Follow Me On Facebook

Friday, 13 January 2017

चार मठ

                                            जानें शंकराचार्यों की महान परम्परा के बारे में



कृते विश्वगुरुर्ब्रह्मा त्रेतायां ऋषिसत्तमः। 
द्वापरे वेदव्यासश्च अहमस्मि कलौयुगे। (मठाम्नाय महानुशासन) 
माहिष्मती सम्राट महाराज सुधन्वा चौहान को सर्वप्रथम यह बात बताई गयी थी कि सत्ययुग में ब्रह्मा, त्रेता में वशिष्ठ, द्वापर में वेदव्यास और कलियुग में रुद्रांश वीरभद्र के अवतार शंकराचार्य जी विश्व के गुरु होते हैं। ये साक्षात् शरीर धारी भगवान् शिव के अंश होते हैं। नररूप धरो हरः 


हिंदू धर्म का संत समाज आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा नियुक्त चार मठों के अधीन है। हिंदू धर्म की एकजुटता और व्यवस्था के लिए चार मठों की परंपरा को जानना आवश्यक है। चार मठों से ही गुरु-शिष्य परम्परा का निर्वाह होता है। चार मठों के संतों को छोड़कर अन्य किसी को गुरु बनाना हिंदू संत धारा के अंतर्गत नहीं आता। 

शंकराचार्य जी ने इन मठों की स्थापना के साथ-साथ उनके मठाधीशों की भी नियुक्ति की, जो बाद में स्वयं शंकराचार्य कहे जाते हैं। जो व्यक्ति किसी भी मठ के अंतर्गत संन्यास लेता हैं वह दसनामी संप्रदाय में से किसी एक सम्प्रदाय पद्धति की साधना करता है। 


                                                  -:चार मठ निम्न हैं:- 

श्रृंगेरी मठ


श्रृंगेरी मठ भारत के दक्षिण में रामेश्वरम में स्थित है। श्रृंगेरी मठ के अन्तर्गत दीक्षा प्राप्त करने वाले संन्यासियों के नाम के बाद सरस्वती, भारती तथा पुरी सम्प्रदाय नाम विशेषण लगाया जाता है जिससे उन्हें उक्त संप्रदाय का संन्यासी माना जाता है। श्रृंगेरी पीठाधीश्वर जगद्गुरु श्री भारती कृष्णतीर्थ जी महाराज। इस मठ का महावाक्य ‘अहं ब्रह्मास्मि’ है तथा मठ के अन्तर्गत ‘यजुर्वेद’ को रखा गया है। इस मठ के प्रथम मठाधीश आचार्य सुरेश्वरजी थे, जिनका पूर्व में नाम मण्डन मिश्र था।वर्तमान में स्वामी भारती कृष्णतीर्थ इसके 36वें मठाधीश हैं। 



2. गोवर्धन मठ

गोवर्धन मठ भारत के पूर्वी भाग में उड़ीसा राज्य के जगन्नाथ पुरी में स्थित है। गोवर्धन मठ के अंतर्गत दीक्षा प्राप्त करने वाले सन्यासियों के नाम के बाद ‘आरण्य’ सम्प्रदाय नाम विशेषण लगाया जाता है जिससे उन्हें उक्त संप्रदाय का संन्यासी माना जाता है। पुरी पीठाधीश्वर जगद्गुरु श्री निश्चलानंद सरस्वती जी महाराज इस मठ का महावाक्य है ‘प्रज्ञानं ब्रह्म’ तथा इस मठ के अंतर्गत ‘ऋग्वेद’ को रखा गया है। इस मठ के पहले मठाधीश आदि शंकराचार्य के पहले शिष्य पद्मपाद हुए। वर्तमान में निश्चलानंद सरस्वती इस मठ के 145 वें मठाधीश हैं। 


 3.शारदा मठ 

शारदा (कालिका) मठ गुजरात में द्वारकाधाम में स्थित है। शारदा मठ के अंतर्गत दीक्षा प्राप्त करने वाले सन्यासियों के नाम के बाद ‘तीर्थ’ और ‘आश्रम’ सम्प्रदाय नाम विशेषण लगाया जाता है जिससे उन्हें उक्त संप्रदाय का संन्यासी माना जाता है। द्वारिका एवं ज्योति पीठाधीश्वर जगद्गुरु श्री स्वरूपानन्द जी महाराज है । इस मठ का महावाक्य है ‘तत्त्वमसि’ तथा इसके अंतर्गत ‘सामवेद’ को रखा गया है। शारदा मठ के प्रथम मठाधीश हस्तामलक (पृथ्वीधर) थे। हस्तामलक आदि शंकराचार्य के प्रमुख चार शिष्यों में से एक थे। वर्तमान में स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती इसके 79 वें मठाधीश हैं।





 4.ज्योतिर्मठ


उत्तरांचल के बद्रीनाथ में स्थित है ज्योतिर्मठ। ज्योतिर्मठ के अंतर्गत दीक्षा प्राप्त करने वाले संन्यासियों के नाम के बाद ‘गिरि’, ‘पर्वत’ एवं ‘सागर’ सम्प्रदाय नाम विशेषण लगाया जाता है जिससे उन्हें उक्त संप्रदाय का संन्यासी माना जाता है। इस मठ का महावाक्य ‘अयमात्मा ब्रह्म’ है। इस मठ के अंतर्गत अथर्ववेद को रखा गया है। ज्योतिर्मठ के प्रथम मठाधीशआचार्य तोटक बनाए गए थे। वर्तमान में कृष्णबोधाश्रम इसके 44 वें मठाधीश थे, जिनके ब्रह्मलीन होने के बाद वर्तमान में श्री स्वरूपानंद जी इस पीठ का अतिरिक्त प्रभार सम्भाल रहे हैं। उक्त मठों तथा इनके अधीन उपमठों के अंतर्गत संन्यस्त संतों को गुरु बनाना या उनसे दीक्षा लेना ही हिंदू धर्म के अंतर्गत माना जाता है। यही हिंदुओं की संत धारा मानी गई है। 



इन पीठों के अलावा बाद में कार्यभार बढ़ने के कारण तीन खंडपीठों की भी स्थापना की गयी, जिनमे काशी सुमेरु, भानपुरा और कांची कामकोटि पीठ सम्मिलित है। वर्तमान में चर्चित शंकर रमन हत्याकांड में इन्हीं कांची कामकोटि खण्डपीठ के शंकराचार्य श्री जयेन्द्र सरस्वती जी को जयललिता के षड्यंत्र पर मुख्य अभियुक्त बनाया गया था, जिसमें वे पूर्णतः निर्दोष सिद्ध हुए। ये सभी पीठ हर वर्ष समाजसेवा में बीस हज़ार करोड़ से भी अधिक धन खर्च करते हैं। आईये हम सब पूज्य जगद्गुरु शंकराचार्यों का दर्शन कर सौभाग्यशाली बने।

No comments:

Post a Comment