Saturday, 25 March 2017

देश आजाद हुआ तो किसी को इस वीर जवान की सुध ही नहीं रही और तब पीएम मोदी ने वो किया जो कांग्रेस को काफी समय पहले ही कर लेना चाहिए थ

पीएम मोदी की देशभक्ति को आप भी करेंगे सलाम, भगत सिंह का वो काम किया पूरा जिसके बारे में भूल चुका था पूरा भारत!

तारीख थी 30 मार्च 1930 और वक्त था रात के 11.30 बजे जब जेनेवा के एक हॉस्पिटल में भारत मां के एक सच्चे सपूत ने आखिरी सांस ली थी| इस वीर का नाम था श्याम जी कृष्ण वर्मा और इनकी मौत पर लाहौर की जेल में भगत सिंह और उसके साथियों ने भी शोक सभा रखी थी ये बात जानते हुए कि वो खुद भी कुछ ही दिनों के मेहमान थे|

   
सालों साल बीत जाने के बाद आखिरकार इस गुजराती क्रांतिकारी की अस्थियों की सुध ली एक दूसरे गुजराती ने और वो हैं देश के मौजूदा पीएम नरेन्द्र मोदी| नरेन्द्र मोदी ने ये बड़ा काम किया और जेनेवा की धरती से श्यामजी और उनकी पत्नी भानुमति की अस्थियां लेकर भारत आए| पीएम मोदी मुंबई से श्याम जी कृष्ण वर्मा के जन्मस्थान मांडवी तक भव्य जुलूस के साथ उनका अस्थि कलश राजकीय सम्मान के साथ लेकर आए।

इतना ही नहीं श्याम जी कृष्ण वर्मा के जन्म स्थान पर भव्य स्मारक क्रांति-तीर्थ  बनाया और उसके परिसर के श्यामजी कृष्ण वर्मा कक्ष में उनकी अस्थियों को सुरक्षित रखा| पीएम मोदी ने क्रांति तीर्थ को भी बिल्कुल वैसा ही बनाने की कोशिश की जैसा कि श्याम जी कृष्ण वर्मा का लंदन में इंडिया हाउस हुआ करता था|

आखिर क्या था ये लंदन हाउस और कौन थे श्याम जी कृष्ण वर्मा जिनकी अस्थियों को भारत की ज़मीन पर लाने के लिए पीएम मोदी ने कर दिया था दिन-रात एक और फिर एक दिन…

कौन थे श्याम जी कृष्ण वर्मा?

श्यामजी कृष्ण वर्मा का जन्म 4 अक्टूबर 1857 को कच्छ के मांडवी में हुआ था| पिता की जल्दी मृत्यु के बाद उनकी पढ़ाई मुंबई के विल्सन कॉलेज से हुई| संस्कृत से उनका नाता यहीं जुड़ा, जो बाद में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में संस्कृत पढ़ाने के काम आया| उनकी पत्नी भानुमति एक सम्पन्न परिवार से थीं, इसी दौरानउनका सम्पर्क स्वामी दयानंद सरस्वती से हुआ और वो उनके शिष्य बन गए| पूरे देश में श्यामजी ने उनकी शिक्षाओं को प्रसारित करने के लिए दौरे किए| यहां तक कि काशी में उनका भाषण सुनकर काशी के पंडितों ने उन्हें पंडित की उपाधि दे दी, ऐसी उपाधि पाने वाले वो पहले गैर ब्राह्मण थे|

उसके बाद वो ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में पढ़ने लंदन चले गए, जहां संस्कृत के प्रोफेसर मोनियर विलियम्स ने उन्हें अपना असिस्टेंट बना लिया| वहां से श्यामजी ने ग्रेजुएशन किया और एमए और बार एट लॉ ऑक्सफोर्ड से करने वाले वो पहले भारतीय बने| इस दौरान वो एशियाटिक सोसायटी के सदस्य बन गए, बर्लिन कांग्रेस ऑफ ओरियंटलिस्ट में भारत का प्रतिनिधित्व किया और सात साल लंदन रहने के बाद वो 1885 में भारत लौट आए|
 वही साल था जब देश में कांग्रेस की स्थापना हुई थी, लेकिन श्यामजी कांग्रेस के उसकी याचना की नीतियों के हमेशा आलोचक बने रहे| भारत आकर उन्होंने बतौर वकील अपना काम शुरू किया| बहुत जल्द उनको रतलाम स्टेट का दीवान बना दिया गया लेकिन तबियत खराब रहने के चलते उन्होंने वहां से छुट्टी ले ली| उस वक़्त उनको इस नौकरी की ग्रेच्युटी में बत्तीस हजार रुपए मिले थे| उन्होंने अपनी ये रकम कॉटन के बिजनेस में लगा दी और खुद अपने गुरू स्वामी दयानंद के प्रिय शहर अजमेर में बस गए और बिटिश कोर्ट में प्रैक्टिस करने लगे| इसी दौरान वो दो साल तक उदयपुर स्टेट के काउंसिल मेम्बर भी रहे और फिर वो गुजरात में जूनागढ़ स्टेट के दीवान भी बने| इसी दौरान उनका एक ब्रिटिश एजेंट से इस कदर झगड़ा हुआ कि ब्रिटिश सरकार के प्रति उनके मन में नफरत भर गयी और उन्होंने इस नौकरी से इस्तीफा दे दिया| 1890 में एज ऑफ कसेंट बिल वाले विवाद में तिलक का उन्होंने जमकर साथ दिया, पुणे के प्लेग कमिश्नर रैंड की हत्या के केस में भी वो चापकर बंधुओं का समर्थन करने से पीछे नहीं हटे| इसी दौरान उनको पता लग गया था कि देश में रहकर अंग्रेजों का विरोध करना आसान नहीं है और ये काम लंदन में रहकर थोड़ा आसानी से हो सकता है और इसलिए…
लंदन के मंहगे इलाके में श्याम जी कृष्ण वर्मा ने इंडिया हाउस खोला और उसमें 25 भारतीय स्टूडेंट्स के लिए रहने-पढ़ने की व्यवस्था की, ताकि वो वहां रहकर लंदन में अपनी पढ़ाई पूरी कर सकें| इसके लिए श्याम जी कृष्ण वर्मा ने बाकायदा कई फेलोशिप भी शुरू कीं| ऐसी ही एक शिवाजी फेलोशिप के जरिए वीर सावरकर भी लंदन हाउस में रहने आए| इसी लंदन हाउस में सावरकर ने क्रांतिकारी मदन लाल धींगरा को हथियार चलाने की ट्रेनिंग दी, जिसने बाद में…
जिसने बाद में भारत सचिव वाइली की लंदन में ही गोली मारकर उसकी हत्या कर दी| भारत सचिव ब्रिटिश सरकार का वो अधिकारी या मंत्री होता था, जिसको भारत का वायसराय रिपोर्ट करता था|  इस तरह से किसी भी ब्रिटिश अधिकारी के मारने की अब तक की ये सबके बड़ी घटना थी वो भी उनके घर में घुसकर यानी लंदन में| साफ है कि इंडिया हाउस युवा क्रांतिकारियों का गढ़ बनता चला गया|
सीक्रेट सर्विस के एजेंट श्यामजी पर नजर रखने लगे| यहां तक कि उन पर कई तरह की पाबंदियां लगा दी गईं|  इधर वीर सावरकर वहां आकर रहने लगे और कई साल तक रहे भी| उन दिनों वो मदन लाल ढींगरा को हथियार चलाने की ट्रेनिंग भी दे रहे थे| श्यामजी ने इंडिया हाउस की जिम्मेदारी वीर सावरकर को सौंपी और वो 1907 में पेरिस निकल गए| हालांकि अंग्रेजी सरकार ने उनको वहां भी परेशान किया लेकिन श्याम जी ने कई फ्रांसीसी राजनेताओं से संपर्क बना लिया और वो वहीं से पूरे यूरोप के भारतीय क्रांतिकारियों को एकजुट करने, उनको मदद करने, कई भाषाओं में अखबार छपवाने आदि में मदद करने लगे|
लेकिन ब्रिटेन और फ्रांस के बीच एक सीक्रेट टाईअप के चलते उन्होंने पेरिस को भी छोड़ना बेहतर समझा और वो प्रथम विश्व युद्ध से ठीक पहले स्विटजरलैंड की राजधानी जेनेवा के लिए निकल गए| हालांकि वहां उन पर थोड़ी पाबंदियां थीं, फिर भी वो जितना हो सकता था, यूरोप में सक्रिय भारतीय क्रांतिकारियों की मदद करते रहे, ये वही वक्त था, जब दुनियाभर में मौजूद भारतीय विश्व युद्ध का फायदा उठाकर अंग्रेजी सरकार पर हमला करना चाहते थे, गदर क्रांतिकारियों और बाघा जतिन, रास बिहारी बोस ने भी ऐसी ही कोशिश की थी|
श्याम जी कृष्ण वर्मा को ये बाद में पता चला कि जिस प्रो इंडिया कमेटी के प्रेसीडेंट डॉक्टर ब्रीस से वो सबसे ज्यादा बातचीत करते थे, वो एक ब्रिटिश सीक्रेट एजेंट था|  इधर मदन लाल ढींगरा ने जैसे ही भारत सचिव वाइली की हत्या की, इंडिया हाउस अंग्रेजी सरकार के निशाने पर आ गया और 1910 में इसे बंद कर दिया गया लेकिन आज इंडिया हाउस को श्याम जी की बजाय वीर सावरकर की वजह से ज्यादा जाना जाता है, इंडिया हाउस की सामने की दीवार पर ही लिखा हआ है, “Veer Sawarkar- Indian Patriot and Philosopher lived here”.
इधर जेनेवा में श्याम जी कृष्ण वर्मा की तबियत खराब रहने लगी थी| उन्होंने लोकल प्रशासन और सेंट जॉज सीमेट्री के साथ अपनी और पत्नी की अस्थियां सौ साल तक रखने का करार किया,  इसके लिए उन्होंने फीस भी चुकाई| इस करार में ये भी था कि इस दौरान देश आजाद होता है तो उनकी अस्थियां उनके देश वापस भेज दी जाएं, वो वतन की मिट्टी में ही मिलना चाहते थे|

देश आजाद हुआ तो किसी को उनकी सुध ही नहीं रही|  इंदिरा गांधी के समय जरूर पेरिस के एक भारतीय विद्वान प्रथवेन्द्र मुखर्जी ने कोशिश की, लेकिन कामयाब नहीं हो पाए| तब नरेन्द मोदी 2003 में उनकी अस्थियों को वापस भारत लाए और उनका शानदार स्मारक इंडिया हाउस की शक्ल में ही मांडवी में बनवाया| पीएम मोदी अपने गुजराती क्रांतिकारी श्याम जी कृष्ण वर्मा से इतने ज्यादा प्रभावित रहे हैं कि ये माना जाता है कि जो दाढ़ी वाला लुक मोदी का है, वो दरअसल श्याम जी कृष्ण वर्मा के ही लुक से प्रभावित होकर रखा गया है|

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