पहले किया शिव का अपमान फिर रच दिया तांडव स्तोत्र
देवाधिदेव महादेव की उपासना के लिए रचे गये सभी स्तोत्रों में रावण रचित तांडव स्तोत्र भगवान शिव को सर्वाधिक प्रिय है। सनातन धर्म में ऐसी मान्यता है कि शिव तांडव स्तोत्र का नियमित पाठ या स्तुति करने वाले व्यक्ति के मान-सम्मान और धन-यश-कीर्ति में हमेशा बढ़ोत्तरी होती है। यह भी उतना ही सत्य है कि शिव तांडव स्तोत्र को सुनने मात्र से ही आत्मविश्वास में भी वृद्धि होती है। लेकिन, क्या आप जानते हैं कि रावण रचित शिव तांडव स्तोत्र की रचना कैसे हुई। यह भी बता दें कि रावण ने इस स्तोत्र को पहली बार गाने से पहले ही अहंकारवश भगवान शिव का अपमान भी कर दिया था। आइए जानते हैं कि कैसे हुई शिव तांडव स्तोत्र की रचना और रावण ने क्यों किया था अपने ही आराध्य का अपमान।
कुबेर के चले जाने के बाद इससे दशानन बहुत प्रसन्न हुआ। वह लंका का राजा बन गया और लंका का राज्य प्राप्त करते ही धीरे-धीरे वह इतना अहंकारी हो गया कि उसने साधु जनों पर अनेक प्रकार के अत्याचार करने शुरू कर दिए।
लंका का राजा बन गया रावण
कुबेर के चले जाने के बाद इससे दशानन बहुत प्रसन्न हुआ। वह लंका का राजा बन गया और लंका का राज्य प्राप्त करते ही धीरे-धीरे वह इतना अहंकारी हो गया कि उसने साधु जनों पर अनेक प्रकार के अत्याचार करने शुरू कर दिए।
कुबेर के चले जाने के बाद इससे दशानन बहुत प्रसन्न हुआ। वह लंका का राजा बन गया और लंका का राज्य प्राप्त करते ही धीरे-धीरे वह इतना अहंकारी हो गया कि उसने साधु जनों पर अनेक प्रकार के अत्याचार करने शुरू कर दिए।
जब दशानन के इन अत्याचारों की ख़बर कुबेर को लगी तो उन्होंने अपने भाई को समझाने के लिए एक दूत भेजा, जिसने कुबेर के कहे अनुसार दशानन को सत्य पथ पर चलने की सलाह दी। कुबेर की सलाह सुन दशानन को इतना क्रोध आया कि उसने उस दूत को बंदी बना लिया व क्रोध के मारे तुरन्त अपनी तलवार से उसकी हत्या कर दी।
रावण ने किया अलकापुरी पर आक्रमण
कुबरे की सलाह से दशानन इतना क्रोधित हुआ कि दूत की हत्या के साथ ही अपनी सेना लेकर कुबेर की नगरी अलकापुरी को जीतने निकल पड़ा और कुबेर की नगरी को तहस-नहस करने के बाद अपने भाई कुबेर पर गदा का प्रहार कर उसे भी घायल कर दिया लेकिन कुबेर के सेनापतियों ने किसी तरह से कुबेर को नंदनवन पहुंचा दिया जहां वैद्यों ने उनका इलाज कर उन्हें ठीक किया।
कुबरे की सलाह से दशानन इतना क्रोधित हुआ कि दूत की हत्या के साथ ही अपनी सेना लेकर कुबेर की नगरी अलकापुरी को जीतने निकल पड़ा और कुबेर की नगरी को तहस-नहस करने के बाद अपने भाई कुबेर पर गदा का प्रहार कर उसे भी घायल कर दिया लेकिन कुबेर के सेनापतियों ने किसी तरह से कुबेर को नंदनवन पहुंचा दिया जहां वैद्यों ने उनका इलाज कर उन्हें ठीक किया।
पुष्पक विमान भी पड़ गया कमजोर
चूंकि दशानन ने अब कुबेर की नगरी और उसके पुष्पक विमान पर भी अपना अधिकार कर लिया था, सो एक दिन पुष्पक विमान में सवार होकर वह शारवन की तरफ चल पड़ा। लेकिन एक पर्वत के पास से गुजरते हुए उसके पुष्पक विमान की गति स्वयं ही धीमी हो गई।
पुष्पक विमान की ये विशेषता थी कि वह चालक की इच्छानुसार चलता था तथा उसकी गति मन की गति से भी तेज थी, इसलिए जब पुष्पक विमान की गति मंद हो गर्इ तो दशानन को बडा आश्चर्य हुआ। तभी उसकी दृष्टि सामने खड़े विशाल और काले शरीर वाले नंदीश्वर पर पडी। नंदीश्वर ने दशानन को चेताया कि यहां भगवान शंकर क्रीड़ा में मग्न हैं इसलिए तुम लौट जाओ।
चूंकि दशानन ने अब कुबेर की नगरी और उसके पुष्पक विमान पर भी अपना अधिकार कर लिया था, सो एक दिन पुष्पक विमान में सवार होकर वह शारवन की तरफ चल पड़ा। लेकिन एक पर्वत के पास से गुजरते हुए उसके पुष्पक विमान की गति स्वयं ही धीमी हो गई।
पुष्पक विमान की ये विशेषता थी कि वह चालक की इच्छानुसार चलता था तथा उसकी गति मन की गति से भी तेज थी, इसलिए जब पुष्पक विमान की गति मंद हो गर्इ तो दशानन को बडा आश्चर्य हुआ। तभी उसकी दृष्टि सामने खड़े विशाल और काले शरीर वाले नंदीश्वर पर पडी। नंदीश्वर ने दशानन को चेताया कि यहां भगवान शंकर क्रीड़ा में मग्न हैं इसलिए तुम लौट जाओ।
दंभ में दशानन ने किया शिव का अपमान
वहीं दशानन भी कुबेर पर विजय पाकर इतना दंभी हो गया था कि वह किसी कि सुनने को तैयार नहीं था। उसे उसने कहा, ''कौन है ये शंकर और किस अधिकार से वह यहां क्रीड़ा करता है? मैं उस पर्वत का नामो-निशान ही मिटा दूंगा, जिसने मेरे विमान की गति अवरूद्ध की है।
वहीं दशानन भी कुबेर पर विजय पाकर इतना दंभी हो गया था कि वह किसी कि सुनने को तैयार नहीं था। उसे उसने कहा, ''कौन है ये शंकर और किस अधिकार से वह यहां क्रीड़ा करता है? मैं उस पर्वत का नामो-निशान ही मिटा दूंगा, जिसने मेरे विमान की गति अवरूद्ध की है।
एक अंगूठे के बल से शिव ने तोड़ा दशानन का अभिमान इतना कहते हुए उसने पर्वत की नींव पर हाथ लगाकर उसे उठाना चाहा। अचानक इस विघ्न से शंकर भगवान विचलित हुए और वहीं बैठे-बैठे अपने पांव के अंगूठे से उस पर्वत को दबा दिया ताकि वह स्थिर हो जाए। लेकिन भगवान शंकर के ऐसा करने से दशानन की बाहें उस पर्वत के नीचे दब गई। परिणामस्वरूप क्रोध और जबरदस्त पीड़ा के कारण दशानन भीषण चीत्कार कर उठा, जिससे ऐसा लगने लगा कि मानो प्रलय हो जाएगा। तब दशानन के मंत्रियों ने उसे शिव स्तुति करने की सलाह दी ताकि उसका हाथ उस पर्वत से मुक्त हो सके।
रावण ने रच दिया शिव तांडव स्तोत्र
दशानन ने बिना देरी किए हुए सामवेद में उल्लेखित शिव के सभी स्तोत्रों का गान करना शुरू कर दिया, जिससे प्रसन्न होकर भगवान शिव ने दशानन को क्षमा करते हुए उसकी बांहों को मुक्त किया।
दशानन द्वारा भगवान शिव की स्तुति के लिए किए जो स्त्रोत गाया गया था, वह दशानन ने भयंकर दर्द व क्रोध के कारण भीषण चीत्कार से गाया था और इसी भीषण चीत्कार को संस्कृत भाषा में 'राव: सुशरूण:' कहा जाता है।
और तभी पड़ा दशानन का नाम रावण
इसलिए जब भगवान शिव, रावण की स्तुति से प्रसन्न हुए और उसके हाथों को पर्वत के नीचे से मुक्त किया, तो उसी प्रसन्नता में उन्होंने दशानन का नाम रावण यानी ‘भीषण चीत्कार करने पर विवश शत्रु' रखा क्योंकि भगवान शिव ने रावण को भीषण चीत्कार करने पर विवश कर दिया था और तभी से दशानन को रावण कहा जाने लगा।
रावण ने रच दिया शिव तांडव स्तोत्र
दशानन ने बिना देरी किए हुए सामवेद में उल्लेखित शिव के सभी स्तोत्रों का गान करना शुरू कर दिया, जिससे प्रसन्न होकर भगवान शिव ने दशानन को क्षमा करते हुए उसकी बांहों को मुक्त किया।
दशानन द्वारा भगवान शिव की स्तुति के लिए किए जो स्त्रोत गाया गया था, वह दशानन ने भयंकर दर्द व क्रोध के कारण भीषण चीत्कार से गाया था और इसी भीषण चीत्कार को संस्कृत भाषा में 'राव: सुशरूण:' कहा जाता है।
और तभी पड़ा दशानन का नाम रावण
इसलिए जब भगवान शिव, रावण की स्तुति से प्रसन्न हुए और उसके हाथों को पर्वत के नीचे से मुक्त किया, तो उसी प्रसन्नता में उन्होंने दशानन का नाम रावण यानी ‘भीषण चीत्कार करने पर विवश शत्रु' रखा क्योंकि भगवान शिव ने रावण को भीषण चीत्कार करने पर विवश कर दिया था और तभी से दशानन को रावण कहा जाने लगा।
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