Saturday, 15 April 2017

बलिदान दिवस क्रन्तिकारी विश्वनाथ शाहदेव . वो महायोद्धा जिसे हमें जानने ही नहीं दिया गया

16 अप्रैल - बलिदान दिवस क्रन्तिकारी विश्वनाथ शाहदेव . वो महायोद्धा जिसे हमें जानने ही नहीं दिया गया
1857 के स्वतंत्रता संग्राम के अमर बलिदानी विश्वनाथ शाहदेव झारखंड की एक छोटी सी रियासात बड़कागढ़ के नरेश थे। मातृभूम का प्रेम , गौरवमय स्वाभिमान और देशभक्ति उनकी नसों में रक्त के साथ बहती थी। उसी स्वाभिमान , राष्ट्रप्रेम को आत्मसात करते हुए वो महासमर 1857 की क्रांति में अपना राज पाट व् सुख सुविधा छोड़ कर कूद गये थे। 

जिस तरह ब्रिटिश सरकार अत्याचार और अन्याय पर उतारू थी उसे देख कर भारत की वीरभूमि झारखंड में भी क्रान्ति की ज्वाला भड़क उठी थी । उस समय वहां क्रान्ति के प्रमुख नेतृत्वकर्ता  ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव समूचे झारखंड को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त कराने की घोषणा कर चूके थे। ठाकुर विश्वनाथ जी के जांबाज़ सैनिक कई मोर्चों पर अंग्रेजों का बेहद सधे तात्रीके से आमना सामना कर रहे थे। यह युद्ध कई मोर्चों पर एक साथ लड़ा गया .  क्रांतिकारियों के एक दल ने अंग्रेजों को धूल चटा कर अपनी विजय पताका को झारखंड के चतरा तक पहुंचा दिया। इस जांबाज़ फौजी दल का नेतृत्व ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव और दूसरे दल का नेतृत्व उनके दीवान गणपत राय कर रहे थे। भारत माँ को आज़ाद करवाने का जूनून इस कदर हावी था उन सब पर की उनके आक्रमण इतना तेज थे कि आततायी अंग्रेजों को रांची छोड़कर भागना पड़ा। रांची की कचहरी, थाना, जेल जैसी सार्वजनिक और सरकारी जगहों पर क्रांतिकारियों का कब्जा हो गया । झारखंड के रांची शहर को क्रांतिवीरों ने स्वतंत्र घोषित कर डाला जो १ महीने तक आज़ाद रहा लेकिन कई बार की तरह एक बार और देश के अंदर छुपे हुए गद्दारों की वजह से यह स्थिति ज्यादा समय नहीं बन पायी रही .  ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव को पकडने के लिए अंग्रेजों बड़ा ने ईनाम घोषित किया। उस समय ब्रिटिश सेना का कैप्टन ओक्स निकल पड़ा था उनकी तलाश में जो आज के समय में गद्दार और दगाबाज बोले जाते हैं और वो अपनी इस खोज में सफल भी रहा. पर गाद्दारों की गद्दारी क्रांतिवीरों के कदम नहीं रोक पायी पर सीमित संसाधनों और पुराने अस्त्रों से लड़ रही क्रांतिकारियों की टोली को गद्दारों की गद्दारी एक और बोझ दे गयी.जयचंद और मीरजाफर जैसे लोगों ने झारखंड के क्रांतिकारियों को अंग्रेजों की जेलों में डलवा दिया। 1858 में जब ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव चतरा तालाब के पास अंग्रजों से युद्ध कर रहे  थे, तभी धोखे से उन्हें घेर कर पकड़ लिया गया। जनता में दहशत बनाने के लिए अंग्रजों ने उन्हें पैदल चतरा से रांची लाकर अपर बाजार जेल में निरुद्ध किया ।आज ही के दिन अर्थात  16 अप्रैल 1858 को ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव को रांची जिला स्कूल के गेट के निकट एक कदंब पेड़ की डाली से लटका कर फांसी  दी गयी और आज़ादी की चाहे में छोटी से दल को ले कर ब्रिटिश हुकूमत से भिड़ गया यह महायोद्धा सदा के लिए अमर हो गया . दुर्भाग्य है कि ऐसे महावीरों को हमारी शाश्कीय पुस्तकों में वो स्थान नहीं मिला जिसके वो पात्र थे . उनके बलिदान के स्तर को कम कर के आँका गया जिसका परिणाम वर्तमान पीढ़ी दिग्भर्मित हो कर झेल रही है . निश्चित रूप से भारत विरोधी नारे लगाने वाले कुछ संस्थानों में यदि ऐसे वीरों की जीवनी उपलब्ध होती तो कोई भी भारत के टुकड़े जैसी बात नहीं करता . 

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