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Thursday, 15 February 2018

ग्रहण जब लगते हैं तो पृथ्वी के प्राणियों में कुछ हलचल सी होती है

सूर्यग्रहण 16 फरवरी को लगेगा, राशियों पर भी पड़ेगा प्रभाव
ग्रहण जब लगते हैं तो पृथ्वी के प्राणियों में कुछ हलचल सी होती है। 
ग्रहण के दौरान पक्षी अपने घोसलों की ओर लौटना शुरू हो जाते हैं। लगभग 15 दिन पहले साल का पहला चंद्र ग्रहण लगा था अब दूसरा ग्रहण जो सूर्य ग्रहण होगा, लगेगा। यह सूर्य ग्रहण आंशिक होगा, जो कि भारत में दिखाई नहीं देगा। विश्व के अन्य देशों में यह दिखाई देगा। वर्ष 2018 में कुल तीन बार सूर्य ग्रहण लगेंगे। और ये तीनों ही आंशिक रूप से होंगे। ये तीनों सूर्य ग्रहण दक्षिण अमेरिका, अटलांटिक और अंटार्कटिका के एरिया में दिखाई पड़ेंगे। 16 फरवरी को साल का पहला सूर्यग्रहण पड़ेगा। इससे पहले पिछले महीने की 31 जनवरी को चंद्रग्रहण हुआ था। जो पूरे भारत में दिखाई दिया था। भारतीय समय के अनुसार यह ग्रहण 12 बजकर 25 मिनट से शुरू होगा लेकिन भारत में यह ग्रहण नहीं दिखाई देगा। ग्रहण का मोक्ष सुबह 4 बजे होगा। 
यह सूर्य ग्रहण दक्षिण जार्जिया, प्रशांत महासागर, चिली, ब्राजील  और अंटार्कटिका आदि देशों में दिखाई देगा। जब सूर्य व पृथ्वी के बीच में चन्द्रमा आ जाता है तो चन्द्रमा के पीछे सूर्य का बिम्ब कुछ समय के लिए ढक जाता है, उसी घटना को सूर्य ग्रहण कहा जाता है।
इस सूर्य ग्रहण के कारण 16 फरवरी के बाद कुछ राशियों पर इसका नकारात्मक असर रहेगा जबकि कुछ राशियों की खुलेगी किस्मत।
मेष-सूर्य ग्रहण के कारण मेष राशि वालों का कार्यक्षेत्र में सम्मान बढ़ेगा, इनकम बढ़ेगी तथा व्यवसाय में उत्तम लाभ होगा, सामाजिक प्रतिष्ठा में वृद्धि के साथ ही रुके हुए कामों में पूर्ण होंगे तथा सफलता मिलने की उम्मीद है।
वृष-कार्य क्षेत्र में व्यस्त रहेंगे। जिसकी वजह से नौकरी में सम्मान बना रहेगा। व्यवसाय में विस्तार होगा। वाणी पर नियंत्रण रखें। 16 फरवरी के बाद वृष राशि वालों के लिए धन कमाने के कई मौके मिलेंगे। इस दौरान आपको थोड़ी परेशानी और थोड़ी बेचैनी हो सकती हैं। परिवार के सदस्यों के स्वास्थ्य के मामले में चिंता और परेशानी हो सकती है।
मिथुन-न्नति और लाभ की संभावना कम है। प्रेम संबंधों में तकरार हो सकती है। पढ़ाई में मन कम ही लगेगा। पारिवारिक विवाद से बचें। विरोधी शांत रहेंगे। व्यावसायिक लाभ सामान्य रहेगा। स्वास्थ्य नरम रहेगा। हालांकि आने वाले समय में कुछ परेशानियां बढ़ सकती है।
 कर्क- यह समय जीवन में थोड़ा कष्टकारी रहेगा। धन हानि और मानहानि भी हो सकती है। यह ग्रहण 16 फरवरी के बाद शुभ समाचार मिल सकेगा। करियर में उन्नति के अवसर मिलेंगे। व्यवसाय में धन लाभ बढ़ेगा। मित्र से भेंट होगी जिसकी वजह से किसी नए प्रोजेक्ट पर आगे बढऩे की संभावना रहेगी।
सिंह-किसी से साझेदारी है तो संभलकर रहें। जीवन साथी को कष्ट हो सकता है। वैवाहिक जीवन में भी उथल-पुथल आ सकती है, सावधानी रखें। भू संपत्ति का अटका कार्य बनेगा। व्यय पर नियंत्रण रखें। व्यवसाय में लाभ कम होगा। स्वास्थ्य नरम रहेगा। कानूनी विवाद में  उलझ सकते हैं। 16 फरवरी के बाद किसी दुर्घटना का शिकार हो सकते हैं इसलिए सावधानी बरतें।
कन्या- विरोधियों और शत्रु का नाश होगा। हर जगह से अच्छी खबर और सफलता प्राप्त होने से खुशी मिलेगी। कन्या राशि वालों के लिए यह ग्रहण आने वाला समय अनुकूल रहेगा। कार्य क्षेत्र में विस्तार संभव है। अटके धन की प्राप्ति होगी। व्यवसाय में लाभ बढ़ेगा। घर में खुशी होगी। विदेशी की यात्रा कर सकते हैं।
तुला- ग्रहण के बाद आपका मन विचलित हो सकता है। मानसिक तनाव बढ़ सकता है। पैसों के मामले में नुकसान उठाना पड़ सकता है। सावधानी बरतें।
वृश्चिक- मन अशांत रहेगा। कानूनी परेशानी से मुक्ति मिलेगी। व्यवसाय में सुधार आएगा। धर्म में श्रद्धा बढ़ेगी।
धनु- इच्छाशक्ति में वृद्धि होगी। छोटी यात्रा का योग बनेगा, यात्रा मंगलमय रहेगी। पारिवारिक संबंधों में सुधार बनेगा।अजनबी से सचेत रहें। व्यावसायिक निर्णय सोच समझकर लें। घर में शांति रहेगी।मकर-कार्यक्षेत्र में नया पदभार मिल सकता है। भू संपत्ति से लाभ के अवसर मिलेंगे। व्यावसायिक लाभ बढ़ेगा।
मकर-मानसिक तनाव बढऩे से परेशानी हो सकती है। आमदनी की तुलना में खर्च ज्यादा होगा। स्वास्थ्य संबंधी परेशानी बढ़ सकती है।
कुंभ-भोग विलास के साधनों पर व्यय होगा। नौकरी में मन लगेगा। व्यवसाय में धन लाभ होगा। धैर्य बनाए रखें।
मीन-उत्साह में वृद्धि होगी। नौकरी में उन्नति के अवसर मिलेंगे।व्यवसाय में लाभ होगा।संतान पक्ष से चिंता रहेगी।
कार्यक्षेत्र में नया पदभार मिल सकता है। भू संपत्ति से लाभ के अवसर मिलेंगे। व्यावसायिक लाभ बढ़ेगा।
सूर्य ग्रहण के दौरान शास्त्रों में निर्देश दिए गए हैं जिन्हें मानव को पालन करना चाहिए

* जन्मकुंडली के 12 भाव और 9 ग्रहों का योग जानिए...

शरीर के हर हिस्से पर होता है ग्रहों का प्रभाव, जानिए कैसे?



* जन्मकुंडली के 12 भाव और 9 ग्रहों का योग जानिए...  
ज्योतिष में कुल नौ (9) ग्रहों की गणना की जाती है। इनमें सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, बृहस्पति (गुरु), शुक्र, शनि मुख्य ग्रह तथा राहु-केतु छाया ग्रह माने जाते हैं। 
 
इन ग्रहों में सूर्य-मंगल क्रूर ग्रह तथा शनि, राहु व केतु पाप ग्रह माने जाते हैं। सूर्य हमारे नेत्र, सिर और हृदय पर प्रभाव रखता है। मंगल पित्त, रक्त, कान, नाक पर और शनि हड्डियों, मस्तिष्क, पैर-पिंडलियों पर प्रभुत्व रखता है। राहु-केतु का स्वतंत्र प्रभाव नहीं होता है। वे जिस राशि में या जिस ग्रह के साथ बैठते हैं, उसके प्रभाव को बढ़ाते हैं।
 
बृहस्पति, शुक्र, बुध शुभ ग्रह माने जाते हैं। पूर्ण चंद्रमा शुभ कहा गया है। मगर कृष्ण पक्ष की तरफ बढ़ता चंद्रमा पापी हो जाता है। बृहस्पति शरीर में चर्बी, गुर्दे, व पाचन को नियंत्रित करता है। शुक्र वीर्य, आंख व कामशक्ति को नियंत्रण में रखता है। बुध का वर्चस्व वाणी (जीभ) पर होता है। चंद्रमा छाती, फेफड़े व नेत्र ज्योति पर अपना प्रभाव रखता है।
 
ग्रहों का कारकत्व : जन्मकुंडली में 12 भाव होते हैं। भावों के नैसर्गिक कारक निम्नानुसार है-
 
* सूर्य- प्रथम भाव, दशम भाव 
 
* चंद्र- चतुर्थ भाव 
 
* मंगल- तृतीय, षष्ठ भाव
 
* बुध- चतुर्थ भाव
 
* गुरु- द्वितीय, पंचम, नवम, एकादश भाव
 
* शुक्र- सप्तम भाव
 
* शनि- षष्ठ, व्यय, अष्टम भाव
 
* राहु-केतु - स्वतंत्र प्रभाव नहीं

Wednesday, 14 February 2018

15 फ़रवरी को अपने प्राण दे कर सदा सदा के लिए अमर हो गये उन सभी वीरों को हिन्दू परिवार संघठन संस्था की और से बारम्बार नमन करता है

15 फ़रवरी- आज बिहार के मुंगेर में हुआ था देशभक्तों का एक और नरसंहार, ठीक जलियांवाला बाग़ जैसा. जानिये कौन थे वो हुतात्मा ?
आज़ादी अगर चरखे से आई थी तो ये वीर कौन थे ? इनकी आत्मा को दुःख क्यों दिया जाता है एक झूठा गाना गा कर ? आखिर खामोश पड़े सच को झूठ का तेज तेज ढोल पीट कर कब तक दबाया जा सकता है ? मुंगेर आज बिहार का एक जिला है | फ़रवरी 1932 में मुंगेर के शंभुगंज थाना में आने वाले सुपोर जमुआ में एक मीटिंग हो रही थी | श्रीभवन की इसी मीटिंग में तारापुर थाने पर भारत का ध्वज फहराने की बात राखी गई जो किसी भी हाल में अंग्रेजों को स्वीकार नहीं था | मुंगेर का ये इलाका पहाड़ी इलाका है | महाभारत कालीन कर्ण का क्षेत्र अंग देश माने जाने वाले इस इलाके में देवधरा पहाड़ और ढोलपहाड़ी जैसे इलाके हैं जो अपनी बनावट और जंगल की वजह से अक्सर क्रांतिकारियों को सुरक्षा देते थे |


गंगा के उस पार बिहपुर से लेकर बांका और देवघर तक के इलाकों में क्रांतिकारियों का प्रभाव काफी ज्यादा था | 15 फ़रवरी की सुबह होते होते तारापुर में भीड़ जमा होने लगी | दोपहर में जब ये लोग झंडे के साथ आगे बढे तो अंग्रेज कलेक्टर ई. ओली के आदेश पर एक निहत्थी भीड़ पर फिरंगी एस.पी. डब्ल्यू. फ्लैग ने चलवानी शुरू कर दी | गोलियां चलती रही, लोग बढ़ते रहे और आखिर झंडा फहरा दिया गया | आश्चर्यजनक था कि गोलियां चलने पर भी लोगों ने बढ़ना नहीं छोड़ा ! बाद में और कुमुक आने पर पुलिस ने दोबारा थाने को अपने कब्जे में लिया |अंग्रेज कलेक्टर ई. ओली के आदेश पर एक निहत्थी भीड़ पर एस.पी. डब्ल्यू. फ्लैग ने गोलियां चलवा दी थी | नहीं नहीं किसी जलियांवाला की बात नहीं कर रहे भाई | वहां जनरल डायर थे, और वहां लाशें बहाने के लिए गंगा कहाँ होती है ? ये घटना जलियांवाला बाग़ के बाद की है, 15 फ़रवरी 1932 की इस घटना में मारे गए ज्यादातर लोगों को लापता घोषित कर दिया गया था | बिलकुल उसी तरह बेरहमी से मारे गए लोगों का आज जिक्र करना भी किसी को जरूरी नहीं लगता | असली कसूरवार है रीढ़विहीन, गफलत में डूबी, जातिवादी, पलायन के शौक़ीन, उज्जड़, और अन्य कई संबोधनों से नवाजने योग्य जनता का एक वर्ग . क्यों ?
क्योंकि इन्हें अशर्फी मंडल याद नहीं, बसंत धानुक पता नहीं, शीतल और सांता पासी याद नहीं | ये सिर्फ चंद नाम हैं इनके अलावा थे रामेश्वर मंडल, विश्वनाथ सिंह, महिपाल सिंह, सुकुल सोनार, सिंहेश्वर राजहंस, बद्री मंडल, गैबी सिंह, चंडी महतो, झोंटी झा | इनमें से किसी नाम का जिक्र सुना है ? नहीं सुना तो बता दें कि ये वो 13 लोग थे, जिनके शव की शिनाख्त हुई थी | इनके अलावा 31 शव ऐसे थे जिनकी शिनाख्त नहीं हो पाई थी | जो गंगा में बह गए उनका कोई हिसाब नहीं | आज 15 फ़रवरी को अपने प्राण दे कर सदा सदा के लिए अमर हो गये उन सभी वीरों को हिन्दू परिवार संघठन संस्था की और से बारम्बार नमन करता है और उनकी गौरवगाथा को अनंत काल तक के लिए अमर रखने का संकल्प लेता है .

Tuesday, 13 February 2018

बेलपत्र और जल से भगवान शंकर का अभिषेक करने से और पूजा में इनका प्रयोग करने से शिव जल्द प्रसन्न होते हैं।

बेलपत्र को संस्कृत में ‘बिल्वपत्र’ कहा जाता है, 
यह औषधी गुणों से भरपूर वृक्ष भगवान शिव को प्रिय है, पौराणिक मान्यता है कि बेलपत्र और जल से भगवान शंकर का अभिषेक करने से और पूजा में इनका प्रयोग करने से शिव जल्द प्रसन्न होते हैं। बेलपत्र का तोड़ने के लिए पुराणों में ऐसे निर्देश दिए गए हैं, जिससे धर्म का पालन भी हो जाये और वृक्षों का संरक्षण भी हो जाए, यही कारण है कि देवी-देवताओं को अर्पित किए जाने वाले फूल और पत्रों को तोड़ने के कुछ नियम हैं, बेलपत्र तोड़ने के भी कुछ नियम हैं :-  
1. चतुर्थी, अष्टमी, नवमी, चतुर्दशी और अमावस्या तिथ‍ियों को, सं‍क्रांति के समय और सोमवार को बेलपत्र न तोड़ें। 
2. भगवान शंकर को बेलपत्र चढ़ाने के लिए इन तिथ‍ियों या वार से पहले तोड़ा गया पत्र ही चढ़ाना चाहिए।  
3. शास्त्रों में कहा गया है कि अगर नया बेलपत्र न मिल सके, तो किसी दूसरे के चढ़ाए हुए बेलपत्र को भी धोकर कई बार इस्तेमाल किया जा सकता है। 
अर्पितान्यपि बिल्वानि प्रक्षाल्यापि पुन: पुन:।
शंकरायार्पणीयानि न नवानि यदि क्वचित्।।
(स्कंदपुराण) 
4. टहनी से चुन-चुनकर सिर्फ बेलपत्र ही तोड़ना चाहिए, कभी भी पूरी टहनी नहीं तोड़नी चाहिए। पत्र सावधानी से तोड़ना चाहिए कि वृक्ष को कोई हानि न पहुंचे। 
5. बेलपत्र तोड़ने से पहले और बाद में वृक्ष को मन ही मन प्रणाम करना चाहिए।
कैसे चढ़ाएं बेलपत्र :- भगवान शिव को बेल पत्र प्रिय हैं ही। साथ ही भगवान शिव के अंशावतार हनुमान जी को भी बेलपत्र अर्पित किया जा सकता है, भगवान शिव को बेलपत्र चढ़ाने से घर की धन-दौलत में वृद्धि होने लगती है, अधूरी कामनाएं पूर्ण होती हैं।
शिव पुराण के अनुसार सावन के सोमवार को शिवालय में बेलपत्र चढ़ाने से एक करोड़ कन्यादान के बराबर फल मिलता है।
बेलपत्र का वृक्ष हर कामना को पूरी करता है। यही नहीं उसके पत्तों को गंगा जल से धोकर उन्हें बजरंगबली पर अर्पित करने से अनेक तीर्थों का फल मिलता है।
बिल्व वृक्ष (बेल के पेड़) की जड़ सफेद धागे में पिरोकर रविवार को गले में धारण करने से रक्तचाप, क्रोध और असाध्य रोगों से रक्षा होती है।
बिल्व वृक्ष का पूजन पाप व दरिद्रता का अंत कर वैभवशाली बनाने वाला माना गया है। घर में बेल पत्र लगाने से देवी महालक्ष्मी बहुत प्रसन्न होती हैं।
बेल पत्तों को लक्ष्मी का रूप माना जाता है। इन्हें अपने पास रखने से कभी धन-दौलत का अभाव नहीं होता।
शिव पुराण के अनुसार :-  1. बिल्व वृक्ष के आसपास सर्प नहीं आते ।  
2. यदि किसी की शव यात्रा बिल्व वृक्ष की छाया से होकर
गुजरे तो उसका मोक्ष हो जाता है ।
3. वायुमंडल में व्याप्त अशुध्दियों को सोखने की क्षमता
सबसे अधिक बिल्व वृक्ष में होती है ।
4. चार पांच छः या सात पत्तो वाले बिल्व पत्रक पाने वाला
परम भाग्यशाली और शिव को अर्पण करने से अनंत गुना फल
मिलता है ।
5. बेल वृक्ष को काटने से वंश का नाश होता है। और बेल
वृक्ष लगाने से वंश की वृद्धि होती है। 
6. सुबह शाम बेल वृक्ष के दर्शन मात्र से पापो का नाश होता
है। 
7. बेल वृक्ष को सींचने से पितर तृप्त होते है।
8. बेल वृक्ष और सफ़ेद आक् को जोड़े से लगाने पर अटूट
लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। 
9. बेल पत्र और ताम्र धातु के एक विशेष प्रयोग से ऋषि मुनि
स्वर्ण धातु का उत्पादन करते थे । 
10. जीवन में सिर्फ एक बार और वो भी यदि भूल से भी
शिवलिंग पर बेल पत्र चढ़ा दिया हो तो भी उसके सारे पाप मुक्त
हो जाते है । 
11. बेल वृक्ष का रोपण, पोषण और संवर्धन करने से महादेव
से साक्षात्कार करने का अवश्य लाभ मिलता है।
शिवपुराण के अनुसार जानिए कौन सा अनाज भगवान शिव को
चढ़ाने से क्या फल मिलता है :-
1. भगवान शिव को चावल चढ़ाने से धन की प्राप्ति होती है।
2. तिल चढ़ाने से पापों का नाश हो जाता है।
3. जौ अर्पित करने से सुख में वृद्धि होती है।
4. गेहूं चढ़ाने से संतान वृद्धि होती है।यह सभी अन्न भगवान
को अर्पण करने के बाद गरीबों में वितरीत कर देना चाहिए। 
शिवपुराण के अनुसार जानिए भगवान शिव को कौन सा रस
(द्रव्य) चढ़ाने से उसका क्या फल मिलता है :-
1. ज्वर (बुखार) होने पर भगवान शिव को जलधारा चढ़ाने से
शीघ्र लाभ मिलता है। सुख व संतान की वृद्धि के लिए भी
जलधारा द्वारा शिव की पूजा उत्तम बताई गई है।
2. नपुंसक व्यक्ति अगर शुद्ध घी से भगवान शिव का अभिषेक
करे, ब्राह्मणों को भोजन कराए तथा सोमवार का व्रत करे तो
उसकी समस्या का निदान संभव है।
3. तेज दिमाग के लिए शक्कर मिश्रित दूध भगवान शिव को
चढ़ाएं।
4. सुगंधित तेल से भगवान शिव का अभिषेक करने पर समृद्धि में
वृद्धि होती है।
5. शिवलिंग पर ईख (गन्ना) का रस चढ़ाया जाए तो सभी आनंदों
की प्राप्ति होती है।
6. शिव को गंगाजल चढ़ाने से भोग व मोक्ष दोनों की प्राप्ति
होती है।
7. मधु (शहद) से भगवान शिव का अभिषेक करने से राजयक्ष्मा
(टीबी) रोग में आराम मिलता है।
शिवपुराण के अनुसार जानिए भगवान शिव को कौन का फूल
चढ़ाया जाए तो उसका क्या फल मिलता है :-
1. लाल व सफेद आंकड़े के फूल से भगवान शिव का पूजन करने
पर भोग व मोक्ष की प्राप्ति होती है।
2. चमेली के फूल से पूजन करने पर वाहन सुख मिलता है।
3. अलसी के फूल से शिव का पूजन करने से मनुष्य भगवान
विष्णु को प्रिय होता है।
4. शमी पत्र (पत्तों) से पूजन करने पर मोक्ष प्राप्त होता है।
5. बेला के फूल से पूजन करने पर सुंदर व सुशील पत्नी मिलती
है।
6. जूही के फूल से शिव का पूजन करें तो घर में कभी अन्न की
कमी नहीं होती।
7. कनेर के फूलों से शिव पूजन करने से नए वस्त्र मिलते हैं।
8. हारसिंगार के फूलों से पूजन करने पर सुख-सम्पत्ति में वृद्धि
होती है।
9. धतूरे के फूल से पूजन करने पर भगवान शंकर सुयोग्य पुत्र
प्रदान करते हैं, जो कुल का नाम रोशनकरता है।
10. लाल डंठलवाला धतूरा पूजन में शुभ माना गया है। 
11. दूर्वा से पूजन करने पर आयु बढ़ती है।

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हिन्दू परिवार संघटन संस्था
 Cont No-9448487317

शिव और शक्ति का नाम लिंग के अनुसार नहीं बल्कि उनकी विेशेषताओं के आधार पर दिया गया है।

सृष्टि के सर्वनाश के लिए थामा था शिव ने त्रिशूल!
तीन देव
हिन्दू मान्यताओं के अनुसार, ब्रह्मा, विष्णु, महेश, इन तीन देवों के हाथ में संपूर्ण सृष्टि की बागडोर सौंपी गई है।
विनाशक हैं शिव!
ब्रह्मा को रचयिता, विष्णु को पालनहार और शिव यानी महेश को विनाशक की उपाधि दी गयी है।
शिव का त्रिशूल
शिव के हाथ में मौजूद त्रिशूल भी अपनी अलग कहानी बयां करता है।
विनाश की निशानी
बहुत से लोग इसे विनाश की निशानी मानते हैं तो कुछ का मानना है कि त्रिशूल के रहस्य को समझ पाना वाकई बहुत कठिन है।
रहस्यमय त्रिशूल
हिन्दू पुराणों में कई रहस्य छिपे हैं जिनमें से एक है भगवान शिव के हाथ त्रिशूल। चलिए जानने की कोशिश करते हैं कि आखिर ये रहस्य क्या हो सकते हैं।
रचना और पालन का भी प्रतीक
बहुत से लोग ये मानते हैं कि ये त्रिशूल ब्रह्मा-विष्णु-महेश यानी रचना, पालन और फिर उसके विनाश का प्रतीक है।
भविष्य को भी दर्शाता है
इसे भूत, वर्तमान और भविष्यकाल के साथ-साथ स्वर्ग, धरती, पाताल और इच्छा, क्रिया और बुद्धि का परिचायक भी माना जाता है।
देवी के हाथ का त्रिशूल
शिव के अलावा हिन्दू देवियों के भी हाथ में त्रिशूल देखा जा सकता है इसलिए कुछ लोगों का ये भी मानना है कि देवी के हाथ में त्रिशूल लक्ष्मी, सरस्वती और काली को दर्शाता है।
विचारों की दुनिया का नाश
ऐसा माना जाता है कि शिव के हाथ के त्रिशूल का निर्माण भौतिक लोक, पूर्वजों की दुनिया और विचारों की दुनिया के सर्वनाश के लिए हुआ था।
पाप का नाश
ताकि इंसानी दुनिया में बढ़ते पाप और अहंकार का विनाश के बाद एक ऐसे आध्यात्मिक लोक की स्थापना की जा सके जहां किसी प्रकार का कोई पाप मौजूद न हो।
ईश्वर निर्गुण है
त्रिशूल, तीनों गुण सत, रज, तम का भी परिचायक है और त्रिशूल का शिव के हाथ में होने का अर्थ है कि भगवान तीनों गुणों से ऊपर है, वह निर्गुण है।
पवित्रता का प्रतीक है त्रिशूल
शिव का त्रिशूल पवित्रता और शुभकर्म का प्रतीक भी है, जिसकी आराधना कर हम अपने अतीत, वर्तमान और भविष्य के कष्टों से पार पा सकते हैं।
मोक्ष की प्राप्ति
इतना ही नहीं जन्म और मृत्यु के चक्र को छोडकर हमारी आत्मा मोक्ष की प्राप्ति कर ईश्वर का सानिध्य प्राप्त कर सकती है।
नकारात्मकता का सर्वनाश
शिव के त्रिशूल में इंसानी मस्तिष्क और शरीर में व्याप्त विभिन्न बुराइयों और नकारात्मकता को समाप्त करने की भी ताकत है।
मानव शरीर की नाड़ियां
मनुष्य शरीर में भी त्रिशूल, जहां तीन नाड़ियां मिलती हैं, मौजूद है और यह ऊर्जा स्त्रोतों, इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना को दर्शाता है।
ऊर्जा का केन्द्र
सुषुम्ना जो कि मध्य में है, को सातवां चक्र और ऊर्जा का केंद्र कहा जाता है।
बाहरी उठापटक से दूर
हमारे शरीर में एक स्थान ऐसा होता है जो बाहरी उठापटक को पूरी तरह नजरअंदाज करता है और यह तभी कार्य करता है जब सुषुम्ना तक ऊर्जा पहुंचने लगती है।
जीवन की असली शुरुआत
सुषुम्ना तक ऊर्जा पहुंचने के साथ ही जीवन की असली शुरुआत होती है। जब बाहर हो रही किसी भी तरह की गतिविधियों का प्रभाव मनुष्य के भीतर नहीं होता।
इड़ा और पिंगल
वहीं अन्य दो कोनों को इड़ा और पिंगला कहा जाता है।
शिव और शक्ति
इड़ा और पिंगला को शिव और शक्ति का नाम भी दिया जाता है।
विभिन्न विशेषताएं
इन्हें शिव और शक्ति का नाम लिंग के अनुसार नहीं बल्कि उनकी विेशेषताओं के आधार पर दिया गया है।
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हिन्दू परिवार संघटन संस्था
 Cont No-9448487317

यदि आपसे कोई यह सवाल करे तो आप फटाक से जवाब में कहेंगे कि ‘2 पुत्र थे’

भगवान शिव के 2 नहीं, 6 पुत्र थे!!
शिव जी की संतान
भगवान शिव के कितने पुत्र थे? यदि आपसे कोई यह सवाल करे तो आप फटाक से जवाब में कहेंगे कि ‘2 पुत्र थे’। एक का नाम गणेश और दूसरे पुत्र हैं कार्तिकेय। लेकिन अगर हम ये कहें कि भगवान शिव के 2 नहीं 6 पुत्र थे तो क्या आप यकीन करेंगे?
शिव जी की संतान
शायद नहीं... लेकिन सत्य यही है कि शिवजी के 2 नहीं, बल्कि 6 पुत्र थे। ये बात अलग है कि अन्य 4 पुत्रों के बारे में कभी जाना नहीं गया, लेकिन अगर पौराणिक घटनाओं को करीब से जाना जाए, तो शिवजी के अन्य 4 पुत्रों का उल्लेख मिल जाता है।

शिव जी की संतान
तो क्या ये पुत्र गणेश जी और कार्तिकेय जी से बड़े थे? या फिर उम्र में छोटे थे? इनका जन्म कब हुआ और कहां हुआ? क्या शिवजी ने इन पुत्रों को कभी अपनाया था? इन सभी सवालों के जवाब हम यहां प्रस्तुत करने जा रहे हैं। भगवान शिव
हिन्दू धर्म में आप त्रिमूर्ति का उल्लेख पा सकते हैं – ब्रह्मा, विष्णु, महेश। एक ने सृष्टि को रचा है, तो दूसरे देव उसका पालन कर रहे हैं। लेकिन जब कोई बड़ा संकट आए या महापाप फैल जाए, तो सृष्टि का सर्वनाश करने के लिए तीसरे देव ‘महेश’ हैं।
भगवान शिव
शिवजी को हिन्दू मान्यताओं में “रौद्र” बताया गया है। ऐसा कहा जाता है कि उन्हें गुस्सा दिलाने वाले का भविष्य संकट में पड़ जाता है। लेकिन अगर दिल से उनकी आराधना की जाए, तो भोले भंडारी जल्द से जल्द मनोकामना पूरी करते हैं।
पहला विवाह
हिन्दू मान्यताओं के अनुसार भगवान शिव का विवाह दक्ष की पुत्री सती से हुआ था। लेकिन सती ने आग में कूद कर स्वयं को भस्म कर लिया था। सती की मृत्यु के बाद सती ने अपना दूसरा जन्म पर्वतराज हिमालय के यहां उमा के रूप में लिया था।
दूसरा विवाह
कठोर तपस्या और व्रत का पालन करने के बाद पार्वती को भगवान शिव वर के रूप में प्राप्त हुए थे। शिव पार्वती के विवाह के बाद उनका गृहस्थ जीवन शुरू हुआ और उन्हें पुत्र प्राप्त हुए।
कार्तिकेय
यह सभी जानते हैं कि माता पार्वती से शिव जी को दो पुत्रों की प्राप्ति हुई थी। पहले थे कार्तिकेय, जिन्हें भगवान कार्तिकेय के नाम से पुकारा जाता है।कार्तिकेय
कहते हैं कि सती की मृत्यु के बाद भगवान् शिव दुखी हो कर लम्बी तपस्या में बैठ गए थे, जिससे विश्व में दैत्यों का अत्याचार बढ़ गया था। सभी देवता इससे परेशान होकर भगवान् ब्रह्मा के पास उपाय मांगने गए। उसी वक़्त ब्रह्म देव ने कहा था कि शिव और पार्वती से जन्मा पुत्र इस समस्या का समाधान करेगा और शिव पार्वती के विवाह के बाद कार्तिकेय का जन्म हुआ था।
गणेश
भगवान् गणेश के जन्म के पीछे कई कहानियां प्रचलित हैं, लेकिन इन्हीं में से एक कहानी के अनुसार माता पार्वती स्नान करने के लिए जाने लगी थीं कि उन्होंने देखा कि बाहर पहरा देने के लिए कोई नहीं है। तभी उन्होंने उबटन और चन्दन के मिश्रण से गणेश की उत्पत्ति की और उसके बाद स्नान करने गयी थीं।गणेश
माता पार्वती ने गणेश को यह आदेश दिया था कि स्नान करते तक वह किसी को घर में प्रवेश न करने दें। कुछ देर बाद भगवान शिव वहां पहुंचे, जिन्हें गणेश ने घर के भीतर जाने से रोक दिया। इस बात से क्रोधित भगवान शिव ने गणेश का सर धड़ से अलग कर दिया।गणेशजब पार्वती जी ने यह दृश्य देखा तो वे बेहद नाराज़ हुईं। माता पार्वती के गुस्से को शांत करने के लिए भगवान शिव ने कटे धड़ की जगह, हाथी के बच्चे का सर लगा कर गणेश को पुनःजीवित किया।
अयप्पा
ये हैं शिवजी के तीसरे पुत्र, जिन्हें दक्षिण भारत में पूजा जाता है। इन्हें तमिलनाडु में भगवान अयप्पा या फिर भगवान अय्यनर के नाम से भी पुकारा जाता है। ये शिवजी और मोहिनी के पुत्र थे, मोहिनी भगवान विष्णु का ही स्त्री अवतार थीं। पुराणों के अनुसार अयप्पा ने भगवान परशुराम से शस्त्र विद्या प्राप्त की थी, वे एक शक्तिशाली योद्धा थे।
अंधक
शिवजी के अंधक पुत्र का जन्म कैसे हुआ, इसका पुराणों में कोई पुख्ता उल्लेख नहीं है। कहते हैं हिरनयक्ष, जो कि संतान सुख से वंचित था उसकी इच्छा पूर्ण करने के लिए शिवजी यह पुत्र वरदान में दिया था।
अंधक
परंतु वह पुत्र देख नहीं सकता था, इसलिए उसका नाम अंधक रखा गया। कहते हैं स्वयं शिवजी ने ही अंधक का संहार किया था, क्योंकि उसने माता पार्वती को अपमानित करने जैसा पाप किया था।
भौमा
शिवजी के ‘पसीने’ से उतपन्न हुआ था यह पुत्र। एक पौराणिक कथा के अनुसार कठोर तपस्या में लीन शिवजी के पसीने का एक कतरा भूमि देवी पर जाकर गिरा। उस समय शिव जी तपस्या में लीन थे, इसलिए भूमि देवी ने स्वयं ही इस पुत्र के पालन-पोषण की जिम्मेदारी ली।
भौमा
लेकिन कुछ समय के पश्चात जब शिवजी को यह ज्ञात हुआ कि यह उन्हीं का पुत्र है, तो भूमि देवी को सम्मान देते हुए उन्होंने अपने पुत्र का नाम ‘भौमा’ ही रखा। पुराणों में भगवान भौमा के नाम का उल्लेख मिलता है, जिनका रंग-रूप लाल था और उनके चार हाथ थे।
खुजा
पौराणिक वर्णन के अनुसार खुजा धरती से तेज किरणों की तरह निकले थे और सीधा आकाश की ओर निकल गए थे।
अशोक सुंदरी
शिव जी के 6 पुत्रों के अलावा, एक पुत्री भी थी। इस पुत्री का नाम अशोक सुंदरी था। कहते हैं माता पार्वती ने अपने अकेलेपन को खत्म करने के लिए ही इस पुत्री का निर्माण किया था।

अशोक सुंदरी

जी हां... अशोक सुंदरी को माता पार्वती ने एक पेड़ से निर्मित किया था। इन्होंने पार्वती जी का ‘शोक’ समाप्त किया था, इसीलिए उन्होंने अपनी पुत्री का नाम अशोक सुंदरी रखा।

भगवान शिव से जुड़ा अगर कोई बेहद शक्तिशाली एवं अद्भुत फल देने वाला मंत्र है

इस शिवरात्रि करें शिव महामंत्र का जाप, 




शिव महामंत्र का जाप

भगवान शिव से जुड़ा अगर कोई बेहद शक्तिशाली एवं अद्भुत फल देने वाला मंत्र है तो वह है ‘महामृत्युञ्जय मंत्र’। इस मंत्र की शास्त्रों में बेहद महिमा है। कहते हैं कि इस मंत्र का जाप इंसान की हर मन्नत पूरी कर सकता है। यह मंत्र व्यक्ति को मौत के मुंह से भी बाहर निकाल सकता है।
शिवजी को प्रसन्न करना हो तो महामृत्युञ्जय मंत्र को बहुत ही अचूक माना जाता है। कहते हैं कि प्रतिदिन यदि सही संख्या में इस मंत्र का जाप किया जाए तो यह विभिन्न फल प्रदान कराता है। 

आज इसी बात को ध्यान में रखते हुए हम आपको बताएंगे कि आप महामृत्युञ्जय मंत्र का कितनी बार जाप करें, ताकि आपको भिन्न-भिन्न फलों की प्राप्ति हो 

शिव महामंत्र का जाप

महामृत्युञ्जय मंत्र से जुड़ी यह जानकारी शिव पुराण में दर्ज है, जहां यह बताया गया है कि शिव से जुड़े विशेष दिन या वार जैसे कि प्रदोष, सोमवार, चतुर्दशी, महाशिवरात्रि या हर रोज भी महादेव के इस मंत्र का अलग-अलग रूप और संख्या में जप तन, मन और धन के साथ जप किया जाए तो यह हर सुख देने वाला बनता है।

एक लाख जाप

शिव पुराण के अनुसार महामृत्युञ्जय मंत्र के एक लाख जप करने पर शरीर पवित्र हो जाता है।

दो लाख जाप

अगर इस शक्तिशाली मंत्र के आप 2 लाख जप पूर्ण कर लें तो पूर्वजन्म की बातें याद आ जाती हैं।

तीन लाख जाप

महामृत्युञ्जय मंत्र के तीन लाख जप पूरे होने पर सभी मनचाही सुख-सुविधा और वस्तुएं मिल जाती है।

चार लाख जाप

चार लाख जप पूरे होने पर भगवान शिव सपनों में दर्शन देते हैं और अगर पांच लाख महामृत्युंजय मंत्र जप पूरे हो जाएं तो भगवान शिव स्वयं ही प्रकट होकर अपने भक्त को दर्शन देते हैं और मुंह मांगी मुराद पूरी करते हैं।

शिव मंत्र जाप

इतनी अधिक संख्या में महामृत्युञ्जय मंत्र को पूर्ण कर पाना असंभव तो लगता है लेकिन आस्था की कोई परिभाषा और निश्चित सीमा नहीं होती। यदि भक्त चाहे तो भगवान को प्रसन्न करने के लिए कुछ भी कर सकता है।



शिवरात्रि पर करें यह 10 अभिषेक

शिवरात्रि पर करें यह 10 अभिषेक, पूरी होगी कामना अनेक
महाशिवरात्रि का पर्व भगवान शिव को प्रसन्न करने का दिन माना जाता है। आइए जानते हैं किस प्रकार की मनोकामना के लिए शिव शंकर का किस द्रव्य से पूजन करना चाहिए। सभी अभिषेक द्रव्य का फल अलग-अलग है।

1. गंगाजल या शुद्ध जल- सौभाग्य वृद्धि।
2. दुग्ध गाय का- गृह शांति तथा लक्ष्मी प्राप्ति।
3. सुगंधित तेल- भोग प्राप्ति।
4. सरसों का तेल- शत्रु नाश।
5. मीठा जल या दुग्ध- बुद्धि विलास।
6. घी- वंश वृद्धि।
7. पंचामृत- मनोवांछित प्राप्ति के लिए।
8. गन्ने का रस या फलों का रस- लक्ष्मी तथा ऐश्वर्य प्राप्ति।
9. छाछ- ज्वर से छुटकारा।
10. शहद- ऐश्वर्य प्राप्ति।

शिवलिंग कई प्रकार के उपयोग में लाए जाते हैं हर शिवलिंग का फल अलग-अलग है।

13 फरवरी को महाशिवरात्रि, किस कामना के लिए करें कैसा पूजन


शव से शिव होने की यात्रा ही जड़ से चैतन्य होने की यात्रा है। फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष में चतुर्दशी को मनाया जाने वाला यह पर्व 'शिवरात्रि' के नाम से जाना जाता है। इस दिन भोलेनाथ का विवाह माता पार्वती के साथ हुआ था। इस‍ दिन शिव मंत्र जप-हवन-अभिषेक हवन का बड़ा महत्व है। यदि मंदिर में पूजन इत्यादि करें तो ठीक अन्यथा घर पर भी पूजन कार्य किया जा सकता है। इस वर्ष शिवरात्रि14 फरवरी 2018 को है।
पूजा विधि
पूजा के लिए आवश्यक है शिवलिंग। नंदी को एक बड़े पात्र में रखें। शिव जी की जलाधारी का मुंह उत्तर दिशा की ओर रखते हुए पूजन प्रारंभ किया जा सकता है।

शिवलिंग कई प्रकार के उपयोग में लाए जाते हैं हर शिवलिंग का फल अलग-अलग है।

1. पार्थिव शिवलिंग- हर कार्य सिद्धि के लिए।
2. गुड़ के शिवलिंग- प्रेम पाने के लिए।
3. भस्म से बने शिवलिंग- सर्वसुख की प्राप्ति के लिए।
4. जौ या चावल या आटे के शिवलिंग- दाम्पत्य सुख, संतान प्राप्ति के लिए।
5. दही से बने शिवलिंग-‍ ऐश्वर्य प्राप्ति के लिए।
6. पीतल, कांसी के शिवलिंग- मोक्ष प्राप्ति के लिए।
7. सीसा इत्यादि के शिवलिंग- शत्रु संहार के लिए।
8. पारे के शिवलिंग- अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष के लिए।
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शिवरात्रि विशेष : 12 राशियों के लिए पूजन के विशेष प्रकार

चमकदार किस्मत के लिए राशि अनुसार करें महाशिवरात्रि पूजन, (12 राशियां)

शिवरात्रि विशेष : 12 राशियों के लिए पूजन के विशेष प्रकार
महाशिवरात्रि पर्व पर अलग-अलग राशि के लोगों के लिए विशेष पूजन के प्रकार का प्रावधान है। भगवान शिव यूं तो मात्र जल और बिल्वपत्र से प्रसन्न हो जाते हैं लेकिन उनका पूजन अगर अपनी राशि के अनुसार किया जाए तो अतिशीघ्र फल की प्राप्ति होती है।
मेष- रक्तपुष्प से पूजन करें तथा अभिषेक शहद से करें। 'ॐ नम: शिवाय' का जप करें।
वृषभ- श्वेत पुष्प तथा दुग्ध से पूजन-अभिषेक करें। महामृत्युंजय का मंत्र जपें।

मिथुन- अर्क, धतूरा तथा दुग्ध से पूजन-अभिषेक करें। शिव चालीसा पढ़ें।

कर्क- श्वेत कमल, पुष्प तथा दुग्ध से पूजन-अभिषेक करें। शिवाष्टक पढ़ें।

सिंह- रक्त पुष्प तथा पंचामृत से पूजन-अभिषेक करें। शिव महिम्न स्त्रोत पढ़ें।

कन्या- हरित पुष्प, भांग तथा सुगंधित तेल से पूजन-अभिषेक करें। शिव पुराण में वर्णित कथा का वाचन करें।

तुला- श्वेत पुष्प तथा दुग्ध धारा से पूजन-‍अभिषेक करें। महाकाल सहस्त्रनाम पढ़ें।

वृश्चिक- रक्त पुष्प तथा सरसों तेल से पूजन-‍अभिषेक करें। शिव जी के 108 नामों का स्मरण करें।
धनु- पीले पुष्प तथा सरसों तेल से पूजन-‍अभिषेक करें। 12 ज्योतिर्लिंगों का स्मरण करें।

मकर- नीले-काले पुष्प तथा गंगाजल से पूजन-‍अभिषेक करें। शिव पंचाक्षर मंत्र का जप करें।

कुंभ- जामुनिया-नीले पुष्प तथा जल से पूजन-‍अभिषेक करें। शिव षडाक्षर मंत्र का 11 बार स्मरण करें।

मीन- पीले पुष्प तथा मीठे जल से पूजन-‍अभिषेक करें। रावण रचित शिव तांडव का पाठ करें।

नोट : पूजन में पहले ध्यान, आवाहन, आसन, पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान, पंचामृत स्नान, शुद्धोदक जल स्नान, वस्त्र, यज्ञोपवीत, उपवस्त्र, चंदन, अक्षत, पुष्प, पुष्प माला, धूप-दीप, नैवेद्य नीराजन, पुष्पांजलि, परिक्रमा, क्षमा-प्रार्थना इत्यादि मूल मंत्र का प्रयोग करें।
भोलेनाथ को बिल्वपत्र, भांग, अर्क पुष्प, धतूरे के पुष्प-फल भी चढ़ाए जाते हैं। जो वस्तु कम हो, उस वस्तु की जगह अक्षत का प्रयोग करें।

शिव पंचाक्षरी मंत्र- नम: शिवाय।
शिव षडाक्षरी मंत्र- ॐ नम: शिवाय।
मृत्युंजय मंत्र- ॐ जूं स:।
महामृत्युंजय मंत्र-
ॐ त्र्यम्बकम् यजामहे, सुगन्धिं पुष्टि वर्धनम्।
उर्वारु‍कमिव बन्धनात् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्।।
इन मंत्रों में से जो अच्‍छा लगे, उसका जाप तथा उसी से पूजन करें तथा लाभ उठाएं।

जिस तरह हिन्दू धर्म में दिन, समय और मुहूर्त का विशेष ध्यान रखा जाता है उसी तरह यह भी आवश्यक है कि विशेष फल प्राप्ति के लिए महाशिवरात्रि के दिन शुभ काल के दौरान ही महादेव और पार्वती की पूजा की जाए।

महाशिवरात्रि 2018: जानिए शिव पूजा का शुभ मुहूर्त

निशिथ काल पूजन: 24:09 से 25:01 (13 फरवरी)
चतुर्दशी तिथि आरंभ: 22:34 (13 फरवरी)

भगवान शिव ब्रह्मांड के रक्षक हैं और साथ ही साथ विनाशक भी। वह नकारातमकता और बुरी शक्तियों का विनाश कर उसके स्थान पर शुभता और पवित्रता की स्थापना करते हैं...उसके रक्षा करते हैं। वे समस्त बुराइयों का नाश करते हैं, वे तंत्र-मंत्र के जनक भी हैं।
वैसे तो सप्ताह का हर सोमवार देवाधिदेव भगवान शिव को समर्पित हैं लेकिन शिवरात्रि एक ऐसा अवसर है जब महादेव के भक्त उनकी पूरी श्रद्धा और तन्मयता के साथ पूजा करते हैं, उनके प्रति अपनी आस्था का प्रदर्शन करते हैं।
हिन्दू कैलेंडर के अनुसार प्रति माह शिवरात्रि का त्यौहार आता है, लेकिन फाल्गुन के महीने में आने वाली शिवरात्रि को महाशिवरात्रि के तौर पर बड़ी धूमधाम के साथ मनाया जाता है।
इस माह यह पर्व 13 तारीख को है, जाहिर तौर पर सभी शिव मंदिरों में इस शिवोत्सव की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। शिव भक्त भी इस दिन को लेकर अति उत्साहित रहते हैं, क्योंकि इस दिन वह अपने अराध्य देव को प्रसन्न कर उनसे मनचाही मुराद मांग सकते हैं।
जिस तरह हिन्दू धर्म में दिन, समय और मुहूर्त का विशेष ध्यान रखा जाता है उसी तरह यह भी आवश्यक है कि विशेष फल प्राप्ति के लिए महाशिवरात्रि के दिन शुभ काल के दौरान ही महादेव और पार्वती की पूजा की जाए।

Monday, 12 February 2018

तो मन्दिर के विरोध में खड़ेहिन्दू को किसको उत्तर देना होगा . ?

ओवैसी बोला कि बाबरी पर झुकने वाले मुसलमान अल्लाह को देगे जवाब. मन्दिर विरोधी सेकुलर हिन्दू बताएं कि वो किसे देंगे जवाब ?

खुद को धर्मनिरपेक्ष कहने वाला ओवैसी नहीं तैयार है किसी भी प्रकार से बाबरी के नाम पर कोई भी समझौता करने के लिए लेकिन उसकी जुबान पर हर बार किसी न किसी हिन्दू संगठन का नाम साम्प्रदायिकता के रूप में आ ही जाता है . धर्मनिरपेक्षता की बात करने वाला और धर्मनिरपेक्ष देश की धर्मनिरपेक्ष संसद में धर्मनिरपेक्ष संविधान की शपथ लेने वाला ओवैसी एक बार फिर से सिर्फ और सिर्फ मुसलमान की बात कर रहा है . और ये बात नहीं सीधे सीधे मुसलमानों को साम्प्रदायिक उन्माद के लिए उत्साहित कर रहा है जिसमे सवाल है हिन्दुओं के लिए भी जो श्रीराम मन्दिर के विरोध में खड़े हैं .

ज्ञात हो कि अयोध्या में बाबरी मस्जिद के मालिकाना हक़ को लेकर समझौते की गुंजाइश से साफ़ इनकार करते हुए आल इंडिया मजलिस ए इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि बाबरी मस्जिद मामले में किसी भी तरह का समझौता नहीं किया जाएगा. जहां तक बाबरी मस्जिद की बात है, मस्जिद मुद्दे पर करने वाले लोग अल्लाह के सामने जवाबदेह होंगे.'' इस बयान के बाद कम से कम सेकुलर और श्रीराम मन्दिर के विरोध में खड़े खुद को हिन्दू कहने वाले उन तमाम सेकुलर ब्रिगेड के सदस्यों से सवाल तो बनता ही है कि अगर मस्जिद से समझौता करने वाले मुसलमान को अल्लाह के आगे जवाब देना होगा तो मन्दिर के विरोध में खड़ेहिन्दू को किसको उत्तर देना होगा . ?

Sunday, 11 February 2018

सनातन धर्म के अनुसार महादेव का ना ही कोई अंत है, ना ही कोई आरंभ। शिव का ना कोई रूप, ना कोई आकार

क्यों की जाती है शिवलिंग पूजा


त्रिदेवों का महत्त्व

सनातन धर्म के अनुसार महादेव का ना ही कोई अंत है, ना ही कोई आरंभ। शिव का ना कोई रूप, ना कोई आकार माना गया है। शिवलिंग को भगवान शिव का प्रतीकात्मक रूप माना जाता है। लेकिन क्या आप कभी समझ पाएं कि क्यों तमाम दैवीय प्रतीकों में केवल शिवलिंग को इतना महत्व दिया जाता है? नहीं, तो चलिए आज जानते हैं शिवलिंग से जुड़े कुछ अहम रहस्य?

क्या है शिवलिंग?

शिव' का अर्थ है– 'परम कल्याणकारी' और 'लिंग' का अर्थ है – ‘सृजन’। लिंग का एक अर्थ शास्त्रों में ऐसी वस्तु से भी है प्रलयकाल में समस्त सृष्टि जिसमें लीन हो जाती है और पुन: सृष्टिकाल में जिससे प्रकट होती। पृथ्वी की समस्त शक्ति का उद्गम स्थल लिंग को ही माना गया है।

क्या है शिवलिंग?

त्रिदेवों में से एक महादेव शिव से संबंधित होना शिवलिंग की मान्यता को और बल देता है। लेकिन क्या यह शिवजी का “लिंग” यानि पुरुष जननांग है? उत्तर है हां।

कैसे हुई शिवलिंग की उत्पत्ति?

एक कथा अनुसार (जिसे प्रक्षिप्तांश माना गया है), आदिकाल में एक बार भगवान शिव अपने धुन में निर्वस्त्र होकर घूम रहे थे। इसी दौरान वह एक वन से गुजर रहे थे जहां ऋषि-पत्नियां उनके इस रूप को देखकर मोहित हो गईं।

कैसे हुई शिवलिंग की उत्पत्ति?

इसके बाद सभी देवतागण देवी पार्वती जी के पास पहुंचे और उन्होंने शिवलिंग को धारण कर लिया और संसार को प्रलय से बचा लिया। इसके बाद से ही शिवलिंग के नीचे माता पार्वती का भाग विराजमान रहने लगा।
कैसे हुई शिवलिंग की उत्पत्ति?हालांकि शिवपुराण में एक अन्य कथा का वर्णन है जिसके अनुसार भगवान शिव ने ब्रह्मा और विष्णु के बीच श्रेष्ठता को लेकर हुए विवाद को सुलझाने के लिए एक दिव्य लिंग प्रकट किया था। इस लिंग का आदि और अंत ढूंढते हुए ब्रह्मा और विष्णु को शिव के परब्रह्म स्वरूप का ज्ञान हुआ।
12 ज्योतिर्लिंग
संपूर्ण भारत में 12 ज्योतिर्लिंग हैं जहां साक्षात भोले भंडारी शिवलिंग के रूप में विराजमान हैं। इनके नाम हैं सौराष्ट्र प्रदेश में श्री सोमनाथ, श्रीशैल पर श्री मल्लिकार्जुन, उज्जयिनी (उज्जैन) में श्री महाकालेश्वर, ओमकारेश्वर अथवा अमलेश्वर।

12 ज्योतिर्लिंग

इसके अलावा परली में वैद्यनाथ, डाकिनी नामक स्थान में श्रीभीमशंकर, सेतुबंध पर श्री रामेश्वर, दारुकावन में श्री नागेश्वर, वाराणसी (काशी) में श्री विश्वनाथ, गौतमी (गोदावरी) के तट पर श्री त्र्यम्बकेश्वर, हिमालय पर केदारखंड में श्री केदारनाथ और शिवालय में श्रीघुश्मेश्वर हैं।

समस्त जगत के आदि और अंत का कारण

शास्त्रों में भगवान शिव को ही संसार की उत्पत्ति का कारण और परब्रह्म कहा गया है। इसी कारण प्रतीकात्मक रूप में शिवजी के लिंग की पूजा की जाती है।

समस्त जगत के आदि और अंत का कारण

शिवलिंग की मान्यता का एक कारण इसका कई वेदों और पुराणों में वर्णन भी है। श्री शिवमहापुराण में वर्णित है कि भगवान शिव ने स्वयं परमपिता ब्रह्मा और पालहार विष्णु जी को यह भेद बताया था कि केवल शिवलिंग के पूजन मात्र से ही समस्त देवों को तृत्प्त किया जा सकता है।

शिवलिंग पर जल क्यों अर्पित किया जाता है?

मान्यता है कि शिवलिंग पर जल चढ़ाने की प्रथा का आरंभ समुद्र मंथन के समय से हुआ। समुद्र मंथन से निकले हलाहल विष को ग्रहण करने के कारण भगवान शिव के शरीर का ताप अत्यधिक बढ़ गया था जिसे कम करने के लिए अन्य देवताओं ने उनके शरीर पर जल चढ़ाया। इसी के बाद से शिवजी का प्रतीक माने जाने वाले शिवलिंग पर भी चल चढ़ाने की परंपरा शुरु हुई।

शिवलिंग पर जल क्यों अर्पित किया जाता है?

इसके अतिरिक्त यह मान्यता है कि शिवलिंग के ताप को शांत रखने के लिए इसका जलाभिषेक किया जाता है और ऐसी व्यवस्था की जाती है कि शिवलिंग पर निरंतर जल की बूंदे गिरती रहें।
शिवलिंग की पूजा के कुछ विशेष नियम
भगवान शिव का एक नाम भोलेनाथ भी है जो केवल एक क्षमा प्रार्थना से पूजा में हुई गलतियों को माफ कर देते हैं। लेकिन इसके बाद भी कुछ ऐसे नियम हैं जिनका पालन शिवलिंग की पूजा के समय अवश्य करना चाहिए जैसे:

शिवलिंग की पूजा के कुछ विशेष नियम

शिवलिंग को घर में तभी स्थापित करना चाहिए जब आप उसपर निरंतर जल आपूर्ति और प्रतिदिन पूजा को सुनिश्चित कर सकें। घर में शिवलिंग की प्राण-प्रतिष्ठा करने के बाद ही रखें। शिवलिंग पर केतकी के फूल, तुलसी, हल्दी, कुमकुम आदि नहीं चढ़ाने चाहिए। शिवलिंग पर तिलक के लिए चन्दन का प्रयोग करना चाहिए।

शिवलिंग की पूजा के कुछ विशेष नियम

अविवाहित स्त्रियों को शिवजी की पूजा करने पर कोई रोक नहीं है लेकिन उन्हें शिवलिंग का स्पर्श या इसकी परिक्रमा नहीं करना चाहिए क्योंकि ऐसा करने से महादेव की समाधि भंग होती है। समाधि भंग होने से भगवान शिव जातक को अनिष्ट फल भी दे सकते हैं। यह भी कहा जाता है कि शिवलिंग की कभी पूरी परिक्रमा नहीं करनी चाहिए।

शिवलिंग की पूजा के कुछ विशेष नियम

श्रावण, शिवरात्रि और अन्य शुभ दिवसों पर शिवलिंग का दूध से अभिषेक करना चाहिए। दूध, जल, धतूरा, बेल पत्र, भस्म आदि भगवान शिव को अतिप्रिय हैं।