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Saturday, 9 April 2016

भारत की दस सबसे डरावनी (हान्टेड) जगहें – तथ्य।

हम सभी मनुष्यों को हमेशा से डरावनी चीजों में कुछ ना कुछ दिलचस्पी रहती ही है, हमारे भारत में ऐसी बहुत सी जगह हैं जिन्हें डरावनी जगह की ख्याती प्राप्त है। आज हम आपको भारत की दस उन्हीं सबसे डरावनी जगहों के बारें में बतायेंगे।

1. भानगढ़ का किला – अलवर – राजस्थान

स्रोत – वीकिपीडिया
भानगढ़ फोर्ट, राजस्थान के अलवर जिले में स्तिथ है। यह भारत का टॉप मोस्ट हॉन्टेड प्लेस है। इसे आम बोलचाल की भाषा में भूतो का भानगढ़ कहा जाता है।  भानगढ़ कि कहानी बड़ी ही रोचक है 16 वि शताब्दी में भानगढ़ बसता है।  300 सालो तक  भानगढ़ खूब फलता फूलता है।  फिर यहाँ कि एक सुन्दर राजकुमारी  पर काले जादू में महारथ तांत्रिक सिंधु सेवड़ा आसक्त हो जाता है। वो राजकुमारी  को वश में करने लिए काला जादू करता है पर खुद ही उसका शिकार हो कर मर जाता है पर मरने से पहले भानगढ़ को बर्बादी का श्राप दे जाता है और संयोग से उसके एक महीने बाद ही पड़ौसी राज्य अजबगढ़ से लड़ाई में राजकुमारी सहित सारे भानगढ़ वासी मारे जाते है और भानगढ़  वीरान हो जाता है। तब से वीरान हुआ भानगढ आज तक वीरान है और कहते है कि उस लड़ाई में मारे गए लोगो के भूत आज भी रात को भानगढ़ के किले में भटकते है।क्योकि तांत्रिक के श्राप के कारण उन सब कि मुक्ति नहीं हो पाई थी। यह जगह अब पुरात्तव विभाग अधीन है और उन्होंने सूर्यास्त के बाद इसे किले में नहीं रुकने की सख्त हिदायत दे रखी है।

2. कुलधरा गाँव – जैसलमेर – राजस्थान

Kuldhara_7
इस सूचि में हमने दूसरे नंबर पर रखा है राजस्थान के जैसलमेर जिले के कुलधरा गाँव को जो की पिछले 170 सालों से वीरान पड़ा हैं। कुलधरा गाँव पालीवाल ब्राहम्णो का गाँव था।  कुलधरा गाँव के हज़ारों लोग अपने गाँव की एक लड़की को अय्याश दीवान सालम सिंह से बचाने के लिए, एक ही रात मे इस गांव को खाली कर के चले गए थे  और जाते जाते श्राप दे गए थे कि यहाँ फिर कभी कोई नहीं बस पायेगा। तब से गाँव वीरान पड़ा हैं। कहा जाता है कि यह गांव रूहानी ताकतों के कब्जे में हैं, कभी एक हंसता खेलता यह गांव आज एक खंडहर में तब्दील हो चुका है| टूरिस्ट प्लेस में बदल चुके कुलधरा गांव में घूमने आने वालों के मुताबिक यहां रहने वाले पालीवाल ब्राह्मणों की आहट आज भी सुनाई देती है। उन्हें वहां हरपल ऐसा अनुभव होता है कि कोई आसपास चल रहा है। बाजार के चहल-पहल की आवाजें आती हैं, महिलाओं के बात करने उनकी चूडिय़ों और पायलों की आवाज हमेशा ही वहां के माहौल को भयावह बनाते हैं। प्रशासन ने इस गांव की सरहद पर एक फाटक बनवा दिया है जिसके पार दिन में तो सैलानी घूमने आते रहते हैं लेकिन रात में इस फाटक को पार करने की कोई हिम्मत नहीं करता हैं। मई 2013 मे दिल्ली से आई भूत प्रेत व आत्माओं पर रिसर्च करने वाली पेरानार्मल सोसायटी की टीम ने कुलधरा गाँव में रात बिताई और यहाँ पर पारलौकिक गतिविधिया रिकॉर्ड की।

 3. लाम्बी  देहर माइंस, मसूरी

लाम्बी देहर माइंस, मसूरी के बाहरी इलाके में स्तिथ है। 1990 से पहले यहाँ पर लाइमस्टोन का खनन किया जाता था। उस वक़्त यहाँ पर करीब 50000 मजदुर काम करते थे। लाइम (चुना) हमारे शरीर में जाकर फेफड़ों में जम जाता है और फेफड़ो को पत्थर में बदल देता है जिससे की इंसान को खुनी खासी (Bloody Cough) हो जाती जिससे उसकी दर्दनाक मौत होती है। इससे बचने के लिए लाइमस्टोन माइंस के लिए कई सुरक्षा नियम बने हुए है पर लाम्बीब देहर माइंस में इस तरह के किसी भी नियम का पालन नहीं होता था नतीज़न वहा पर बड़ी संख्या में मजदुर इस बिमारी से मरने लगे। इसके अलावा उन दिनों सुरक्षा नियमो की पालना के अभाव में, उस माइंस में काम पर लगे ट्रको के पहाड़ी से गिरने की भी कई घटनाएं हुई। फलस्वरूप सरकार ने सुरक्षा नियमो की अनदेखी के कारण इस माइंस को हमेशा के लिए बंद करवा दिया। तब से यह जगह वीरान पड़ी है।  जहाँ कभी 50000 मजदूरो की आबादी थी वहा पर अब मुश्किल से 1000 लोग रहते है।  खाली पड़ी माइंस एयर घरों में बड़े बड़े पेड़ उग आये है। स्थनीय लोगो के अनुसार खाली पड़ी माइंस और घर अब आत्माओ का ठिकाना है। यहाँ पर रात को लोगो के बाते करने की आवाज़े सुनाई देती है। एक और बात जो इस जगह को भयानक बनाती है वो है चलती हुई कार, बस, ट्रको का अचानक सड़क से उत्तर जाना जिससे की कई बार गंभीर हादसे भी हो जाते है।  यहाँ तक की यह पर एक हेलीकॉप्टर रहस्यमयी तरीके से क्रेश भी हो चुका है।  यह सभी बाते मिलकर इस जगह को भारत की मोस्ट हॉन्टेड प्लेस की लिस्ट में स्थान दिलाती है।

4. जमाली-कमाली मस्जिद और कब्र – महरौली, दिल्ली

स्रोत – वीकिपीडिया
यह मस्जिद दिल्ली के महरौली में स्थित है। यहां सोलवहीं शताब्दी के सूफी संत जमाली और कमाली की कब्र मौजूद है। इस जगह के बारे में लोगों का विश्वास है कि यहां जिन्न रहते हैं। कई लोगों को इस जगह पर डरावने अनुभव हुए हैं। सूफी संत जमाली लोधी हुकूमत के राज कवि थे। इसके बाद बाबर और उनके बेटे हुमायूं के राज तक जमाली को काफी तवज्जो दी गई। माना जाता है कि जमाली के मकबरे का निर्माण हुमायूं के राज के दौरान पूरा किया गया। मकबरे में दो संगमरमर की कब्र हैं, एक जमाली की और दूसरी कमाली की। जमाली कमाली मस्जिद का निर्माण 1528-29 में किया गया था। यह मस्जिद लाल पत्थर और संगमरमर से बनी है।

5. थ्री किंग्स चर्च – वेलसाओ – गोवा


कहते है की गोवा के किंग्स चर्च में तीन पुर्तगाली राजाओ की आत्मा भटकती है  और कई बार चर्च में आए लोगों को इनकी मौजूदगी का एहसास भी होता है। यहां के लोगों का कहना है की किसी समय यहां तीन पुर्तगाली राजा हुआ करते थे। इनमें वर्चस्व को लेकर अक्सर लड़ाई होती रहती थी। एक बार होल्गेर नाम के एक राजा ने अन्य दोनों राजाओं को इस चर्च में आमंत्रित किया और धोखे से जहर देकर मार दिया। जब लोगों को होल्गेर की इस करतूत का पता चला तो उन्होंने इसके महल को घेर लिया। जनता के आक्रोश को देखकर तीसरे राजा ने आत्महत्या कर ली। तीनों राजाओं के शव को इसी चर्च में दफना दिया गया। इसके बाद से ही इस चर्च में भूतों का निवास माना जाता है।

6. रामोजी फिल्म सिटी – हैदराबाद

हैदराबाद स्थित विशाल रामोजी फिल्मf सिटी का निर्माण उस जगह पर हुआ है जहाँ निज़ाम सुल्तानों ने इतिहास की कुछ क्रूरतम लड़ाईया लड़ी थी। इस फिल्म सिटी, खासकर फिल्म सिटी में स्तिथ होटलों को पारलौकिक गतिविधियों का केंद्र माना जाता है। यहाँ पर आए दिन कुछ ना कुछ ऐसा होता रहता है जो की पारलौकिक ताकतों का एहसास कराता है।  जैसे की शूटिंग के वक़्त लाइट का छत से गिर जाना, ऊपर बैठे लाइट मेन को अदृश्य ताकतों द्वारा नीचे गिरा देना (ऐसा कई बार हो चुका है और कई मौको पर तो लाइट मेन गंभीर से घायल हो चुके हैं , होटल में छोड़े गए भोजन का वापस लौटने पर इधर उधर बिखरा मिलना, ड्रेसिंग के कांच पर उर्दू में कुछ अजीब सा लिखा हुआ मिलना। माना जाता है की यहां पर मरे हुए सैनिको की आत्माए भटकती है। एक अजीब बात यह है की ये आत्माए औरतो को ज्यादा परेशान करती है। जैसे की जब वो ड्रेसिंग रूम में होती है तो वह अजीब सी परछाई दिखाई देती है , जब वो नहाती है तो उनके बाथरूम बाहर से लॉक हो जाते है। इनसे छुटकारा पाने के कई उपाय किये जा चुके है पर अब तक कोई विशेष फायदा नहीं हुआ है।

7.  अग्रसेन की बावड़ी – कनाट प्लेस – दिल्ली

अग्रसेन की बावड़ी राजधानी दिल्ली में कनाट प्लेस से थोड़ी ही दुरी पर स्थित है। महाराजा अग्रसेन ने चौदवहीं शताब्दी में इस बावड़ी का निर्माण करवाया था। इसकी लंबाई 60 मीटर और चौड़ाई 15 मीटर है। इस प्राचीन स्मारक को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) का संरक्षण प्राप्त है। किसी ज़माने में यह हमेशा पानी से भरी रहती थी, लेकिन अब यह सूख चुकी है। इसके बारे में प्रचलित है कि इसका काला पानी लोगों को सम्मोहित कर आत्महत्या के लिए उकसाता था। इसके तल तक पहुंचने के लिए 106 सीढियां उतरनी पड़ती हैं। एएसआई के अधीन होने के बावजूद लोगो को इसके बारे में ज्यादा पता नही है यदि आप कनाट प्लेस जाकर भी किसी से इसके बारे में पूछेंगे तो वो अनभिज्ञता ज़ाहिर देंगे।

8. डाउ हिल – कुर्शियांग, पश्चििम बंगाल

कुर्शियांग, पश्चिम बंगाल के दार्जलिंग जिले में स्तिथ एक हिल स्टेशन है। इसकी दार्जलिंग से दुरी 32 किलो मीटर है।  इसकी ऊँचाई 4864 फ़ीट है। कुर्शियांग का स्थानीय नाम खरसांग (Kharasang) है जिसका मतलब होता है ‘सफेद आर्किड की भूमि’। कुर्शियांग मुख्यतः अपने बोर्डिंग स्कूलों और पर्यटन के लिए जाना जाता है। पर कुर्शियांग से लगती डाउ हिल से एक मिस्ट्री जुडी हुई है जो की इसे भारत के टॉप मोस्ट हॉन्टेड प्लेस की लिस्ट में शामिल कराती है। डाउ हिल के जंगलों में बड़ी संख्या में आत्म हत्याएं हुई है। इस जंगल में इधर उधर इंसानो की हड्डियां दिखाई दे जाना आम बात है। इसलिए यहाँ के वातावरण में अजीब सी सिरहन और दर महसूस किया जाता है। इसके अलावा यहाँ के स्थानीय लोगो का कहना है कि दिसंबर से मार्च तक की छुट्टियों के दौरान उन्हें विक्टोरिया बॉयज स्कूल में पैरों कि आहट सुनाई देती है। एक लकड़हारे का तो यहाँ तक कहना है की उसने जंगल में एक युवा लड़के की सर कटी लाश को चलते हुए देखा है जो की कुछ दूर जाकर पेड़ों में गायब हो गई। वैसे यह सर कटी लाश वाली बात काल्पनिक ज्यादा लगती है लेकिन डाउ हिल के जंगलो में जाने वाला कोई भी शख्स इस बात से इंकार नहीं करता की ये जगह हॉन्टेड हो या न हो पर डरावनी बहुत है।

9. बृज राज भवन पैलेस – कोटा, राजस्थान

इस भवन में 1857 के विद्रोह में ब्रिटिश रेजिडेंट मेजर चार्ल्स बुटेन की विद्रोहियों ने हत्या कर दी थी। कहा जाता है तब से मेजर की आत्मा इसी महल में भटक रही है। खुद कोटा की पूर्व महारानी का कहना है कि उन्होंने 1980 में मेजर को हॉल में देखा था जहा कि उसे मारा गया था। उस समय महारानी उस हॉल को अपने ड्राइंग रूम के रूप में काम लेती थी। वर्तमान में यह एक हैरिटेज होटल में तब्दील हो चुका है।  कई पर्यटकों व कर्मचारियों ने भी मेजर के भूत को इस महल में भटकते देखा है। हालांकि यह आत्मा किसी को नुकसान नहीं पहुचाती है। इस मेजर की आत्मा को सिर्फ एक चीज बुरी लगती है वह है ड्यूटी के समय चौकीदार और हाउस कीपर का सोना। बृजराज भवन पैलेस में भटकती हुई आत्मा जब भी इन्हें ड्यूटी पर सोते अथवा धूम्रपान करते हुए देखती है एक जोरदार थप्पड़ लगाती है।

10. बड़ोग सुरंग नं : 33 – शिमला, हिमाचल प्रदेश

इस सुरंग का निर्माण एक अंग्रेज़ इंजीनियर बड़ोग ने करवाया था। इसलिए इसे बड़ोग सुरंग भी कहते है। बड़ोग सुरंग के साथ एक दर्द भरी कहानी  जुड़ी है। कहते हैं कि इस सुरंग को बनाने वाले  अंग्रेज इंचार्ज बड़ोग ने एक बड़ी भूल यह करदी कि एक ही बार में दोनों ओर से सुरंग बनाने का कार्य शुरू कर दिया। अंदाजे की भूल से सुरंग के दोनों छोर मिल नहीं पाए जिसके कारण उन पर एक रुपये जुरमाना किया गया। कहते हैं कि अपनी इस चूक से वह इतने अधिक दुखी हुए कि उन्होंने एक दिन अपने कुत्ते के साथ सैर पर जाते हुए स्वयं को गोली मार कर आत्म ह्त्या कर ली।  कहते है की आज भी इसमें उस अंग्रेज इंजीनियर की रूह भटकती है। हालांकि इस रूह को फ्रेंडली माना जाता है।

इन बेशकीमती भारतीय खजानों की खोज अभी है बाकी – हमारा भारत।

भारत वेदों की जननी रहा है जब लोग लिखना- पढ़ना नहीं जानते थे तब भारतीय श्रषि शोध और अनुसंधआन किया करते थे। भारत बहुत ही सम्पन्न और वैभवशाली देश रहा है। हमारे देश को पहले सोने की चिड़िया कहा जाता था,  क्योंकि उस दौर के राजाओं की शानोशौकत के चर्चे दुनिया में थे। हालांकि यही दौलत दुनिया भर के हमलावरों को भी अपनी ओर खींचती थी। इसीलिए उस दौर के राजा अपने खजानों को बचाने के लिए इनसे जुड़ी जानकारियां गुप्त रखते थे।
उस दौरान कई क्रूर आक्रमणकारी भले ही राजाओं की सत्ता छीनने में कामयाब रहे, लेकिन वे कई छिपे हुए खजानों को हासिल नहीं कर सके। भारत में ऐसे कई खजाने हैं, जिनकी तलाश करनी अभी भी बाकी है। हम आपको देश के ऐसे ही कुछ खजानों के बारे में बता रहे है जिन्हें लेकर कई तरह की किवदंतिया आज भी प्रचलित है।

जानिए कौन से हैं भारत के छिपे हुए खजाने

नादिर शाह का खजाना (Nadir Shah’s treasure)

रचान्तमक चित्र
नादिर शाह ने 1739 में भारत पर हमला कर दिल्ली पर कब्जा कर लिया था। इस हमले में न केवल हजारों निर्दोष लोग मारे गए थे, बल्कि नादिर शाह पूरी दिल्ली को भी लूटकर ले गया था। लूटे गए खजाने में मयूर तख्त और कोहिनूर के साथ लाखों की संख्या में सोने के सिक्के और बड़ी मात्रा में जवाहरात थे। सालों से चली आ रही कहानियों के मुताबिक माना जाता है कि युद्ध के उस माहौल में नादिर शाह पूरे खजाने पर अपनी नजर नहीं रख पाया। वापस जाते वक्त नादिर शाह के काफिले से जुड़े बड़े अफसर और सिपहसालारों ने इस खजाने का काफी हिस्सा छिपा दिया। इस बेशकीमती खजाने को अभी भी खोजा जाना बाकी है।

बिम्बिसार का खजाना (King Bimbisara’s Treasure)

रचनात्मक चित्र
ईसा पूर्व पांचवी शताब्दी में बिम्बिसार मगध का राजा था। इसके बाद ही मौर्य साम्राज्य का विस्तार शुरू हुआ था। माना जाता है कि बिहार के राजगीर में बिम्बिसार का खजाना छिपा हुआ है। यहां पर स्थित दो गुफाओं (सोन भंडार गुफा) में पुरानी लिपि में कुछ लिखा हुआ है, जिसे अभी तक पढ़ा नहीं जा सका है। माना जाता है कि इसमें ही खजाने से जुड़े संकेत छिपे हो सकते हैं। खजाने से जुड़े संकेत इतने ठोस थे कि अग्रेजों ने इस खजाने को खोजने के लिए तोप का सहारा लिया लेकिन असफल रहे थे। लोगों के मुताबिक संभव है कि यहां लिखे संकेतों से कहीं और छिपे खजाने का नक्शा मिल सके।

जहांगीर का खजाना (Jahangir’s Treasure)

रचनात्मक चित्र
राजस्थान से 150 किलोमीटर दूर अलवर का किला मौजूद है। इलाकों में प्रचलित कहानियों के मुताबिक मुगल शहंशाह जहांगीर अपने निर्वासन के दौरान अलवर में रहा था। इस दौरान जहांगीर ने अपना खजाना यहां किसी गुप्त जगह पर छिपा दिया था।  कई लोग मानते हैं कि यह खजाना अभी भी अलवर में कहीं दबा हुआ है।

राजा मान सिंह का खजाना (Raja Man Singh Treasure)

मान सिंह प्रथम अकबर के दरबार में ऊंचे ओहदे पर थे। 1580 में मान सिंह ने अफगानिस्तान पर जीत हासिल की थी। माना जाता है कि इस जीत में मिले खजाने को मान सिंह ने किसी स्थान पर छिपा दिया था। यह कहानी कितनी ठोस थी, इसका पता इस बात से चलता है कि आजादी के बाद इमरजेंसी के दौरान तत्कालीन केंद्र सरकार ने इस खजाने को खोजने का आदेश दिया था। इसको लेकर लंबे समय तक सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप भी हुए थे। आधिकारिक रूप से यह खजाना अभी भी किस्से कहानियों का हिस्सा बना हुआ है और माना जाता है कि यह अभी भी किसी गुप्त स्थान पर छिपा हुआ है।

श्री मोक्कम्बिका मंदिर का खजाना, कर्नाटक (Sri Mokkambika temple’s Treasure, Karnataka)

कर्नाटक के पश्चिमी घाट में कोलूर में स्थित मोक्कम्बिका मंदिर में भी खजाना होने की बात कही जाती है। मंदिर के पुजारी के मुताबिक मंदिर में सांपों के खास निशान बने हुए हैं। भारतीय मान्यताओं के मुताबिक छिपे हुए खजानों की रक्षा सांप करते हैं। ऐसे में पुराने समय में खजाना छिपाने वाले ऐसे चिह्न बनाते थे। इससे मंदिर से जुड़े लोगों को संकेत और चेतावनी दोनों मिल जाए। इस खजाने का अनुमान इस बात से ही लगाया जा सकता है कि मंदिर में रखे जवाहरात की कीमत 100 करोड़ रुपए आंकी गई है। अभी तक खजाने का कोई सुराग नहीं मिला है।

कृष्णा नदी का खजाना ( Krishna river treasure, Andhra Pradesh)

आंध्र प्रदेश के गुंटूर में कृष्णा नदी के तटीय इलाके काफी समय से अपने हीरों के लिए प्रसिद्ध थे। एक समय में यह इलाका  गोलकुंडा राज्य में शामिल था। विश्व प्रसिद्ध कोहिनूर हीरा भी यहीं की खदानों से निकाला गया था। माना जाता है कि इलाके में कृष्णा नदी के तट पर कई हीरे खोजे जाने का इंतजार कर रहे हैं।

जानिए दुनिया के 10 रहस्यमय ऐतिहासिक             शहरों के बारे में – तथ्य।

जब धार्मिक स्थलों की बात होती है तो भारत की ओर बरबस ही नजर ठहर जाती है। निश्चित ही भारत धार्मिक स्थलों के मामले में अमीर है। लेकिन हम बात कर रहे हैं दुनिया के उन प्रमुख स्थलों की कि जो जितने प्रसिद्ध हैं उससे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण और विवादित भी।
धर्मों के इतिहास की बात करें तो आज से 13 हजार वर्ष पूर्व आर्यों ने वेदों के धर्म का प्रचार कर एक अलग आर्यावर्त की स्थापना की थी। इसकी सीमा अयोध्या-आगरा से लेकर हिन्दूकुश पर्वत और पारस (ईरान) तक फैली थी। इसमें उत्तर ईरान भी शामिल था। दूसरी ओर इसकी सीमा तिब्बत-कश्मीर से लेकर नर्मदा-कावेरी के किनारे तक फैली थी। हालांकि बाद में इस सीमा का ययाति के काल में विस्तार हुआ। ययाति और उसके पुत्रों की कहानी सभी धर्मों में मिल जाएगी।
हम आपको दुनिया के उन ऐतिहासिक और धार्मिक शहरों के बारे में बताएंगे, जो प्राचीनकाल में धर्म, राजनीति, समाज और व्यापार के केंद्र में रहे और जिनके लिए भयंकर युद्ध भी हुए। ये ऐसे शहर हैं जिनका रहस्य आज भी बरकरार है।
हालांकि उससे पहले इन शहरों का नाम भी जान लें। यह भी प्राचीन और ऐतिहासिक शहर रहे हैं:- स्पेन के लोर्का और केदिज, साइप्रस का लोर्नाका, अफगानिस्तान का बल्ख, इराक का तिर्कुक और अर्बिल, लेबनान का बेयरूत, सिडान और त्रिपोली, तुर्की का गाजियांतेप, बुल्गारिया का प्लोवदीव, मिश्र का फाइयान, ईरान का सुसा, सीरिया का दमश्क और एलेप्पो, फिलिस्तीन का जेरिका आदि भी प्राचीन शहरों की लिस्ट में शुमार हैं, लेकिन हम यहां इन्हें छोड़कर अन्य शहरों की बात कर रहे हैं।
पहला शहर…
काशी : वैसे तो भारत में कई प्राचीन शहर हैं, जैसे मथुरा, अयोध्या, द्वारिका, कांची, उज्जैन, रामेश्वरम, प्रयाग (इलाहाबाद), पुष्कर, नासिक, श्रावस्ती, पेशावर (पुरुषपुर), बामियान, सारनाथ, लुम्बिनी, राजगिर, कुशीनगर, त्रिपुरा, गोवा, महाबलीपुरम, कन्याकुमारी, श्रीनगर आदि। लेकिन काशी का स्थान इन सबमें सबसे ऊंचा है। काशी को वाराणसी और बनारस भी कहा जाता है। हालांकि प्राचीन भारत में 16 जनपद थे जिनके नाम इस प्रकार हैं- अवंतिका, अश्मक, कम्बोज, अंग, काशी, कुरु, कौशल, गांधार, चे‍दि, वज्जि, वत्स, पांचाल, मगध, मत्स्य, मल्ल और सुरसेन।

काशी

काशी की प्राचीनता :  शहरों और नगरों में बसाहट के अब तक प्राप्त साक्ष्यों के आधार पर एशिया का सबसे प्राचीन शहर वाराणसी को ही माना जाता है। इसमें लोगों के निवास के प्रमाण 3,000 साल से अधिक पुराने हैं। हालांकि कुछ विद्वान इसे करीब 5,000 साल पुराना मानते हैं। लेकिन हिन्दू धर्मग्रंथों में मिलने वाले उल्लेख के अनुसार यह और भी पुराना शहर है।
विश्व के सर्वाधिक प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद में काशी का उल्लेख मिलता है। यूनेस्को ने ऋग्वेद की 1800 से 1500 ई.पू. की 30 पांडुलिपियों को सांस्कृतिक धरोहरों की सूची में शामिल किया है। उल्लेखनीय है कि यूनेस्को की 158 सूची में भारत की महत्वपूर्ण पांडुलिपियों की सूची 38 है। इसका मतलब यह कि 1800+2014= 3814 वर्ष पुरानी है काशी। वेद का वजूद इससे भी पुराना है। विद्वानों ने वेदों के रचनाकाल की शुरुआत 4500 ई.पू. से मानी है या‍नी आज से 6500 वर्ष पूर्व। हालांकि हिन्दू इतिहास के अनुसार 10 हजार वर्ष पूर्व हुए कश्यप ऋषि के काल से ही काशी का अस्तित्व रहा है।
काशी : भारत के उत्तरप्रदेश में स्‍थित काशी नगर भगवान शंकर के त्रिशूल पर बसा है। काशी संसार की सबसे पुरानी नगरी है। यह नगरी वर्तमान वाराणसी शहर में स्थित है।
पुराणों के अनुसार पहले यह भगवान विष्णु की पुरी थी, जहां श्रीहरि के आनंदाश्रु गिरे थे, वहां बिंदुसरोवर बन गया और प्रभु यहां बिंधुमाधव के नाम से प्रतिष्ठित हुए। महादेव को काशी इतनी अच्छी लगी कि उन्होंने इस पावन पुरी को विष्णुजी से अपने नित्य आवास के लिए मांग लिया। तब से काशी उनका निवास स्थान बन गई। काशी में हिन्दुओं का पवित्र स्थान है ‘काशी विश्वनाथ’।
भगवान बुद्ध और शंकराचार्य के अलावा रामानुज, वल्लभाचार्य, संत कबीर, गुरु नानक, तुलसीदास, चैतन्य महाप्रभु, रैदास आदि अनेक संत इस नगरी में आए। एक काल में यह हिन्दू धर्म का प्रमुख सत्संग और शास्त्रार्थ का स्थान बन गया था।
दो नदियों वरुणा और असि के मध्य बसा होने के कारण इसका नाम वाराणसी पड़ा। संस्कृत पढ़ने के लिए प्राचीनकाल से ही लोग वाराणसी आया करते थे। वाराणसी के घरानों की हिन्दुस्तानी संगीत में अपनी ही शैली है। सन् 1194 में शहाबुद्दीन गौरी ने इस नगर को लूटा और क्षति पहुंचाई। मुगलकाल में इसका नाम बदलकर मुहम्मदाबाद रखा गया। बाद में इसे अवध दरबार के प्रत्यक्ष नियंत्रण में रखा गया।

गांधार

गांधार प्राचीन भारत के 16 जनपदों में से एक था जिसके प्रमुख दो नगर थे- पुरुषपुर (पेशावर) और तक्षशिला। पाकिस्तान का पश्चिमी तथा अफगानिस्तान का पूर्वी क्षेत्र। महाभारतकाल में यहां के राजा शकुनि के पिता सुबल थे। गांधार की होने के कारण धृतराष्ट्र की पत्नी को गांधारी कहा जाता था। प्राचीनकाल में अफगानिस्तान आर्यों का प्रमुख केंद्र था। हिन्दूकुश पर्वत ऐसा क्षेत्र था, जहां के दर्रे से निकलकर अन्य जातियों के लोग आए और उन्होंने अफगानिस्तान (आर्याना) और यहां के हिन्दुओं को बर्बाद कर दिया। बामियान, जलालाबाद, बगराम, काबुल और कंदहार यहां के प्रमुख प्राचीन स्थल थे, लेकिन इस्लाम के आगमन के बाद ये सभी नष्ट कर दिए गए।
अमरता पाने के लिए रावण ने यहां बनाई थी 'चमत्कारी सीढ़ी'
शिव तांडव स्‍तोत्र : हिन्‍दी में जानिए क्‍या-क्‍या लिखा है इसमें
पहले किया शिव का अपमान फिर रच दिया तांडव स्‍तोत्र
श्रीराम के अलावा इन चार से भी हार चुका था रावण

मनुस्मृति (Manusmriti)- रास्ते में ये 8 लोग सामने               आ जाएं तो पीछे हट जाना चाहिए



श्लोक

चक्रिणो दशमीस्थस्य रोगिणो भारिणः स्त्रियाः।
स्नातकस्य च राज्ञश्च पन्था देयो वरस्य च।।
अर्थात- रथ पर सवार व्यक्ति, वृद्ध, रोगी, बोझ उठाए हुए व्यक्ति, स्त्री, स्नातक, राजा तक वर (दूल्हा)। इन आठों को आगे जाने का मार्ग देना चाहिए और स्वयं एक ओर हट जाना चाहिए।



Manusmriti Gyan in Hindi
मनुस्मृति में लिखे कुछ ऐसे ही लाइफ मैनेजमेंट के सूत्र हम आज आपको बता रहे हैं। मनुस्मृति के एक श्लोक में बताया गया है कि किन लोगों के सामने आ जाने पर स्वयं मार्ग से हटकर इन्हें पहले जाने देना चाहिए। ये श्लोक तथा इससे जुड़ा लाइफ मैनेजमेंट इस प्रकार है-

श्लोक

चक्रिणो दशमीस्थस्य रोगिणो भारिणः स्त्रियाः।
स्नातकस्य च राज्ञश्च पन्था देयो वरस्य च।।
अर्थात- रथ पर सवार व्यक्ति, वृद्ध, रोगी, बोझ उठाए हुए व्यक्ति, स्त्री, स्नातक, राजा तक वर (दूल्हा)। इन आठों को आगे जाने का मार्ग देना चाहिए और स्वयं एक ओर हट जाना चाहिए।

1- रथ पर सवार व्यक्ति

मनुस्मृति के अनुसार यदि कहीं जाते समय सामने रथ पर सवार कोई व्यक्ति आ जाए तो स्वयं पीछे हटकर उसे मार्ग दे देना चाहिए। लाइफ मैनेजमेंट की दृष्टि से देखा जाए तो रथ पर सवार व्यक्ति किसी ऊंचे राजकीय पद पर हो सकता है या वह राजा के निकट का व्यक्ति भी हो सकता है। मार्ग न देने की स्थिति में वह आपका नुकसान भी कर सकता है। इसलिए कहा गया है कि रथ पर सवार व्यक्ति को तुरंत रास्ता दे देना चाहिए। वर्तमान में रथ का स्थान दो व चार पहिया वाहनों ने ले लिया है।

2- वृद्ध

अगर रास्ते में कोई वृद्ध स्त्री या पुरुष आ जाए तो स्वयं पीछे हटकर उसे पहले मार्ग दे देना चाहिए। लाइफ मैनेजमेंट के अनुसार वृद्ध लोग सदैव सम्मान के पात्र होते हैं, उन्हें किसी भी स्थिति में अपमानित नहीं करना चाहिए। यदि वृद्ध को रास्ता न देते हुए हम पहले उस मार्ग का उपयोग करेंगे तो यह वृद्ध व्यक्ति का अपमान करने जैसा हो जाएगा। वृद्ध के साथ ऐसा व्यवहार करने के कारण समाज में हमें भी सम्मान की दृष्टि से नहीं देखा जाएगा। सिर्फ हमें ही नहीं बल्कि परिवार को भी हीन समझा जाएगा। इसलिए मनु स्मृति में कहा गया है कि स्वयं पीछे हटकर वृद्ध को पहले मार्ग देना चाहिए।

3- रोगी

रोगी व्यक्ति दया व स्नेह का पात्र होता है। यदि रास्ते में कोई रोगी सामने आ जाए तो उसे पहले जाने देना ही शिष्टता है। संभव है रोगी उपचार के लिए जा रहा हो अगर हम उसे मार्ग न देते हुए पहले स्वयं रास्ते का उपयोग करेंगे तो हो सकता है रोगी को उपचार मिलने में देरी हो जाए। उपचार में देरी से रोगी को किसी विकट परिस्थिति का सामना भी करना पड़ सकता है। रोगियों की सेवा करना बड़ा ही पुण्य का काम माना गया है। इसलिए रोगी व्यक्ति के लिए स्वयं मार्ग से हट जाना चाहिए।

4- बोझ उठाए हुआ व्यक्ति

यदि मार्ग पर एक ही व्यक्ति के निकलने का स्थान हो और सामने बोझ उठाए हुआ व्यक्ति आ जाए तो पहले उसे ही जाने देना चाहिए। ऐसा हमें मानवीयता के कारण करना चाहिए। जिस व्यक्ति के सिर या हाथों में बोझ होता है वह सामान्य स्थिति में खड़े मनुष्य से अधिक कष्ट का अनुभव कर रहा होता है। ऐसी स्थित में हमें मानवीयता का भाव मन में रखते हुए उसे ही पहले जाने देना चाहिए। यही शिष्टता है। ऐसा करने से समाज में आपका सम्मान और भी बढ़ेगा।

5- स्त्री

मनुस्मृति के अनुसार यदि मार्ग में कोई स्त्री आ जाए तो स्वयं पीछे हटकर पहले उसे ही जाने देना चाहिए। ऐसा इसलिए क्योंकि हिंदू धर्म में स्त्री को बहुत ही सम्माननीय माना गया है। किसी भी तरीके से स्त्री का अनादर नहीं करना चाहिए। स्त्री को मार्ग न देते हुए स्वयं पहले उस रास्ते का उपयोग करना स्त्री का अनादर करने जैसा ही है। स्त्री का अनादर करने से धन की देवी लक्ष्मी व विद्या की देवी सरस्वती दोनों ही रूठ जाती हैं और ऐसा करने वाले के घर में कभी निवास नहीं करती। इसलिए स्त्री के मार्ग से स्वयं पीछे हटकर उसे ही पहले जाने देना चाहिए।

6- स्नातक

ब्रह्मचर्य आश्रम में रहते हुए गुरुकुल में सफलता पूर्वक शिक्षा पूरी करने वाले विद्यार्थी को एक समारोह में पवित्र जल से स्नान करा कर सम्मानित किया जाता था। इन्हीं विद्वान विद्यार्थी को स्नातक कहा जाता था। वर्तमान परिदृश्य में स्नातक को वेद व शास्त्रों का ज्ञान रखने वाला विद्वान माना जा सकता है। यदि कोई ऐसा व्यक्ति जिसे वेद-वेदांगों का संपूर्ण ज्ञान हो और वह सामने आ जाए तो उसे पहले जाने देना चाहिए। क्योंकि ऐसा ही व्यक्ति समाज में ज्ञान की रोशनी फैलाता है। इसलिए वह हर स्थिति में आदरणीय होता है।

7- राजा

राजा प्रजा का पालन-पोषण करने वाला व विपत्तियों से उनकी रक्षा करने वाला होता है। राजा ही अपनी प्रजा के हित के लिए निर्णय लेता है। राजा हर स्थिति में सम्माननीय होता है। अगर जिस मार्ग पर आप चल रहे हों, उसी पर राजा भी आ जाए तो स्वयं पीछे हटकर राजा को जाने देना चाहिए। ऐसा न करने पर राजा आपको दंड भी दे सकता है। अगर आप दंड नहीं पाना चाहते तो पहले राजा को ही आगे जाने का मार्ग देना चाहिए।

8- दूल्हा

मनुस्मृति के अनुसार दूल्हा यानी जिस व्यक्ति का विवाह होने जा रहा हो वह आपके मार्ग में आ जाए तो पहले उसे ही जाने देना चाहिए। ऐसी मान्यता है कि दूल्हा बना व्यक्ति भगवान शिव का स्वरूप होता है इसलिए वह भी सम्मान करने योग्य कहा गया है। इसलिए यदि रास्ते में दूल्हा आ जाए तो पहले ही उसे मार्ग देना चाहिए। यही शिष्टाचार भी है।

Friday, 8 April 2016

भारत की सबसे पुरानी यूनिवर्सिटी – यहां थे 10 हजार छात्र और 2 हजार शिक्षक

भारत अपनी प्राचीनता और अद्भुत ज्ञान के लिए हमेशा से ही मशहूर रहा है। भारत में विदेशों से लोग पढ़ने आते थे और खुब ज्ञान अर्जित करके जाते थे। सोने के इस देश ने जितना ज्ञान दुनिया को दिया है उतना शायद ही किसी ओर देश से मिला है।
आज हम बात कर रहे हैं भारत के सबसे पुराने विश्वविद्यालय की जो लभगभ 3000 साल से पुराना था औऱ जहां कोरिया, जापान, चीन, तिब्बत और तुर्की से यहां स्टूडेंट्स और टीचर्स पढ़ने-पढ़ाने आते थे। इस विश्वविद्यालय का नाम नालंदा विश्वविद्यालय था जो भारत में उस समय सबसे बड़ा विद्या का केंद्र था।

यहां थे 10 हजार छात्र, 2 हजार शिक्षक

छठी शताब्दी में हिंदुस्तान सोने की चिडिया कहलाता था। यह सुनकर यहां मुस्लिम आक्रमणकारी आते रहते थे। इन्हीं में से एक था- तुर्की का शासक इख्तियारुद्दीन मुहम्मद बिन बख्तियार खिलजी। उस समय हिंदुस्तान पर खिलजी का ही राज था। नालंदा यूनिवर्सिटी तब राजगीर का एक उपनगर हुआ करती थी। यह राजगीर से पटना को जोड़ने वाली रोड पर स्थित है। यहां पढ़ने वाले ज्यादातर स्टूडेंट्स विदेशी थे। उस वक्त यहां 10 हजार छात्र पढ़ते थे, जिन्हें 2 हजार शिक्षक गाइड करते थे।
महायान बौद्ध धर्म के इस विश्वविद्यालय में हीनयान बौद्ध धर्म के साथ ही दूसरे धर्मों की भी शिक्षा दी जाती थी। मशहूर चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भी यहां साल भर शिक्षा ली थी। यह वर्ल्ड की ऐसी पहली यूनिवर्सिटी थी, जहां रहने के लिए हॉस्टल भी थे।

यूनिवर्सिटी में थे 7 बड़े- 300 छोटे कमरे

नालंदा यूनिवर्सिटी की स्थापना गुप्त वंश के शासक कुमारगुप्त प्रथम ने 450-470 ई. के बीच की थी। यूनिवर्सिटी स्थापत्य कला का अद्भुत नमूना थी। इसका पूरा कैम्पस एक बड़ी दीवार से घिरा हुआ था जिसमें आने-जाने के लिए एक मुख्य दरवाजा था। नॉर्थ से साउथ की ओर मठों की कतार थी और उनके सामने अनेक भव्य स्तूप और मंदिर थे। मंदिरों में भगवान बुद्ध की मूर्तियां थीं।
यूनिवर्सिटी की सेंट्रल बिल्डिंग में 7 बड़े और 300 छोटे कमरे थे, जिनमें लेक्चर हुआ करते थे। मठ एक से अधिक मंजिल के थे। हर मठ के आंगन में एक कुआं बना था। 8 बड़ी बिल्डिंग्स, 10 मंदिर, कई प्रेयर और स्टडी रूम के अलावा इस कैम्पस में सुंदर बगीचे और झीलें भी थीं। नालंदा को हिंदुस्तानी राजाओं के साथ ही विदेशों से भी आर्थिक मदद मिलती थी। यूनिवर्सिटी का पूरा प्रबंध कुलपति या प्रमुख आचार्य करते थे जिन्हें बौद्ध भिक्षु चुनते थे।

किसने तबाह किया यूनिवर्सिटी को

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बख्तियार खिलजी
ख्तियार खिलजी नाम के एक सिरफिरे की सनक ने इसको तहस-नहस कर दिया। उसने नालंदा यूनिवर्सिटी में आग लगवा दी, जिससे इसकी लाइब्रेरी में रखीं बेशकीमती किताबें जलकर राख हो गईं। खिलजी ने नालंदा के कई धार्मिक लीडर्स और बौद्ध भिक्षुओं की भी हत्या करवा दी।

हकीमों के इलाज का खिलजी पर नहीं हुआ असर

कहा जाता है कि एक बार बख्तियार खिलजी बुरी तरह बीमार पड़ा। उसने अपने हकीमों से काफी इलाज करवाया, लेकिन कोई असर नहीं हुआ। तब किसी ने उसे नालंदा यूनिवर्सिटी की आयुर्वेद शाखा के हेड (प्रधान) राहुल श्रीभद्र जी से इलाज करवाने की सलाह दी, लेकिन खिलजी किसी हिंदुस्तानी वैद्य (डॉक्टर) से इलाज के लिए तैयार नहीं था। उसे अपने हकीमों पर ज्यादा भरोसा था। उसका मन ये मानने को तैयार नहीं था कि कोई हिंदुस्तानी डॉक्टर उसके हकीमों से भी ज्यादा काबिल हो सकता है।

राहुल श्रीभद्र ने खिलजी का किया अनूठा इलाज

कई हकीमों से सलाह करने के बाद आखिरकार खिलजी ने इलाज के लिए राहुल श्रीभद्र को बुलवाया। खिलजी ने उनके सामने शर्त रखी कि वो किसी हिंदुस्तानी दवा का इस्तेमाल नहीं करेगा और अगर वो ठीक नहीं हुआ तो उन्हें मौत की नींद सुला देगा। ये सुनकर राहुल श्रीभद्र सोच में पड़ गए। फिर कुछ सोचकर उन्होंने खिलजी की शर्तें मान लीं। कुछ दिनों बाद वो खिलजी के पास एक कुरान लेकर पहुंचे और उससे कहा कि इसके इतने पन्ने रोज पढिए, ठीक हो जाएंगे।

खिजली की बेतुकी सनक

दरअसल, राहुल श्रीभद्र ने कुरान के कुछ पन्नों पर एक दवा का लेप लगा दिया था। खिलजी थूक के साथ उन पन्नों को पढ़ता गया और इस तरह धीरे-धीरे ठीक होता गया, लेकिन पूरी तरह ठीक होने के बाद उसने हिंदुस्तानी वैद्य के अहसानों को भुला दिया।
उसे इस बात से जलन होने लगी कि उसके हकीम विफल हो गए जबकि एक हिंदुस्तानी वैद्य उसका इलाज करने में सफल हो गया। तब खिलजी ने सोचा कि क्यों न ज्ञान की इस पूरी जड़ (नालंदा यूनिवर्सिटी) को ही खत्म कर दिया जाए। इसके बाद उसने जो किया, उसके लिए इतिहास ने उसे कभी माफ नहीं किया।

तीन महीने तक जलती रही थी यूनिवर्सिटी

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जलन के मारे खिलजी ने नालंदा यूनिवर्सिटी में आग लगाने का आदेश दे दिया। कहा जाता है कि यूनिवर्सिटी की लाइब्रेरी में इतनी किताबें थीं कि यह तीन महीने तक जलता रहा। इसके बाद भी खिलजी का मन शांत नहीं हुआ। उसने नालंदा के हजारों धार्मिक लीडर्स और बौद्ध भिक्षुओं की भी हत्या करवा दी। बाद में पूरे नालंदा को भी जलाने का आदेश दे दिया। इस तरह उस सनकी ने हिंदुस्तानी वैद्य के अहसान का बदला चुकाया। साभार –भास्कर.काम
कहा जाता है कि खिजली की घटिया सनक से इतिहास ने बहुत से ज्ञान को खो दिया। दरअसल नालंदा में जो रिसर्च होतीं थी वे बहुत ही मुल्यवान थीं। यदि वह आज भी हमें मालुम होतीं तो विज्ञान बहुत आगे होता।