Wednesday, 5 April 2017

श्रीनगर : नेशनल काफ्रेंस के अध्यक्ष फारूख अब्दुल्ला के जहरीले बोल और इन ज़हरों में देशद्रोही बयान बढते जा रहे हैं।

एक बार फिर पत्थरबाजों के हिमायती बने फारुख अब्दुल्ला, दिया देशद्रोही बयान

श्रीनगर : नेशनल काफ्रेंस के अध्यक्ष फारूख अब्दुल्ला के जहरीले बोल और इन ज़हरों में देशद्रोही बयान बढते जा रहे हैं। दरअसल, कुछ समय से वो देश विरोधी गतिविधियों को लगातार हवा दे रहे है और हद तो तब पार हो गई जब फ़ारुख ने देश के जवानों को अपने पत्थरबाजी से घायल करने वाले आतंकियों का खुला समर्थन किया। फारुख ने कहा कि कश्मीर में जो बच्चे पत्थर मारते हैं, उनका राज्य के टूरिज्म से कोई लेना-देना नहीं है वो अपने देश के लिए लड़ रहे हैं। फारुख ने भारत-पाक के रिश्तों पर कहा कि अगर भारत और पाकिस्तान मिलकर इस मुद्दे को नहीं सुलझा पा रहे हैं, तो अमेरिका को बीच में आकर समझौता करने चाहिए। यह किसी पार्टी में लड़ाई नहीं है बल्कि सांप्रदायिकता के खिलाफ एक जंग है। वहीं, AIMIM के नेता असदुद्दीन ओवैसी ने फारुक की बात से असहमति जताते हुए कहा कि फारुख साहब को चुनाव लड़ना है इसलिए इस तरह की बातें कर रहे हैं, उनके बेटे जब सीएम थे तब 100 से ज्यादा लड़कों की मौत हुई थी। तब तो उन्होंने कुछ नहीं कहा। अब चुनाव हैं तो वह बोल रहे हैं। औवेसी ने कहा कि भारत और पाकिस्तान का मसला दो देशों का मुद्दा है, इसमें किसी तीसरे की जरुरत नहीं है। फारुक ने कहा कि मैं मोदी साहब को बताना चाहता हूं कि इसमें कोई शक नहीं कि पर्यटन हमारी जिंदगी है लेकिन पथराव करने वालों के पास पर्यटन को बिगाड़ने के लिए कुछ नहीं है। वे भूखे रहेंगे लेकिन देश के लिए पथराव करेंगे और यही हमें समझने की जरूरत है। लेकिन अब फारुख अब्दुल्ला को कौन बताये कि इन पत्थरबाज़ों की हिमायत करके वो देशद्रोह का काम तो कर ही रहे हैं। साथ ही घायल कश्मीर को और ज्यादा जख्म दे रहे हैं। फारुख अब्दुल्ला आज उसी कश्मीर में देशविरोधी बयान दे रहे हैं, जिस राज्य के वो मुख्यमंत्री रह चुके हैं, कश्मीर की नुमाइंदगी करते हुए केंद्र में भी मंत्री रह चुके हैं। आज उनकी ज़ुबान ज़हर उगल रही है। उनके ज़हरीले बोल से अगर किसी को फायदा हो रहा है तो वो पाकिस्तान को। सत्ता से बाहर होने का मतलब ये तो कतई नहीं होता कि आप देशद्रोही हो जाएं। वो भी महज इसलिए कि हाशिए पर पड़ी उनकी पार्टी को कश्मीर में होने वाले उपचुनाव में चंद वोट मिल जाएं। 2014 के विधान सभा चुनाव में उनको करारी हार मिली थी। 87 विधान सभा सीटों मे से फारूख अब्दुल्ला की पार्टी को महज 15 सीटें ही मिल पाईं थीं। 

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