सहदेव , संपत चौरावाले, रुदल, रामरूप, रघुबीर और रामलगन के नाम शामिल हैं।


जरा सोचिये कि उस समय उन्हें कैसा लगा रहा होगा जिन्होंने किसी के नेतृत्व में आन्दोलन शुरू किया और आन्दोलन के बीच समय में ही उन्हें छोड़ कर कोई अलग हो जाए और उनको दोषी ठहरा दे .. कुछ ऐसा ही हुआ था आज अर्थात 5 फरवरी को हुए चौरी चौरा काण्ड में शामिल भारतीयों के साथ जो एक सीमा तक दबाए जाने के बाद आक्रोशित हो गये और उन्होंने जैसे को तैसा जवाब दिया . लेकिन अफ़सोस की बात ये रही कि इसके बाद वो अकेले रह गये क्योकि जैसे आज तथाकथित धर्मनिरपेक्षता का बोलबाला है वैसे ही कभी तथाकथित अहिंसा का बोलबाला हुआ करता था . 
जिसे इस आंदोलन के प्रणेता ने ही उपद्रव घोषित कर दिया था वो असल में था एक किसान विद्रोह जो अत्यधिक दमन के चलते हिसक स्वरूप में आ गया . हिंसक स्वरूप को गलत कहने का अर्थ होता है भगत सिंह , चन्द्रशेखर आज़ाद , सुभाष चन्द्र बोस, मंगल पाण्डेय आदि महानतम वीरों के बलिदान पर सवाल उठाना लेकिन उस समय ऐसा ही हुआ था और जैसे को तैसा जवाब देने वाले तमाम अकेले रह गये थे अंग्रेजो की दी गयी घोरतम यातना युक्त सजा झेलने के लिए उस समय बिस्मिल जैसे अमर बलिदानी ने इस विरोध का विरोध किया था और वहीँ से कांग्रेस में गरम दल और नरम दल बन गया था .. खैर जानते हैं इस घटना की पूरी कहानी .
पुलिस थाने भले ही आज समाज की रक्षा और सुरक्षा के लिए बने हैं लेकिन ब्रिटिश और मुगल काल में इसका स्वरूप बेहद वीभत्स था क्योकि ये उस समय केवल जनता का रक्त चूसने के लिए होते थे . जहाँ कहीं भी स्थानीय स्वतन्त्रता की आग सुलगती ये पुलिस थाने वहाँ जा कर उसको खामोश कर दिया करते थे .भारत में फैले ब्रिटिश साम्राज्य के लिए अंग्रेजों द्वारा स्थापित थाने दमनकारी भूमिका निभाते थे। ये थाने ब्रिटिश सरकार की शोषणकारी और जनविरोधी नीतियों को जनता के ऊपर जोर-जबरदस्ती से लागू करवाने में बहुत ही अहम भूमिका निभाते थे। उन्हें ही सबसे पहले जनता के गुस्से का भी शिकार बनना पड़ता था। 4 फरवरी1922 को गोरखपुर के चौरी चौरा में यही हुआ, जब अंग्रेजों के जुल्म से तंग आकर आक्रोशित किसानों ने ब्रिटिश साम्राज्य के लिए (दमन के प्रतीक) चौरी चौरा थाने को फूंक दिया, जिसमें 22 अंग्रेजो के गुलाम कहे जा सकने वाले वो पुलिसकर्मी जल कर मर गये थे जो भारत की जनता पर अंतहीन यातना के जिम्मेदार थे ..


इस चौरी चौरा की घटना को अंग्रेजों , उनके उस समय के गुलामों , तथाकथित विदेश परस्त राजनेताओं और झोलाछाप इतिहासकारों ने भले ही एक 'उपद्रव' मात्र कहा हो, लेकिन इस घटना का भविष्य में देश के क्रांतिकारी आंदोलन पर गहरा प्रभाव पड़ा। क्रांतिकारी कार्रवाइयों के लिए 'उपद्रव' शब्द बड़ा भ्रामक है। यह देश की आजादी  के लिए हुए क्रांतिकारी आंदोलनों, विद्रोहों आदि के प्रति हमारे नजरिए को अंग्रेजों के जाने के बाद आज भी प्रभावित कर रहा है। ऐसा नहीं हो सकता कि चौरी चौरा के किसानों की भीड़ ने बिना किसी वजह के और बिना सोचे-समझे ही चौरी चौरा थाने को फूंक दिया होगा लेकिन नकली बिके इतिहासकारों ने आज़ादी के झूठे ठेकेदारोंके इशारे पर ऐसा लिखा और ज्वलंत क्रान्ति के उन बलिदानियो को अन्य वीरों जैसा आतंकी साबित करने की पूरी कोशिश की .. ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ हुए सन्यासी विद्रोह, मोपला विद्रोह और यहां तक कि 1857 के पहले स्वतंत्रता संग्राम को भी एक विद्रोह कह दिया जाता है। ये नकली इतिहासकारों कि देन है जबकि इसको सीधे सीधे स्वाधीनता का नाम देना चाहिए था . गांधी के छेड़े असहयोग आंदोलन के दौरान कार्यकर्ता शांतिपूर्वक जनता को जागरूक कर रहे थे। इस दरमियान 1 फरवरी, 1922 को चौरीचौरा थाने के एक दारोगा ने असहयोग आंदोलन के कार्यकर्ताओं की जमकर पिटाई कर दी। इस घटना पर अपना विरोध दर्ज करवाने के लिए लोगों का एक जुलूस चौरी चौरा थाने पहुंचा। इसी दरमियान पीछे से पुलिस कर्मियों ने सत्याग्रहियों पर लाठीचार्ज तथा गोलियां चलाई। जिसमें 260 व्यक्तियों की मौत हो गई। हर तरफ खून से सने शव बिखरे पड़े थे। इसी के बाद क्रांतिकारी किसानों ने वह किया, जिसे इतिहास में चौरी चौरा कांड के नाम से जाना जाता है। अफ़सोस की बात ये रही कि 260 हिंदुस्तानियों के कत्ल पर एकदम चुप बैठे कुछ लोगों को २२ ब्रिटिश पुलिसवालों की मौत का इतना दर्द हुआ कि उन्होंने आंदोलनकारियो को ही दोषी ठहरा दिया . 2 जुलाई 1923 को फांसी पर लटकाए गए क्रांतिकारियों में अब्दुल्ला उर्फ सुकई, भगवान, विकरम, दुधई, कालीचरण, लाल मुहम्मद, लौटू, महादेव, लाल बिहारी, नजर अली, सीताराम, श्यामसुंदर, संपत रामपुर वाले, सहदेव , संपत चौरावाले, रुदल, रामरूप, रघुबीर और रामलगन के नाम शामिल हैं। जबकि इस पूरे आन्दोलन की शुरुआतमें कुल १७२ लोगों को मृत्युदंड की सजा मिली थी जो बाद में कानूनी प्रक्रियाओं के चलते कम संख्या में आ गयी . हैरानी की बात ये है कि ब्रिटिश सरकार की जड़े तक हिला कर रख देने वाले इस आन्दोलन में अमरता को प्राप्त हुए फांसी चढ़े आंदोलनकारियो के लिए उस समय के बड़े और नामी लोगों ने कुछ भी नहीं बोलाजबकि वो आक्रोश की आग में जले उन्ही २२ पुलिसवालों की याद में आंसू बहाते रहे... आज उन सभी ज्ञात अज्ञात और गोरखपुर के चौरी चौरा से लन्दन तक को हिला कर रख देने वाले अमर बलिदानियों को हिन्दू परिवार संघठन संस्था  का बारम्बार नमन और वंदन है साथ ही उस सोच पर भी सवाल है जो अंग्रेजी सिपाहियों के लिए आंसू बहाती रही लेकिन हिन्दुस्तानी बलिदानियो के लिए उफ़ तक न कह पाई . आज चौरी चौरा काण्ड अर्थात 5 फ़रवरी के उस शौर्यपूर्ण दिवस की सभी राष्ट्रप्रेमियो को शुभकामनाएं .

Monday, 5 February 2018

मोदी सरकार के असल दुश्मन कौन है ...

भाजपा को जितना खतरा खान ग्रेस या अन्य दल दल से नहीं उतना इन महान ' न्यायप्रिय हिन्दुत्व वादियों ' से है .ये अपने आप को सर्वोत्कृष्ट हिन्दुत्व वादी समझते हैं ,

याद कीजिए कुछ आरोप और शब्द -- ' जुमले वाली सरकार , सूटबूट की सरकार , साम्प्रदायिक सरकार , आर एस एस का हाथ , गरीब ,दलित , आदिवासी , अल्पसंख्यक , महिला , असहिष्णुता , भगवा आतंक , भगवाकरण ' क्या ये सब वास्तव में देश में हाहाकार उत्पन्न करते हैं , प्रत्यक्षतः तो नहीं पर अवचेतन में जो नकारात्मकता उत्पन्न होती है वह हिन्दुओं के सर्वनाश के लिए काफ़ी है .
हो सकता है हो भी पर ये महाशय यह नहीं समझ पा रहे हैं कि प्रतिबद्ध मतदाता बहुत कम होते हैं , आस पास के वातावरण से प्रभावित हो कर अपना मन बदल लेने वाले मतदाताओं का वर्ग काफ़ी बड़ा होता है , यह समूह अपनी बुद्धि का प्रयोग कम करता है और तात्कालिक वातावरण से प्रभावित हो कर वोट करता है , छोटे छोटे मुद्दे जिन का जन जीवन पर कोई असर नहीं होता को भी बड़ा और ज्वलंत बना कर खान ग्रेस और अन्य दलदल अब तक ऐश मनाते आए हैं .
जैसे खान ग्रेसी , बसपाई , आपिए , तृणमूलिए या अन्य दलदलिए वैसे ही आप भी हैं आप भी प्रत्यक्ष नहीं तो परोक्ष रूप से हिन्दू द्रोही ही हैं , मत मानिए खुद को हिन्दू द्रोही , मान लीजिए खुद को कट्टर राष्ट्रवादी .पर आप अपरिपक्व मानसिकता वाले नित्य ' धणी ' बदलने वाली गणिका के समान हैं .आप किसी के नाम का चूड़ा जीवन पर्यंत नहीं पहन सकते , जहाँ आप के मन से रंच मात्र भी इधर उधर हुआ आप पिल पड़े अपने ही लोगों पे . आप में न तो संयम हैं न आप में धैर्य है ,
आप मुस्लिमों से तो कुछ सीख लें भले ही उन के नेतृत्व ने उन को बाबा जी का ठुल्लू ही पकड़ाया लेकिन वे कभी उन के विरोध में एक शब्द न तो लिखते हैं न प्रकट करते हैं ,क्या आप यह समझते हैं कि वे अपने नेताओं से नाराज नहीं होते ? होते हैं , बेशक होते हैं लेकिन वे आप की तरह अपने पायजामे फाड़ फाड़ कर नंगे नहीं होते , वे अपने घर की बात घर में सुलझाना जानते हैं . आप हवा के झोंके मात्र से बांके हो जाते हैं और अपने ही नेताओं को जो लाख मजबूरियों के बीच कुछ रास्ता बनाने का प्रयास करते हैं उन पर वक्रोक्तियां करते हैं ,लेखनी से विष बुझे तीर पे तीर चलाते हो और फिर कहते हो हम राष्ट्रवादी हैं , हिन्दुत्ववादी हैं . आप की लेखनी लाख परिष्कृत होगी , आप संघ के महा झाड़ रहे होंगे , आजीवन प्रचारक रहे होंगे ,भागवत जी , तोगड़िया जी , आडवानी जी आप से निर्देश प्राप्त कर के ही सांस ले रहे होंगे , स्वर्गस्थ अशोक सिंघल आप के तेज से ही स्वर्ग में सुख से रह रहे होंगे लेकिन मेरी दृष्टि में आप निरे मूर्ख ,अधीर और बौद्धिक रूप से अपाहिज हैं .


लेखक 
दिनेश कुमार बिस्सा आकिल

जिस फैसले का काफी समय से इंतजार था ताज महोत्सव इस बार भगवान राम के नाम पर आयोजित किया जा रहा है

ताज महोत्सव में अब तक गूंजती थी मुगलिया धुन लेकिन सब पलट दिया योगी सरकार ने. जानिए अब क्या सुनाई देगा वहां ?
ताज महोत्सव इस बार भगवान राम के नाम पर आयोजित किया जा रहा है


जिस फैसले का काफी समय से इंतजार था , जिसके लिए समाज टकटकी लगाये देख रहा था आख़िरकार उस पर ध्यान दिया है योगी आदित्यनाथ जी की सरकार ने . भारत को लूटने और बर्बाद करने वाले मुगलों की धुन से शुरू होने वाले ताज महोत्सव में कर दिया गया है आमूलचूल परिवर्तन और इस आयोजन को रंग दिया गया है भारत की संस्कृति में आगरा बनेगा अब इस एतिहासिक बदलाव का गवाह जो शायद इतिहास में पहली बार हो रहा है. विदित हो कि रामराज्य की तरफ उत्तर प्रदेश को ले जाने के लिए संकल्पित योगी आदित्यनाथ के राज में उत्तर प्रदेश की मुगलिया छवि बदल कर उसको वास्तविक रूप में लाने के सभी प्रयास किये जा रहे हैं .योगी राज में पहली बार हो रहे वार्षिक ताज महोत्सव की थीम बदल दी गई है. शायद इतिहस में ये पहला मौक़ा होगा जब ताज महोत्सव इस बार भगवान राम के नाम पर आयोजित किया जा रहा है. ये वही ताज नगरी आगरा है जहाँ कभी तेजोमहालय में घुसने से पहले पर्यटकों के भगवा निशानियाँ उतार दी गयी थी लेकिन आख़िरकार न्याय की जीत हु 

सिर्फ और सिर्फ कुछ वोटों के लिए तुष्टिकरण की राजनीति से लिपटे ढाई दशक से हर साल आयोजित होने वाले ताज महोत्सव में हमेशा मुगल काल की झलक दिखाई देती रही थी लेकिन इस बार यूपी में बीजेपी की सत्ता है और सूबे की कमान योगी आदित्यनाथ के हाथों में है. ऐसे में मुगलिया अंदाज के बदले राम पर आधारित नृत्य नाटिका से ताज महोत्सव का आगाज होगा. हर साल की तरह इस बार भी ताज महोत्सव 18 फरवरी से शुरू होकर 27 फरवरी तक चलेगा, जिसकी रंगत इस बार एकदम अलग होगी. महोत्सव की शुरुआत श्रीराम कला केंद्र की प्रस्तुति से होगी, जहां नृत्य नाटिका के जरिए जनता के सामने भगवान राम की लीलाओं का मंचन होगा. 

जानिए क्या है दस पुण्य और दस पाप

धृति: क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रह:।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम् ॥-मनु स्मृति 6/92



-- हिंदू धर्मग्रंथ वेदों का संक्षिप्त है उपनिषद और उपनिषद का संक्षिप्त है गीता। स्मृतियां उक्त तीनों की व्यवस्था और ज्ञान संबंधी बातों को क्रमश: और स्पष्ट तौर से समझाती है। पुराण, रामायण और महाभारत हिंदुओं का प्रचीन इतिहास है धर्मग्रंथ नहीं।
 
विद्वान कहते हैं कि जीवन को ढालना चाहिए धर्मग्रंथ अनुसार। यहां प्रस्तुत है धर्म अनुसार प्रमुख दस पुण्य और दस पाप। इन्हें जानकर और इन पर अमल करके कोई भी व्यक्त अपने जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन ला सकता है।
 
धृति: क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रह:।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम् ॥-मनु स्मृति 6/92
 
दस पुण्य कर्म-
1.धृति- हर परिस्थिति में धैर्य बनाए रखना।
2.क्षमा- बदला न लेना, क्रोध का कारण होने पर भी क्रोध न करना।
3.दम- उदंड न होना।
4.अस्तेय- दूसरे की वस्तु हथियाने का विचार न करना।
5.शौच- आहार की शुद्धता। शरीर की शुद्धता।
6.इंद्रियनिग्रह- इंद्रियों को विषयों (कामनाओं) में लिप्त न होने देना।
7.धी- किसी बात को भलीभांति समझना।
8.विद्या- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का ज्ञान।
9.सत्य- झूठ और अहितकारी वचन न बोलना।
10.अक्रोध- क्षमा के बाद भी कोई अपमान करें तो भी क्रोध न करना।
 
दस पाप कर्म-
1.दूसरों का धन हड़पने की इच्छा।
2.निषिद्ध कर्म (मन जिन्हें करने से मना करें) करने का प्रयास।
3.देह को ही सब कुछ मानना।
4.कठोर वचन बोलना।
5.झूठ बोलना।
6.निंदा करना।
7.बकवास (बिना कारण बोलते रहना)।
8.चोरी करना।
9.तन, मन, कर्म से किसी को दु:ख देना।
10.पर-स्त्री या पुरुष से संबंध बनाना।- प्रस्तुति अनिरुद्ध जोशी 'शतायु'

Sunday, 4 February 2018

हैदराबादी निजाम ने आज ही टेके थे घुटने हिन्दू योद्धा सदाशिवराव भाऊ के आगे उदागीर के युद्ध में

3 फरवरी- विजय दिवस. हैदराबादी निजाम ने आज ही 
टेके थे घुटने हिन्दू योद्धा सदाशिवराव भाऊ के आगे 
उदागीर के युद्ध में
सदाशिव राव भाऊ जी पेशवा के बलिदान के बाद ही अब्दाली के पाँव हिलने शुरू हो गए थे और उसने अपनी मरी हुई अंतरात्मा में ये मान लिया था की भारत भूमि को जीतना इतना आसान नहीं जितना वो समझ रहा था .. महावीर का सदाशिवराव भाऊ महान योद्धा पेशवा बालाजी बाजीराव के चचेरे भाई थे .. अपने शासन प्रशासन में बेहद निपुण व् कुशल होने के कारण मराठा साम्राज्य का समस्त शासन भार पेशवा ने उन्ही पर छोड़ दिया था. प्रसिद्ध वीर योद्धा सदाशिवराव की व्यूह रचना ऐसी हुआ करती थी जिस से सीख ले कर यूरोपीय शासकों ने अपनी सेना और व्यूह रचना करनी शुरू कर दी थी ... इनके पास सैन्य बल के अतिरिक्त एक विशाल तोपख़ाना भी था।इस महायोद्धा का इतिहास उस तथाकथित मजहबी ठेकदार को भी याद रखने की जरूरत है जो आये दिन किसी ना किसी को हैदराबाद आने की चुनौती दिया करता है . क्योंकि इस महावीर के नाम अपनी इसी सैन्य शक्ति व् अपने पराक्रम के बलबूते हैदराबाद के निज़ाम सलावतजंग को भी उदयगिरि के प्रसिद्ध युद्ध में हारने का गौरव प्राप्त है .

इस युद्ध में हैदराबाद का वो निज़ाम घुटनो के बल बैठ गया था इन योद्धाओ का पराक्रम देख कर ...अपनी दौलत और ताकत के अहंकार में तानाशाही पर उतारू उस हैदराबादी निजाम को अपने घुटनों पर बैठ कर जान की भीख मांगने पर मजबूर कर देने वाले उस महान योद्धा ने आज ही के दिन अर्थात3 फ़रवरी को ये जंग जीती थी और भारत के शत्रुओं के कलेजे में अपने नाम का खौफ पैदा किया था . इस पावन दिवस को एक धरोहर के रूप में जान कर इस विजय पर्व की तमाम राष्ट्रभक्तों और धर्मरक्षको को बारम्बार बधाई देने के साथ ऐसे पावन दिनों की स्मृति सदा सदा बनाये रखने का संकल्प भी   परिवार लेता है .भारत के प्रसिद्ध गद्दारों में से एक ओवैसी जैसो को कम से कम इस इतिहास को दिन में एक बार जरूर पढ़ना चाहिए इतिहास में अपने पूर्वजों का हश्र देखने के लिए .  

Saturday, 3 February 2018

कुर्म पुराण में एक श्लोक का उल्लेख है: नाभिप्रसारयेद् देवं ब्राह्मणान् गामथापि वा। वाय्वग्निगुरुविप्रान् वा सूर्यं वा शशिनं प्रति।।

इन 7 की तरफ नहीं करने चाहिए पांव, बनेंगे पाप के भागी

धार्मिक स्थान

बचपन से हम सुनते आ रहे हैं कि हमें मंदिर या अन्य धार्मिक स्थानों की तरफ पांव नहीं करने चाहिए। भगवान की मूर्ति या फिर अन्य पवित्र वस्तुओं की ओर पांव करना उनका अपमान होता है इसलिए हमें ऐसा करने से बचना चाहिए।

नकारात्मक प्रभाव

लेकिन इसके अलावा भी बहुत सी बहुत कुछ ऐसा है जिनका जिक्र कुर्म पुराण में किया गया है। कुर्म पुराण के भीतर 8 ऐसे वस्तुओं का उल्लेख है, जिनकी ओर पांव करना व्यक्ति के जीवन पर नकारात्मक प्रभाव डालता है।

श्लोक

कुर्म पुराण में एक श्लोक का उल्लेख है: नाभिप्रसारयेद् देवं ब्राह्मणान् गामथापि वा। वाय्वग्निगुरुविप्रान् वा सूर्यं वा शशिनं प्रति।। इस श्लोक का अर्थ है कि व्यक्ति को देवता, ब्राह्मण, गाय, अग्नि, गुरु, विप्र, सूर्य, चंद्र की तरफ पांव नहीं करने चाहिए। लेकिन ऐसा क्यों? चलिए जानते हैं।

देवता

हर स्थिति में देवता पूजनीय हैं और इनकी ओर पांव करना अपमान माना जाएगा। जातक को कभी भी उस स्थान की तरफ पांव नहीं करने चाहिए जहां इनकी मूर्ति स्थापित हो।

ब्राह्मण

ऋगवेद के अनुसार ब्राह्मणों की उत्पत्ति भगवान विष्णु के मुख से हुई है, इसलिए ब्राह्मण की ओर पांव करना उनका और स्वयं भगवान विष्णु का अपमान है।

गाय

गाय के भीतर सभी देवताओं का वास है, हिन्दू धर्म के सभी देवता गाय में वास करते हैं, इसलिए उनकी ओर पांव करना समस्त देवताओं का अपमान माना जाता है।


अग्नि

अग्नि को देवताओं का मुख स्वरूप माना गया है, जहां से अग्नि प्रज्वलित होती है वहां कभी पांव करके नहीं बैठना चाहिए।

विप्र

वेदों की पढ़ाई करने वाले ब्राह्मण बालकों को विप्र कहा जाता है। कुर्म पुराण के अनुसार जो लोग इनकी ओर पांव करते हैं उन्हें पाप का भागी बनना पड़ता है, इसलिए ऐसा करने से बचना चाहिए।

सूर्य

सूर्य सिर्फ पंचदेवताओं में से एक ही नहीं, ऊर्जा और अग्नि का स्त्रोत भी हैं। हिन्दू धर्म में कोई भी पूजा-पाठ हो, सूर्य देव की अराधना अवश्य की जाती है। इसलिए उनकी ओर पांव करना पापकर्म माना जाता है।

चंद्रमा

चंद्रमा को प्रत्यक्ष देवता महा गया है, वह वनस्पति के स्वामी हैं। इसलिए उनकी ओर कभी बेहे पांव नहीं करने चाहिए।

Thursday, 1 February 2018

2 फरवरी 1931 को भगत सिंह ने युवा राजनैतिक कार्यकर्ताओं के लिये ये लिखा

2 फ़रवरी- आज ही भगत सिंह ने पत्र लिख कर कहा "मैं आतंकवादी नहीं". सवाल बनता है- "तब कहाँ थे आज़ादी के ठेकेदार" ?




आज़ादी के कुछ नकली ठेकेदारों के बारे में प्रचलित है कि वो सबका बड़ा सम्मान करते थे और उन्होंने भारत में आज़ादी की अलख जगा दी थी लेकिन अगर ये सारे दावे सही थे तो भारत के सर्वोच्च बलिदानी को , एक महानतम क्रांतिवीर को ये पत्र लिख कर खुद की सफाई क्यों देनी पड़ी कि वो एक आज़ादी का योद्धा है न कि आतंकी .. ये पत्र उस वीर को क्यों लिखने पड़े जब तमाम आज़ादी के ठेकेदारों के बारे में कहा जाता है कि वो लाखों लोगों के जुलूस के साथ चला करते थे . कुछ नमक , वस्त्र आदि के लिए आन्दोलन कर डाले थे लेकिन आखिर उन्हें इस वीर के लिए आन्दोलन की जरूरत क्यों नहीं समझ में आई .

2 फरवरी 1931 को भगत सिंह ने युवा राजनैतिक कार्यकर्ताओं के लिये ये लिखा; - कुछ को लगता है मैंने आतंकवादी जैसा काम काम किया है पर मैं मैं अपनी सारी ताकत से ये कहना चाहता हूँ की मैं आतंकवादी नहीं हूँ .. भगत सिंह के ये शब्द उस समय आज़ादी के क्रांतिवीरों की दुर्दशा बताते हैं . ये सिर्फ भगत सिंह के साथ नही था . अमर बलिदानी राम प्रसाद बिस्मिल जी से भी मिलने कोई जेल में नहीं गया . क्रांतिदूत चन्द्रशेखर आज़ाद की अंतिम यात्रा लगभग 5 किलोमीटर तक गयी थी लेकिन उनकी अंतिम यात्रा में आज़ादी के तथाकथित ठेकेदार नहीं दिखे जबकि उनमे से कुछ के घर इलाहाबाद में ही थे .

भगत सिंह की ये लाइन भले ही आज भी आप की छाती को चीरने जैसी वेदना देती है लेकिन सवाल ये है कि उस समय के उन तमाम ठेकेदारों को इन शब्दों से वेदना क्यों नहीं हुई ? आखिर क्या वजह है कि किसी तथाकथित ठेकेदार के पास गिनाने के लिए एक कार्य भी नहीं है जो उन्होंने इन वीरों के लिए किया रहा हो जबकि इन्होने भुने भुने चने खा कर आज़ादी की जंग लड़ी थी . आज भगत सिंह को याद कर के उस चुप्पी पर भी सवाल कीजिए जो इन वीरो को अकेला छोड़ दिया था इनके हाल पर ? भगत सिंह अमर रहें , देश की आज़ादी के असल इतिहास की प्रतीक्षा में ...

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गाँधी भारत का कोई राष्ट्रपिता नहीं है, भारत तो गाँधी के जन्म से हज़ारों साल पहले से मौजूद था दूसरी चीज ये की अगर गाँधी को किसी राष्ट्र का पिता कहना है तो गाँधी को पाकिस्तान का राष्ट्रपिता कहा जा सकता है क्यूंकि गांधी ने पाकिस्तान बनवाया

कोई राष्ट्रपुत्र तो हो सकता है पर राष्ट्रपिता नहीं, गाँधी को राष्ट्रपिता कहना राष्ट्र_का_अपमान :

🚩राष्ट्र से बड़ा कोई भी नहीं होता, यहाँ तक की भगवान् श्री राम ने भी अयोध्या जी को अपनी माता कहा था, हम सब राष्ट्र में जन्म लेते है, राष्ट्र और धरती हमारी माता है, न की हम अपने राष्ट्र और इस धरती के बाप है, पर कांग्रेस ने मोहनदास गाँधी को भारत का पिता घोषित कर दिया
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आपकी जानकारी के लिए बता दें की द्वारका शंकराचार्य जी ने मोहनदास गाँधी को भारत का पिता कहे जाने का विरोध किया है और उन्होंने कहा है की कोई भी शख्स राष्ट्र का पुत्र तो हो सकता है पर राष्ट्र का पिता नहीं हो सकता, और गाँधी को राष्ट्र का पिता कहना राष्ट्र का अपमान है, और हमे ये अपमान नहीं करना चाहिए
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आपकी जानकारी के लिए बता दें की भारत तो 20 हज़ार साल से ज्यादा पुराना देश है, गाँधी के जन्म से पहले से भारत इस धरती पर था, भारत को गाँधी ने नहीं बनाया, दूसरी चीज ये की अगर गाँधी को किसी राष्ट्र का पिता कहना है तो गाँधी को पाकिस्तान का राष्ट्रपिता कहा जा सकता है क्यूंकि गांधी ने पाकिस्तान बनवाया
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भारत तो गाँधी के जन्म से हज़ारों साल पहले से मौजूद था, गाँधी भारत का पुत्र हो सकता है, पर भारत का पिता कैसे, हम सब भी भारत में जन्मे है, हम राष्ट्र के पुत्र हो सकते है, हम भारत को अपनी माता भी कहते है, हम धरती को भी धरती माता कहके बुलाते है, पर हम खुद को धरती का बाप या भारत का बाप तो नहीं घोषित कर सकते, पर कांग्रेस ने गाँधी को भारत का पिता घोषित कर दिया

आपकी जानकारी के लिए ये भी बता दें की आधिकारिक रूप से गाँधी भारत का कोई राष्ट्रपिता नहीं है, और भारत में राष्ट्रपिता जैसा कोई पद भी नहीं है, पर देश के सेक्युलर वामपंथी गाँधी को राष्ट्रपिता राष्ट्रपिता राष्ट्रपिता बोलते रहते है, जो की राष्ट्र को गाली देने जैसा है