Saturday, 30 April 2016

बाबर और बाबरी मस्जिद की हकीकत

बाबर एक समलैंगिक (homosexual), नशेड़ी,शराबी, और बाल उत्पीड़क (child molester) था ।



बाबरनामा के विभिन्न पृष्ठों से लिए गए निम्नलिखित अंश पढ़िए
🔽१. पृष्ठ १२०-१२१ पर बाबर लिखता है कि वह अपनी पत्नी में अधिक रूचि नहीं लेता था बल्कि वह तो बाबरी नाम के एक लड़के का दीवाना था.
वह लिखता है कि उसने कभी किसी को इतना प्यार नहीं किया कि जितना दीवानापन उसे उस लड़के के लिए था. यहाँ तक कि वह उस लड़के पर शायरी भी करता था. 
उदाहरण के लिए-
“मुझ सा दर्दीला, जुनूनी और बेइज्जत आशिक और कोई नहीं है. और मेरे आशिक जैसा बेदर्द और तड़पाने वाला भी कोई और नहीं है.”
🔽२. बाबर लिखता है कि जब बाबरी उसके ‘करीब’ आता था तो बाबर इतना रोमांचित हो जाता था कि उसके मुंह से शब्द भी नहीं निकलते थे. इश्क के नशे और उत्तेजना में वह बाबरी को उसके प्यार के लिए धन्यवाद देने को भी मुंह नहीं खोल
पता था.
🔽३. एक बार बाबर अपने दोस्तों के साथ एक गली से
गुजर रहा था तो अचानक उसका सामना बाबरी से
हो गया! बाबर इससे इतना उत्तेजित हो गया कि बोलना बंद
हो गया, यहाँ तक कि बाबरी के चेहरे पर नजर
डालना भी नामुमकिन हो गया. वह लिखता है- “मैं
अपने आशिक को देखकर शर्म से डूब जाता हूँ. मेरे दोस्तों की नजर मुझ पर टिकी होती है और मेरी किसी और पर.” स्पष्ट है
की ये सब साथी मिलकर क्या गुल खिलाते थे!
🔽४. बाबर लिखता है कि बाबरी के जूनून और चाह में
वह बिना कुछ देखे पागलों की तरह नंगे सिर और
नागे पाँव इधर उधर घूमता रहता था.
🔽५. वह लिखता है- “मैं उत्तेजना और रोमांच से पागल
हो जाता था. मुझे नहीं पता था कि आशिकों को यह
सब सहना होता है. ना मैं तुमसे दूर जा सकता हूँ और न
उत्तेजना की वजह से तुम्हारे पास ठहर
सकता हूँ. ओ मेरे आशिक (पुरुष)! तुमने मुझे बिलकुल पागल
बना दिया है”.
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इन तथ्यों से पता चलता है कि बाबर और उसके साथी समलैंगिक और बाल उत्पीड़क थे.
अब यदि इस्लामी शरियत की बात करें तो समलैंगिकों के लिए मौत की सजा ही मुक़र्रर की जाती है. बहुत से इस्लामी देशों में यह सजा आज भी दी जाती है. बाबर को भी यही सजा मिलनी चाहिए थी. दूसरी बात यह है कि उसके नाम
पर बनाए ढाँचे का नाम “बाबरी मस्जिद”
था जो कि उसके पुरुष आशिक “बाबरी” के नाम पर था!
हम पूछते हैं कि क्या अल्लाह के इबादत के लिए कोई
ऐसी जगह क़ुबूल की जा सकती है कि जिसका नाम
ही समलैंगिकता के प्रतीक बाबर के पुरुष आशिक “बाबरी” के नाम पर रखा गया हो? इससे भी बढ़कर एक आदमी द्वारा जो कि मुसलमान ही नहीं हो, समलैंगिक और बच्चों से कुकर्म करने वाला हो, उसके नाम पर मस्जिद
किसी भी मुसलमान को कैसे क़ुबूल हो सकती है?
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यह सिद्ध हो गया है कि बाबरी मस्जिद कोई इबादतघर नहीं लेकिन समलैंगिकता और बाल उत्पीडन का प्रतीक जरूर
थी. और इस तरह यह अल्लाह, मुहम्मद, इस्लाम आदि के नाम पर कलंक थी कि जिसको खुद मुसलमानों द्वारा ही नेस्तोनाबूत कर दिया जाना चाहिए था. खैर वे यह नहीं कर सके पर जिसने यह काम किया है उनको बधाई और धन्यवाद तो जरूर देना चाहिए था. यह बहुत शर्म की बात है कि पशुतुल्य और समलैंगिकता के महादोष से ग्रसित आदमी के बनाए
ढाँचे को, जो कि भारत की हार का प्रतीक था, यहाँ के इतिहासकारों, मुसलमानों, और सेकुलरवादियों ने
किसी अमूल्य धरोहर की तरह संजो कर रखना चाहा.

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