Wednesday, 29 March 2017

मतलब राम और सीता इसके बाद पैदा हुवे है अब ए बढाओ सब हिन्दुओ को राम और सीता की कहानी सुना रहा है बेफक़ूक़ समझ है क्या

वामपंथी डी एन झा ने यहां तक दावा किया कि राम और सीता भाई बहन थे. झा 1940  पैदा हुवा था अब वामपंथी को क्या पता राम और सीता भाई बहन थे 
राम_मंदिर केस की संबसे भयानक बात। .....रामसीता भाई बहन
राममंदिर को बाबरी मज्जिद सिद्ध करने के लिए अवार्ड-वापसी गैंग वामपंथी इतिहासकार डी एन झा और रोमिला थापर ने राम और सीता को भाई_बहन ही सिद्ध करदिया था 

इतिहासकार डी एन झा ने यहां तक दावा किया कि राम और सीता भाई बहन थे. फिर इन महान इतिहासकारों ने यह कहा कि जिस जगह पर बाबरी मस्जिद है वहां कभी कोई मंदिर नहीं था. इतना ही नहीं इन वामपंथी इतिहासकारों ने देश भर में बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के साथ कैंपेन किया. सिगनेचर कैंपेन किया.
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यहां तक कि कोर्ट में जाकर एक्सपर्ट के रूप में इन ठगों ने गवाही भी दी. बाबरी मस्जिद के इस कैपेन का नेतृत्व रोमिला थापर ने किया और आर एस शर्मा, सूरजभान जैसे तमाम इतिहासकारों की सक्रिय भूमिका रही. लेकिन जब क्रास-एग्जामिनेशन किया गया तो इन सभी फर्जी इतिहासकारों का सच सामने आ गया.
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सिर्फ फैसला ही नहीं सुनाया बल्कि इन इतिहासकारों के फर्जीवाड़ा को पर्दाफाश किया. हैरानी की बात यह है कि इन वामंपथी इतिहासकारों ने कोर्ट के सामने अपनी अज्ञानता और फर्जीवाड़े को स्वीकार भी किया.
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जब कोर्ट को लगा कि इन वामपंथी इतिहासकारों की बातों पर भरोसा नहीं किया जा सकता तब कोर्ट को जमीन खोद कर पता लगाने का आदेश देना पड़ा. जब खुदाई हुई और ये पता चल गया कि बाबरी मस्जिद किसी समतल जमीन पर नहीं बनाई गई थी बल्कि किसी भवन को तोड़ कर उसके मलबे पर बनी थी. खुदाई में मंदिर के निशान मिले. दिन के उजाले की तरह यह बात साफ हो गई कि बाबरी मस्जिद मंदिर को तोड़ कर बनाई गई थी. खुदाई के दौरान मिले सबूतों से वामपंथी इतिहासकारों की सिट्टी पिट्टी गुम हो गई. वो बेनकाब हो गए
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ये अलग बात है कि इन इतिहासकारों से कोई यह नहीं पूछता कि देश को तोड़ने और सांप्रदायिकता को जीवित रखने के लिए इनलोगों ने झूठ क्यों बोला? इन इतिहासकारों को तो देश से माफी मांगनी चाहिए. कम से कम इन्हें देश के मुसलमानों से माफी मांगनी चाहिए क्योंकि इन इतिहासकारों ने झूठी व काल्पनिक कहानियों को इतिहास बताकर देश के मुसलमानों के इमोशन के साथ खेला है.
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इस कमीने हरामखोर ने क्या लिखा था पढ़िए

मिथक इतिहास नहीं हो सकता - ड़ी.एन.झा
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अब रामसेतु के मुद्दे को ही लें. जितने भी दक्षिणपंथी लोग हैं, उनका कहना है कि नासा ने जो एरियल फोटो लिये हैं, उनसे यही सिद्ध होता है कि यह वही पुल है, जिसे राम के जमाने में वानर सेना ने बनाया था. लेकिन नासा ने ऐसा कभी नहीं कहा. नासा ने कहा था कि यह जियोलॉजिकल फॉरमेशन है जो कि लाखों वर्ष पुराना है. लेकिन लोग यह बात नहीं सुन रहे हैं.

असल में मिथकों के साथ दिक्कत यह है कि जो चीज आपके सामने होती है, उसे आप मिथ से जोड देते हैं. एक उदाहरण जनकपुर का है. जनकपुर को सीता का जन्मस्थान बताया जाता है. मगर वह सीता का जन्मस्थान हो ही नहीं सकता. वह स्थान मुश्किल से 200 साल पुराना है.

अगर मिथकों से कोई भौगोलिक संरचना जुड जाती है, तब भी उस मिथक को इतिहास नहीं माना जा सकता. सरकार ने रामसेतु के संदर्भ में इतिहासकारों की एक कमेटी बनायी थी, जिसमें प्रो रामशरण शर्मा, डॉ पदइया और प्रो बैकुंठन जैसे लोग थे. उन्होंने अपनी रिपोर्ट में साफ कहा था कि इस संरचना का मिथकों और रामायण में वर्णित रामसेतु से कोई लेना-देना नहीं है.

एक मिथक के इतिहास का रूप लेने का भ्रम पैदा होने की प्रक्रिया जटिल होती है. बार-बार कोई कहानी अगर लोगों के बीच दोहरायी जाये, उसे प्रस्तुत किया जाये तो वह लोकप्रिय होती जाती है.

हम इसे एक उदाहरण से समझ सकते हैं. बिहार के गांवों में लोग काफी समय से आल्हा-ऊदल की कहानी गाते हैं. अगले सौ सालों में मान लीजिए कि कोई इसे लिपिबद्ध कर दे. उसके बाद इसे काव्य मानना शुरू कर दिया जायेगा. इस तरह लोकप्रिय वाचिक परंपरा लिखित साहित्य परंपरा में बदल जाती है. और फिर लिखित साहित्य को कालांतर में भ्रमपूर्वक इतिहास के बतौर ले लिया जाता है. रामायण के साथ यही हुआ.

हम देखते हैं कि काल और स्थान के अनुरूप रामायण भी अलग-अलग हैं. फादर कामिल बुल्के ने राम कथा पर जो शोध किया था, उसके तहत उन्होंने रामायणों की कुल संख्या 300 बतायी. मगर रामानुजम ने जो शोध किया, तो उनका कहना है कि कन्नड और तेलुगु में ही हजारों रामायण हैं. बाकी भाषाओं को तो छोड दीजिए. और उनके पाठों में भी अंतर है.

ऐसा इसलिए होता है कि कहानी जब ट्रेवल करती है, समाज का एक वर्ग जब दूसरे वर्ग की कहानी को अपनाता है, तो इसमें वह थोडी बदल जाती है और इसे अपनाने की प्रक्रिया की भी अपनी एक कहानी बन जाती है.

आमतौर पर उत्तर भारत में माना जाता है कि सीता बडी पतिव्रता स्त्री थीं. मगर संथालों के रामायण में सीता के चरित्र के बारे में बताया गया है कि उनके रावण से भी संबंध थे और लक्ष्मण से भी. बौद्धों का जो रामायण है-दशरथ जातक-उसमें राम और सीता को भाई-बहन बताया जाता है और वे बाद में शादी करते हैं. इन राम का संबंध अयोध्या से नहीं बल्कि बनारस से है.

तो यह कहना कि कोई भी कहानी स्थिर है, सही नहीं है. वाल्मीकि रामायण के बारे में इतिहासकारों का मानना है कि उसका पहला और अंतिम कांड बाद में लिखा गया. हमें इन चीजों को एक लचीले नजरिये से देखना चाहिए.

हम देखते हैं कि अभी की प्रमुख समस्या सांप्रदायिकता की है. इतिहासकारों को सांप्रदायिकता से लडना है. आरसी मजूमदार जैसे इतिहासकारों का बडा असर रहा है और जो दक्षिणपंथी गिरोह हैं, वे उन्हीं से अपनी लेजिटिमेसी ठहराते रहे हैं. मगर फिर भी आजादी के बाद से इतिहासकारों का नजरिया काफी वैज्ञानिक ही रहा है. इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस में सैकडों इतिहासकार हैं. इतिहास कांग्रेस ने कभी भी सांप्रदायिक दृष्टि नहीं अपनायी. सांप्रदायिक पक्ष जो एक्सक्लूसिव विजन देता है, अल्पसंख्यकों के खिलाफ और अपने अतीत के बारे में वह बिल्कुल गलत है. जो भी इस देश में गंभीर रिसर्चर हैं, वे इसके विरुद्ध हैं. यह एक बडी चुनौती है.

अपने यहां सिर्फ दृष्टि की समस्या ही नहीं है. इतिहास लेखन को व्यवस्थाजन्य चुनौतियों से भी दो-चार होना पडता है. यह एक बडी कमजोरी है कि खुदाइयों के बारे में कुछ पता नहीं चल पाता कि उनमें क्या मिला और उनसे हम किस निष्कर्ष पर पहुंचें. दरअसल यह गलती आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया की है. वह सब जगह खुदाई करवाती रहती है, मगर उसकी रिपोर्टें नहीं जमा की जातीं.

आप इसका नुकसान जानना चाहते हैं तो केवल अयोध्या विवाद का उदाहरण देना काफी होगा. इस विवाद में पूरा मामला इतना गडबडाया सिर्फ इसलिए कि बी लाल ने सालों तक खुदाई की रिपोर्ट नहीं जमा की. जो छोटी खुदाई हुई, कोर्ट के आदेश पर, सिर्फ उसकी रिपोर्ट जमा की गयी. उसके साथ भी छेड-छाड की गयी थी. जहां भी, जो भी अवशेष मिलता है, उसे भंडार में जमा कर दिया जाता है. उसके बारे में रिपोर्ट जमा ही नहीं होती. इससे पता नहीं चलता कि क्या मिला है और उसका क्या महत्व है.

ये लेख का अंश है जो ये बार बार हर जगह सिद्ध करता फिरता है

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