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Tuesday, 6 February 2018

जिसे इतिहास में चौरी चौरा कांड के नाम से जाना जाता है। अफ़सोस की बात ये रही कि 260 हिंदुस्तानियों के कत्ल पर एकदम चुप बैठे कुछ लोगों

5 फ़रवरी- आज ही हुआ था चौरीचौरा काण्ड जिसमे फट पड़ा था भारतीयों के आक्रोश का ज्वालामुखी लेकिन गांधी ने उन्हें ही ठहरा दिया गलत
क्रांतिकारियों में अब्दुल्ला उर्फ सुकई, भगवान, विकरम, दुधई, कालीचरण, लाल मुहम्मद, लौटू, महादेव, लाल बिहारी, नजर अली, सीताराम, श्यामसुंदर, संपत रामपुर वाले, सहदेव , संपत चौरावाले, रुदल, रामरूप, रघुबीर और रामलगन के नाम शामिल हैं।


जरा सोचिये कि उस समय उन्हें कैसा लगा रहा होगा जिन्होंने किसी के नेतृत्व में आन्दोलन शुरू किया और आन्दोलन के बीच समय में ही उन्हें छोड़ कर कोई अलग हो जाए और उनको दोषी ठहरा दे .. कुछ ऐसा ही हुआ था आज अर्थात 5 फरवरी को हुए चौरी चौरा काण्ड में शामिल भारतीयों के साथ जो एक सीमा तक दबाए जाने के बाद आक्रोशित हो गये और उन्होंने जैसे को तैसा जवाब दिया . लेकिन अफ़सोस की बात ये रही कि इसके बाद वो अकेले रह गये क्योकि जैसे आज तथाकथित धर्मनिरपेक्षता का बोलबाला है वैसे ही कभी तथाकथित अहिंसा का बोलबाला हुआ करता था . 
जिसे इस आंदोलन के प्रणेता ने ही उपद्रव घोषित कर दिया था वो असल में था एक किसान विद्रोह जो अत्यधिक दमन के चलते हिसक स्वरूप में आ गया . हिंसक स्वरूप को गलत कहने का अर्थ होता है भगत सिंह , चन्द्रशेखर आज़ाद , सुभाष चन्द्र बोस, मंगल पाण्डेय आदि महानतम वीरों के बलिदान पर सवाल उठाना लेकिन उस समय ऐसा ही हुआ था और जैसे को तैसा जवाब देने वाले तमाम अकेले रह गये थे अंग्रेजो की दी गयी घोरतम यातना युक्त सजा झेलने के लिए उस समय बिस्मिल जैसे अमर बलिदानी ने इस विरोध का विरोध किया था और वहीँ से कांग्रेस में गरम दल और नरम दल बन गया था .. खैर जानते हैं इस घटना की पूरी कहानी .
पुलिस थाने भले ही आज समाज की रक्षा और सुरक्षा के लिए बने हैं लेकिन ब्रिटिश और मुगल काल में इसका स्वरूप बेहद वीभत्स था क्योकि ये उस समय केवल जनता का रक्त चूसने के लिए होते थे . जहाँ कहीं भी स्थानीय स्वतन्त्रता की आग सुलगती ये पुलिस थाने वहाँ जा कर उसको खामोश कर दिया करते थे .भारत में फैले ब्रिटिश साम्राज्य के लिए अंग्रेजों द्वारा स्थापित थाने दमनकारी भूमिका निभाते थे। ये थाने ब्रिटिश सरकार की शोषणकारी और जनविरोधी नीतियों को जनता के ऊपर जोर-जबरदस्ती से लागू करवाने में बहुत ही अहम भूमिका निभाते थे। उन्हें ही सबसे पहले जनता के गुस्से का भी शिकार बनना पड़ता था। 4 फरवरी1922 को गोरखपुर के चौरी चौरा में यही हुआ, जब अंग्रेजों के जुल्म से तंग आकर आक्रोशित किसानों ने ब्रिटिश साम्राज्य के लिए (दमन के प्रतीक) चौरी चौरा थाने को फूंक दिया, जिसमें 22 अंग्रेजो के गुलाम कहे जा सकने वाले वो पुलिसकर्मी जल कर मर गये थे जो भारत की जनता पर अंतहीन यातना के जिम्मेदार थे ..


इस चौरी चौरा की घटना को अंग्रेजों , उनके उस समय के गुलामों , तथाकथित विदेश परस्त राजनेताओं और झोलाछाप इतिहासकारों ने भले ही एक 'उपद्रव' मात्र कहा हो, लेकिन इस घटना का भविष्य में देश के क्रांतिकारी आंदोलन पर गहरा प्रभाव पड़ा। क्रांतिकारी कार्रवाइयों के लिए 'उपद्रव' शब्द बड़ा भ्रामक है। यह देश की आजादी  के लिए हुए क्रांतिकारी आंदोलनों, विद्रोहों आदि के प्रति हमारे नजरिए को अंग्रेजों के जाने के बाद आज भी प्रभावित कर रहा है। ऐसा नहीं हो सकता कि चौरी चौरा के किसानों की भीड़ ने बिना किसी वजह के और बिना सोचे-समझे ही चौरी चौरा थाने को फूंक दिया होगा लेकिन नकली बिके इतिहासकारों ने आज़ादी के झूठे ठेकेदारोंके इशारे पर ऐसा लिखा और ज्वलंत क्रान्ति के उन बलिदानियो को अन्य वीरों जैसा आतंकी साबित करने की पूरी कोशिश की .. ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ हुए सन्यासी विद्रोह, मोपला विद्रोह और यहां तक कि 1857 के पहले स्वतंत्रता संग्राम को भी एक विद्रोह कह दिया जाता है। ये नकली इतिहासकारों कि देन है जबकि इसको सीधे सीधे स्वाधीनता का नाम देना चाहिए था . गांधी के छेड़े असहयोग आंदोलन के दौरान कार्यकर्ता शांतिपूर्वक जनता को जागरूक कर रहे थे। इस दरमियान 1 फरवरी, 1922 को चौरीचौरा थाने के एक दारोगा ने असहयोग आंदोलन के कार्यकर्ताओं की जमकर पिटाई कर दी। इस घटना पर अपना विरोध दर्ज करवाने के लिए लोगों का एक जुलूस चौरी चौरा थाने पहुंचा। इसी दरमियान पीछे से पुलिस कर्मियों ने सत्याग्रहियों पर लाठीचार्ज तथा गोलियां चलाई। जिसमें 260 व्यक्तियों की मौत हो गई। हर तरफ खून से सने शव बिखरे पड़े थे। इसी के बाद क्रांतिकारी किसानों ने वह किया, जिसे इतिहास में चौरी चौरा कांड के नाम से जाना जाता है। अफ़सोस की बात ये रही कि 260 हिंदुस्तानियों के कत्ल पर एकदम चुप बैठे कुछ लोगों को २२ ब्रिटिश पुलिसवालों की मौत का इतना दर्द हुआ कि उन्होंने आंदोलनकारियो को ही दोषी ठहरा दिया . 2 जुलाई 1923 को फांसी पर लटकाए गए क्रांतिकारियों में अब्दुल्ला उर्फ सुकई, भगवान, विकरम, दुधई, कालीचरण, लाल मुहम्मद, लौटू, महादेव, लाल बिहारी, नजर अली, सीताराम, श्यामसुंदर, संपत रामपुर वाले, सहदेव , संपत चौरावाले, रुदल, रामरूप, रघुबीर और रामलगन के नाम शामिल हैं। जबकि इस पूरे आन्दोलन की शुरुआतमें कुल १७२ लोगों को मृत्युदंड की सजा मिली थी जो बाद में कानूनी प्रक्रियाओं के चलते कम संख्या में आ गयी . हैरानी की बात ये है कि ब्रिटिश सरकार की जड़े तक हिला कर रख देने वाले इस आन्दोलन में अमरता को प्राप्त हुए फांसी चढ़े आंदोलनकारियो के लिए उस समय के बड़े और नामी लोगों ने कुछ भी नहीं बोलाजबकि वो आक्रोश की आग में जले उन्ही २२ पुलिसवालों की याद में आंसू बहाते रहे... आज उन सभी ज्ञात अज्ञात और गोरखपुर के चौरी चौरा से लन्दन तक को हिला कर रख देने वाले अमर बलिदानियों को हिन्दू परिवार संघठन संस्था  का बारम्बार नमन और वंदन है साथ ही उस सोच पर भी सवाल है जो अंग्रेजी सिपाहियों के लिए आंसू बहाती रही लेकिन हिन्दुस्तानी बलिदानियो के लिए उफ़ तक न कह पाई . आज चौरी चौरा काण्ड अर्थात 5 फ़रवरी के उस शौर्यपूर्ण दिवस की सभी राष्ट्रप्रेमियो को शुभकामनाएं .

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