Thursday, 6 April 2017

भारत कभी नहीं डरा था दुश्मन की तलवारों से जब भी उसकी हार हुई तो घर के ही गद्दारों से ..

7 अप्रैल - आज हुई गिरफ्तारी से बुझने लगी थी 1857 क्रान्ति की लौ . कोई और नहीं बल्कि अपनों ने ही की थी गद्दारी
आज 7 अप्रैल को अंग्रेजी सत्ता उखाड़ फेंकने के लिए सबसे आगे चल रहे महान बलिदानी और पराक्रमी योद्धा तात्या टोपे की अपने ही एक विश्वाशपात्र द्वारा गिरफ्तारी होने के बाद धधकती 1857 क्रान्ति की लौ बुझना शुरू हो गयी थी . ब्रिटिश हुकूमत के लिए दुःस्वप्न बने तात्या जी कैसे भी असीरगढ पहुँचना चाहते थे, जहां बेहद कडा पहरा था।  दुश्मन का ध्यान भटकाने के मकसद से इस वीर ने निमाड से बिदा होने के ही खण्डवा, पिपलोद आदि के पुलिस थानों और सरकारी इमारतों में आग लगा दी। खण्डवा से वे खरगोन होते हुए वो वापस चले गये। तात्या की राष्ट्रभक्ति से बेहद प्रभावित हो चुका खरगोन में खजिया नायक अपने 4000 अनुयायियों के साथ तात्या टोपे के साथ जा मिला। इनमें लड़ाकू भील सरदार और प्रसिद्द मालसिन भी थे। यहाँ राजपुर खेत्र में ब्रिटिश सेनापति सदरलैण्ड के साथ एक घमासान लडाई हुई और इसी लड़ाई का लाभ उठा कर तात्या सदरलैण्ड को चकमा देकर तात्या नर्मदा पार करने में सफल रहे । एक बार फिर अंग्रेजों के विरुद्ध तात्या की यात्रा आरम्भ हो कर खरगोन से छोटा उदयपुर, बाँसवाडा, जीरापुर, प्रतापगढ, नाहरगढ होते हुए वे इन्दरगढ पहुंची । इन्दरगढ में उन्हें पहले से ही घात लगाए ब्रिटिश अफसरों  नेपियर, शाबर्स, समरसेट, स्मिथ, माइकेल और हार्नर नामक ब्रिगेडियर और उससे भी ऊँचे सैनिक अधिकारियों ने हर एक दिशा से घेर लिया। भले ही वहा से बचकर निकलने का कोई रास्ता नहीं था पर अपार बल के साथ कुशाग्र बुद्धि के धनी तात्या इस बेहद कठिन और लगभग असंभव घेरे को भेद कर जयपुर की ओर निकल गए । मात्र वेतन और मेडल के लालच में अपने ही जब अंग्रेजों का साथ देने लगे तो संख्या बल कम होने के कारण देवास और शिकार में उन्हें अंग्रेजों से हार मिली जिसके कारण उन्हें निराश होकर परोन के जंगल में शरण लेनी पड़ी .. महाराणा प्रताप के आदर्श उन्हें निश्चित रूप से याद थे इसीलिए जंगल की विषम परिस्थिति उन्हें आत्मबल को बिलकुल नहीं डिगा पाई . पर उसी परोन के जंगल में तात्या टोपे के साथ बेहद अप्रत्याशित विश्वासघात हुआ। एक भारतीय शासक जो अपनी अपनी राष्ट्रभक्ति बेच कर अंग्रेजों से मिल चुका था उसकी गद्दारी के कारण तात्या 7  अप्रैल, 1859 को तब गिरफ्तार हुए जब वो गहरी नींद में सो रहे थे ... अंग्रेजों को पता था कि उस महायोद्धा को जागते हुए पकड़ पाना असंभव था यही भूल भारत के इतिहास की थी जिसने 1857 में ही मातृभूमि को स्वतंत्र होने से वंचित कर दिया जिसके बाद बिस्मिल , भगत , आज़ाद , सुखदेव , खुदीराम , सावरकर जैसे वीरों को अपना बलिदान देना पड़ा . 


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